Friday, 30 October 2015


                                                                शर्मनाक ! मगर ये हमारे दौर का सच है ।
       अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाने वाले मोदी व उनकी सरकार उनके पीछे काम कर रही ताक़तें जिस मकसद से सत्ता पर आई हैं उस एजेंडे पर वह काम कर रही हैं । उस एजेंडे पर जितनी तेजी से वह आगे बढ़ जाना चाहते हैं उस पर भांति भांति के अवरोध हैं इसलिए वह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं ।
                एकाधिकारी पूँजीपतियों की सेवा में नतमस्तक मोदी , मोदी सरकार  व संघ परिवार उनके अच्छे दिनों के लिए समाज का फासीवादीकरण लगातार कर रही हैं ।
                मोदी, भाजपा व संघ परिवार को देश का मतलब एकाधिकारी पूंजीपति के अलावा कुछ नहीं हैं । आज़ादी से पहले भी उनका कोई इतिहास खंगाले तो साफ हो जाएगा जिसका नतीजा आज उनके लिए यही है कि उनके पास अपना कोई नेता नहीं हैं । वह क्रांतिकारियो पर या  सुभाष , पटेल जैसे कांग्रेसी नेता को कब्जाने की कोशिश करते हैं।
                एक दौर में ब्रिटिश पूँजीपतियों व भारतीय सामंतों जमींदारों के लिए काम करने वाले आज अंबानी,अदानी टाटा जैसे इजारेदार पूँजीपतियों की सेवा में तल्लीन हैं ।
                आर्थिक सुधारों के जिस एजंडे को यह झटके से आगे बढ़ाना चाहते हैं इसमें यह मुंह की खा रहे हैं । एक तरफ खुद शासक वर्ग के बीच से दूसरी तरफ जनता के अलग अलग हिस्सों की ओर से तेज सुधारों के विरोध में आवाज उठ रही हैं ।
                दूसरी तरफ इन एक सालों में मोदी व मोदी सरकार बेनकाब भी हुई हैं । दिल्ली के चुनाव में 3- 4 सीट तक सीमटने वाली मोदी सरकार- मोदी-अमित शाह व संघ परिवार के मुंह पर यह एक करारा तमाचा था । यह अलग बात है कि यह तमाचा किसी क्रांतिकारी विकल्प की ओर से नहीं बल्कि खुद शासकों की ही अपनी पार्टी की ओर से मिला था ।
                अब बिहार चुनाव का दर चल रहा है । मोदी संघ की जुगलबंदी ने फिर से इन दिनों सांप्रदायिक एजंडे  को तेजी से आगे बढ़ाया है । यह वैसे भी उनकी जरूरत हैं और बिहार विधान सभा के चुनाव तथा फिर 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव इन दोनों के मद्देनजर यह विकास व सांप्रदायिकता की खिचड़ी उबल रही हैं । और इससे भी ज्यादा यह आज के दौर के लम्पट अंबानी अदानी जैसे कॉर्पोरेट घरनों  की जरूरत है । इससे भी आगे बढ़कर यह आज के दौर के संकटग्रस्त पूंजीवाद की जरूरत है ।
                इसी जरूरत को संघ – भाजपा कभी आगे बढ़ते हुए  तो कभी पीछे हटाते हुए पूरी कर रहे हैं ।
                ना तो संघ को  ना ही मोदी को ना ही भाजपा को गाय से विशेष मोहबब्त हैं , ना ही देश की मेहनतकश आबादी से । ना ही उन्हें देश से प्यार है यदि देश का मतलब  बहुसंख्यक मेहनतकश जनता से है।  उनके लिए सब कुछ कॉर्पोरेट घराने हैं । देश का पूंजीपति है । पूंजीवादी व्यवस्था है ।
                 लव जिहाद के बाद आजकल ये बीफ या गौमांस के जरिये यही काम कर रहे हैं । अखलाक की मौत के लिए जिम्मेदार भी यही लोग हैं । दादरी में अखलाक बाद मेनपुरी व अन्य जगहों पर भी यही घटनाएँ हो चुकी हैं ।
                देश में इस असहिष्णु सांप्रदायिक  माहौल के खिलाफ जो विरोध के स्वर फूट हैं । उनका स्वरूप जैसा भी हो लेकिन चूंकी वह सत्ता पर बैठी हुई  फासिस्ट ताकतों के खिलाफ है ।  इसलिए संघी ताक़तें इसको हर तरह से नल्लीफ़ाई करने में लगी हुई हैं ।
                यानी अब विरोध का स्वरूप क्या हो,? कितना हो ?, किस मुसद्दे पर हो ? किस समय हो व  कहाँ हो  यह भी मोदी व संघ परिवार तय करेंगे व उनकी पसंदगी वाला विरोध विरोध होगा जबकि नापसंदगी वाला विरोध विरोध नही होगा । 
               
                 
           



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