एल जी बी टी क्यू समुदाय के अधिकारों पर हिंदू राष्ट्रवादियों का कानूनी हमला
मार्च 2026 में संसद ने ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पास कर एलजीबीटीक्यू समुदाय के अधिकारों पर सीधा हमला किया। यह कानून 2014 के नालसा फैसले को लगभग खत्म करता है और 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में बड़े बदलाव करता है।
नालसा फैसले ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ‘तीसरा लिंग’ माना था और आत्म-पहचान का अधिकार दिया था। 2018 के नवती सिंह जोहर फैसले ने धारा 377 को बदलकर समलैंगिक संबंधों को अपराध से बाहर किया। इन फैसलों ने समुदाय को समानता, गरिमा और निजता का अधिकार दिलाया था। 2019 के कानून ने इसे लागू किया था, जिसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी सभी शामिल थे।
2026 का संशोधन विधेयक आत्म-पहचान का अधिकार खत्म करता है। अब व्यक्ति स्वयं अपना लिंग नहीं कह सकता। उसकी पहचान जन्म के जैविक चिह्नों या पुरानी सामाजिक पहचानों (किन्नर, हिजड़ा, अरावणी, जोगता) से तय होगी। विधेयक साफ कहता है कि "विभिन्न यौन अभिविन्यास और स्व-अनुभूत यौन पहचान वाले व्यक्ति इसमें शामिल नहीं होंगे।" यह ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी, जेंडर-फ्लुइड सभी को कानूनी दायरे से बाहर कर देता है।
कानून मेडिकल बोर्ड को अनिवार्य बनाता है। पहचान प्रमाण पत्र के लिए व्यक्ति को सरकारी मेडिकल बोर्ड (CMO की अध्यक्षता में) के सामने चिकित्सकीय परीक्षण से गुजरना होगा। सुप्रीम कोर्ट की सलाहकार समिति ने इसे "निजता का पूर्ण उल्लंघन" बताया। नालसा फैसले ने स्पष्ट कहा था कि लिंग पहचान के लिए किसी चिकित्सकीय जांच की आवश्यकता नहीं।
यौन हिंसा पर यह कानून घोर भेदभाव करता है। BNS में सिसजेंडर महिला के साथ बलात्कार पर न्यूनतम 10 साल की सजा है, जबकि ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ यौन शोषण पर अधिकतम सजा सिर्फ 2 साल रखी गई है। यह अनुच्छेद 14 (समानता) का सीधा उल्लंघन है।
सरकार ने कानून बनाने में समुदाय से कोई सार्थक सलाह नहीं की। राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद के सदस्यों को बहुत कम समय पर बुलाया गया, मंत्री ने उनसे मिलने से मना कर दिया, उनके सुझाव खारिज हुए और चारों सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने विधेयक को चयन समिति को भेजने की मांग की, लेकिन सरकार ने वह मांग ठुकरा दी और बिना बहस के बिल पास कर दिया। 88 से अधिक ट्रांसजेंडर संगठनों, 40,000 हस्ताक्षरकर्ताओं और सुप्रीम कोर्ट की सलाहकार समिति की चेतावनी को भी सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।
भारत में एलजीबीटीक्यू व्यक्ति पहले से ही परिवार से निकाले जाने, पुलिस उत्पीड़न, स्वास्थ्य सेवाओं में भेदभाव और यौन हिंसा का सामना करते हैं। 80% ट्रांसजेंडर व्यक्ति कभी न कभी यौन हमले का शिकार होते हैं। 2019 के कानून के तहत अब तक केवल 32,500 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान पत्र मिल सका।
हिंदू राष्ट्रवादी ‘हिजड़ा-किन्नर’ जैसी पुरानी पहचानों को तो मानते हैं, लेकिन ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिला, नॉन-बाइनरी जैसी पहचानों को ‘पाश्चात्य’ कहकर खारिज करते हैं। इस कानून ने आत्म-पहचान छीनी, निजता पर हमला किया, यौन हिंसा को मामूली अपराध बना दिया और समुदाय के बड़े हिस्से को कानूनी दायरे से बाहर कर दिया। जरूरी है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय प्रतिरोध के साथ खड़ा हो और इस कानून को रद्द करवाने की मांग करे।