Friday, 6 March 2020

8 मार्च: अंतराष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद

       8 मार्च: अंतराष्ट्रीय महिला दिवस ज़िंदाबाद
 आज से लगभग 110 साल पहले, 1910 से 8 मार्च 'कामगार महिलाओं' के लिए बराबरी के अधिकार व संघर्ष का प्रतीक बन गया। 1917 में रूस में समाजवादी क्रांति हुई तो महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। समाजवादी रूस में महिलाओं को शिक्षा, नौकरी  से लेकर हर जगह बराबरी के अधिकार हासिल हुए।
 
    आज हालात क्या हैं? हमारे समाज में आम महिलाओं की क्या स्थिति है? कामकाजी महिलाओं की क्या स्थिति है? आम महिलाओं के खिलाफ अपराधों की क्या स्थिति है?
    कोई भी आसानी से कह सकता है कि आम महिलाओं की, कामकाजी महिलाओं की स्थिति कुछ मायने में पहले से बेहतर हुई है तो कई मायनों में स्थिति खराब भी हुई है। यह आज पूरी दुनिया के लिए सच है।
      आज के दौर में आम महिलाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा 'असुरक्षा' का है। रातें तो पहले ही महिलाओं के लिए खतरनाक मानी जाती थी, एक अघोषित 'कर्फ्यू' रात में महिलाओं पर लागू हो जाता था। मगर अब दिन भी खतरनाक हो गए हैं। महिलाएं घर की चारदीवारी के भीतर भी असुरक्षित हैं तथा बाहर भी। बात इतनी ही नहीं है, स्त्री चाहे वह बच्ची हो या 70-80 साल की, कोई भी सुरक्षित नहीं है।
यही नहीं, आज समाज में बढ़ती बेरोजगारी की एक वजह 'कामकाजी महिलाओं' को भी बताया जाता है। जबकि महिलाओं की बराबरी, समानता के अधिकार के लिए बेहद जरूरी है कि महिलाओं की 'सामाजिक उत्पादन' में भागीदारी अवश्य बने यानी वह नौकरी करें या रोज़गार करें आत्मनिर्भर बनें ।
      महिलाओं को दोयम दर्जे का मानने वाली सोच, आज भी बनी हुई है। एक तरफ सदियों पुरानी पुरुषप्रधान सोच कि महिला पैर की जूती है, महिलाएं पुरुषों के लिए हैं आज भी बनी हुई है। तो दूसरी तरफ आज इंटरनेट व फ़िल्म इंडस्ट्री ने महिलाओं को 'खाने-पीने व मौज की वस्तु' यानी 'यौन वस्तु' में बदल दिया है। ये दोनों सोच  मिलकर एक ऐसे 'खतरनाक पुरुष' को तैयार कर रही है जो उन्नाव, कठुवा, हैदराबाद, आगरा व पौड़ी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।
      लेकिन यही स्थिति शासक वर्ग की महिलाओं की नहीं है यानी सोनिया गांधी, निर्मला सीतारमण, मेनका गांधी, मायावती, ममता बनर्जी आदि की नहीं है। क्योंकि ये शासक हैं। आम महिलाएं, कामकाजी महिलाएं जो मेहनतकश जनता का हिस्सा हैं उन्हीं की यह स्थिति बनती हैं।
      आज देश में जब से नागरिकता संशोधन कानून आया है तथा देश में हर जगह एन पी आर होनी है तब ऐसे में भी सबसे ज्यादा खतरे की तलवार भी महिलाओं पर ही लटकी हुई है। आम तौर पर अधिकांश महिलाओं के पास ही दस्तावेज नहीं मिलेंगे जिससे साबित होता हो कि वह देश की नागरिक हैं। असम में यही स्थिति बनी थी।
      अभी दिल्ली में 'दंगे' प्रायोजित किये गए। इस प्रायोजित दंगे में सबसे ज्यादा किसे झेलना पड़ा? महिलाओं को ही। महिलाओं के साथ यौन हिंसा की गई। ऐसा हर दंगों में होता है, ऐसा हर संघर्षों में होता है कि निशाने पर महिलाएं ही होती हैं। अलग उत्तराखंड के लिए जब संघर्ष हुआ था तब 'रामपुर तिराह कांड' हुआ था जहां दिल्ली प्रदर्शन के लिए जा रही बसों को रोककर उत्तराखंड की महिलाओं के साथ यू.पी. पुलिस ने जमकर यौन हिंसा की थी, बलात्कार किये थे। सब जानते हैं कि यह सब सरकार के इशारे पर ही होता है। चाहे सरकार किसी की पार्टी हो।
      समाज में होने वाला हर अन्याय, हर उत्पीड़न आम तौर पर महिलाओं की स्थिति को कमजोर करता है उन्हें पीछे धकेलता है। इसी की उल्टी बात भी सच है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाला हर अन्याय, हर हिंसा पूरे समाज को भी पीछे धकेल देती है।
     इसीलिये जरूरी है कि बराबरी, भाईचारे तथा अन्याय-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में मेहनतकश महिलाएं व मेहनतकश पुरुष मिलजुलकर, एकजुट होकर संघर्ष करें।
      आज देश में स्थिति बेहद गंभीर है। अर्थव्यवस्था भीषण संकट में है, बेरोजगारी 45 सालों में सबसे ज्यादा है। बैंक डूब रहे हैं इसी के साथ इनमें जनता की मेहनत की कमाई भी डूब रही हैं। कारोबारियों-दूकानदारों की स्थिति बहुत खराब है। लाखों की संख्या में मज़दूरों की नौकरियों से छंटनी हो चुकी है। अन्ततः इस सबका बुरा असर भी आम महिलाओं पर ही पड़ना है। दूसरी ओर इस संकट में भी देश के शीर्ष पूंजीपति अम्बानी,अडाणी, टाटा जैसे लोग मालामाल हो रहे हैं वहीं भाजपा सबसे अमीर पार्टी बन चुकी है।
ये शीर्ष पूंजीपति मोदी-शाह की अगुवाई में हिन्दू फासीवादी राजनीति के जरिये जनता के हर संघर्ष को कुचल रहे है। यही नहीं, इनके राज में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा व बलात्कार करने वाले चिन्मयानन्द, कुलदीप सेंगर, नित्यानंद जैसे लोगों को खुलकर बचाने का काम भी हो रहा है।
      सही मायने में इनका 'हिन्दू राष्ट्र' महिलाओं को गुलामी की स्थिति में धकेलने वाला है। आज यह खतरा काफी बढ़ चुका है इसलिए आज आम  जरूरी है कि एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया जाय। यह भी जरूरी है कि जिस पूंजी ने, पूंजीवाद ने पूरे समाज को अपनी जकड़न में ले लिया है और समाज को अब भाजपा की फासीवादी राजनीति के जरिये बर्बरता की तरफ धकेल दिया है उस पूंजी पर काबू पाने के संघर्ष को तेज़ किया जाय, पूंजीवाद को खत्म कर समाजवादी समाज कायम करने की ओर बढ़ा जया।

No comments:

Post a Comment

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...