Friday, 30 October 2015

     Political   report  passed by the sixth conference 

                                                     राजनीतिक रिपोर्ट                                     
                                                 अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां
          वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व आर्थिक संकट का शिकार है। यह संकट अमेरिका में 2007-08 में शुरू हुऐ सब प्राइम संकट से ही जारी है। इस दौरान लगभग हर वर्ष साम्राज्यवादियों और उनकी संस्थाओं द्वारा इस संकट से निकलने की घोषणाएं होती हैं और हर बार उन्हें मायूस होना पड़ता है। यह संकट 1929 की महामंदी के बाद सबसे बड़ा संकट साबित हो रहा है।
          पूंजीवाद के इस आर्थिक संकट के कारण सभी साम्राज्यवादी देशों व विश्व की अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की विकासदर लगातार गिरती गयी है। यद्यपि 1996-2006 के दस सालों में भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की औसत सालाना वृद्धि दर 3.9 थी लेकिन संकट के बाद 2008-11 में यह 1.9, 2012 में 2.4, 2013 में 2.5, 2014 में 2.5 रही व 2015 में इसके 3.1 रहने का अनुमान है।
          पूंजीवादी देशों के सिरमौर अमेरिका की वृद्धि जहाँ 1996-2006 में 3.4 थी वहाँ 2015 में 2.8 रहने का अनुमान है। अमेरिका की यह विकास दर भी उसके वित्तीय प्रभुत्व व सामऱिक महत्व के कारण ही है।
          लगातार युद्धों मे उलझने व अन्य कारणों से अमेरिकी राज्य के गैर उत्पादक खर्चे बढ़ते जा रहे हैं जिस कारण वह न केवल दुनिया का सबसे बड़ा कर्ज खोर देश बन चुका है बल्कि ओबामा के शासन काल में सामाजिक मदों से भारी कटौती जारी है।
          अमेरिकी साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया में अपने सैन्य अड्डे कायम किये हुऐ हैं और वह बिना किसी ठोस चुनौती के लगातार नाटो का विस्तार करता गया है। शांति के लिए नोबेल पुरूस्कार पाने वाले ओबामा के शासन काल में न केवल एक के बाद एक देश अमेरिकी साम्राज्यावाद की जद में आते गये हैं बल्कि काबुल व बगदाद में तो अमेरिकी सेना ने स्थायी अड्डे बना लिये हैं। 2008 मे कायम की गई अमेरिकी सेना की नयी कमान अफ्रीकाम नें अफ्रीका में कई खुली व गुप्त कार्यवाहियों का अन्जाम दिया है।
          अमेरिकी साम्राज्यवादी संस्कृति का व्यापक प्रसार-प्रचार होता गया है। आधुनिक संचार साधनों व इन्टरनेट आदि के जरिये यह संस्कृति तीसरी दुनिया के देशों के घर-घर तक पहुँच गयी है और हिंसा-सेक्स व फूहड़ कामेडी पर आधारित फिल्मों व शोज के जरिये अपना विषाक्त प्रभाव छोड़ रही है। खुद अमेरिकी समाज के मजदूर-मेहनतकश व अन्य जनता इस संस्कृति के प्रभाव में है।
          अमेरिकी समाज में पिछले वर्षों के मुकाबले इस आर्थिक संकट के कारण प्रतिक्रियावादी और नव फासीवादी विचारों का प्रभाव बढ़ा है और इसके साथ ही अश्वेतों और अप्रवासियों पर शारी़रिक हमले बढ़े हैं।
          अमेरिकी राज्य का घोर प्रतिक्रियावादी व आक्रामक चरित्र रोज उजागर होता है। वह अपने ही नागरिकों और मित्र राष्ट्रो के प्रमुख व जनता की कितनी गहरी निगरानी करता है यह स्नोडेन-मेनिंग प्रकरण से सामने आ चुका है। दमन के नये तौर तरीके और कानून बना रहे अमेरिकी शासकों ने लाखों लोगों को बिना किसी ठोस कारण के जेलों में ठूँसा हुआ है। लोकतंत्र व मानवाधिकारों के नाम पर तीसरी दुनिया के देशों पर हमला करने वाले अमेरिका की यही सच्चाई है।
          विश्व आर्थिक संकट ने यूरोपीय यूनियन के देशों पर काफी बुरा असर डाला है। जिस कारण यूरोपीय यूनियन, यूरो क्षेत्र व  उसकी मुद्रा यूरो के भविष्य पर प्रश्न खड़े हो गये हैं। अर्थव्यवस्था की विकास दर के हिसाब से यूरो क्षेत्र का हाल काफी बुरा है। 1996-2006 में 2.4 प्रतिशत विकास-दर रखने वाला यूरो क्षेत्र 2015 में 1.3 प्रतिशत की विकास-दर ही बनाए रखने में सफल हो पा रहा है।
          आर्थिक संकट के कारण औद्योगिक उत्पादन व निर्यात गिर रहा है, सामाजिक मदों में कटौती, फैक्ट्रियों से छंटनी जारी है। इन कारणों से बेरोजगारी की समस्या जटिल व गहनतर होती जा रही है। इस समय बेरोजगारी की दर पूरे यूरोपीय क्षेत्र में 10 प्रतिशत से ऊपर जा पहुँची है।
          इन देशों में अर्थव्यवस्था के संकट ग्रस्त रहने से राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ी है। इटली, ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, में राजनीतिक पार्टियों की साख काफी नीचे गिर गई है। ग्रीस में सिरिजा जैसी वामपंथी रूझान वाली पार्टी ने यूरोपीय यूनियन द्वारा थोपे गये कटौती कार्यक्रम का विरोध करते हुये सत्ता पाई और बाद में जनता से वादा खिलाफी करते हुए नये कटौती कार्यक्रम लागू करना जारी रखा। बाद में जब देश की स्थिति ज्यादा खराब हुई और ग्रीस की सरकार को कर्मचारियों तक की पगार के लिए पुनः यूरोपीय यूनियन से और कर्ज लेने की नौबत आयी तो ग्रीस के प्रधानमंत्री ने के कटौती कार्यक्रम के मुद्दे पर जनमत संग्रह करवाया और ग्रीस की जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ कटौती कार्यक्रम  न लागू के लिए वोट दिया लेकिन ग्रीस के प्रधानमंत्री ने जनमत संग्रह को धता बताते हुए कर्ज एवं उसके साथ जुड़ी अपमानजनक शर्तों को थोड़ा हेर-फेर के साथ मान लिया।
          आर्थिक, राजनैतिक संकट की अभिव्यक्ति सामाजिक संकट में भी हो रही है। पूरे यूरोप में नव नाजीवादी व नव फासीवादी आन्दोलन जोर पकड़ रहा है। धार्मिक अल्पसंख्यकों, अफ्रीकी व एशियाई मूल के अप्रवासियों पर हमले बढ़े हैं ।फ़्रांस, इटली ब्रिटेन में अलगाववादी प्रवृत्तियां दिखाई पड़ रही हैं।                               
          पूर्वी यूरोप के देश-अमेरिकी-यूरोपीय साम्राज्यावादियों एवं रूसी साम्राज्यवादियों के बीच संघर्ष का अखाड़ा बन गये हैं। पहले से ही जर्जर इन देशों के साम्राज्यवादियों के बीच चल रहे संघर्षों के कारण हालात बद से बदतर होते                                                            गये हैं। उक्रेन, जर्जिया का तो इन ताकतों के बीच अनौपचारिक बंटवारा तक हो गया है।
          रूस की अर्थव्यवस्था की विकास दर 1996-2006 में 4.3 प्रतिशत थी। मंदी के समय 2008-11 के बीच 1.4 तो 2011 में 3.4 हो गयी लेकिन 2013 से रूस की अर्थव्यवस्था संकट के भंवर में है। जिसका फौरी कारण तेल की कीमतों में आयी भारी गिरावट और उक्रेन के मुद्दे पर पश्चिमी साम्राज्यवादियों द्वारा रूस पर लगाये गये प्रतिबन्ध हैं। इस के बावजूद रूसी साम्राज्यवादी अपने हितों के लिए जोखिम उठा रहे हैं उसी का नतीजा है कि उन्हें वर्ष 2014 में बड़े साम्राज्यवादी देशों के गुट जी-8 से अलग कर दिया गया और जी-20 की बैठक में अलगाव में डाल दिया गया। फिर भी रूसी साम्राज्यवादी पूर्वी यूरोप व मध्य एशिया में ही नहीं बल्कि शेष दुनिया में भी अपने हितों के लिए मुखर है। ऐसा करते हुऐ उन्हें लैटिन अमेरिका, अरब जगत और अफ्रीका में भी देखा जा सकता है।
          रूस के आंतरिक हालात यूरोप के देशों जैसे बुरे तो नहीं परन्तु ज्यादा अच्छे भी नहीं हैं। पूंजीवादी नीतियों के कारण बढ़ती असमानता, मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है। तेल की कीमतों में जारी गिरावट व पश्चिमी साम्राज्यवादियों द्वारा लगाये गये प्रतिबंध, राज्य का बढ़ता सैन्य खर्च आम जनता की स्थिति को और खराब करेगा।
          विश्व आर्थिक संकट का यूरोप के बाद सबसे ज्यादा असर जापान पर पड़ा है। ऐसी स्थिति में पहले से खस्ताहाल जापानी अर्थव्यवस्था की हालत और खराब हो गयी है। 2% के क्षणिक उभार के बाद जापानी अर्थव्यवस्था लगातार सिकुड़ रही है। आज जापान में आर्थिक संकट और राजनैतिक अस्थिरिता स्थाई परिघटना बन चुकी है। 2014 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजे को समय से पूर्व चुनाव की घोषणा करनी पड़ी और वे वित्त पतियों के भरपूर सर्मथन व राजनैतिक विकल्प हीनता की स्थिति में पुनः चुनाव जीत गये।
           जापानी समाज में आर्थिक संकट के कारण व्यापक निराशा पसरी हुयी है। ऐसे में दक्षिणपंथी व फासीवादी रूझानों के पैदा होने के साथ-साथ जापानी साम्राज्यवादियों की महत्वाकांक्षाएं भी जोर मारने लगीं हैं  और वे पुनः सैन्यीकरण की ओर उन्मुख हो रहे हैं।
          हाल के वर्षों में आर्थिक संकट बढ़ने से, सारे साम्राज्यवादियों के बीच बेचैनी है जिस कारण उनके अंतरविरोध पहले के मुकाबले ज्यादा तीखे हुए हैं।
          पश्चिमी साम्राज्यवादियों व रूसी साम्राज्यवादियों के बीच तीखे अन्तरविरोध सीरिया, उक्रेन, जार्जिया आदि मामलों में सामने आये। पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने रूसी साम्राज्यवादियों को अलगाव में डालने की कोशिश की और उन्होंने जी-8 से रूस को अलग करके जी-20 में भी रूस को अलगाव में डाला किन्तु यूरोपीय युनियन व रूस की अर्थव्यवस्था जितनी आपस में एकीकृत है उससे वह खास कामयाब नहीं हो पाये। दूसरी ओर रूस भी ब्रिक्स, शंघाई सहकार इत्यादि मंचों के माध्यम से अपनी स्थिति व प्रभाव सुदृढ़ करने में लगा हुआ है।
          अमेरिकी एवं यूरोपीय साम्राज्यावदियों के बीच भी इजराइल, ईरान, चीन, रूस, उक्रेन आदि मुद्दों पर मतभेद उभरते रहे हैं। इसी तरह यूरोपीय यूनियन में वर्चस्व को बढ़ाने को लेकर यूरोपीय साम्राज्यवादियों के अन्तरविरोध सतह पर आये। विश्व आर्थिक संकट ने यूरोप के अग्रणी देशों जर्मनी, फ्रांस, इटली, यू0के0 के अन्य देशों जैसे स्पेन, पुर्तगाल, ग्रीस के साथ अन्तरविरोध को बढ़ाया है।
          पिछले आठ साल से चलते आर्थिक संकट की रोकथाम में खास कारगर सिद्ध नहीं हो पायी अमेरिकी वर्चस्व वाली संस्थाओं अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष व विश्व बैंक की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। विश्व बैंक द्वारा आर्थिक संकट के संबंध में किये गये आंकलन को हर तिमाही बाद बदलना पड़ा है। जिससे इस संस्था की विश्वसनीयता संदेह के दायरे में आ गयी है। वहीं तीसरी दुनिया के उभरते भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका व साम्राज्यवादी देश जर्मनी, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में बदलाब की मांग कर रहे हैं। ये स्थितियां साम्राज्यावादी शक्तियों के बीच के अन्तरविरोधों को दिखा रही हैं कि अन्तरविरोध यद्यपि तीव्र हो रहे हैं लेकिन साम्राज्यवादी उन्हें हल कर ले रहे हैं। लेकिन संकट के अति तीव्र होने पर यह अंतरविरोध कहाँ तक जायेगे यह देखने की बात होगी।
          विश्व आर्थिक संकट ने तीसरी दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। चीनी मेहनतकशों के चरम शोषण व उत्पीड़न के दम पर चीन अभी भी दुनिया की सबसे तेज गति से दौड़ने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुयी है। यद्यपि 1996-2006 में 9.2 के मुकाबले उसकी विकास दर 2015 में 7.0 ही है। दुनिया के पैमाने पर चीन अपनी स्थिति और प्रभावी बनाने के लिए हाथ-पांव मार रहा है। चीनी शासकों ने संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मुद्रा का लगभग 2 % अवमूल्यन कर दिया जिसका असर तुरंत ही वैश्वीकृत हो गई दुनिया के अधिकांश मुल्कों के शेयर मार्केट के लड़खड़ाने के रूप में दिखाई दिया ।  वह अफ्रीका, एशिया एवं लैटिन अमेरिका के कई देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है।
          चीन के शासक अपनी सेना के आधुनिकीकरण व विस्तार में लगे हुये हैं। इस कारण चीन का रक्षा बजट संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दूसरे नं0 पर है। अपनी साम्राज्यवादी शक्ति बनने की महत्वकांक्षा के कारण चीन का अपने पड़ोसियों जापान, वियतनाम, भारत, ताइवान आदि से तनाव बढ़ा है।
          चीन में तीव्र विकास दर के बावजूद चीनी जनता की स्थिति खराब है। चीन की मजदूर आबादी के बीच लगातार असन्तोष बढ़ रहा है। तो चीनी किसान भी लगातार संघर्षरत हैं। व्यापक पहरेदारी के बावजूद चीनी जनता के संघर्ष की खबरें छन-छन कर बाहर आती रहती हैं।
          ब्रिक्स के अन्य देशों ब्राजील व दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्थाओं पर भी मंदी का असर पड़ा है। और इन देशों के शासक भी इस संकट से मुक्ति के लिए नीम हकीमी नुस्खे ही अपना रहे हैं। इन देशों में भी बेरोजगारी दर काफी ऊँची है। पिछले वर्षों में इन देशों में भी अपनी छिनती सुविधाओं के कारण जनता के विभिन्न हिस्सों नें संघर्ष किया है।                 
          लैटिन अमेरिकी देशों की स्थिाति पिछले एक दशक से मिली जुली बनी हुयी है। कई देशों की जैसे पेरू, वोलीविया आदि ठीक प्रदर्शन वाली तो कई जैसे- मैक्सिको, चिली व अर्जेण्टाइना संकटग्रस्त रहे हैं। लैटिन अमेरिकी कुछ देशों के इक्कीसवीं  सदी के समाजवाद की चीजें फीकी हो चुकी हैं। शावेज, लूला आदि पूंजीवादी दायरे में ही सुधारों को अंजाम दे रहे थे। क्यूबा की साम्राज्यवादी अमेरिका से  बढ़ती निकटता अब जगजाहिर है।
          दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर पूरा अफ्रीकी महाद्वीप पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों, रूसी साम्राज्यवादियों, चीन, भारत, इजराइल जैसी ताकतों के दोहन व शोषण की जमीन बना हुआ है। दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर कोई ऐसी शक्ति अफ्रीका में नहीं है जो इन बाहरी ताकतों से मोल भाव कर सके। लीबिया, मिश्र, नाइजीरिया जैसी बड़ी ताकतें अपनी आंतरिक समस्याओं से बुरी तरह ग्रस्त हैं तो सूडान, कांगो, माली, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, सोमालिया, पश्चिमी साम्राज्यावादियों के सैन्य हस्तक्षेप का शिकार हैं। 
          2008 में शुरू हुऐ विश्व आर्थिक संकट और खाद्यान्न संकट का सबसे तीखा असर अरब देशों पर पड़ा। जिस कारण। इन देशों में व्यापक जन आन्दोलन हुए। लेकिन यह सभी आन्दोलन मूलतः और मुख्यतः पूंजीवादी दायरे में ही रहे। जिसके प्रभाव को कम करने के लिए यहाँ के शासक वर्गों के साथ-साथ साम्राज्यवादियों की भी व्यापक भूमिका रही। सीरिया में पश्चिमी साम्राज्यवदियों ने अपने सहयोगी अरब देशों के जरिये कट्टर इस्लामिक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट को पैदा किया। इस संगठन ने नृशंसता की सारी हदें पार कर दी हैं। अब आई0 एस0 के दमन के नाम पर अमेरिकी साम्राज्यवादी पुनः हवाई हमलों से ईराक, सीरिया में कहर बरपा रहे हैं। सीरिया को गृह युद्ध में धकेलकर लाखों बेगुनाह नागरिकों व मासूम बच्चों को शरणार्थियों के रूप में दर दर भटकने व मरने को विवश करने के लिए मूलत:साम्राज्यवादी मुल्क ही जिम्मेदार हैं ।
          फिलीस्तीन की जनता, बढ़ते इज्राइली दमन के खिलाफ व अपनी मुक्ति के लिए संघर्षरत है। फिलीस्तीनी जनता को मुक्ति के लिए हमास जैसे संगठनों से किनारा कर अपने क्रांतिकारी संगठन खड़े करने होंगे।
          सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, ईरान जैसे तेल उत्पादक देशों के आंतरिक हालात भी अच्छे नहीं हैं। तेल की कम कीमतों के चलते यहाँ के शासकों के खिलाफ भी जनआन्दोलन खड़े होने की सम्भावनाएं हैं। इन्ही से मिलते-जुलते हालातों वाले तुर्की ने अपेक्षाकृत तीव्र आर्थिक प्रगति की है। वहाँ पर तेज आर्थिक सुधारों के साथ-साथ इस्लामीकरण का रास्ता अपनाया गया है। जिसका तुर्की की जनता ने व्यापक विरोध किया है। तुर्की द्वारा कुर्दों का दमन जारी है। कुर्द वामपंथी संगठन कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के नेतृत्व में अपने आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए संघर्षरत है।
          मध्य एशिया के देश पश्चिमी साम्राज्यवादियों व रूसी साम्राज्यवादियों के बीच पूर्वी यूरोप की तरह अपने-अपने प्रभाव में लेने के लिए तनाव व संघर्ष के क्षेत्र बने हुए हैं।
          दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों का निर्यात मूलक अर्थव्यवस्थाऐं संकट से काफी प्रभावित हुई हैं। जिस कारण इन देशों इण्डोनेशिया, मलेशिया, कम्बोडिया, थाईलैण्ड आदि में मजदूरों-किसानों व अन्य वर्गों-तबकों के संघर्ष फूटते रहे हैं।
          दक्षिण एशिया में भारतीय शासकों के हस्तक्षेप व प्रभाव के बीच विभिन्न देश अलग-अलग किस्म के आर्थिक संकट से आंतरिक संकटों से जूझ रहे हैं।  पिछले कई सालों से चुनी हुई सरकार होने के बावजूद पाकिस्तान में फौज की सशक्त भूमिका बनी हुई है। समाज में गहरा संकट व्याप्त है। उत्पीडित राष्ट्रीयताएं-ब्लूच, पख्तून, सत्ता के खिलाफ संघर्षरत है। यहाँ पर इस्लामिक कट्टरपंथी भी आये दिन धमाके करके अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं।
          अफगानिस्तान में अभी भी तालीबानियों व अमेरिकी सहायता से गद्दी पर बैठे मोहम्मद अशरफ घानी के बीच संघर्ष में जनता चक्की के पाटों के बीच पिस रही है।
          बांग्लादेश में जनतांत्रिक तरह से चुनी हुई सरकारों के बावजूद इस्लामिक कट्टरपंथ काफी प्रभाव रखता है। पूंजीवादी शोषण के कारण रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी न होने से यहाँ भी जनता के विभिन्न हिस्सों के संघर्ष फूटते रहते हैं।
          नेपाली समाज, माओवादियों के नेतृत्व में हुई क्रान्ति के बाद एक कदम आगे सामंती राजशाही से पूंजीवादी जनतंत्र में बदल गया है। लेकिन संविधान बनने के बावजूद अभी भी यहाँ विभिन्न पार्टियों के बीच इसे लेकर रस्साकसी जारी है। श्रीलंका में हुऐ चुनावों में सिंहली राष्ट्रवाद को उभारने वाले तथा तमिल राष्ट्रीयता के आंदोलन का क्रूर दमन करने वाले राजपक्षे को जनता ने नकार दिया अब उसकी जगह मैत्रीपाला सिरीसेना की सरकार आयी है। नयी सरकार ने अपने कदमों से साफ कर दिया है कि वह भी पुरानी सरकार जितनी ही पूंजीपरस्त व जनविरोधी है।
..................................................................................................................................... इतिहास गवाह है कि स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व के नारे को उठाने वाला पूंजीपति वर्ग सत्ताएं प्राप्त करने के बाद अपना क्रांतिकारी, प्रगतिशील चरित्र क्रमशः खोता चला गया। मजदूरों के एक वर्ग के रूप में विकसित होते ही पूंजीपति वर्ग की क्रांतिकारिता खत्म हो गयी और रही सही कसर पूंजीवाद के साम्राज्यवाद में बदलते ही पूरी हो गई। साम्राज्यवाद की शुरूआत से ही मजदूरों के, महिलाओं के, किसानों व अन्य मेहनतकश वर्गों के, अश्वेतों, दलितों, पिछड़ो के व राष्ट्रीय मुक्ति के संघर्षों  के कारण ही पूंजीवाद में जनवाद खुद को बचा पाया व एक हद तक विस्तारित करा पाया । निश्चित ही इन संघर्षों में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में क्रान्तिकारी संघर्ष की अग्रणी भूमिका रही। मजदूर वर्ग के नेतृत्व में क्रान्तिकारी संघर्षों के फलस्वरूप कई देशों में समाजवादी राज्य बने। इन समाजवादी राज्यों में जनता को महत्तम स्तर का जनवाद था। इन समाजवादी समाजों व दुनिया की जनता के संघर्षों के कारण विभिन्न पूंजीवादी देशों के शासक वर्ग अपने-अपने देशों में कल्याणकारी राज्य की नीतियाँ अपनाने को विवश हुए। इन राज्यों में जहाँ एक ओर विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों में जनता को राहतें दी गईं वहीं पूंजीवादी दायरे में जनवाद का विस्तार भी हुआ।       
          लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में मौजूद अन्तरविरोध के कारण 1960 के दशक के अन्त में फिर से आर्थिक संकट आया और इस बार साम्राज्यवादी देशों ने आर्थिक संकट से मुक्ति के लिए ढ़ाँचागत समायोजनों को आगे बढ़ाया जिसका लव्बे लुआव साम्राज्यवादी/कारपोरेट पूंजी की सुरक्षा व उसके वर्चस्व को और मजबूत करना था। लेकिन साथ ही यह नुस्खा पहले से ज्यादा बड़े आर्थिक संकट के आने के लिए आधार भी मुहैया कराता है।
          समाजवादी मुल्कों में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के चलते अब साम्राज्यवादी मुल्कों के लिए कल्याणकारी राज्यों को खत्म करने व ढांचागत समायोजन को लागू करने के लिए मुफीद परिस्थितियां थी । और फिर 1970 के बाद आये हर आर्थिक संकट के समाधान के रूप में इन ढ़ाँचागत समायोजनों को विभिन्न इलाकों एवं अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों तक विस्तारित किया गया है। चूँकि यह ढ़ाँचागत समायोजन अपनी बारी में साम्राज्यवादी/कारपोरेट पूंजी के वर्चस्व को और मजबूत करता है और इसी के अनुरूप इनका राजनैतिक वर्चस्व भी और मजबूत होता जाता है यानि की जनता के लिए जनवादी स्पेस और सिकुड़ता जाता है । वर्तमान समय में मोटा-मोटी इसकी निम्न अभिव्यक्तियाँ हैं-
1. साम्राज्यवादी पूंजी की तीसरी दुनिया के देषों में बढ़ती दखलन्दाजी-
          इस आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी देशों की तीसरी दुनिया के देशों में दखलन्दाजी और बढ़ी है। इस बढ़ती दखलन्दाजी में तीसरी दुनिया का शासक वर्ग, साम्राज्यवादियों का सहयोगी या जुनियर पार्टनर के रूप में है । यद्यपि अपने देश में वह ही मुख्य भूमिका में है।
          अमेरिकी साम्राज्यवादी, साम्राज्यवादियों का सिरमौर बनकर उसका नेतृत्व कर रहे हैं। साम्राज्यवादियों ने तीसरी दुनिया के देशों के संरचनागत सुधारों को और तेज करने की ओर धकेला है। इन सुधारों ने प्रत्येक देश में जनता के हिस्से से बुनियादी चीजें छीनकर, पूंजपतियों की तिजोरियाँ भरी हैं। पूरी दुनिया में भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, अस्वास्थ्य के बने रहने के लिए यह नीतियाँ मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
          वित्तीय अधिपत्य के साथ-साथ साम्राज्यवादियों का लीबिया, सीरिया, यमन, इराक, अफगानिस्तान, सूडान, सोमालिया, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, माली, कांगों, उक्रेन, जर्जिया इत्यादी के ऊपर सैन्य हस्तक्षेप भी इस या उस रूप में जारी है।
          इसके अलावा साम्राज्यवादी पूंजी तीसरी दुनिया के देशों की प्राकृतिक सम्पदा के अनियंत्रित दोहन में भी लगी हुई है। वे प्राकृतिक सम्पदा को लूटने में पर्यावरण का भी भारी नुकसान कर रहे हैं। जो अपनी बारी में पर्यावरण संकट को पैदा कर रहा है।
2. साम्राज्यवादी, उपभोक्तावादी, पतनषील संस्कृति का कुप्रभाव-  साम्राज्यवादी पतनशील संस्कृति ने अपने काले डैनो से तीसरी दुनिया के देशों में अंधकार फैलाया है। साम्राज्यवादी संस्कृति आम लोगों को आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी, लोभी, अपराधी, नशेड़ी, मानसिक रोगी व हिंसक बना रही है। महिलाओं के इंसान के बतौर वजूद स्वीकारने के बजाय यौन वस्तु में बदल दिया है जिसके चलते  महिलाओं के प्रति यौन हिंसा  बहुत तेजी से बढ़ रही है  आज तीसरी दुनिया के देशों में भी उपभोक्तावाद चरम पर है। लोग भयंकर अलगाव में जी रहे हैं। तकनीक का मुनाफे के लिए इस्तेमाल ने, मानव को तकनीक का गुलाम बना लिया है। अलगाव व दूसरे पर भरोसा न होने के कारण, सामूहिकता पर विश्वास न के बराबर रह गया है और लोग अकेले-अकेले ही समस्याओं से लड़ने के दृष्टिकोण से बंध गये हैं। जिसका ज्यादातर परिणाम असफलता एवं  उसके बाद हताशा-निराशा में ही होता है।
3. दुनिया में धार्मिक कट्टरपंथ का बढ़ना-
          आज पूरी दुनिया में धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ रहा है। इसे बढ़ाने में दुनिया के शासक वर्गों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हाथ है। दुनिया के शासक वर्ग जनता का धर्मनिरपेक्ष नहीं बल्कि धार्मिक आधार पर संकुचित दृष्टिकोण चाहते हैं। इससे जनता पंथों में बंट जाती है और एकजुट होकर संघर्ष नहीं कर पाती। लेकिन दुनिया के शासक वर्गों की इस कुटिल नीति से, आई0 एस0 जैसे कट्टरपंथी संगठन पैदा होते हैं जो जनता का जीवन नारकीय कर देते हैं।
4. फासीवादी व दक्षिणपंथी आन्दोलन का बढ़ता प्रभाव-
          दुनिया के शासक वर्ग अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके तेज आर्थिक सुधार जनता की हालत बदहाल करेंगें। और इस कारण छात्रों, युवाओं, किसानों, मजदूरों इत्यादि के संघर्ष फूटेंगे। इन संघर्षों को भटकाने एवं कुचलने के लिए वे फासीवादी व दक्षिणपंथी पार्टियों-संगठनों को प्रश्रय दे रहे हैं। आर्थिक संकट के समय पूंजीवादी व्यवस्था पर ही अगर संकट उठ खड़ा हो जाता है तो पूंजी अपने अन्तिम विकल्प फासीवाद को आजमा सकती है। इसी कारण दुनिया के कई देशों में घोर दक्षिणपंथी ताकतें या तो सत्ता में आयी हैं या उनका आधार बढ़ रहा है। अनस्लीय, आप्रवासियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा इसकी अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं।
5. राष्ट्रीय मुक्ति संघर्षों का अत्यन्त धीमा पड़ना-
          मजदूर आन्दोलन के पीछे हटने एवं विश्व में सिकुड़ते जनवाद के एक उदाहरण के रूप में राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की बदलती तस्वीर भी है। दुनिया के विभिन्न देशों में चल रहे राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष अब थकने लग गये हैं और क्रान्तिकारी दिशा के अभाव में इनका नेतृत्व देने वाले संगठनों में वह ऊर्जा नहीं रह गई है कि वह इन संघर्षों को आगे बढ़ा सके।
6. राज्य के कामों में जनता की घटती भागीदारी-
          पूंजीवाद में शासन चलाने के सबसे सुभीते के प्रकार पूंजीवादी जनतंत्र में भी जनता को मात्र वोट डालने का अधिकार ही है। कई देशों में सरकारों ने विधायिका की विभिन्न मसलों में भूमिका घटाकर वा यूं कहें प्रशासन के विशेषाधिकारों को बढ़ा कर जनतांत्रिक संस्थाओं के कामों को उन्हें स्थानांतरित किया है। कुछ देशों में वाकायदा टैक्नोक्रेट सरकार ही जनता के ऊपर बिठा दी गई।
7. जन संघर्षों का तीव्र होता दमन-   पूरी दुनिया के अन्दर, जन संघर्षों का दमन तीव्र हुआ है। दुनिया के विभिन्न देशों में कठोर कानूनों को बनाने से लेकर भाँति-भाँति के निगरानी तंत्र खड़े किये जा रहे हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले देशों में आम जनता के प्रदर्शनों पर गोली चलाने की घटनाऐं आम सी हो गई हैं। दुनिया का शासक वर्ग इतना अधिक डरा हुआ है कि वह जनता के शान्तिपूर्ण प्रदर्शनों की भी इजाजत न देकर, उनके मौलिक अधिकारों के दमन पर उतारू है।
8.   प्रायोजित असहमति -   आज अभूतपूर्व तरह से जनता की सहमति ही नहीं बल्कि असहमति को भी मीडिया व अन्य संसाधनों की मदद से गढ़ा जा रहा है। जनता के आक्रोश को बाहर निकलने के लिए पूरी एन0 जी00 परिघटना को शासक वर्गों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। ये एन0 जी00 साम्राज्यवादी देशों व कारपोरेट पूंजी द्वारा संचालित होते हैं और बेहद सूक्ष्म तरह से जनता के आक्रोश को ठंडा करते हुए, जनता के सचेत तत्वों को भी अपने में समाहित करने में सफल रहते हैं। यह राज्य के ऊपर के सामाजिक कामों की जिम्मेदारी को इधर-उधर स्थानान्तरित करने का भ्रम फैलाते हैं।
          समग्र तौर पर देखें तों पूरी दुनिया में विश्व आर्थिक संकट का कम या ज्यादा प्रभाव है। दुनिया के साम्राज्यवादी देश व उनकी समर्थक संस्थाओं ने इससे मुक्ति का रास्ता संरचनागत सुधारों को तेज करने का बताया है। इन संरचनागत सुधारों के कारण जहाँ पूंजीपतियों को और छूटें मिलेंगी और ज्यादा चीजें बाजार के हवाले होंगी, बाजार पर नियंत्रण कम/खत्म होगा, सार्वजनिक उद्यम बेचे जायेंगे, प्राकृतिक संसाधनों का निजी/कारपोरेट पूंजीपतियों द्वारा दोहन तीव्र होगा लेकिन जनता को और ज्यादा पूंजीपरस्त श्रम सुधार, औद्योगिक अधिनियम में सुधार एवं सामाजिक मदों में सब्सिडी की कटौती, बेरोजगारी, समाजिक सुविधाओं का बाजारीकरण ही मिलेगा।
          सरकारों के इन कदमों का व उनके परिणामों के फलस्वरूप पूरी दुनिया की जनता की स्थिति बदहाल हो रही है। इस कारण अलग-अलग देशों की जनता के अलग-अलग समय पर संघर्ष फूटते रहे हैं।
# अमेरिका में हुए आक्यूपाई वाल स्ट्रीट के खात्में के बाद भी छिट-पुट आन्दोलन होते रहे हैं। हाल ही में नस्लीय हिंसा के खिलाफ मजबूत आन्दोलन हुआ था।
#  यूरोप में फ्रांस, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल आदि देशों में जनता ने पूजीवादी सुधारों व यूरोपीय यूनियन की शर्तों के खिलाफ लगातार संघर्ष व विरोध किया है। 
#  तीसरी दुनिया के विभिन्न देशों में, साम्राज्यवादी लूट व शोषण के एवं उनकी अवैध घुसपैठ एवं सैनिक अड्डों के खिलाफ जनता के संघर्ष हुए हैं।
दुनिया के अलग-अलग देशों में शासक वर्गों के जासूसी एवं निगरानी तंत्र व काले कानूनों के खिलाफ जनता आक्रोशित है व कहीं-कहीं उसने इनके खिलाफ प्रदर्शन भी किये हैं ।
#  तीसरी दुनिया के देशों चीन, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, बांग्लादेश आदि में मजदूर-मेहनतकशों के कई संघर्ष हुए हैं।
#  पूंजीवादी आर्थिक सुधारों से हुई बदहाली के अलावा प्रकृति के निर्मम दोहन एवं उसके कारण हुए पर्यावरण संकट के खिलाफ भी दुनिया में संघर्ष हुए हैं।
#   दुनिया के अलग-अलग हिस्सों मसलन बर्मा, थाइलेंड, मलेशिया भारत इन्डोनेशिया आदि आदि मुल्कों में में देशी-विदेशी पूंजीपतियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा एवं वहां से आबादी से जबरन विस्थापन के खिलाफ भी संघर्ष चल रहे हैं।
#   दुनिया में खासकर साम्राज्यवादी देशों में अप्रवासियों/अश्वेतों पर हुई हिंसा के विरोध में जनता ने प्रदर्शन किये हैं।
#   दुनिया में उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की मुक्ति के संघर्ष चल रहे हैं। यद्यपि हाल फिलहाल यह धीमे हैं।
#   हाल के दिनों में छात्रों के कई देशों में जुझारू संघर्ष हुऐ हैं जिसमें मेक्सिको, चिली व फ्रांस के छात्रों के संघर्ष काफी जुझारू रहे।
#  दुनिया के कई देशों में महिलाओं पर हुए अत्याचारों के विरोध में जनता ने अपने विरोध प्रदर्शन किये हैं।
#  दुनिया के कई देशों में धार्मिक नृशंस्तापूर्वक कार्यवाही के खिलाफ भी जनता ने सक्रिय प्रदर्शन किये हैं।
          दुनिया के विभिन्न देशों में चल रहे भाँति-भाँति के संघर्ष यद्यपि अभी काफी निम्न स्तर के हैं, अलग-अलग हैं एवं अलग-अलग मांगों को लेकर हैं एवं मुख्यतः पूंजीवादी दायरे मे ही हैं। लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक संकट गहरायेगा तब संघर्षों में न केवल तेजी आयेगी बल्कि इनकी वैचारिक व सांगठनिक दिशा भी बदलेगी और फिर ये संघर्ष पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होंगे। निश्चय ही यह तभी सम्भव होगा जब परिवर्तनकामी ताकतें मजबूती हासिल कर जनता का अपने पीछे लामबन्द करने में कामयाब हो सकें।
          दुनिया का शासक वर्ग इस बात को जानता है इसीलिए वह ऐसी सरकारों को स्थापित कर रहा है जो दमन की मशीनरी को मजबूत करे और पूंजी के मुनाफे के रास्ते से मौजूद हर बाधा को उखाड़ फेंके। वे जनवादी स्पेस को कम करते हूऐ जनतांत्रिक तरह से चुनी हुई सरकार के बदले ट्रैक्नोक्रेट सरकारों का उपाय भी आजमा रहे हैं।
          इसी के साथ-साथ दुनिया का शासक वर्ग जनता के संघर्षो को भ्रमित करने, बांटने, उसकी वर्गीय एकता को कुन्द करने के लिए धर्म, क्षेत्र, रंग इत्यादि का कार्ड खेलते हुऐ फासीवादी रूझानों, पार्टियों व कट्टरपंथी संगठनों को खड़ा करने में मदद कर रहा हैं। इसी कारण दुनिया में धार्मिक कट्टरपंथ के साथ-साथ दक्षिणपंथी व फासीवादी रूझान बढ़ रहा है एवं आज दुनिया के कई देशों में धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की सरकारें हैं। मतलब साफ है कि दुनिया का शासक वर्ग इस तैयारी में है कि अगर पूंजीवादी आर्थिक संकट के खिलाफ जनता का आन्दोलन खड़ा होकर पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे की ओर बढ़ता है तो इसे फासीवाद की ओर मोड़ा जा सके। इतिहास में वह ऐसा करने में सफल रहा है।
          बार-बार आता पूंजीवादी संकट, उस संकट से बचने के अपनाये जा रहे नीम-हकीमी नुस्खे व इन नुस्खों के कारण जनता की बदहाल होती स्थिति, जनवाद का संकुचन, उसके हनन की तमाम अभिव्यक्तियां इस बात को बता रही हैं कि अब पूंजीवाद समाज को आगे ले जाने में असमर्थ ही नहीं है बल्कि बाधा बन रहा है।कि वह अपने अंर्तनिहित अंर्तविरोधों को हल करने के बजाय उन्हें और तीखा कर रहा है कि वह राज्य के कामों में जनता की भागीदारी बढ़ाने की बजाय कम कर रहा है कि अब वह प्रगतिशील या सुधारवादी तो क्या घोर प्रतिक्रियावादी हो चुका है
   एक व्यवस्था के तौर पर पूंजीवाद असफल हो रहा है, उसका अंत निकट आ रहा है। इसी कारण पूंजीवादी टुकड़खोर बु़द्धिजीवी गाहे बगाहे पूंजीवाद के विकल्पहीन होने, चिरायु होने इत्यादि का ढोल पीट-पीटकर यथार्थ को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं।
          निश्चित ही दुनिया की मेहनतकश जनता क्रांतिकारी संगठनों के नेतृत्व में वर्गीय चेतना से लैस होकर पूंजीवादी व्यवस्था के अंर्तनिहित अंर्तविरोधों को समझते हुए इस बात को भी समझने में सफल होगी कि पूंजीवादी संकट का समाधान स्वंय पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा ही है। और फिर जनता के संघर्षो की विभिन्न धाराएं इकट्ठी होकर महान एवं जुझारू संघर्ष शुरू करेंगी जो पूंजीवाद की जंजीरों को तोड़कर ही दम लेगा।
                                                राष्ट्रीय परिस्थिति
          दुनिया में 2007-08 से शुरू हुये पूंजीवादी आर्थिक संकट से भारत भी अछूता नहीं है। यद्यपि 2007-08 में भारत में इसका शेयर बाजारों पर तो असर पड़ा लेकिन आंतरिक वित्त बाजार किसी गम्भीर संकट का शिकार नहीं हुआ। लेकिन 2011-12 आते-आते विश्व आर्थिक संकट का प्रभाव भारत पर घनीभूत होने लगा। नतीजतन देश की विकास दर गिरने लगी। जहाँ 2008-11 के बीच विकास दर 7.3 थी वह 2012 में 4.7 पर रह गई।
          देश का एकाधिकारी पूंजीपति मनमोहन सरकार से कड़े कदमों की आशा करने लगा। मनमोहन सरकार ने कड़े कदम अर्थात् आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने में थोड़ी लेट-लतीफी व हिचकिचाहट दिखाई, साथ ही 2013 में हुऐ भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन व कांग्रेस के नेताओं के भ्रष्टाचार एवं जनता की समस्याओं को लगभग जस का तस बनाये रखने के कारण कांग्रेस का आधार दरक रहा था। इन कारणों से एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने अन्य विकल्पों की ओर देखा। इस बीच गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सख्त प्रशासक की तरह अपने शासन को चलाते हुए, गुजरात में पूंजी के पक्ष में लगातार व व्यापक फैसले लिये, पूंजीपतियों को विभिन्न क्षेत्रों में छूटें, सहूलियतें दीं, कौड़ी के भाव जमीनें दीं और श्रम कानूनों को धता बताते हुए मजदूर-मेहनतकशों के तीव्र शोषण की नीतियां लागू कीं। इन बातों को ध्यान में रखते हुऐ एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत राजग पर अपना दांव लगाया।
          एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने अभूतपूर्व ढ़ंग से आम चुनाव को पूर्णतया प्रायोजित व नियोजित कर डाला। उन्होंने मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इलेक्ट्रानिक, प्रिन्ट, सोशल मीडिया के साथ-साथ हर संसाधन व हर माध्यम का इस्तेमाल किया।
          चुनाव में मोदी व भाजपा की जीत के लिए एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का वक्ती नापाक गठजोड़ बन गया। गुजरात माडल व नरेन्द्र मोदी के बारे में तमाम मिथक गढ़कर नरेन्द्र मोदी को महानायक की छवी गढ़ी गयी। केवल यह महानायक ही देश की समस्त समस्याओं को हल कर सकता है इसको स्थापित किया गया। इन सबका अन्त भाजपा नीत राजग के प्रबल बहुमत से हुआ और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधान मंत्री बने।
          भारतीय एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए अपने खजाने का मुँह खोलने के साथ-साथ पूरा जोर भी लगा दिया था और अब वे तेजी से आर्थिक सुधार चाहते थे। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें निराश नहीं किया और सत्ता संभालते ही तेजी से कई फैसले लिये। रक्षा, बैंक, बीमा में एफ0 डी0 आई0 का हिस्सा बढ़ाने के साथ-साथ श्रम सुधारों की प्रक्रिया को तेज किया गया। पूंजीपतियों व पूंजी को अन्य कानूनी विनियमों की बाधाओं से मुक्त करने की प्रक्रिया तेज की गई। बचे-खुचे सार्वजनिक उद्योगों का भी औने-पौने दामों पर विनिवेशीकरण, जन कल्याणकारी मदों की सब्सिडी कम करना। कारपोरेट टैक्स में कमी तो वैल्थ टैक्स का खात्मा एवं जनता के ऊपर अप्रत्यक्ष करों को बढ़ाना इत्यादि कदम उठाये।
          नरेन्द्र मोदी सरकार ने पूंजीपतियों के हितों की पूर्ति के लिये संप्रग सरकार द्वारा 2013 में लागू भूमि अधिग्रहण कानून में तमाम संशोधन करते हुएं अध्यादेश जारी किया। यहाँ यह गौरतलब है कि संप्रग सरकार द्वारा 2013 में बने कानून ने ब्रिटिश कालीन भुमि अधिग्रहण कानून 1894 को स्थानापन्न किया था। 1894 का यह काला कानून राज्य के हाथों खुले आम किसानों व आदिवासियों की भूमि पर डाकेजनी का दस्तावेज था। आजादी के बाद भी यह कानून लगभग जस का तस लागू रहा एवं राज्य द्वारा लाखों हेक्टेयर भूमि किसानों, आदिवासियों से अधिग्रहित की गई।
          इस कानून के खिलाफ होने वाले प्रतिरोधों व संघर्षों के कारण एवं खुद को किसानों का रहनुमा साबित करने के लिए जिससे 2014 के लोकसभा चुनावों में उनका वोट मिल जायें, मनमोहन सरकार ने इसकी जगह, 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून लागू किया। जिसमें किसानों, आदिवासियों, दलितों व उन जमीनों पर आश्रित लोगों के लिए कुछ राहतें/सहुलियतें थीं। लेकिन देश का पूंजीपति इन नाममात्र की राहतों से भी नाखुश था और उसने इस कानून के कई प्रावधानों में संशोधन की बात कही थी। उन्हीं संशोधनों की रोशनी में वर्तमान सरकार ने 31 दिसम्बर 2014 को उक्त कानून खत्म कर नया अध्यादेश जारी किया। तब से संसद में पास न हो पाने के कारण इस अध्यादेश की अवधि कई बार बढ़ाई गयी । इस अध्यादेश में जनता को मिली नाममात्र की राहतें भी छीन ली गई ।
          लोकसभा चुनावों में प्रबल बहुमत के बावजूद भाजपा लगभग 31 प्रतिशत व एन0 डी00 37 प्रतिशत वोट ही प्राप्त कर पाये। वामदल व क्षेत्रीय पार्टियों -आम आदमी पार्टी, सपा, डी0 एम0 के0, 0आई0डी0एम0के0, तृणमूल कांग्रेस, जदयू इत्यादि का प्रभाव मौजूद है। लेकिन देश में तेज होते आर्थिक सुधारों पर इन सभी पार्टियों की खामोशी यह बता रही है कि सभी पार्टियां नव-उदारवाद की समर्थक हैं।
          कांग्रेस पार्टी जो कि भ्रष्टाचार, जनता की समस्याओं को न सुलटा पाने के कारण 2014 के लोकसभा चुनावों में मुंह की खा चुकी है अपने चरित्र के अनुरूप पूजीपतियों की सेवा में तल्लीन है। उसके युवराज गाहे बगाहे कुछ लोकप्रिय बाते कहकर ही जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री मान ले रहे हैं और बाकी बची पार्टी उसी का गुणगान करती रहती है।
          दलित बुर्जुआ की पार्टी बसपा पिछले चुनावों में वोटों की संख्या के हिसाब से तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही। लेकिन यह पार्टी दलित उत्पीड़न के ही मुद्दे पर सक्रिय प्रतिरोध/संघर्ष करने के बजाय मात्र बयानवाजी तक ही सीमित है। दलितों की अस्मिता के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी दलित बुर्जुआ की ही अस्मिता के लिए काम कर रही है।
          संसदीय वामपंथी पार्टियां भी आर्थिक सुधारों का कोई ठोस जमीनी विरोध नहीं कर रही हैं बल्कि वे भी जुबानी खर्च से काम चला रहे हैं। आज भी बड़ी-बड़ी ट्रेड यूनियनें व अन्य संगठन रखने वाली ये पार्टियां जनता को वैज्ञानिक चेतना पर नहीं बल्कि अर्थवाद का सुधारवाद पर खड़ा कर रही हैं। चुनावों में फासीवादी विरोध के नाम पर कभी कांग्रेस तो कभी क्षेत्रीय दलों से गठबंधन बनाना इनके वैचारिक दिवालियेपन व जनता के आन्दोलन में विश्वास न होने का ही द्योतक है।
          भ्रष्टाचार के खात्में, लोकपाल बनाने इत्यादि मुद्दों पर आन्दोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में आई है। लगभग एक साल की अवधि के अपने शासन में आपने अपने कामों/ प्राथमिकताओं से साफ कर दिया है कि वह भी अन्य पार्टियों जितनी ही पूंजीपरस्त है। उसके अन्दर आपसी लड़ाई अन्य पूंजीवादी संसदीय पार्टियों सरीखी है।
          भाजपा के खिलाफ इकट्ठे हुऐ जनता परिवार जिसमें मुलायम, नितीश, लालू जैसे दिग्गज हैं का काम चुनावों में ज्यादा से ज्यादा सीटों को प्राप्त करना है भाजपा द्वारा लागू की गयी नीतियों का विरोध। नहीं/क्योंकि अपने द्वारा शासित राज्यों में वे इन्हीं नीतियों को लागू करवाते हैं जनता परिवार कितना ही सेक्युलर होने का दम भरले लेकिन यह साम्प्रदायिकता के खिलाफ कोई निर्णायक लड़ाई नहीं लड़ सकते क्योंकि यह भी नरम साम्प्रदायिकता या अल्पसंख्यकों के भयादोहन की ही राजनीति कर रहे हैं। अन्य क्षेत्रीय दलों में , 0आई0डी0एम0के0, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल इत्यादि पूंजीवादी सुधारों को अपने यहाँ लागू कर ही रहे हैं। हाँ वे जनाधार न खिसके इस कारण बीच-बीच में विरोध का प्रहसन जरूर करते रहते हैं।
          देश के अन्दर आक्रामक पूंजीपरस्त आर्थिक सुधार करने के साथ-साथ भारतीय शासक वर्ग दुनिया में अपनी ताकत बढ़ाने के लिए व्याकुल हैं। क्षेत्रीय बड़ी शक्ति होने के कारण अपने पड़ोसियों पर हमेशा सवारी करने की ताक में रहता है। यह अफगानिस्तान, श्रीलंका , बर्मा, थाईलैण्ड, नेपाल, भूटान में हर संभव तरह से पैठ बढ़ा रहा है। हाल ही मंे नेपाल में आये भूकम्प के दौरान सहायता के साथ-साथ भी इसने अपनी बड़े भाई की छवि को दिखाने का प्रयास किया ।                                                                                                विस्तारवादी चरित्र के कारण भारतीय शासक वर्ग के अपने पड़ोसियों से खराब रिस्ते हैं। खासकर पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते बेहद खटास पूर्ण हैं। नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद स्थिति और बिगड़ी है। दोनों देशों के शासक वर्ग कश्मीर, आतंकवाद, घुसपैठ इत्यादि को लेकर अंध राष्ट्रवादी गुर्देगुबार खड़ा करते रहते हैं लेकिन वहीं दोनों  के  बीच व्यापारिक समझौतों के तहत व्यापार बदस्तूर जारी है। पड़ोसी देशों में भी प्रभाव बढ़ाने के साथ-साथ भारतीय शासक वर्ग अफ्रीकी देशों में भी अपना प्रभाव बड़ा रहा है। वहाँ उद्योग धन्धें, जमीन खरीद इत्यादि के द्वारा पूंजी निवेश करके इस क्षेत्र के दोहन/शोषण में साम्राज्यवादियों का साझीदार बना हुआ है।
           हाल के वर्षों में भारतीय शासक वर्ग ने अमेरिकी साम्राज्यवाद से निकटता बढाई है। इस कारण इसकी विदेश नीति पर इन दिनों अमेरिकी प्रभाव है। लेकिन साथ ही अपने सभी विकल्प खुले रखते हुऐ यह यूरोपीय व रूसी साम्राज्यवादियों से भी रिश्ते बनाकर रखता है। यही नहीं रूस, चीन, ब्राजील इत्यादि के साथ ‘‘ब्रिक्स’’ समूह की स्थापना करने के बाद ब्रिक्स बैंक की स्थापना में भी लगा हुआ है।
           इसके साथ-साथ भारत जी-20 में भी शामिल होकर दुनिया के दोहन/शोषण को संचालित/नियंत्रित करने में भागीदार है और पिछले साल नवम्बर 2014 में आर्थिक संकट व पर्यावरण संकट के एजेण्डे पर हुई बैठक में इन संकटों से उबरने के नीम हकीमी-नुस्खे बनाने में शामिल रहा है।
          मोदी या मोदी सरकार के पास अपना ऐसी कोई निजी नुस्खा नहीं है जो कि देश की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आये। जिसे मोदीनामिक्सकह कर प्रचार किया गया है वह पी चिदम्बरम, मन मोहन सिंह से भिन्न नहीं है यह मिल्टन फ्रीडमेन व फ्रेडरिक आगस्ट हायेक जैसे अर्थशास्त्रियों का ही नुस्खा है । ग्रीस आदि जैसे मुल्कों में इसे कटौति कार्यक्रमकह कर लागू किया जा रहा है। इस नुस्खे यानी मोदीनामिक्स का मतलब है --- सामाजिक मद में व्यय होने वाले बजट के हिस्से में भारी कटौति कर इसे पूंजीपतियों पर लुटानापूंजी निवेश के लिए पूंजी जुटाने के लिए हर जतन करनाआम जनता की जेबों से पैसा खींचने वाली स्कीमें बनाना , पूंजी निवेश के राह में रुकावट बन रहे  श्रम कानूनों , पर्यावरण कानूनों, जनवादी अधिकारों आदि को खत्म कर देना। इस मोदीनामिक्स का हाल ये है कि साल भर से ज्यादा हो चुकने के बावजूद अर्थव्यवस्था सुधरने का नाम नहीं ले रही।
          मोदी सरकार द्वारा तमाम पूंजी समर्थक व जन विरोधी कदम उठाने के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में कोई मजबूत संकेत नहीं मिल रहे है। सकल घरेलू उत्पाद की दर बढ़ने के बजाए गिरी हैं। हालत यह है कि फैक्ट्रियां अपनी उत्पादन क्षमता के नीचे उत्पादन कर रही हैं फिर भी माल, बाजार की क्रयशक्ति के मुकाबले ज्यादा हो रहा है। देश का औद्योगिक उत्पादन ही नहीं बल्कि निर्यात भी गिर गया है। निर्यात मूलक औद्योगिक ईकाईयां भारी संकट में है । ऐसे में गिरता रूपया भी उनका निर्यात बढ़ानें में मददगार साबित नहीं हो पा रहा है। तमाम क्षेत्रों में विदेशी निवेश को खोलने एवं तरह-तरह की छूटें व सुविधाऐं देने की घोषणा के बावजूद विदेशी पूंजी का निवेश काफी कम है। अर्थव्यवस्था के तीनों ही क्षेत्र कृषि, उद्योग व सेवा खस्ताहाल हो रहे हैं। ऐसे में सरकार ने आकड़ों में तब्दीली कर 4.5 प्रतिशत की विकास दर को 7 प्रतिशत तक पहुँचा कर अपनी पीठ ठोकना शुरू कर दिया। इस तथ्य पर जनता तो क्या पूंजीपतियों को भी विश्वास नहीं हुआ और उनकी संस्था ने भी 7 प्रतिशत की विकास दर पर संदेह जाहिर किया।
          कुल मिलाकर मोदी सरकार के आने के बाद भी अर्थव्यवस्था का संकट जस का तस है इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। हाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था से एकाकार जरूर बढ़ा है और यह अपनी बारी में संकट गहराने पर देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सि़द्ध होगा।
          मोदी के सत्तारोहण में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के साथ-साथ हिन्दू फासीवादी संगठन आर0एस0एस0 की केन्द्रीय भूमिका थी। संघ ने मोदी को चुनाव जिताने के लिए जमीनी मेहनत व नेटवर्क के जरिए सामाजिक आधार तैयार किया था। साथ ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण व जातीय समीकरण बैठाने में योगदान दिया था।
          एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग व हिन्दू फासिस्ट संगठन मोदी को सत्तारूढ़ कराने के लिए जहाँ फौरी तौर पर एक थे वहीं उनके अलग-अलग हित व अलग-अलग चाहतें थी। जहाँ एक ओर तेजी से आर्थिक सुधार एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की चाहत थी वही भारतीय समाज का तेजी से हिन्दुत्वकरण संघ की चाहत थी।
          मोदी के सत्तासीन होने के साथ ही संघ ने अपनी इस चाहत को आक्रामक तरह से अंजाम देना शुरू कर दिया है । आज हिन्दू फासीवादी आन्दोलन देश में अब तक की सबसे मजबूत स्थिति में है। आज ये सांप्रदायिक फासीवादी ताकतें क्या खायें,क्या पियें, क्या पहनें, कैसे जिये यहाँ तक की कैसे सोचें  तक को निर्धारित करने की कोशिशें  कर रही हैं। धार्मिक अंधविश्वास व कट्टरपंथ के खिलाफ बात करने वालों को धमकी ही नहीं बल्कि गोली मारने का उदाहरण नरेन्द्र दाभोलकर के रूप में हमारे सामने है। लेखकों की किताबों या उनके अंशों पर प्रतिबन्ध लगाने से लेकर, फिल्मों, चित्रों इत्यादि पर प्रतिबन्ध लगबाने की बातें हो रही हैं। कई तरह से अभिव्यक्ति की आजादी पर खुला हमला हो रहा है और केन्द्र सरकार मूकदर्शक बनकर इसे प्रश्रय दे रही है।
          भारतीय उप महाद्वीप की जनता को अंग्रेजों के जमाने से ही धार्मिक कट्टरपंथ-साम्प्रदायिकता का दंश झेलना पड़ा। यद्यपि दुनिया के अन्य देशों की जनता की तरह भारत की मेहनतकश जनता ने भी धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ संघर्ष चलाया । उन्होंने धर्म की जकड़बंदी को तोड़ा, एवं उसकी सीमायें लांघते समय, सभी धर्मों, जातियों के लोगों ने देश की आजादी व जनवाद विस्तार के लिए संघर्ष किया। लेकिन यहाँ के जनमानस को शासक वर्गीय नीतियों व महत्वाकांक्षा के कारण आजादी के समय ही धर्म के आधार पर विभाजन झेलना पड़ा मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन सांप्रदायिक हिंसा व धार्मिक कट्टरपंथ से हुआ है
          आजादी के इतने साल बाद भी पाकिस्तान व बांग्लादेश धार्मिक कट्टरपंथ की आग में झुलस रहे हैं और वहाँ लोगों की जिन्दगी बदहाल है। भारत में भी आजादी के बाद समय-समय पर हुऐ साम्प्रदायिक दंगों/ झड़पों से न जाने कितने घरों के चिराग उजड़ गये। मोदी सरकार के आने के बाद साम्प्रदायिक तनाव और बढ़ रहा है। देश के सार्वजनिक जीवन में धर्म की घुसपैठ को व्यापक करने की कोशिशें बढ़ रही हैं।       संविधान को धता बताते हुये देश को हिन्दू राष्ट्रबनाने की घोषणायें/कोशिशें हो रही  हैं।लवजिहादजैसी फर्जी अफवाहों व गौ हत्याइत्यादि मुद्दों से जनता को कट्टरपंथ पर खड़ा करने की कोशिशें हो रही हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों को बार-बार अपनी देशभक्ति साबित करने की या देश छोड़ने की धमकी दी जा रही है। देश में साम्प्रदायिक दंगों व झड़पों को सुनियोजित तरीके से भड़काने की घटनायें भी हो रही हैं। इन सब चीजों ने देश में धार्मिक विद्वेष का माहौल बना दिया है जिससे विभिन्न धर्मों के बीच की दीवारों को अभूतपूर्व ढंग से चैड़ा कर दिया गया है। इसी के साथ इसकी प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता भी पैर पसार रही है  यह सब देश में एक मजबूत फासीवादी आन्दोलन की उपस्थिति को दर्शा रहा है।
          मोदी सरकार जिस तेजी से आर्थिक सुधारों को लागू कर रही है व जिस संगठित व आक्रामक तरीकों से संघ परिवार व उसके सहयोगी संगठन साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण व दंगों का कुचक्र रच रहे हैं। उतने ही योजनाबद्ध तरीके से शिक्षा, संस्कृति, मीडिया, विज्ञान व अकादमिक दुनिया के भगवाकरण की मुहिम जारी है। विश्व विज्ञान कांग्रेस में प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी व क्लोन जैसी तकनीक की मौजूदगी को बताकर  विश्वास  अंधविश्वास व पोंगापंथ को, सच व यथार्थ में बदलने की असफल कोशिश की गयी थी। कला, संस्कृति की विभिन्न संस्थाओं और शिक्षा परिसरों का रहा सहा जनवादी स्पेस भी कम होता जा रहा है। भाजपा शासित राज्यों में स्कूलों में गीता पाठ, सरस्वती वंदना को रोजमर्रा का हिस्सा बनाया गया है। योग व सूर्य नमस्कार जैसी चीजों को इस या उस तरह से पूरे देश पर थोपने का उपक्रम चल रहा है। और इन चीजों को न करने पर देश छोड़ने का फरमान सुनाया जा रहा है।
          भाजपा शासित राज्यों के विश्वविद्यालयों में तमाम संघी सोच बाले कुलपतियों को बैठाने के बाद केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भाजपा समर्थित लोगों को बैठाने की कोशिशें हो रही हैं। आई.आई.टी., आई.सी.एच.आर., आई.सी.सी.आर. आदि के भगवाकरण के बाद अब एन.सी.ई.आर.टी. और एन.वी.टी.पर भी कब्जा जमाने की साजिशें चल रही हैं। सी.बी.एस.ई. की किताबों को भी फिरसे लिखने की तैयारियां हो रही हैं। पूरे इतिहास को साम्प्रदायिक जामा पहनाने की कोशिशें की जा रही हैं। संघी फासिस्टों ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त भारतीय फिल्म और टेलीवीजन संस्थान पूणे (एफ.टी.आई.आई.) को भी नहीं बख्शा। महाभारत में युधिष्ठिर की भूमिका के अलावा हिन्दी की कई सी ग्रेड व साफ्ट पोर्न फिल्मों में भूमिका निभाने वाले तथा टी.वी. चैनलों पर हनुमान जी का रक्षा कवच बेचने वाले, भाजपा के कार्यकर्ता एवं चुनाव प्रचारक गजेन्द्र चैहान को संस्थान का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है। सेन्सर बोर्ड, बालचित्र विकास निगम आदि संस्थाओं पर भी संघ के विश्वसनीय लोंगों को बिठाया जा चुका है।
          संघी फासिस्टों की यह तमाम कार्यवाहियां इस सच को साबित करती हैं कि सभी तरह के फासिस्ट जितनी बर्बरता के साथ धार्मिक, अल्पसंख्यकों, मजदूरों, महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं उतनी ही घृणा के साथ वे विज्ञान, इतिहासबोध कला और संस्कृति की दुनिया पर भी हमला बोलते हैं। वे सामाजिक ताने-बाने और जनमानस में जनवाद व तर्क की जमीन को नष्ट करने के लिए हर तरह के प्रयत्न करते हैं।
          भारतीय शासक वर्ग ने जनवादी संस्थाओं के फासीवादीकरण की ओर तेजी से कदम बढ़ाये हैं। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संस्थाओं का केन्द्रीकरण भी बढ़ा है। योजना आयोग को खत्म करने के साथ के देश में बड़े फैसले लेने को पी.एम.ओ. के मातहत कर दिया गया है। यही नहीं, पी.एम.ओ. अपने राज्य स्तरीय कई कामों को भी सरकार के चुने हुये नुमाइन्दों (मंत्रीमण्डलीय) के द्वारा न कराकर सचिवालय के द्वारा संपन्न करा रहा है। नौकरशाही के विशेषाधिकारों को बढ़ाकर कार्यों को जनतान्त्रिक संस्थाओं/पदों से नौकरशाही को स्थानान्तरति करने का रूझान बढ़ रहा है।
          सारे पूंजीवादी कोलाहल में समानता ( राजनीतिक, आर्थिक सामाजिक ) का प्रश्न गायब किया जा रहा है । अधिकार का प्रश्न खैराती नुस्खों के हो हल्ले से ढक दिया गया है । जीविका का सवाल ,सामाजिक भागीदारी के प्रश्नरोजगार की जगह बेगारी ठेका प्रथा, आउटसोर्सिंग के नुस्खों से बेमानी किए जा रहे हैं न्याय का बुनियादी सवाल काले कानूनों के जंगल में लापता होता जा रहा  है सरकारी लाठी गोली पाबंदी से भी निजी गुंडा वाहिनियाँ व बाउंसरों का गैर कानूनी उपयोग बिना रोक टोक चलन बढ़ रहा है जनता की सम्प्रभुता की जगह पूंजी का दखल हावी होता जा तहा है । राज्य नागरिकों के स्वास्थ्य शिक्षा परिवहन की जिम्मेदारी उठाने से इंकार कर रहा है ।
          देश की जनता को आधा-अधूरा जनवाद, जनता के संघर्षों द्वारा व पूंजी की जरूरत के हिसाब से मिला था। उसको भी विभिन्न तौर तरीकों से सीमित/संकुचित किया जा रहा है। जनता की भागीदारी को मात्र वोट देने तक ही सीमित करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था में जनता की राय को भी सांस्कृतिक मुद्दों, उग्रराष्ट्रवाद इत्यादि के द्वारा प्रभावित किया जा रहा है। बाज दफे मुसलमानों को आतंकवादी की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यह कहा जा रहा है कि हर आतंकवादी मुसलमान होता है भले ही हर मुसलमान आतंकी न हो। ऐसा कहकर सरकार जनता में यह बात स्थापित कर रही है कि आतंकवाद को कुचलने के लिए और कानूनों की आवश्यकता है ताकि इन काले कानूनों की मदद से जनता की जायज माँगों के लिए होने वाले आन्दोलनों/संघर्षों को कुचला जा सके।
          तेजी से होते पूंजी समर्थक आर्थिक सुधारों के कारण आम जनता की स्थिति खराब हो रही है। बेरोजगारी, भुखमरी बढ़ रही है। आज देश का हर तीसरा नौजवान काम की तलाश में मारा-मारा घूम रहा है। भुखमरी का आलम यह है कि दुनिया का हर चौथा भूखा हमारे देश में है। खेती की स्थिति भी खराब है। मोदी सरकार के आने के बाद किसानों का खेती से पलायन और तेजी से व आत्महत्याओं की तादाद भी बढ़ी है। सरकार की चिंता किसान नहीं भूमि अधिग्रहण है। देश के हर प्रदेश में मजदूरों के बरक्स पूंजी की तरफदारी जारी है। श्रम कानूनों में तेजी से हो रहे परिवर्तन मजदूरों की स्थिति बद से बदहाल ही करेंगे।
          समाज में महिलाओं का उत्पीड़न बदस्तूर जारी है। छेड़छाड़ व यौन हिंसा की स्थिति भयाबह है। कार्यस्थल से लेकर घर तक में महिलायें असुरक्षित हैं। यहाँ तक की गर्भ में भी कन्या शिशुओं को मारने की घटनाएं जारी है। आज भी देश में दलित- आदिवासियों का व कुछ हद तक पिछड़ों के खिलाफ भी अत्याचार, हिंसा, उत्पीड़न जारी है। दलित आदिवासियों के उत्पीनड़न की खबरें आम हैं और बाज दफे पिछड़ी जातियों के बाहुबली भी इनके उत्पीड़न में लिप्त हैं।
          बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति ने लोगों में खुदगर्जी, निजता को घनीभूत किया है। लोग भीड़ में भी अकेले हैं। आपसी प्यार, भरोसा, त्याग के बदले घृणा, ईष्र्या व खुदगर्जी बढ़ रही है। मूल्यों पर टिकी नैतिकता का स्थान पैसों पर टिकी नैतिकता ने ले लिया है। सरकार द्वारा हर किसी को शक की नजर से देखने की चेतावनी व विज्ञापनों ने लोगों के आपसी सम्बन्धों के भरोसे को तार-तार कर दिया है। बेहद अकेला व किसी पर भरोसा न करने वाले व्यक्तित्व के कारण समाज में कुंठा व हताशा पसर रही है जिसका परिणाम, हिंसा, आत्महत्याएं व समाज में संवेदनहीनता का बढ़ना ही है।
          कुल मिलाकर भारतीय समाज चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है। ‘‘अच्छे दिनों’’ का वादा करने वाली नई सरकार सिर्फ पूंजीपतियों के लिए अच्छे दिन लायी है। आम जनता के हिस्से में, बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, श्रम की लूट, व उत्पीड़न ही है। हाँ कल्याणकारी मदों जैसे शिक्षा, चिकित्सा, ग्रामीण व शहरी विकास इत्यादि से सब्सिडी जरूर कम हुई हैं साथ ही उसे धर्म के आधार पर कटुता में बढ़ोत्तरी ही मिली है।
          अपनी परेशानियों व संकटों को हल करने के लिए जनता विभिन्न जगह संघरर्षों  में उतर रही है। पिछले समय में मजदूरों के कई संघर्ष हुऐ हैं जिनमें गुड़गांव व तमिलनाडु व देश के अन्य हिस्सों में आटो सेक्टर के मजदूरों के संघर्ष  प्रमुख रहे। इन संघर्षों में मजदूरों ने श्रम की लूट के खिलाफ संघर्ष किया है। वहीं कृषि की बदहाल स्थिति में कोढ़ में खाज का काम भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने किया है। आज विभिन्न जगहों पर किसान भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत हैं। भूमि अधिग्रहण पर अध्यादेश के विरोध में व्यापक संघर्ष के दबाव से अंतत: मोदी सरकार को अध्यादेश वापिस लेना पड़ा है हालांकि धूर्तता से सरकार ने इसे राज्य सरकारों के हवाले कर उन्हें अपने हिसाब से लागू करने का अधिकार दिया है ।
          पूंजीवादी शासकों की तिकड़मी चाल से नये तरह के बंधुआ मजदूर, आंगनबाड़ी कार्यकत्री, भोजन माताएं, आशा बहनें, रोजगार सेवक, शिक्षामित्र इत्यादि बनाये गये। ये सब भी संगठित हो अपनी बेहतरी के लिए संघर्ष में उतरते रहते हैं।
          बैंक, बीमा, इत्यादि में बढ़ते एफ0डी0आई0 के खिलाफ व अपने वेतन/भत्तों के लिए इनके कर्मचारी संघर्षरत है। मोदी सरकार के तेज श्रम सुधारों व ट्रेड यूनियन सुधारों के विरोध में 2 सितंबर 15 को हुई व्यापक हड़ताल हुई । इसके अलावा शहरी मध्यम वर्ग व निम्न मध्यम वर्ग भी बिजली, पानी, सड़क इत्यादि सुविधाओं को लेकर इस या उस स्तर के संघर्ष में उतर रहा है।
          हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार व नारी उत्पीड़न के विषय पर समाज का युवा वर्ग कुछ हरकत में आया है। मोदी सरकार द्वारा शिक्षा-मीडिया, कला संस्कृति, अकादमी, व विज्ञान इत्यादि के भगवाकरण व गैर तार्किक नजरिये को स्थापित करने के खिलाफ भी इंसाफ पसन्द, सेक्युलर व प्रगतिशील जन संघर्षरत हैं।
          देश में जारी जाति उत्पीड़न, क्षेत्रीय आन्दोलन के खिलाफ भी जनता किसी न किसी स्तर पर प्रतिरोध करती रही है। इन्हीं सबके साथ-साथ भारतीय राज्य द्वारा शोषित व दोहित उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष भी चल रहे हैं। इन उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की लड़ाई यद्यपि आज धीमी है लेकिन आने वाले समय में मजदूर-मेहनतकशों के आन्दोलन से इसमें तेजी आने की सम्भावना बनती है। तेलंगाना राज्य का गठन, त्रिपुरा में अफस्पा का हटना व कश्मीर की जनता का भारतीय राज्य से संघर्ष इसी की अभिव्यक्तियां हैं।
            भारत में उठ रहे यह भाँति-भाँति के संघर्ष मुख्यतः नव उदारवादी नीतियों की तबाही से पैदा हुऐ हैं। यह संघर्ष पूंजीवादी शासकों की बढ़ती लूट, शोषण व अत्याचार के खिलाफ हैं।
          जनता के यह संघर्ष यद्यपि अलग-अलग व छोटे हैं  तथा वैचारिक विभ्रम का शिकार हैं लेकिन फिर भी यह इस बात को दिखा रहे हैं कि अब मजदूर-मेहनतकशों के पीछे हटने का दौर खत्म हो रहा है। अब मजदूर-मेहनतकश प्रतिरोध के लिए खड़े हो रहे हैं वह अपनी निराशा को तोड़ लड़ने की मनोदशा में आ रहे हैं वह पूंजीवादी शोषण व लूट से मुक्ति की दिशा तलाश रहे हैं। वह एकताबद्ध होकर सटीक दिशा तलाश कर पूंजीवादी चैखटे को तोड़ सकते हैं और एक झटके से अन्याय, शोषण व लूट से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यदि वह ऐसा करने में असफल रहे तो पूंजीवादी-आर्थिक संकट के चरम पर इस बात की भी सम्भावना है कि पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के खिलाफ असन्तोष को फासीवादी शक्तियां लामबन्द कर लें  और देश पर फासीवाद थोपकर रहे सहे जनवाद का भी अपहरण कर ले।
          दोस्तो, आज देश व दुनिया के ये गंभीर होते जाते हालात हमारे सामने बड़ी चुनौति बनते हैं। देश के भीतर कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए ढांचागत समायोजन को फासीवादी ताकतों द्वारा ज्यादा आक्रामकता से लागू किया जा रहा है जिस कारण न केवल देश की संप्रभुता पहले से और ज्यादा कमजोर हुई है बल्कि जनता को हासिल सीमित जनवाद को भी भांति भांति से कमजोर किया जा रहा है छीना जा रहा है । इन फासीवादी ताकतों द्वारा जनवादी चेतना व सोच को लगातार कुंद किया जा रहा है । इन स्थितियों में जनवादी संगठन के बतौर हमारा दायित्व बनाता है की हम जनता में जनवाद व जनवादी अधिकारों को कमजोर करने व खत्म करने के शासकों के हर प्रयास और फासीवादिकरण की दिशा में उठाए जाने वाले हर कदम को बेनकाब करते हुए इसके विरोध में मेहनतकश नागरिकों को एकजुट करें । और जनता की न्यायपूर्ण संघर्षों का समर्थन करें व इनमें शिरकत करें ।                                                                                                                                                             
                                                                   क्रान्तिकारी लोक अधिकार संगठन
         




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