Wednesday, 8 April 2026

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

 अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम 

      अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना पड़ा है। ईरानी संप्रभुता को इजरायली विस्तारवादी शासकों के दम पर रौंदने और अपनी कठपुतली ईरान में बिठाने में अमेरिकी कामयाब नहीं हो पाए हैं। ईरानी शासकों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष में कुर्बानियां भी दी और समर्पण नहीं किया। इस तरह यह ईरान की रणनीतिक जीत भी है। इजरायली शासक खामोश हैं। वे यहां अमेरिकी साम्राज्यवादियों पर निर्भर हैं। 

      इस युद्धविराम को समझने के लिए सतही मुद्दों (ईरान का परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, अमेरिकी सेना की उपस्थिति) से परे जाना होगा। यह संघर्ष का एक छोटा पड़ाव है, जिसका सार अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा है – अमेरिकी साम्राज्यवाद चीन और रूस के उभरते साम्राज्यवादी ध्रुवों के खिलाफ पश्चिम एशिया में अपने लड़खड़ाते आधिपत्य को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस नजरिए से देखें तो, दो सप्ताह के इस युद्धविराम ने अमेरिका को रणनीतिक झटका दिया है। ट्रंप को अपनी सख्त अल्टीमेटम (हॉर्मुज को पूर्ण, तत्काल और सुरक्षित खोलो) से पीछे हटना पड़ा और दो सप्ताह के युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा – जिसे ईरानी मीडिया ने ‘अपमानजनक वापसी’ करार दिया। इस पीछे हटने के कारण थे: युद्ध से बढ़ती तेल की कीमतों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव, ट्रंप की गिरती अप्रूवल रेटिंग, और इराक जैसे युद्ध के दलदल में फंसने का डर। ईरान, जो चीन-रूस साम्राज्यवादी गुट का एक प्रमुख सहयोगी है, ने हॉर्मुज पर ‘नियंत्रित पुन:खोलने’ की शर्त मनवाकर अपनी असममित सैन्य क्षमताओं को कूटनीतिक जीत में बदल लिया।

      क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका भी इसी अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में रंगी है। पाकिस्तान (चीन का सबसे करीबी सहयोगी) मुख्य मध्यस्थ के रूप में उभरा, जिसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव को संतुलित करते हुए चीन-समर्थित समाधान को आगे बढ़ाया। तुर्की और मिस्र ने क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, जबकि रूस ने ईरान को गुप्त खुफिया सहायता देते हुए युद्धविराम का स्वागत किया। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर पांच-सूत्रीय शांति योजना पेश की और इस्लामाबाद को बातचीत का मंच बनाकर अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को प्रदर्शित किया।

       कुल मिलाकर, इस युद्धविराम में अमेरिकी साम्राज्यवाद सैन्य और कूटनीतिक रूप से पीछे हटने को मजबूर हुआ, जबकि चीन-रूस गुट (जिसमें ईरान एक प्रमुख सहयोगी है) ने रणनीतिक लाभ अर्जित किया। हालांकि, यह केवल एक अस्थायी ठहराव है, क्योंकि मूल अंतर्विरोध – पश्चिम एशिया पर आधिपत्य के लिए अमेरिकी और चीनी-रूसी साम्राज्यवाद के बीच संघर्ष – पूरी तरह अनसुलझा है। अब आगामी इस्लामाबाद वार्ता ही तय करेगी कि यह युद्धविराम बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में एक कदम है या फिर टकराव का नया, और अधिक खतरनाक दौर शुरू होता है।

Sunday, 29 March 2026

एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर हिंदू राष्ट्रवादियों का कानूनी हमला

 एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर हिंदू राष्ट्रवादियों का कानूनी हमला


मार्च 2026 में संसद ने ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पास कर एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों पर सीधा हमला किया। यह कानून 2014 के नालसा फैसले को लगभग खत्म करता है और 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में बड़े बदलाव करता है।

नालसा फैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘तीसरा लिंग’ माना था और आत्म-पहचान का अधिकार दिया था। 2018 के नवती सिंह जोहर फैसले ने धारा 377 को बदलकर समलैंगिक संबंधों को अपराध से बाहर किया। इन फैसलों ने समुदाय को समानता, गरिमा और निजता का अधिकार दिलाया था। 2019 के कानून ने इसे लागू किया था, जिसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी सभी शामिल थे।

2026 का संशोधन विधेयक आत्म-पहचान का अधिकार खत्म करता है। अब व्यक्ति स्वयं अपना लिंग नहीं कह सकता। उसकी पहचान जन्म के जैविक चिह्नों या पुरानी सामाजिक पहचानों (किन्नर, हिजड़ा, अरावणी, जोगता) से तय होगी। विधेयक साफ कहता है कि "विभिन्न यौन अभिविन्यास और स्व-अनुभूत यौन पहचान वाले व्यक्ति इसमें शामिल नहीं होंगे।" यह ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी, जेंडर-फ्लुइड सभी को कानूनी दायरे से बाहर कर देता है।

कानून मेडिकल बोर्ड को अनिवार्य बनाता है। पहचान प्रमाण पत्र के लिए व्यक्ति को सरकारी मेडिकल बोर्ड (CMO की अध्यक्षता में) के सामने चिकित्सकीय परीक्षण से गुजरना होगा। सुप्रीम कोर्ट की सलाहकार समिति ने इसे "निजता का पूर्ण उल्लंघन" बताया। नालसा फैसले ने स्पष्ट कहा था कि लिंग पहचान के लिए किसी चिकित्सकीय जांच की आवश्यकता नहीं।

यौन हिंसा पर यह कानून घोर भेदभाव करता है। BNS में सिसजेंडर महिला के साथ बलात्कार पर न्यूनतम 10 साल की सजा है, जबकि ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ यौन शोषण पर अधिकतम सजा सिर्फ 2 साल रखी गई है। यह अनुच्छेद 14 (समानता) का सीधा उल्लंघन है।

सरकार ने कानून बनाने में समुदाय से कोई सार्थक सलाह नहीं की। राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद के सदस्यों को बहुत कम समय पर बुलाया गया, मंत्री ने उनसे मिलने से मना कर दिया, उनके सुझाव खारिज हुए और चारों सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने विधेयक को चयन समिति को भेजने की मांग की, लेकिन सरकार ने वह मांग ठुकरा दी और बिना बहस के बिल पास कर दिया। 88 से अधिक ट्रांसजेंडर संगठनों, 40,000 हस्ताक्षरकर्ताओं और सुप्रीम कोर्ट की सलाहकार समिति की चेतावनी को भी सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।

भारत में एलजीबीटीक्यू व्यक्ति पहले से ही परिवार से निकाले जाने, पुलिस उत्पीड़न, स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव और यौन हिंसा का सामना करते हैं। 80% ट्रांसजेंडर व्यक्ति कभी न कभी यौन हमले का शिकार होते हैं। 2019 के कानून के तहत अब तक केवल 32,500 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान पत्र मिल सका।

हिंदू राष्ट्रवादी ‘हिजड़ा-किन्नर’ जैसी पुरानी पहचानों को तो मानते हैं, लेकिन ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी जैसी पहचानों को ‘पाश्चात्य’ कहकर खारिज करते हैं। इस कानून ने आत्म-पहचान छीनी, निजता पर हमला किया, यौन हिंसा को मामूली अपराध बना दिया और समुदाय के बड़े हिस्से को कानूनी दायरे से बाहर कर दिया। जरूरी है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय प्रतिरोध के साथ खड़ा हो और इस कानून को रद्द करवाने की मांग करे।

Monday, 14 July 2025

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे बढ़ा रही है। नागरिकता संशोधन कानून के जरिए गैर मुस्लिमों की जो तीन पड़ोसी देशों के होंगे उन्हें भारत की नागरिकता देने का प्रावधान 2019 में किया गया था और फिर नागरिकता परीक्षण हेतु राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण (एनआरसी) कराने की बात मोदी सरकार ने कही और इसके बाद बड़े स्तर पर देश भर में आंदोलन हुआ तो सरकार पीछे हट गई। मगर अब साम्प्रदायिक नागरिकता कानून के बाद चुनाव के बहाने बिहार में परोक्ष तरीके से नागरिक परीक्षण कराया जा रहा है।

      यह चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर कर रहा है । इस प्रक्रिया में मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र सहित 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करना जिसमें जन्म और जगह का पता लगे, अनिवार्य किया गया है, इसमें आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, डी एल, पेन कार्ड जैसे आम पहचान दस्तावेज़ अब नागरिकता के प्रमाण नहीं माने जा रहे हैं। अब बड़ी संख्या में इन 11 दस्तावेजों के नहीं होने के चलते भी बिहार के गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों पर गहरा असर पड़ेगा। हिंदू फासीवादियों के हिसाब से जिनके पास ये 11 दस्तावेज में से कोई नहीं होगा, यदि वे मुस्लिम होंगे तो घुसपैठिए और बाकी धर्मों के होंगे तो शरणार्थी होंगे। 

     हिन्दू फासीवादी सरकार इसे मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने और चुनावी ध्रुवीकरण का हथियार बना रहे हैं। बिहार चुनाव से पहले इसे लागू कर वे अपने वोट बैंक को भी मजबूत करना चाहते हैं। जाहिर है सवर्णों का दायरा सापेक्षिक तौर पर अनुपात में बढ़ जाएंगे।

     चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड जैसे दस्तावेज नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके बजाय जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, जाति प्रमाण पत्र जैसे 11 दस्तावेजों की मांग की गई है, जो आम जनता के लिए जुटाना मुश्किल होगा।

       बिहार में अधिकांश ग्रामीण परिवारों के पास जमीन नहीं है, पासपोर्ट रखने वालों की संख्या बहुत कम है, और सरकारी सेवाओं में काम करने वालों की संख्या भी सीमित है। ऐसे में दस्तावेज जुटाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। हाईस्कूल की शिक्षा किया हुए लोगों का प्रतिशत भी 10- 12 से ज्यादा नहीं है।

      नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी जिम्मेदारी सरकार या जांच एजेंसियों की बजाय आम नागरिकों पर डाली गई है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें। यदि कोई दस्तावेज़ नहीं जमा कर पाता, तो उसे विदेशी या घुसपैठिया घोषित करने का खतरा रहेगा।

      विपक्ष ने इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि नागरिकता की पहचान गृह मंत्रालय का काम है, चुनाव आयोग का नहीं। हालांकि यह सुझाव भी दिया कि आधार, वोटर कार्ड और राशन कार्ड पर भी चुनाव आयोग विचार करे। मगर चुनाव आयोग अब बिहार में भारी संख्या में नेपाली, बांग्लादेशी आदि आदि के होने का हवाले देकर एन आर सी के पक्ष में माहौल बना रहा रहा है।

     वास्तव में, यह प्रक्रिया न्याय की मूल अवधारणा के खिलाफ है क्योंकि नागरिक नहीं होने का आरोप का बोझ निर्दोष जनता पर डाला गया है, जिसे खुद आरोप से मुक्ति पाने के लिए खुद को निर्दोष साबित करना होगा। न्याय की बुनियादी अवधारणा यह है कि आरोप लगाने वाले को अपने आरोप साबित करने होंगे, अन्यथा किसी पर भी आरोप लगाना बेहद आसान होगा और यह उत्पीड़न का औजार बन जाएगा। वास्तव में हिंदू फासीवादी ने इसी सिद्धांत को अधिकांश मामलों में अपना न्याय का सिद्धांत बना डाला है। जिसमें वे किसी पर भी आरोप लगाते हैं मीडिया ट्रायल शुरू होता है बिना न्यायिक प्रक्रिया के ही जिस पर आरोप लगाया जाता है उसे अपराधी बना दिया जाता है सालों बाद उसे बिना सबूत के न्यायालय निर्दोष के रूप में रिहा करती है।  

इस एजेंडे के देशव्यापी विस्तार की संभावना है। बिहार में इस प्रक्रिया को लागू कर इसे अन्य राज्यों में भी लागू करने की तैयारी है, जिससे पूरे देश में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।

     इस प्रकार, बिहार में चल रहा विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए एन आर सी एक ऐसा कदम है जो लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए गंभीर खतरा बन सकता है इसकी ही ज्यादा संभावना है। इसके ज़रिए भी हिंदू फासीवादी एकाधिकारी पूंजी के हित में हिंदू फासीवादी राज्य कायम करने की ओर बढ़ रहे हैं।

Monday, 12 May 2025

भारत पाक सैन्य टकराव और युद्ध विराम

 

  भारत पाक सैन्य टकराव युद्ध विराम 

       22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में कथित आतंकी हमले में 28 लोग मारे गए। इसमें अधिकतर हिंदू पर्यटक थे। मारे जाने वालों में एक मुसलमान मजदूर भी था। हिंदू फासीवादियों और मीडिया ने इसे हिंदू बनाम मुसलमान आतंकवादी के रूप में प्रस्तुत किया और आम हिंदुओं के दिमाग में मुसलमानों को आतंकवादी होने और खतरे के रूप में प्रचारित किया गया।
     इसके बाद देश भर में हिंदू राष्ट्र के ध्वजवाहकों ने आम मुसलमानों को जगह जगह अलगाव में धकेलने, मार पीट करने धमकी देने, कारोबार पर हमला करने की कार्रवाई की। जो बेहद घृणित और निंदनीय है।
    मोदी शाह और इनकी अगुवाई वाली सरकार ने दावा किया कि इस आतंकी हमले को पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया।
      मोदी शाह और सरकार का दावा था कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद शांति क़ायम हो गई है और आतंकवाद समाप्त हो गया है। हकीकत ठीक इसके विपरीत है। इस घटना ने भी यह साबित कर दिया।
      इस हमले के बाद हिंदू फासीवादी सरकार ने अंधराष्ट्रवादी युद्ध का उन्माद खड़ा किया। आर्मी, खुफिया विभाग के साथ बैठकों का सिलसिला और फिर मॉक ड्रिल की तैयारी। समूचे देश में क्रमशः सनसनी, असुरक्षा, नफरत और बदले की मानसिकता को तेजी से आगे बढ़ाया गया। हालत यह रही कि सभी विपक्षी पार्टियां सरकार की जुबान बोलने लगी। इस तरह जनता के एक ठीक ठाक हिस्से और विपक्ष को हिंदू फासीवादी
अपने एजेंडे पर गोलबंद करने में कामयाब रहे।
     इस बीच 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर के तहत रात को पाकिस्तान के कथित 9 आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना ने हमला करने और इसमें 100 आतंकियों के मरने का दावा किया। पाकिस्तानी सरकार ने दावा किया यह आम नागरिकों पर हमला था और इसमें 31 आम नागरिक मारे गए और कुछ घायल हुए है।
    इसके बाद पाकिस्तानी सेना ने सीमा पर और ड्रोन आदि के जरिए हवाई हमले किए। इस तरह सैन्य टकराव की स्थिति बन गई। दोनों ओर से दावे हुए कि आम नागरिक आबादी पर हमला नहीं हुआ और सैन्य अड्डों पर  हमले हुए। दोनों ने ही अपने देश के भीतर नागरिकों पर हमले के दावे किए। दोनों ही देशों के शासकों ने हमले में अपने देश के भीतर नुकसान न होने जबकि दूसरे देश को  भारी नुकसान पहुंचाने के दावे किए।
      अभी तीसरा ही दिन था कि अधिकांश लोग युद्ध की ओर बढ़ जाने का अनुमान लगा रहे थे तभी ट्रंप के द्वारा दोनों देशों के बीच युद्ध विराम होने की बात आई। और इसके बाद भारत की ओर से भी युद्ध विराम लागू होने की बात उजागर हुई।
       इस स्थिति ने मोदी शाह और भाजपाइयों के लिए स्थिति बेहद असहज कर दी। वैसे भी, पिछले कुछ समय से अमेरिकी साम्राज्यवादी लगातार ही इनके लिए विकट स्थिति पैदा कर दे रहे है। अमरीकी साम्राज्यवाद के इस दखलंदाजी ने भारतीय शासकों खासकर मोदी शाह और इनकी वाली सरकार की हैसियत को बेनकाब कर दिया। ऐसी फजीहत की मोदी शाह की जोड़ी को उम्मीद नहीं थी।
        एक ओर पाकिस्तानी शासकों की तैयारी उनके जवाबी सैन्य हमले दूसरी ओर साम्राज्यवादी हस्तक्षेप में भारतीय शासकों के लिए अलगाव की स्थिति बन गई। कहां तो मोदी और सरकार का आंकलन था कि पाकिस्तानी कथित आतंकी ठिकानों पर हमले के बाद पाकिस्तानी हुक्मरान चुप रहेंगे। इस तरह मोदी शाह और इनकी सरकार अमेरिकी इजरायली शासकों की ही पंक्ति में खड़ी हो जाएगी। इस तरह इतिहास में नाम दर्ज हो जाएगा। मगर सारा दांव उल्टा पड़ गया। कहां तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर कब्जे की बात, पाकिस्तान के टुकड़े करने की बात और कहां मिली ये जग हंसाई।
         अब युद्ध विराम हो चुका है। मगर अंधराष्ट्वाद  बना रहेगा और फिर इसी तरह की स्थिति या छद्म युद्ध की संभावना फिर भी बनी रहेगी। यह, दोनों ही देशों के शासकों के लिए अपने देश के भीतर जनता के असंतोष, संघर्ष से निपटने का तरीका भी है।  पूंजीवाद का संकट इसमें कमजोर और ताकतवर देशों की स्थिति, प्रभुत्व की चाह युद्ध की ओर ले जाती है। शासकों के लिए युद्ध एक कारोबार भी बन जाता है। आम तौर पर आतंकवाद को भी पूंजीवादी सरकारें ही खड़ा करती हैं पालती पोसती हैं। या यह राज्य / पूंजीवादी सरकारों की दमन उत्पीड़न की प्रतिक्रिया से उपजता है।
     जहां तक आम जनता का सवाल है उसके लिए युद्ध हर दृष्टि से तबाही बर्बादी लाने वाला होता है। युद्ध में सेना में मरने वाले भी जनता के ही बेटे बेटियां होती हैं। युद्ध के खर्चे का बोझ भी जनता के ही कंधे पर पड़ता है।
इसलिए आम जनता को युद्धों की मुसीबतों से तभी छुटकारा मिल सकता है जब अन्यायपूर्ण पूंजीवादी व्यवस्था की जगह समाजवादी व्यवस्था कायम हो।




















अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...