Saturday, 20 June 2020

क्रालोस कार्यकर्त्ता नसीम को डराने धमकाने का विरोध करो



     क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की हल्द्वानी इकाई के कार्यकर्त्ता नसीम को केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करने वाली आई बी (खुफिया विभाग) का आदमी बताते हुए दो लोगों ने नसीम को जबरन रास्ते पर रोककर उत्पीड़ित करने का काम किया। उनकी फोटो खींची तथा एक दुकान में कुछ लोगों के सामने डराने धमकाने की कार्यवाही की। जनवरी फरवरी माह में हल्द्वानी के वनभूलपूरा क्षेत्र में हज़ारों अल्पसंख्यक लोग सी ए ए, एन आर सी तथा एन पी आर के विरोध में सड़कों पर उमड़ पड़े थे। इस आंदोलन में क्रालोस के हल्द्वानी क्षेत्र के कार्यकर्त्ता भी इस दौरान गए थे।
      चूंकि मोदी-शाह की सरकार की जंग कोरोना से नहीं बल्कि सी ए ए प्रदर्शनकारियों से चल रही है इसीलिये दिल्ली में दिल्ली दंगों के नाम पर कई नौजवान छात्रों व छात्राओं को जो कि सी ए ए  विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे। उन्हें यू ए पी ए से लेकर तमाम संगीन मुकदमों में जेलों में ठूंसने की घृणित कारवाई को आगे बढ़ा रही है।
      हल्द्वानी में क्रालोस कार्यकर्त्ता को डराने धमकाने की यह कारवाई भी इसी की मिसाल है। क्रालोस मोदी सरकार की इस जनवादविरोधी घृणित कारवाई की तीखी भर्त्सना व निंदा करता है और मांग करता है कि इन डराने धमकाने व न्याय के लिए उठती इन आवाजों को कुचलने की घृणित कार्रवाइयों पर तत्काल रोक लगाए।

बढ़ते युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद का विरोध जरूरी है


       भारत की सीमा पर गलवान घाटी में चीनी व भारतीय सैनिकों के बीच संघर्ष में तकरीबन 20 भारतीय सैनिकों के मारे गए हैं। इस घटना के बाद देश में अन्धराष्ट्रवादी उन्माद का शोर फिर चरम पर है। पिछले कई दिनों से चीनी व भारतीय शासकों के बीच लगातार अंतर्विरोध बढ़े है जिसकी परिणति के बतौर एक ओर सीमा पर तो दूसरी ओर देश के भीतर कॉरपोरेट मीडिया व संघी आई टी सेल द्वारा युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद का माहौल बनाया गया।
    इस युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद की कीमत मज़दूरों किसानों के बेटों को अपनी जान के रूप में सरहद पर चुकानी पड़ी है। यह बेहद दुःखद है। यह सीमा के इस व उस पार दोनों जगहों पर है।
    यह बेहद संगीन व दुखदायी स्थिति है कि एक तरफ देश के भीतर मजदूर मेहनतकश लोग, शासकों के घोर पूंजीपरस्त व घोर जनविरोधी होने के चलते मारे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके बेटे अन्धराष्ट्रवादी युद्धोन्माद में सरहदों पर मारे जाते हैं।
       अन्धराष्ट्रवादी युद्धोन्माद शासकों के लिए ऐसा मुद्दा है जहां पूँजीवादी शासक, चाहे वे उदारवादी हों या फिर फासीवादी, एक हो जाते हैं। मगर फासीवादी ताकतों के लिए तो यह कोर मुद्दा है। आज अन्धराष्ट्रवाद अमेरिका से लेकर दुनिया के अधिकांश मुल्कों में छाया हुआ है। इसके जरिये फासीवादी ताकतों को एकाधिकारी पूंजी आगे बढ़ा रही है।
     भारत जैसे मुल्कों के लिए अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद के दो पहलू हैं एक तरफ कमजोर मुल्कों को सर्जीकल स्ट्राइक व घर में घुसकर मारने की धमकी देना तो दूसरी ओर अपने से ताकतवर पूँजीवादी मुल्कों के सामने दुम हिलाना, मालों के बाहिष्कार की खोखली धमकी देना।
      पड़ोसी मुल्कों के खिलाफ नफरत फैलाना, युद्ध के उकसावे की राजनीति, सैन्य महिमामंडन, छद्म युद्ध ! पूँजीवादी फासीवादी शासकों की यह अन्धराष्ट्रवादी राजनीति बहुसंख्यक नागरिकों के लिए बेहद खतरनाक है।  आम नागरिकों, मजदूर मेहनतकशों, निम्न मध्यम वर्ग व मध्यम वर्गीय लोगों, सभी के असन्तोष, संकट से ध्यान हटाने तथा इमके तमाम संघर्षों को ध्वस्त कर देने व डाइवर्ट कर देने में अन्धराष्ट्रवाद शासकों का बेहद मारक हथियार है।
      कोरोना महामारी ने संकट ग्रस्त पूंजीवाद के संकट को गहनतम कर दिया है जो विश्वअर्थव्यवस्था पहले ही संकट में थी व भारत की भी। वह धराशायी होने की ओर बढ़ी है। इस महामारी ने पूंजीवाद की सीमाओं को तीखे ढंग से उजागर किया है। इसने पूँजीवादी फासीवादी शासकों के नकाब लगे घृणित चेहरों को नंगा कर दिया है।
     इसलिये ऐसे दौर में अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद जैसा माहौल बनाये रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
        कोरोना जैसी महामारी या अन्य भीषण आपदा, ऐसे समाज में जिसकी बुनियाद शोषण पर टिकी हुई हो, जहां मुनाफा ही जीवन दर्शन हो, जहां पूंजी ही सब कुछ हो, जहां व्यक्ति व समाज के बीच दुश्मनाना द्वंद हो, जहां पूंजीपति-मजदूर, डॉक्टर-मरीज,वकील-क्लाइन्ट व अन्य रूप में दो परस्पर निरंतर विरोधी हितों में भयानक टकराहट हो ! पूंजीपति वर्ग ही समाज में हावी होता है। यहां समाज , सामाजिक हित नेपथ्य में चला जाता है व्यक्तिगत हित सर्वोपरी हो जाते हैं। यहां पूंजीपति वर्ग कहता है हर व्यक्ति अपने अपने लिए मेहनत करेगा तो समाज भी ऊपर उठ जाएगा, मगर ऐसा होता नहीं, पूंजीपतिवर्ग शेष समाज की तबाही बर्बादी की कीमत पर आगे बढ़ता जाता है ऐसे समाज में त्याग-समर्पण व बलिदान का भाव कहां से आये। जबकि भीषण आपदा व महामारी से निपटने में इन मूल्यों की भी सख्त दरकार होती है। यह पूँजीवाद की सीमा है। यह केवल समाजवाद में ही सम्भव है।
      पूंजीवाद बहुसंख्यक आम नागरिकों को आज के दौर में केवल और केवल तबाही बर्बादी दे सकता है। यह लूट खसोट के जरिये भी होता है यह सामाजिक व्यय में भारी कटौति व टेक्स की बढ़ोत्तरी के जरिये भी होता है तो यह अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद के जरिये भी होता है। इसलिए बेहद जरूरी है कि इसका हर संभव विरोध किया जाय।

Monday, 15 June 2020

हत्या के विरोध में अमेरिकी जनता का जबरदस्त प्रतिरोध




      'अश्वेतों की जान मायने रखती है' ! तथा ' मैं सांस नहीं ले पा रहा हूँ'' ! इन्हीं नारों के साथ अमेरिका के कई शहरों में न्याय, अधिकार, समानता की आकांक्षा लिए हजारों लोग सड़कों पर 26 मई से प्रर्दशन को निकल पड़े हैं। यह सैलाब आगे बढ़ता जा रहा है। इसके दमन के लिए राष्ट्रीय गार्ड लगा दी गई है मगर संघर्ष फैल रहा है। ब्रिटेन व फ्रांस में भी इस संघर्ष के समर्थन में बड़ी रैलियां निकली है हिंसक प्रदर्शन हुए हैं। अब धूर्त अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प अमेरिका में मिलिट्री के द्वारा दमन की बातें भी करने लगे हैं।
      10 जून तक 200 शहरों में फैल चुका यह प्रदर्शन 46 वर्षीय अश्वेत (काले) जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के विरोध में है। फ्लॉयड की हत्या श्वेत (गोरे) पुलिस कर्मी ने की। अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में मिनियापोलिस शहर में यह घटना हुई थी। इसमें 4 पुलिसकर्मी शामिल थे। एक पुलिसकर्मी ने अपने घुटने से फ्लॉयड का गला दबाया और तब तक दबाता रहा जब तक कि उसकी मौत नहीं हो गई। इस दौरान ज्यार्ज कहता रहा 'मैं सांस नहीं ले पा रहा हूँ'। मगर इस आवाज को अनसुना कर दिया गया। बाकी पुलिसकर्मी इस दौरान सहयोगी की भूमिका में थे।
     इन्हीं 4 पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के लिए आक्रोश सड़कों पर फुट पड़ा। इस आक्रोश में लंबे वक्त से नस्लवादी हिंसा व उत्पीड़न के खिलाफ गूंज है। इस उमड़ते प्रदर्शन में लॉकडाउन में लम्पट ट्रम्प की अगुवाई में अमेरिकी लम्पट शासकों के घृणित तौर तरीकों से उपजी हताशा-निराशा की गूंज भी है साथ ही साथ बेरोजगारी, असुरक्षित भविष्य और भुखमरी सी स्थिति के खिलाफ भी यह आवाज है।
      भारत में जो अल्पसंख्यक विरोधी घोर फासीवादी रुख, राजनीति तथा घृणित जातिवादी रुख के चलते आये दिन हिंसा की घटनाएं होती हैं भारतीय पुलिस का विशेषकर उत्तर भारत तथा गुजरात में, जो घोर मुस्लिम विरोधी तथा जातिवादी है । वही चीज अमेरिका में घृणित नस्लवादी फासीवादी राजनीति के रूप में दिखाई देता हैं। आज के दौर में इन घोर फासीवादी प्रवृत्तियों का हावी होना अपने अंतिम मूल्यांकन में यह मरणासन्न पूंजीवाद के भीषण संकट की निशानी है।
      फासीवादी नेता ट्रम्प ने अमेरिका में जन प्रतिरोध को कुचलने के लिए मिलिट्री लगाने की धमकी दी थी। तथा फासीवाद विरोधी मोर्चा 'एंटीफा' को आतंकवादी संगठन की श्रेणी में डालने की धमकी दी गई। एक शहर में मिलिट्री लगाई गई जबकि कई शहरों में 'पुलिस' के साथ राष्ट्रीय गार्ड लगाई गई। मगर दमन जितना बड़ा, प्रतिरोध उससे ज्यादा गति से आगे बढ़ा।
     इस व्यापक दमन में लगभग 10000 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 13 लोगों की मौत हुई है। मगर संघर्ष और ज्यादा व्यापक अनुशासित भी हुआ है।
      यह प्रतिरोध अमेरिका के 27 राज्यों के 200 शहरों में फैल चुका है। इसमें अब मजदूर, नर्स भी शामिल हो चुके हैं। न केवल अमेरिका बल्कि यूरोप के कई मुल्कों में भी इस संघर्ष के समर्थन में बड़ी रैलियां निकली हैं।
      अमेरिकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग का दूसरा धड़ा संघर्ष का दिखावे के लिए तथा इसे अपने पक्ष में ढालने के लिए समर्थन व प्रयास कर रहा है। हालांकि ट्रम्प के रुख ने मतभेद की स्थिति पैदा कर दी है।
       इस संघर्ष की काफी सीमाएं भी है आंदोलन संगठित नहीं है तथा यह किसी क्रांतिकारी संगठनों के नियंत्रण में नहीं है। एंटीफा भांति भांति के विचारों वाले संघटनों का एक व्यापक प्लेटफार्म है जो फासीवादी रुझानों, कार्रवाइयों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध करता है।
      जहां तक अमेरिकी समाज में नस्लीय भेद, नस्लवादी सोच का मसला है यह बेहद पुराना है। 16 वीं -17 वीं सदी में अमेरिकी महाद्वीप से सोने चांदी की तलाश ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस, पुर्तगाली शासकों में यहां इन्हें उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया। अमेरिका के मूल निवासियों का एक ओर सफाया किया गया दूसरी ओर इन व्यापारिक साम्राज्यवादी देशों के बीच आपसी संघर्ष हुआ। उत्त्तरी अमेरिका के मुख्य हिस्सों पर ब्रिटेन का प्रभुत्व कायम हुआ। इसी दौर में अमेरिका में काम करवाने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप से लाखों की तादाद में जहाजों में भर-भर कर काले (नीग्रो) लोगों को बंधक बनाकर, जबरन बेगारी हेतु अमेरिका ले जाया गया। यह आधुनिक 'दासता' का जमाना था। बड़ी तादाद में इन 'ग़ुलामों' 'दासों' का जो भोले-भाले इंसान थे, इनकी खरीद-फरोख्त का कारोबार विकसित हो गया था। इनसे खानों, खेतों व अन्य जगहों पर जबरन बेहद उत्पीड़नकारी ढंग से काम करवाया जाता था। काम के दौरान, भूख से, बीमारी से तथा जहाजों में भी लाखों की तादाद में, ये अश्वेत मारे गए।
     वास्तविकता में यह परोक्ष हत्याएं थी। 'यूरोपीय सभ्य समाज' के चेहरे के भीतर 'यह घृणित व अमानवीय' चेहरा था। यह भारत में 'भारतीय व कुत्तों' को प्रवेश नहीं के 'नस्लीय श्रेष्ठता' के रूप में दिखता था। इसी भयानक लूट-खसोट ने ब्रिटेन, फ़्रांस में पूंजीवाद के विकास को तेज़ी से आगे बढ़ाया था।
       इसी दौरान यानी 1776 में अमेरिकी क्रांति हुई। जिसका नारा 'स्वतंत्रता व समानता' का था। यह क्रांति ब्रिटिश शासकों तथा अमेरिका में बस चुके ब्रिटेन से ही प्रवासी हो चुके पूंजीपतियों, कारोबारियों तथा अन्य लोगों के बीच था।
      यह पूँजीवादी क्रांति भी लाखों गुलाम अश्वेतों के जीवन में कोई बदलाव नहीं लाई। इसके उलट दासता को संस्थागत के दिया गया।   
      अमेरिका ( ब्रिटिश उपनिवेश ) के उत्तर व दक्षिण हिस्से में फर्क था। उत्त्तरी हिस्से में तेज पूँजीवादी विकास था, उद्योग का तेज विस्तार हो रहा था, यहां ग़ुलामों की जरूरत नहीं थी, दासता यहां विकास के आगे रोड़ा थी। इसीलिए इस हिस्से में दास प्रथा कमजोर होते चली गयी जबकि दक्षिण हिस्सा,पिछड़ा व कृषि वाला था यहां दासों की खूब जरूरत थी। दक्षिणी हिस्से अपने ढंग से चलना चाहते थे। सत्ता के केन्द्रीकरण (संघ) उत्त्तरी हिस्से की चाहत थी। 19 वीं सदी के 60 के दशक में उत्त्तरी व दक्षिणी हिस्से के संघर्ष ने गृह युद्ध का रूप धारण किया। अब्राहम लिंकन की अगुवाई में अन्ततः दक्षिणी हिस्से के प्रतिरोध को दमन कर गृहयुद्ध को जीत लिया गया। इस प्रकार  वो संयुक्त राज्य अमेरिका वज़ूद में आया जिसमें लगभग 40 से ज्यादा राज्य (प्रांत) थे। यह गृह युद्ध दासों की मुक्ति के मकसद से नहीं था। अब दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
    ऐसा नहीं कि इसके खिलाफ कोई प्रतिरोध न  हुआ  हो। 1811 में ही अश्वेत दासों द्वारा विद्रोह किया गया। तब 500 अश्वेत हथियारों से लैस होकर अंग्रेज शासकों के खिलाफ विद्रोह किया मगर यह कुचल दिया गया।
      अब इस विद्रोह के लगभग 50 साल बाद 'दास प्रथा' को गैरकानूनी घोषित किये जाने के बावजूद नस्लवादी भेदभाव, उत्पीड़न का खात्मा नहीं हुआ। 'शेयर क्रॉपर' व 'कन्विक्ट लिजिंग' के नाम से यह दूसरे रूप में जारी रही। हालांकि पहले की तुलना में यह कमजोर हो गयी। दासों का 90 फीसदी हिस्सा दक्षिणी हिस्से में था।
       1916 में 200 शेयर क्रॉपर (अश्वेत) की हत्या कर दी गई। यह श्वेत पुलिसकर्मियों द्वारा की गई थी। इसे इलेन नरसंहार कहा जाता है। इस वक़्त लाखों की तादाद में दक्षिणी हिस्से से उत्तर की ओर अश्वेतों का पलायन या विस्थापन हुआ था।
      सामाजिक राजनीतिक व आर्थिक हर स्तर पर यह नस्लीय भेदभाव, उत्पीड़न व हिंसा अलग अलग वक़्त पर फिर बाद में भी चलती रही। फासीवादी संगठन कु कलक्स क्लान (kkk)  व पुलिस इसमें सबसे आगे-आगे थी।
      1940 के दशक से सिविल राइट आंदोलनों ने जोर पकड़ा। जबकि इसी दौर में यानी पुनर्निर्माण व दूसरे युद्ध के बीच लगभग 5500 अश्वेतों (अफ्रीकी अमेरिकन) 'भीड़ हिंसा' में मारे गए थे।
      ब्लैक पैंथर तथा मार्टिन लूथर किंग जूनियर की अगुवाई में 'मांगें व आकांक्षाएं' के रूप में मागें सूत्रीत की गई व व्यापक संघर्ष हुआ। यह 1960-70 के दशक में चला। 1968 तक आते आते यह आज के 'में सांस नहीं ले पा रहा हूं' 'अश्वेत जिंदगी मायने रखती है' जैसे व्यापक आंदोलन की तरह देशव्यापी हो गया। लाखों लोगों ने इसमें शिरकत की। मार्टिन लूथर की हत्या कर दी गई। आंदोलन का दमन भी किया गया। 40 से ज्यादा लोग मारे गए। तीन-चार हज़ार लोग घायल हो गए। लगभग 27000 से ज्यादा लोग गिरफ्तार कर लिए गए।
       इस आंदोलन के दबाव में अश्वेतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था अमेरिकी हुक्मरानों को करनी पड़ी। इसके बाद फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर, पुलिस, मिलिट्री व सभी जगहों पर अश्वेत लोग पहूंचे। इनका आत्मासातीकरण व्यवस्था में हुआ। यह वह दौर भी था जब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। बाद में 70 के दशक में यह ठहराव ग्रस्त होने की ओर बढ़ी।
      बीते 50-60 सालों में अश्वेतों  के बीच भी ध्रुवीकरण बढ़ा। यह एक हद तक भारत में जातिवाद के खात्मे के लिए शासकों द्वारा की गई आरक्षण व अश्पृश्यता उन्मूलन कानून जैसी ही थी तथा खुद जातिवाद का शिकार रहे समूह के भीतर इसने ध्रुवीकरण को अंजाम दिया। आज दलितों की पार्टियां है मगर वह दलित उत्पीड़न हिंसा पर खामोश है। क्योंकि मसला अब जाति नहीं वर्ग का है। यही पूंजीवाद का असल विभाजन है। यही स्थिति मुस्लिमों के मसले पर भी है।
       यही चीज थोड़ा भिन्न रूप में अमेरिका में अश्वेतों के खिलाफ होती हिंसा व उत्पीड़न की है। इसीलिए अश्वेतों के बीच से वो लोग जो शासकों की जमात में पहुंच चुके हैं वो खामोश हैं या केवल सीमित विरोध है।
       पिछले 3 दशकों से जब से विश्व अर्थव्यवस्था संकट की ओर बढ़ी है व खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी। तब से अमेरिका के 7-8 प्रांतों में अश्वेतों व महिलाओं के लिए किये गए विशेष प्रावधानों को खत्म किया जा रहा है।
      अब 2007-08 से गहन संकट की ओर बढ़ चुकी विश्व अर्थव्यवस्था को 12 साल हो चुके हैं और अब कोरोना महामारी ने संकट को अप्रत्याशित रूप से कई गुना बढ़ा दिया है। अमेरिका में बेरोजगारी, महंगाई, गरीबों के लिए इलाज के अभाव या बेहद कमजोर होने ने स्थिति को विस्फोटक बनाया है। अश्वेत लोग इसके सबसे ज्यादा शिकार है। दूसरी ओर फासीवादी राजनीति के अमेरिकी समाज में तेज़ी से बढ़ने के चलते अश्वेत, एशियाई व अप्रवासी लोगो  पर हमले बढ़े हैं। गरीब अश्वेतों की स्थिति सबसे बदतर है। जेलों में सबसे ज्यादा यही हैं गरीब बस्तियों में अधिकांश यही हैं कोरोना का शिकार भी अधिकतर यही हैं। पुलिस की हिंसा का शिकार तो लंबे वक्त से होते रहे हैं।
       कोरोना महामारी का शिकार भी अधिकांश इन्हीं के बीच से गरीब हैं। महामारी से निपटने की स्थिति ने अधिकांश को भयानक असुरक्षा में डाल दिया है। ट्रम्प के रवैये ने स्वास्थ्यकर्मियों से लेकर मजदूरों को भी आक्रोशित किया है साथ ही शासक वर्ग के दूसरे धड़े भी बेचैन हैं।
इन भयानक संकटग्रस्त  स्थितियों में ही ज्यार्ज फ्लॉयड की हत्या ने चिंगारी का काम किया। इसने जंगल में आग की तरह फैलने का काम किया। इसमें अलग-अलग तरह के लोग शामिल हुए। यह संघर्ष फिलहाल उत्पीड़न, भेदभाव, असमानता के खिलाफ है। इसकी दिशा समाजवाद की ओर फिलहाल कतई नहीं है। इस दिशा में इसके बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।



     

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

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