Tuesday, 12 October 2021

बरेली में किसानों की शहादत पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम

बरेली में किसानों की शहादत पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम

      लखीमपुर खीरी में किसानों की शहादत पर संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा किये गए आह्वान पर क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन एवं क्रांतिकारी किसान मंच द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम।



Friday, 1 October 2021

साथी कंचन को भावभीनी श्रद्धांजलि



  साथी कंचन को श्रद्धांजलि
       

       प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच, बरेली के नेता कामरेड कंचन का 16 सितम्बर 2021 को प्रातः बरेली में निधन हो गया। वे कैंसर से पीड़ित थे और बीते डेढ़ माह से कोमा में थे। करीब 4 माह पहले ही उन्हें सांस लेने में तकलीफ शुरू हुयी और उसके बाद शुरू हुए इलाज में जांचों के पश्चात यह सामने आया कि उन्हें फेफड़ों का कैंसर है और कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों के साथ दिमाग में भी फैल गया है। 4 दिन पूर्व तक वे ऋषिकेश एम्स में भर्ती थे। कैंसर की पुष्टि व उसके फैलाव का पता चलने के पश्चात डॉक्टरों ने भी हाथ खड़े कर दिये थे।

       कामरेड कंचन का यूं जाना उनको जानने वाले सभी लोगों को हतप्रभ कर गया। जिन्हें उनकी लाइलाज बीमारी का पता भी था वे भी उनके इतनी जल्दी जाने की उम्मीद नहीं कर रहे थे।

       कामरेड कंचन का इंकलाबी जीवन लगभग ढाई दशक का रहा। इस दौरान वे क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, इंकलाबी मजदूर केन्द्र, मेडिकल वर्कर्स एसो. व प्रगतिशील  सांस्कृतिक मंच में विभिन्न जिम्मेदारियां उठाते रहे। सांस्कृतिक कर्म में उनकी संगठन में जुड़ने से पहले से ही रुचि थी। गीत गायन, तरह-तरह के वाद्य यंत्र बनाने, नाटक करने आदि में वे पहले से ही सिद्धहस्त थे। अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों व सहज व्यवहार के चलते, वे न केवल अपने संगठन में बल्कि बरेली शहर की तमाम ट्रेड यूनियनों, संगठनों में काफी लोकप्रिय थे। उनकी मांग शहर में होने वाली हर छोटी-बड़ी सभा-गोष्ठी-जलसों में सांस्कृतिक प्रस्तुति के लिए होने लगती थी।

      उनकी सांस्कृतिक प्रतिभा को देखकर ही उन्हें एक सांस्कृतिक संगठन खड़ा करने का कार्यभार दिया गया। जिसे बखूबी निभाते हुए उन्होंने प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच के गठन में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी। इस मंच के गठन की प्रक्रिया में उनकी सांस्कृतिक प्रतिभा और निखरती गयी। उनकी प्रस्तुतियां अधिक लोकप्रिय होती गयीं। मंच के निर्माण के बाद उनके नेतृत्व में मंच के साथी बरेली शहर के बाहर भी विभिन्न बड़े जलसों, जनसंघर्षों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देने लगे। अपनी बीमारी से पहले तक वे किसान आंदोलन में गाजीपुर बार्डर पर 3-4 माह तक लगातार मौजूद रहे। गाजीपुर बार्डर पर भी अपनी प्रस्तुतियों के चलते वे काफी लोकप्रिय हो चुके थे।

       कामरेड कंचन सरल-सहज स्वभाव के व्यक्ति थे। साथियों के साथ घुल मिल जाने, लोगों को अपनी बातों से प्रभावित कर लेने, आम जन से उनकी भाषा में बातें करने में वे माहिर थे। वे पूरे दिल से गाते-बोलते नजर आते थे और उनकी जुबान ही नहीं आंखें भी बोलती नजर आती थीं। वे विभिन्न अन्य मुद्दों पर खुद गीत रचने की कोशिश करते थे, गीतों की नयी धुन इजाद करने का प्रयास करते थे। इस कोशिश में वे ज्यादातर सफल होते और उनकी ज्यादातर नयी प्रस्तुति पसंद की जाती। हालांकि कई दफा उन्हें नाकामयाबी भी मिलती। और लोग उनकी नयी धुन को पसंद नहीं करते लेकिन इसके बावजूद साथी कंचन  निराश नहीं होते थे बल्कि अपनी लगन से नई धुन रचने में लगे रहते।

       2006 से मजदूर संगठन ( इमके)  में काम करने के बावजूद क्रालोस के कार्यक्रमो उनकी मौजूदगी रहती थी। कभी तकनीकी कामों में सहयोग के लिए तो कभी सांस्कृतिक विधा की प्रस्तुति हेतु।

          2019 के क्रालोस के सम्मेलन में उनके गाये गए गीत और नाटक की प्रस्तुति बेहद सराहनीय थी। इस साल जुलाई में स्वास्थ्य खराब होने से पहले 4-5 माह तक वह लगातार ही गाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों के बीच मौजूद रहे। गीतों, मिमिक्री और एकल नाटक के जरिये वह किसानों के दुख दर्द, किसानों के आंदोलन को स्वर देते रहे।

          क्रांतिकारी राजनीति में सक्रिय होने के बाद लम्बे वक्त तक तरह-तरह के काम करते हुए अपने परिवार का पालन करते रहे। ज़िन्दगी के इस कठिन संघर्ष में भी उनकी समाज बदलने की चाहत की लौ कभी मद्धिम नहीं हुई।

       इस अंधेरे दौर में ऐसे साथी का अकस्मात हमारे बीच से चले जाना न केवल उनके परिवार के लिए क्षति है बल्कि प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच के लिए यह काफी बड़ी क्षति है। इसके साथ साथ यह हम सभी लोगों व संगठनों के लिए जो समाज को पूंजी की जकड़न से मुक्त करने के संघर्ष में लगे हुए हैं उनके लिए भी गहरी क्षति है। साथी कंचन की कमी को हम जल्द भर सकें और मानवता की मुक्ति के उनके संघर्ष तथा सपने को शिद्दत से आगे ले जा सकें यही हमारी उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Tuesday, 15 June 2021

कॉमरेड नगेन्द्र का शानदार इंकलाबी जीवन : एक भावभीनी श्रृद्धांजलि

 

कॉमरेड नगेन्द्र का शानदार इंकलाबी जीवन : एक भावभीनी श्रृद्धांजलि



10 जून की रात 8 बजे कामरेड नगेन्द्र हमें छोड़कर चले गये। मोबाइल के जरिये यह खबर करीब और दूर के परिचितों के बीच एक-एक कर फैलती चली गयी। उन्हें जानने वाला हर इंसान इस खबर से स्तब्ध रह गया। स्तब्ध होना स्वाभाविक भी था। वे करीबी लोग भी दिमागी तौर पर इस खबर के लिए तैयार नहीं थे जिन्हें पता था कि वे दो वर्ष से अधिक समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हैं और बीते कुछ वक्त से कैंसर फैलने लगा था और कुछ दिन पहले ही डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। वे किसी चमत्कार की उम्मीद में भले न हों पर उन्हें भी उनके इतनी जल्दी जाने की उम्मीद न थी। शायद कामरेड नगेन्द्र से अन्तिम मुलाकातों में भी दर्द के बीच उनके चेहरे पर फैली निश्छल मुस्कराहट ऐसा कोई भान होने से रोक देती थी कि साथी इतनी जल्दी हमें छोड़कर चले जायेंगे। 


उनके निधन की खबर जैसे-जैसे फैलती गयी, उनके संगठन इंकलाबी मजदूर केन्द्र के साथियों के, अन्य संगठनों के साथियों के और उनसे परिचित, उनके संपर्क में आये ढेरों लोगों के श्रृद्धांजलि संदेश उनके निकट के साथियों के फोनों पर आते चले गये। ये संदेश बताते हैं कि कामरेड नगेन्द्र को चाहने वालों, उन्हें प्यार व सम्मान देने वालों की संख्या बहुत है। ये संदेश बताते हैं कि कामरेड नगेन्द्र ने अपना 28 वर्ष लम्बा शानदार इंकलाबी जीवन कुछ ऐसे जिया जिस पर गर्व किया जा सके, जिससे सीखा जा सके, उनकी ढेरों खूबियों को अपनाने का संकल्प लिया जा सके। 


11 जून की सुबह कामरेड नगेन्द्र के पार्थिव शरीर को लाल झण्डे में लपेटकर शाहबाद डेरी लाया गया। यहां इंकलाबी मजदूर केन्द्र के केन्द्रीय कार्यालय पर उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शनार्थ रखा गया। विभिन्न संगठनों, मित्रों, परिजनों ने लाल सलाम के साथ कामरेड को अंतिम विदाई दी। इसके पश्चात दिल्ली के निगम बोध श्मशान घाट के गैस शवदाह गृह में उनके पार्थिव शरीर को सुपुर्दे खाक कर दिया गया। 


कामरेड नगेन्द्र का जन्म 15 जुलाई 1975 को उत्तराखण्ड के भलट गांव, गनाई रानीखेत जिला अलमोड़ा में हुआ था। उनका शुरूआती बचपन अपने गांव में ही बीता। शुरूआती कुछेक वर्ष की शिक्षा गांव में होने के पश्चात ये काशीपुर (ऊधमसिंह नगर) आ गये। यहां उन्होंने केन्द्रीय विद्यालय काशीपुर में प्रवेश लिया। 1989 में यहीं से उन्होंने हाईस्कूल व 1991 में इण्टरमीडिएट किया। इसके पश्चात 1992 में इन्होंने काशीपुर के पॉलिटेक्निक कॉलेज में कैमिकल इंजीनियरिंग में 4 वर्षीय डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश लिया और 1996 में पालीटेक्निक डिप्लोमा पास किया। इसी दौरान उन्होंने रामनगर के डिग्री कालेज में प्राइवेट छात्र के रूप में 1995 में बी ए भी पूरा किया। केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ने के दौरान ही वे सामान्य ज्ञान, नाटक, भाषण, एकांकी, अंताक्षरी आदि की प्रतियोगिताओं में भाग लेते व पुरस्कार पाते रहे। विविध क्षेत्रों में उनकी यह रुचि उनके आगे के क्रांतिकारी जीवन के दौरान भी बनी रही। पालिटेक्निक कॉलेज के शुरूआती वर्षों में ही 1993 में वे क्रांतिकारी राजनीति से जुड़ गये। 


1993 में ‘विकल्प’ मंच से जुड़ने के कुछ समय बाद ही कामरेड नगेन्द्र परिवर्तनकामी छात्र संगठन की स्थापना के प्रयासों में सक्रिय हो गये। 1996 में परिवर्तनकामी छात्र संगठन के स्थापना सम्मेलन से लेकर 2003 के संगठन के चौथे सम्मेलन तक वे संगठन की विभिन्न जिम्मेदारियों को उठाते रहे। इस दौरान वे लम्बे वक्त तक संगठन की केन्द्रीय कार्यकारिणी, सर्वोच्च परिषद के सदस्य रहने के साथ केन्द्रीय उपाध्यक्ष भी रहे। इसी दौरान वे परचम पत्रिका के सम्पादक भी रहे। 


प.छा.स. के बैनर तले सक्रिय रहते हुए ही इन्होंने अपना पूरा वक्त इंकलाब के कामों में लगाने का निर्णय लिया। इन्होंने कई छात्र संघर्षों में हिस्सा लिया। इस समय वे नैनीताल में फड़-खोखे वालों के संघर्ष में भी सक्रिय रहे। कुमाऊं वि.वि. में चले फीस वृद्धि के खिलाफ संघर्ष में इन्होंने बढ़- चढ़कर हिस्सा लिया। 


2003 के बाद से ही कामरेड नगेन्द्र मजदूर वर्ग को संगठित करने के प्रयासों में जुट गये। 2005 में ईस्टर (खटीमा) फैक्टरी के मजदूरों के लम्बे जुझारू संघर्ष में साथी ने नेतृत्वकारी भूमिका निभायी। 2006 में इंकलाबी मजदूर केन्द्र की स्थापना के वक्त से लेकर अपने जीवन के अंतिम वक्त तक ये मजदूर वर्ग को संगठित करने में जुटे रहे। इंकलाबी मजदूर केन्द्र में ये केन्द्रीय कमेटी व केन्द्रीय परिषद की जिम्मेदारियों के अलावा उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाते रहे। इस दौरान ये खटीमा, फरीदाबाद और दिल्ली आदि जगहों पर विभिन्न मजदूर संघर्षों में सक्रिय रहे। 2016 से अपने जीवन के अंतिम समय तक ये नागरिक पाक्षिक समाचार पत्र के सम्पादक भी रहे। संघर्षों के दौरान वे जेल भी गये। 


दिल्ली में विभिन्न मसलों पर होने वाले साझा प्रदर्शनों, गोष्ठियों, सेमिनारों, बैठकों आदि में कामरेड नगेन्द्र लगातार इंकलाबी मजदूर केन्द्र के प्रतिनिधि व वक्ता रहे। अपने 28 वर्ष लम्बे इंकलाबी जीवन में इन्होंने ढेरों पर्चे-पुस्तिकायें-लेख लिखे। राजनैतिक मुद्दों पर अवस्थिति लेने में अपनी मजबूत विचारधारात्मक पकड़ व देश दुनिया के घटनाक्रमों से परिचित होने के चलते कामरेड नगेन्द्र ने हमेशा ही नेतृत्वकारी भूमिका निभायी। 


एक बेहतरीन वक्ता के बतौर उन्हें संगठन की गोष्ठियों-शिविरों-सेमिनारों में हमेशा जाना गया। भाषण देते वक्त उनका विषय का ज्ञान, शब्दों का चयन, भाषा का प्रवाह और चेहरे की भाव भंगिमा अक्सर ही श्रोताओं को उद्वेलित कर देती थी। आम तौर पर भी वे अपने विविधता भरे ज्ञान के चलते अक्सर ही अपने इर्द-गिर्द एक घेरा जुटा लेते थे। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से लेकर खेल, कला, साहित्य, संस्कृति, नाटक आदि विविध विषयों पर बहस करते हुए पाया जा सकता था। सहज, मित्रवत मिलनसार व्यक्तित्व के चलते उनसे पहली बार मिलने वाले साथी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहते थे। 


पढ़ने के वे शौकीन थे। उनके जानने वाले उनके झोले में तीन-चार विविध विषयों की पुस्तकों से कम कभी नहीं पाते थे। राजनैतिक-सैद्धांतिक विषयों से लेकर कहानी-उपन्यासों तक विभिन्न पुस्तकों को वह निरंतर पढ़ते रहते थे। वर्तमान समय में देश-दुनिया के क्रांतिकारी संघर्ष से लेकर भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के बारे में वे यथासंभव परिचित रहते थे। क्रांतिकारी आंदोलन में हो रहे परिवर्तनों पर बेबाकी से अपनी राय रखते थे। राजनीति, खेल, संगीत, संस्कृति सबके बारे में वर्तमान स्थिति से वे हमेशा परिचित रहते थे। इतने व्यापक क्षेत्रों में जानकारी के चलते ही उनके साथ वक्त बिताने वाले आम मजदूर से लेकर संगठन के कार्यकर्ता-नेता तक उनसे कुछ न कुछ सीखते रहते थे। 


मजदूर वर्ग के ध्येय क्रांति के मिशन पर उनका विश्वास अटूट था। संगठन में आने के पश्चात उन्होंने ढेरों लोगों को इंकलाब से पीछे हटते, पलायन करते देखा। पर इस सबका असर कभी भी उनके जीवन पर नजर नहीं आया। वे एकबारगी भी कमजोर पड़ते नहीं पाये गये। अपने संगठन और इंकलाब में उनका अटूट विश्वास जीवन के अंतिम क्षणों तक बना रहा। 


पर इसका अर्थ यह नहीं था कि वे अपने संगठन के प्रति अंध विश्वास रखते थे। बल्कि बात उलटी है। वे अपने संगठन की नीतियों की, संगठन के साथियों की हर उस वक्त आलोचना करते थे जब उन्हें गलत लगता था। पर उनकी आलोचना का लक्ष्य अपने संगठन पर विश्वास करते हुए अपनी समझ से उसे दुरुस्त करने का होता था। 


उनका सरल सौम्य स्वभाव, निश्छल हंसी हर किसी को आकर्षित करती थी। वे अपनी कमियों-गलतियों को कभी छिपाने की कोशिश नहीं करते थे। बहुधा तो वे खुद की गलतियों के किस्से खुद ही सुनाते पाये जाते थे। 


एक क्रांतिकारी को जैसा जीवन जीना चाहिए उन्होंने न केवल वैसा ही जीवन जिया बल्कि बीमारी और मौत का भी एक क्रांतिकारी की तरह सामना किया। अक्सर ढेरों लोग यह जानने के बाद कि वे कैंसर की ऐसी असाध्य बीमारी से ग्रसित हैं जिसका इलाज संभव नहीं है, कमजोर पड़ जाते हैं, आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं। पर कामरेड नगेन्द्र ने बीमारी के आतंक को कभी अपने मस्तिष्क पर हावी नहीं होने दिया। वे बीमारी से बहादुरी से लड़ते रहे, इलाज कराते रहे और इंकलाब के कामों में जुटे रहे। वक्त-वक्त पर कैंसर के चलते शरीर के विभिन्न हिस्सों में दर्द बढ़ता रहा, कुछ समय वे दर्द सहते, पड़े रहते पर दर्द से जरा भी राहत मिलते ही अपने कामों में सक्रिय हो जाते। बीते वर्ष जब कोरोना महामारी के नाम पर लॉकडाउन लगा तो उन्होंने कई विषयों पर आनलाइन वक्तव्य कैंसर से जूझते व लड़ते हुए ही दिये। 


पिछले कुछ माह से उनकी पीड़ा काफी बढ़ गयी थी पर अपने से मिलने वालों के सामने अक्सर वे इस दर्द को छुपाते हुए हंसते हुए बात करते पाये जाते थे। मृत्यु से कुछ दिन पूर्व तक अपने लिए वे किताबें जुटा रहे थे जिन्हें उन्होंने पढ़ने की सोच रखी थी। उनकी इस लगन को देखकर बरबस ही भगत सिंह याद आते हैं जो फांसी के फंदे पर चढ़ने से पहले लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। कहना गलत नहीं होगा कि कामरेड नगेन्द्र ने बीमारी का सामना भी मजदूर वर्ग के बहादुर सिपाही की तरह किया। उन्होंने जीवन के अंतिम क्षण तक को मजदूर वर्ग के मिशन में लगाने की कोशिश की। 


एक इंसान के बतौर वे, बच्चों के बीच बच्चे सरीखा बनने वाले, अपने साथियों का यथा संभव ख्याल करने वाले थे। उनके सीधे सरल स्वभाव के चलते कई दफा दूसरे लोग उनका नाजायज फायदा तक उठा लेते थे। 


क्रांतिकारी बदलाव में लगे साथियों के लिए कामरेड नगेन्द्र के जीवन में बहुत कुछ ऐसा था जिससे सीखा जाना चाहिए। कम्युनिस्ट जीवन मूल्य ऐसा ही एक गुण है। मजदूर वर्ग की दुःख, तकलीफ से द्रवित हो उठना, भावुक हो जाना, उनकी मदद को तत्पर हो जाते उन्हें अक्सर देखा जाता था। किसी बच्चे, किसी घरेलू महिला से लेकर सामान्य मजदूर-छात्र, भिन्न मत के लोगों तक को साथी नगेन्द्र पूरे ध्यान से सुनते थे, उनको पूरी इज्जत देते थे और फिर धैर्यपूर्वक अपनी बातों को उनके सामने सरलता से प्रस्तुत करते थे। लोग उनसे सहमत हों या नहीं, प्रभावित हुए बगैर नहीं रहते थे। इसीलिए लोग उन्हे पसंद करने लगते थे। वे अनुशासनशील प्राणी थे। वे किसी भी काम में जुटे हों पर अपने से बात करने आये साथियों को कभी निराश नहीं करते थे। इस चक्कर में निश्चित समय में काम पूरा करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करते थे। पर ज्यादातर वे दिये समय में काम पूरा कर डालते थे। कैसे सहजता-सरलता से कठिन विषयों को भी जनता के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। इसकी वे मिशाल थे। इन सबसे बढ़कर वे एक योद्धा थे, मजदूर वर्ग के इंकलाबी मिशन के सिपाही थे जिन्होंने बीमारी को भी इंकलाबी सिपाही की तरह जवाब दिया।


कामरेड नगेन्द्र आज हमारे बीच नहीं हैं। उनके जाने से पैदा हुए निर्वात को भरना काफी कठिन है। उनकी कमी इंकलाबी मजदूर केन्द्र ही नहीं नागरिक समाचार पत्र तक में लम्बे वक्त तक महसूस की जायेगी। उनकी कमी को हमें पूरा करना ही होगा। उनके जीवन से सीखते हुए, उनके गुणों को अपनाते हुए संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। यही हमारी उनको सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। कामरेड नगेन्द्र तुम्हें अलविदा कहने का मन नहीं करता, फिर भी अलविदा साथी।
 
 
साभार :-      http://enagrik.com

Friday, 11 June 2021

कॉमरेड नगेंद्र को लाल सलाम

 कॉमरेड नगेंद्र को लाल सलाम
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     पिछले ढाई दशकों से मजदूर वर्ग की विचारधारा को समर्पित एक योद्धा की तरह कॉमरेड नगेंद्र अपनी अंतिम सांस तक मजदूर मेहनतकश अवाम के संघर्षों को समर्पित रहे। 

    आप छात्र जीवन से ही परिवर्तनकामी छात्र संगठन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाते हुए क्रांतिकारी विचारों की राह पर बढ़ते गए। इंकलाबी मज़दूर केंद्र के उपाध्यक्ष और पाक्षिक अखबार नागरिक (अधिकारों को समर्पित) के संपादक के बतौर  कॉम. पिछले कई वर्षों से अपनी संघर्षशील और वैचारिक भूमिका का निर्वाह करते रहे।

   पिछले कुछ सालों से केंसर जैसे  रोग से ग्रस्त होने के बावजूद आपकी सक्रियता बनी रही। मगर इस बीच स्थितियां ज्यादा जटिल होती गयी। अंततः 10 जून की रात को 8 बजे कॉम. नागेंद्र का निधन हो गया। यह न केवल संगठन बल्कि मुक्ति की आकांछा पाले तमाम लोगों के लिए अपूरणीय क्षति है।

   कॉमरेड नागेंद्र के निधन की इस घड़ी में क्रालोस गहरा शोक प्रकट करते हुए, क्रान्तिकारी सलाम के साथ श्रद्धांजलि अर्पित करता है। जिस ध्येय लिए आपका जीवन समर्पित रहा, उस दिशा में और शिद्दत बढ़ने का संकल्प लेता है

Monday, 17 May 2021

हत्यारा गुजरात मॉडल

 




           हत्यारा गुजरात मॉडल
 

       वक़्त खुद को दोहरा रहा है। इसने मोदी सरकार को मौके दिए। मगर कोई सबक, मोदी और मोदी सरकार ने नहीं लिया। न अस्पतालों की व्यवस्था हुई, न टेस्टिंग-ट्रेसिंग-ट्रीटिंग की नीति को शिद्दत से लागू किया, ना ही वैक्सीनेशन को और ऑक्सीजन की व्यवस्था को गंभीरता से लिया गया। दहशत और आतंक का माहौल फिर से बनाया जा रहा है।

      सब कुछ राज्यों सरकारों के मत्थे डालकर मोदी-शाह की सरकार ने कोरोना संक्रमण से अपना पिंड छुड़ा लिया , कोरोना संक्रमण से बचाव की जिम्मेदारी अब राज्य सरकारों की है जबकि जी एस टी के रूप में आय केंद्र सरकार को बटोरना है, सारे संसाधन केंद्र सरकार के पास है।

     कोरोना संक्रमण  के तेज़ प्रसार ने  मोदी सरकार को नंगा कर दिया है यही हाल योगी महाराज का है। अन्य राज्य सरकारों को भी कोरोना संक्रमण ने बेनकाब किया है। ये अलग बात है कि जनता के पास विकल्प नहीं।

     4 लाख तक मामले पहुंच चुके हैं कबकी मौते 3000-4000 के स्तर पर है। ये सरकारी आंकड़ों के मुताबिक है। हकीकत में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या और मौतों की संख्या काफी ज्यादा है। अभी बरेली में ही सरकारी आंकड़ों के हिसाब से मरने वाले 97 थे जबकि शमशान घाटों के आंकड़ों के हिसाब से मरने वाले 600 थे। आंकड़ों का यह भारी फर्क मध्यप्रदेश से ले कर गुजरात तक हर जगह देखा गया। गंगा नदी में बहती लाशों, रेत में दबाये गए सैकड़ों शव, अब चर्चा का विषय हैं।

    ज्यादा हंगामा इसीलिए है कि ऑक्सीजन वेन्टीलेटर की भारी कमी से शासक वर्ग के निचले स्तर के लोग भी मारे गए हैं इन्हें भी ऑक्सीजन, वेन्टीलेटर के लिए भटकना पड़ा है।  मगर बहुसंख्यक आम जनता के लिए स्थिति बेहद विकट है। गांवों की स्थिति बदहाल है। उत्तर प्रदेश के देहातों से मौतों के आंकड़े काफी ज्यादा है। यहां क्योकि इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है। कुछ जगहों पर तो प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ही बंद पड़े हैं।

    देश की राजधानी दिल्ली में सर गंगाराम जैसे अस्पताल में ऑक्सीजन के अभाव में 25 लोग मर जाते हैं। तो फिर स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लग सकता है। ऐसी खबरें अब आम हो गयी है।
     मौतों का यह आंकड़ा, अस्पतालों की दुर्गति, डॉक्टर नर्सों की भारी कमी, ऑक्सीजन-वेन्टीलेटर और दवाओं की भारी कमी आम लोगों को डरा रही हैं इसने भारी अफ़रातफ़री और दहशत का माहौल पैदा हो रहा है।  ये मौतें कोरोना संक्रमण से उतनी नहीं है बल्कि इलाज के अभाव में हो रही हैं यदि उचित समय पर उचित इलाज मिलता तो अधिकांश लोग बच जाते। इसीलिए ये परोक्ष हत्याएं हैं जिसके लिए मुख्यतः मोदी-शाह और मोदी सरकार जिम्म्मेदार है और देश के कॉरपोरेट शासक जिम्मेदार हैं। ये शासक वर्ग द्वारा निर्मित त्रासदी है। इसमें शिव सेना, टी एम सी, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस से लेकर सभी चुनावबाज पूंजीवादी पार्टियों की भूमिका भी कम नहीं है।            

     सार्वजनिक इलाज की व्यवस्था बेहद कमजोर पहले ही थी मगर मोदी सरकार ने तो इस ढांचे को ध्वस्त कर दिया है। सब कुछ प्राइवेट के भरोसे है और खोखली आयुष्मान योजना के। आयुष्मान के तहत 6400 करोड़ मात्र का बजट सवा अरब से ज्यादा की आबादी के लिए रखा गया। जबकि प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के लिए 2 बोइंग विमान के लिए ही 8458 करोड़ रुपये खर्च कर दिये गए।
      यही स्थिति वैक्सीनेशन के मामले में है। पहले तो मोदी सरकार ने महिमामंडन में वैक्सीन का निर्यात विदेशों को किया ताकि आर्थिक राजनीतिक समीकरण बनाये जा सकें। स्थिति अब यह बन गयी है कि वैक्सीन के भयानक अभाव के चलते आयात को आपात मंजूरी देनी पड़ी है।

       एक संदर्भ में देखा जाय तो इस मौके का भरपूर इस्तेमाल मोदी सरकार ने वैक्सीन कंपनियों के लिए भी कर दिया है। वैक्सीन की कीमत 400 से लेकर 1200 तक तय कर दी गयी है।
      मगर बेशर्म शासकों को शर्म नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी इसके बावजूद 'ऑक्सीजन से किसी को नहीं मरने देने' की बात करते हैं, 'मन की बात' फरमाते हैं। ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए जो बैठक की जाती है उसमें भी अपने कॉरपोरेट मित्रों को बिठाया जाता है। ताकि इस निर्मित त्रासदी का 'आपदा में अवसर ' के रूप में इस्तेमाल आगे बढ़ सके।

    एक ओर लफ्फाजी है तो दूसरी तरफ अलग-अलग स्तर पर राज्यों में 'कोरोना कर्फ्यू', 'धारा 144', 'आपदा प्रबंधन कानून' के रूप में पुलिसिया दमन कोरोना संक्रमण से बचाव का इलाज है। तरह तरह के निर्देश जारी करके माहैल में भयानक अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा कर दी गयी है। यही नहीं, कोरोना संकमण के त्वरित प्रसार का ठिकरा आम जनता पर ही फोड़ा जा रहा है।

     राज्य स्तर पर हो रहे सीमित लॉकडाउन या कोरोना कर्फ्यू ने मजदूरों, छोटे मझौले कारोबारियों के सामने संकट को गहन बना दिया है। एक बार फिर से मजदूरों का सैलाब सड़कों पर है जो वापस घरों की ओर निकल पड़े हैं। इस प्रकार से भयावह बेरोजगारी का संकट सामने है।

    इस विकट स्थिति में आम लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर हालात को बयां कर रहे हैं अपने साथ घटती घटनाओं को साझा कर रहे हैं। मगर हिन्दू फासीवादी सरकार 'अफवाह' के नाम पर इस ' आवाज' को बंद कर देना चाहती है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने, इस प्रकार के 'अफवाह' फैलाने वाले लोगों के खिलाफ 'रासुका' के तहत मुकदमा दर्ज करने का एलान कर दिया है।

    कुलमिलाकर आज के मोदी-शाह की हिदुत्ववादी सरकार ने जो आर्थिक-राजनीतिक हमला, जनता पर बोला है उसी की परिणति है कि कोरोना संक्रमण का दौर आम जनता के लिए त्रासदी बन चुका है।




 



 





Thursday, 15 April 2021

उत्तर प्रदेश पंचायती चुनाव का शोर

  

         पंचायती चुनाव फिर आ गए हैं।  प्रत्याशी फिर से, रंग बिरंगे दावों व वादों के साथ, हमारे बीच में हैं। ये वोटों को हासिल करने की घृणित जुगत में लगे हुए हैं। शराब, पैसा, ताकत, जाति-धर्म, भाई भतीजावाद का ही यहां शोरगुल है ।

         प्रत्याशी हमारे बीच आते हैं। हमारे वोटों से जीतकर, अपने मालामाल होने के रास्ते बनाते हैं। रोजगार, सस्ती बेहतर शिक्षा, सस्ता बेहतर इलाज, महिला सुरक्षा और छिनते अधिकार आदि-आदि मुद्दों से तो, इनका कोई सरोकार ही नहीं।

         सच यही है कि पंचायती निकाय की कोई हैसियत नहीं कि वह इन सभी मुद्दों पर काम कर सके, योजना बना सके और फिर उसे लागू कर सके। जिला पंचायत, नगर पंचायत और ग्राम पंचायतें सभी की यही स्थिति है। ऐसे में इन पंचायतों को अधिकारयुक्त संस्थाएं बनाने का संघर्ष होना चाहिए था। जो योजनाएं बनाती, केंद्र के लिए इसे भेजती फिर इसे लागू करती। मगर इस संघर्ष से इन प्रत्याशियों कुछ भी लेना देना नहीं ।

 .      इस दौर में नोटबंदी हुई, लॉकडाउन हुआ जिसमें एक ओर करोड़ों लोग बेरोजगार हुए, काम-धन्धा बर्बाद हुआ, दूसरी ओर अंबानी-अदानी जैसे लोग मालामाल हुए। करोड़ों मजदूर सैकड़ों किमी पैदल भूखे-प्यासे घरों को जाने को मजबूर कर दिए गए। कॉरपोरेट पूंजीपतियों की लूट और ज्यादा बढ़ गई। इनकी सरकार ने घोर किसान विरोधी बिल पास किये, घोर मजदूर विरोधी श्रम कानून बना दिये। किसान 'तीन कृषि कानूनों' के खिलाफ पिछले 5 माह से सड़कों पर है। इस सबमें, पंचायती निकायों की कोई हैसियत नहीं कि वह कुछ कर सकती हों। प्रत्याशियों के लिए तो ये कोई मुद्दे ही नहीं बनते।

        ये पंचायतें हर तरह से अधिकारविहीन संस्थाएं हैं। ये  सरकार की योजनाओं को लागू करने वाली संस्थाएं मात्र हैं। इन्हें आर्थिक मदद के लिए सरकार का मुंह ताकते रहना पड़ता है।               

        पंचायत क्षेत्रों में कुछ सुविधाओं हेतु केंद्र सरकार कुछ पैसा भेजती है। इस पैसे को ही हड़पने की होड़ प्रत्याशियों में होती है। इसे हड़पने के लिए, ये हर हथकंडे अपनाते हैं। यह सीख भी इन्हें, अपने बड़े पूंजीवादी नेताओं से ही मिलती है। चंद ईमानदार प्रत्याशी ही इसे देख निराश -हताश होते हैं और समझौता कर लेते हैं।

        हकीकत यही है कि हमारे शासक इन पंचायत निकायों के जरिये अपनी शासन सत्ता को मज़बूत करते हैं।

        देश के भीतर सारे ही फैसले लेने व नीतियां बनाने का अधिकार संसद के पास है। संसद पूंजीपतियों का औजार ही है। आम जनता को यही लगता रहता है कि वही सब कुछ करती है सभी को चुनती है दिखता यही है मगर हकीकत इसके ठीक उलट होती है। इसलिए जनता के 'अच्छे दिन' कभी नहीं आते मगर पूंजीपति मालामाल होते जाते हैं। वे अरबपति से खरबपति बन जाते हैं।  

      भा.ज.पा., स.पा., ब.स.पा., कांग्रेस समेत सभी पूंजीवादी पार्टियां चुनाव के समय जनता के बीच वोट मांगते हैं। इसके बदले अच्छे दिन लाने का वादा करते हैं। लेकिन हर चुनाव के बाद 'अच्छे दिन',‘बुरे दिन' में बदल जाते हैं। इन पार्टियों के नेता और देश के पूंजीपति ज्यादा मालामाल होते जाते हैं।

        दरअसल ये सभी पूंजीवादी पार्टियां, इसी पूंजीवादी व्यवस्था को चलाने का काम करती हैं जो कि मजदूर मेहनतकश जनता की  मेहनत को हड़पने का तंत्र है पूंजीपतियों को और खुद को भी मालामाल बनाने का यंत्र है। संसद में ये पार्टियां, इन्हीं के लिए नीतियां बनाती हैं व फैसले लेती हैं।  

        ये जनता की सामूहिक ताकत को नकारते हैं जनता को ठेंगा दिखाते हैं जनता को मूर्ख बनाते हैं धर्म-जाति की नफरत भरी राजनीति से जनता को बांट देते हैं जनता को आपस में लड़ाते हैं, दंगे करवाते हैं जनता का दमन करने को काले दमनकारी कानून बनाकर पुलिस का आतंक कायम करते हैं।

         ये एक व्यक्ति को हीरो के रूप में स्थापित करते हैं जो कि अपने दम पर जनता के दुख-दर्द हर लेगा। ऐसा, मगर कभी होता नहीं। इसके उलट तानाशाही की स्थिति बन जाती है। पिछले 6 साल इस बात के गवाह है।

         इसलिए आज असल सवाल, सामूहिक तौर पर संघर्ष करने का है। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का है।

         हमें इन प्रत्याशियों पर दबाव बनाने की जरूरत है कि जनता के पक्ष में नीतियां बनाये जायं; हमारे अधिकारों को केवल वोट तक सीमित ना किया जाए बल्कि देश के स्तर पर सभी महत्वपूर्ण फैसले व नीतियां बनाने का अधिकार भी हमें मिले; बड़े महत्वपूर्ण फैसलों पर जनमत संग्रह करवायें जायें; तथा प्रतिनिधियों का वापस बुलाने का अधिकार भी हमें मिले ।

         अंतत: यह सब हासिल हो जाने के बाद भी, लूट-शोषण उत्पीड़न वाली पूंजीवादी व्यवस्था चलती रहेगी क्योंकि फैक्ट्रियों, कल-कारखानों, फार्म्स ( बड़े खेतों), खानों सभी जगह पर इन पूंजीपतियों का ही नियंत्रण है। इसलिए समाजवादी व्यवस्था के लिए संघर्ष करने की जरूरत हैं। जहां सभी संसाधनों पर जनता का नियंत्रण हो।

         यही वह व्यवस्था है  जहां सारे ही अधिकार मजदूर मेहनतकश अवाम को होंगे। लूट शोषण पर  पाबंदी होगी। रोजगार की गारंटी होगी। नि:शुल्क शिक्षा, चिकित्सा व परिवहन के अधिकार होंगे ।

     इसलिए आइये ! पंचायती चुनाव में इन सवालों को उठाने एवं इनके लिए संघर्ष करने की जरूरत है :-

1-:   जिला पंचायत, नगर पंचायत व ग्राम पंचायत सभी स्तर पर इन संस्थाओं को अपने क्षेत्र के शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्वच्छता, प्रशासन आदि क्षेत्रों में योजनाएं बनाने का, इसे प्रस्तावित करने, केंद्र के साथ समन्वय करने का व इन्हें लागू करने तथा इस हेतु फण्ड सृजित करने का अधिकार हो।

2-: जाति, धर्म आदि की साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले तथा आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशियों को चुनाव में प्रतिबंधित किया जाय।

3-:   चुने गये पंचायत प्रतिनिधि को, 5 साल के अंदर किसी भी वक़्त वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास हो।


                                     


Monday, 12 April 2021

जलियावाला बाग हत्याकांड के शहीदों की स्मृति में

 








   लगभग 100 साल पहले, 13 अप्रैल की तारीख, हमारे इतिहास में एक अलग ही मुकाम रखती है। 13 अप्रैल 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड, जनता के कुर्बानी भरे संघर्षों की याद दिलाता है।                                                                                                                      

     भारत की जनता उस दौर में ब्रिटिश शासकों के शोषण, उत्पीड़न और जुल्म से त्रस्त थी। जनता का संघर्ष, इस गुलामी के विरोध में शुरू से ही था इसीलिए अंग्रेज शासकों ने जनता के क्रांतिकारी संघर्षों को कुचलने के लिए 'रॉलेट एक्ट' लागू कर दिया था ।

     आजाद भारत में जनता के संघर्षों को कुचलने के लिए यू.ए.पी.ए और राजद्रोह जैसे कई खतरनाक काले कानून हैं। इसी तरह अंग्रेजों के जमाने में 'रॉलेट एक्ट' था। इसके जरिये,  जो कोई भी अंग्रेजी गुलामी का विरोध करता था, उसे केवल शक के आधार पर 'आतंकवादी ठहरा' दिया जाता था और फिर जेल में 2 साल तक के लिए बंद करके सड़ाया जाता था।

     इस एक्ट के विरोध में ही जनता सड़कों पर उमड़ पड़ी थी। जलियांवाला बाग में, 13 अप्रैल 1919 के दिन, रॉलेट एक्ट के विरोध में 'हिन्दू-मुस्लिम-सिख' जनता सभा कर रही थी। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं व पुरुष, सभी सभा में थे। तकरीबन 20 हज़ार लोग सभा में थे। शांतिपूर्ण ढंग से सभा कर रहे इन लोगों को चारों तरफ से घेरकर, अंग्रेज सरकार ने, गोलियां चलवा दी थी। इस बर्बर हत्याकांड में सैकड़ों लोग मार दिए गए और घायल कर दिए गए।

      जलियांवाला बाग के शहीदों ने लुटेरे अंग्रेजी साम्राज्यवादी शासकों की गुलामी के विरोध में संघर्ष किया था। इन शहीदों का संघर्ष 'धर्म के नाम पर' जनता के बीच नफरत फैलाने और राजनीति करने वाली ताकतों के खिलाफ भी था। धर्म का भेदभाव भुलाकर, ये सभी एकजुट होकर, संघर्ष में शहीद हो गए।

      आज ऐसे वक्त में, जब देश में 'देशी-विदेशी पूंजी' को रोजगार से लेकर हर मर्ज का इलाज का बताया जा रहा हो ; देशी-विदेशी पूंजी के मालिक ही देश के नियंता बन बैठे हों;  जब धर्म के नाम पर हर ओर नफरत फैलायी जा रही हो; तब ऐसे घोर जन विरोधी और अंधेरे दौर में, जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीद हमें रास्ता दिखाते हैं हमें प्रेणा देते हैं। यही हमारा रास्ता है।

      जलियांवाला बाग जैसे कई-कई संघर्षों व कुर्बानियों के दम पर आखिरकार देश आजाद हो गया था।  1947 में, देश अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद तो हुआ मगर जनता को शोषण उत्पीड़न, जुल्म से मुक्ति नहीं मिली। शासक अब बदल गए। देश के पूँजीपति, राजा-रजवाड़े, जमींदार और इनकी पार्टियां, अब शासक हो गये। तब से अब तक की, यही कहानी है। आज, सब कुछ कॉरपोरेट पूंजीपतियों के कब्जे में है। सरकारें और सभी पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां इनकी जेब में हैं। आज अडानी-अंबानी, टाटा-बिड़ला जैसों की ही धूम मची है। यही आज के आदर्श हैं। अब मोदी, मोदी सरकार औऱ अदानी-अंबानी का गठजोड़ आज सबके सामने है। कभी यही काम कांग्रेस करती थी।

      आज आम जनता के सामने चौतरफा संकट है कोरोना वायरस पर नियंत्रण के नाम पर लॉकडाउन लगा मगर इसकी कीमत भी आम जनता ने ही चुकाई; करोड़ों लोगों की नौकरियां खत्म हो गयी। छोटे-मझौले कारोबारियों का काम-धंधा चौपट हो गया। दूसरी ओर इस तबाही-बर्बादी के दौर में भी कॉरपोरेट पूँजीपतियों का मुनाफा 35 % बढ़ गया। अब तो इन्हें लूट का लाइसेंस मिल गया है।

     मोदी और मोदी सरकार ने कहा 'आपदा को अवसर में बदलो'। पूंजीपतियों के हित में, घोर मजदूर विरोधी 'श्रम कानून' बना दिए गए। अब, काम के घण्टे बढ़ गए हैं, न्यूनतम मजदूरी कम हो गई है, ट्रेड यूनियन बनाना व हड़ताल करना बेहद कठिन बना दिया गया है, जब चाहो काम से कामगारों को निकाला जा सकता है। नौकरी की तैयारी करते नौजवानों के दिन भी अब बेहद कठिन हो चुके हैं क्योंकि नई भर्तियों पर भी अब लगभग रोक लग चुकी है।

      कर्मचारियों का महंगाई भत्ता ही स्थिर कर दिया गया । पहले बैंकों का विलय किया गया फिर इनके निजीकरण की ओर सरकार बढ़ गई है। ऑर्डिनेंस (आयुध) फैक्ट्रीयां, एल.आई.सी., बी.पी.सी.एल. जैसी कंपनियों को कौड़ी के मोल पूंजीपतियों को सौंपा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें काफी कम रही हैं इसके बावजूद बहुत ज्यादा सरकारी टैक्स के चलते पेट्रोल, डीजल व गैस की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। इलाज, पढाई, यात्रा और भोजन सब कुछ खूब महंगा हो चुका है।

    यही नहीं, मोदी सरकार ने तीन कृषि  कानून  तुरत-फुरत में बना दिये। इसके चलते, एक तरफ देशी-विदेशी कंपनियां अनाज,दाल आदि की असीमित जमाखोरी करेंगी दूसरी तरफ  बाजार में अनाज, तेल, दाल आदि की कीमतों काफी बढ़ जाएंगी। कुल मिलाकर , इसके चलते एक ओर छोटे-मझोले किसान कहीं ज्यादा तेजी से बर्बाद होंगे तो दूसरी ओर आम जनता को मिलने वाला सस्ता अनाज लगभग बंद हो जाएगा, भुखमरी से हालात बन जाएंगे।

      इन कानूनों के खिलाफ किसान सड़कों पर हैं। लगभग 300 किसान इस आंदोलन में शहीद हो चुके हैं मगर मोदी सरकार को किसानों की नहीं बल्कि अदानी-अंबानी जैसों के  मुनाफे की ही बेहद फिक्र है।

      'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार अबकी बार मोदी सरकार', ये नारा मोदी व भाजपा का था। मगर मोदी और योगी राज में, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाएं कम नहीं हुई बल्कि काफी बढ़ गई हैं। चिन्मयानंद, नित्यानंद, कुलदीप सेंगर जैसे अपराधी मोदी-योगी सरकार की शान बन गए। हाथरस कांड, कटुवा कांड को कौन भूला सकता है ?

       जो कोई भी, मोदी और मोदी सरकार को बेनकाब करता है, इनकी  तमाम जनविरोधी चीजों के खिलाफ बोलता है, लिखता है व आवाज उठाता है, कॉरपोरेट मीडिया और संघी आई. टी. सेल उनको 'देशविरोधी' कहती है  बदनाम करती है, फर्जी खबरें चलाकर इन्हें अलग-थलग कर दिया जाता है। फर्जी मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है।

       जे एन यू, दिल्ली विश्वविद्यालय, हैदराबाद, बी.एच.यू. आदि के कॉलेज के छात्रों के संघर्ष को इसी तरह बदनाम किया गया। किसी आंदोलन को पाकिस्तानी, खालिस्तानी तो किसी को कांग्रेसी या नक्सली या हिन्दू विरोधी कहा जाता है। यही नहीं, आंदोलनों को 'विदेशी मुल्कों' की साजिश बताया जाता है। यही सी.ए.ए. विरोधी आंदोलन के साथ किया गया। यही कर्मचारियों, रोजगार की मांग करते छात्र-नौजवानों के साथ किया गया। यही हाथरस और कटुवा में बलात्कारियों व हत्यारों को सजा दिलवाने की मांग पर उमड़ी जनता के साथ किया गया। यही अब किसानों के साथ हो रहा है।    

         इसीलिए कई लोग कह रहे हैं कि भारत में अब 'चुनावी लोकतंत्र' नहीं बल्कि 'चुनावी तानाशाही' कायम हो गई है। दुनिया में सबसे ज्यादा बार इंटरनेट पर रोक भी भारत में ही लगाई गई है।

        यही कहना सही होगा कि आज 'अघोषित तानाशाही' सी स्थिति बन चुकी है। यह हिंदुत्व के नाम पर है। जनता के हर संघर्ष को 'हिन्दू विरोधी' या 'देश विरोधी' बता दो और फर्जी संगीन मुकदमे दर्ज कर गिरफ्तार कर लो। यही हिन्दू फासीवादी तौर तरीके हैं।

        जलियांवाला बाग कांड के शहीदों का संघर्ष, आज भी हमें रास्ता दिखाता है। इन शहीदों के लिए धर्म निजी मामला था, राजनीति व संघर्ष में धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी, इन्हें गुलामी से नफरत थी इसीलिए एकजुट होकर, आज़ादी के संघर्ष में कुर्बान हो गए।

        इन शहीदों ने हिंदू-मुस्लिम-सिख का भेद भुलाकर एकजुटता की मिसाल कायम की थी और ऐसे भारत का सपना देखा था जहां देश और जनता आत्मनिर्भर हो, देश के संसाधनों व हर चीज पर जनता का नियंत्रण हो, जहां जनता को असली आज़ादी व समानता हासिल हो, जहां पर शोषण-उत्पीड़न की गुंजाइश ना हो, धर्म लोगों का निजी मामला हो, सार्वजनिक जीवन- शिक्षा, कला व राजनीति में धर्म का कोई दखल ना हो।

       आज के दौर में जलियांवाला बाग के शहीदों को याद करते हुए अपने अधिकारों के लिए, धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए संघर्ष करने की जरूरत है। हिंदू फासीवाद द्वारा किये जा रहे हर हमले का प्रतिवाद जरूरी है।


          

Monday, 22 February 2021

किसानों का प्रतिरोध

               किसानों का प्रतिरोध




 

     किसानों का दिल्ली में चल रहा संघर्ष मोदी सरकार को चुनौती पेश कर रहा है। तीन कृषि कानूनों की वापसी की मांग के साथ जारी इस संघर्ष में किसानों ने अब तक जुझारू तेवर प्रदर्शित किये हैं। पंजाब-हरियाणा के किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने की सरकारी कोशिशें विफल हुईं और किसान आंसू गैस-पानी की बौछारों-लाठियों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए दिल्ली पहुंचने में सफल हो चुके हैं। उन्होंने दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाल दिया है और वे निर्णायक संघर्ष के मूड में दिखलायी पड़ रहे हैं।
    मोदी सरकार द्वारा पारित तीनों कृषि कानून बड़े पूंजीपतियों की लूट के लिए कृषि क्षेत्र को खोलने का काम करते हैं। ये कानून उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की प्रक्रिया का ही कृषि क्षेत्र में परिणाम हैं। कृषि उत्पादों की जमाखोरी की छूट, किसानों के ठेका खेती करने सम्बन्धी प्रावधान व मंडी-न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म करने की कवायद ये सभी कदम किसानों को मिले नाम मात्र के सरकारी संरक्षण से भी सरकार द्वारा कदम पीछे खींचना है। यह किसानों को अम्बानी-अदाणी से प्रतियोगिता-कारोबार के लिए खुले बाजार में उतार देना है। जाहिर है इस सबका परिणाम छोटे-मझोले किसानों की बड़े पैमाने पर तबाही-बर्बादी के रूप में ही सामने आना है। यहां तक कि पंजाब-हरियाणा के बड़े किसान भी इन कानूनों से आशंकित हैं इसलिए भी वे संघर्ष के मैदान में उतरे हैं। हालांकि इनकी मुख्य मांग न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में ही ध्वनित हो रही है, वे किसी भी तरह इसकी गारण्टी चाहते हैं। 
   जहां तक न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रश्न है तो भारत सरकार की नीति चोर दरवाजे से इससे पल्ला झाड़ने की रही है। यही स्थिति सरकारी मंडियों को खत्म करने व सरकारी खरीद कम करने के बारे में भी रही है। इसी का परिणाम यह हुआ है कि पंजाब-हरियाणा को छोड़ ज्यादातर जगहों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होने के बावजूद उस पर खरीद काफी हद तक पहले ही ध्वस्त हो चुकी है। ढेरों दफा तो भुगतान में काफी वक्त लगने के चलते भी किसान बाजार में उपज बेचने को मजबूर होते रहे हैं। मंडियों की संख्या इतनी कम रही है कि ज्यादातर धनी किसान ही वहां तक पहुंचते रहे हैं। इस तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य व सरकारी मंडियों-खरीद केन्द्रों का ज्यादातर लाभ धनी किसानों के हिस्से ही आता रहा है। छोटे-मझोले किसान अक्सर अपनी उपज औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर होते रहे हैं। फिर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ने व सरकारी खरीद होने से जिस हद तक बाजार भाव प्रभावित होता है उस हद तक इसका प्रकारान्तर से लाभ छोटे-मझोले किसानों को भी होता है।
    उदारीकरण-वैश्वीकरण के बीते 3-4 दशकों में सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की आगतों में सब्सिडी खत्म करने के साथ बिक्री को भी बाजार के हवाले करने की नीति की ओर क्रमशः बढ़ा जाता रहा है। अब इसे एक झटके से अंतिम मुकाम तक पहुंचा दिया गया है। ऐसे में किसानों को अपनी तबाही की गति तेज होती दिख रही है और वे संघर्ष के मैदान में उतर आये हैं।
    वैसे जब ये 3 कानून नहीं थे, जब सरकारी खरीद कुछ हद तक ठीक-ठाक स्थिति में थी तब भी छोटे-मझोले किसान तबाह ही हो रहे थे। पूंजीवादी व्यवस्था में इससे अलग और कुछ सम्भव भी नहीं है यहां छोटी पूंजी-छोटे कारोबार के मालिक बड़ी पूंजी के आगे तबाह होने को अभिशप्त हैं। उनकी तबाही को कुछ संरक्षणवादी कदमों से मद्धिम तो किया जा सकता है पर पूर्णतया रोका नहीं जा सकता। 
      ऐसे वक्त में मौजूदा संघर्ष में सक्रिय छोटे-मझोले किसानों की बड़ी संख्या को यह समझना होगा कि उसका भला महज न्यूनतम समर्थन मूल्य हासिल हो जाने से कुछ खास नहीं होने वाला। कि उसकी गिरती स्थिति में कुछ राहत उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की नीतियों को पलटकर ही हासिल हो सकती है। कि उनको बड़ी पूंजी से मुकम्मल सुरक्षा तो पूंजीवाद खत्म कर कायम होने वाली समाजवादी व्यवस्था में ही हासिल हो सकती है। पूंजीवादी व्यवस्था में उनकी तबाही को रोका नहीं जा सकता है।  
      ऐसे में मौजूदा वक्त में  किसानों के इस संघर्ष के साथ खड़े होते हुए उसमें छोटे-मझोले किसानों की मांगों को उठाया जाना चाहिए। कहा जाना चाहिए कि तीनों कृषि कानून किसान विरोधी हैं अतः वापस होने चाहिए। पर साथ ही सरकार को छोटे-मझोले किसान हेतु सब्सिडी, उचित मूल्य पर खरीद का इंतजाम करना चाहिए। किसानों के साथ कंधे से कंधा मिला संघर्ष करते हुए उन्हें समझाया जाना चाहिए कि उन्हें अपने संघर्ष के निशाने पर उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के साथ मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को लेना चाहिए। एक बेहतर जीवन उन्हें समाजवाद ही दे सकता है। पूंजीवाद तो उन्हें बढ़ती आत्महत्यायें ही दे सकता है।

मौकापरस्त गठबन्धन अर्थात महागठबंधन बनाम हिन्दू फासीवादी गठबंधन




 

मौकापरस्त गठबन्धन अर्थात महागठबंधन बनाम हिन्दू फासीवादी गठबंधन





       बिहार में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। तीन चरणों के चुनाव निपटते ही 10 नवंबर को चुनावी नतीजे भी घोषित हो जाएंगे। जीत के लिए असल चुनावी संघर्ष महागठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच है। महागठबंधन में तीनों संसदीय वाम दल यानी सी पी आई, सी पी आई (एम एल) लिबरेशन व सी पी एम भी शामिल हैं व इसके मुख्य घटक हैं लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल तथा कांग्रेस। पिछले विधानसभा चुनाव में साम्प्रदायिक ताकतों को हराने के नाम पर नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाटेड भी महागठबंधन की हिस्सेदार थी।
 .    नीतीश व उनकी जदयू इस बार हिन्दू फासीवादी पार्टी के द्वारा बने गठबंधन एन डी ए में शामिल है। एन डी ए में  इस बार भाजपा, जद यू के अलावा हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा शामिल है। इस बार लोक जनशक्ति पार्टी इससे बाहर है। यह मोदी के साथ होने मगर नीतीश को बाहर करने के नारे के साथ मैदान में है।
    इस बार आर एल एस पी (कुशवाहा) बसपा के साथ तीसरे मोर्चे (ग्रांड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट) के नाम से चुनावी मैदान में है। इसके अलावा और भी छोटी-छोटी पार्टियां हैं जिन्हें कहीं भी सीटों के बंटवारे में अपने हिसाब से भाव नहीं मिला या पार्टी को तवज्जो नहीं मिली। ये पूंजीवादी पार्टियां अकेले या फिर कोई अन्य मोर्चा बनाकर चुनाव के मैदान में हैं।
     असल सवाल यह है कि जनता के लिए इस चुनाव में क्या है? कुछ भी नहीं। क्या हिन्दू फासीवादियों को यह चुनाव कमजोर करेगा? कतई नहीं। 
     संसदीय वाम दलों का अवसरवाद आज स्प्ष्ट है। ये साम्प्रदायिक दंगों, साम्प्रदायिक पार्टी भाजपा को रोकने के नाम पर कभी किसी के साथ तो कभी किसी के साथ गठबंधन बनाते रहे हैं। जिस महागठबंधन में ये शामिल हैं उसके नीतीश कुमार व उनकी जदयू 2015 में कुछ वक्त गुजरने के बाद भाजपा के साथ गठबंधन करके मुख्यमंत्री बन गए।
    अवसरवादी नीतीश कुमार व उनकी जे डी यू जो इस बार सत्ता में हैं। उनसे बहुत सी उम्मीद खुद को ‘सेक्युलर’ व खुद को ‘वाम’ मानने वाले लोगों के बीच पिछली बार भी थी। ठीक वैसी ही जैसी कभी इन लोगों ने आम आदमी पार्टी व अन्ना हज़ारे के फासीवादी आंदोलन से उम्मीद की थी, मगर इसके फासीवादी चरित्र को कभी इनके द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। 
      खैर! अब ये एक बार फिर महागठबंधन से भारी उम्मीद लगाए हुए हैं। जैसे महागठबंधन की जीत हिन्दू फासीवादी ताकतों को रोक देगी। महागठबंधन में ‘संसदीय वाम’ भी हैं इसलिए इनकी उम्मीद बहुत ज्यादा है। संसदीय वाम की ऐसी दुर्गति हो चुकी है कि इन्हें तेजस्वी यादव के कंधे पर सवार होना पड़ रहा है। संसदीय वाम वैसे भी एक दौर में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनाने में हिन्दू फासीवादी पार्टी के साथ सहयोग की अद्भुत भूमिका निभा चुके हैं।
     आज के दौर में हिन्दू फासीवादियों का सत्ता में आने का निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों से गहरा नाता है। आज के पूंजीवादी संकट से गहरा नाता है। एकाधिकारी कारपोरेट पूंजी के मालिक खुल कर हिन्दू फासीवादी ताकतों के साथ खड़े हैं। ये इन नई आर्थिक नीतियों को धड़ल्ले से आगे बढ़ा चुके हैं। महागठबंधन भी इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने वाला है बस गति और तरीके का अंतर है। लेकिन इसके बावजूद कई लोग ऐसे हैं जो इससे बेहतरी की उम्मीद लगाये हुए हैं।
      आज स्पष्ट है कि ‘फेंकने’ या ‘झूठे वायदों’ की कला में सब माहिर हो चुके हैं या मोदी-शाह की जोड़ी ने यह कला यानी ‘जुमलेबाजी’ अन्य सभी को भी कायदे से सिखा दी है। 
      मौजूदा वक्त में जब भयानक बेरोजगारी है, निराशा है, तब ऐसे में रोजगार का वायदा लुभाने वाला ही है इसीलिये महागठबंधन के प्रमुख तेजस्वी के जीतने के तत्काल बाद 10 लाख नौकरी देने के वायदे पर विरोधियों का भड़कना स्वाभाविक है हालांकि एन डी ए या मोदी-शाह ही यह बेशर्मी कर सकते थे कि सत्ता में होने के दौरान रोजगार खा जाने के बावजूद 19 लाख रोजगार देने का वायदा करें। यही नहीं मोदी सरकार ने बिहार में हर किसी के लिए उस कोरोना वैक्सीन के निःशुल्क उपलब्ध कराने का फर्जी वायदा कर दिया जिसका अभी दूर-दूर तक अता-पता भी नहीं हैं। 
     सुरक्षित रोजगार उपलब्ध कराने का तथा सस्ता इलाज देने का जहां तक सवाल है इस ओर बिना निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों को रद्द किए कुछ भी करना सम्भव नहीं है। क्या महागठबंधन इन नीतियों के खिलाफ है? नहीं। क्या महागठबंधन में शामिल पार्टियां इन नीतियों की मुखर विरोधी हैं? नहीं। महागठबंधन ‘भानुमति का पिटारा’ है, अवसरवादी गठबंधन है। यह न तो हिन्दू फासीवाद का धुर विरोधी है ना ही निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों का। इसका भविष्य चुनाव जीतने पर भी क्या होगा? इन तथ्यों से आसानी से समझ में आ सकता है।
     जहां तक जनता का सवाल है उसे फिर से छल-कपट के सिवा कुछ हासिल नहीं होना है। अंततः यही कहना सही होगा कि जीते चाहे कोई भी जनता की तो फिलहाल हार ही होनी है।

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...