भाजपा की जीत और इसके मायने
भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जीत हासिल कर ली। उत्तराखंड व मणिपुर में भी भाजपा बहुमत से जीत गयी। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने बहुमत हासिल कर लिया। गोवा में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गयी।
उत्तर प्रदेश का चुनाव भाजपा के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण था। इसे जीतने के लिए मोदी शाह योगी और संघ ने हर दांव चला, हर हथकंडे अपनाए।
जहां तक विपक्षी पार्टियों का सवाल है वह भी आजमाए हुए थे। पिछले पांच सालों में जनता के मुद्दे पर जनता को संगठित करने का कोई प्रयास इन्होंने नहीं किया। ये केवल और केवल भाजपा के खिलाफ जनता के गुस्से पर सवार होकर सत्ता हासिल करना चाहते थे। इसमें ये असफल हुए।
उत्तर प्रदेश जीतने का मतलब राज्य सभा में सीटों का बढ़ना भी है। इससे भाजपा की मजबूती राज्य सभा में बनी रहेगी। राष्ट्रपति के चुनाव में भी यह भाजपा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
यदि आंकड़ों की बात की जाय तो उत्तर प्रदेश में इस बार भी भाजपा का वोट 1.6 प्रतिशत बढ़ गया। मगर सीट 57 कम हो गयी। 312 से 255 रह गयी। सपा को 64 सीट का फायदा हुआ जबकि इसके 10 प्रतिशत वोट बढ़ गए। इसकी सीट अब 111 हो गयी हैं।
उत्तराखंड में भी भाजपा की सीट कम हुई साथ ही वोट प्रतिशत कम हो गया। इसकी सीट 57 से घटकर 47 हो गयी जबकि लगभग 2 प्रतिशत वोट कम होकर 44.3 हो गया। कांग्रेस की 8 सीट बढ़ी जबकि 4.5 वोट प्रतिशत बढ़ गया। बसपा और आप को कुल 8 प्रतिशत वोट पड़े यह कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए काफी था।
पंजाब में मोदी शाह ने जीत की हर कोशिश की। बलात्कार और हत्या के अपराध में सजा पा रहे डेरा के राम रहीम को फरलो ( एक प्रकार के पेरोल) पर रिहा किया गया। इस अपराधी को जेड श्रेणी की सुरक्षा दी गयी।
डेरा धार्मिक संस्था के जरिये सत्ता हासिल करने की घृणित कोशिश हुई मगर मोदी और भाजपा के प्रति नफरत इस कदर थी कि यह हथकंडा किसी काम न आया। एक सीट कम होकर 2 रह गयी। आम आदमी पार्टी ने 42 प्रतिशत वोट हासिल किए और 92 सीट। पिछली बार इसके 23 प्रतिशत वोट थे और 20 सीट। कांग्रेस 77 सीट से सिमटकर 18 पर आ गयी।
गोवा में भाजपा की सीट 13 से 20 हो गयी तो मणिपुर में 21 से 32।
इन सबमें उत्तर प्रदेश को जीतना भाजपा के लिए ही हर लिहाज से जरूरी था। भाजपा की इस यू पी जीत का यकीनन किसी को भी भरोसा नहीं था। जीत के प्रति खुद भाजपाई भी कहीं से आश्वस्त नहीं थे। हार का खतरा स्पष्ट था।
भाजपा, योगी, मोदी के खिलाफ असन्तोष साफ था। साल भर चले किसान आंदोलन, इसमें 700 से ज्यादा किसानों का शहीद हो जाने से किसानों में अंसतोष था। बेरोजगारी और महंगाई से आम जनता में नाराजगी थी, निराशा थी। आवारा पशुओं द्वारा फसलों को चट कर जाने के चलते भी गुस्सा था। कोरोना से निपटने के नाम पर लगे लौकडाउन और कोरोना की दूसरी लहर में अपने मारे गए प्रियजनों को लोग कैसे भूल सकते थे।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायकों का पिटना कोई हवाई बात नहीं थी। जगह जगह से ऐसे पिटाई की खबरें आ रही थी। फिर ऐसे में भाजपा की जीत किस तरह मुमकिन हो सकती थी।
जहां तक विपक्ष का सवाल है। यह जनता के साथ जनता के संकट में कब रहा। जनता के लिए इनके पास क्या था। केवल जनता के गुस्से पर सवार होकर ही तो हर बात सत्ता पर नहीं पहुंचा जा सकता। कुलमिलाकर जनता के सामने कोई विकल्प नहीं था।
मोदी,शाह, और भाजपा को कॉरपोरेट घरानों का खुला साथ और समर्थन बरकरार है। यही इनकी असल ताकत हैं।
ऐसे में मोदी,शाह, योगी और भाजपा और संघ ने फिर से अपनी फासीवादी राजनीति पर दांव खेला। इसके अलावा इनके पास कहने करने को कुछ था भी नहीं।
बेरोजगारी, महंगाई, महिला असुरक्षा आदि आदि जो जनता के मुद्दे थे उसे भाजपा ने हवा में उड़ा दिया। बाकी पार्टियों के पास भी इन जनमुद्दों पर कहने के लिये कुछ था नहीं। इसलिए भाजपा अपने खेल में सफल हो गयी।
भाजपा ने मुसलमानों से खतरे का 'काल्पनिक डर या खतरा' हिंदुओं के दिमाग में बिठाया है। इस चुनाव में इसे और गहरा किया है। मोदी शाह और योगी ने हर बात के जरिये व अपने प्रोपेगैंडा मशीनरी के दम पर इसे आम जनमानस का हिस्सा बनाया है।
ओवैसी के जरिये भी भाजपा के 'मुसलमान के खतरे' की 'फर्जी धारणा' मजबूत हुई । ओवैसी ने 100 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए। भले ही एक भी सीट नहीं जीती हो मात्र 0.49 प्रतिशत वोट हासिल किए। मगर ओवैसी की अपनी मौजूदगी और भाषणों से भाजपा की इस मुस्लिम विरोधी राजनीति पर मुहर लगी। इसे मुसलमानों का हिंदुओं के लिए खतरे के रूप में भाजपाई प्रचार मिला। इस तरह ओवैसी ने हिंदू वोटों को भाजपा की ओर धकेला।
शाह ने कैराना के एक फर्जी और खत्म हो चुके मुद्दे को हवा दी। फिर यह हिजाब तक जा पहुंचा। हिजाब और कैराना पर सवार होकर इन्होंने 'मुसलमानों को हिंदुओं' के लिए बड़े खतरे के रूप में स्थापित किया।
यही चीज अपराध और माफिया के मसले पर हुई। अपराधी और माफिया मुसलमान ही होते हैं इस फर्जी धारणा का खूब भाजपाई प्रचार है। सपा के मुस्लिमपरस्त होने की फर्जी बात भी इन्होंने स्थापित की है। सपा की सरकार बनने का मतलब मुसलमानों की सरकार बनाना है यह बात वोटर्स के दिमाग में बिठाई गयी।
अंधाधुंध रैली, चुनाव आचार संहिता की ऐसी तैसी करके, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री से लेकर तमाम केंद्रीय मंत्री राज्य के चुनाव व्यस्त रहे। विपक्ष जो बेहद कमजोर है उस पर हमलावर रहे।
अपने आई टी सेल और अफवाह मशीनरी आर एस एस के जरिये इन्होंने इस बात को घर-घर तक फैला दिया। भाजपा और आर एस एस हर विधान सभा क्षेत्र में चुनाव के अंत तक अपने मजबूत विपक्षी के मुस्लिमपरस्त होने का दुष्प्रचार करती है।
इस तरह किसान, बेरोजगार और आम जनता जो अलग अलग वजहों से भाजपा, मोदी योगी से काफी नाराज थी, एक हद तक गुस्से में भी थी, भाजपा के बिछाये हुए जाल में फंस गई।
यह जनता आर्थिक मामलों में भाजपा से त्रस्त है मगर भाजपा की हिंदू फासीवाद की राजनीति से मुक्त नहीं है। इसके प्रभाव में है। आर्थिक वजहों से जो नाराजगी है गुस्सा है वह अभी बड़े स्तर पर भाजपाइयों और मोदी योगी के खिलाफ नफरत में नहीं बदला है।
इस जनता के पास कोई बेहतर विकल्प भी नहीं था। यह दुविधा में भी थी। इस स्थिति में 'मुसलमानों के खतरे' के काल्पनिक और फर्जी खतरे से मुक्ति के लिए अंतिम समय में भाजपा के पक्ष में वोट कर गयी।
जहां तक फ्री राशन की बात है और मकान की बात है। यह एक गौण कारक है। फ्री राशन के बावजूद इन लोगों में भी सरकार के प्रति नाराजगी थी। उन्हें रोजगार की तलाश थी। लोग कहते थे 'हमें काम दे दो, हमें फ्री राशन नहीं चाहिए, काम होगा तो खुद ही सब कर लेंगे'।
लेकिन चुनाव जीतने के लिए केवल हिंदू फासीवादी राजनीति पर्याप्त नहीं थी। और भी हथकंडे अपनाये गए।
मायावती जिस भी वजह से हो भाजपा के साथ सट गई। इसने भाजपा की जीत के लिहाज से अपना दांव चला। जिस सपा की जीत के दावे हो रहे थे इसके वोटों को बांटने का काम किया।
सही बात यही है कि विपक्ष भी भ्रष्ट है। यह नरम हिंदुत्व का झंडा थामे हुए है जब तब इसे इस्तेमाल भी करता है। नीतियों के मामले में भी भाजपा से लेकर सपा तक सब एक हैं।
इस विपक्ष के सामने हिंदू फासीवादी राजनीति को पराजित करने और नष्ट करने का कार्यभार नहीं है बल्कि किसी तरह सत्ता पर पहुंचना है। इसलिए यह बिखरा हुआ है या बिखर जाता है। 58 प्रतिशत वोट यानी बहुमत बिखर जाता है। 42 प्रतिशत जीत जाता है।
भाजपा ने अन्य छोटे छोटे जातिवादी दलों से गठबंधन किया। इससे भाजपा को अपने वोट का दायरा अन्य जगहों पर व्यापक करने का मौका मिला।
भाजपा द्वारा अपने पक्ष में वोट करवाने के लिए सस्थाओं और प्रशासनिक अधिकारियों का इस्तेमाल भी किया गया। सूक्ष्म स्तर की गड़बड़ियां की जाती हैं। गड़बड़ियां कई तरह की हो सकती हैं। जिसका परिणाम बड़ा हो सकता है। इस बार भी तरह तरह की खबरें आई।
2019 इसका उदाहरण है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 542 सीटों में से 347 सीट पर वोटों की गिनती और ई वी एम पड़े वोटों के बीच अंतर पाया गया। यह अंतर 1 से लेकर 1,01,323 वोट तक का था।
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म संस्था ने पाया कि 28 मई 2019 से 30 जून 2019 के बीच चुनाव आयोग ने कई बार अपनी वेबसाइट तथा माई वोटर्स टर्न आउट एप्प पर आंकड़ों में फेरबदल किया। जबकि 23 मई को चुनाव रिजल्ट आ गया था। यह सब मनमर्जी से बिना किसी स्पष्टीकरण के कई बार किया गया। यह फेरबदल किसी गड़बड़ी पर पर्दा डालने के अलावा और क्या मकसद हो सकता है।
इस संबंध में इस संस्था के लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले में याचिका लगाई। याचिका में 347 से ज्यादा सीटों पर की गई गड़बड़ी की जांच की मांग की गई। मगर कोई कार्रवाई इस पर नहीं हुई। ना ही चुनाव आयोग ने कोई जवाब दिया।
कुलमिलाकर हर हथकंडे अपनाकर इसके मिले जुले प्रभाव से भाजपा जीत गयी। कुछ विशेष मा हो तो आम जनता की ज़िंदगी अब और बदतर होगी। आम जनता की नाराजगी की नफरत की दिशा में बढ़ने की ही अब ज्यादा संभावना है ।
डेरा धार्मिक संस्था के जरिये सत्ता हासिल करने की घृणित कोशिश हुई मगर मोदी और भाजपा के प्रति नफरत इस कदर थी कि यह हथकंडा किसी काम न आया। एक सीट कम होकर 2 रह गयी। आम आदमी पार्टी ने 42 प्रतिशत वोट हासिल किए और 92 सीट। पिछली बार इसके 23 प्रतिशत वोट थे और 20 सीट। कांग्रेस 77 सीट से सिमटकर 18 पर आ गयी।
गोवा में भाजपा की सीट 13 से 20 हो गयी तो मणिपुर में 21 से 32।
इन सबमें उत्तर प्रदेश को जीतना भाजपा के लिए ही हर लिहाज से जरूरी था। भाजपा की इस यू पी जीत का यकीनन किसी को भी भरोसा नहीं था। जीत के प्रति खुद भाजपाई भी कहीं से आश्वस्त नहीं थे। हार का खतरा स्पष्ट था।
भाजपा, योगी, मोदी के खिलाफ असन्तोष साफ था। साल भर चले किसान आंदोलन, इसमें 700 से ज्यादा किसानों का शहीद हो जाने से किसानों में अंसतोष था। बेरोजगारी और महंगाई से आम जनता में नाराजगी थी, निराशा थी। आवारा पशुओं द्वारा फसलों को चट कर जाने के चलते भी गुस्सा था। कोरोना से निपटने के नाम पर लगे लौकडाउन और कोरोना की दूसरी लहर में अपने मारे गए प्रियजनों को लोग कैसे भूल सकते थे।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधायकों का पिटना कोई हवाई बात नहीं थी। जगह जगह से ऐसे पिटाई की खबरें आ रही थी। फिर ऐसे में भाजपा की जीत किस तरह मुमकिन हो सकती थी।
जहां तक विपक्ष का सवाल है। यह जनता के साथ जनता के संकट में कब रहा। जनता के लिए इनके पास क्या था। केवल जनता के गुस्से पर सवार होकर ही तो हर बात सत्ता पर नहीं पहुंचा जा सकता। कुलमिलाकर जनता के सामने कोई विकल्प नहीं था।
मोदी,शाह, और भाजपा को कॉरपोरेट घरानों का खुला साथ और समर्थन बरकरार है। यही इनकी असल ताकत हैं।
ऐसे में मोदी,शाह, योगी और भाजपा और संघ ने फिर से अपनी फासीवादी राजनीति पर दांव खेला। इसके अलावा इनके पास कहने करने को कुछ था भी नहीं।
बेरोजगारी, महंगाई, महिला असुरक्षा आदि आदि जो जनता के मुद्दे थे उसे भाजपा ने हवा में उड़ा दिया। बाकी पार्टियों के पास भी इन जनमुद्दों पर कहने के लिये कुछ था नहीं। इसलिए भाजपा अपने खेल में सफल हो गयी।
भाजपा ने मुसलमानों से खतरे का 'काल्पनिक डर या खतरा' हिंदुओं के दिमाग में बिठाया है। इस चुनाव में इसे और गहरा किया है। मोदी शाह और योगी ने हर बात के जरिये व अपने प्रोपेगैंडा मशीनरी के दम पर इसे आम जनमानस का हिस्सा बनाया है।
ओवैसी के जरिये भी भाजपा के 'मुसलमान के खतरे' की 'फर्जी धारणा' मजबूत हुई । ओवैसी ने 100 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए। भले ही एक भी सीट नहीं जीती हो मात्र 0.49 प्रतिशत वोट हासिल किए। मगर ओवैसी की अपनी मौजूदगी और भाषणों से भाजपा की इस मुस्लिम विरोधी राजनीति पर मुहर लगी। इसे मुसलमानों का हिंदुओं के लिए खतरे के रूप में भाजपाई प्रचार मिला। इस तरह ओवैसी ने हिंदू वोटों को भाजपा की ओर धकेला।
शाह ने कैराना के एक फर्जी और खत्म हो चुके मुद्दे को हवा दी। फिर यह हिजाब तक जा पहुंचा। हिजाब और कैराना पर सवार होकर इन्होंने 'मुसलमानों को हिंदुओं' के लिए बड़े खतरे के रूप में स्थापित किया।
यही चीज अपराध और माफिया के मसले पर हुई। अपराधी और माफिया मुसलमान ही होते हैं इस फर्जी धारणा का खूब भाजपाई प्रचार है। सपा के मुस्लिमपरस्त होने की फर्जी बात भी इन्होंने स्थापित की है। सपा की सरकार बनने का मतलब मुसलमानों की सरकार बनाना है यह बात वोटर्स के दिमाग में बिठाई गयी।
अंधाधुंध रैली, चुनाव आचार संहिता की ऐसी तैसी करके, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री से लेकर तमाम केंद्रीय मंत्री राज्य के चुनाव व्यस्त रहे। विपक्ष जो बेहद कमजोर है उस पर हमलावर रहे।
अपने आई टी सेल और अफवाह मशीनरी आर एस एस के जरिये इन्होंने इस बात को घर-घर तक फैला दिया। भाजपा और आर एस एस हर विधान सभा क्षेत्र में चुनाव के अंत तक अपने मजबूत विपक्षी के मुस्लिमपरस्त होने का दुष्प्रचार करती है।
इस तरह किसान, बेरोजगार और आम जनता जो अलग अलग वजहों से भाजपा, मोदी योगी से काफी नाराज थी, एक हद तक गुस्से में भी थी, भाजपा के बिछाये हुए जाल में फंस गई।
यह जनता आर्थिक मामलों में भाजपा से त्रस्त है मगर भाजपा की हिंदू फासीवाद की राजनीति से मुक्त नहीं है। इसके प्रभाव में है। आर्थिक वजहों से जो नाराजगी है गुस्सा है वह अभी बड़े स्तर पर भाजपाइयों और मोदी योगी के खिलाफ नफरत में नहीं बदला है।
इस जनता के पास कोई बेहतर विकल्प भी नहीं था। यह दुविधा में भी थी। इस स्थिति में 'मुसलमानों के खतरे' के काल्पनिक और फर्जी खतरे से मुक्ति के लिए अंतिम समय में भाजपा के पक्ष में वोट कर गयी।
जहां तक फ्री राशन की बात है और मकान की बात है। यह एक गौण कारक है। फ्री राशन के बावजूद इन लोगों में भी सरकार के प्रति नाराजगी थी। उन्हें रोजगार की तलाश थी। लोग कहते थे 'हमें काम दे दो, हमें फ्री राशन नहीं चाहिए, काम होगा तो खुद ही सब कर लेंगे'।
लेकिन चुनाव जीतने के लिए केवल हिंदू फासीवादी राजनीति पर्याप्त नहीं थी। और भी हथकंडे अपनाये गए।
मायावती जिस भी वजह से हो भाजपा के साथ सट गई। इसने भाजपा की जीत के लिहाज से अपना दांव चला। जिस सपा की जीत के दावे हो रहे थे इसके वोटों को बांटने का काम किया।
सही बात यही है कि विपक्ष भी भ्रष्ट है। यह नरम हिंदुत्व का झंडा थामे हुए है जब तब इसे इस्तेमाल भी करता है। नीतियों के मामले में भी भाजपा से लेकर सपा तक सब एक हैं।
इस विपक्ष के सामने हिंदू फासीवादी राजनीति को पराजित करने और नष्ट करने का कार्यभार नहीं है बल्कि किसी तरह सत्ता पर पहुंचना है। इसलिए यह बिखरा हुआ है या बिखर जाता है। 58 प्रतिशत वोट यानी बहुमत बिखर जाता है। 42 प्रतिशत जीत जाता है।
भाजपा ने अन्य छोटे छोटे जातिवादी दलों से गठबंधन किया। इससे भाजपा को अपने वोट का दायरा अन्य जगहों पर व्यापक करने का मौका मिला।
भाजपा द्वारा अपने पक्ष में वोट करवाने के लिए सस्थाओं और प्रशासनिक अधिकारियों का इस्तेमाल भी किया गया। सूक्ष्म स्तर की गड़बड़ियां की जाती हैं। गड़बड़ियां कई तरह की हो सकती हैं। जिसका परिणाम बड़ा हो सकता है। इस बार भी तरह तरह की खबरें आई।
2019 इसका उदाहरण है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 542 सीटों में से 347 सीट पर वोटों की गिनती और ई वी एम पड़े वोटों के बीच अंतर पाया गया। यह अंतर 1 से लेकर 1,01,323 वोट तक का था।
एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म संस्था ने पाया कि 28 मई 2019 से 30 जून 2019 के बीच चुनाव आयोग ने कई बार अपनी वेबसाइट तथा माई वोटर्स टर्न आउट एप्प पर आंकड़ों में फेरबदल किया। जबकि 23 मई को चुनाव रिजल्ट आ गया था। यह सब मनमर्जी से बिना किसी स्पष्टीकरण के कई बार किया गया। यह फेरबदल किसी गड़बड़ी पर पर्दा डालने के अलावा और क्या मकसद हो सकता है।
इस संबंध में इस संस्था के लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले में याचिका लगाई। याचिका में 347 से ज्यादा सीटों पर की गई गड़बड़ी की जांच की मांग की गई। मगर कोई कार्रवाई इस पर नहीं हुई। ना ही चुनाव आयोग ने कोई जवाब दिया।
कुलमिलाकर हर हथकंडे अपनाकर इसके मिले जुले प्रभाव से भाजपा जीत गयी। कुछ विशेष मा हो तो आम जनता की ज़िंदगी अब और बदतर होगी। आम जनता की नाराजगी की नफरत की दिशा में बढ़ने की ही अब ज्यादा संभावना है ।
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