Tuesday, 26 February 2013

20-21 फरवरी की आम हड़ताल के संदर्भ में


                               20-21 फरवरी की आम  हड़ताल  के संदर्भ में
       20-21 फरवरी को तथाकथित वामपंथी ट्रेड यूनियनों समेत 11 ट्रेड यूनियनों ने देश के स्तर पर आम हड़ताल आयोजित की। यह हड़ताल विनिवेशीकरण व निजीकरण के विरोध में तथा न्यूनतम वेतनमान व श्रम कानूनों को लागू करवाए जाने की मांग को लेकर है। इस प्रकार की हड़ताल इससे पहले भी अलग-अलग वक्त पर होती रहीं हैं।
                ये हड़तालें जो कि अलग-अलग वक्त पर हुई हैं। महज रस्म अदायगी भर साबित हुई हैं। हालांकि समग्रता में इसके दबाव के चलते विनिवेशीकरण व निजीकरण किए जाने की गति कुछ कम जरूर हुई। लेकिन पूंजी की आक्रामकता के आगे यह बेहद नाकाफी है।
                यह नाकाफी है और यह हड़ताल रूपी प्रतिरोध इसीलिए अनुष्ठान भर बन जाता है क्योंकि ट्रेड यूनियन नेतृत्व जो इन हड़तालों का संगठन व संचालन करती हैं। वे खुद अर्थवाद, कानूनवाद और सुधारवाद के दलदल में गोता लगा रहे हैं। यही अर्थवाद, कानूनवाद और सुधारवाद इन ट्रेड यूनियन नेतृत्व को रस्मअदायगी तक सीमित कर देता है। अपनी बारी में वक्त बे वक्त होने वाले ये प्रतिरोध इन ट्रेड यूनियनों के अस्तित्व की शर्त बन जाती हैं। या दूसरे रूप में अस्तित्व की शर्त के लिये इस प्रकार के प्रतिरोध अनिवार्य बन जाते हैं|
      बदलती परिस्थितियों के साथ यह तस्वीर भी बदल जायेगी| शासक वर्ग जिस प्रकार लगातार धीरे धीरे ही सही विनिवेशीकरण के रथ को आगे बढा रहा है तब इन ट्रेड युनियन नेतृत्व का आधार भी खत्म होने की ओर बढेगा साथ ही पूंजी की आक्रामकता के चलते मजदूर वर्ग का जीवन जिस हद तक नारकीय होता जा रहा है व जीवन परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं तब अपनी स्वाभाविक गति में मजदूर वर्ग का यह हिस्सा इस रस्मआदयगी के खोल को तोडकर बाहर निकाल आयेगा। जिसके कुछ लक्षण 20 फरवरी की हड़ताल में दिखाई भी दिए।
                वर्तमान हड़ताल के संदर्भ में कहा जाए तो यह कि इन हड़तालों में उठाए जाने वाली मांगों की प्रकृति को देखते हुए इनका समर्थन किया जाना चाहिए। तथा भरसक प्रयास इस बात का होना चाहिए कि मजदूर वर्ग को इस अर्थवादी, कानूनवादी और सुधारवादी दायरे से बाहर निकाला जाए, इसके प्रति सचेत किया जाए। तथा उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग बनाया जाए।

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