Friday, 8 December 2023

हिंदू फासीवादियों की जीत के मायने




       विधान सभा चुनाव : 2023
      हिंदू फासीवादियों की जीत के मायने        

      जैसा कि तय था मोदी और शाह की जोड़ी की अगुवाई में हिंदूत फासीवादी उत्तर भारत के तीन राज्यों के चुनाव में जीत के लिए सब कुछ दांव पर झोंक देंगे। इस जीत के जरिए 2024 की लोक सभा चुनाव के लिए पूरा माहौल तैयार कर देना था। इन प्रांतों में चुनाव में भाजपा को जीत हासिल हुई। बहुमत के लिए जरूरी सीटों से ज्यादा सीट हासिल करने में मोदी सरकार कामयाब रही। इसी के साथ ही यह भी सच है कि तेलंगाना में भाजपा तमाम तिकड़मों के बावजूद सत्ता के निकट भी नहीं पहुंच सकी। इसी तरह मिजोरम में जेड पी एम पार्टी जीत गई।

        उत्तर भारत में भाजपा के चुनाव जीतते ही शेयर बाजार ने जश्न मनाया। इसका सूचकांक तुरंत ही ऊपर उठ गया साथ ही अदानी के शेयर में भारी उछाल देखने को मिला।

      तीन राज्यों में भाजपा की जीत पर कार्पोरेट मीडिया मोदी की जयजयकार में डूबा हुआ है। एक तरह से 2024 के आम चुनाव में मोदी की भाजपा को जीता हुआ घोषित कर दिया है।

       निश्चित तौर पर मोदी और भाजपा की जीत हुई है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की वापसी की बातें की जा रही थी, वह नहीं हुई।

       यदि मत प्रतिशत के लिहाज से देखा जाय तो कांग्रेस ने इन राज्यों में अपने मत वोट शेयर को बरकरार रखा है। बीजेपी छतीसगढ़ में 46.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 54 सीटें ; मध्य प्रदेश में 48.6 प्रतिशत मत के साथ 163 सीटें; तथा, राजस्थान में 41.7 प्रतिशत के साथ 115 सीट हासिल कर बाज़ी पलट दी। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 42.2 वोटों के साथ 35 सीटें मिलीं; मध्य प्रदेश में 42.1 प्रतिशत वोटों के साथ 66 सीटें; और राजस्थान में 39.5 वोट शेयर के साथ 69 सीटें मिली।

         इन तीनों ही राज्यों में भाजपा का आधार पहले से ही मौजूद रहा है विशेषकर मध्य प्रदेश में।  यहां  2003 के चुनाव में भाजपा को 173, बाद में 143 और फिर 165 सीटें मिलती रही हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी अलग राज्य बनने  के बाद ही भाजपा 50 सीटें हासिल करती रही हैं। और मत प्रतिशत 40 के आसपास रहा है। राजस्थान में 2003 में भाजपा को 120 तो 2013 में 45 प्रतिशत मतों के साथ 163 सीटें मिली हैं।

          ये तथ्य खुद में, यह बता देते हैं कि जो मीडिया मोदी को सर्वाधिक लोकप्रिय और मतदाताओं को अपनी ओर खींचने वाला बताते हैं उसकी हकीकत में क्या स्थिति है। इस तरह भाजपा यानी हिंदू फासीवादियों की मौजूदा चुनाव में जीत कहीं से भी 2024 के आम चुनाव में जीत की गारंटी नहीं हैं। यदि इस लिहाज से नहीं तो इस तर्क से भी की 2018 के चुनाव में भाजपा की इन राज्यों में हार हुई थी जबकि फिर 2019 के आम चुनाव में भाजपा जीत गई थी।

        मोदी शाह और भाजपा की जीत की सबसे बड़ी ताकत है कॉरपोरेट पूंजी का खुला साथ। कॉरपोरेट पूंजी अपने फंड और मीडिया के दम पर मोदी को देश की तस्वीर बदल देने वाला और सर्वश्रेष्ठ नेता बताता है। इसके साथ ही इनकी सबसे बड़ी ताकत इनका संगठन और सांगठनिक नेटवर्क, अफवाह मशीनरी है जिसके दम पर ये जमीनी स्तर पर फीड बैक लेते हैं और माहौल को रातों रात बदलने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा केंद्र की सत्ता में होने के अतिरिक्त फायदे इन्हें मिल जाते हैं। इनकी उग्र हिंदुत्व की राजनीति इसके साथ साथ चलती है जिसे कभी भी इस सबसे अलग नहीं किया जा सकता। इसके अलावा इनके पास तमाम तिकड़में हैं विरोधी मतदाताओं के नाम मतदाताओं की सूची से गायब कर देना तथा फर्जी वोटिंग; यह सब सूक्ष्म स्तर पर होता है। जिसका नतीजा यही होता है कि यदि जनता के स्तर पर बड़े स्तर पर इनके खिलाफ़ वोटिंग ना हो या इन्हें वोट ना मिले तो इनका  जीतना तय है।

        ये कॉरपोरेट मीडिया और ई डी जैसी सस्थाओं के दम पर विपक्ष की साख को मिट्टी में मिलाने का अभियान चलाते हैं।

      मौजूदा विधान सभा चुनावों में विशेषकर उत्तर भारत में यही काम इन्होंने किया। चुनाव को हर बार की ही तरह मोदी बनाम स्थानीय विपक्ष नेता किया गया। केंद्रीय नेताओं को झोंक दिया गया। जब कभी इस रणनीति में ये चुनाव में हारते हैं तब फिर ठीकरा दूसरों पर मढ देते हैं जबकि जीतने पर वह सिर्फ मोदी की जीत होती हैं।

       विपक्ष की पूंजीवादी पार्टियां विशेषकर कांग्रेस जो कि हिंदू फासीवादियों को चुनाव में हरा देने का दावा कर रही थी खुद हार गई। 2024 के लिए जो गठबंधन सितंबर में जोर शोर से आगे बढ़ रहा था वह विधान सभा चुनाव आते आते बिखर गया। भानुमति का कुनबा अपने ही अंतर्विरोधों से पार नहीं पा सका है। कांग्रेस इसमें अपने वर्चस्व को, इस चुनाव में जीत लेने के बाद बनाने की मंशा रखती थी मगर बेचारों के लिए वह स्थिति बन ही नहीं पाई।

      विपक्ष की अन्य छोटी और राज्य के स्तर की पार्टियां के पास सिवाय कांग्रेस के इर्द गिर्द सिमटने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। इसे कांग्रेस भी जानती है। इसी लिए आम चुनाव के लिए किस पार्टी को कितनी सीट मिलेंगी, इसका झगड़ा अभी जारी है।

        विपक्ष की इस स्थिति से वे लोग बहुत हैरान परेशान हैं जिन्हें राहुल गांधी और राहुल की कांग्रेस हिंदू फासीवादियों को टक्कर देते हुए नजर आते हैं।जिन्हें लगता है यही हिंदू फासीवादियों से मुक्ति दिला सकती है। इनका भरोसा जनता पर नहीं है। ये भूल गए हैं कि इतिहास का निर्माण जनता ही करती हैं।

         सही बात यही है कि विपक्ष की जीत से जनता को कोई मुक्ति नहीं मिलने वाली। ना तो दुख तकलीफों से ना ही हिंदू फासीवादियों से। छत्तीसगढ़, राजस्थान में भाजपा की सरकार के हार के बाद कांग्रेस का जीतना फिर से भाजपा का यहां सत्ता पर आ जाना, इस चीज को स्पष्ट कर देती है। यही स्थिति देश में आम चुनावों में भी विपक्ष के जीतने की स्थिति में भी बनेगी।

 


       


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