Friday, 30 October 2015

                                Repression of Occupy UGC’ movement
Delhi --- The students’of Delhi’s universities and J N U were  protesting against the University Grants Commission’s (UGC’s) . This struggle started against the decision to discontinue the non-National Eligibility Test (NET) Fellowship for research scholars.  But instead of hearing their voice the government deployed there police and paramilitary personnel with the intention of crack down on “Occupy UGC” movement. A group of protesters was picked up by ITBP and CRPF personnel from the UGC office premises and detained, while another group faced lathicharge at ITO .
        The decision of U G C was a blow for the students who were not NET qualified .  So The students have been asking for not just the reinstatement of the fellowship of Rs 5,000 and 8,000 per month, respectively for MPhil and PhD students, but also its increase. A delegation of students met UGC officials in the evening, but were not satisfied with the response. The protesters decided to organise an indefinite gherao of the UGC office . The UGC, meanwhile, decided to refer its decision to scrap the fellowship to an expert committee after the HRD ministry stepped in. According to ministry sources, the UGC justified scrapping of the fellowship on the grounds that there was little transparency and accountability in this scholarship programme. 
        The logic behind the decision was given by the ministry as  “Last year, the UGC disbursed Rs 99.16 crore under the non-NET fellowship. This is a huge amount and it was spent without any transparency. On one hand, we expect students to qualify NET to get fellowship and on the other we have students who don’t need to take any test to get financial aid. The UGC felt this amounted to double standards and decided to discontinue the non-NET fellowship,” said a ministry source.
        The protesters were “forcibly picked up” put in buses and taken to Bhalswa Dairy police station, nearly 20 km away.
        Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) activists who had kept away from the protest stayed put outside the UGC office. They were not touched by the paramilitary or police forces.
        A B V P exposed itself in this struggle .  ABVP pesident blamed that occupy UGC movement blaming central government for this decision
        The U G C decision is not a secret . it is apparent and everyone who know about the new economic reforms can get through it easily. Modi gov systematically cutting down the budget in favour of monopoly capital with fast pace. In financial year 2014-15 the government given a rebate in tax of 6 lakh carore to the capitalist . in additon to this Modi gov. cut down more than 2 lakh crore from the budget in favour of corporate.

        The decision to discontinue the non-National Eligibility Test (NET) Fellowship for research scholar and brutal repression of the agitators and the logic to nullify all the struggles being given by the sangh family and Modi gov again indicated clearly the faasist trend of Modi gov. 

                                                                शर्मनाक ! मगर ये हमारे दौर का सच है ।
       अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाने वाले मोदी व उनकी सरकार उनके पीछे काम कर रही ताक़तें जिस मकसद से सत्ता पर आई हैं उस एजेंडे पर वह काम कर रही हैं । उस एजेंडे पर जितनी तेजी से वह आगे बढ़ जाना चाहते हैं उस पर भांति भांति के अवरोध हैं इसलिए वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं ।
                एकाधिकारी पूँजीपतियों की सेवा में नतमस्तक मोदी , मोदी सरकार  व संघ परिवार उनके अच्छे दिनों के लिए समाज का फासीवादीकरण लगातार कर रही हैं ।
                मोदी, भाजपा व संघ परिवार को देश का मतलब एकाधिकारी पूंजीपति के अलावा कुछ नहीं हैं । आज़ादी से पहले भी उनका कोई इतिहास खंगाले तो साफ हो जाएगा जिसका नतीजा आज उनके लिए यही है कि उनके पास अपना कोई नेता नहीं हैं । वह क्रांतिकारियो पर या  सुभाष , पटेल जैसे कांग्रेसी नेता को कब्जाने की कोशिश करते हैं।
                एक दौर में ब्रिटिश पूँजीपतियों व भारतीय सामंतों जमींदारों के लिए काम करने वाले आज अंबानी,अदानी टाटा जैसे इजारेदार पूँजीपतियों की सेवा में तल्लीन हैं ।
                आर्थिक सुधारों के जिस एजंडे को यह झटके से आगे बढ़ाना चाहते हैं इसमें यह मुंह की खा रहे हैं । एक तरफ खुद शासक वर्ग के बीच से दूसरी तरफ जनता के अलग अलग हिस्सों की ओर से तेज सुधारों के विरोध में आवाज उठ रही हैं ।
                दूसरी तरफ इन एक सालों में मोदी व मोदी सरकार बेनकाब भी हुई हैं । दिल्ली के चुनाव में 3- 4 सीट तक सीमटने वाली मोदी सरकार- मोदी-अमित शाह व संघ परिवार के मुंह पर यह एक करारा तमाचा था । यह अलग बात है कि यह तमाचा किसी क्रांतिकारी विकल्प की ओर से नहीं बल्कि खुद शासकों की ही अपनी पार्टी की ओर से मिला था ।
                अब बिहार चुनाव का दर चल रहा है । मोदी संघ की जुगलबंदी ने फिर से इन दिनों सांप्रदायिक एजंडे  को तेजी से आगे बढ़ाया है । यह वैसे भी उनकी जरूरत हैं और बिहार विधान सभा के चुनाव तथा फिर 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव इन दोनों के मद्देनजर यह विकास व सांप्रदायिकता की खिचड़ी उबल रही हैं । और इससे भी ज्यादा यह आज के दौर के लम्पट अंबानी अदानी जैसे कॉर्पोरेट घरनों  की जरूरत है । इससे भी आगे बढ़कर यह आज के दौर के संकटग्रस्त पूंजीवाद की जरूरत है ।
                इसी जरूरत को संघ – भाजपा कभी आगे बढ़ते हुए  तो कभी पीछे हटाते हुए पूरी कर रहे हैं ।
                ना तो संघ को  ना ही मोदी को ना ही भाजपा को गाय से विशेष मोहबब्त हैं , ना ही देश की मेहनतकश आबादी से । ना ही उन्हें देश से प्यार है यदि देश का मतलब  बहुसंख्यक मेहनतकश जनता से है।  उनके लिए सब कुछ कॉर्पोरेट घराने हैं । देश का पूंजीपति है । पूंजीवादी व्यवस्था है ।
                 लव जिहाद के बाद आजकल ये बीफ या गौमांस के जरिये यही काम कर रहे हैं । अखलाक की मौत के लिए जिम्मेदार भी यही लोग हैं । दादरी में अखलाक बाद मेनपुरी व अन्य जगहों पर भी यही घटनाएँ हो चुकी हैं ।
                देश में इस असहिष्णु सांप्रदायिक  माहौल के खिलाफ जो विरोध के स्वर फूट हैं । उनका स्वरूप जैसा भी हो लेकिन चूंकी वह सत्ता पर बैठी हुई  फासिस्ट ताकतों के खिलाफ है ।  इसलिए संघी ताक़तें इसको हर तरह से नल्लीफ़ाई करने में लगी हुई हैं ।
                यानी अब विरोध का स्वरूप क्या हो,? कितना हो ?, किस मुसद्दे पर हो ? किस समय हो व  कहाँ हो  यह भी मोदी व संघ परिवार तय करेंगे व उनकी पसंदगी वाला विरोध विरोध होगा जबकि नापसंदगी वाला विरोध विरोध नही होगा । 
               
                 
           



             धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाम् वास्तविक धर्मनिरपेक्षता


    कहा जाता है कि किसी सच को झूठ से ढंकना हो तो उस झूठ को 100 बार दोहराया जाना चाहिए। भारत की संघ-भाजपा मंडली इस काम में सिद्धहस्त है और सबसे ज्यादा सिद्धहस्त हैं इसके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। पिछले लोकसभा चुनावों में इनके बारम्बार झूठ से गुजरात के विकास माॅडल को स्थापित किया गया और गुुजरात हर किसी को विकसित नजर आने लगा। लोकसभा चुनावों के एक वर्ष बाद भी प्रधानमंत्री अपनी वाक् कला से यह झूठ फैलाने का प्रयास कर रहे हैं कि देश गत एक वर्ष में अभूतपूर्व ढंग से विकास की राह पर बढ़ चला है और पूंजीवादी मीडिया की मेहरबानी से वे इस काम में भी कुछ हद तक सफल रहे हैं। हालांकि एक बड़ी आबादी का विकास की लफ्फाजी से मोहभंग भी हो चुका है और ऐसे लोगों में कई पूंजीपति भी हैं।
           
  संघ मण्डली और उसके प्रधानमंत्री अब इसी तरह का एक नया प्रयोग अंजाम दे रहे हैं। यह प्रयोग है किसी शब्द का इतना मखौल उड़ाया जाये कि वह अपना अर्थ खो दे। संघ व उसके चहेते मोदी दोनों को भारतीय संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) घोषित किये जाने पर आपत्ति है। संघ तो देश को खुलेआम हिदू राष्ट्र बनाना ही चाहता है। ऐसे में इन शख्सियतों की इतनी हिम्मत तो है नहीं कि वे संविधान बदल दें इसलिए वे चोर दरवाजे से दूसरी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं। 
           
यह रणनीति है कि सेक्युलरिज्म का इतना मखौल उड़ाया जाय कि लोग धीरे-धीरे यह भूल जायें कि भारत का संविधान भारत को एक सेक्युलर देश बताता है। कि लोग इस बात को धीरे-धीरे मान लें कि धर्म निरपेक्ष कहलाना एक मजाक बन जाये। इसमें कोई भूल कर भी यह सवाल न उठा पाये कि देश के प्रधानमंत्री जब धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो वे खुलेआम भारतीय संविधान का भी मखौल बनाते हुए एक अपराधिक कृत्य करते हैं। इसीलिए जब मोहन भागवत देश को हिंदू राष्ट्र करार देते हैं तो कोई भी आवाज इसे एक अपराधिक वक्तव्य ठहराने की नहीं उठती। 
           
  संघ मंडली ने सेक्युलरिज्म का मखौल उड़ाने का मुख्य जिम्मा प्रधानमंत्री मोदी को ही दे रखा है। अभी मोदी को देश के भीतर तो यदा कदा ही सेक्युलरिज्म का मजाक बनाने का मौका मिला पर जब भी उन्होंने विदेशों में अनिवासी भारतीयों को सम्बोधित किया तो इसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। 
           
पिछले वर्ष टोकियों में मोदी ने जब जापानी राजा को गीता भेंट की तो साथ ही यह भी कह डाला कि हमारे सेक्युलर मित्र इस पर तूफान खड़ा कर देंगे कि मोदी खुद को क्या समझता है। वे गीता को अपने साथ लाने पर उन्हें साम्प्रदायिक करार देंगे। इसके बाद बर्लिन में यह कहा कि किसी जमाने में जर्मन रेडियो संस्कृत में एक बुलेटिन प्रसारित करता था पर भारत में इस पर सेक्युलरिज्म के ऊपर इतना तूफान मच जाता कि संस्कृत भी विवाद में फंस जाती। और अभी हाल में 23 सितम्बर 2015 को आयरलैण्ड के डबलिन में मोदी का स्वागत संस्कृत के श्लोक व गीत से किये जाने पर उन्होंने टिप्पणी की कि अगर भारत में ऐसा करने का प्रयास किया जाए तो सेक्युलरिज्म पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता।          
             इन सब वाकयों में मोदी गीता और संस्कृत को कुछ इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि ये हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं बल्कि भारतीय पहचान की चीजें हैं। क्या किसी धर्मनिरपेक्ष देश का प्रधान गीता व संस्कृत की वकालत करता नजर आना चाहिए। इसका जवाब स्पष्टतया यही होगा कि ऐसा होना ही यह दिखलाता है कि धर्मनिरपेक्षता वास्तव में स्थापित ही नहीं है। 
           
आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता को कभी वैज्ञानिक अर्थों में परिभाषित ही नहीं किया गया। किसी राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा अर्थ यह होता है कि राजकीय मसलों- राजनीति- शिक्षा आदि में धर्म का हस्तक्षेप बन्द कर दिया जाये। लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जिस धर्म को वे चाहें मानने की स्वतंत्रता हो पर राज्य या सार्वजनिक जीवन में धर्म का कोई हस्तक्षेप न हो। राज्य वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को लगातार समाज में, शिक्षा में स्थापित करें। 

    पर भारत में धर्मनिरपेक्षता की उपरोक्त व्याख्या के बजाय सर्वधर्म समभाव के रूप में व्याख्या की गयी यानि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखे। सब धर्मों के आयोजनों को वह समान रूप से प्रश्रय दे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में कांग्रेस के तिलक-गांधी नुमा नेताओं की पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्षता के वैज्ञानिक अर्थ ग्रहण करने की संभावना क्षीण ही थी क्योंकि ये नेता अक्सर हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल करते पाये जाते थे। 
             फिर भी आजादी के वक्त नेहरू के धर्मनिरपेक्ष भारत से आज तक लम्बी यात्रा तय की जा चुकी है। नेहरू ने अपने वक्त में देश के राष्ट्रपति को, मंत्रियों को गीता-कुरान दूसरों को भेंट देने से यह कहते हुए रोक दिया था कि धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति, मंत्री को धार्मिक प्रतीक भेंट नहीं करना चाहिए। नेहरू ने राष्ट्रपति को किसी मंदिर के उद्घाटन तक में राष्ट्रपति की हैसियत के बजाय व्यक्तिगत तौर पर शामिल होने की सलाह दी थी। 
             आज नेहरू सरीखे व्यवहार की उम्मीद भाजपा नेताओं से तो दूर कांग्रेसी व अन्य दलों के नेताओं से भी किये जाने की उम्मीद बेमानी है। दरअसल वोट बैंक मजबूत करने के लिए अपने को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियां कांग्रेस-जनता दल आदि क्रमशः नरम हिंदुत्व की ओर झुकती चली गयी हैं। धर्मनिरपेक्षता की सर्वधर्म समभाव की व्याख्या ने इसमें मदद की है। यहां तक कि संशोधनवादी कम्युनिस्ट भी इस दौर में ‘नास्तिकता’ से डगमगाने लगे हैं। इसीलिए राजीव गांधी राम मंदिर के ताले खुलवाते हैं तो सोनिया बुखारी से वोट मांगने जाती हैं और कांग्रेस सेक्युलर होने का ढोल पीटती रहती है।            
             तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के व्यवहार ने भी सेक्युलरिज्म का मखौल बनाने की मोदी की कोशिश में भरपूर मदद की है। ये पार्टियां खुद धर्म के आधार पर वोट जुटाने की तिकड़में करती हैं। हिन्दू वोट बैंक खिसक न जाये इस हेतु संघ के जहरीले वक्तव्यों के विरोध से डरती हैं और खुद को सेक्युलर करार देती हैं। संसदीय वामपंथी भी धर्मनिरपेक्ष ताकतों के तौर पर इनके साथ मोर्चा बना मोदी के धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाने का काम आसान कर देते हैं। 
             प्रधानमंत्री मोदी अभी भले ही विदेशों में सेक्युलरिज्म का मजाक बना रहे हों पर शीघ्र ही वे देश के भीतर भी यह हरकत बारम्बार करेंगे। वे सेक्युलर होने को एक गाली के बतौर स्थापित कर संघ की हिन्दू पहचान को मजबूती से स्थापित करना चाहते हैं। देश का शासक पूंजीपति वर्ग भी मोदी की इस कवायद में उसके साथ इस उम्मीद में खड़े हैं कि मोदी उनकी मुनाफे की राह सुगम बनायेंगे। इसीलिए मोदी एक ओर धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाते हैं तो दूसरी ओर संघी संगठनों के लोग धर्मनिरपेक्ष-तार्किक चिन्तकों की हत्यायें कर रहे होते हैं और शासक पूंजीपति वर्ग मौन धारण कर मोदी प्रशंसा में जुटा रहता है। 
           
संघ व एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ के इस चरण में इससे भिन्न व्यवहार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। यह बात ही इस ओर संकेत करती है कि आज पूंजीवादी दायरे में धर्मनिरपेक्षता-तार्किकता को स्थापित करने की हर कवायद निष्फल होनी तय है क्योंकि यह नेहरू का नहीं मोदी का जमाना है। पूंजीपति वर्ग का हाथ अब नेहरू के सिर पर नहीं मोदी के सिर पर है। धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अर्थों (सार्वजनिक जीवन, राजकीय मसलों से अलग धर्म को व्यक्तिगत मसला घोषित करना) में स्थापित करने वाले सभी बुद्धिजीवियों-चिन्तकों को इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में चल रहे समाजवाद के लिए संघर्ष का हमराह बनना होगा। समाजवाद में ही धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण होगा तब तक मोदी के सेक्युलरिज्म विरोध के साथ अन्य पूंजीवादी दलों के छदम सेक्युलरिज्म का पर्दाफाश करना होगा।  


                        अमरीकी साम्राज्यवाद की एक ध्रुवीय दुनिया के लिए चुनौती


    30 सितम्बर से जारी रूसी हवाई हमलों से सीरिया में ही नहीं समूचे पश्चिम एशिया, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनीतिक हलकों में समीकरण बदलने के आसार मिलने लगे हैं और शासक वर्गों के भीतर उथल-पुथल मची हुयी है। सीरिया की हुकूमत के साथ मिलकर और उसके बुलावे पर रूसी बमवर्षक विमानों ने आई.एस.आई.एस., अल-नुसरा और अन्य आतंकवादी ग्रुपों के ठिकानों को हमलों का निशाना बनाया है। कैस्पियन सागर से आतंकवादी ठिकानों पर रूसी मिसाइलें दागी गयी हैं। सी.आई.ए. और साऊदी अरब से सहायता पाने वाले आतंकवादी समूह तुर्की से लगातार सीरिया में आते रहे हैं। अभी तक मिल रही सूचनाओं के आधार पर आईएसआईएस और अन्य आतंकवादी समूहों के ठिकानों को अधिकांशतः ध्वस्त कर दिया गया है। सीरिया की सरकारी सेना के हौंसले बुलंद हो गये हैं और वह आतंकवादी अधिकृत क्षेत्रों में जमीनी हमले तेज कर चुकी है और उसको हवाई सुरक्षा रूसी बमवर्षक विमान मुहैय्या करा रहे हैं। आतंकवादी संगठनों के अपने को बचाने के लिए मस्जिदों और नागरिक आबादी के बीच शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 

    
इस घटनाक्रम से अमरीकी साम्राज्यवादी बौखला गये हैं। वे रूसी हुकूमत के विरुद्ध जहर उगलने की मुहिम और तेज कर चुके हैं लेकिन इससे रूसी हमलों में कोई कमी नहीं आ रही है। अमरीकी साम्राज्यवादियों की बशर अल असद को सत्ता से हटाने की मुहिम कमजोर हो गयी है। अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादी तथा अरब देशों में मौजूद शेखशाहियां, विशेष तौर पर साऊदी अरब के शासक सुन्नी आतंकवादियों को हथियार, पैसा और प्रशिक्षण मुहैय्या कराके बशर अल असद की हुकूमत को हटाने के लिए उसके विरुद्ध आतंकवादी वारदातों को अंजाम दे रहे थे। उत्तर में तुर्की को प्रशिक्षण शिविर के बतौर इस्तेमाल किया जा रहा था। तुर्की से आतंकवादी सीआईए से प्रशिक्षण लेकर सीरिया के अलेप्पो प्रांत में अधिकार जमा चुके थे। यह सब अमरीकी साम्राज्यवादी आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर कर रहे थे। यह अब जानी हुई बात है कि अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ही आईएसआईएस, अल नुसरा और फ्री सीरियन आर्मीजैसे आतंकवादी संगठनों को खड़ा करने में मदद की थी और इस काम में उनके घनिष्ठ सहयोगी साऊदी अरब के बहावी शासक थे। 

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सितम्बर के बाद सीरिया में स्थिति बदल गयी है। अमरीकी शासकों के सामने यह चुनौती  खड़ी हो गयी है कि आतंकवादी गुटों को सचमुच में खतम करने वाले रूसी हवाई हमलों को किस तरह से गलत सिद्ध किया जाए। अमरीकी साम्राज्यवादी अब यह कह रहे हैं कि रूसी हवाई हमले बशर अल असद की हुकूमत के विरुद्ध लड़ने वाले उदारवादी विरोधियों के विरुद्ध केन्द्रित हो रहे हैं। रूसी साम्राज्यवादी यह साफ तौर पर कह रहे हैं कि बशर अल-असद की हुकूमत के निमंत्रण पर वे सीरिया में आतंकवादियों का सफाया करने के मकसद से हवाई हमले कर रहे हैं। सीरिया में उनके द्वारा किया गया हवाई हमला कानूनी और न्यायसंगत है जब कि अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा आतंकवादी समूहों को दी जाने वाली मदद और प्रशिक्षण गैरकानूनी और अन्यायपूर्ण है। यह अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा अपनी नापसंद हुकूमतों को दुष्ट हुकूमतें कहने और उनके हुकूमत परिवर्तनके अभियान का हिस्सा है। यह सिर्फ इसलिए चलाया जा रहा है कि अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र के तेल भंडारों और अन्य साधन स्रोतों पर कब्जा कर सकें। रूसी साम्राज्यवादी सीरिया में बशर अल असद की सरकार को कायम रखना चाहते हैं और अमरीकी साम्राज्यवादी उस हुकूमत को हटाकर अपनी मनपसंद सरकार कायम करना चाहते हैं। यह ज्ञात हो कि पश्चिम एशिया में सीरिया एकमात्र देश है जिसके साथ रूसियों के घनिष्ठ सम्बन्ध सोवियत संघ के जमाने से निरंतर रहे हैं। 

    
रूसी साम्राज्यवादी तुर्की की हुकूमत के साथ निरंतर सम्पर्क में हैं। वे तुर्की के शासकों को यह साफ-साफ संदेश दे रहे हैं कि सीरिया में उसका हस्तक्षेप बंद होना चाहिए। तुर्की नाटो का सदस्य देश है। अमरीकी साम्राज्यवादी तुर्की को इस बात के लिए उकसा रहे हैं कि वह रूस द्वारा उसके हवाई क्षेत्र का अतिक्रमण करने और तुर्की के क्षेत्र में बमबारी करने का विरोध करे और रूस के विरुद्ध लड़ाई में उतर जाए। इससे नाटो के देशों को रूस के विरुद्ध चौतरफा युद्ध छेड़ने में मदद मिलेगी क्योंकि नाटो संगठन के प्रावधान के अनुसार यदि नाटो के किसी देश पर कोई हमला करता है तो नाटो के सदस्य देश इसे अपने ऊपर हमला मानकर उसके विरुद्ध साझी कार्रवाई करेंगे। 

    
लेकिन तुर्की इसके परिणामों से परिचित है। तुर्की के शासकों को रूसी साम्राज्यवादी लगातार यह बता रहे हैं कि उनका तुर्की से लड़ने का कोई इरादा नहीं है। यदि तुर्की के क्षेत्र में कोई बम गिरा है तो यह आकस्मिक है। यह रूसी सेना का इरादा नहीं है। लेकिन तुर्की के शासक अपनी अभी तक की चली आ रही सीरिया विरोधी नीति को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं। वे रूसी साम्राज्यवादियोें के विरुद्ध दूर तक जाने के लिए भी तैयार नहीं हैं। रूसी साम्राज्यवादियों ने उन्हें बता दिया है और चेतावनी भी दे दी है कि कुर्द लोगों के दमन के विरुद्ध लड़ाई तेज होने पर तुर्की के शासक कमजोर स्थिति में जा सकते हैं और स्वतंत्र कुर्द राज्य बन सकता है। रूसी हवाई हमलोें के दस दिन बाद तुर्की में एक बम विस्फोट उस समय हुआ जब एक कुर्द पार्टी की रैली हो रही थी। इस बम विस्फोट में 50 से ज्यादा लोग मारे गये और भारी तादाद में लोग घायल हुए। यह आतंकवादी कार्रवाई निश्चित तौर पर तुर्की हुकूमत की छत्र छाया में पलने वाले आतंकवादी संगठनों में से किसी ने की होगी। तुर्की जो अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों, साऊदी अरब और अन्य शेखशाहियों से मिलीभगत करके सीरिया की हुकूमत के विरुद्ध आतंकवादियों की मदद कर रहा था अब उसकी गति सांप-छछूंदर की हो गयी है। अभी तक वह अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर सीरिया की हुकूमत के लिए नो फ्लाई जोनबनाना चाहता था, अब उसमें पानी फिर गया है। अब खुद अमरीकी साम्राज्यवादियों और तुर्की जैसे उसके सहयोगियों के लिए नो-फ्लाई जोनसीरिया में बनने के आसार बन रहे हैं। 

    
इस समूचे घटनाक्रम के दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों के भीतर खुद अंतरविरोध तीव्र हो गये हैं। बराक ओबामा की हुकूमत परिवर्तनकी अभी तक चलने वाली नीति पर हमले हो रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियोें का एक धड़ा यह मांग करने लगा है कि आतंकवाद के खात्मे के लिए अमरीका को रूस के साथ सहयोग करना चाहिए क्योेंकि रूसी हवाई हमला आतंकवाद के विरुद्ध ही केन्द्रित है। एक दूसरा मजबूत धड़ा है जो रूसी साम्राज्यवादियों के विरुद्ध युद्ध करने का नारा दे रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने नाटो के जरिए रूस को चारों तरफ से घेर रखा है। यूक्रेन में फासिस्ट हुकूमत के जरिए रूस को लगातार लड़ाई में डालने की कोशिश की है। यूरोपीय संघ के साथ मिलकर यूक्रेन के मसले पर रूस के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। इस सबके बावजूद रूस ने सीरिया में हवाई हमला करके दुनिया भर के शासकों में अपनी साख को बढ़ाया है और अमरीकी साम्राज्यवादियों की दादागिरी पर लगाम लगाने में पहल की है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादियों के बीच आपसी टकराहट और तेज हुयी है। फिलहाल ऐसा लगता है कि ओबामा को तात्कालिक तौर पर पीछे हटना पड़ेगा और बशर अल असद की हुकूमत के साथ किसी न किसी किस्म की समझौता वार्ता में अपने समर्थकों को बिठाना होगा। लेकिन दीर्घकालिक तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादियों की नीति वही हुकूमत परिवर्तन की बनी रहेगी। 

    
पश्चिम एशिया में इस हवाई हमले ने एक नये गठबंधन को और मजबूती प्रदान की है। ईरान की हुकूमत पहले से ही सीरिया की हुकूमत का साथ दे रही थी लेकिन इस रूसी हवाई हमले ने ईरान की हुकूमत की अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सौदेबाजी करने की ताकत को और बढ़ा दिया है। जैसा कि दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों का चरित्र है कि वे हर मौके का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसी के अनुरूप ईरान के शासक भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। ईरान के शासकों को अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों की बंदरघुडकी और दबावों को ज्यादा झेलना पड़ रहा था, इस घटनाक्रम में उनकी स्थिति मजबूत हुई है और वे रूसी साम्राज्यवादियों के पक्ष में फिलहाल ज्यादा मजबूती से खड़े हो गये हैं। 

    
इराक में लम्बी तबाही के बाद जो अमरीका परस्त हुकूमत वहां मौजूद है, उसमें भी दरारें पड़ रही हैं। खुद इराक के भीतर अमरीकी साम्राज्यवाद की मौजूदगी उनके अंदर एक तरह की बैचेनी और असंतोष का कारण बन रही है। यह इस बात का सुबूत है कि आज की दुनिया में किसी देश को लम्बे समय तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता। इराक के शासक हलकों में सीरिया में हो रहे रूसी हवाई हमलों के समर्थन में लोग मौजूद हैं। बातें यहां तक हो रही हैं कि इराक, ईरान, सीरिया और रूस का इस इलाके में एक नया गठबंधन तैयार हो रहा है। इस गठबंधन में लेबनान के हिजबुल्ला छापामार भी शामिल होंगे। इस तरह, इस क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवादियों के एक छत्र प्रभुत्व पर गहरा आघात लगा है। 

    
अफगानिस्तान, इराक और लीबिया में अमरीकी साम्राज्यवादियों की हुकूमत परिवर्तन की नीति का खामियाजा अभी तक वहां की अवाम भुगत रही है। लाखों लोगों की हत्याओं और इससे भारी तादाद में लोगों के घायल होने, घरों और सम्पत्ति की तबाही तथा शरणार्थियों की भारी तादाद खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। 2011 से सीरिया में जो आतंकवादी गतिविधियों का सिलसिला जारी रखा है उसने लाखों-लाख लोगों को शरणार्थी बना दिया है। ये शरणार्थी यूरोप के देशों में दर-दर भटक रहे हैं। यूरोप के देश उन्हें कोई ठिकाना नहीं दे रहे हैं। बच्चे और औरतें-बूढ़े कहीं समुद्र में मर रहे हैं तो कहीं बिना दवा के, बिना भोजन के और बिना ठिकाने के मरने को अभिशप्त हैं। इन लाखों-लाख लोगों की हत्याओं के लिए मुख्यतः अमरीकी साम्राज्यवादी जिम्मेदार हैं। इन देशों में हुई और होती जा रही तबाही और बर्बादी ने इन देशोें के शासक हलकों के भीतर भी अमरीकी साम्राज्यवाद की एक ध्रुवीय दुनिया के विरुद्ध अपनी आवाज शामिल करने की भावना को बढ़ाया है और सीरिया में रूसी हवाई हमले के समर्थन में कमोवेश खड़ा किया है, कम से कम इन सभी देशों के शासकों के बीच दरार को बढ़ाने में मदद की है। 

    
अगर पश्चिम एशिया में मजबूती से अमरीकी साम्राज्यवाद के पक्ष में कुछ हुकूमतें खड़ी हैं तो वे इजरायल के अलावा साऊदी अरब, संयुक्त राज्य अमीरात इत्यादि की शेखशाहियां हैं। साऊदी अरब खुद यमन में लगातार हूती विद्रोहियों के दमन में लगा हुआ है और भारी दमन के बावजूद वह उन्हें दबा नहीं पा रहा है। खुद इन शेखशाहियों के विरुद्ध इन देशों में आवाजें उठ रही हैं। ये खुद कुछ सुधार करने की ओर जाने की और अपने-अपने देशों के भीतर विवश होंगे। इस रूसी हवाई हमले के बाद इजरायल के विरुद्ध फिलिस्तीनी अवाम के संघर्ष को और ज्यादा बल मिलेगा। 

    
रूसी साम्राज्यवादी इस विश्व परिस्थिति को देखकर ही सीरिया में यह हवाई हमला करने की ओर गये हैं। सोवियत संघ के विघटन के लगभग 25 वर्षों बाद रूसी साम्राज्यवादियों ने यह कदम उठाया है। इसने पश्चिम एशिया के समीकरणों को बदलने में भूमिका निभायी है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादियों की एक ध्रुवीय दुनिया बनाने के प्रयासों को धक्का लगा है। रूसी साम्राज्यवादियों ने नैतिक तौर पर अपने को ऊंचा खड़ा कर दिया है। 

    
आखिर अमरीकी साम्राज्यवादी इस हमले के बाद सीरिया में क्यों रक्षात्मक स्थिति में जाने को मजबूर हुए हैं? इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण तो खुद अमरीकी साम्राज्यवादियों की कमजोर होती जा रही स्थिति है। आज आर्थिक तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादी उतने मजबूत नहीं हैं जितना कि दो दशक या एक दशक पहले तक थे। हालांकि उनकी सैन्य ताकत के आस-पास कोई भी देश नहीं है। दूसरे, रूसी साम्राज्यवादी फिर से आर्थिक तौर पर एक शक्ति के तौर पर उभर कर खड़े हो गये हैं। तीसरे, रूसी साम्राज्यवादियों ने अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए और अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा खड़ी की गयी विश्व संस्थाओं के समानान्तर अपने क्षेत्रीय संगठन खड़े किये हैं। ब्रिक्स द्वारा खड़ा किया गया बैंक तथा शंघाई सहकार संगठन जैसे संगठन इसमें अमरीकी वर्चस्व के विरुद्ध कारगर भूमिका निभाते हैं। चौथे, आज की दुनिया ऐसे मुकाम पर पहुंच गयी है जहां पर किसी देश में कठपुतली शासक बनाना लम्बे समय तक सम्भव नहीं है। अन्य कारकों के अलावा ये महत्वपूर्ण कारक हैं जो अमरीकी साम्राज्यवादियों को सीरिया में पीछे हटने के लिए मजबूर कर रहे हैं। 

    
लेकिन जैसा कि कहावत है कि सभी आतताइयों और अन्यायियों की तरह साम्राज्यवादी मूर्ख होते हैं। वे खुद ही भारी पत्थर उठाकर अपने ही पैरों में गिरा देते हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी भी इसका अपवाद नहीं हैं। 

    
अपनी एक ध्रुवीय दुनिया के सपने को साकार करने और विश्व प्रभुत्व की आकांक्षा में वे ऐसी मूर्खताएं करने को अभिशप्त हैं। 


                                     छठे सम्मलेन में पारित राजनीतिक प्रस्ताव
                                     राजनीतिक प्रस्ताव  -1 :   शहीदों को श्रद्धांजली  
            पिछले लगभग सवा तीन सालों में समाजवाद की स्थापना का सपना संजोए हुए पूंजीवाद साम्राज्यवाद से लड़ते हुए दुनिया भर के ढेरों लोग शहीद हुए । क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन इन इंकलाबी शहीदों को अपनी भावभीनी श्रद्धांजली देता है और उनके सपनों को पूरा करने संकल्प लेता है ।
            इसके अलावा इसी दौरान तमाम लोगों ने जनवाद के रक्षा के लिए लड़ते हुए कुर्बानी दी है भारत में आदिवासियों , किसानों ने जबरन बेदखली के खिलाफ संघर्ष में अपनी जानें गवाई है । धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ प्रचार कर वैज्ञानिक मूल्यों की स्थापना को लेकर सक्रिय लोगों की फासीवादी गुंडों द्वारा हत्याएं की गईं तो कई सूचना अधिकार कार्यकर्त्ताओं भी मौत के घाट उतार दिये गए । ट्रेड यूनियन संघर्षों में तमाम लोग मारे गए हैं इन सभी लोगों को यह सम्मेलन श्रद्धांजली देता है ।
            इन संघर्षों के इतर पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था द्वारा अनगिनत लोगों को ठंडी मौत देने का सिलसिला जारी है । भुखमरी , कुपोषण , बेकारी , से लेकर व्यवस्थाजन्य आपदाओं में लोगों का मारा जाना जारी है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन इन सभी मौतों के लिये पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था का दोषी मानता है संघटन पूंजीवाद साम्राज्यवाद से लड़ते हुए जनवाद की रक्षा व विस्तार के लिए लड़ते हुए शहादत देने वाले शहीदों के सपनों को साकार करने का संकल्प लेता है और इनकी याद में अपने झंडे को झुकाता है ।
                       
                                    राजनीतिक प्रस्ताव 2 :  फासीवाद के बढ़ते खतरे के विरुद्ध
            एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के घृणित गठजोड़ के परिणामस्वरूप देश की केंद्रीय सत्ता पर भा ज पा के सत्तासीन होने से संघ के नेतृत्व वाला हिन्दू फासीवादी आंदोलन अपने इतिहास की सबसे ताकतवर स्थिति में पहुँच गया है ।
            यह केंद्रीय संस्थाओं आई सी एच आर , आए सी सी आर  के बाद अब  एन  सी ई  आर टी  और एन बी टी के भगवाकरण की दिशा में बढ़ रहा है । संघी फासिस्टों ने भारतीय फिल्म और टेलीविजन व प्रशिक्षण संस्थान पुणे में चेयरमेन के पद पर भा ज पा कार्यकर्त्ता गजेंद्र चौहान की नियुक्ति कर दी है ।
            वर्तमान मोदी सरकार ने जहां धर्मांतरण , लव जिहाद जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया तथा सरस्वती पूजा, गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ  घोषित करवाने गौमांस खाने पर प्रतिबंध आदि मुद्दों पर बहस को हवा देकर अपने साम्प्रादायिक फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाया है । वहीं दूसरी ओर नागरिकों के व्यक्तिगत मामलो मसलन खान पान , रहन सहन , विश्वास मूल्यों मान्यताओं के जनवादी अधिकारपर भी हमला बोला है ।
            भारतीय शासक वर्ग ने जनवादी संस्थाओं के फासीवादीकरण की मुहिम तेज कर दी है । नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संस्थाओं का केन्द्रीकरण बढ़ा है । योजना आयोग को समाप्त किया जा चुका है । देश के महत्वपूर्ण फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय ( पी एम ओ ) ले रहा है । चुने हुए मंत्रियों के स्थान पर नौकरशाहों से महत्वपूर्ण कारी लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है । नौकरशाही के अधिकारों में वृद्धि कर जनवादी संस्थाओं व पदों पर नौकरशाहों को बिठाने का रुझान लगातार बढ़ रहा है ।
            संघ के नेता खुले आम भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर रहे हैं तथा शिव सेना ने तो मुसलमानो से मताधिकार छीनने तक की मांग उठाई है । संघ एक राष्ट्र – एक भाषा-एक संस्कृति को थोपने का प्रयास करता हुआ हमारे समाज का एक खतरनाक फासीवादी संगठन है । जो भाजपा के सत्ता में आने का लाभ उठाते हुए देश में हिन्दू फासीवादी राज्य की स्थापना करना चाहता है ।
            देश में जनवाद प्रगतिशील संस्कृति , वैज्ञानिक मूल्यों आदि के लिए काम करने वाली संस्थाओं तथा व्यक्तियों पर हमले बढ़े हैं । महाराष्ट्र के नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे व कर्नाटक के प्रोफेसर कलबुर्गी तथा आर टी आई कार्यकर्त्ताओं , मानव अधिकार कार्यकर्त्ताओं व सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की हत्याएं  व उन्हे धमकियां इसी का उदाहरण हैं ।
            ऐसे में फासीवाद के इस खतरे को चुनौती देना तथा पराजित किया जाना आवश्यक है । फासीवादी आंदोलन के हर तरह के झूठे हथकंडों को जनता के बीच बेनकाब करना उसका प्रतिरोध करना हमारी महती ज़िम्मेदारी बनती है ।
            यह सम्मेलन साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ संघर्ष करने तथा इसके खतरों को आम नागरिकों के बीच उजागर करने का संकल्प लेता है । 
                                   


                                    राजनीतिक प्रस्ताव  -3 : श्रम क़ानूनों में बदलाव के विरोध में
            देश में आज़ादी के संघर्ष के दौरान व उसके बाद मजदूर मेहनतकश जनता  के संघर्षों के कारण सरकारों को कई ऐसे श्रम कानून बनाने पड़े जो संगठित क्षेत्र के मजदूरों को कुछ राहतें व सहूलियतें प्रदान करते थे । असंगठित क्षेत्र में यह श्रम कानून व्यवहार कहीं भी लागू नहीं होते।
            यद्यपि इन श्रम क़ानूनों को पूंजीपति वर्ग व सरकारें आधे-अधूरे तरीके से व अक्सर मजदूरों के संघर्ष के कारण ही पालन करने को मजबूर होती रही हैं । इसी कारण पूंजीपति वर्ग लंबे समय से श्रम कानूनों में संशोधन की बात करता रहा है उसकी इच्छा रही है कि उसे मजदूरों के निर्बाध शोषण का अधिकार मिल जाये ।
            स्थापित ट्रेड यूनियनों द्वारा जुझारू ट्रेड यूनियन संघर्ष से किनाराकशी करने के कारण 80 के दशक से ही पूंजीपति वर्ग को हमलावर होने का मौका मिल गया । बाद में उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर में  श्रम कानून में बदलाव की उसकी मांग मुखर होटी गई । उसकी इस मांग की ही सूत्रीत अभिव्यक्ति द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट के रूप में जारी हुई थी । तत्कालीन सरकारें इस दिशा में धीरे धीरे कदम बढ़ाकर पूंजीपति वर्ग को संतुष्ट करती रही ।
            2007-08 से दुनिया बाहर में जारी विश्व आर्थिक संकट ने भारत के पूंजीपति वर्ग को भी संकट की ओर धकेला ऐसे में इस संकट की भरपाई के लिए पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारें मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनता पर और ज्यादा हमलावर हो गई । इसी दौरान पूँजीपतियों की तमाम कोशिशों व कांग्रेस पार्टी के खिलाफ जनाक्रोश के कारण भा ज पा सत्ता में आई । इस सरकार ने न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 , कारख़ाना अधिनियम 1961 , औद्योगिक विवाद अधिनियम 1949 , ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 , बाल श्रम अधिनियम तथा कुछ अद्योगों को रिटर्न भरने रजिस्टर रखने से छूट संबंधी अधिनियम 1988 में मजदूर विरोधी संशोधन  प्रस्तावित करके मजदूरों पर हमला तेज कर दिया है ।
            सरकार ने इन सशोधनों को संसद से पास कराने की पुरजोर कोशिश की है और लोक सभा में अपने बहुमत का इस्तेमाल करके कुछेक को पास भी करा चुकी है । भाजपा की राजस्थान व महाराष्ट्र सरकारें तो इस मामले में केंद्र की सरकार से भी दो कदम आगे निकल गई हैं ।
            ये संशोधन जहां एक ओर मजदूर वर्ग की श्रम दशाओं को और बदहाली की ओर धकेलने की कोशिशें हैं वहीं दूसरी ओर मजदूर वर्ग के संगठित प्रतिरोध को कमजोर करने का भी इंतजाम करते हैं। ये संशोधन मजदूर वर्ग के संगठित होने के आधिकार को कमजोर करते हैं ।
            भारत के मजदूर वर्ग पर तेज होता हमला उदारीकरण वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में और विशेषकर विश्व आर्थिक संकट के काल में पूरी दुनिया भर में पूंजीपति वर्ग द्वारा श्रम पर बोले जा हमले का ही एक हिस्सा है । वैश्विक पैमाने पर आज जैसे जैसे पूंजी द्वारा श्रम पर एक के बाद एक हमले बोले जा रहे हैं वैसे वैसे ही मजदूर वर्ग भी इसके विरोध में एक के बाद एक जुझारू संघर्ष कर रहा है । हमारे देश में भी पूंजी के हमले के विरुद्ध मजदूरों के संघर्षों में तेजी आई हैं ।
            क्रालोस का यह सम्मेलन सब कुछ पैदा करने वाले अपनी मेहनत से पूरी दुनिया चलाने वाले मजदूर मेहनतकशों को उनके संघर्ष व कुर्बानियों द्वारा मिले श्रम कानूनों में पूंजी के हितों के अनुरूप हो रहे बदलावों – प्रस्तावों का विरोध करता है । क्रालोस श्रम कानूनों में हो रहे बदलाव के खिलाफ  मजदूरों के संघर्षों में भागीदारी को कृतसंकल्प है तथा इन संघर्षों के किसी भी तरह के दमन का प्रबल विरोधी है ।      
                                          राजनीतिक प्रस्ताव 4  : सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण का विरोध करो !
            पिछले साल 16 मई के बाद केंद्र की सत्ता में पहुँचते ही मोदी सरकार के नेतृत्व में सत्ता का बढ़ता केन्द्रीकरण अब स्पष्ट दिखाई देने लगा है । मोदी व मोदी सरकार की पूरी कार्यशैली इंदिरा गांधी के आपात काल के दौर की यादों को ताजा करने लगी है ।
            सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण का न केवल जनपक्षधर संगठनों ने विरोध किया है बल्कि शासक वर्गीय अन्य पार्टियों व खुद भा ज पा के जबरन मार्गदर्शक बनाए गए नेता ने भी इस ओर इशारा किया है । स्थितियां यहां तक पहुंची हैं कि खुद प्रधानमंत्री मोदी को इस संबंध में सफाई देनी पड़ी है ।
            पूंजीवादी लोकतन्त्र के संबंध में हकीकत यही है कि यह पूंजीपति वर्ग द्वारा आम मेहनतकश नागरिकों का शांतिपूर्ण शोषण उत्पीड़न की व्यवस्था है कि यह पूंजीपति वर्ग की अवाम पर तानाशाही का ऐसा रूप है जिसमें मेहनतकश आवाम को सीमित अधिकार होते हैं जबकि इसके बरक्स शासकों को सारे विशेषाधिकार होते हैं ।
            स्पष्ट है कि सत्ता की सारी शक्ति शासक पूंजीपति वर्ग के हाथ में ही केन्द्रित होती है । न्यायपालिका, विधायिका व कार्यपालिका इस पूंजीवादी व्यवस्था के ही अंग हैं । इसमें जनता का हस्तक्षेप केवल विधायिका तक है वह भी बहुत सीमित रूप में । शासक पूंजीपति वर्ग अपनी पार्टियों को जनता के मतों के जरिये सत्ता में पहुंचाता है ।
            साल 2014 में कारपोरेट घरानों ने मोदी को सत्ता पर अभूतपूर्व ढंग से बिठाने से अब यह बात बहुत बहुत ज्यादा स्पष्ट हो चुकी है । कारपोरेट घारानों ने मोदी को सत्ता पर जिस मकसद से बिठाया था उसकी पूर्ती के लिए जरूरी था कि सत्ता की सारी ताकत /शक्ति अत्यधिक केन्द्रित हो जाये ताकि नए आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने में आ रहे तमाम भांति भांति के अवरोधों से निपटने में आसानी हो ।
            कारपोरेट घरानों व संघ के अभूतपूर्व गठजोढ़ से सत्ता पर काबिज मोदी सत्ता के केन्द्रीकरण की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं । इस बात के संकेत तभी यानी 16 मई को ही मिल गए थे जब संसद में माथा टेकते ही उन्होने अध्यादेश जारी कर नृपेन्द्र मिश्रा को अपना सचिव बना लिया । तब से अब तक अध्यादेश  दर अध्यादेश जारी कर यह सरकार अध्यादेश सरकार बन गई है ।
            प्रधानमंत्री मोदी के इस एक वर्ष के कार्यकाल में सर्वोच्च नीति निर्धारक निकाय व्यवहार में मंत्रीमंडल न रहकर प्रधामन्त्री कार्यालय हो गया है । मंत्रीमंडल की ताकत नाममात्र की रह गई है । मंत्रियों, राज्यमंत्रियों की हैसियत इस हद तक कमजोर कर दी गई है कि उनको निजी सचिव रखने तक की आज़ादी प्रधानमंत्री मोदी के चरणों में लोट पोट हो रही है । यह केवल मुखौटा भर हैं ।
            अब मंत्रीमंडल की बजाय फैसले लेने व नीतियों को तय करने का सारा काम व्यवहार में मोदी व 6 (नौकरशाह ) सचिव से बना पी एम ओ कर रहा है । मंत्रियों के सशक्त समूह ( ई जी ओ एम ) तो पहले ही तत्काल भंग कर दिये गए थे ।
            सत्ता के बढ़ते केन्द्रीकरण का ही यह नतीजा है कि मोदी की फासिस्ट कार्यशैली के जब न्यायपालिका से अंतरविरोध बनने लगे तो मोदी सरकार ने न्यायपालिका के अधिकारों को कमजोर करने में कतई देर नहीं की । जबकि रिजर्व बैंक के साथ बनते अंतर्विरोध से निपटने के लिए नया बिल लाने की कोशिश हुई ताकि गवर्नर के वीटो पावर को कमजोर या खत्म  किया जा सके ।     
             सत्ता के इस बढ़ते केन्द्रीकरण ने न केवल 1975 बल्कि हिटलर व मुसोलिनी के दौर की यादों  को भी फिर से जिंदा कर दिया है । सत्ता में बैठी वर्तमान ताक़तें अपने चरित्र में फासीवादी हैं । इसीलिए हिटलर व मुसोलिनी की तर्ज पर काम कर रहे  मोदी व मोदी सरकार के होते फासीवाद का गंभीर खतरा हमारे सामने है । हिटलर व मुसोलिनी ने सत्ता पर पहुँचने के कुछ साल गुजरते गुजरते फासीवाद कायम कर लिया था ।
            मोदी सरकार के नेतृत्व में सत्ता का बढ़ते केन्द्रीकरण की दिशा भी यही है । सम्मेलन सत्ता के इस बढ़ते केन्द्रीकरण के विरोध में आवाज उठाने का संकल्प लेता है ।  

        राजनीतिक प्रस्ताव 5 : -- अफ्रीकी पश्चिमी एशियाई देशों में साम्राज्यवादी दुश्चक्र के विरोध में        
            पश्चिमी एशियाई और अफ्रीकी देश इराक सीरिया लीबिया सूडान व अफगानिस्तान साम्राज्यवादियों द्वारा थोपे गये युद्धों से पैदा हुई तबाही बर्बादी के कारण भयावह मानवीय त्रासदी झेल रहे हैं । लाखों लोग युद्ध में जान गंवा चुके हैं । युद्ध में फंसे लोगों का जीवन दूभर है । युद्ध की तबाही ने आबादी के भारी हिस्सों को उनकी जमीन से उखड़ने को मजबूर किया है । अपने निवास से उजड़े लाखों लाख स्त्री पुरुष व बच्चों का सैलाब सुरक्षित जगहों की तलाश में दूसरे देशों में शरण पाने के लिए पलायन के लिए मजबूर है ।
            लोग शरण पाने के लिए असुरक्षित समुद्री मार्गों दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं । मार्ग में मानवतस्करों के जाल में फंस रहे हैं ।  
            दूसरे देशों के सरकारों के अपमानजनक सीमा पाबंदी की मार झेल रहे हैं । जानकारों का दावा है की यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी पलायन की परिघटना है ।
            साम्राज्यवादी शक्तियां अमेकी नेतृत्व में अपने वर्चस्व को थोपने अपने लूट व शोषण को स्थापित करने के लिए दूसरे देशों में दखलअंदाजी करते रहे हैं । शीट युद्ध से लेकर रंगीन क्रांतियों का षड्यंत्र रखने में हमेशा सक्रिय रहे हैं । सरकारों का तख़्ता पलट करना, विद्रोहों को भड़काना, प्रतिक्रियावादी , रूढ़िवादी ताकतों फासिस्ट गिरोहों को पाल पोस कर हस्तक्षेप के बहाने बनाने में ये सक्रिय रहते हैं ।
            बुरे राष्ट्रों के बहाने , जनवाद स्थापित करने के पाखंड , आतंकवाद का फरेबी हो हल्ला गढ़ कर इंहोने दुनिया भर में जहां तहां स्वार्थों की पूर्ति के लिए हस्तक्षेप किए । अफगानिस्तान इराक इनके खुले आक्रमण व कब्जाकारी विध्वंशक कारगुजारियों के शिकार रहे हैं । जहां जनता ने दशकों से विनाशकारी तबाही को झेला है ।
            वर्ष 2011 में अरब व पश्चिमी एशियाई देशों में उठे जन विद्रोहों को अपने हितों के अनुरूप मोड़ने के लिए साम्राज्यवादियों ने साता परिवर्तन का खेल खेला । इनके इस दुश्चक में अपने प्रतिगामी हितों की रक्षा के लिए इजरायल, सऊदी अरब व अन्य शेखों के राज्य भी शामिल रहे । लीबिया में गद्दाफ़ी की हत्या करने के बाद उन्होने सीरिया को भी तख़्ता पलट दुश्चक्र का निशाना बनाया । विद्रोहों की सीरियन आर्मी को सामरिक साजो समान से लैस कर युद्ध आरंभ किया गया । सीरिया को चौतरफा युद्ध से घेर दिया गया । इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन को सीरिया के खिलाफ खड़ा किया । तुर्की, सऊदी अरब ने आतंकी संगठन अहरार-अह-शाम व जैस-अल-इस्लाम तथा जमात-अल-नूसरा को आगे कर सीरिया के खिलाफ परोक्ष युद्ध छेड़ दिया । इस चौतरफा युद्ध का घोषित लक्ष्य सीरिया के शासक बसर-अल-असद को सत्ता से हटाना था। साढ़े चार साल के लंबी विध्वंशक युद्ध के हालातों ने जनता की तबाही बढ़ा दी । दो लाख लोग युद्ध में मारे गए । सीरिया की आधी आबादी  तकरीबन 2 करोड़ 30 लाख अपनी जमीन से उखड़ गई । 40 लाख लोग शरण पाने के लिए दूसरे देशों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए ।
            साम्राज्यवादी इतनी भयावह त्रासदी के बावजूद अपने दुश्चक्र को रोकने को तैयार नहीं हैं । युद्ध को और कारगर बनाने की जोड़ तोड़ जारी है । उनकी कोशिश है कि सीरिया को भी लीबिया, इराक की तरह अपने चंगुल में फंसा लें । रूस व ईरान इसमें आड़े आ रहे हैं ।
            सभी देशों की तबाही बर्बादी ने भयावह मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है । अपनी जमीन से उखड़े लोगों का सैलाब बढ़ता हुआ यूरोपीय देशों में पहुंच रहा है । ये देश शरणार्थियों को रोकने के लिए अपनी सीमा चौकसी बढ़ा रहे हैं । शरणार्थियों को कमजोर देशों की ओर ठेल रहे हैं। विश्व जनमानस इस अमानवीय  त्रासदी से प्रभावित हो रहा है ।
            इतिहास साक्षी है साम्राज्यवादी व्यवस्था मानवद्रोही रही है । इसने विश्व भर में जनता की गुलामी और शोषण को बढ़ाया है यही कारण है 20 वीं सदी के जनता के संघर्षों का मुख्य निशाना साम्राज्यवाद रहा है । शीट युद्ध से लेकर नव उदारवादी शोषण साम्राज्यवाद द्वारा थोपा गया है ।
            सम्मेलन  अफ्रीकी पश्चिमी एशियाई देशों की जनता की पीड़ा का एहसास करता है और अपनी संवेदनाएं व्यक्त करता है । साम्राज्यवादी आक्रामकता का समूल नाश करने में अपनी भागीदारी का वचन देता है ।
             
                                          राजनीतिक प्रस्ताव 6  : --  कन्नड विद्वान कलबुर्गी की हत्या के विरोध में     
            कुछ दिनों पहले कर्नाटक के मशहूर विद्वान , तार्किक चिंतक , अंधविश्वास विरोधी कलबुर्गी की फासीवादी तत्वों द्वारा हत्या कर दी गई । इससे पूर्व हिन्दू फासीवादी तत्वों द्वारा दाभोलकर व पनसारे के हत्या कर दी गई थी ।
            कलबुर्गी , दाभोलकर व पंसारे तीनों ही धार्मिक अंधविश्वासों के घोर विरोधी , कर्मकाण्डों के विरोधी व वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को समाज में स्थापित करने को प्रयासरत थे । संघी फासीवादी तत्व हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों ,अंधविश्वासों को समाज में स्थापित करने पर उतारू हैं । इसीलिए ये लोग उन्हें अपनी राह में बाधा के रूप में नज़र आए और फासीवादी लंपटों ने इनकी हत्या कर दी ।
            ये तीनों विद्वान पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष नहीं कर रहे थे । इनमें पंसारे संशोधन वादी पार्टी से जुड़े थे । इसीलिए कहा जा सकता है कि ये तीनों ही पूंजीवादी दायरे में भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता के साथ वैज्ञानिक मूल्यों को स्थापित करने में जुटे थे । लेकिन फासीवादी तत्वों को संविधान के दायरे में कार्यरत इन विद्वानों की कार्यवाहियां भी बर्दाश्त नहीं हुई ।
            इसीलिए पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे के लिए संघर्षरत लोगों के साथ फासीवादी तत्व इससे भी बुरा सलूक करेंगे । आज जब पूंजीपति वर्ग अपनी सारी तार्किकता विज्ञान के मूल्यों को एक किनारे रख फासीवादी पार्टी के समर्थन आ खड़ा हुआ है ऐसे में पूंजीवादी दायरे में समाज को और तार्किक वैज्ञानिक बनाने की संभावनाएं बेहद कमजोर हो जाती हैं ।
            इसीलिए समाज को तार्किक-वैज्ञानिक मूल्यों पर खड़ा करने के किसी भी प्रयास को पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष का हमराही बनना होगा । पूंजीवाद विरोध की जमीन पर खड़ा होकर फासीवादी ताकतों के हमलों का वैचारिक जवाब दिया जा सकता है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिका संगठन फासीवादी लंपटों द्वारा तार्किक चिंतक कल्बुर्गी की हत्या का विरोध करता है । और इन सभी लोगों की हत्यारों पर कार्यवाही की मांग करता है । यह सम्मेलन फासीवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लेता है ।             
           
            राजनीतिक प्रस्ताव 7 : - भूमि अधिग्रहण के खिलाफ
            किसानों की जमीन का सरकार द्वारा जबरन अधिग्रहण करने का सिलसिला ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के जमाने से चला आ रहा है। ब्रिटिश शासकों ने इसके लिए 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था । जो उन्हें किसानों से जबरन मनमाने दामों पर भूमि अधिग्रहित करने का अधिकार देता था । यह कानून पूरी तरह से ज़ोर जबर्दस्ती का कानून था ।
            आज़ादी के बाद भी इसी कानून के तहत लंबे समय तक भूमि अधिग्रहण होता रहा । किसानों ने जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ देश भर में कई जुझारू संघर्ष किए । बिहार के चंपारण, गुजरात के बारदौली, पंजाब के बाहनाक, महाराष्ट्र के रायगढ़, हरियाणा के गुड़गांव, उड़ीसा के कलिंग नगर, बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम , उत्तर प्रदेश के दादरी और भट्टा पारसौल में किसानों ने अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण के जबर्दस्त संघर्ष चलाया था । इन संघर्षों में किसानों ने अपनी जान की कुर्बानी दी ।
            किसानों के इन संघर्षों व 2014 के चुनावों में राजनीतिक लाभ के मद्देनजर कांग्रेस सरकार ने 2013 का नया भूमि अधिग्रहण कानून पास किया । यद्यपि यह कानून भी किसानों खासकर विस्थापित खेतीहर मजदूरों व भूमिहीनों की सुरक्षा का कोई बेहतर इंतजाम नहीं करता था पर फिर भी इस कानून से अभी तक मनमाने भूमि अधिग्रहण पर लगाम लगाने की कुछ उम्मीद जगी थी । 
            पूंजीपति वर्ग ने इस कानून में किसानों को मिलने वाली सहूलियतों के प्रति अपनी नाखुशी इसके पारित होते ही जता दी थी । पूंजीपति वर्ग तभी से 2013 के कानून को रद्द करने के लिए सरकार पर दबाव बनाता रहा है । इसीलिए जब 2014 में पूंजीपति वर्ग द्वारा नियोजित चुनाव के जरिये मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होने अध्यादेश के जरिये 2013 के कानून को बदल डालने की कवायद शुरू कर दी । 2014 के अध्यादेश में किसानों को मिली तमाम सहूलियतें छीन ली गई थी ।
            इस किसान विरोधी अध्यादेश का व्यापक विरोध होना लाजिमी था और भारी विरोध के चलते फिलवक्त मोदी सरकार को अपने कदम पीछे खींचते हुए अध्यादेश वापस लेना पड़ा है पर सही मौका पाते ही सरकार फिर से इस अध्यादेश को आगे बढ़ायेगी ।
            आज़ादी के बाद से भूमि अधिग्रहण के जरिये करोड़ों लोगों को विस्थापित किया जा चुका है । विस्थापितों के पुनर्वास के सरकार केवल वायदे ही करते रहती है। मोदी सरकार विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण की योजनाएँ लेकर बैठी है जो किसानों से भूमि छीन पूंजीपतियों को लौटाने का एक तरीका है ।
            पूंजीवादी व्यवस्था हर तरह से छोते मझौले किसानों को तबाह बर्बाद करती है । बाज़ार के मैकेनिज़्म के जरिये छोटे मझौले किसानों को अपनी भूमि बेच मजदूर बनाने की ओर धकेला जाता है कई दफा सरकार की जबरन भूमि छीन भी किसानों को मजदूर बनने को मजबूर कर देती है । पूंजीवाद में छोटी संपत्ति की तरह छोटे मझौले किसानों की तबाही तय है । इसीलिए छोटे गरीब  किसानों  के हितों की मुकम्मल रक्षा पूंजीवाद में नहीं समाजवाद में ही संभव है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन किसानों से जबरन भूमि अधिग्रहण के किसी भी प्रयास का विरोध करता है । किसान विरोधी किसी भी अधिग्रहण कानून का संगठन पुरजोर विरोध करेगा ।

            राजनीतिक प्रस्ताव 8 :-- जनसंघर्षों के दमन के खिलाफ  
           
            इतिहास गवाह है  कि जनता अपने एक एक अधिकार को शासकों से लड़कर ही हासिल कर पायी है आज भी हमारे देश में मेहनतकश जनता अपने अधिकारों की रक्षा व विस्तार के लिए जगह जगह लड़ रही है । हमारे पूंजीवादी शासक इन संघर्षों का गला घोंटने के लिए लाठी गोली सरीखे हथकंडे अपनाने के साथ साथ दमनकारी काले क़ानूनों का निर्माण कर रहे हैं ।
            आज मजदूर वर्ग पूरे देश में श्रम क़ानूनों परिवर्तन के खिलाफ संघर्षरत है । इन क़ानूनों में बदलाव कर शासक वर्ग अपने लिए लूट की खुली छूट हासिल करना चाहता है । मजदूरों से संगठित हो यूनियन बनाने का हक छीन लेना चाहता है। अपने हकों के लिए आज मजदूर वर्ग जब भी संघर्ष की राह पर चल रहा है तो उसे शासकों के निर्मम दमन का सामना करना पड़ रहा है। होंडा से लेकर मारुति सुजुकी का दमन इसके जीते जागते उदाहरण हैं ।
            देश में किसान समुदाय कृषि लागतों के महंगा होने के खिलाफ समर्थन मूल्य बढ़ाने सरीखे मुद्दों पर संघर्षरत हैं सरकारों द्वारा कृषि में अनुदान घटाने व किसानों की उपज को बाज़ार के हवाले करने से तबाह बर्बाद कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं । इसके साथ ही किसान मोदी सरकार द्वारा जबरन भूमि छीनाने के दस्तावेज़ नए भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ संघर्षरत रहे हैं। किसानों के इस संघर्ष से भी हमारे शासक लाठी गोली की भाषा से निपट रहे हैं । पिछले एक दशक में जबरन भूमि छीने जाने के खिलाफ लड़ते हुए ढेरों किसानों को मौत के घाट उतार दिया गया ।   
            मध्य भारत में जंगलों में मौजूद खनिज संपदा को पूँजीपतियों के हवाले करने के लिए शासकों ने आदिवासी लोगों को खदेड़ने के लिए आपरेशन ग्रीन हंट अभियान चला रखा है । आदिवासी जन अपनी जबरन बेदखली के खिलाफ जुझारू संघर्ष कर रहे हैं और सरकार अपने पुलिस बलों की मदद से आदिवासियों के खून की होली खेल उनका मुंह बंद कर देने पर उतारू हैं ।
            कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर में भारतीय राजसत्ता के उत्पीड़न का शिकार उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएं अपनी मुक्ति के लिए निरंतर संघर्षरत हैं भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा यहाँ की संघर्षरत जनता का निर्मम दमन बदस्तूर जारी है । महिलाओं से बलात्कार, संघर्षरत लोगों को आतंकवादी करार देकर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराना आदि भारतीय शासकों के दमन के हथकंडे हैं ।
            देश के तमाम  राज्यों में बेरोजगार नौजवान रोजगार की मांग को लेकर, बेहद कम वेतन पर कार्यरत आंगनवाड़ी –आशा-भोजन माता आदि अपने स्थाई काम के लिए , प्रशिक्षित नौजवान रोजगार के लिए संघर्षरत हैं । सम्मानजनक जीवन की इनकी मांग को हमारे शासक लाठी गोली से कुचलने पर उतारू हैं ।
            फासीवादी पार्टी के सत्तासीन होने के बाद से लोगों के खान पान, संस्कृति, रहन-सहन, शिक्षा आदि पर जबरन संघी विचार थोपे जा रहे हैं। इतिहास के भगवाकरण से लेकर तमाम पदों पर संघी लोग बैठाये जा रहे हैं । इनके खिलाफ संघर्षरत छात्रों-मेहनतकशों का निरंतर दमन किया जा रहा है ।
            मोदी सरकार के सत्तासीन होने के बाद से अपने हकों के लिए संघर्ष करने का अधिकार जनता से क्रमश: छीना जा रहा है । सरकार जनसंघर्षों के दमन के लिए काले क़ानूनों का जाल खड़ा करने से लेकर पुलिस बालों को आधुनिक उपकरणों से लैस कर आधिक खूंखार बनाने में जुटी है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन देश के इन न्यायपूर्ण संघर्षों में अपनी क्षमताभर भागीदारी को कृतसंकल्प है और इन संघर्षों के दमन का पुरजोर विरोध करता है ।   
             
           
           





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