Tuesday, 26 February 2013


 अंधराष्ट्रवादी गर्द गुबार खड़ा करते फासीवादी संगठन  व हिन्दी अखबार
     
       उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में कश्मीरी छात्रों द्वारा अफ़जल गुरु को फ़ांसी देने के तीन दिन बाद किये गये प्रदर्शन को देश द्रोह घोषित करने में जहां संघी व उसके आनुषंगिक संगठनों ने कोई कसर नहीं छोडी| वहीं हिन्दी दैनिक अखबार तो इस वक्त अघोषित तौर पर  इनके  मुखपत्र ही बन गये| कश्मीरी छात्रों पर देशद्रोही का ठप्पा लगाने में अखबार के पन्ने भर दिये|कश्मीरी छात्रों की फ़ासिस्टों द्वारा की गयी पिटाई को यूं प्रचारित किया गया मानो इन्होंने कोई महान काम किया हो जंग जीत ली हो|अखबार यहीं नहीं रुके उन लोगों को व संगठनों को भी जो फ़ासिस्ट संगठनों के विरोध में व कश्मीरी छात्रों के समर्थन में आगे आये उन्हें भी परोक्ष तौर पर देशद्रोही करार दे दिया गया|
      चूकीं 9 फ़रवरी को अफ़जल गुरु को फ़ांसी दे दी गयी थी| न्यायालय द्वारा दिया गया फ़ांसी का यह फ़ैसला ``तर्क व तथ्यों के आधारपर न होकर  ``सामुहिक अन्त:करण’’ के आधार पर लिया गया था|अफ़जल गुरु ने 93 में ही खुद को भारतीय सेना के हवाले कर दिया था तब से वह सेना व पुलिस की निगरानी में था मामला यहां तक था कि 2000 के उत्तरार्ध में स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने उसे ट्रेनिंग व सर्टिफ़िकेट देकर छ: माह के लिये स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर भी बनाया था| खैर! न्यायालय ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर फ़ैसला दे दिया स्पष्ट था कि यह निर्णय फ़ासीवादी रुझान को तुष्ट करने वाला भी था|खैर ! फ़ांसी के तत्काल बाद ही `सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानूनके तहत संगीनों के साये में जी रही कश्मीरी अवाम पर पूरी ही तरह शिकंजा कस दिया अखबार , सोशल साइट व मोबाइल पर संदेशों के आदान-प्रदान व खबरों के प्रसारण पर भी रोक लगा दी थी| इसके विरोध में जो प्रदर्शन हुए उसमें कुछ लोग मारे गये व कुछ घायल हो गये थे|   
      इस कर्फ़्यू व नरसंहार के विरोध में ही कश्मीरी छात्रों ने 12 दिसम्बर को राजधानी देहरादून में हाथों में चार्ट लेकर विरोध प्रदर्शन किया|जिसमें कश्मीर में नरसंहार रोके जाने व कर्फ़्यू हटाये जाने सम्बन्धी स्लोगन थे|ये छात्र यहां रह कर पढाई कर रहे थे|लगभग 20 कश्मीरी छात्र पूंजीवादी संविधान प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप ही विरोध प्रदर्शन कर रहे थे| इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ही इसकी खबर साम्प्रादायिक व फ़ासीवादी संगठनों तक पहुँच गयी तत्काल ही इनके कई लोग यहां पहुंच गये और फ़िर हंगामा खडा करना शुरू कर दिया| देशद्रोही होने का तमगा इन संगठनों द्वारा इन छात्रों पर लगाया जा रहा था|पुलिस पर इस बात के लिये भी दबाव बनाया जा रहा था कि इस आधार पर मुकदमे दर्ज किये जायं|
      इस    हंगामाखेज माहौल के चलते व पुलिस के आतंक के चलते कुछ छात्र यहां से जाने लगे तो यहीं इन्दिरा मार्केट में ही दो कश्मीरी छात्रों की पिटाई साम्प्रादायिक-फ़ासीवादी तत्वों द्वारा कर दी गयी इसके अलावा एक चकराता के युवक को कश्मीरी समझ कर उसकी भी पिटाई कर दी गयी|
       पुलिस प्रशासन ने इन फ़ासीवादी-साम्प्रादायिक तत्वों को गिरफ़्तार करने के बजाय 16 कशमीरी छात्रों को ही हिरासत में ले लिया|पुलिस प्रशासन द्वारा देर शाम  को ही एक प्रेस कान्फ्रेंस कर स्पष्ट कर दिया गया कि इस प्रदर्शन में अफ़जल गुरु के समर्थन में किसी भी प्रकार के नारे नहीं लगे व इनके पास कोई भी एसा स्लोगन वाला चार्ट नहीं था|लेकिन इसके बावजूद भी ये संगठन अपनी जिद पर अडे रहे कि इन पर अफ़जल गुरू के फ़ांसी का विरोध करने व भारत सरकार का विरोध करने के आरोप में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाय|
      फ़िर रात तकरीबन एक बजे इन छात्रों को रिहा किया गया|बात यहीं खत्म नहीं हुई अगले दिन हिन्दी दैनिक अखबारों ने इन छात्रों को देशद्रोही घोषित करने का अभियान छेड दिया|एक अखबार ने लिखा ``अफजल गुरु की फांसी को लेकर कश्मीरी मूल के लोगों में इसका विरोध ˜तिनका बन कर सुलगते हुए शोला बन गया और हर बात की खबर रखने का दावा करने वाली पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। एलआईयू से लेकर इंटेलीजेंस के लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।… राजधानी में दिन दहाड़े आतंकी अफजल समर्थकों ने जो किया उससे सुरक्षा बंदोबस्त की कलयी खुल गई है। इस घटना के बाद पुलिस के खुफिया तंत्र पर सवाल उठने लगे हैं। ………कई लोगों ने बताया कि यह एक दिन का फितूर नहीं है।……… ऐसे प्रदर्शनकारी छात्रों के मन में काफी समय से इस प्रकार की विचारधारा मौजूद थी। इसके पीछे देश विरोधी तत्व सक्रिय हैं।…… मामले की जानकारों की मानें तो यह देश विरोधी तत्वों के भविष्य की योजना का प्रारंभिक कदम है।‘’’
      इस प्रकार मीडिया द्वारा माहौल में  सनसनी, उत्तेजना           व असुरक्षा पैदा कर दी गयी| और इस प्रकार से कॉरपोरेट घरानों द्वारा संचालित मीडिया ने इस बात को भी किनारे लगा दिया कि इस पूंजीवादी लोकतन्त्र में भी कम से कम लोगों को अपने विरोध को अभिव्यक्त करने का अधिकार है भले ही उनका यह विरोध अधिकांश को गलत लगे|लेकिन इस गलत लगने से उनके विरोध करने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता|
      इस लिहाज से यदि इन  कश्मीरी छात्रों को यदि यह भी लगता हो      भारत सरकार व न्यायालय द्वारा अफ़जल मामले में जो किया गया वह गलत है तो फ़िर उन्हें इस गलत के खिलाफ़ अपना विरोध व्यक्त करने अपना मत व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिये |लेकिन हुआ बिल्कुल विपरीत|      
      और फ़िर इस माहौल ने दो कदम और आगे बढकर कश्मीरी छात्रों के निजता के अधिकार पर हमला करते हुए  एक हिन्दी दैनिक अखबार ने प्रदर्शन में शामिल सभी छात्रों का पूरा-पूरा पता उनके पिता के नाम सहित छाप दिया| इस प्रकार ये अखबार खुद ही `पुलिस`न्यायालयकी भूमिका में आ गये|
       पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर क्या किया | एक ओर सारे कश्मीरी छात्रों का सत्यापन अभियान शुरू कर दिया तथा इन छात्रों को निर्देश दिया कि वे अपने कमरों से बाहर ना जायें|लेकिन दूसरी ओर मकान मालिक का यह दबाव कि वे तत्काल उनके कमरे खाली करें|इसका परिणाम यही हुआ कि ये छात्र और ज्यादा असुरक्षित हो गये व और ज्यादा अलगाव में पड गये , डर व दहशत में आ गये |अपने ही देश में हिकारत व नफ़रत का यह भाव किसी को भी यही अहसास दिलायेगा कि वे अपने मुल्क में न होकर किसी विदेशी मुल्क में हैं|   
      फ़ासीवादी संगठनों द्वारा की गयी मारपीट के विरोध में जब कुछ संगठनों ने प्रेस रीलीज जारी की|तब अगले दिन एक हिन्दी दैनिक अखबार ने खबर लगायी`` देश द्रोहियों के समर्थन में आये कुछ संगठन’’| इस प्रकार इन अखबारों ने अपना घृणित फासीवादी अभियान जारी रखा|
      मीडिया के इस रुख व फासीवादी संगठनों के द्वारा इस मारपीट के खिलाफ़ फ़िर 16 फ़रवरी को उत्तराखण्ड महिला मंच, भाकपा(माले), भाकपा, माकपा, क्रालोस,पछास, पीपल्स फ़ोरम, प्रगतिशील पत्रकार ऐसोसिएसन ,चेतना समाजिक आंदोलन आदि संगठनों ने सयुंक्त रूप से एकदिवसीय धरने का आयोजन किया जिसमें पी∙यू∙डी∙आर∙के गौतम नौलखा भी शामिल थे |इस धरने के माध्यम से राज्यपाल के लिये एक ज्ञापन प्रेषित किया जाना था  जिसमें कश्मीरी छात्रों के साथ मारपीट करने वाले लोगों की गिरफ़्तारी तथा कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा व उनके रहने की व्यवस्था राज्य सरकार द्वारा लिये जाने की  मांग की गयी थी साथ ही यह मांग भी की गयी थी कि शहर में इस प्रकार के प्रचार प्रसार पर रोक लगे| इसके अलावा राष्ट्रीय सहारा व हिन्दुस्तान अखबार के संपादकों के नाम भी इस प्रकार की घृणित सामग्री के प्रचार पर रोक लगाये जाने के संदर्भ में पत्र दिये जाने थे |
              11 बजे धरना शुरू हुआ लगभग 2 घण्टे तक सब सामान्य गति से चलता रहा लेकिन  11 बजे से यहां पर आये हुए पत्रकारों के लगातार 2 घण्टे तक यहीं पर  जमे रहने  से कुछ अंदेशा हो चला था कि कुछ असामान्य होने वाला है| इस दौरान पुलिस व इसके सी∙ओ रैंक के अधिकारी भी यहां आ धमके और   यहां से हटने का दबाव बनाने लगे | पुलिस प्रशासन द्वारा तर्क दिया गया कि गांधी पार्क पर धरना प्रदर्शन प्रतिबन्धित हैं | लेकिन इसके बावजूद भी जब प्रदर्शनकारियों ने धरने से हटने से मना कर दिया तो तभी पत्रकारों के इस जमावड़े के बीच से कुछ सामप्रादायिक तत्व `बन्दे मातरमके नारे लगाने लगे बस फ़िर क्या था पुलिस प्रशासन को जैसे बहाना मिल गया था या फ़िर इस बहाने को निर्मित करने में वह खुद शामिल थी खैर जो भी हो परिणाम यही हुआ कि पुलिस प्रशासन यहां से लोगो हटाना चाहता था इसलिये उसने 12 -13 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया व गाड़ी में बिठाकर थाने ले जाने के बाद नाम-पता नोट करने के बाद छोड़ दिया|
      अगले दिन डी∙ए∙वी∙कॉलेज में एक कश्मीरी छात्र की संघी छात्र संगठन के एक सदस्य ने बुरी तरह से पिटाई कर दी|हालांकि इस बार यह विरोध प्रदर्शन का दबाव ही था कि पुलिस ने जहां घायल छात्र को तुरन्त ही हॉस्पिटल में एडमिट किया व  इसे घायल करने वाले संघी छात्र के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कर दिया|कश्मीरी छात्रों के प्रति इस माहौल ने उन्हें यहां से वापस कश्मीर जाने को बाध्य कर दिया है |







     



20-21 फरवरी की आम हड़ताल के संदर्भ में


                               20-21 फरवरी की आम  हड़ताल  के संदर्भ में
       20-21 फरवरी को तथाकथित वामपंथी ट्रेड यूनियनों समेत 11 ट्रेड यूनियनों ने देश के स्तर पर आम हड़ताल आयोजित की। यह हड़ताल विनिवेशीकरण व निजीकरण के विरोध में तथा न्यूनतम वेतनमान व श्रम कानूनों को लागू करवाए जाने की मांग को लेकर है। इस प्रकार की हड़ताल इससे पहले भी अलग-अलग वक्त पर होती रहीं हैं।
                ये हड़तालें जो कि अलग-अलग वक्त पर हुई हैं। महज रस्म अदायगी भर साबित हुई हैं। हालांकि समग्रता में इसके दबाव के चलते विनिवेशीकरण व निजीकरण किए जाने की गति कुछ कम जरूर हुई। लेकिन पूंजी की आक्रामकता के आगे यह बेहद नाकाफी है।
                यह नाकाफी है और यह हड़ताल रूपी प्रतिरोध इसीलिए अनुष्ठान भर बन जाता है क्योंकि ट्रेड यूनियन नेतृत्व जो इन हड़तालों का संगठन व संचालन करती हैं। वे खुद अर्थवाद, कानूनवाद और सुधारवाद के दलदल में गोता लगा रहे हैं। यही अर्थवाद, कानूनवाद और सुधारवाद इन ट्रेड यूनियन नेतृत्व को रस्मअदायगी तक सीमित कर देता है। अपनी बारी में वक्त बे वक्त होने वाले ये प्रतिरोध इन ट्रेड यूनियनों के अस्तित्व की शर्त बन जाती हैं। या दूसरे रूप में अस्तित्व की शर्त के लिये इस प्रकार के प्रतिरोध अनिवार्य बन जाते हैं|
      बदलती परिस्थितियों के साथ यह तस्वीर भी बदल जायेगी| शासक वर्ग जिस प्रकार लगातार धीरे धीरे ही सही विनिवेशीकरण के रथ को आगे बढा रहा है तब इन ट्रेड युनियन नेतृत्व का आधार भी खत्म होने की ओर बढेगा साथ ही पूंजी की आक्रामकता के चलते मजदूर वर्ग का जीवन जिस हद तक नारकीय होता जा रहा है व जीवन परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं तब अपनी स्वाभाविक गति में मजदूर वर्ग का यह हिस्सा इस रस्मआदयगी के खोल को तोडकर बाहर निकाल आयेगा। जिसके कुछ लक्षण 20 फरवरी की हड़ताल में दिखाई भी दिए।
                वर्तमान हड़ताल के संदर्भ में कहा जाए तो यह कि इन हड़तालों में उठाए जाने वाली मांगों की प्रकृति को देखते हुए इनका समर्थन किया जाना चाहिए। तथा भरसक प्रयास इस बात का होना चाहिए कि मजदूर वर्ग को इस अर्थवादी, कानूनवादी और सुधारवादी दायरे से बाहर निकाला जाए, इसके प्रति सचेत किया जाए। तथा उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग बनाया जाए।

Sunday, 24 February 2013

the terror of communal and faasist organigation on kashmiree students in Dehradun



      ``सामुहिक अन्त:करण’’ के नाम पर `फ़ासीवादी सोच’’ को तुष्ट करती  फैसले सुनाती  न्यायपालिका
                       
      13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हुए हमले के आरोप में योजनाकार के रूप में अफ़ज़ल गुरु को अन्तत: 9 फ़रवरी की सुबह फ़ांसी दे दी गयी और इसके बाद फ़िर यहीं तिहाड़ जेल के भीतर दफ़ना दिया गया अफजल गुरु ऐसा शख्स था जो एक दौर  में कश्मीरी राष्ट्रीयता के पक्ष में अपनी आवाज बुलन्द  करता था और फ़िर बाद में जो प्रतिक्रियावादी होकर इस्लामिक कटटरपंथियों के साथ हो लिया यहां से मोह भंग होने पर 1993 में नियमित उग्रवादी होते हुए भी उसने स्वेच्छा से बी.एस.एफ़. के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया यह  हथियार डाल चुका शख्स अब पूरी तरह से भारतीय सेना पुलिस की निगरानी में था घोर दबाव में इनके लिये मुखबिरी भी करता था सन 2000 के उत्तरार्ध में स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने उसे ट्रेनिगं देकर फ़िर सर्टिफ़िकेट देकर  उसे : माह के लिये स्पेशल पुलिस ओफ़िसरबना दिया   
      13 दिसम्बर 2001 को जब  संसद पर हमला हो गया जिसमें एक माली सात सुरक्षाकर्मी मारे गये। तो उसके अगले ही दिन 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने ऐसे कई लोगों का पता लगा लिया है, जिन पर इस षडयंत्र में शामिल होने का संदेह है। एक दिन बाद, 15 दिसम्बर को उसने घोषणा की कि उसने मामले को सुलझा लिया था’ : पुलिस ने दावा किया कि हमला पाकिस्तान आधारित दो आतंकवादी गुटों, लश्कर--तैयबा और जैश--मोहम्मद का संयुक्त अभियान था। इस षडयंत्र में 12 लोगों के शामिल होने की बात कही गयी। जैश--मोहम्मद का ग़ाज़ी बाबा ( आरोपी नंबर -1), जैश--मोहम्मद का ही मौलाना मसूद अज़हर ( आरोपी नंबर 2), तरीक़ अहमद ( पाकिस्तानी नागरिक ), पांच मारे गये पाकिस्तानी आतंकवादी’( आज तक हम नहीं जानते कि वे कौन थे ) और तीन कश्मीरी मर्द एस..आर. गिलान, शौकत गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल। इसके अलावा शौकत की बीबी अफ़सान गुरू। सिर्फ़ यही चार गिरफ़्तार हुए। 
       और फ़िर 15 दिसम्बर, 2001 को श्रीनगर पुलिस ने अफ़जल को श्रीनगर बस स्टॉप से पकड़ लिया। दिल्ली पुलिस ने अपना आरोप-पत्र एक त्वरित-सुनवाई अदालत में दायर किया निचली अदालत ( ट्रायल कोर्ट ) ने 16 दिसम्बर, 2002 को गिलानी, शौकत और अफ़ज़ल को मौत की सज़ा सुनायी। अफ़सान गुरू को पांच वर्ष की कड़ी कैद की सज़ा दी गयी। साल भर बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफ़सान गुरू को बरी कर दिया। लेकिन शौकत और अफ़ज़ल की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी रिहाइयों को यथावत् रखा और शौकत की सज़ा को 10 वर्ष की कड़ी सज़ा में तब्दील कर दिया। लेकिन उसने मोहम्मद अफ़ज़ल की सज़ा को बरक़रार रखा।
      4 अगस्त, 2005 के अपने फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़-साफ़ कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अफ़ज़ल किसी आतंकवादी गुट या संगठन का सदस्य है। लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा है : ‘जैसा कि अधिकांश षड्यंत्रों के मामले में होता है, उस सांठ-गांठ का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता और है जो आपराधिक षड्यंत्र ठहरती हो। फिर भी, कुल मिलाकर आंके जाने पर परिस्थितियां अचूक ढंग से अफ़ज़ल और मारे गये फ़ियादीनआतंकवादियों के बीच सहयोग की ओर इशारा करती हैं।
      यानि सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं।
      फ़ैसले के एक विवादास्पद पैरे में कहा गया  : ‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौतें हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अन्तःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जायेगा।
      और फ़िर  सामूहिक अन्तःकरण की संतुष्टि के नाम पर तर्क तथ्योंके आधार पर फ़ैसला सुनाने की   निर्णय लेने की परिपाटी को ठेंगा दिखाते हुए मौतका फ़रमान दे दिया गया। और इस प्रकार यह फ़ैसला समाज के उस फ़ासीवादी रुझान को जिसे शासक वर्ग पैदा कर  लगातार  इसे खाद पानी मुहया कर रहा है को तुष्ट करता है|शासक वर्ग  इस फासीवादी रुझान को और मज़बूत करता है फ़िर इसका इस्तेमाल करता है अपने व्यवस्था के संकटों को हल करने के लिये इसीलिये फ़ासीवादी संगठन इस पर जश्न भी मना रहे हैं। इसीलिये फ़ांसी की यह सजा महज कानूनी प्रश्न होकर राजनीतिक प्रश्न  है।कसाब इसके बाद अफ़जल इतने कम समय में दो फ़ांसी। यह निकट भविष्य में वाले संसदीय चुनावों के मद्देनजर लिया गया फ़ैसला भी है|
       इस फ़ैसले के तुरन्त बाद हीसशस्त्र बल विशेषाधिकार कानूनके तहत संगीनों के साये में पहले से ही रह रही अवाम पर  इस बार फ़िर पूरी ही तरह से शिकंजे में ले लिया गया | विरोध करने पर फ़िर वही दमन जिसमें लोग मारे गये घायल हुए| उन्हें फ़िर अलगाव में डालने वाली कार्यवाही की गयी| इसलिये  कश्मीरी अवाम को उसका सम्मान दिये बगैर, उसके अधिकारों को सम्मान दिये बिना उस अलगाव को जो भारतीय शासकों ने पैदा किया है उसको खत्म किये बगैर ना तो कश्मीर समस्या का ना ही फ़िर इससे उपजने वाले अलगाववाद कट्टरपंथी आतंकवाद को खत्म किया जा सकता है|
      लेकिन भारतीय शासकों के लिये यह संभव नहीं| पूंजीवादी लूट खसोट के लिये  जो शोषण-उत्पीड्न-दमन इन्होंने किया है ये उसे और जोर -शोर से आगे बढ़ाने के लिये आतुर हैं। इसलिये समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के बगैर आत्मनिर्णय के अधिकार का लागू होना मुमकिन नहीं है।और यह अलगाववाद कट्टरपंथी आतंकवाद भी इसीलिए इस शोषण-उत्पीड्न-दमन के बने रहते हुए खतम नहीं हो सकता |

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...