Tuesday, 22 March 2022

भगत सिंह शहादत दिवस पर

भगत सिंह शहादत दिवस पर

          23 मार्च भगत सिंह का शहादत का दिन है। 1931 में इसी दिन अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दी थी। इसी दिन राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई थी। ये सभी शहीद हो गए मगर हमारी यादों में आज भी ज़िंदा हैं।
         भगत सिंह को हम क्यों याद करते हैं ? क्यों भगत सिंह का नाम शहीदों में सबसे ऊपर है ? क्यों भगत सिंह को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की आम जनता याद करती है ? भगत सिंह के विचारों में ऐसा क्या था कि वह आम जनता के दिलों में बसते हैं?
        शहीद भगत सिंह के पास एक विचार था, एक दृष्टि थी। भगत सिंह मजदूरों, किसानों की राजनीति करते थे। वह आम जनता की लूट-खसोट के विरोधी थे। शहीद भगत सिंह ऐसा समाज चाहते थे जहां हर चीज की मालिक आम जनता हो। समाज की जरूरत के हिसाब से हर चीज पैदा हो। हर किसी के लिए रोज़गार, इलाज, पढ़ाई की गारंटी हो।
       शहीद भगत सिंह को आम जनता की  मेहनत की लूट-खसोट मचाने वाले देशी-विदेशी पूंजीपतियों और जमींदारों से नफरत थी।
        दूसरे देश को गुलाम बनाने वाले विदेशी शासकों से भगत सिंह को नफरत थी। मेहनतकश जनता का राज समाजवाद लाना ही भगत सिंह का मकसद था। इसी के लिए उन्होंने संघर्ष किया।
     इसीलिए ये लुटेरे अंग्रेज, देशी-विदेशी पूंजीपति और जमींदार इन विचारों से डरते थे। आज के शासक भी इसीलिए भगत सिंह के विचारों से डरते हैं। ये जानते हैं भगत सिंह के विचारों पर जिस दिन जनता खड़ी होगी, उस दिन इनकी लूट खसोट खत्म हो जाएगी।
         भगत सिंह को हिंदू-मुस्लिम जनता के बीच फूट डालने वालों व जनता की एकता को कमजोर करने वालों से नफरत थी। अंग्रेज़ सरकार और पूंजीपति इन संगठनों को पालते पोसते थे। इनकी नीति थी - आम जनता के बीच "फूट डालो" और "राज करो"।
        'हिंदू कट्टरपंथी' संगठन मुस्लिमों के खिलाफ नफरत पैदा करते थे जबकि 'मुस्लिम कट्टरपंथी' संगठन हिंदुओं के खिलाफ नफरत पैदा करते थे। इस तरह आज़ादी का आंदोलन कमजोर पड़ जाता था, लूट खसोट के खिलाफ संघर्ष आगे कमजोर पड़ जाता था। इस जहरीली राजनीति के खिलाफ भगत सिंह ने लेख लिखा 'साम्प्रदायिक दंगे और इनका इलाज'।
          यही वजह है भगत सिंह को हर जगह की जनता याद करती है। कई लोग और संगठन उनके विचारों को याद करते हैं उस पर चलते हैं। भगत सिंह की इसी साख का कुछ संगठन, पार्टियां इस्तेमाल करती हैं। वे भगत सिंह की फ़ोटो तो जरूर लगाते हैं मगर काम हिटलर-मुसोलिनी वाला करते हैं।
       आज जो राष्ट्रवाद की बात करते हैं संस्कृति की बात करते हैं हिंदू धर्म पर खतरे की बात करते हैं उन्हें आज़ादी से नफरत है बराबरी से नफरत है। ये पूंजीपतियों के नंगे सेवक हैं। जब भगत सिंह जैसे नौजवान देश के लिए कुर्बान हो रहे थे तब ये फर्जी राष्ट्रवादी अंग्रेजों, जमींदारों के हित साध रहे थे।
         अब देश को आज़ाद हुए 75 साल हो चुके। क्या भगत सिंह ने जैसा समाज चाहा था, यह वैसा ही समाज है? नहीं। क्या आज समाज में हिंदू मुस्लिम जनता के बीच गहरी खाई नहीं पैदा कर दी गयी हैं ? क्या दूसरे धर्म का 'काल्पनिक और फर्जी खतरा' इन संगठनों और पार्टियों ने हम जनता के दिमाग में नहीं बिठाया है? व्हाट्स एप्, फेसबुक, अफवाहों व तरह तरह से झूठे, आधे अधूरे सत्य और  मनगढ़न्त बातों से जहर दिमाग में ठूंसा जा रहा है।
      शहीद भगत सिंह अपने जमाने में काले कानूनों के खिलाफ लड़े थे। 1928 में अंग्रेज सरकार 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' लायी। इससे अंग्रेज फैक्ट्रियों में मजदूरों की हड़ताल को खत्म कर देना चाहते थे । आज़ादी के आंदोलन को खत्म करने के लिए 'पब्लिक सेफ्टी बिल' (कानून) लायी। किसी भी हड़ताल को गैरकानूनी बताकर कुचलना आसान था। किसी को केवल शक होने पर बिना मुकदमे के जेल में डाला जा सकता था।
         इन काले कानूनों के विरोध में ही भगत सिंह ने असेंबली में बम विस्फोट किया। ताकि बहरों को आवाज सुनाई जा सके। अंग्रेज सरकार और पूंजीपतियों व जमींदारों की नज़र में भगत सिंह आतंकवादी थे, देशविरोधी थे। इसीलिए भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी हुई।
आज़ादी के बाद क्या हाल हैं? राष्ट्र या देश के नाम पर जनता के खिलाफ कानून बनते हैं। आतंकवाद के नाम पर काले कानून बनते हैं। आज यू.ए.पी.ए., राजद्रोह, पब्लिक सेफ्टी कानून, रासुका, एस्मा जैसे काले कानूनों की भरमार है।
        इन काले कानूनों का इस्तेमाल जनता के खिलाफ ही होता है। टाडा में 97 प्रतिशत बेगुनाह लोगों को फंसाया गया। यही हाल राजद्रोह, यू.ए.पी.ए. और रासुका का है।  
         जब भी कर्मचारी हड़ताल पर आते हैं इसे रोकने के लिए सरकार एस्मा (आवश्यक सेवा अनुरक्षण कानून) लगा देती है।
        आम जनता के पक्ष में आवाज उठाने वालों को अधिकतर लोगों को इन काले कानूनों में फर्जी मुकदमे लगाकर फंसाया जाता है। हज़ारों बेकसूर लोग जेलों में सड़ाये जा रहे हैं। आज जो कोई भी मोदी सरकार की पोल खोलते हैं या अपनी मांगों पर आंदोलन करते हैं वही देश विरोधी हैं, अरबन नक्सल हैं, आतंकवादी हैं।
         मोदी सरकार घोर मजदूर कर्मचारी विरोधी श्रम कानून भी बना चुकी है। ये इसे अब पूरी तरह से लागू करने वाले हैं। अब काम के घंटे 12 हो गए हैं। हड़ताल करना बेहद मुश्किल है। फैक्ट्री मालिकों को मेहनत की लूट की खुली छूट है।
         इनके राज में सरकारी नौकरियों में भर्तियां ही बेहद कम हो गयी हैं। अधिकांश भर्तियां ठेके के भरोसे हैं। अब मोदी सरकार यू.पी.एस.सी. और विश्विद्यालयों में भी अपनी मनमर्जी के हिसाब से शिक्षकों की भर्ती सीधे करेगी। पढ़े-लिखे नौजवान जो सरकारी नौकरी उम्मीद में दिन-रात मेहनत करते थे, उनकी उम्मीदें बिल्कुल मुरझा गयी हैं।
         आज हालत क्या है। एक तरफ भयानक बेरोजगारी है, दूसरी तरफ ऊंची महंगाई है। इलाज कराना बेहद मुश्किल है। पढाई काफी महंगी है। हर चीज पर टैक्स बढ़ाकर इन्होंने महंगाई बहुत बढ़ा दी है। इधर रोजगार का कोई भरोसा नहीं।
          देश जनता का है। करोड़ो-करोड़ जनता ने इसे अपने मेहनत और खून-पसीने से इसे सींचा है। इस भारत का निर्माण किया है। मगर यही जनता हर चीज के लिए मोहताज हैं। इस जनता के बेटे-बेटियों के लिए ठेके की नौकरियां हैं या फिर पकोड़ा तलने का रोजगार।
         2020 के सख्त लॉकडाउन और इसके बाद जब हर घंटे 2 लाख लोगों का रोजगार चौपट हो रहा था तब अंबानी हर घंटे में 90 करोड़ रुपये कमा रहा था।
         मोदी जी और इनकी सरकार कॉरपोरेट मालिकों की सबसे अच्छी चौकीदार है, सबसे बढ़िया सेवक है। इसीलिए इनकी पार्टी भी सबसे ज्यादा अमीर पार्टी है।
        कॉरपोरेट बिड़ला वाली वोडाफोन-आईडिया कंपनी घाटे में चल रही थी। इस पर लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज था। मोदी सरकार ने जनता के पैसों से (सरकारी खजाने से) इसकी भरपाई कर दी। सबसे ज्यादा हिस्सेदारी इसमें अब सरकार की है मगर सरकार इसकी मालिक नहीं ।
       इस तरह कॉरपोरेट घराने मोदी राज में खूब तरक्की कर रहे हैं। मोदी जी के परम मित्र अडानी और अंबानी दुनिया की टॉप पूंजीपतियों की लिस्ट में आ चुके हैं । टाटा को एयर इंडिया कौड़ी के मोल हासिल हो गयी है। फिर मोदी जी 'महान' क्यों ना हों !
       ये मुट्ठी भर कॉरपोरेट घराने ही असली शासक हैं यही हर संसाधनों के मालिक हैं। यही देश के मालिक हैं। सरकार इनकी मुट्ठी में है। ये जिसकी चाहें उसकी सरकार बना दें। राहुल, केजरीवाल, अखिलेश आदि सभी इनके सेवक हैं
        यही कॉरपोरेट घराने अपने मुनाफे की हवस में समाज को गहरी खाई की ओर धकेलते जा रहे हैं। इन्होंने करोड़ों-करोड़ आम जनता के अधिकारों पर डांका डाला है,  इनकी मेहनत को हड़पा है और इन्हें कंगाली में धकेला है। इन्होंने जनता के अधिकार को 'खैरात' बना दिया है। आम नागरिकों को कंगाल करके 'लाभार्थी' बना दिया है।
          यही हिंदू-मुस्लिम की ज़हरीली राजनीति को आम जनता के दिमाग में डलवाने वाले असली गुनाहगार हैं। 'फूट डालो-राज करो', यही इनकी नीति है।
          इस सबके बावजूद बेरोजगार रोजगार के लिए सड़कों पर उमड़ आ रहे हैं। किसान साल भर तक सड़कों पर डटे रहे। सी ए ए, एन आर सी के विरोध में देश भर में संघर्ष हुए हैं। इसी संघर्ष से ये डरते हैं। इसे कमजोर करने के लिए ही 'हिंदू मुस्लिम' की जहरीली राजनीति आम जनता में ठूंस रहे हैं।
         क्या शहीद भगत सिंह ने ऐसे ही समाज का ख्वाब देखा था? क्या भगत सिंह का 'समाजवाद' यही है ? नहीं। यह लंपट पूंजीवाद है। यह टाटा-बिड़ला, अडानी-अंबानी का राज है।
आइये ! शहीद भगत सिंह के रास्ते पर बढ़ने का संकल्प लें। संघर्षों के रास्ते पर बढ़ें। यही आम जनता की तमाम तकलीफों से मुक्ति का रास्ता है

भाजपा की जीत और इसके मायने


      
           भाजपा की जीत और इसके मायने
 
            भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जीत हासिल कर ली। उत्तराखंड व मणिपुर में भी भाजपा बहुमत से जीत गयी। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने बहुमत हासिल कर लिया। गोवा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गयी।
            उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण था। इसे जीतने के लिए मोदी शाह योगी और संघ ने हर दांव चला, हर हथकंडे अपनाए।
            जहां तक विपक्षी पार्टियों का सवाल है वह भी आजमाए हुए थे। पिछले पांच सालों में जनता के मुद्दे पर जनता को संगठित करने का कोई प्रयास इन्होंने नहीं किया। ये केवल और केवल भाजपा के खिलाफ जनता के गुस्से पर सवार होकर सत्ता हासिल करना चाहते थे। इसमें ये असफल हुए।
           उत्तर प्रदेश जीतने का मतलब राज्य सभा में सीटों का बढ़ना भी है। इससे भाजपा की मजबूती राज्य सभा में बनी रहेगी। राष्ट्रपति के चुनाव में भी यह भाजपा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
          यदि आंकड़ों की बात की जाय तो उत्तर प्रदेश में इस बार भी भाजपा का वोट 1.6 प्रतिशत बढ़ गया। मगर  सीट 57 कम हो गयी। 312 से 255 रह गयी। सपा को 64 सीट का फायदा हुआ जबकि इसके 10 प्रतिशत वोट बढ़ गए। इसकी सीट अब 111 हो गयी हैं।
           उत्तराखंड में भी भाजपा की सीट कम हुई साथ ही वोट प्रतिशत कम हो गया। इसकी सीट 57 से घटकर 47 हो गयी जबकि लगभग 2 प्रतिशत वोट कम होकर 44.3 हो गया। कांग्रेस की 8 सीट बढ़ी जबकि 4.5 वोट प्रतिशत बढ़ गया। बसपा और आप को कुल 8 प्रतिशत वोट पड़े यह कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए काफी था।
           पंजाब में मोदी शाह ने जीत की हर कोशिश की। बलात्कार और हत्या के अपराध में सजा पा रहे डेरा के राम रहीम को फरलो ( एक प्रकार के पेरोल) पर रिहा किया गया। इस अपराधी को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गयी।  
           डेरा धार्मिक संस्था के जरिये सत्ता हासिल करने की घृणित कोशिश हुई मगर मोदी और भाजपा के प्रति नफरत इस कदर थी कि यह हथकंडा किसी काम न आया। एक सीट कम होकर 2 रह गयी। आम आदमी पार्टी ने 42 प्रतिशत वोट हासिल किए और 92 सीट। पिछली बार इसके 23 प्रतिशत वोट थे और 20 सीट। कांग्रेस 77 सीट से सिमटकर 18 पर आ गयी।
गोवा में भाजपा की सीट 13 से 20 हो गयी तो मणिपुर में 21 से 32।
            इन सबमें उत्तर प्रदेश को जीतना भाजपा के लिए ही हर लिहाज से जरूरी था। भाजपा की इस यू पी जीत का यकीनन किसी को भी भरोसा नहीं था। जीत के प्रति खुद भाजपाई भी कहीं से आश्वस्त नहीं थे। हार का खतरा स्पष्ट था।
          भाजपा, योगी, मोदी के खिलाफ असन्तोष साफ था। साल भर चले किसान आंदोलन, इसमें 700 से ज्यादा किसानों का शहीद हो जाने से किसानों में अंसतोष था। बेरोजगारी और महंगाई से आम जनता में नाराजगी थी, निराशा थी। आवारा पशुओं द्वारा फसलों को चट कर जाने के चलते भी गुस्सा था। कोरोना से निपटने के नाम पर लगे लौकडाउन और कोरोना की दूसरी लहर में अपने मारे गए प्रियजनों को लोग कैसे भूल सकते थे।
            उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायकों का पिटना कोई हवाई बात नहीं थी। जगह जगह से ऐसे पिटाई की खबरें आ रही थी। फिर ऐसे में भाजपा की जीत किस तरह मुमकिन हो सकती थी।  
           जहां तक विपक्ष का सवाल है। यह जनता के साथ जनता के संकट में कब रहा। जनता के लिए इनके पास क्या था। केवल जनता के गुस्से पर सवार होकर ही तो हर बात सत्ता पर नहीं पहुंचा जा सकता। कुलमिलाकर जनता के सामने कोई विकल्प नहीं था।
           मोदी,शाह, और भाजपा को कॉरपोरेट घरानों का खुला साथ और समर्थन बरकरार है। यही इनकी असल ताकत हैं।
           ऐसे में मोदी,शाह, योगी और भाजपा और संघ ने फिर से अपनी फासीवादी राजनीति पर दांव खेला। इसके अलावा इनके पास कहने करने को कुछ था भी नहीं।
          बेरोजगारी, महंगाई, महिला असुरक्षा आदि आदि जो जनता के मुद्दे थे उसे भाजपा ने हवा में उड़ा दिया। बाकी पार्टियों के पास भी इन जनमुद्दों पर कहने के लिये कुछ था नहीं। इसलिए भाजपा अपने खेल में सफल हो गयी।
       भाजपा ने मुसलमानों से खतरे का 'काल्पनिक डर या खतरा' हिंदुओं के दिमाग में बिठाया है। इस चुनाव में इसे और गहरा किया है। मोदी शाह और योगी ने हर बात के जरिये व अपने प्रोपेगैंडा मशीनरी के दम पर इसे आम जनमानस का हिस्सा बनाया है।
        ओवैसी के जरिये भी  भाजपा के 'मुसलमान के खतरे' की 'फर्जी धारणा' मजबूत हुई । ओवैसी ने 100 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए। भले ही एक भी सीट नहीं जीती हो मात्र 0.49 प्रतिशत वोट हासिल किए। मगर ओवैसी की अपनी मौजूदगी और  भाषणों से भाजपा की इस मुस्लिम विरोधी राजनीति पर मुहर लगी। इसे मुसलमानों का हिंदुओं के लिए खतरे के रूप में भाजपाई प्रचार मिला। इस तरह ओवैसी ने हिंदू वोटों को भाजपा की ओर धकेला।
           शाह ने कैराना के एक फर्जी और खत्म हो चुके मुद्दे को हवा दी। फिर यह हिजाब तक जा पहुंचा। हिजाब और कैराना पर सवार होकर इन्होंने 'मुसलमानों को हिंदुओं' के लिए बड़े खतरे के रूप में स्थापित किया।
           यही चीज अपराध और माफिया के मसले पर हुई। अपराधी और माफिया मुसलमान ही होते हैं इस फर्जी धारणा का खूब भाजपाई प्रचार है। सपा के मुस्लिमपरस्त होने की फर्जी बात भी इन्होंने स्थापित की है। सपा की सरकार बनने का मतलब मुसलमानों की सरकार बनाना है यह बात वोटर्स के दिमाग में बिठाई गयी।
           अंधाधुंध रैली, चुनाव आचार संहिता की ऐसी तैसी करके, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री से लेकर तमाम केंद्रीय मंत्री राज्य के चुनाव व्यस्त रहे। विपक्ष जो बेहद कमजोर है उस पर हमलावर रहे।
          अपने आई टी सेल और अफवाह मशीनरी आर एस एस के जरिये इन्होंने इस बात को घर-घर तक फैला दिया। भाजपा और आर एस एस हर विधान सभा क्षेत्र में चुनाव के अंत तक अपने मजबूत विपक्षी के मुस्लिमपरस्त होने का दुष्प्रचार करती है।
          इस तरह किसान, बेरोजगार और आम जनता जो अलग अलग वजहों से भाजपा, मोदी योगी से काफी नाराज थी, एक हद तक गुस्से में भी थी, भाजपा के बिछाये हुए जाल में फंस गई।
यह जनता आर्थिक मामलों में भाजपा से त्रस्त है मगर भाजपा की हिंदू फासीवाद की राजनीति से मुक्त नहीं है। इसके प्रभाव में है। आर्थिक वजहों से जो नाराजगी है गुस्सा है वह अभी बड़े स्तर पर भाजपाइयों और मोदी योगी के खिलाफ नफरत में नहीं बदला है।
           इस जनता के पास कोई बेहतर विकल्प भी नहीं था। यह दुविधा में भी थी। इस स्थिति में 'मुसलमानों के खतरे' के काल्पनिक और फर्जी खतरे से मुक्ति के लिए अंतिम समय में भाजपा के पक्ष में वोट कर गयी।
            जहां तक फ्री राशन की बात है और मकान की बात है। यह एक गौण कारक है। फ्री राशन के बावजूद इन लोगों में भी सरकार के प्रति नाराजगी थी। उन्हें रोजगार की तलाश थी। लोग कहते थे 'हमें काम दे दो, हमें फ्री राशन नहीं चाहिए, काम होगा तो खुद ही सब कर लेंगे'।
            लेकिन चुनाव जीतने के लिए केवल हिंदू फासीवादी राजनीति पर्याप्त नहीं थी। और भी हथकंडे अपनाये गए।
            मायावती जिस भी वजह से हो भाजपा के साथ सट गई। इसने भाजपा की जीत के लिहाज से अपना दांव चला। जिस सपा की जीत के दावे हो रहे थे इसके वोटों को बांटने का काम किया।
           सही बात यही है कि विपक्ष भी भ्रष्ट है। यह नरम हिंदुत्व का झंडा थामे हुए है जब तब इसे इस्तेमाल भी करता है। नीतियों के मामले में भी भाजपा से लेकर सपा तक सब एक हैं।
       इस विपक्ष के सामने हिंदू फासीवादी राजनीति को पराजित करने और नष्ट करने का कार्यभार नहीं है बल्कि किसी तरह सत्ता पर पहुंचना है। इसलिए यह बिखरा हुआ है या बिखर जाता है। 58 प्रतिशत वोट यानी बहुमत बिखर जाता है। 42 प्रतिशत जीत जाता है।
           भाजपा ने अन्य छोटे छोटे जातिवादी दलों से गठबंधन किया। इससे भाजपा को अपने वोट का दायरा अन्य जगहों पर व्यापक करने का मौका मिला।
           भाजपा द्वारा अपने पक्ष में वोट करवाने के लिए सस्थाओं और प्रशासनिक अधिकारियों का इस्तेमाल भी किया गया। सूक्ष्म स्तर की गड़बड़ियां की जाती हैं। गड़बड़ियां कई तरह की हो सकती हैं। जिसका परिणाम बड़ा हो सकता है। इस बार भी तरह तरह की खबरें आई।
         2019 इसका उदाहरण है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 542 सीटों में से 347 सीट पर वोटों की गिनती और ई वी एम पड़े वोटों के बीच अंतर पाया गया। यह अंतर 1 से लेकर 1,01,323 वोट तक का था।
         एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म संस्था ने पाया कि 28 मई 2019 से 30 जून 2019 के बीच चुनाव आयोग ने कई बार अपनी वेबसाइट  तथा माई वोटर्स टर्न आउट एप्प पर आंकड़ों में फेरबदल किया। जबकि 23 मई को चुनाव रिजल्ट आ गया था। यह सब मनमर्जी से बिना किसी स्पष्टीकरण के कई बार किया गया। यह फेरबदल किसी गड़बड़ी पर पर्दा डालने के अलावा और क्या मकसद हो सकता है।
           इस संबंध में इस संस्था के लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले में याचिका लगाई। याचिका में 347 से ज्यादा सीटों पर की गई गड़बड़ी की जांच की मांग की गई। मगर कोई कार्रवाई इस पर नहीं हुई। ना ही चुनाव आयोग ने कोई जवाब दिया।
           कुलमिलाकर हर हथकंडे अपनाकर इसके मिले जुले प्रभाव से भाजपा जीत गयी। कुछ विशेष मा हो तो आम जनता की ज़िंदगी अब और बदतर होगी। आम जनता की नाराजगी की नफरत की दिशा में बढ़ने की ही अब ज्यादा संभावना है ।

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...