अंधराष्ट्रवादी
गर्द गुबार खड़ा करते फासीवादी संगठन व
हिन्दी अखबार
उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में कश्मीरी छात्रों द्वारा अफ़जल
गुरु को फ़ांसी देने के तीन दिन बाद किये गये प्रदर्शन को देश द्रोह घोषित करने में
जहां संघी व उसके आनुषंगिक संगठनों ने कोई कसर नहीं छोडी| वहीं हिन्दी दैनिक अखबार तो इस वक्त अघोषित तौर पर इनके
मुखपत्र ही बन गये| कश्मीरी छात्रों पर देशद्रोही का
ठप्पा लगाने में अखबार के पन्ने भर दिये|कश्मीरी छात्रों की
फ़ासिस्टों द्वारा की गयी पिटाई को यूं प्रचारित किया गया मानो इन्होंने कोई महान काम
किया हो जंग जीत ली हो|अखबार यहीं नहीं रुके उन लोगों को व
संगठनों को भी जो फ़ासिस्ट संगठनों के विरोध में व कश्मीरी छात्रों के समर्थन में
आगे आये उन्हें भी परोक्ष तौर पर देशद्रोही करार दे दिया गया|
चूकीं 9 फ़रवरी को अफ़जल गुरु को फ़ांसी दे दी गयी थी| न्यायालय द्वारा दिया गया फ़ांसी का यह फ़ैसला ``तर्क
व तथ्यों के आधार‘पर न होकर
``सामुहिक अन्त:करण’’ के आधार
पर लिया गया था|अफ़जल गुरु ने 93 में ही खुद को भारतीय सेना
के हवाले कर दिया था तब से वह सेना व पुलिस की निगरानी में था मामला यहां तक था कि
2000 के उत्तरार्ध में स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने उसे ट्रेनिंग व सर्टिफ़िकेट देकर छ:
माह के लिये स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर भी बनाया था| खैर! न्यायालय
ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर फ़ैसला दे दिया स्पष्ट था कि यह निर्णय
फ़ासीवादी रुझान को तुष्ट करने वाला भी था|खैर ! फ़ांसी के
तत्काल बाद ही `सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून’के तहत संगीनों के साये में जी रही कश्मीरी अवाम पर पूरी ही तरह शिकंजा कस
दिया अखबार , सोशल साइट व मोबाइल पर संदेशों के आदान-प्रदान
व खबरों के प्रसारण पर भी रोक लगा दी थी| इसके विरोध में जो
प्रदर्शन हुए उसमें कुछ लोग मारे गये व कुछ घायल हो गये थे|
इस कर्फ़्यू व नरसंहार के विरोध में ही कश्मीरी छात्रों ने 12 दिसम्बर
को राजधानी देहरादून में हाथों में चार्ट लेकर विरोध प्रदर्शन किया|जिसमें कश्मीर में नरसंहार रोके जाने व कर्फ़्यू हटाये जाने सम्बन्धी
स्लोगन थे|ये छात्र यहां रह कर पढाई कर रहे थे|लगभग 20 कश्मीरी छात्र पूंजीवादी संविधान प्रदत्त अधिकारों के अनुरूप ही
विरोध प्रदर्शन कर रहे थे| इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ही
इसकी खबर साम्प्रादायिक व फ़ासीवादी संगठनों तक पहुँच गयी तत्काल ही इनके कई लोग
यहां पहुंच गये और फ़िर हंगामा खडा करना शुरू कर दिया| देशद्रोही होने का तमगा इन
संगठनों द्वारा इन छात्रों पर लगाया जा रहा था|पुलिस पर इस
बात के लिये भी दबाव बनाया जा रहा था कि इस आधार पर मुकदमे दर्ज किये जायं|
इस हंगामाखेज
माहौल के चलते व पुलिस के आतंक के चलते कुछ छात्र यहां से जाने लगे तो यहीं
इन्दिरा मार्केट में ही दो कश्मीरी छात्रों की पिटाई साम्प्रादायिक-फ़ासीवादी
तत्वों द्वारा कर दी गयी इसके अलावा एक चकराता के युवक को कश्मीरी समझ कर उसकी भी
पिटाई कर दी गयी|
पुलिस प्रशासन ने इन
फ़ासीवादी-साम्प्रादायिक तत्वों को गिरफ़्तार करने के बजाय 16 कशमीरी छात्रों को ही हिरासत
में ले लिया|पुलिस प्रशासन द्वारा देर शाम को ही एक प्रेस कान्फ्रेंस कर स्पष्ट कर दिया
गया कि इस प्रदर्शन में अफ़जल गुरु के समर्थन में किसी भी प्रकार के नारे नहीं लगे
व इनके पास कोई भी एसा स्लोगन वाला चार्ट नहीं था|लेकिन इसके
बावजूद भी ये संगठन अपनी जिद पर अडे रहे कि इन पर अफ़जल गुरू के फ़ांसी का विरोध
करने व भारत सरकार का विरोध करने के आरोप में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाय|
फ़िर रात तकरीबन एक बजे इन छात्रों को रिहा किया गया|बात यहीं खत्म नहीं हुई अगले दिन हिन्दी दैनिक अखबारों ने इन छात्रों को
देशद्रोही घोषित करने का अभियान छेड दिया|एक अखबार ने लिखा ``अफजल
गुरु की फांसी को लेकर कश्मीरी मूल के लोगों में इसका विरोध ˜तिनका बन कर सुलगते हुए शोला बन गया और हर बात की खबर रखने
का दावा करने वाली पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी। एलआईयू से लेकर इंटेलीजेंस के
लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।… राजधानी में दिन दहाड़े आतंकी अफजल समर्थकों ने जो
किया उससे सुरक्षा बंदोबस्त की कलयी खुल गई है। इस घटना के बाद पुलिस के खुफिया
तंत्र पर सवाल उठने लगे हैं। ………कई लोगों ने बताया कि यह एक दिन का फितूर नहीं है।………
ऐसे प्रदर्शनकारी छात्रों के मन में काफी समय से इस प्रकार की विचारधारा मौजूद थी।
इसके पीछे देश विरोधी तत्व सक्रिय हैं।…… मामले की जानकारों की मानें तो यह देश
विरोधी तत्वों के भविष्य की योजना का प्रारंभिक कदम है।‘’’
इस
प्रकार मीडिया द्वारा माहौल में सनसनी, उत्तेजना व असुरक्षा पैदा कर दी गयी| और इस प्रकार से
कॉरपोरेट घरानों द्वारा संचालित मीडिया ने इस बात को भी किनारे लगा दिया कि इस
पूंजीवादी लोकतन्त्र में भी कम से कम लोगों को अपने विरोध को अभिव्यक्त करने का
अधिकार है भले ही उनका यह विरोध अधिकांश को गलत लगे|लेकिन इस
गलत लगने से उनके विरोध करने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता|
इस लिहाज से यदि इन
कश्मीरी छात्रों को यदि यह भी लगता हो भारत
सरकार व न्यायालय द्वारा अफ़जल मामले में जो किया गया वह गलत है तो फ़िर उन्हें इस
गलत के खिलाफ़ अपना विरोध व्यक्त करने अपना मत व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिये |लेकिन हुआ बिल्कुल विपरीत|
और फ़िर इस माहौल ने दो कदम और आगे बढकर कश्मीरी छात्रों के निजता
के अधिकार पर हमला करते हुए एक हिन्दी दैनिक
अखबार ने प्रदर्शन में शामिल सभी छात्रों का पूरा-पूरा पता उनके पिता के नाम सहित
छाप दिया| इस प्रकार ये अखबार खुद ही `पुलिस’
व `न्यायालय’ की भूमिका
में आ गये|
पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा
के नाम पर क्या किया | एक ओर सारे कश्मीरी छात्रों का सत्यापन
अभियान शुरू कर दिया तथा इन छात्रों को निर्देश दिया कि वे अपने कमरों से बाहर ना
जायें|लेकिन दूसरी ओर मकान मालिक का यह दबाव कि वे तत्काल
उनके कमरे खाली करें|इसका परिणाम यही हुआ कि ये छात्र और
ज्यादा असुरक्षित हो गये व और ज्यादा अलगाव में पड गये , डर
व दहशत में आ गये |अपने ही देश में हिकारत व नफ़रत का यह भाव किसी
को भी यही अहसास दिलायेगा कि वे अपने मुल्क में न होकर किसी विदेशी मुल्क में हैं|
फ़ासीवादी संगठनों द्वारा की गयी मारपीट के विरोध में जब कुछ
संगठनों ने प्रेस रीलीज जारी की|तब अगले दिन एक हिन्दी दैनिक अखबार
ने खबर लगायी`` देश द्रोहियों के समर्थन में आये कुछ संगठन’’| इस प्रकार इन अखबारों ने अपना घृणित फासीवादी अभियान जारी रखा|
मीडिया के इस रुख व फासीवादी संगठनों के
द्वारा इस मारपीट के खिलाफ़ फ़िर 16 फ़रवरी को उत्तराखण्ड महिला मंच, भाकपा(माले), भाकपा, माकपा,
क्रालोस,पछास, पीपल्स
फ़ोरम, प्रगतिशील पत्रकार ऐसोसिएसन ,चेतना
समाजिक आंदोलन आदि संगठनों ने सयुंक्त रूप से एकदिवसीय धरने का आयोजन किया जिसमें
पी∙यू∙डी∙आर∙के गौतम नौलखा भी शामिल थे |इस धरने के माध्यम
से राज्यपाल के लिये एक ज्ञापन प्रेषित किया जाना था जिसमें कश्मीरी छात्रों के साथ मारपीट करने
वाले लोगों की गिरफ़्तारी तथा कश्मीरी छात्रों की सुरक्षा व उनके रहने की व्यवस्था
राज्य सरकार द्वारा लिये जाने की मांग की
गयी थी साथ ही यह मांग भी की गयी थी कि शहर में इस प्रकार के प्रचार प्रसार पर रोक
लगे| इसके अलावा राष्ट्रीय सहारा व हिन्दुस्तान अखबार के
संपादकों के नाम भी इस प्रकार की घृणित सामग्री के
प्रचार पर रोक लगाये जाने के संदर्भ में पत्र दिये जाने थे |
11 बजे धरना शुरू हुआ लगभग 2 घण्टे तक सब
सामान्य गति से चलता रहा लेकिन 11 बजे से
यहां पर आये हुए पत्रकारों के लगातार 2 घण्टे तक यहीं पर जमे रहने से कुछ अंदेशा हो चला था कि कुछ असामान्य होने
वाला है| इस दौरान पुलिस व इसके सी∙ओ रैंक के अधिकारी भी
यहां आ धमके और यहां से हटने का दबाव
बनाने लगे | पुलिस प्रशासन द्वारा तर्क दिया गया कि गांधी
पार्क पर धरना प्रदर्शन प्रतिबन्धित हैं | लेकिन इसके बावजूद
भी जब प्रदर्शनकारियों ने धरने से हटने से मना कर दिया तो तभी पत्रकारों के इस
जमावड़े के बीच से कुछ सामप्रादायिक तत्व `बन्दे मातरम’
के नारे लगाने लगे बस फ़िर क्या था पुलिस प्रशासन को जैसे बहाना मिल
गया था या फ़िर इस बहाने को निर्मित करने में वह खुद शामिल थी खैर जो भी हो परिणाम
यही हुआ कि पुलिस प्रशासन यहां से लोगो हटाना चाहता था इसलिये उसने 12 -13 लोगों
को गिरफ़्तार कर लिया व गाड़ी में बिठाकर थाने ले जाने के बाद नाम-पता नोट करने के
बाद छोड़ दिया|
अगले दिन डी∙ए∙वी∙कॉलेज में एक कश्मीरी
छात्र की संघी छात्र संगठन के एक सदस्य ने बुरी तरह से पिटाई कर दी|हालांकि इस बार यह विरोध प्रदर्शन का दबाव ही था कि पुलिस ने जहां घायल
छात्र को तुरन्त ही हॉस्पिटल में एडमिट किया व
इसे घायल करने वाले संघी छात्र के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कर दिया|कश्मीरी छात्रों के प्रति इस माहौल ने उन्हें यहां से वापस कश्मीर जाने को
बाध्य कर दिया है |
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