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Tuesday, 9 July 2013

disaster


            इस आपदा का दोषी कौन? प्रकृति अथवा मनुष्य



    जून माह में उत्तराखण्ड में आयी आपदा को सरकारी तंत्र और मीडिया प्राकृतिक तो कुछ लोग मानवीय आपदा की संज्ञा दे रहे हैं। उत्तराखण्ड में हजारों लोगों की मौत और करोड़ों-करोड़ रुपये के सम्पत्ति के नुकसान के साथ यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इसके लिए जिम्मेवार कौन है? प्रकृति अथवा मनुष्य!

    प्रकृति को जिम्मेवार ठहराकर वे सभी लोग एकबारगी में ही बरी हो जाते हैं जिनके द्वारा शासन-प्रशासन चलाया जाता है। वे लोग भी एकदम ही भुलाये दिये जाते हैं जिनके द्वारा अपने हित व मुनाफे की हवस के कारण प्रकृति के साथ रोज खिलवाड़ किया जा रहा है। प्रकृति को दोषी ठहराकर गुनाहगार मासूम बन जाते हैं। भोले बन जाते हैं। क्या यह सच है कि प्रकृति ने ही यह आपदा रची है? क्या महज पहले आ गये मानसून के कारण यह सब घटा है?

    उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री व केन्द्र सरकार और मीडिया के एक बड़े हिस्से की बातों का तो यही अर्थ है कि यह भयानक प्राकृतिक आपदा थी। विजय बहुगुणा ने एक अंग्रेजी अखबार को दिये गये अपने इंटरव्यू में तो यही कहा। वे इस बात का जवाब दे रहे थे कि यह मानव निर्मित आपदा है कि नहीं। वे कहते हैं,‘‘ये उन लोगों द्वारा दिया जाने वाला बचकाना तर्क है जो प्रकृति को नहीं समझते हैं लेकिन सरकार को लज्जित महसूस करवाना चाहते हैं।’’

    प्राकृतिक आपदा के मुकाबले मानव निर्मित आपदा का तर्क भी लचर और भ्रम में डालने वाला है। इसमें प्रकृति तो आपदा के लिए जिम्मेवार नहीं है परन्तु सभी मनुष्य इसके लिए जिम्मेवार हैं। मनुष्यों के दायरे में सभी आ जाते हैं। उत्पीडि़त और उत्पीड़क भी, शोषित और शोषक भी। जो मर चुके हैं वे भी जो अभी मुसीबत में हैं वे भी। पहाड़ों में ऐश करने वाले भी और उनकी सेवा करने वाले भी। बहुर्राष्ट्रीय कम्पनियां भी और पहाड़ में किसी तरह जीवनयापन करने वाले छोटे किसान व खेतिहर मजदूर भी। हेलीकाप्टर से केदारनाथ, बद्रीनाथ जाने वाले अभिजात भी और पहाड़ में किसी तरह गुजर बसर करने वाले भी।

    इस आपदा को प्राकृतिक या मानवीय कहना सफेद झूठ बोलना है। आम लोगों की आंख में धूल झोंकना है। मूर्ख बनाना है।

    यह आपदा हमारे देश के शासक वर्ग के द्वारा निर्मित, प्रतिक्षित आपदा थी। यह आपदा शासकों की नीतियों की उपज है। यह आपदा ऐसे लोगों द्वारा थोपी गयी आपदा है जो भारत में एक दिन भी शासन करने के योग्य नहीं हैं। यह आपदा अभी उत्तराखण्ड में पैदा की गयी है कल ऐसी ही पूरे देश में कभी भी, कहीं भी घट सकती है। फिर वहां भी यही प्राकृतिक या मानवीकृत आपदा का शोर खड़ा हो जायेगा। सरकार, शासक वर्ग कहेगा प्राकृतिक। मानवतावादी, पर्यावरणवादी, गांधीवादी कहेंगे मानवीकृत।

    उत्तराखण्ड सरकार कह रही है कि इस आपदा में उसे कई हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। उत्तराखण्ड तीन साल पीछे चला गया है। पर्यटन उद्योग, चारधाम यात्रा जो उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था का प्रमुख हिस्सा है खतरे में पड़ चुकी है। बिजली परियोजना संकट में है। इसका क्या अर्थ लगाया जाए। बेताल उसी डाल में फिर बैठ चुका है जहां से आपदा ने उसे उतारा था।

    उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में पूंजीवादी विकास जिस ढंग व गति से हो रहा है वह भारतीय समाज व प्रकृति को गम्भीर संकट में डाल रहा है। प्राकृतिक संसाधनों का पूंजीवादी समाज जिस ढंग से इस्तेमाल करता है वह प्रकृति को गम्भीर व कई बार तो स्थायी नुकसान पहुंचाता है। जिस ढंग से प्रकृति से खनिज, तेल, गैस आदि का दोहन किया जाता है। वह एक तरह से उस स्थान तक पहुंच जाता है जहां ऐसी आपदाओं की नींव डाल देना है। किसी भी प्राकृतिक घटना के प्रभाव को कई हजार गुणा बढ़ा देना है। पूंजीवाद का अराजक व असमान विकास का यह परिणाम है।

    इसके साथ जो और अधिक महत्वपूर्ण है वह है शासकों का शासितों से बढ़ता जाता अलगाव। मजदूरों, किसानों और अन्य मेहनतकशों से अलगाव और उनके प्रति असंवेदनशीलता अपने चरम पर इस व्यवस्था में पहुंचती जाती है। उत्तराखण्ड में अन्यथा ऐसे कैसे होता है कि वही कहानी बार-बार दुहरायी जाती है जो पिछली हर प्राकृतिक आपदा के आने के बाद घटी। पिछले दो दशकों में ही उत्तराखण्ड कभी भूकम्प, कभी भू-स्खलन, कभी बादल फटने, कभी बाढ़ आ जाने से लहूलुहान होता रहा है। क्यों पिछली आपदा से कोई सबक नहीं सीखा गया। क्यों पूर्व तैयारी नहीं की गयी। खबरें यहां तक आ रही हैं कि आपदा प्रबंधन के लिए बनाये गये निकाय की बैठकें समय-समय पर आयोजित ही नहीं की गयी। मंत्री, अफसर किन कामों में व्यस्त और किन दायित्वों का निर्वाह करते हैं, खुदा जाने! निकम्मे, निर्लज्ज, शासकों से यह उम्मीद करना कि वे भारत के मजदूरों, किसानों, निम्न मध्मयवर्गीय के जीवन, उनकी परेशानियों, कठिनाइयों का ख्याल रखेंगे, व्यर्थ है। झूठी आशाएं पालना है।

    भारत के शासकों का जो व्यवहार इस समय है क्या भोपाल गैस काण्ड से वह कुछ खास भिन्न है। कुछ वर्ष पूर्व आयी सुनामी या बिहार में आई कोसी नदी की बाढ़ या उड़ीसा व पश्चिम बंगाल में आये चक्रवाती तूफानों के समय कमोवेश ऐसा ही नहीं होता है जैसा आज उत्तराखण्ड में हो रहा है।

    अधिक से अधिक ऐसे मौकों पर राज्य केन्द्र सरकार या फिर विभिन्न पूंजीवादी कम्पनियां या दाता संस्थाओं की भूमिका खैरात बांटने की होती है। खैरात का काम करने वालों को भी ऐसे मौकों पर फलने-फूलने का बढि़या मौका मिल जाता है। यह सब क्या है? यह सब कुछ ऐसा है जैसे जख्म देने वाले ही मरहम लेकर हाजिर हो जायें। युद्ध छेड़ने-थोपने वाले ही शांति मिशन की बातें करें।

    भारत के मेहनतकश मजदूर, किसान भारत के शासकों की खैरात की मोहताज नहीं हैं। वे हर कष्ट, दुःख, आपदा में सदियों से खुद ही लड़ते रहे हैं। खुद ही खड़े होते रहे हैं। उनकी रीढ़ की हड्डी मजबूत व सीधी है उनकी दुर्दशा का कारण वे स्वयं नहीं हैं। इसका कारण तो आज का शासक वर्ग और उसकी व्यवस्था है। आपदा या फिर और गैर आपदा का समय हो भारत की मेहनतकश जनता अपना जीवन भारी मेहनत व कठिनाइयों के बीच जीती है। उसके जीवन में अच्छे या बुरे शासकों से कुछ ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। उसके जीवन में प्रभाव या बदलाव अब तो उसके स्वयं के ही शासक बनने से पड़ेगा। उसके संगठित होने और वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को बदलने से ही पड़ेगा। पूरे भारतीय समाज को नये आधार पर संगठित व पुर्ननिर्मित करने से ही पड़ेगा। इंकलाब ही उसकी जीवन की समस्याओं को हल कर सकता है।  

    मजदूर-किसानों का राज ही वह समाज निर्मित कर सकता है जहां प्रकृति व मनुष्य के उस संबंध की स्थापना की जा सकती है जिसमें मनुष्य प्रकृति के नियमों को सही ढंग से समझकर उसमें अपने हित वैज्ञानिक ढंग से साधेगा। उससे लेगा भी परन्तु उसे संरक्षित भी करेगा। अपने आने वाली पीढ़ी को हर गुजरने वाली पीढ़ी ऐसा समाज और प्रकृति भेंट करेगी जो पहले से और अधिक उन्नत और बेहतर होगी। पूंजीवादी समाज में यह संबंध एकदम उल्टा है

Friday, 28 June 2013




राज्य सरकार  की घोर असंवेदनशीलता व दावो की हकीकत  को उजागर करते उत्तरकाशी के कुछ गाँव
                 हम क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन , परिवर्तन कामी छात्र संगठन व प्रोग्रेसिव मेडकोज फोरम के 8 लोगो की संयुक्त टीम ने 21 जून की रात को देहरादून से उत्तरकाशी को प्रस्थान किया ।  इस टीम में 4 डाक्टर थे ।  मसूरी ,  धनोल्टी ,सुआखेत,भवान, चिन्यालीसौड़  रास्ते से होते हुए हमारी टीम सुबह  7 बजे उत्तरकाशी पेट्रोल पंप के पास लगे राहत शिविर के पास पहुंची    जिस सड़क से होकर हम गुजरे वह जगह जगह- जगह पर कटी हुई थी कंही बह गई थी व कहीं कहीं धँसी हुई थी अस्थायी तौर पर दूरुस्त किए जाने के बावजूद अभी  सड़क  काफी  खराब है जोखिम काफी है ।  



उत्तरकाशी पेट्रोल पंप के पास राहत शिविर के पास हमने देखा कि लगभग 400-500 की तादाद में यात्री ( फंसे हुए पर्यटक) यहाँ इधर उधर बैठे हुए हैं  राहत शिविर के संचालनकर्ता द्वारा बार.बार माइक से चाय,दलिया व चने की सब्जी लेने के लिए पुकारा जा रहा था ।  लोग भूखे प्यासे थे कई कई किमी.  पैदल चलकर यहाँ पहुंचे थे।  लोगों की जरूरत के हिसाब से यह प्रबंध नाकाफी था ।  यह प्रबंध भी सरकार द्वारा नहीं किया गया था बल्कि गैर सरकारी संस्थानो,धार्मिक संस्थाओ व व्यक्तिगत प्रयासों के दम पर चल रहा था । राज्य सरकार ने खुद प्रबंध करने के बजाय इन संस्थानों के रहमों करम पर फंसे हुए यात्रियों को छोड़ रखा था ।  ये लोग यहा पर बड़ी बेचैनी से गाड़ी का इंतजार कर रहे थे ताकि जल्द से जल्द अपने घरों तक पहुँच सकें । ये अधिकांश पर्यटक निम्नमध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के लग रहे थे।  शासन प्रशासन द्वारा इन्हें गाड़ी में पहुचाने  का आश्वाशन दिया जा रहा था लेकिन इंतजार करते करते इनका धैर्य जवाब दे जा रहा था जिसका नतीजा झड़प के रूप में दिखाई दे रहा था।  यहा पर प्रबंध का जिम्मा सम्भाल रहे सिपाहियों व यात्रियों में घंटो से इंतजार करने के बावजूद गाड़ी ना पहुचने पर तीखी बहस हो रही थी । 






चुकीं हमारा मकसद उत्तरकाशी के आसपास के इलाकों में जाकर स्थानीय निवासियों के बीच मेडिकल कैंप लगाने की थी ऐसा इसलिए था कि बार.बार अखबारों व न्यूज चैनलों के माध्यम से स्थानीय लोगों को नज़रअंदाज़ किए जाने व उनके प्रति राज्य व केंद्र सरकार की घोर संवेदनहीनता उजागर हो रही थी ।
                इसी मकसद से हम जानकारी जुटाने के संबंध में जब यहा आपदा से निपटने के लिए बनाए गए रेसक्यू सेंटर में पहुंचे तो पता लगा कि आधा अधूरा स्टाफ़् ही यहा मौजूद था । हमने जब पूछा कि यहा आस पास के कौन से इलाके है जहा मेडिकल कैंप लगाया जा सकता है । तो इसका भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया । अपनी ज़िम्मेदारी को दूसरे के ऊपर डालते हुए बोले कि हमें नही मालूम  दूसरे अधिकारी से जानकारी ले लीजिये।  अंत में एक अधिकारी बड़े ही रूखेपन से कहा कि जाइये....  मनेरी चले जाइये यहाँ से 12 किमी दूर है ....  आपदा प्रबंधन में आये हो खुद ही आपदा में फ़सने आए हो......   ज्यादा मुझे नहीं पता...... अभी सी.  एम.  ओ.  साहब यहाँ नहीं है.....  थोड़ी देर में आएंगे ... वो सब बता देंगे । हम  1 घंटे तक मुख्य चिकित्सा अधिकारी का इंतजार करते रहे   लेकिन अधिकारी महोदय नही पहुंचे ।  फोन करने पर पता लगा कि दूर दूर से आपदा का हवाई नजारा लेने वाले मंत्रियों.बड़े अधिकारियों ने उन्हे उलझा रखा है ।  बिना जानकारी जुटाये हमें वापस आना पड़ा ।  इस दौरान आपदा पीड़ितों के फोन बार. बार इस कंट्रोल रूम में आ रहे थे लेकिन इनकी आशंका व दिक्कतों को बड़ी लापरवाही व संवेदनहीनता के साथ कुशलता से निपटाया जा रहा था ।



हमें क्षेत्र के बारे में कही से भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही थी ऐसी स्थिति में हमने हिमालयी पर्यावरण संस्था के सुरेश भाई से संपर्क किया । उन्ही की मदद से हमें जानकारी मिली कि  उत्तरकाशी के सामने नदी के पार दिलसौड़ ,चामकोट व अटाली गाव का संपर्क भी एक हद तक कटा हुआ है तथा इसके अलावा भटवाड़ी व डूँड़ा ब्लाक ज्यादा संकट में है धराली में कई गाडिया व मकान पहाड़ से गिरे  मलवे के नीचे दब  गए है   कीसमपुर, मनेरी,सहस क्षेत्र भी काफी प्रभावित है ।ये यहा से 15 से 40 किमी की दूरी पर हैं ।  संगम चट्टी मार्केट के इर्दगिर्द बसे 9.10 गाँव का संपर्क पूरी तरह कटा हुआ है। संगमचट्टी में गाडिया बह गयी तथा गाव के जिन लोगो ने लोन लेकर गाडिया ली है वह भी  सड़क ध्वस्त हो जाने के चलते इनके सड़क पर  ना चलने से अगले कई महीनो तक गाडियों की क़िस्त नहीं चुका पायेंगे ।

इस इलाके के बारे में जानकारी रखने वाले मातली के दो युवको रोशन व मानवीर के साथ उत्तरकशी के मातली क्षेत्र से हम लोग रवाना हुए  थोड़ा सफर गाड़ी से करने के बाद एक पैदल पुल को पार करने के बाद पैदल पैदल 3- 4 किमी का सफर तय कर हम गाव में पहुंचे इस गाव में तकरीबन 40 नाली जमीन बह गई थी व कुछ मकान तबाह हो गए थे ।  इस गाव में हमने मेडिकल कैंप लगाया । गरीब लोगो की हालत ज्यादा खराब थी वह जैसे तैसे गुजर कर रहे थे। लोगो ने बताया कि  अभी तक शासन.प्रशासन का कोई भी आदमी यंहा नहीं पहुंचा ना ही मुवावजे के संबंध में कोई प्रक्रिया अभी तक चली है । यही हमने अपनी टीम के एक हिस्से को यहा से तकरीबन 3-4 किमी दूर चामकोट के लिए रवाना किया लेकिन देर हो जाने के चलते वहा मेडिकल कैम्प नही लगाया जा सका ।

अगले दिन यहाँ के दुर्गम इलाके की ओर हमने प्रस्थान किया । उत्तरकाशी से 5 किमी दूर गंगोरी क्षेत्र से होकर हम गुजरे । यह क्षेत्र असी गंगा नदी के किनारे बसा है इस बार की तबाही की कहानी को नदी में ध्वस्त हुए जे सी बी मशीन गाड़ी, होटल,  खेत व नदी के बीचोंबीच खड़ा मकान बयां कर रहा था । यह भी समझ में साफ साफ आ रहा था की क्यों इस प्रकार की तबाहिया अब कुछ समय से आम बात हो गई है ।यहां की कच्ची पहाडियों में व असी गंगा नदी में अन्धधुध तरीके से बने कुछ बांध व इनका ध्वस्त होना , इसी प्रकार सड़कों का अंधाधूध  निर्माण तबाही बरबादी की ओर साफ़ साफ इशारा कर रहा था यह इशारा इस तबाही के सृजकों  की ओर था इस तबाही व बर्बादी के प्रतिनिधियों की ओर था  जो  भले ही इसे `हिमालयन सुनामीया ``प्राकृतिक या दैवीय आपदा’’ कह कर हम सब की आखो में धूल झोंकने की कोशिश कर अपनी जिम्मेदारियों व  जवाबदेही  से मुक्त होने में एडी चोटी का ज़ोर लगा रहे हों ।  
                 देशी विदेशी पूंजी के निवेश का चारागाह बने उत्तराखंड में जिस प्रकार अंधाधुध ढंग से आखे मूद कर अराजक तरीके से अनियंत्रित ढंग से बिना किसी मुकम्मल योजना  के यहा की भोगोलिक संरचना को ध्यान में रखे बगैर पहाड़ो को डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया जाता है और फिर बांधों का निर्माण बढ़े स्तर पर किया  जाता है टनेल बनाए जाते है  सड़कों का जाल बिछाया जाता है नदियों को तबाह किया जाता है खनन किया जाता है । और पर्यटन के नाम पर अंधाधूध ढंग से होटलों का रिजोर्टों  का निर्माण किया जाता है इसे बेलगाम छोड़ दिया जाता है इसीलिए यह सब भी बड़ी आसानी से हो जाता है की एक ओर मौसम विभाग द्वारा मूसलाधार बारिस की चेतावनी दी जाती है दूसरी ओर राज्य सरकार इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करके आंखेँ मूद कर एक लाख से ऊपर लोगों को इन दुर्गम यात्रा पर आने देता है यह इस हद तक होता है कि उसे इनकी संख्या का खुद ही कोई भान नही ।
                 और फिर जो तबाही व बर्बादी आती है उससे निपटने में घोर संवेदन्हीनता का परिचय शासकों द्वारा दिया जाता है . राज्य का मुख्य मन्त्री  3-4 दिन बाद रुद्रप्रयाग जिले में हवाई भ्रमण पर पहुन्चता है  वह पिछली  दफा ईको सेन्सितिव ज़ोन के मसले की तरह हाथ फैलाये राह्त पैकेज की मांग करने पहले ही  दिल्ली चला जाता है । राज्य सरकार व इसका आपदा प्रबन्धन इस तबाही से निपटने में असहाय व बदहवास नजर आता है शासन प्रशासन संवेदनहीन लापरवाह बना रहता है । केवल 12 हेलिकोप्टर पहले दो दिन लगाये जाते हैं सुप्रीम कोर्त के निर्देश के बाद ही व 2014 के लोक सभा के चुनाव की गणित याद आने के बाद ही सन्साधनो से सम्पन्न  केन्द्र सरकार जागती है तब  कहीं जाकर आपदा  प्रबन्धन कुछ हद तक दुरुस्त होता है ।
खैर अब पुनः हम गन्गोरी पर आते हैं यहा से होते हुए च्यों होते हुए हम रिफिला से कप्लोन्दा पहुन्चे इस 20 किमी की दूरी  को हमने दो गाडियों से तय किया जिसमें 700 रुपये खर्च हो गये । खैर यंहा से हमें सन्गम चट्टी पहुंचना था हम नदी के किनारे- किनारे और फिर फिसलन भरे खतर्नाक रास्ते को चढकर संगमचट्टी तक पहुचाने वाले पुल की तलाश में भटकते रहे यंही आकर पता लगा कि पुल तो ध्वस्त हो गया है और सन्गम चट्टी बाजार तबाह हो गया है और फिर पैदल रास्तों के भी ध्वस्त हो जाने के चलते हम नदी से तकरीबन 25-30 फिर ऊपर बनी टनैल नहर के किनारे -किनारे 1 से 2 फिट चौडी जगह से तकरीबन 1 किमी. की दूरी तय करके ऊपर पहाडी में स्थित एक गावं सेखू में पहुचे इस 5-6 किमी के पैदल  रास्ते को तय करने में हमें तकरीबन 2 -3 घन्टा लग गया ।
                गाव में पहुचते ही हमें शुरू में ही हमें एक ऐसा घर मिला जिसकी  स्थिति काफी   खराब थी  घर में   तीन सदस्य थे दो महिला व एक  पुरुष । महिला के पाँव में एक लकड़ी इस आपदा के दौरान घुस गयी थी लेकिन सारे रास्ते खराब होने व शासन प्रशासन से कोई मेडिकल  ना मिलने के चलते पाँव में संक्रमण फ़ैल रहा था । इस घर के लोगों ने हमें  बताया कि इस बार गाव के लोग अपने लिए राशन की व्यवस्था नहीं कर पाए । राशन अक्सर ही गावं के लोग जून के अंतिम हफ्ते में खरीदते थे इस बार बारिश जल्दी होने के चलते वो अनाज नहीं खरीद पाए ।  इसके बाद हमने पंचायती  घर में मेडिकल कैम्प लगाया यहाँ पर भी मेडिकल टीम ने कई   मरीजों की   जांच  की व दवा वितरित की  । गाव के लोगो में शासन प्रशासन व नेताओं के प्रति काफी नाराजगी व आक्रोश था ।
 अखबार व यहाँ गाव के लोगो से हमें जानकारी मिली कि यंहा से 8- 9 किमी की दूरी पर केल्सू क्षेत्र में  अगोड़ा व एक अन्य  गाव में उल्टी दस्त का प्रकोप फैला हुआ है जिसमें दो एक महिला समेत दो लोगों की मृत्यु हो चुकी है । लेकिन सरकार का कोई भी नुमाइन्दा यंहा नहीं पहुंचा । सी एम् ओ द्वारा अखबारी बयानबाजी कर दी गयी थी कि यंहा के लिए मेडिकल टीम रवाना कर दी गयी है । लेकिन हकीकत बिलकुल इसके विपरीत थी ।
                असी गंगा के दोनों ओर गाव बसे थे एक और सेखु व अगोड़ा गाव था तो दूसरी ओर काफी दूर दूर गजोली ,नौगाव , भंकोली, ढासडा   आदि गाव बसे थे । इन सभी   गावो का संपर्क पूरी तरह से कटा हुआ था यंहा गजोली गाव के पास लगा आडिया का एकमात्र टावर भी पिछले कुछ दिनों से तेल ना होने के चलते बंद पडा हुआ था ।

सड़को व पुल के ध्वस्त हो जाने के चलते अगले 5-6 माह से पहले शहर से संपर्क होने की उम्मीद नहीं । साफ़ तौर पर समझ में आ रहा था कि यंहा हेलिकोप्टर से मेडिकल सहायता आसानी से दी जा सकती है व राहत सामाग्री  भी ।यही यह बात भी स्पष्ट हो रही थी  कि गाव के पूरी तरह से तबाह  लोगो को चिकित्सा सुविधा , भोजन ,रहने के लिए मकान की व बरतनों कपड़ो जरूरत ।
                हालात इतने बुरे है कि नदी के किनारे की जमीन लगातार  दरक रही है इसके नदी में समा जाने की आवाज गडगडाहट के साथ बड़ी दूर तक सुनायी देती है । कुल मिलाकर इस यात्रा ने हमारे सामने आपदा से निपटने के उसके तमाम दावों की कलई खोल दी थी  यही नहीं जिन पर्यटकों का  शासन प्रशासन में दखल था जो हाई प्रोफ़ाइल थे उन्हें गरीब व निम्नमध्यमवर्गीय पृष्ठभूमी के लोगो की तुलना में काफी तवज्जो दी जा रही थी । शासन प्रशासन यह दावा कर रहा था  कि फंसे हुए  यात्रियों को मुफ्त में यंहा से  आ रहा है हकीकत यह थी कि अधिकाँश से उतराकाशी  से देहरादून तक 2 0 0 -3 0 0 रुपया लिया जा रहा था । अधिकारियों का उत्तराकाशी  शहर में ही  अपने बेड़े के साथ चक्कर लगाया जा रहा था ।स्थानीय लोगो के पास आवागमन की कोई सुविधा नहीं थी लेकिन ये अधिकारी व मंत्री हेलीकाप्टर व गाड़ियों में मुफ्त सफ़र कर  कर रहे थे । गाव में जाकर हकीकत से रूबरू होने की लोगो के दुःख तकलीफों को महसूस करने की ना तो इनकी जरूरत थी ना ही इसका एहसास । हर जगह की तस्वीर देखने के बाद ऐसा लग रहा है जैसे ये गिद्द् है  जो दुःख तखलीफो में घिरी तबाह बर्बाद जनता को नोच रहे  है  


uttarakhand disaster

No ! No!!  neither  it is the natural disaster  nor the man made disaster
   No ! No!!   it is not natural disaster  or the man made disaster 
 as the electronic and prit corporate  media presents before us.  
 it is the disaster created by the ruling class i.e. the government . the manner in which way  the unplanned, uncontrolled unscientific costruction (development) is going on in uttarakhand specially since the last decade it lead the disaster.
  the construction the design  of  the huge n. of dam, river tunnel, roads,   besides this the huge quantity of garbage produces during this construction and been thrown into the river, the hotels resorts and other things in the close vicinity of river have inherent quality of devastation or disaster.
    so  all of us should say that it is the uttarakhand government, central government who is the designer or creator of this disaster. the ruling class is the designer finally it is the capitalist system which is in one hand destruct the environment as well as the poor human being ( specially the worker ) and the other hand pretends to conserve the environment in the form of national park, sancturies, and eco sensitive zone. In its environmental  conservation ruling class again put huge pressure on the poor people devastate,  displaced and loot them as well as natural resources .

Monday, 27 February 2012

Raise the red flag high

Call for 'All India Bandh' by the central trade union is an occasion for the workers to show their united strength to the capitalist class. The Bnadh call by all central trade union is a big opportunity to show the revolutionary zeal of the workers. Capitalist class wants to extract last drop of blood from a worker's body to augment his super profit. Job security and legal protections of labor laws have vanished in the era of new economic policy where every thing won over by the struggle of the worker's martyrs have been snatched by the ruling capitalist class. Contract labor is not an exception in the factories but , it has become rule for hiring workers.Mr. Manmohan singh ; prime minister of India in a recent labor conference has shamelessly disclosed nefarious design of ruling capitalist class. They want to snatch all those which is still existing in the name of worker's protection in law book of the Indian state. Mr. Prime minister has accused the so called labor protection regime for slow pace of economic growth. Worker's right to get their union registered has been taken away by the covert state policy to not to register new trade union.
Central trade unions policies of compromise and surrender has given edge to the ruling capitalist class.
Now , it is time to raise and turn the tide in favor of working class.
Let us join the hand to make 28 February 'All India Bandh' a great success by seizing the opportunity in worker's hand for bright future ahead. Let the Bandh become a mile stone for future struggle of working class to make a society based on equality. Socialism is only way out for the emancipation of workers from yoke of capitalism.
Workers of the world get united!
Long live revolution.
Krantikari lok Adhikar Sangathan.

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...