बरेली में किसानों की शहादत पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम
लखीमपुर खीरी में किसानों की शहादत पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा किये गए आह्वान पर क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन एवं क्रांतिकारी किसान मंच द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम।
जनवादी अधिकारों के लिए संघर्षशील व साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी संगठन
बरेली में किसानों की शहादत पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम
लखीमपुर खीरी में किसानों की शहादत पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा किये गए आह्वान पर क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन एवं क्रांतिकारी किसान मंच द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम।
साथी कंचन को श्रद्धांजलि
प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच, बरेली के नेता कामरेड कंचन का 16 सितम्बर 2021 को प्रातः बरेली में निधन हो गया। वे कैंसर से पीड़ित थे और बीते डेढ़ माह से कोमा में थे। करीब 4 माह पहले ही उन्हें सांस लेने में तकलीफ शुरू हुयी और उसके बाद शुरू हुए इलाज में जांचों के पश्चात यह सामने आया कि उन्हें फेफड़ों का कैंसर है और कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों के साथ दिमाग में भी फैल गया है। 4 दिन पूर्व तक वे ऋषिकेश एम्स में भर्ती थे। कैंसर की पुष्टि व उसके फैलाव का पता चलने के पश्चात डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिये थे।
कामरेड कंचन का यूं जाना उनको जानने वाले सभी लोगों को हतप्रभ कर गया। जिन्हें उनकी लाइलाज बीमारी का पता भी था वे भी उनके इतनी जल्दी जाने की उम्मीद नहीं कर रहे थे।
कामरेड कंचन का इंकलाबी जीवन लगभग ढाई दशक का रहा। इस दौरान वे क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, मेडिकल वर्कर्स एसो. व प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच में विभिन्न जिम्मेदारियां उठाते रहे। सांस्कृतिक कर्म में उनकी संगठन में जुड़ने से पहले से ही रुचि थी। गीत गायन, तरह-तरह के वाद्य यंत्र बनाने, नाटक करने आदि में वे पहले से ही सिद्धहस्त थे। अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों व सहज व्यवहार के चलते, वे न केवल अपने संगठन में बल्कि बरेली शहर की तमाम ट्रेड यूनियनों, संगठनों में काफी लोकप्रिय थे। उनकी मांग शहर में होने वाली हर छोटी-बड़ी सभा-गोष्ठी-जलसों में सांस्कृतिक प्रस्तुति के लिए होने लगती थी।
उनकी सांस्कृतिक प्रतिभा को देखकर ही उन्हें एक सांस्कृतिक संगठन खड़ा करने का कार्यभार दिया गया। जिसे बखूबी निभाते हुए उन्होंने प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच के गठन में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी। इस मंच के गठन की प्रक्रिया में उनकी सांस्कृतिक प्रतिभा और निखरती गयी। उनकी प्रस्तुतियां अधिक लोकप्रिय होती गयीं। मंच के निर्माण के बाद उनके नेतृत्व में मंच के साथी बरेली शहर के बाहर भी विभिन्न बड़े जलसों, जनसंघर्षों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देने लगे। अपनी बीमारी से पहले तक वे किसान आंदोलन में गाजीपुर बार्डर पर 3-4 माह तक लगातार मौजूद रहे। गाजीपुर बार्डर पर भी अपनी प्रस्तुतियों के चलते वे काफी लोकप्रिय हो चुके थे।
कामरेड कंचन सरल-सहज स्वभाव के व्यक्ति थे। साथियों के साथ घुल मिल जाने, लोगों को अपनी बातों से प्रभावित कर लेने, आम जन से उनकी भाषा में बातें करने में वे माहिर थे। वे पूरे दिल से गाते-बोलते नजर आते थे और उनकी जुबान ही नहीं आंखें भी बोलती नजर आती थीं। वे विभिन्न अन्य मुद्दों पर खुद गीत रचने की कोशिश करते थे, गीतों की नयी धुन इजाद करने का प्रयास करते थे। इस कोशिश में वे ज्यादातर सफल होते और उनकी ज्यादातर नयी प्रस्तुति पसंद की जाती। हालांकि कई दफा उन्हें नाकामयाबी भी मिलती। और लोग उनकी नयी धुन को पसंद नहीं करते लेकिन इसके बावजूद साथी कंचन निराश नहीं होते थे बल्कि अपनी लगन से नई धुन रचने में लगे रहते।
2006 से मजदूर संगठन ( इमके) में काम करने के बावजूद क्रालोस के कार्यक्रमो उनकी मौजूदगी रहती थी। कभी तकनीकी कामों में सहयोग के लिए तो कभी सांस्कृतिक विधा की प्रस्तुति हेतु।
2019 के क्रालोस के सम्मेलन में उनके गाये गए गीत और नाटक की प्रस्तुति बेहद सराहनीय थी। इस साल जुलाई में स्वास्थ्य खराब होने से पहले 4-5 माह तक वह लगातार ही गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों के बीच मौजूद रहे। गीतों, मिमिक्री और एकल नाटक के जरिये वह किसानों के दुख दर्द, किसानों के आंदोलन को स्वर देते रहे।
क्रांतिकारी राजनीति में सक्रिय होने के बाद लम्बे वक्त तक तरह-तरह के काम करते हुए अपने परिवार का पालन करते रहे। ज़िन्दगी के इस कठिन संघर्ष में भी उनकी समाज बदलने की चाहत की लौ कभी मद्धिम नहीं हुई।
इस अंधेरे दौर में ऐसे साथी का अकस्मात हमारे बीच से चले जाना न केवल उनके परिवार के लिए क्षति है बल्कि प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच के लिए यह काफी बड़ी क्षति है। इसके साथ साथ यह हम सभी लोगों व संगठनों के लिए जो समाज को पूंजी की जकड़न से मुक्त करने के संघर्ष में लगे हुए हैं उनके लिए भी गहरी क्षति है। साथी कंचन की कमी को हम जल्द भर सकें और मानवता की मुक्ति के उनके संघर्ष तथा सपने को शिद्दत से आगे ले जा सकें यही हमारी उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कॉमरेड नगेंद्र को लाल सलाम
◼◼◼◼◻◻◻◼◼◼◼
पिछले ढाई दशकों से मजदूर वर्ग की विचारधारा को समर्पित एक योद्धा की तरह कॉमरेड नगेंद्र अपनी अंतिम सांस तक मजदूर मेहनतकश अवाम के संघर्षों को समर्पित रहे।
आप छात्र जीवन से ही परिवर्तनकामी छात्र संगठन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए क्रांतिकारी विचारों की राह पर बढ़ते गए। इंकलाबी मज़दूर केंद्र के उपाध्यक्ष और पाक्षिक अखबार नागरिक (अधिकारों को समर्पित) के संपादक के बतौर कॉम. पिछले कई वर्षों से अपनी संघर्षशील और वैचारिक भूमिका का निर्वाह करते रहे।
पिछले कुछ सालों से केंसर जैसे रोग से ग्रस्त होने के बावजूद आपकी सक्रियता बनी रही। मगर इस बीच स्थितियां ज्यादा जटिल होती गयी। अंततः 10 जून की रात को 8 बजे कॉम. नागेंद्र का निधन हो गया। यह न केवल संगठन बल्कि मुक्ति की आकांछा पाले तमाम लोगों के लिए अपूरणीय क्षति है।
कॉमरेड नागेंद्र के निधन की इस घड़ी में क्रालोस गहरा शोक प्रकट करते हुए, क्रान्तिकारी सलाम के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करता है। जिस ध्येय लिए आपका जीवन समर्पित रहा, उस दिशा में और शिद्दत बढ़ने का संकल्प लेता है।
हत्यारा गुजरात मॉडल
वक़्त खुद को दोहरा रहा है। इसने मोदी सरकार को मौके दिए। मगर कोई सबक,
मोदी और मोदी सरकार ने नहीं लिया। न अस्पतालों की व्यवस्था हुई, न
टेस्टिंग-ट्रेसिंग-ट्रीटिंग की नीति को शिद्दत से लागू किया, ना ही
वैक्सीनेशन को और ऑक्सीजन की व्यवस्था को गंभीरता से लिया गया। दहशत और
आतंक का माहौल फिर से बनाया जा रहा है।
सब कुछ राज्यों सरकारों के मत्थे डालकर मोदी-शाह की सरकार ने कोरोना
संक्रमण से अपना पिंड छुड़ा लिया , कोरोना संक्रमण से बचाव की जिम्मेदारी अब
राज्य सरकारों की है जबकि जी एस टी के रूप में आय केंद्र सरकार को बटोरना
है, सारे संसाधन केंद्र सरकार के पास है।
कोरोना संक्रमण के तेज़ प्रसार ने मोदी सरकार को नंगा कर दिया है यही हाल
योगी महाराज का है। अन्य राज्य सरकारों को भी कोरोना संक्रमण ने बेनकाब
किया है। ये अलग बात है कि जनता के पास विकल्प नहीं।
4 लाख तक मामले पहुंच चुके हैं कबकी मौते 3000-4000 के स्तर पर है। ये
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक है। हकीकत में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या
और मौतों की संख्या काफी ज्यादा है। अभी बरेली में ही सरकारी आंकड़ों के
हिसाब से मरने वाले 97 थे जबकि शमशान घाटों के आंकड़ों के हिसाब से मरने
वाले 600 थे। आंकड़ों का यह भारी फर्क मध्यप्रदेश से ले कर गुजरात तक हर जगह
देखा गया। गंगा नदी में बहती लाशों, रेत में दबाये गए सैकड़ों शव, अब चर्चा
का विषय हैं।
ज्यादा हंगामा इसीलिए है कि ऑक्सीजन वेन्टीलेटर की भारी कमी से शासक वर्ग
के निचले स्तर के लोग भी मारे गए हैं इन्हें भी ऑक्सीजन, वेन्टीलेटर के लिए
भटकना पड़ा है। मगर बहुसंख्यक आम जनता के लिए स्थिति बेहद विकट है। गांवों
की स्थिति बदहाल है। उत्तर प्रदेश के देहातों से मौतों के आंकड़े काफी
ज्यादा है। यहां क्योकि इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। कुछ जगहों पर तो
प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ही बंद पड़े हैं।
देश की राजधानी दिल्ली में सर गंगाराम जैसे अस्पताल में ऑक्सीजन के अभाव
में 25 लोग मर जाते हैं। तो फिर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग सकता है।
ऐसी खबरें अब आम हो गयी है।
मौतों का यह आंकड़ा, अस्पतालों की
दुर्गति, डॉक्टर नर्सों की भारी कमी, ऑक्सीजन-वेन्टीलेटर और दवाओं की भारी
कमी आम लोगों को डरा रही हैं इसने भारी अफ़रातफ़री और दहशत का माहौल पैदा हो
रहा है। ये मौतें कोरोना संक्रमण से उतनी नहीं है बल्कि इलाज के अभाव में
हो रही हैं यदि उचित समय पर उचित इलाज मिलता तो अधिकांश लोग बच जाते।
इसीलिए ये परोक्ष हत्याएं हैं जिसके लिए मुख्यतः मोदी-शाह और मोदी सरकार
जिम्म्मेदार है और देश के कॉरपोरेट शासक जिम्मेदार हैं। ये शासक वर्ग
द्वारा निर्मित त्रासदी है। इसमें शिव सेना, टी एम सी, आम आदमी पार्टी,
कांग्रेस से लेकर सभी चुनावबाज पूंजीवादी पार्टियों की भूमिका भी कम नहीं
है।
सार्वजनिक इलाज की व्यवस्था बेहद कमजोर पहले ही थी मगर मोदी सरकार ने तो
इस ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। सब कुछ प्राइवेट के भरोसे है और खोखली
आयुष्मान योजना के। आयुष्मान के तहत 6400 करोड़ मात्र का बजट सवा अरब से
ज्यादा की आबादी के लिए रखा गया। जबकि प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति और
उपराष्ट्रपति के लिए 2 बोइंग विमान के लिए ही 8458 करोड़ रुपये खर्च कर दिये
गए।
यही स्थिति वैक्सीनेशन के मामले में है। पहले तो मोदी सरकार
ने महिमामंडन में वैक्सीन का निर्यात विदेशों को किया ताकि आर्थिक राजनीतिक
समीकरण बनाये जा सकें। स्थिति अब यह बन गयी है कि वैक्सीन के भयानक अभाव
के चलते आयात को आपात मंजूरी देनी पड़ी है।
एक संदर्भ में देखा जाय तो इस मौके का भरपूर इस्तेमाल मोदी सरकार ने
वैक्सीन कंपनियों के लिए भी कर दिया है। वैक्सीन की कीमत 400 से लेकर 1200
तक तय कर दी गयी है।
मगर बेशर्म शासकों को शर्म नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी इसके बावजूद 'ऑक्सीजन से किसी को नहीं मरने देने' की बात
करते हैं, 'मन की बात' फरमाते हैं। ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए जो बैठक की
जाती है उसमें भी अपने कॉरपोरेट मित्रों को बिठाया जाता है। ताकि इस
निर्मित त्रासदी का 'आपदा में अवसर ' के रूप में इस्तेमाल आगे बढ़ सके।
एक ओर लफ्फाजी है तो दूसरी तरफ अलग-अलग स्तर पर राज्यों में 'कोरोना
कर्फ्यू', 'धारा 144', 'आपदा प्रबंधन कानून' के रूप में पुलिसिया दमन
कोरोना संक्रमण से बचाव का इलाज है। तरह तरह के निर्देश जारी करके माहैल
में भयानक अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा कर दी गयी है। यही नहीं, कोरोना
संकमण के त्वरित प्रसार का ठिकरा आम जनता पर ही फोड़ा जा रहा है।
राज्य स्तर पर हो रहे सीमित लॉकडाउन या कोरोना कर्फ्यू ने मजदूरों, छोटे
मझौले कारोबारियों के सामने संकट को गहन बना दिया है। एक बार फिर से
मजदूरों का सैलाब सड़कों पर है जो वापस घरों की ओर निकल पड़े हैं। इस प्रकार
से भयावह बेरोजगारी का संकट सामने है।
इस विकट स्थिति में आम लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर हालात को बयां कर रहे
हैं अपने साथ घटती घटनाओं को साझा कर रहे हैं। मगर हिन्दू फासीवादी सरकार
'अफवाह' के नाम पर इस ' आवाज' को बंद कर देना चाहती है। उत्तर प्रदेश की
योगी सरकार ने, इस प्रकार के 'अफवाह' फैलाने वाले लोगों के खिलाफ 'रासुका'
के तहत मुकदमा दर्ज करने का एलान कर दिया है।
कुलमिलाकर आज के मोदी-शाह की हिदुत्ववादी सरकार ने जो आर्थिक-राजनीतिक
हमला, जनता पर बोला है उसी की परिणति है कि कोरोना संक्रमण का दौर आम जनता
के लिए त्रासदी बन चुका है।
पंचायती चुनाव फिर आ गए हैं। प्रत्याशी फिर से, रंग बिरंगे दावों व वादों के साथ, हमारे बीच में हैं। ये वोटों को हासिल करने की घृणित जुगत में लगे हुए हैं। शराब, पैसा, ताकत, जाति-धर्म, भाई भतीजावाद का ही यहां शोरगुल है ।
प्रत्याशी हमारे बीच आते हैं। हमारे वोटों से जीतकर, अपने मालामाल होने के रास्ते बनाते हैं। रोजगार, सस्ती बेहतर शिक्षा, सस्ता बेहतर इलाज, महिला सुरक्षा और छिनते अधिकार आदि-आदि मुद्दों से तो, इनका कोई सरोकार ही नहीं।
सच यही है कि पंचायती निकाय की कोई हैसियत नहीं कि वह इन सभी मुद्दों पर काम कर सके, योजना बना सके और फिर उसे लागू कर सके। जिला पंचायत, नगर पंचायत और ग्राम पंचायतें सभी की यही स्थिति है। ऐसे में इन पंचायतों को अधिकारयुक्त संस्थाएं बनाने का संघर्ष होना चाहिए था। जो योजनाएं बनाती, केंद्र के लिए इसे भेजती फिर इसे लागू करती। मगर इस संघर्ष से इन प्रत्याशियों कुछ भी लेना देना नहीं ।
. इस दौर में नोटबंदी हुई, लॉकडाउन हुआ जिसमें एक ओर करोड़ों लोग बेरोजगार हुए, काम-धन्धा बर्बाद हुआ, दूसरी ओर अंबानी-अदानी जैसे लोग मालामाल हुए। करोड़ों मजदूर सैकड़ों किमी पैदल भूखे-प्यासे घरों को जाने को मजबूर कर दिए गए। कॉरपोरेट पूंजीपतियों की लूट और ज्यादा बढ़ गई। इनकी सरकार ने घोर किसान विरोधी बिल पास किये, घोर मजदूर विरोधी श्रम कानून बना दिये। किसान 'तीन कृषि कानूनों' के खिलाफ पिछले 5 माह से सड़कों पर है। इस सबमें, पंचायती निकायों की कोई हैसियत नहीं कि वह कुछ कर सकती हों। प्रत्याशियों के लिए तो ये कोई मुद्दे ही नहीं बनते।
ये पंचायतें हर तरह से अधिकारविहीन संस्थाएं हैं। ये सरकार की योजनाओं को लागू करने वाली संस्थाएं मात्र हैं। इन्हें आर्थिक मदद के लिए सरकार का मुंह ताकते रहना पड़ता है।
पंचायत क्षेत्रों में कुछ सुविधाओं हेतु केंद्र सरकार कुछ पैसा भेजती है। इस पैसे को ही हड़पने की होड़ प्रत्याशियों में होती है। इसे हड़पने के लिए, ये हर हथकंडे अपनाते हैं। यह सीख भी इन्हें, अपने बड़े पूंजीवादी नेताओं से ही मिलती है। चंद ईमानदार प्रत्याशी ही इसे देख निराश -हताश होते हैं और समझौता कर लेते हैं।
हकीकत यही है कि हमारे शासक इन पंचायत निकायों के जरिये अपनी शासन सत्ता को मज़बूत करते हैं।
देश के भीतर सारे ही फैसले लेने व नीतियां बनाने का अधिकार संसद के पास है। संसद पूंजीपतियों का औजार ही है। आम जनता को यही लगता रहता है कि वही सब कुछ करती है सभी को चुनती है दिखता यही है मगर हकीकत इसके ठीक उलट होती है। इसलिए जनता के 'अच्छे दिन' कभी नहीं आते मगर पूंजीपति मालामाल होते जाते हैं। वे अरबपति से खरबपति बन जाते हैं।
भा.ज.पा., स.पा., ब.स.पा., कांग्रेस समेत सभी पूंजीवादी पार्टियां चुनाव के समय जनता के बीच वोट मांगते हैं। इसके बदले अच्छे दिन लाने का वादा करते हैं। लेकिन हर चुनाव के बाद 'अच्छे दिन',‘बुरे दिन' में बदल जाते हैं। इन पार्टियों के नेता और देश के पूंजीपति ज्यादा मालामाल होते जाते हैं।
दरअसल ये सभी पूंजीवादी पार्टियां, इसी पूंजीवादी व्यवस्था को चलाने का काम करती हैं जो कि मजदूर मेहनतकश जनता की मेहनत को हड़पने का तंत्र है पूंजीपतियों को और खुद को भी मालामाल बनाने का यंत्र है। संसद में ये पार्टियां, इन्हीं के लिए नीतियां बनाती हैं व फैसले लेती हैं।
ये जनता की सामूहिक ताकत को नकारते हैं जनता को ठेंगा दिखाते हैं जनता को मूर्ख बनाते हैं धर्म-जाति की नफरत भरी राजनीति से जनता को बांट देते हैं जनता को आपस में लड़ाते हैं, दंगे करवाते हैं जनता का दमन करने को काले दमनकारी कानून बनाकर पुलिस का आतंक कायम करते हैं।
ये एक व्यक्ति को हीरो के रूप में स्थापित करते हैं जो कि अपने दम पर जनता के दुख-दर्द हर लेगा। ऐसा, मगर कभी होता नहीं। इसके उलट तानाशाही की स्थिति बन जाती है। पिछले 6 साल इस बात के गवाह है।
इसलिए आज असल सवाल, सामूहिक तौर पर संघर्ष करने का है। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का है।
हमें इन प्रत्याशियों पर दबाव बनाने की जरूरत है कि जनता के पक्ष में नीतियां बनाये जायं; हमारे अधिकारों को केवल वोट तक सीमित ना किया जाए बल्कि देश के स्तर पर सभी महत्वपूर्ण फैसले व नीतियां बनाने का अधिकार भी हमें मिले; बड़े महत्वपूर्ण फैसलों पर जनमत संग्रह करवायें जायें; तथा प्रतिनिधियों का वापस बुलाने का अधिकार भी हमें मिले ।
अंतत: यह सब हासिल हो जाने के बाद भी, लूट-शोषण उत्पीड़न वाली पूंजीवादी व्यवस्था चलती रहेगी क्योंकि फैक्ट्रियों, कल-कारखानों, फार्म्स ( बड़े खेतों), खानों सभी जगह पर इन पूंजीपतियों का ही नियंत्रण है। इसलिए समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष करने की जरूरत हैं। जहां सभी संसाधनों पर जनता का नियंत्रण हो।
यही वह व्यवस्था है जहां सारे ही अधिकार मजदूर मेहनतकश अवाम को होंगे। लूट शोषण पर पाबंदी होगी। रोजगार की गारंटी होगी। नि:शुल्क शिक्षा, चिकित्सा व परिवहन के अधिकार होंगे ।
इसलिए आइये ! पंचायती चुनाव में इन सवालों को उठाने एवं इनके लिए संघर्ष करने की जरूरत है :-
1-: जिला पंचायत, नगर पंचायत व ग्राम पंचायत सभी स्तर पर इन संस्थाओं को अपने क्षेत्र के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छता, प्रशासन आदि क्षेत्रों में योजनाएं बनाने का, इसे प्रस्तावित करने, केंद्र के साथ समन्वय करने का व इन्हें लागू करने तथा इस हेतु फण्ड सृजित करने का अधिकार हो।
2-: जाति, धर्म आदि की साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले तथा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों को चुनाव में प्रतिबंधित किया जाय।
3-: चुने गये पंचायत प्रतिनिधि को, 5 साल के अंदर किसी भी वक़्त वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास हो।
लगभग 100 साल पहले, 13 अप्रैल की तारीख, हमारे इतिहास में एक अलग ही मुकाम
रखती है। 13 अप्रैल 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड, जनता के कुर्बानी
भरे संघर्षों की
याद दिलाता है।
भारत
की जनता उस दौर में ब्रिटिश शासकों के शोषण, उत्पीड़न और जुल्म से त्रस्त
थी। जनता का संघर्ष, इस गुलामी के विरोध में शुरू से ही था इसीलिए अंग्रेज
शासकों ने जनता के क्रांतिकारी संघर्षों को कुचलने के लिए 'रॉलेट एक्ट'
लागू कर दिया था ।
आजाद भारत में जनता के संघर्षों को कुचलने के लिए यू.ए.पी.ए और राजद्रोह
जैसे कई खतरनाक काले कानून हैं। इसी तरह अंग्रेजों के जमाने में 'रॉलेट
एक्ट' था। इसके जरिये, जो कोई भी अंग्रेजी गुलामी का विरोध करता था, उसे
केवल शक के आधार पर 'आतंकवादी ठहरा' दिया जाता था और फिर जेल में 2 साल तक
के लिए बंद करके सड़ाया जाता था।
इस एक्ट के विरोध में ही जनता सड़कों पर उमड़ पड़ी थी। जलियांवाला बाग में,
13 अप्रैल 1919 के दिन, रॉलेट एक्ट के विरोध में 'हिन्दू-मुस्लिम-सिख' जनता
सभा कर रही थी। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं व पुरुष, सभी सभा में थे। तकरीबन 20
हज़ार लोग सभा में थे। शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे इन लोगों को चारों तरफ
से घेरकर, अंग्रेज सरकार ने, गोलियां चलवा दी थी। इस बर्बर हत्याकांड में
सैकड़ों लोग मार दिए गए और घायल कर दिए गए।
जलियांवाला बाग के शहीदों ने लुटेरे अंग्रेजी साम्राज्यवादी शासकों की
गुलामी के विरोध में संघर्ष किया था। इन शहीदों का संघर्ष 'धर्म के नाम पर'
जनता के बीच नफरत फैलाने और राजनीति करने वाली ताकतों के खिलाफ भी था।
धर्म का भेदभाव भुलाकर, ये सभी एकजुट होकर, संघर्ष में शहीद हो गए।
आज ऐसे वक्त में, जब देश में 'देशी-विदेशी पूंजी' को रोजगार से लेकर हर
मर्ज का इलाज का बताया जा रहा हो ; देशी-विदेशी पूंजी के मालिक ही देश के
नियंता बन बैठे हों; जब धर्म के नाम पर हर ओर नफरत फैलायी जा रही हो; तब
ऐसे घोर जन विरोधी और अंधेरे दौर में, जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीद
हमें रास्ता दिखाते हैं हमें प्रेणा देते हैं। यही हमारा रास्ता है।
जलियांवाला बाग जैसे कई-कई संघर्षों व कुर्बानियों के दम पर आखिरकार देश
आजाद हो गया था। 1947 में, देश अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद तो हुआ मगर जनता
को शोषण उत्पीड़न, जुल्म से मुक्ति नहीं मिली। शासक अब बदल गए। देश के
पूँजीपति, राजा-रजवाड़े, जमींदार और इनकी पार्टियां, अब शासक हो गये। तब से
अब तक की, यही कहानी है। आज, सब कुछ कॉरपोरेट पूंजीपतियों के कब्जे में है।
सरकारें और सभी पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां इनकी जेब में हैं। आज
अडानी-अंबानी, टाटा-बिड़ला जैसों की ही धूम मची है। यही आज के आदर्श हैं। अब
मोदी, मोदी सरकार औऱ अदानी-अंबानी का गठजोड़ आज सबके सामने है। कभी यही काम
कांग्रेस करती थी।
आज आम जनता के सामने चौतरफा संकट है कोरोना वायरस पर नियंत्रण के नाम पर
लॉकडाउन लगा मगर इसकी कीमत भी आम जनता ने ही चुकाई; करोड़ों लोगों की
नौकरियां खत्म हो गयी। छोटे-मझौले कारोबारियों का काम-धंधा चौपट हो गया।
दूसरी ओर इस तबाही-बर्बादी के दौर में भी कॉरपोरेट पूँजीपतियों का मुनाफा
35 % बढ़ गया। अब तो इन्हें लूट का लाइसेंस मिल गया है।
मोदी और मोदी सरकार ने कहा 'आपदा को अवसर में बदलो'। पूंजीपतियों के हित
में, घोर मजदूर विरोधी 'श्रम कानून' बना दिए गए। अब, काम के घण्टे बढ़ गए
हैं, न्यूनतम मजदूरी कम हो गई है, ट्रेड यूनियन बनाना व हड़ताल करना बेहद
कठिन बना दिया गया है, जब चाहो काम से कामगारों को निकाला जा सकता है।
नौकरी की तैयारी करते नौजवानों के दिन भी अब बेहद कठिन हो चुके हैं क्योंकि
नई भर्तियों पर भी अब लगभग रोक लग चुकी है।
कर्मचारियों का महंगाई भत्ता ही स्थिर कर दिया गया । पहले बैंकों का विलय
किया गया फिर इनके निजीकरण की ओर सरकार बढ़ गई है। ऑर्डिनेंस (आयुध)
फैक्ट्रीयां, एल.आई.सी., बी.पी.सी.एल. जैसी कंपनियों को कौड़ी के मोल
पूंजीपतियों को सौंपा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें
काफी कम रही हैं इसके बावजूद बहुत ज्यादा सरकारी टैक्स के चलते पेट्रोल,
डीजल व गैस की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इलाज, पढाई, यात्रा और भोजन सब कुछ
खूब महंगा हो चुका है।
यही नहीं, मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून तुरत-फुरत में बना दिये। इसके
चलते, एक तरफ देशी-विदेशी कंपनियां अनाज,दाल आदि की असीमित जमाखोरी करेंगी
दूसरी तरफ बाजार में अनाज, तेल, दाल आदि की कीमतों काफी बढ़ जाएंगी। कुल
मिलाकर , इसके चलते एक ओर छोटे-मझोले किसान कहीं ज्यादा तेजी से बर्बाद
होंगे तो दूसरी ओर आम जनता को मिलने वाला सस्ता अनाज लगभग बंद हो जाएगा,
भुखमरी से हालात बन जाएंगे।
इन कानूनों के खिलाफ किसान सड़कों पर हैं। लगभग 300 किसान इस आंदोलन में
शहीद हो चुके हैं मगर मोदी सरकार को किसानों की नहीं बल्कि अदानी-अंबानी
जैसों के मुनाफे की ही बेहद फिक्र है।
'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार अबकी बार मोदी सरकार', ये नारा मोदी व
भाजपा का था। मगर मोदी और योगी राज में, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और
बलात्कार जैसी घटनाएं कम नहीं हुई बल्कि काफी बढ़ गई हैं। चिन्मयानंद,
नित्यानंद, कुलदीप सेंगर जैसे अपराधी मोदी-योगी सरकार की शान बन गए। हाथरस
कांड, कटुवा कांड को कौन भूला सकता है ?
जो कोई भी, मोदी और मोदी सरकार को बेनकाब करता है, इनकी तमाम जनविरोधी
चीजों के खिलाफ बोलता है, लिखता है व आवाज उठाता है, कॉरपोरेट मीडिया और
संघी आई. टी. सेल उनको 'देशविरोधी' कहती है बदनाम करती है, फर्जी खबरें
चलाकर इन्हें अलग-थलग कर दिया जाता है। फर्जी मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है।
जे एन यू, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैदराबाद, बी.एच.यू. आदि के कॉलेज के
छात्रों के संघर्ष को इसी तरह बदनाम किया गया। किसी आंदोलन को पाकिस्तानी,
खालिस्तानी तो किसी को कांग्रेसी या नक्सली या हिन्दू विरोधी कहा जाता है।
यही नहीं, आंदोलनों को 'विदेशी मुल्कों' की साजिश बताया जाता है। यही
सी.ए.ए. विरोधी आंदोलन के साथ किया गया। यही कर्मचारियों, रोजगार की मांग
करते छात्र-नौजवानों के साथ किया गया। यही हाथरस और कटुवा में बलात्कारियों
व हत्यारों को सजा दिलवाने की मांग पर उमड़ी जनता के साथ किया गया। यही अब
किसानों के साथ हो रहा है।
इसीलिए कई लोग कह रहे हैं कि भारत में अब 'चुनावी लोकतंत्र' नहीं बल्कि
'चुनावी तानाशाही' कायम हो गई है। दुनिया में सबसे ज्यादा बार इंटरनेट पर
रोक भी भारत में ही लगाई गई है।
यही कहना सही होगा कि आज 'अघोषित तानाशाही' सी स्थिति बन चुकी है। यह
हिंदुत्व के नाम पर है। जनता के हर संघर्ष को 'हिन्दू विरोधी' या 'देश
विरोधी' बता दो और फर्जी संगीन मुकदमे दर्ज कर गिरफ्तार कर लो। यही हिन्दू
फासीवादी तौर तरीके हैं।
जलियांवाला बाग कांड के शहीदों का संघर्ष, आज भी हमें रास्ता दिखाता है।
इन शहीदों के लिए धर्म निजी मामला था, राजनीति व संघर्ष में धर्म के लिए
कोई जगह नहीं थी, इन्हें गुलामी से नफरत थी इसीलिए एकजुट होकर, आज़ादी के
संघर्ष में कुर्बान हो गए।
इन शहीदों ने हिंदू-मुस्लिम-सिख का भेद भुलाकर एकजुटता की मिसाल कायम की
थी और ऐसे भारत का सपना देखा था जहां देश और जनता आत्मनिर्भर हो, देश के
संसाधनों व हर चीज पर जनता का नियंत्रण हो, जहां जनता को असली आज़ादी व
समानता हासिल हो, जहां पर शोषण-उत्पीड़न की गुंजाइश ना हो, धर्म लोगों का
निजी मामला हो, सार्वजनिक जीवन- शिक्षा, कला व राजनीति में धर्म का कोई दखल
ना हो।
आज के दौर में जलियांवाला बाग के शहीदों को याद करते हुए अपने अधिकारों के
लिए, धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए संघर्ष करने की जरूरत है। हिंदू फासीवाद
द्वारा किये जा रहे हर हमले का प्रतिवाद जरूरी है।
चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी) बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...