शर्मनाक ! मगर ये हमारे दौर का सच है ।
अच्छे
दिनों का ख्वाब दिखाने वाले मोदी व उनकी सरकार उनके पीछे काम कर रही ताक़तें जिस मकसद
से सत्ता पर आई हैं उस एजेंडे पर वह काम कर रही हैं । उस एजेंडे पर जितनी तेजी से
वह आगे बढ़ जाना चाहते हैं उस पर भांति भांति के अवरोध हैं इसलिए वह आगे नहीं बढ़ पा
रहे हैं ।
एकाधिकारी पूँजीपतियों की सेवा
में नतमस्तक मोदी , मोदी सरकार व संघ परिवार उनके
अच्छे दिनों के लिए समाज का फासीवादीकरण लगातार कर रही हैं ।
मोदी,
भाजपा व संघ परिवार को देश का मतलब एकाधिकारी पूंजीपति के अलावा कुछ नहीं हैं ।
आज़ादी से पहले भी उनका कोई इतिहास खंगाले तो साफ हो जाएगा जिसका नतीजा आज उनके लिए
यही है कि उनके पास अपना कोई नेता नहीं हैं । वह क्रांतिकारियो पर या सुभाष , पटेल जैसे
कांग्रेसी नेता को कब्जाने की कोशिश करते हैं।
एक दौर में ब्रिटिश पूँजीपतियों व
भारतीय सामंतों जमींदारों के लिए काम करने वाले आज अंबानी,अदानी
टाटा जैसे इजारेदार पूँजीपतियों की सेवा में तल्लीन हैं ।
आर्थिक सुधारों के जिस एजंडे को
यह झटके से आगे बढ़ाना चाहते हैं इसमें यह मुंह की खा रहे हैं । एक तरफ खुद शासक
वर्ग के बीच से दूसरी तरफ जनता के अलग अलग हिस्सों की ओर से तेज सुधारों के विरोध
में आवाज उठ रही हैं ।
दूसरी तरफ इन एक सालों में मोदी व
मोदी सरकार बेनकाब भी हुई हैं । दिल्ली के चुनाव में 3- 4 सीट तक सीमटने वाली मोदी
सरकार- मोदी-अमित शाह व संघ परिवार के मुंह पर यह एक करारा तमाचा था । यह अलग बात
है कि यह तमाचा किसी क्रांतिकारी विकल्प की ओर से नहीं बल्कि खुद शासकों की ही
अपनी पार्टी की ओर से मिला था ।
अब बिहार चुनाव का दर चल रहा है ।
मोदी संघ की जुगलबंदी ने फिर से इन दिनों सांप्रदायिक एजंडे को तेजी से आगे बढ़ाया है । यह वैसे भी उनकी
जरूरत हैं और बिहार विधान सभा के चुनाव तथा फिर 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव इन
दोनों के मद्देनजर यह विकास व सांप्रदायिकता की खिचड़ी उबल रही हैं । और इससे भी
ज्यादा यह आज के दौर के लम्पट अंबानी अदानी जैसे कॉर्पोरेट घरनों की जरूरत है । इससे भी आगे बढ़कर यह आज के दौर
के संकटग्रस्त पूंजीवाद की जरूरत है ।
इसी जरूरत को संघ – भाजपा कभी आगे
बढ़ते हुए तो कभी पीछे हटाते हुए पूरी कर
रहे हैं ।
ना तो संघ को ना ही मोदी को ना ही भाजपा को गाय से विशेष
मोहबब्त हैं , ना ही देश की मेहनतकश आबादी से । ना ही उन्हें देश से प्यार है यदि देश
का मतलब बहुसंख्यक मेहनतकश जनता से
है। उनके लिए सब कुछ कॉर्पोरेट घराने हैं
। देश का पूंजीपति है । पूंजीवादी व्यवस्था है ।
लव जिहाद के बाद आजकल ये बीफ या गौमांस के जरिये
यही काम कर रहे हैं । अखलाक की मौत के लिए जिम्मेदार भी यही लोग हैं । दादरी में
अखलाक बाद मेनपुरी व अन्य जगहों पर भी यही घटनाएँ हो चुकी हैं ।
देश में इस असहिष्णु
सांप्रदायिक माहौल के खिलाफ जो विरोध के
स्वर फूट हैं । उनका स्वरूप जैसा भी हो लेकिन चूंकी वह सत्ता पर बैठी हुई फासिस्ट ताकतों के खिलाफ है । इसलिए संघी ताक़तें इसको हर तरह से नल्लीफ़ाई
करने में लगी हुई हैं ।
यानी अब विरोध का स्वरूप क्या हो,?
कितना हो ?, किस मुसद्दे पर हो ? किस
समय हो व कहाँ हो यह भी मोदी व संघ परिवार तय करेंगे व उनकी
पसंदगी वाला विरोध विरोध होगा जबकि नापसंदगी वाला विरोध विरोध नही होगा ।
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