धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाम् वास्तविक धर्मनिरपेक्षता
कहा जाता है कि किसी सच
को झूठ से ढंकना हो तो उस झूठ को 100 बार दोहराया जाना चाहिए। भारत की संघ-भाजपा
मंडली इस काम में सिद्धहस्त है और सबसे ज्यादा सिद्धहस्त हैं इसके प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी। पिछले लोकसभा चुनावों में इनके बारम्बार झूठ से गुजरात के विकास
माॅडल को स्थापित किया गया और गुुजरात हर किसी को विकसित नजर आने लगा। लोकसभा
चुनावों के एक वर्ष बाद भी प्रधानमंत्री अपनी वाक् कला से यह झूठ फैलाने का प्रयास
कर रहे हैं कि देश गत एक वर्ष में अभूतपूर्व ढंग से विकास की राह पर बढ़ चला है और
पूंजीवादी मीडिया की मेहरबानी से वे इस काम में भी कुछ हद तक सफल रहे हैं। हालांकि
एक बड़ी आबादी का विकास की लफ्फाजी से मोहभंग भी हो चुका है और ऐसे लोगों में कई
पूंजीपति भी हैं।
संघ मण्डली और उसके प्रधानमंत्री अब इसी तरह का एक नया प्रयोग अंजाम दे रहे हैं। यह प्रयोग है किसी शब्द का इतना मखौल उड़ाया जाये कि वह अपना अर्थ खो दे। संघ व उसके चहेते मोदी दोनों को भारतीय संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) घोषित किये जाने पर आपत्ति है। संघ तो देश को खुलेआम हिदू राष्ट्र बनाना ही चाहता है। ऐसे में इन शख्सियतों की इतनी हिम्मत तो है नहीं कि वे संविधान बदल दें इसलिए वे चोर दरवाजे से दूसरी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं।
यह रणनीति है कि सेक्युलरिज्म का इतना मखौल उड़ाया जाय कि लोग धीरे-धीरे यह भूल जायें कि भारत का संविधान भारत को एक सेक्युलर देश बताता है। कि लोग इस बात को धीरे-धीरे मान लें कि धर्म निरपेक्ष कहलाना एक मजाक बन जाये। इसमें कोई भूल कर भी यह सवाल न उठा पाये कि देश के प्रधानमंत्री जब धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो वे खुलेआम भारतीय संविधान का भी मखौल बनाते हुए एक अपराधिक कृत्य करते हैं। इसीलिए जब मोहन भागवत देश को हिंदू राष्ट्र करार देते हैं तो कोई भी आवाज इसे एक अपराधिक वक्तव्य ठहराने की नहीं उठती।
संघ मंडली ने सेक्युलरिज्म का मखौल उड़ाने का मुख्य जिम्मा प्रधानमंत्री मोदी को ही दे रखा है। अभी मोदी को देश के भीतर तो यदा कदा ही सेक्युलरिज्म का मजाक बनाने का मौका मिला पर जब भी उन्होंने विदेशों में अनिवासी भारतीयों को सम्बोधित किया तो इसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
पिछले वर्ष टोकियों में मोदी ने जब जापानी राजा को गीता भेंट की तो साथ ही यह भी कह डाला कि हमारे सेक्युलर मित्र इस पर तूफान खड़ा कर देंगे कि मोदी खुद को क्या समझता है। वे गीता को अपने साथ लाने पर उन्हें साम्प्रदायिक करार देंगे। इसके बाद बर्लिन में यह कहा कि किसी जमाने में जर्मन रेडियो संस्कृत में एक बुलेटिन प्रसारित करता था पर भारत में इस पर सेक्युलरिज्म के ऊपर इतना तूफान मच जाता कि संस्कृत भी विवाद में फंस जाती। और अभी हाल में 23 सितम्बर 2015 को आयरलैण्ड के डबलिन में मोदी का स्वागत संस्कृत के श्लोक व गीत से किये जाने पर उन्होंने टिप्पणी की कि अगर भारत में ऐसा करने का प्रयास किया जाए तो सेक्युलरिज्म पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता।
संघ मण्डली और उसके प्रधानमंत्री अब इसी तरह का एक नया प्रयोग अंजाम दे रहे हैं। यह प्रयोग है किसी शब्द का इतना मखौल उड़ाया जाये कि वह अपना अर्थ खो दे। संघ व उसके चहेते मोदी दोनों को भारतीय संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) घोषित किये जाने पर आपत्ति है। संघ तो देश को खुलेआम हिदू राष्ट्र बनाना ही चाहता है। ऐसे में इन शख्सियतों की इतनी हिम्मत तो है नहीं कि वे संविधान बदल दें इसलिए वे चोर दरवाजे से दूसरी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं।
यह रणनीति है कि सेक्युलरिज्म का इतना मखौल उड़ाया जाय कि लोग धीरे-धीरे यह भूल जायें कि भारत का संविधान भारत को एक सेक्युलर देश बताता है। कि लोग इस बात को धीरे-धीरे मान लें कि धर्म निरपेक्ष कहलाना एक मजाक बन जाये। इसमें कोई भूल कर भी यह सवाल न उठा पाये कि देश के प्रधानमंत्री जब धर्मनिरपेक्षता का मजाक उड़ाते हैं तो वे खुलेआम भारतीय संविधान का भी मखौल बनाते हुए एक अपराधिक कृत्य करते हैं। इसीलिए जब मोहन भागवत देश को हिंदू राष्ट्र करार देते हैं तो कोई भी आवाज इसे एक अपराधिक वक्तव्य ठहराने की नहीं उठती।
संघ मंडली ने सेक्युलरिज्म का मखौल उड़ाने का मुख्य जिम्मा प्रधानमंत्री मोदी को ही दे रखा है। अभी मोदी को देश के भीतर तो यदा कदा ही सेक्युलरिज्म का मजाक बनाने का मौका मिला पर जब भी उन्होंने विदेशों में अनिवासी भारतीयों को सम्बोधित किया तो इसका मजाक बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
पिछले वर्ष टोकियों में मोदी ने जब जापानी राजा को गीता भेंट की तो साथ ही यह भी कह डाला कि हमारे सेक्युलर मित्र इस पर तूफान खड़ा कर देंगे कि मोदी खुद को क्या समझता है। वे गीता को अपने साथ लाने पर उन्हें साम्प्रदायिक करार देंगे। इसके बाद बर्लिन में यह कहा कि किसी जमाने में जर्मन रेडियो संस्कृत में एक बुलेटिन प्रसारित करता था पर भारत में इस पर सेक्युलरिज्म के ऊपर इतना तूफान मच जाता कि संस्कृत भी विवाद में फंस जाती। और अभी हाल में 23 सितम्बर 2015 को आयरलैण्ड के डबलिन में मोदी का स्वागत संस्कृत के श्लोक व गीत से किये जाने पर उन्होंने टिप्पणी की कि अगर भारत में ऐसा करने का प्रयास किया जाए तो सेक्युलरिज्म पर सवालिया निशान खड़ा हो जाता।
इन सब
वाकयों में मोदी गीता और संस्कृत को कुछ इस रूप में प्रस्तुत करते हैं कि ये
हिन्दू धर्म से सम्बन्ध नहीं बल्कि भारतीय पहचान की चीजें हैं। क्या किसी
धर्मनिरपेक्ष देश का प्रधान गीता व संस्कृत की वकालत करता नजर आना चाहिए। इसका
जवाब स्पष्टतया यही होगा कि ऐसा होना ही यह दिखलाता है कि धर्मनिरपेक्षता वास्तव
में स्थापित ही नहीं है।
आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता को कभी वैज्ञानिक अर्थों में परिभाषित ही नहीं किया गया। किसी राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा अर्थ यह होता है कि राजकीय मसलों- राजनीति- शिक्षा आदि में धर्म का हस्तक्षेप बन्द कर दिया जाये। लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जिस धर्म को वे चाहें मानने की स्वतंत्रता हो पर राज्य या सार्वजनिक जीवन में धर्म का कोई हस्तक्षेप न हो। राज्य वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को लगातार समाज में, शिक्षा में स्थापित करें।
पर भारत में धर्मनिरपेक्षता की उपरोक्त व्याख्या के बजाय सर्वधर्म समभाव के रूप में व्याख्या की गयी यानि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखे। सब धर्मों के आयोजनों को वह समान रूप से प्रश्रय दे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में कांग्रेस के तिलक-गांधी नुमा नेताओं की पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्षता के वैज्ञानिक अर्थ ग्रहण करने की संभावना क्षीण ही थी क्योंकि ये नेता अक्सर हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल करते पाये जाते थे।
आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता को कभी वैज्ञानिक अर्थों में परिभाषित ही नहीं किया गया। किसी राज्य के धर्मनिरपेक्ष होने का सीधा अर्थ यह होता है कि राजकीय मसलों- राजनीति- शिक्षा आदि में धर्म का हस्तक्षेप बन्द कर दिया जाये। लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जिस धर्म को वे चाहें मानने की स्वतंत्रता हो पर राज्य या सार्वजनिक जीवन में धर्म का कोई हस्तक्षेप न हो। राज्य वैज्ञानिक व तार्किक चिंतन को लगातार समाज में, शिक्षा में स्थापित करें।
पर भारत में धर्मनिरपेक्षता की उपरोक्त व्याख्या के बजाय सर्वधर्म समभाव के रूप में व्याख्या की गयी यानि राज्य सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखे। सब धर्मों के आयोजनों को वह समान रूप से प्रश्रय दे। भारत के स्वाधीनता संघर्ष में कांग्रेस के तिलक-गांधी नुमा नेताओं की पृष्ठभूमि में धर्मनिरपेक्षता के वैज्ञानिक अर्थ ग्रहण करने की संभावना क्षीण ही थी क्योंकि ये नेता अक्सर हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल करते पाये जाते थे।
फिर भी
आजादी के वक्त नेहरू के धर्मनिरपेक्ष भारत से आज तक लम्बी यात्रा तय की जा चुकी
है। नेहरू ने अपने वक्त में देश के राष्ट्रपति को, मंत्रियों को गीता-कुरान दूसरों
को भेंट देने से यह कहते हुए रोक दिया था कि धर्म निरपेक्ष देश के राष्ट्रपति, मंत्री
को धार्मिक प्रतीक भेंट नहीं करना चाहिए। नेहरू ने राष्ट्रपति को किसी मंदिर के
उद्घाटन तक में राष्ट्रपति की हैसियत के बजाय व्यक्तिगत तौर पर शामिल होने की सलाह
दी थी।
आज नेहरू
सरीखे व्यवहार की उम्मीद भाजपा नेताओं से तो दूर कांग्रेसी व अन्य दलों के नेताओं
से भी किये जाने की उम्मीद बेमानी है। दरअसल वोट बैंक मजबूत करने के लिए अपने को
धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियां कांग्रेस-जनता दल आदि क्रमशः नरम हिंदुत्व की
ओर झुकती चली गयी हैं। धर्मनिरपेक्षता की सर्वधर्म समभाव की व्याख्या ने इसमें मदद
की है। यहां तक कि संशोधनवादी कम्युनिस्ट भी इस दौर में ‘नास्तिकता’ से डगमगाने
लगे हैं। इसीलिए राजीव गांधी राम मंदिर के ताले खुलवाते हैं तो सोनिया बुखारी से
वोट मांगने जाती हैं और कांग्रेस सेक्युलर होने का ढोल पीटती रहती है।
तथाकथित
सेक्युलर पार्टियों के व्यवहार ने भी सेक्युलरिज्म का मखौल बनाने की मोदी की कोशिश
में भरपूर मदद की है। ये पार्टियां खुद धर्म के आधार पर वोट जुटाने की तिकड़में
करती हैं। हिन्दू वोट बैंक खिसक न जाये इस हेतु संघ के जहरीले वक्तव्यों के विरोध
से डरती हैं और खुद को सेक्युलर करार देती हैं। संसदीय वामपंथी भी धर्मनिरपेक्ष
ताकतों के तौर पर इनके साथ मोर्चा बना मोदी के धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाने का
काम आसान कर देते हैं।
प्रधानमंत्री
मोदी अभी भले ही विदेशों में सेक्युलरिज्म का मजाक बना रहे हों पर शीघ्र ही वे देश
के भीतर भी यह हरकत बारम्बार करेंगे। वे सेक्युलर होने को एक गाली के बतौर स्थापित
कर संघ की हिन्दू पहचान को मजबूती से स्थापित करना चाहते हैं। देश का शासक
पूंजीपति वर्ग भी मोदी की इस कवायद में उसके साथ इस उम्मीद में खड़े हैं कि मोदी
उनकी मुनाफे की राह सुगम बनायेंगे। इसीलिए मोदी एक ओर धर्मनिरपेक्षता का मखौल बनाते
हैं तो दूसरी ओर संघी संगठनों के लोग धर्मनिरपेक्ष-तार्किक चिन्तकों की हत्यायें
कर रहे होते हैं और शासक पूंजीपति वर्ग मौन धारण कर मोदी प्रशंसा में जुटा रहता
है।
संघ व एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ के इस चरण में इससे भिन्न व्यवहार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। यह बात ही इस ओर संकेत करती है कि आज पूंजीवादी दायरे में धर्मनिरपेक्षता-तार्किकता को स्थापित करने की हर कवायद निष्फल होनी तय है क्योंकि यह नेहरू का नहीं मोदी का जमाना है। पूंजीपति वर्ग का हाथ अब नेहरू के सिर पर नहीं मोदी के सिर पर है। धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अर्थों (सार्वजनिक जीवन, राजकीय मसलों से अलग धर्म को व्यक्तिगत मसला घोषित करना) में स्थापित करने वाले सभी बुद्धिजीवियों-चिन्तकों को इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में चल रहे समाजवाद के लिए संघर्ष का हमराह बनना होगा। समाजवाद में ही धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण होगा तब तक मोदी के सेक्युलरिज्म विरोध के साथ अन्य पूंजीवादी दलों के छदम सेक्युलरिज्म का पर्दाफाश करना होगा।
संघ व एकाधिकारी पूंजी के गठजोड़ के इस चरण में इससे भिन्न व्यवहार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। यह बात ही इस ओर संकेत करती है कि आज पूंजीवादी दायरे में धर्मनिरपेक्षता-तार्किकता को स्थापित करने की हर कवायद निष्फल होनी तय है क्योंकि यह नेहरू का नहीं मोदी का जमाना है। पूंजीपति वर्ग का हाथ अब नेहरू के सिर पर नहीं मोदी के सिर पर है। धर्मनिरपेक्षता को वास्तविक अर्थों (सार्वजनिक जीवन, राजकीय मसलों से अलग धर्म को व्यक्तिगत मसला घोषित करना) में स्थापित करने वाले सभी बुद्धिजीवियों-चिन्तकों को इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में चल रहे समाजवाद के लिए संघर्ष का हमराह बनना होगा। समाजवाद में ही धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण होगा तब तक मोदी के सेक्युलरिज्म विरोध के साथ अन्य पूंजीवादी दलों के छदम सेक्युलरिज्म का पर्दाफाश करना होगा।
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