अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम
अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना पड़ा है। ईरानी संप्रभुता को इजरायली विस्तारवादी शासकों के दम पर रौंदने और अपनी कठपुतली ईरान में बिठाने में अमेरिकी कामयाब नहीं हो पाए हैं। ईरानी शासकों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष में कुर्बानियां भी दी और समर्पण नहीं किया। इस तरह यह ईरान की रणनीतिक जीत भी है। इजरायली शासक खामोश हैं। वे यहां अमेरिकी साम्राज्यवादियों पर निर्भर हैं।
इस युद्धविराम को समझने के लिए सतही मुद्दों (ईरान का परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, अमेरिकी सेना की उपस्थिति) से परे जाना होगा। यह संघर्ष का एक छोटा पड़ाव है, जिसका सार अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा है – अमेरिकी साम्राज्यवाद चीन और रूस के उभरते साम्राज्यवादी ध्रुवों के खिलाफ पश्चिम एशिया में अपने लड़खड़ाते आधिपत्य को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस नजरिए से देखें तो, दो सप्ताह के इस युद्धविराम ने अमेरिका को रणनीतिक झटका दिया है। ट्रंप को अपनी सख्त अल्टीमेटम (हॉर्मुज को पूर्ण, तत्काल और सुरक्षित खोलो) से पीछे हटना पड़ा और दो सप्ताह के युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा – जिसे ईरानी मीडिया ने ‘अपमानजनक वापसी’ करार दिया। इस पीछे हटने के कारण थे: युद्ध से बढ़ती तेल की कीमतों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दबाव, ट्रंप की गिरती अप्रूवल रेटिंग, और इराक जैसे युद्ध के दलदल में फंसने का डर। ईरान, जो चीन-रूस साम्राज्यवादी गुट का एक प्रमुख सहयोगी है, ने हॉर्मुज पर ‘नियंत्रित पुन:खोलने’ की शर्त मनवाकर अपनी असममित सैन्य क्षमताओं को कूटनीतिक जीत में बदल लिया।
क्षेत्रीय शक्तियों की भूमिका भी इसी अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा में रंगी है। पाकिस्तान (चीन का सबसे करीबी सहयोगी) मुख्य मध्यस्थ के रूप में उभरा, जिसने अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव को संतुलित करते हुए चीन-समर्थित समाधान को आगे बढ़ाया। तुर्की और मिस्र ने क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, जबकि रूस ने ईरान को गुप्त खुफिया सहायता देते हुए युद्धविराम का स्वागत किया। चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर पांच-सूत्रीय शांति योजना पेश की और इस्लामाबाद को बातचीत का मंच बनाकर अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को प्रदर्शित किया।
कुल मिलाकर, इस युद्धविराम में अमेरिकी साम्राज्यवाद सैन्य और कूटनीतिक रूप से पीछे हटने को मजबूर हुआ, जबकि चीन-रूस गुट (जिसमें ईरान एक प्रमुख सहयोगी है) ने रणनीतिक लाभ अर्जित किया। हालांकि, यह केवल एक अस्थायी ठहराव है, क्योंकि मूल अंतर्विरोध – पश्चिम एशिया पर आधिपत्य के लिए अमेरिकी और चीनी-रूसी साम्राज्यवाद के बीच संघर्ष – पूरी तरह अनसुलझा है। अब आगामी इस्लामाबाद वार्ता ही तय करेगी कि यह युद्धविराम बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में एक कदम है या फिर टकराव का नया, और अधिक खतरनाक दौर शुरू होता है।
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