Monday, 22 February 2021

मौकापरस्त गठबन्धन अर्थात महागठबंधन बनाम हिन्दू फासीवादी गठबंधन




 

मौकापरस्त गठबन्धन अर्थात महागठबंधन बनाम हिन्दू फासीवादी गठबंधन





       बिहार में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। तीन चरणों के चुनाव निपटते ही 10 नवंबर को चुनावी नतीजे भी घोषित हो जाएंगे। जीत के लिए असल चुनावी संघर्ष महागठबंधन और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच है। महागठबंधन में तीनों संसदीय वाम दल यानी सी पी आई, सी पी आई (एम एल) लिबरेशन व सी पी एम भी शामिल हैं व इसके मुख्य घटक हैं लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल तथा कांग्रेस। पिछले विधानसभा चुनाव में साम्प्रदायिक ताकतों को हराने के नाम पर नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाटेड भी महागठबंधन की हिस्सेदार थी।
 .    नीतीश व उनकी जदयू इस बार हिन्दू फासीवादी पार्टी के द्वारा बने गठबंधन एन डी ए में शामिल है। एन डी ए में  इस बार भाजपा, जद यू के अलावा हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा शामिल है। इस बार लोक जनशक्ति पार्टी इससे बाहर है। यह मोदी के साथ होने मगर नीतीश को बाहर करने के नारे के साथ मैदान में है।
    इस बार आर एल एस पी (कुशवाहा) बसपा के साथ तीसरे मोर्चे (ग्रांड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट) के नाम से चुनावी मैदान में है। इसके अलावा और भी छोटी-छोटी पार्टियां हैं जिन्हें कहीं भी सीटों के बंटवारे में अपने हिसाब से भाव नहीं मिला या पार्टी को तवज्जो नहीं मिली। ये पूंजीवादी पार्टियां अकेले या फिर कोई अन्य मोर्चा बनाकर चुनाव के मैदान में हैं।
     असल सवाल यह है कि जनता के लिए इस चुनाव में क्या है? कुछ भी नहीं। क्या हिन्दू फासीवादियों को यह चुनाव कमजोर करेगा? कतई नहीं। 
     संसदीय वाम दलों का अवसरवाद आज स्प्ष्ट है। ये साम्प्रदायिक दंगों, साम्प्रदायिक पार्टी भाजपा को रोकने के नाम पर कभी किसी के साथ तो कभी किसी के साथ गठबंधन बनाते रहे हैं। जिस महागठबंधन में ये शामिल हैं उसके नीतीश कुमार व उनकी जदयू 2015 में कुछ वक्त गुजरने के बाद भाजपा के साथ गठबंधन करके मुख्यमंत्री बन गए।
    अवसरवादी नीतीश कुमार व उनकी जे डी यू जो इस बार सत्ता में हैं। उनसे बहुत सी उम्मीद खुद को ‘सेक्युलर’ व खुद को ‘वाम’ मानने वाले लोगों के बीच पिछली बार भी थी। ठीक वैसी ही जैसी कभी इन लोगों ने आम आदमी पार्टी व अन्ना हज़ारे के फासीवादी आंदोलन से उम्मीद की थी, मगर इसके फासीवादी चरित्र को कभी इनके द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। 
      खैर! अब ये एक बार फिर महागठबंधन से भारी उम्मीद लगाए हुए हैं। जैसे महागठबंधन की जीत हिन्दू फासीवादी ताकतों को रोक देगी। महागठबंधन में ‘संसदीय वाम’ भी हैं इसलिए इनकी उम्मीद बहुत ज्यादा है। संसदीय वाम की ऐसी दुर्गति हो चुकी है कि इन्हें तेजस्वी यादव के कंधे पर सवार होना पड़ रहा है। संसदीय वाम वैसे भी एक दौर में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनाने में हिन्दू फासीवादी पार्टी के साथ सहयोग की अद्भुत भूमिका निभा चुके हैं।
     आज के दौर में हिन्दू फासीवादियों का सत्ता में आने का निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों से गहरा नाता है। आज के पूंजीवादी संकट से गहरा नाता है। एकाधिकारी कारपोरेट पूंजी के मालिक खुल कर हिन्दू फासीवादी ताकतों के साथ खड़े हैं। ये इन नई आर्थिक नीतियों को धड़ल्ले से आगे बढ़ा चुके हैं। महागठबंधन भी इन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाने वाला है बस गति और तरीके का अंतर है। लेकिन इसके बावजूद कई लोग ऐसे हैं जो इससे बेहतरी की उम्मीद लगाये हुए हैं।
      आज स्पष्ट है कि ‘फेंकने’ या ‘झूठे वायदों’ की कला में सब माहिर हो चुके हैं या मोदी-शाह की जोड़ी ने यह कला यानी ‘जुमलेबाजी’ अन्य सभी को भी कायदे से सिखा दी है। 
      मौजूदा वक्त में जब भयानक बेरोजगारी है, निराशा है, तब ऐसे में रोजगार का वायदा लुभाने वाला ही है इसीलिये महागठबंधन के प्रमुख तेजस्वी के जीतने के तत्काल बाद 10 लाख नौकरी देने के वायदे पर विरोधियों का भड़कना स्वाभाविक है हालांकि एन डी ए या मोदी-शाह ही यह बेशर्मी कर सकते थे कि सत्ता में होने के दौरान रोजगार खा जाने के बावजूद 19 लाख रोजगार देने का वायदा करें। यही नहीं मोदी सरकार ने बिहार में हर किसी के लिए उस कोरोना वैक्सीन के निःशुल्क उपलब्ध कराने का फर्जी वायदा कर दिया जिसका अभी दूर-दूर तक अता-पता भी नहीं हैं। 
     सुरक्षित रोजगार उपलब्ध कराने का तथा सस्ता इलाज देने का जहां तक सवाल है इस ओर बिना निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों को रद्द किए कुछ भी करना सम्भव नहीं है। क्या महागठबंधन इन नीतियों के खिलाफ है? नहीं। क्या महागठबंधन में शामिल पार्टियां इन नीतियों की मुखर विरोधी हैं? नहीं। महागठबंधन ‘भानुमति का पिटारा’ है, अवसरवादी गठबंधन है। यह न तो हिन्दू फासीवाद का धुर विरोधी है ना ही निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों का। इसका भविष्य चुनाव जीतने पर भी क्या होगा? इन तथ्यों से आसानी से समझ में आ सकता है।
     जहां तक जनता का सवाल है उसे फिर से छल-कपट के सिवा कुछ हासिल नहीं होना है। अंततः यही कहना सही होगा कि जीते चाहे कोई भी जनता की तो फिलहाल हार ही होनी है।

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