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खेती किसानी के संकट और किसान आंदोलन के बारे में कुछ सवाल-जवाब          साभार enagrik.com    
     इस समय समूचा देश एक बड़े किसान आंदोलन से गुजर रहा है। इस आंदोलन ने केन्द्र की मोदी सरकार को मजबूर किया है कि वह दादागिरी और हेकड़ी भूलकर किसान संगठनों से वार्ता करे। अभी कुछ दिन पहले तक किसी की कोई बात न सुनने वाली मोदी सरकार झुककर किसानों की कई मांगें मानने को तैयार है पर किसान तीनों नये कृषि कानूनों को रद्द करने से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं। वे अपने आंदोलन को और व्यापक व ऊंचे स्तर पर ले जा रहे हैं।
किसानों के इस विशाल आंदोलन ने देश की खेती-किसानी और उसके संकट के बारे में भारी चर्चा को जन्म दिया है। भाजपा के द्वारा पिछले सालों में उठाये जा रहे ढेरों साम्प्रदायिक मुद्दों को किनारे लगाते हुए उसने उस खेती-किसानी को चर्चा में ला दिया जिस पर अभी भी देश की आधी आबादी निर्भर है। इतना ही नहीं खेती-किसानी की हालत और उसके संकट से समाज के बाकी मजदूर-मेहनतकश भी गहरे प्रभावित होते हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि किसानों समेत सभी मजदूर-मेहनतकश इस मामले में सही सोच पर खड़े हों।
आज भारत में खेती-किसानी की हालत, उसके संकट, उसके समाधान तथा देश की सरकार और उसको चलाने वाले बड़े कारपोरेट पूंजीपति वर्ग (अंबानी-अडाणी, टा-बिड़ला इत्यादि) की इस मामले में नीति को इन सवालों और उनके जवाबों के जरिये समझा जा सकता है।
सवालः भारत में खेती-किसानी का संकट क्या है?
जवाबः भारत में खेती-किसानी का संकट कई रूपों में है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं।
भारत में खेती का रकबा लगातार घटता जा रहा है। इसका मतलब यह है कि किसी किसान के पास खेती करने के लिए जमीन बहुत कम है। बहुत कम जमीन होने के चलते उस पर खेती की बड़ी मशीनों (ट्रैक्टर, कम्बाइन इत्यादि) से खेती करने की गुंजाइश कम हो जाती है। छोटे किसान के पास पूंजी न होने के चलते इस खेती में खाद-कीटनाशक भी उतना इस्तेमाल नहीं हो पाता। खेती का रकबा कम होने के दो प्रमुख कारण हैं। एक तो पीढ़ी दर पीढ़ी खेतों का बंटवारा तथा दूसरा रोजगार का कोई और जरिया न होने के कारण किसान का छोटे से खेत से चिपके रहना। यदि कहीं और मौका मिले तो आज ही चालीस प्रतिशत किसान खेती करना छोड़ देंगे।
अपने देश में दुनिया के कई देशों के मुकाबले उत्पादकता बहुत कम है तथा खेती की लागत बढ़ती जा रही है। यानी एक एकड़ खेत में भारत में चीन, जापान, अमेरिका इत्यादि से काफी कम पैदा होता है। दूसरे ज्यादा पैदा करने के लिए और ज्यादा लागत की जरूरत पड़ रही है। लागत ज्यादा बढ़ रही है पर पैदावार उतनी नहीं बढ़ रही है। छोटे किसानों के लिए यह और भारी मुसीबत बन रही है। क्योंकि वे खेती में बहुत लागत नहीं लगा सकते।
खेती में उपज बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खाद और पानी का जो प्रयोग हो रहा है उससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता खत्म होती जा रही है। यही नहीं इसमें क्षारकता बढ़़ती जा रही है। इसका मतलब यह है कि लम्बे समय में खेत खेती करने लायक नहीं रह जायेंगे।
खेती की इन सारी समस्याओं का सामना करने के बाद जब किसान अपनी उपज बाजार में लेकर पहुंचता है तो पाता है कि उसका कोई खरीददार नहीं है। जो खरीददार हैं वे फसल की लागत जितना दाम भी नहीं दे रहे हैं। मजबूरी में किसान को औने-पौने दामों में अपनी उपज को बेचना पड़ता है। इस तरह खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा हो गई है। हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी उसके पास कुछ नहीं बचता है।
फसलों के दामों में उठा-पटक भी किसानों के लिए भारी मुसीबत बन गयी है। जब से सरकार ने खेती के मालों में आयात-निर्यात की छूट दी है तब से बाजार में दाम खूब ऊपर-नीचे हो रहे हैं। एक साल ऊंचे दाम देखकर किसान उस फसल को उगाते हैं और फिर पाते हैं कि उनकी फसल को कोई कौड़ियों के मोल भी खरीदने वाला नहीं है। वे बरबाद हो जाते हैं।
खेती में भारी लागत, कम उपज तथा उपज का कम दाम का कुल परिणाम यह निकलता है कि किसान कर्जे में डूब जाता है। वह उधार लेकर खेती में लगाता है पर सही दाम न मिलने के कारण उधार चुकता नहीं कर पाता। धीमे-धीमे स्थिति यह हो जाती है कि वह अपनी जमीन से हाथ धो बैठता है यानी उसे जमीन बेचनी पड़ जाती है। वह किसान से मजदूर बन जाता है।
बहुत सारे किसान इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे में वे अपनी जान लेने की ओर भी बढ़ जाते हैं। पिछले सालों में देश में लाखों किसानों ने आत्महत्या की है।
सवालः खेती-किसानी के इस संकट में सरकारी नीतियों की क्या भूमिका है?
जवाबः खेती-किसानी के वर्तमान संकट में सरकारी नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है हालांकि यह मूल कारण नहीं है।
      सरकार ने निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के पिछले तीन दशकों में खेती-किसानी से अपना हाथ खींचा है। सिंचाई से लेकर भांति-भांति की खेती-बाड़ी की चीजों में सरकार ने अपना खर्च घटाया है। सरकार ने खेती-किसानी को दी जाने वाली राहत (सब्सिडी) भी घटाई है। उसने बैंकों को छूट दी है कि वे किसानों को कम कर्ज दें जिस कारण उन्हें सूदखोरों के पास ज्यादा जाना पड़ रहा है। सरकार उपज के मुकाबले खरीद बहुत कम कर रही है और वह भी केवल कुछ फसलों की। सरकार ने खेती के उपज की आयात-निर्यात की छूट दी है जिससे बाजार में इनके दाम खूब ऊपर-नीचे हो रहे हैं। इसका फायदा केवल बड़े व्यापारी और आयातक-निर्यातक उठाते हैं।
इन सभी का खेती-किसानी पर बहुत बुरा असर पड़ा है।
सवालः खेती-किसानी के संकट का मूल कारण क्या है?
जवाबः खेती-किसानी के संकट का मूल कारण पूंजीवादी व्यवस्था है। पूंजीवादी व्यवस्था में उद्योग खेती के मुकाबले तेजी से विकास करता है और वह खेती का शोषण करता है। उद्योग में तकनीक का खेती के मुकाबले बहुत तेजी से विकास होता है। उसमें पूंजी निवेश की कोई सीमा नहीं होती। खेती में एक तो तकनीक बहुत धीमे विकसित होती है दूसरे जमीन की सीमा होती है। धरती पर खेती योग्य जमीन सीमित है। इसलिए खेती की एक सीमा बंध जाती है। इस सबके कारण उद्योग की चीजें खेती को महंगी मिलती हैं जबकि खेती की चीजें उद्योग को सस्ती। इस तरह उद्योग खेती का शोषण करते हैं। खेती उद्योग के मुकाबले पिछड़ती जाती है। इसका सबसे बुरा परिणाम छोटे किसानों को भुगतना पड़ता है।
इसके साथ-साथ खुद खेती में भी किसानों के बीच होड़ चलती है जिसमें बड़े किसान छोटे किसानों को पछाड़ देते हैं। बड़े किसान बाजार का और सरकारी नीतियों का फायदा उठा लेते हैं जबकि छोटे किसान ताकते रह जाते हैं। नतीजा होता है छोटे किसानों की बर्बादी। वर्तमान खेती-किसानी के संकट में भी सबसे ज्यादा छोटे किसान ही तबाह हो रहे हैं। वे ही सबसे ज्यादा कर्जे के जाल में फंस रहे हैं, अपनी जमीनें बेच रहे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं।
ये दोनों चीजें मिलकर खेती-किसानी के संकट का मूल कारण बनती हैं जिसमें सरकार की किसान और खेती विरोधी नीतियां आग में घी का काम करती हैं।
सवालः भारत की खेती-किसानी के संकट में साम्राज्यवाद की क्या भूमिका है?
जवाबः साम्राज्यवाद यानी विकसित पूंजीवादी देशों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, जापान इत्यादि) की बड़ी एकाधिकार पूंजी की भी इस संकट में महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत में खेती की उपज की बड़ी मात्रा में आयात-निर्यात के लिए साम्राज्यवाद ने ही शर्त थोपी। इससे जहां भारत के पूंजीपतियों को फायदा हुआ वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी फायदा हो रहा है। भारत में खेती-किसानी की जो बड़े पैमाने पर लूट हो रही है उसका फायदा इन्हें भी हो रहा है। वैसे भी आज देशी-विदेशी पूंजी आपस में मिल-जुल कर ही व्यवसाय कर रही है और लूट-पाट कर रही है। जैसे उद्योगों में हो रहा है वैसे ही खेती में भी।
सवालः भारत का पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार खेती-किसानी के इस संकट का क्या समाधान देखती है?
जवाबः भारत का पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार खेती-किसानी के संकट का समाधान खेती-बाड़ी के कारपोरेटीकरण (उद्योगों की तर्ज पर) तथा खुली बाजार व्यवस्था में देखती है जिसमें सरकार का हस्तक्षेप होगा तो बस कारपोरेट घरानों का मुनाफा बनाये रखने या बढ़ाने के लिए।
सरकार चाहती है कि या तो ज्यादातर किसान खेती छोड़ दें या फिर बड़ी कंपनियों के लिए खेती करें (ठेका खेती)। यह उसी तरह होगा जैसे उद्योग में बड़ी कंपनियां कल-पुर्जों के लिए छोटी कंपनियों को ठेका दे देती हैं और जो फिर घरेलू उद्यमों को। औद्योगिक क्षेत्र में इसे ‘वैल्यू चैन’ (मूल्य श्रृंखला) कहते हैं। सरकार चाहती है कि खेती में भी ऐसी ही मूल्य श्रृंखला हो। किसान किसी बड़ी कंपनी के लिए खेती करेगा। (सीधे या फिर किसी अन्य छोटी कंपनी के माध्यम से) या फिर खेत को ही किसी कंपनी को या कंपनी के लिए काम करने वाले बड़े किसान को अपनी जमीन किराये पर दे देगा। अभी ही पंजाब-हरियाणा में कई छोटे किसान बड़े किसानों को अपनी जमीन किराये पर दे देते हैं।
यदि यह देश में बड़े पैमाने पर होने लगता है तो एक तो बड़े पूंजीपतियों को खेती में बड़ा व्यवसाय मिल जायेगा और वे खूब मुनाफा कमायेंगे, दूसरे, सरकार की नजर में खेती-बाड़ी की आज की समस्यायें हल हो जायेंगी। कंपनियां बड़ी मशीनों और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करेंगी। वे वही पैदा करेंगी जिसकी बाजार में मांग होगी। सरकार खेती की उपज की खरीद-बेच और उस पर सब्सिडी से बच जायेगी। सरकार की नजर में पंजाब-हरियाणा के किसान जो गेहूं-धान के चक्र में फंसे हुए हैं उससे निकल जायेंगे। और कंपनियां चूंकि वैज्ञानिक ढंग से खेती करेंगी इसलिए मिट्टी की उर्वरता खत्म होने या भूतल के पानी के स्तर के गिरते जाने की समस्या भी खत्म हो जायेगी।
इस तरह सरकार और बड़े पूंजीपति वर्ग की निगाह में कारपोरेट खेती आज खेती-किसानी की हर समस्या का निदान है।
सवालः तीनों नये कृषि कानूनों का वास्तविक मकसद क्या है?
जवाबः कोविड-19 महामारी की आपदा को अवसर मानते हुए मोदी सरकार ने आनन-फानन में जो तीनों नये कृषि कानून बनवाये (जिनको रद्द करना आज के किसान आंदोलन की प्रमुख मांग है) उनका वास्तविक मकसद खेती-किसानी को बड़े कारपोरेट घरानों के हवाले करना तथा कारपोरेट खेती को बढ़ावा देना है। ठेका खेती, खेती की उपज के असीमित भंडारण तथा देश में कहीं भी उसकी खरीद-बेच सबका बस यही मकसद है। इसमें कारपोरेट घरानों को कोई बाधा न हो इसके लिए यह भी प्रावधान कर दिया गया है किसान अदालत नहीं जा सकते। कंपनियों के साथ किसानों के किसी भी विवाद का निपटारा एस डी एम या डी एम करेंगे जो स्वाभाविक तौर पर ही कंपनियों का पक्ष लेंगे।
सवालः कारपोरेट खेती का किसानों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
जवाबः कारपोरेट खेती में किसानों की वही हालत हो जायेगी जो औद्योगिक क्षेत्र में घरेलू उद्यमों की होती है। छोटे किसान कंपनियों के गुलाम हो जायेंगे। वे ज्यादा से ज्यादा मेहनत करेंगे और कम से कम पायेंगे। अंत में वे अपनी जमीन बेचने को मजबूर हो जायेंगे। दोनों ही मामलों में स्वतंत्र किसान के रूप में उनका वजूद समाप्त हो जायेगा।
चूंकि सरकार का इरादा खेती-किसानी को कारपोरेट कंपनियों के हवाले कर खेती-किसानी से पूरी तरह हाथ खींच लेने का है इसलिए वह धीमे-धीमे फसलों की अपनी खरीददारी को खत्म कर देगी। वह राशन की दुकानों को भी बंद कर देगी। ऐसे में स्वतंत्र किसानों को मजबूरन उस बाजार में अपनी उपज बेचनी पड़ेगी जिस पर कारपोरेट कंपनियों का कब्जा होगा। कंपनियां किसान की उपज कोड़ियों के मोल खरीदेंगी। आज किसान को जो थोड़ा-बहुत दाम मिल भी जाता है वह भी बंद हो जायेगा। उनकी बर्बादी और तेज हो जायेगी। सरकार चाहती भी यही है।
सवालः कारपोरेट खेती का बाकी आबादी पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
जवाबः खेती-किसानी पर कारपोरेट कंपनियों के कब्जे से खेती के मालों के दाम वे मनमाने तरीके से तय करेंगी। वे सस्ते से सस्ते माल हासिल कर महंगे से महंगे बेचेंगी। खेती के उपज की देश भर में बेरोक-टोक आवाजाही, असीमित भंडारण तथा बेरोक-टोक आयात-निर्यात का वही परिणाम निकलेगा जो आजकल प्याज के मामले में देखने को मिलता है। ये कंपनियां खूब मुनाफा कमाएंगी। सरकार न इसे कालाबाजारी कहेगी और न इस पर रोक लगायेगी।
खेती की उपज के मनमाने दामों के अलावा पूरे देश में बेरोजगारी बहुत भयंकर रूप में बढ़ेगी। खेती-बाड़ी से उजड़ी किसान आबादी को उद्योगों में काम नहीं मिलेगा क्योंकि वहां पहले ही जगह नहीं है। इस तरह बस स्व-रोजगार का रास्ता बचता है- ‘पकौड़ा तलने का’। लेकिन यह तो बस बेरोजगारी का दूसरा नाम है।
इस बढ़ती बेरोजगारी के कारण हर जगह मजदूरों पर दबाव बढ़ेगा। निकालने का भय दिखाकर पूंजीपति तनख्वाहें घटायेंगे। भय के मारे मजदूर संगठित भी नहीं होंगे। इस तरह आम तौर पर मजदूरों की मजदूरी घटेगी तथा उनकी यूनियनें कमजोर होंगी। पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ेगा और वे मजदूरों पर और हावी होंगे। मजदूरों की हालत बद से बदतर होगी क्योंकि महंगाई बढ़ेगी, मजदूरी घटेगी और वे संगठित होकर प्रतिरोध भी नहीं कर पायेंगे।
सवालः तब फिर संकट का वास्तविक समाधान क्या है?  
जवाबः पूंजीवाद के भीतर खेती-किसानी के संकट का वही समाधान है जिस पर आज भारत का पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार चल रही है। इस पर चलते हुए पचास-सौ साल में भारत की खेती वहां पहुंच सकती है जहां आज यूरोप-अमेरिका की खेती है। वहां आबादी का बहुत थोड़ा हिस्सा ही खेती करता है और उसमें भी सरकार खेती को भारी सब्सिडी देती है। लेकिन एक तो निश्चय के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि पचास-सौ साल में भारत में ऐसा हो ही जायेगा, दूसरे इस लम्बी यात्रा में किसानों को भारी दुःख और कष्ट से गुजरना होगा। खेती-किसानी के संकट का वास्तविक समाधान कारपोरेट खेती के द्वारा बड़े पैमाने की खेती की ओर बढ़ने में नहीं बल्कि सामूहिक खेती के द्वारा बड़े पैमाने की खेती की ओर बढ़ने में है। इसमें कोई दो राय नहीं कि छोटी-छोटी खेती के रहते खेती-किसानी की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। पर सवाल यह है कि बड़े पैमाने की खेती की ओर अंबानी-अडाणी द्वारा उनके मुनाफे के लिए बढ़ा जाये या फिर स्वयं किसानों द्वारा अपने हित में। पहला रास्ता आज के पूंजीवाद का रास्ता है, दूसरा रास्ता भविष्य के समाजवाद का रास्ता है।
     केवल जब क्रांति के द्वारा मजदूर वर्ग (बाकी मेहनतकशों को साथ लेकर) अपना राज कायम करेगा तभी यह संभव होगा कि किसान अपनी छोटी-छोटी खेती को मिलाकर सामूहिक फार्म बनायें और मिल-जुलकर बड़े पैमाने की खेती करें। इसमें समाजवादी सरकार किसानों की हर संभव मदद करेगी। तब खेती से निकले बाकी लोगों को अन्य जगह रोजगार मिल जायेगा। सामूहिक फार्म अन्य संबंधित क्षेत्रों में भी काम कर सकेंगे। इस तरह किसान आज के दुःख-कष्ट से मुक्त हो जायेंगे। इसीलिए छोटे किसानों को मजदूर वर्ग के साथ समाजवादी क्रांति की ओर बढ़ना चाहिए। यही उनकी मुक्ति का रास्ता है।
सवालः क्रांति और समाजवाद तो भविष्य की चीजें हैं। अभी तत्काल किसानों को क्या करना चाहिए?
जवाबः अभी किसानों को अपनी हालत बेहतर करने के लिए उसी तरह संघर्ष में उतरना चाहिए जैसे वे इस समय कर रहे हैं। उन्हें सरकार को मजबूर करना चाहिए कि वह खेती पर अपना बजट बढ़ाये, किसानों के लिए खाद-बीज, बिजली-पानी इत्यादि और सस्ता करे, उनकी फसल को लाभदायक दाम पर खरीदे तथा उसे मुफ्त या अत्यन्त कम दाम पर मेहनतकश जनता को उपलब्ध कराये। इसके लिए वह पूंजीपतियों पर नये कर लगाये तथा उनकी कर माफी बंद करे। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह निकलता है सरकार ठीक उसकी उल्टी दिशा में चले जिस पर वह चल रही है।
सवालः क्या सरकार की उपरोक्त सुविधाएं सभी किसानों को बराबर मिलनी चाहिए?
जवाबः नहीं। जैसा कि पहले कहा गया है सारे किसान एक जैसे नहीं हैं। सरकार ने स्वयं उन्हें पांच श्रेणियों में बांट रखा हैः भूमिहीन और सीमान्त (ढाई एकड़ से कम), छोटा (ढाई एकड़ से पांच एकड़), अर्द्ध मध्यम (पांच से दस एकड़), मध्यम (दस से पच्चीस एकड़) और बड़ा (पच्चीस एकड़ से ज्यादा)। यह पूरे देश के लिए है। अलग-अलग इलाकों में जमीन के उपजाऊपन तथा सिंचाई की व्यवस्था को देखते हुए ये श्रेणियां अलग-अलग हो सकती हैं।
     खेती-किसानी की असल समस्या गरीब व छोटे-मझोले किसानों की है। बड़े किसानों के पास संसाधन ज्यादा होते हैं, मंडी-बाजार में उनकी पहुंच ज्यादा होती है, बैंकों और सरकारी दफ्तरों में भी उनकी पूछ ज्यादा होती है। इसीलिए खेती-किसानी के संकट का उन पर असर कम होता है या उसे सहन कर ले जाते हैं। वे सही दाम पर फसल बेचने के लिए इंतजार कर सकते हैं। वे ई-मंडी, फसल बीमा, कर्ज माफी तथा बैंकों से कम ब्याज पर कर्ज सबका फायदा उठा सकते हैं। अक्सर ही ये देहातों में सूदखोरी करते हैं, मंडियो में आढ़तिये होते हैं। ये खेती के अलावा अन्य व्यवसाय में भी लगे होते हैं।
     कारपोरेट कंपनियों के मुकाबले इन बड़े किसानों की कोई औकात नहीं है। पर बड़ी कंपनियों को भी देहातों में अपने एजेन्ट चाहिए। ये बड़े किसान उन कंपनियों के एजेन्ट बन जायेंगे। कंपनियों के साथ ठेका खेती में भले ही इन्हें कुछ नुकसान हो पर इसकी भरपाई एजेन्ट बन कर हो सकती है। बस इनकी स्वतंत्र हैसियत खत्म हो जायेगी। आज देश के बड़े किसान इसी नफा-नुकसान के बीच झूल रहे हैं। इसीलिए कुछ सरकारी कदम का समर्थन भी कर रहे हैं।
      आज किसान आंदोलन की मांग यह होनी चाहिए कि सरकारी सुविधाओं का प्रथम फायदा छोटे-मझोले व गरीब किसान को मिलना चाहिए। इसके बाद ही बड़े किसान का नंबर आना चाहिए। यदि सुविधाओं का बजट कम हो तो बड़े किसानों को उससे बाहर रखा जाना चाहिए।
   सवालः क्या ‘भारत बनाम इण्डिया’ का नारा सही है?
   जवाबः किसी समय किसान आंदोलन में यह नारा जोर-शोर से लगा करता था। हालांकि इस समय यह उतना नहीं सुनाई पड़ता। यह सही है कि उद्योग खेती का शोषण करता है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि देहातों में सारे शोषित रहते हैं और शहरों में सारे शोषक। शहरों में मजदूर वर्ग सहित ज्यादातर आबादी शोषित ही है। इसी तरह देहातों में बड़े किसान शोषक हैं, शोषित नहीं। देहातों में दूसरे और भी शोषक हैं। इसीलिए देहातों और शहरों को आमने-सामने खड़ा कर ‘भारत बनाम इंडिया’ का नारा लगाना गलत है। वैसे भी महाराष्ट्र में इस नारे को कभी जोर-शोर से उछालने वाला शेतकारी संगठन बाद में उदारीकरण का समर्थक बन गया। आज किसान आंदोलन जिस तरह से कारपोरेट पूंजीपतियों को निशाना बना रहा है वह सही है।
सवालः क्या किसानों के आंदोलन के समर्थन में आई पूंजीवादी पार्टियों पर भरोसा किया जा सकता है?
जवाबः नहीं। ये सभी पार्टियां पिछले तीन दशकों में कभी न कभी केन्द्र में सत्ता में रही हैं और उन्होंने कारपोरेट पूंजीपतियों के लिए ही काम किया है। उन्होंने उन नीतियों को लागू किया जिससे आज खेती-किसानी का संकट इतना गहरा गया है। कांग्रेस पार्टी और अकाली दल का मामला तो इसमें सबसे ज्यादा घृणित है।
 कभी किसानों की पार्टियां मानी जाने वाली पार्टियां (जनता दल से निकली आज भांति-भांति के नाम वाली पार्टियां) भी आज किसानों के साथ खड़े होने के बदले कारपोरेट पूंजीपतियों के चरणों में लोट रही हैं। इसीलिए वे किसानों को केवल भटका ही सकती हैं।
सवालः क्या किसानों का कोई दृढ़ मित्र और सहयोगी है?
जवाबः हां। मजदूर वर्ग किसानों का दृढ़ मित्र और सहयोगी है। वह उसका सच्चा हितैषी है। किसानों की वास्तविक मुक्ति क्रांति और समाजवाद में है। यह क्रांति मजदूर वर्ग की क्रांति है तथा वह इसे छोटे किसानों को साथ लेकर ही सम्पन्न कर सकता है। इस तरह मजदूरों और छोटे किसानों के हित आपस में मेल खाते हैं। मजदूर वर्ग को अपनी क्रांति में साथ लेने के लिए छोटे किसानों को अपने पक्ष में जीतना होगा। इसीलिए कारपोरेट पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार द्वारा खेती-किसानी पर इस हमले का विरोध करने में मजदूर वर्ग को पूरी ताकत से उतरना होगा। किसानों के इस संघर्ष में उतर कर तथा उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर ही वह छोटे किसानों को समझा सकता है कि उनकी मुक्ति अपनी छोटी सी खेती से चिपटे रहने में नहीं बल्कि समाजवाद और उसकी सामूहिक खेती में है।  

    
    लॉकडाउन के 60 दिन बाद भी अयोजनाबद्धता के चलते अमानवीय कष्ट सहने को बाध्य मजदूर वर्ग
  साभार ~~~  ndtvindia  





   अनियोजित व अयोजनाबद्ध लॉकडाउन के चलते मजदूर वर्ग के सामने अमानवीय संकट पर
----  साभार bbc.comhindi




       गिरमिटिया की वापसी
लॉकडाउन में भारतीय उद्योग की मांग में बंधुआ मजदूरी की गूंज........
         .. द्वारा...... विवेक मेनेसेस
  साभार ___     hindi.caravanmagzine.in

      1910 में नटाल, दक्षिण अफ्रीका में गन्ने के खेतों में मजदूरी करने के लिए भारत से मजदूरों को भेजा गया था.उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में, लगभग बीस लाख मजदूरों को ठेके पर दुनिया के दूर-दराज के कोनों में ले जाया गया था.
        2 मई को मेरे राज्य गोवा ने राष्ट्रव्यापी लॉगडाउन के चलते राज्य में फंसे उन प्रवासी मजदूरों का रजिस्ट्रेशन शुरू किया जो वापस अपने-अपने घर लौटना चाहते हैं. घर लौट पाने की उम्मीद में सैकड़ों लोग तुरंत लाइन लगाकर खड़े हो गए. 4 मई की सुबह मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने यह घोषणा कर चौंका दिया कि 48 घंटों के भीतर ही 71000 लोगों ने वापस लौट जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है और उन्हें और लोगों के रजिस्ट्रेशन कराने की उम्मीद है. उस शाम गोवा के एक बड़े व्यवसायी मनोज काकुलो ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट लिखी, “यह तथाकथित प्रवासियों का पलायन गोवा में उद्योग को बर्बाद करके रख देगा. इन लोगों ने हमारा फायदा उठाया और जब हमें काम को शुरू करने के लिए इनकी जरूरत है तो हमें छोड़कर जा रहे हैं. कुछ लोगों का पलायन कर जाना तो समझ में आता है लेकिन इतनी बड़ी तादाद में लोगों का जाना, गोवा के अर्थतंत्र के लिए खराब बात है. काकुलो होटल, ऑटोमोबाइल और रियल एस्टेट का कारोबार करते हैं. काकुला समूह गोवा के कारोबार जगत का जाना-माना नाम है और राजधानी पणजी में जो एकमात्र मॉल है उसका नाम काकुलो मॉल है. पिछले साल मई में मनोज काकुलो 111 साल पुराने गोवा चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष चुने गए हैं.
          अपनी फेसबुक पोस्ट के अगले दिन काकुलो ने राज्य के मुख्यमंत्री को चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष की हैसियत से एक खत लिखा जिसमें उन्होंने शिकायत की, “हमारे संज्ञान में लाया गया है कि लॉकडाउन के पूरे वक्त इन प्रवासी मजदूरों को रहने की जगह और खाने का खाना व मजदूरी दी गई. सच तो यह है कि ये लोग फंसे हुए नहीं थे. लेकिन अब इन लोगों को अपने राज्य लौटने का फ्री का टिकट दिया जा रहा है. बहुत से मजदूर अपने मालिकों को बर्बाद करने के बाद छोड़ कर अपने राज्य वापस जा रहे हैं.”
          काकुलो ने आगे लिखा कि इस तरह बेरोकटोक पलायन से स्थानीय उद्योग, निर्माण क्षेत्र और कृषि पर नकारात्मक असर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि सरकार को स्क्रीनिंग या काउंसलिंग की प्रक्रिया चलानी चाहिए ताकि पता लगाया जा सके कि रोजगार किन लोगों के पास है और उन्हें राज्य में रुके रहने के लिए कैसे मनाया जा सकता है. हमें डर है कि यदि ये लोग अभी चले जाएंगे तो इनको राज्य में वापस आने में वक्त लगेगा और इससे उपरोक्त क्षेत्रों पर असर पड़ेगा.
        काकुलो की ये बातें गोवा के उद्योगपतियों की पुरानी सोच है. उनके जैसे बहुत से उद्योगपतियों ने भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं दी हैं. 6 मई को कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा ने राज्य के बड़े निर्माण व्यवसायियों से मुलाकात की और बाद में राज्य से मजदूरों को बाहर ले जाने वाली ट्रेने रद्द कर दीं. देशभर में हुई थू-थू के बाद ट्रेनों को दुबारा चलाया गया. दो दिन बाद करोड़ों प्रवासी मजदूरों के गढ़ उड़ीसा ने तय किया कि जिन लोगों का कोविड-19 परीक्षण नकारात्मक आएगा बस उन्हें ही राज्य में लौटने दिया जाएगा. ऐसा लगता है कि राज्य सरकार का यह निर्णय अपने राज्य के मजदूरों को लौटने से निरुत्साहित करने के लिए लिया गया था.
         इस बीच भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने आजादी के बाद मजदूरों के संरक्षण के लिए बने महत्वपूर्ण कानूनों को खत्म करने की दिशा में कदम उठा लिए हैं. खत्म किए जा रहे कानूनों में महत्वपूर्ण माने जाने वाला कानून न्यूनतम वेतन कानून, 1948 और उससे संबंधित अन्य कानून हैं जो वेतन, ओवरटाइम की गारंटी और काम के घंटों से संबंधित हैं.
         इसके बावजूद भारतीय उद्योग परिसंघ या सीआईआई खुश नहीं लगता. 8 मई को उसके प्रतिनिधियों ने श्रम और पर्यावरण राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात की और मांग की कि वह मजदूरों को काम में वापस लौटने का निर्देश दें और यदि वे वापस नहीं आते हैं तो उनके खिलाफ औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) कानून और औद्योगिक विवाद कानून के तहत कार्रवाई की जाए. इसके अतिरिक्त प्रतिनिधियों ने मांग की कि औद्योगिक क्षेत्र के पास शेल्टर होम या स्थानीय जगहों पर रह रहे श्रमिकों की पहचान कर उन्हें नजदीकी फैक्ट्रियों में काम पर लगाया जाए.
        इन उद्योगपतियों के इरादे एकदम साफ हैं. इनके हित और चिंताएं, जिन्हें राष्ट्रीय हित बताया जाता है, करोड़ों अर्ध कुशल, आसानी से स्थानांतरित हो सकने वाले, भूखे और आसानी से झुकाए जा सकने वाले भारतीय मजदूरों के जनसांख्यिकी लाभ पर निर्भर हैं. भारत की उत्तरउदारवादी विकास यात्रा में यह एक असंतुलित आपूर्ति समीकरण है. कोरोनावायरस आपातकाल ने इस समीकरण को भी बिगाड़ के रख दिया क्योंकि भारतीय श्रम शक्ति के एक व्यापक हिस्से ने समझ लिया है कि उसे ही अर्थतंत्र को शुरू करने की अंतिम कीमत चुकानी पड़ेगी और इसलिए उन लोगों ने खुद को न्योछावर करने से अच्छा घर जाना समझ लिया है.

झुंड के झुंड बनाकर जब ये लोग पलायन कर रहे हैं तो भारतीय उद्योग जगत की धमकी वाली प्रतिक्रिया उस ज्यादती की प्रतिध्वनि बन जाती है जिसे अर्थशास्त्री बेगार कहते हैं. इस श्रम की बुनियाद पर सामंतवाद और उपनिवेशवाद के भवन खड़े थे और शासकों ने इसे जनहित का नाम दिया था. 30 वर्ष पहले मैंने इस परिघटना के अध्ययन में काफी समय लगाया था. बाद में मेरा अध्ययन लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मेरे मास्टर थीसिस का विषय बना. पिछले 15 दिनों में मैं जो पढ़ रहा हूं वह मुझे उसी बेगारी की वापसी जैसा लग रहा है. लगता है कि हम गिरमिटिया मजदूरी के दौर में वापस लौट रहे हैं.
          जो हमारी आंखों के सामने हो रहा है उससे स्तब्ध और चिढ़कर मैंने उपन्यासकार अमिताभ घोष को पत्र लिखा. घोष की आइबिस ट्रिलॉजी 19वी शताब्दी के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम से लोगों को परिचित कराती है जो हिंद महासागर में घट रहा था और इसमें केंटन में अफीम कारोबार से लेकर मॉरीशस में लोगों की ट्रैफिकिंग तक का उल्लेख है. घोष अमेरिका के ब्रुकलिन में रहते हैं और मुझे उन्होंने तुरंत जवाब दिया, “यह एक डराने वाली कथा है. दुर्भाग्यशाली प्रवासियों को बहुत अधिक भेदभाव और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है और उन्हें बंधुआ बनाकर रखा जाता है. आज की घटनाओं में गिरमिटिया और अन्य रूपों के बंधुआ श्रम की निरंतरता दिख रही है.”
         भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद के प्रोफेसर चिन्मय तुंबे ने इंडिया मूविंग : ए हिस्ट्री ऑफ माइग्रेशन में लिखा है, "भारत में संगठित आव्रजन 1830 के दशक के गिरमिटिया आव्रजन से संबंधित है. उस व्यवस्था में आमतौर पर 3 से 5 साल के लिए कठोर श्रम का फिक्सड टर्म का अनुबंध होता था जिसमें नियोक्ता या नियुक्ति की शर्तों को बदलने का विकल्प नहीं होता था. 1831 और 1920 के बीच गिरमिटिया अनुबंधों के तहत 20 लाख लोग एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीपों में भेजे गए. इनमें से एक तिहाई लोगों को कैरेबियन और एक चौथाई को मॉरीशस, दसवें हिस्से को दक्षिण अफ्रीका और अन्य को फीजी, क्यूबा, पेरू और हवाई जैसे द्वीपों में भेजा गया."
          लेकिन इसके साथ भारतीय उपमहाद्वीप में बड़ा बदलाव हो रहा था. तुंबे ने बताया है कि भारत में असम के चाय बागानों के लिए जो गिरमिटिया आव्रजन हो रहा था उसमें 19वीं और 20वीं सदी के बीच के दशकों में अनुमानित 20 लाख लोग चाय बागानों में पहुंचे थे. उन्होंने बताया है कि गिरमिटिया श्रम की सबसे खराब बात यह थी कि इसमें मृत्यु दर बहुत उच्च थी और प्लैंटर्स या बागानों के मालिकों के पास सख्त कदम उठाने के विशेष कानूनी अधिकार थे.
          सीआईआई आज जो कानून देशभर में लागू करना चाहता है उसमें उपरोक्त उत्पीड़न का स्वर है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, गुवाहाटी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज के डीन संजय बारबोरा ने 1999 में लिखे अपने शोध पत्र में लिखा है, “गिरमिटिया व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी ताकि प्लैंटर्स को कठोर सजा देने की अनुमति हो ताकि मजदूरों द्वारा अनुबंध के उल्लंघन करने पर आपराधिक मामला चलाया जा सके. इसका इरादा मजदूरों को अपनी श्रमशक्ति को मालिकों से वापस खींच लेने के अधिकार से वंचित करना था. प्लैंटर्स के इन उपायों के लिए जो कानूनी प्रावधान थे उन्हें वर्क्समैन ब्रीच ऑफ कॉन्ट्रैक्ट एक्ट 12 (1859) और 1865 के उसके संशोधन से मजबूती मिली जिसमें हड़ताल के लिए मजदूरों को सजा दी जा सकती थी."
          आज की तरह उस वक्त भी इन अमानवीय उपायों से व्यापक असंतोष फैला था. 2011 में आई किताब अंपायर गार्डन : असम एंड द मेकिंग ऑफ इंडिया में टोरंटो में रहने वाले इतिहासकार गीता शर्मा ने लिखा है कि भर्ती के पुराने जिलों के लोग कठोर परिस्थितियों से वाकिफ हो गए थे और सदी के आखिर में छोटा नागपुर के लोग असम के आव्रजन को “आदमी की बिकवाली” बताने लगे थे. उनके बच्चों ने जान लिया कि असम मौत का फंदा है जहां से उनके पुरखे कभी लौटकर नहीं आए. शर्मा ने लिखा है कि विद्रोहों ने जैसे महामारी का रूप ले लिया और प्लैंटर्स हमेशा शिकायत करते रहते थे कि “गिरमिटिया कुली धीमी गति से काम करते हैं और चाय के पौधों को बर्बाद कर रहे हैं जो संयुक्त रुप से विद्रोह करने का उनका तरीका है” और इनके खिलाफ बहुत कठोर उपाय किए जाते.
         लगभग 99 साल पहले का चारगोला वॉकआउट (हड़ताल) आज के पलायन से बहुत बड़ा था. 20 मई 1921 को चाय बागानों में काम करने वाले हजारों मजदूरों ने, जो चारगोला घाटी की श्रम शक्ति का लगभग 50 फीसदी हिस्सा थे और जो असम का सबसे ज्यादा चाय पैदावार वाला इलाका था, संयुक्त रूप से काम छोड़ दिया. इन लोगों ने अपना सामान पैक किया और 40 किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंच गए जहां से उन लोगों ने चांदपुर बंदरगाह की टिकट ली. चांदपुर बंदरगाह अब बांग्लादेश के चटगांव संभाग में आता है. इन लोगों ने कसम खाई कि वे कभी आसाम लौट कर नहीं आएंगे. लेकिन 21 मई को ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स ने उन लोगों पर हिंसक हमला किया. उनके साथ हुई बर्बरता के समाचार दुनिया भर में छपे और वह बर्बरता राष्ट्रवादी आंदोलन का कारण भी बनी.
          1987 में इकोनामिक एंड पॉलीटिकल वीकली में विश्लेषक कल्याण सरकार ने लिखा, “बाद तक भी चाय बागानों के मालिकों का मजदूरों से काम करवाने के लिए कठोर दंड के उपायों पर विश्वास कायम रहा लेकिन मजदूरों के विरोध ने कई प्रबंधन प्रथाओं को अस्वीकार्य बना दिया.” सरकार ने लिखा है कि चारगोला पलायन ने लंबे समय से प्रांत के बागानों में चले आ रहे तरीकों और प्रथाओं को बेकार साबित कर दिया और श्रमिकों के असंतोष और कार्रवाई के प्रति प्रबंधन को ज्यादा उदारता (सोफेस्टिकेश) के साथ व्यवहार करने के लिए मजबूर किया."

           क्या आज भारत में जिस तरह से उत्पीड़न करने वाले काम को मजदूर बड़े पैमाने पर छोड़कर चल दे रहे हैं उससे कोई सकारात्मक बात निकलकर आएगी. यह भी एक संभावना है. संभवतः मध्यकालीन यूरोप में ब्लैक डेथ के बाद जो हुआ उस तरह का कुछ यहां हो. 14वीं शताब्दी के मध्य में ब्लैक डेथ ने यूरोप की लगभग एक तिहाई आबादी खत्म कर दी थी.
          इतिहासकार पीटर फ्रैंकोपेन ने अपनी किताब सिल्क रोड : ए न्यू हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड में लिखा है कि ब्लैक डेथ प्लेग सामाजिक और आर्थिक बदलाव का कारण बना जिसने यूरोप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने लिखा है कि शहरी वेतन में नाटकीय बढ़ोतरी हुई. किसानों, मजदूरों और महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ और जमींदार जैसे संपत्तिवान वर्गों को अपनी जमीन पर कम किराया लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. उन लोगों को यह मानना पड़ा कि कुछ ना मिलने से कम राजस्व मिलना ही ठीक है. कम किराया और भी कम शर्तें और लंबे समय की लीज ने किसानों और शहरी किराएदारों को फायदा पहुंचाया और उन्हें ताकतवर बनाया."
          आज कई सदियों बाद भारतीय अर्थतंत्र को उपरोक्त किस्म का लाभ मिलने के लिए जरूरी होगा कि सरकार विशेष औद्योगिक हित की ओर से हस्तक्षेप करना बंद करे. यहां गोवा में, जहां मैं चीजों को नजदीक से देख रहा हूं, बहस में राष्ट्रव्यापी बहस की स्पष्ट गूंज है. यह औपनिवेशिक दौर की पुनरावृत्ति है. उदाहरण के लिए 9 मई को ओ हेराल्डो समाचार पत्र ने उद्योगपति ब्लाइस कोस्टबीर की टिप्पणी प्रकाशित की जिसमें उन्होंने लिखा था, "यह वक्त गोवा के अर्थतंत्र को दुरुस्त करने का वक्त है. हम गोवा के लोग बहुत से कामों को अपने हाथों में ले सकते हैं और बाहरी लोगों पर अपनी निर्भरता को कम कर सकते हैं." लेकिन दूसरे व्यवसाई विनय बोरकर ने शिकायत की, "यह पूरी तरह से बेवकूफाना है. यदि ये लोग चले गए और लौट कर नहीं आए तो इनकी जगह कौन भरेगा. वे जो करते हैं बहुत कठिन काम होते हैं और गोवा के लोग इन्हें करना नहीं चाहेंगे और यही जमीनी हकीकत है."
          19वीं सदी के आर्थिक इतिहास को दोबारा पढ़ने से हम आसानी से देख सकते हैं कि ये शब्द, विचार और तर्क ब्रिटेन, फ्रांस और डच प्रशासन के नीतिनिर्माता लगातार दोहराते थे. अपनी हृदय विदारक और महत्वपूर्ण किताब कुली वुमन : ऑडिसी ऑफ इंडेंचर में पुरस्कार विजेता लेखिका और शिक्षाविद गायत्री बहादुर, जो भारतीय गिरमिटिया कामगारों की वंशज हैं, बागान मालिकों के बारे में लिखती हैं कि उनका विश्वास था कि दशकों के सुधारों ‌ने गिरमिटिया व्यवस्था को परिष्कृत कर दिया और यह व्यवस्था पूरी दुनिया के लिए विनीत और निर्भर नस्ल की भलाई वाले लाभप्रद नियंत्रण की ब्रिटिश लोगों की निष्पक्षता, ईमानदारी और संगठन की मिसाल है.
         बहादुर ने अपनी किताब में एक जबरदस्त बात कही है. उन्होंने लिखा है कि ब्रिटिश लोगों ने गन्ने के खेतों के लिए कुलियों की भर्ती नहीं की बल्कि उन्होंने कुलियों का निर्माण किया. बहादुर ने लिखा है, “इस तरह उन्होंने माली, पालकी ढोने वाले, सुनार, चरवाहों, चमड़े का काम करने वालों, नाविकों, सैनिकों और पुजारियों को, जिनकी सदियों की धार्मिक, कुल और व्यवसायिक पहचान थी, एक पहचान रहित तुच्छ प्लांटेशन मजदूरों की भीड़ में तब्दील कर दिया.
       बहादुर की किताब का विमोचन 2013 में गोवा कला एवं साहित्य फेस्टिवल में हुआ था जिसमें मैंने उनसे किताब पर चर्चा की थी. इस सप्ताह के शुरुआत में मैंने बहादुर को ईमेल किया और बताया कि जिस बात की चर्चा हमने फेस्टिवल में की थी वह आज के हालत से कितनी मिलती है. बहादुर अमेरिका के जर्सी शहर में रहती हैं. उन्होंने मुझे वहां से लिखा, “मैं उन दर्दनाक कहानियों को पढ़ रही हूं जिनमें प्रवासी मजदूर, बिहार और अन्य स्थानों में जाने के लिए सड़कों पर चल रहे हैं. इसने मुझे कैरेबियन में उन भारतीयों के बारे सोचने के लिए मजबूर किया है जिन्हें कैरेबियन में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में लाया गया था. पहले-पहल वहां पहुंचे प्रवासी मजदूर वर्षावनों में भाग जाया करते थे यह सोचकर कि वे लोग दक्षिण अमेरिका से पैदल चलकर दक्षिण एशिया पहुंच सकते हैं. ऐसा प्रयास करते हुए कितने ही लोग मारे गए.
      मैंने बहादुर से पूछा कि गिरमिटिया का दीर्घकाली असर क्या होता है, तो उन्होंने पूछा, “गुलामी तो गुलामी है. क्या गुलामी की क्षतिपूर्ति हो सकती है? वह व्यवस्था साम्राज्यवादी पूंजीवाद की मशीन का हिस्सा थी और निश्चित रूप से जिन लोगों ने अपना देश छोड़ा उनके लिए अच्छे अवसर मिलने के रास्ते खुले. उदाहरण के लिए वे जाति से मुक्त हुए. इसलिए मुझे नहीं लगता कि भारतीय शहरों में आने वाले प्रवासी मजदूर उन गिरमिटिया मजदूरों से अलग हैं जो कैरेबियन लाए गए थे. इनमें लिटरली (शब्दशः) के साथ, क्योंकि गिरमिटिया भी भोजपुर के अंदरूनी इलाकों से आए थे, आध्यात्मिक समानता भी है. इनके भीतर भी वही विदेशिया आत्मा होती है जो हमेशा उस खोई हुई चीज की आस में रहती है जिसे वे पीछे छोड़ आए हैं.
        बहादुर ने कहा कि भारत को छोड़ना किसी चीज से टूटने के साथ ही, किसी चीज के निर्माण की कहानी भी है. “मुझे लगता है कि विरोध की भावना, खुद को नया बनाने के लिए अपने अधिकारों पर डटे रहना, विदेशिया गाते हुए अपने घर लौटने की कोशिश करते रहना, यही एक समाधान है जो मैं प्रवासी मजदूरों से साझा कर सकती हूं.” गिरमिटिया का सबक विरोध करना है जो आपकी पहचान बनाता है.
         उन्होंने लिखा कि इतने सारे लोगों को अपने गांव में लौटने की कोशिश करते हुए देखने ने उनके भीतर का कुछ हिला दिया है. जैसे कोई ऐसी याद, जो आर्काइव और ब्रॉडकास्ट समाचार के बीच फंसी हुई थी. “निश्चित तौर पर आज मजदूरों की वापसी को उतना त्रासद नहीं बनने देना चाहिए जितना कि मेरे पुरखों के लिए था.”

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