Tuesday, 18 June 2024

मोदी का आभामंडल ध्वस्त, बैसाखी पर सवार मोदी सरकार

        मोदी का आभामंडल ध्वस्त, बैसाखी पर सवार मोदी सरकार
           लोक सभा 2024 के चुनाव की एकतरफा जीत का मोदी का सपना मिट्टी में मिल गया। खुद को परमेश्वर का दूत कहने वाले मोदी को इस बार मुंह की खानी पड़ी। जितना आभामंडल पिछले 10 सालों में कॉरपोरेट मीडिया, भाजपा आई टी सेल और संघी संगठनों ने खड़ा किया था वह अबकी बार ध्वस्त हो गया। भाजपा 240 पर सिमट गई। मोदी शाह की जोड़ी को इस बार बैसाखी की जरूरत पड़ गई। तेलगु देशम पार्टी और जनता दल यूनाइटेड पार्टी मुख्य घटक पार्टियां है इसके अलावा और भी छोटी छोटी  पार्टियों के कुल 24 सांसद है जिनका समर्थन भाजपा को है।
           राम मंदिर का गरदो गुबार खड़ा करने, उद्घाटन करने और  पहले चरण के चुनाव से ठीक दो दिन पहले रामनवमी का आयोजन भी किसी काम नहीं आया। चुनाव में जीत के लिए तमाम हथकंडे अपनाए गए।  फर्जी वोटिंग से वोटिंग प्रतिशत का खेल खेला गया। विरोधी मत को रोका गया। यहां तक कि ई वी एम काउंटिंग को भी रोककर भाजपा उम्मीदवार को जिताने के आरोप लगे हैं। यह सब होने के बावजूद 240 पर सिमटना थी दिखाता है कि नाराजगी बड़े स्तर पर थी जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकी। 
            भाजपा का वोट प्रतिशत भले ही 1 % की गिरावट मात्र को ही दिखाता है मगर भाजपा के केंद्रक इलाकों विशेषकर उत्तर भारत की वोट प्रतिशत 5 से लेकर 9 % तक गिरा है। ज्यादा सीट लड़ने और दक्षिण भारत के कुछ राज्य , केरल और पंजाब आदि में वोट प्रतिशत  बढ़ने से, कुल वोट प्रतिशत लगभग स्थिर दिखता है।
              मोदी शाह की निरंकुश कार्यशैली पर इस बार अंकुश लगेगा।  मीडिया मोदी राग फिर भी गाता रहेगा मगर इस मोदी की खंडित, ध्वस्त आभामंडल को अब वह फिर से पुनर्जीवित नहीं कर सकता।
            दूसरी ओर इस बार विपक्ष का दर्जा भी कांग्रेस को देने पर मोदी शाह को मजबूर होना पड़ेगा।  इस तरह मनमर्जी से मोदी शाह और पी एम ओ कोई भी बिल पास करवाने की स्थिति में नहीं होगा।
              तकरीबन 25 सालों से बहुमत की आड़ में निरंकुश और मनमर्जी से काम करने, रातों रात नोटबंदी जैसे तुगलकी फरमान सुनाने वाले मोदी को पहली बार गठबंधन सरकार के रूप में कार्य करना होगा। 
               एन डी ए के रूप में बना गठबंधन पहले नाम का था इसमें भाजपा को बहुमत था जबकि इस बार वास्तव में यह एक गठबंधन की सरकार होगी।
              जहां तक इस गठबंधन सरकार में नई आर्थिक नीतियों का सवाल है इन्हें तेजी से लागू करने में मुश्किल खड़ी होने की संभावना कम है। 
             फासिस्ट एजेंडे को लागू करने पर ही टी डी पी और जे डी यू को दिक्कत होगी। यही से एक संभावना सरकार के गिरने की बनती है। दूसरा मोदी शाह की जोड़ी विपक्ष और गठबंधन में शामिल दलों को अपने में विलीन करने की कोशिश करें इसकी भी संभावना बनती है।
             एक संभावना ये भी है कि किसी सी ए ए एन आर सी, यू सी सी आदि जैसे फासीवादी मुद्दे पर एक वक्त बाद मोदी शाह की जोड़ी सरकार गिरा दे और मध्यावती चुनाव करवा दे, इसमें बहुमत हासिल करने की कोशिश करे।
             इस बात की संभावना कम ही है कि हिंदू मुस्लिम की नफरत भरी राजनीति कमजोर पड़े। मीडिया और संघी लंपट संगठन तथा भाजपा आई टी सेल इस काम को जोर शोर से अभियान के रूप में जारी रखेगा। अंधराष्ट्रवाद यानी चीन और विशेषकर पाकिस्तान के खिलाफ नफरत का अभियान चलता रहेगा। सरकार सीधे इस मामले में इंवॉल्व कम होगी। जैसा कि पहले कार्यकाल में दिखता था।
               फासीवादी आंदोलन समाज में मौजूद है। सत्ता में भले ही कमजोर पड़ी हो मगर इसकी मौजूदगी हर स्तर पर है। इसलिए फासीवाद का खतरा टला नहीं है। यह हमारे सामने है। ऐसा भी हो सकता है कि यह कुछ समय के लिए कमजोर पड़ जाए। जनता में विशेषकर बहुसंख्यक हिंदुओं में इसकी अपील कमजोर पड़ जाय। और ये कुछ सालों के लिए सत्ता से भी बाहर हो जाएं। ऐसा भी हो सकता है आर्थिक संकट के गहराने और किसी विस्फोट ( जनसैलाब सड़कों पर हो) के होने पर तेजी से फासीवाद की बढ़ जाएं। इसी की संभावना ज्यादा दिखती है। क्यों दुनिया में आर्थिक संकट गहरा रहा है। अंतर्विरोध तीखे हो रहे हैं। कई देशों में फासीवादी पार्टियां बढ़ती पर हैं।
             
               

Saturday, 23 March 2024

23 मार्च के शहीदों की याद में

                        23 मार्च  के शहीदों की याद में       

                       भगत सिंह की बात सुनो, इंकलाब की राह चुनो !

             

           23 मार्च 1931 के शहीदों को याद करने की आज के दौर की घोर जरूरत है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए और साथ ही पूंजीवाद से मुक्ति के लिए जो संघर्ष छेड़ा था तथा जिस मुक्ति के लिए भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव ने खुद को बलिदान कर दिया, वह मुक्ति की लड़ाई आज भी अधूरी है। भगत सिंह ने और उनके साथियों ने जिन विचारों को अपने लेखों की व्यक्त किया था उन्हें आज के अंधेरे दौर में फिर से जानने समझने की जरूरत है।

       शहीद भगत सिंह 'हिंदुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक संगठन' के नेता और कार्यकर्ता थे। इस संगठन का घोषणा पत्र कहता था- "..भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है। उसके सामने दोहरा ख़तरा है– एक तरफ विदेशी पूंजीवाद के तो, दूसरी तरफ भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का..। ...इसी कारण मेहनतकश की तमाम आशाएं अब सिर्फ़ समाजवाद पर टिकी हैं और सिर्फ़ यही...सब भेदभाव खत्म करने में सहायक हो सकता है...।"

         भगत सिंह और उनके संगठन का मकसद था - अंग्रेजी गुलामी से आजादी और आजाद भारत में मजदूर मेहनतकश जनता का राज 'समाजवाद' कायम करना; देश को 'धर्मनिरपेक्ष' बनाना यानी राजनीति और सार्वजनिक मामलों में धर्म के दखल को खत्म कर देना तथा धर्म को बिल्कुल निजी मामला बनाकर घर तक सीमित कर देना।

       आज, आज़ाद भारत में  'समानता'   'समाजवाद' और 'धर्मनिरपेक्ष' जैसे शब्द, जो  नाम के लिए ही संविधान में हैं; इस संविधान को भी बदल देने की बातें कही जा रही है। आज के काले अंग्रेज, जो हिटलर के नक्शे कदम पर चल रहे हैं; उन्हें ये खोखले शब्द भी बर्दाश्त नहीं है। ये 'हिंदू राष्ट्र' के नाम पर  हिटलर के 'नाजीवाद' की ही तरह 'आतंकी तानाशाही' कायम करना चाहते हैं।

          शहीद भगत सिंह अपने संगठन को वैचारिक दिशा देने वाले नेता थे। 1928 से मार्च 1931 के बीच उन्होंने कई लेख लिखे व संपादित किये। इनमें लिखे विचार आज भी देश के नौजवानों और जनता के लिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।

         8 अप्रेल 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों ने असेंबली बम विस्फोट के वक़्त हॉल में एक पर्चा  बांटा  था। इस पर्चे में कहा गया था - "बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज़ की आवश्यकता होती है, ....हम ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ और ‘औद्योगिक विवाद’ के दमनकारी क़ानूनों और लाला लाजपत राय की हत्या के विरोध में देश की जनता की ओर से यह क़दम उठा रहे हैं।.. हम ऐसे उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते हैं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण शान्ति और स्वतन्त्रता का अवसर मिल सके..।"

             इसी लिखित बयान में भगत सिंह ने आगे कहा था-".. मज़दूरों को उनके... अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं।... अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। ... इसके विपरीत समाज के जोंक, शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। इसीलिए.... जब तक... मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण... समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके कष्टों से छुटकारा मिलना असम्भव है, और तब तक युद्धों को समाप्त कर विश्व-शान्ति... की सारी बातें महज ढोंग .. हैं..।"

            उन दिनों जब संघ और लीग अंग्रेजों  के हित में 'हिन्दू-मुस्लिम' व 'मंदिर-मस्जिद' की जहरीली राजनीति कर रहे थे; तब इसके विरोध में भी भगत सिंह ने एक लेख 1928 में लिखा। इसका  शीर्षक था- 'साम्प्रदायिक दंगे और इनका इलाज'। इसमें कहा गया था- " इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है।.....  ये लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं l... एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए कि स्थानीय अखबारों ने बड़े भड़काऊ लेख लिखे हैं।"

           इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा- "..सभी दंगों का इलाज...भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है..... गरीब, मेहनतकशों व किसानों को समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं।...  संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं।..."

             'विद्यार्थी और राजनीति' लेख में भगत सिंह ने लिखा था- "..जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है।....वे (नौजवान) पढ़ें, जरूर पढ़े! साथ ही पालिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें।.."

         जनवरी 1930 में हाईकोर्ट में जज के सामने लिखित बयान में भगत सिंह ने कहा- ".......पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज़ होती है।... हमारे इंकलाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अन्त करना है।..."

        मार्च 1930 में कोर्ट में अपने छः साथियों की ओर से बयान देते हुए भगत सिंह ने कहा- "...साम्राज्यवाद एक बड़ी डाकेजनी की साज़िश के अलावा कुछ नहीं। साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों मनुष्य के और राष्ट्र के हाथों राष्ट्र के शोषण का चरम है। साम्राज्यवादी अपने हितों, और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए .....भयंकर हत्याकाण्ड भी आयोजित करते हैं।....युद्ध जैसे ख़ौफ़नाक अपराध भी करते हैं।...."

         फरवरी 1931 में जेल से भेजे 'कौम के नाम संदेश' में भगत सिंह ने कहा - " ..... कांग्रेस दूकानदारों और पूँजीपतियों के ज़रिये इंग्लैण्ड पर आर्थिक दबाव डाल कर कुछ अधिकार ले लेना चाहती है। परन्तु जहाँ तक देश की करोड़ों मज़दूर और किसान जनता का ताल्लुक है,..इन्हें विदेशी हुकूमत के साथ-साथ जमीदारों और पूँजीपतियों के जुए से भी उद्धार पाना है, परन्तु कांग्रेस का उद्देश्य यह नहीं है...।"

         फांसी होने से तीन दिन पहले 20 मार्च 1931 को भगत सिंह ने पंजाब के राज्यपाल को लिखा - " हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति हों या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। ....भविष्य में अन्तिम युद्ध लड़ा जाएगा और यह युद्ध निर्णायक होगा।... यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है।..."

         जिस साम्राज्यवाद और पूंजीवाद से भगत सिंह और उनके साथियों की जंग थी; वह आज भी कायम है। बस लूट खसोट के तौर-तरीके बदल गए हैं। आज एक तरफ अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन व रूस, चीन जैसे साम्राज्यवादी लुटेरे शासक हैं; जिनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने देश और दुनिया के कोने-कोने में लूट-खसोट मचा रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ भारत जैसे कई पूंजीवादी देश हैं; जो इन लुटेरे साम्राज्यवादियों से सांठगांठ किये हुए हैं।  अडानी, अंबानी, टाटा, बिड़ला जैसे भारत जैसे देशों के पूंजीपति शासक भी अमेरिका, ब्रिटेन, चीन जैसे देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मिलजुलकर इस भयानक लूट-खसोट के अभियान में लगी हुई हैं। यह देशी- विदेशी लूट-खसोट भांति-भांति के तरीके से हो रही है।

           इस लूट खसोट का ही नतीजा है आज हर जगह, समाज चौतरफा भीषण संकट में है। एक ओर भयानक बेरोजगारी, आसमान छूती महंगाई, भारी गरीबी, भीषण असमानता, युद्ध जैसे हालात के रूप में यह संकट हमारे सामने है तो दूसरी तरफ यह संकट भयानक असुरक्षा, बढ़ते अपराध, बढ़ती  हिंसा, बढ़ती आत्महत्याओं, अकेलापन व अवसाद जैसी बढ़ती मानसिक बीमारियों के रूप में है।

          इस सड़े गले समाज में, एक तरफ 10-20 लाख करोड़ रुपए की दौलत और संपत्ति वाले मुट्ठी भर खरबपति हैं जो सरकार बनाने-बिगाड़ने का खेल रचते है सारे संसाधन इनकी मुट्ठी में ही हैं सरकार, पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां इन्हीं की हैं; तो दूसरी तरफ करोड़ों-करोड़ आम नागरिक हैं जो कथित 'मुफ्त राशन' मात्र पर ज़िंदा रहने को मजबूर कर दिए गए हैं। 'धर्म' की अफीम चटाने और कुछ 'खैरात' के अलावा सरकारों के पास इन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है सिवाय लूट खसोट के।

            हद तो यह है कि इन खरबपति मगरमच्छों को; जो आम नागरिकों की मेहनत को तरह-तरह से हड़प ले रहे हैं रोजगार को भी निगल ले रहे हैं; उन्हें 'दौलत पैदा करने वाले' कहा जा रहा है जबकि बिना श्रम के (मेहनत के) कोई दौलत पैदा ही नहीं होती।

         शहीद भगत सिंह इस गहरे संकट का समाधान समाज के आमूल चूल बदलाव में देखते थे; समाजवाद में देखते थे; क्रांति में देखते थे।

       'बम का दर्शन' लेख में भगत सिंह ने लिखा था- "क्रांति पूँजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अन्त कर देगी। यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म होगा। क्रांति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर व किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामाजिक अवांछित तत्त्वों को इसके अधीन कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं..।"

        शहीद भगत सिंह की इस बात को ध्यान में रखते हुए आज वक़्त की जरूरत है कि शहीद भगत सिंह के बताए रास्ते पर चला जाए। इंकलाब के रास्ते की ओर कदम बढ़ाए जाएं।

 
    



              





साम्प्रदायिक नागरिकता (संशोधन) कानून के ज़रिए भी फासीवादी निजाम की ओर बढ़े कदम



    


साम्प्रदायिक नागरिकता (संशोधन) कानून के ज़रिए भी फासीवादी निजाम की ओर बढ़े कदम

     

        आखिरकार संघी सरकार ने सी ए ए लागू कर ही दिया है। हालांकि इस बार एन आर सी पर और एन पी आर पर ये खामोश हैं l 2019 में गृहमंत्री ने कहा था कि देश में एन आर सी और  एन पी आर होकर रहेगी, तब इसका व्यापक विरोध हुआ था। विरोध सबसे पहल पहले असम में ही हुआ था। असम में जिस वजह से एन आर सी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) लागू की गई थी उसी वजह से मोदी-शाह की सरकार के सी ए ए का व्यापक और उग्र विरोध की शुरुआत भी यहीं से हुई थी। असम के मूल निवासी सी ए ए के जरिए किसी को भी नागरिकता देकर असम में बसाये जाने की आशंका के चलते सी ए ए का विरोध कर रहे थे। जबकि देश के बाकी हिस्सों में इसका विरोध नागरिकता कानून के सांप्रदायिक रुख और एन आर सी होने पर नागरिकता जाने के खतरे के चलते हो रहा था।

   इस व्यापक विरोध के बाद गृहमंत्री और प्रधानमंत्री को बार-बार कहना पड़ा कि देश में एन आर सी नहीं होगी। बाद में सरकार ने संघर्ष के दबाव में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इस वक्त व्यापक विरोध की एक खास वजह थी वह यह कि संघी सरकार ने साफ कहा था कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड जैसे बुनियादी दस्तावेज मान्य नहीं होंगे।

       इस बार पीछे हटकर इन्होंने इन तीन पड़ोसी देशों के गैर मुस्लिमों के लिए एक दस्तावेज उनके मूल देश का साबित करने वाले की जरूरत के साथ भारत सरकार द्वारा जारी पेन कार्ड, आधार कार्ड आदि को भी मान्यता देकर इसकी जरूरत बताई है। इसका ये मतलब नहीं कि भारत में केवल आधार कार्ड, पेन कार्ड, डी एल आदि नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ हैं।

      नागरिकता संशोधन कानून (2019) के जरिए  मनमाने तरीके से तीन देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के प्रावधान कर दिए थे। मुस्लिमों  को अपने ध्रुवीकरण।के औजार बनाकर इससे वंचित कर दिया गया। गरीब अप्रवासियों को  विशेषकर अवैध मुस्लिम अप्रवासियों  को ये दीमक और घुसपैठिये को दीमक के रूप में प्रचारित करते है।

    अब फिर से ठीक चुनाव से पहले इसे ये ले आए। इसकी एक खास वजह असम ही थी जहां बहुसंख्यक हिन्दू जो पिछली बार नागरिकता के दायरे से बाहर रह गए थे, उन्हें इसके दायरे में ले आना; साथ ही पश्चिम बंगाल में मेतुवा समुदाय को अपने पक्ष में लामबंद करना था। जबकि इसकी आम वजह तो पूरे देश के भीतर अपने फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाना है, बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने पक्ष में लामबंद करना है।

    यद्यपि सरकार इस कानून को नागरिकता देने वाला बता इससे किसी की नागरिकता न छीनने की बात कर रही है पर भविष्य में एन आर सी लागू कर वह देश में रह रहे तमाम वंचित समुदायों से नागरिकता छीन सकती है। मुस्लिम समुदाय के लोगों को वह विशेष तौर पर लक्षित कर सकती है। यद्यपि असम की तरह इस प्रक्रिया के निशाने पर आदिवासी व अन्य वंचित समुदाय भी आयेंगे।

       कुल मिलाकर मोदी सरकार अभी नागरिकता के मामले में पीछे हटी है मगर इसका कोर यानी केन्द्रीय चीज बची हुई है वह है सांप्रदायिक आधार पर नागरिकता देना। अभी यह फासीवादी एजेंडा समाप्त नहीं हुआ है बल्कि आने वाले वक्त में यह एजेंडा देश के भीतर नागरिकता की पहचान करने के रूप में सामने आएगा।

Wednesday, 27 December 2023

काकोरी के शहीदों की स्मृति में

                काकोरी के शहीदों की स्मृति में

                अशफ़ाक़-बिस्मिल की राह चलो !

               राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला खाँ, दोनों ही काकोरी के शहीद हैं। काकोरी के ये शहीद, हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ (एच.आर.ए) के सदस्य थे। इस संगठन का मकसद था- अंग्रेजी गुलामी से पूर्ण आज़ादी तथा देश को 'धर्मनिरपेक्ष गणतांत्रिक संघ' बनाना, जहां हर तरह के शोषण का खात्मा हो।

         इन शहीदों ने, काकोरी में ट्रेन में जनता की लूट खसोट से इकट्ठे ब्रिटिश खजाने पर कब्जा किया। मगर बाद में सभी पकड़े गए। अंग्रेज़ सरकार ने राजेंद्र लाहिड़ी, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला और रोशन सिंह को 17 और 19 दिसम्बर 1927 को फांसी दे दी।

       इस शहादत ने आज़ादी के आंदोलन को लहरों की तरह आगे बढ़ाया और भगत सिंह जैसे नायक पैदा हुए। देखते ही देखते अकूत शहादतों के 20 सालों बाद देश आज़ाद हो गया।

        यह साल, काकोरी के शहीदों की शहादत का 96 वां साल है। सवाल है कि क्या जो सपना अशफ़ाक़-बिस्मिल जैसे काकोरी के शहीदों का था; वह हासिल हुआ ? क्या भारत को धर्मनिरपेक्ष और गणतांत्रिक संघ बनाने का उनका लक्ष्य हासिल हुआ; जहां मजदूर, किसान हर आम नागरिक को बराबरी का अधिकार हो, जहां किसी भी प्रकार शोषण ना हो? नहीं। गोरे अंग्रेजों की गुलामी से आज़ादी जरूर हासिल हुई।

        बिस्मिल कट्टर आर्य समाजी हिंदू थे और अशफ़ाक़ मुस्लिम। दोनों ने कभी भी धर्म को राजनीतिक जीवन में नहीं घुसने दिया। दोनों के लिए धर्म और धार्मिक मामले बिल्कुल निजी थे, केवल घर तक सीमित थे जबकि राजनीति और सामाजिक मामलों में धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी। दोनों का मकसद एक समान था। दोनों साथ-साथ जिये, साथ-साथ ही शहीद हुए। दोनों के लिए जलियांवाला बाग के शहीद मिसाल थे। यहां भी हिन्दू-मुस्लिम-सिख जनता ने एक साथ अंग्रेज सरकार गोलियां खाई और शहीद हो गए थे।

       शहीदों के संघर्ष से अंग्रेजी गुलामी से आज़ादी मिली, कुछ अधिकार भी जनता को जरूर मिले मगर धर्मनिरपेक्ष व गणतांत्रिक संघ का सपना पूरा नहीं हुआ। गोरे अंग्रेजों की जगह अब काले अंग्रेजों ने ले ली। पूंजीपति और बड़े बड़े जमींदार देश के नियंता बन गए। यही काले अंग्रेज देश के नए शासक थे। यहां जनता को अपने अधिकारों के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ा। मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, बेरोजगार नौजवानों व अन्य मेहनतकश हिस्सों को, अपनी जिंदगी की बेहतरी के लिए बार बार संघर्ष करना पड़ा।

      हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ने पेश की थी, इस मामले में आज हालात क्या हैं? आज राजनीति पूरी तरह धर्म की चाशनी में डूबी हुई  है। धर्म निजी मामला नहीं रह गया है यह सड़कों, संसदों और राजनीति में प्रदर्शन करने की चीज बन गयी है। यह डराने, धमकाने और शासकों के आतंक के राज को कायम करने का जरिया है। धर्म आज के शासकों का सबसे खतरनाक हथियार है। जनता की एकता और ताकत को खत्म करने में यह सबसे कारगर चीज है। एक ओर मोदी सरकार और भाजपा है जो खुलकर यह काम कर रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस या अन्य राजनीतिक पार्टियां है जो कम या ज्यादा मात्रा में धार्मिक प्रतीकों और धर्म का इस्तेमाल कर रही हैं। 

      मोदी सरकार और भाजपा हिंदू राष्ट्र के रथ पर सवार है। एक ओर इस हिंदू राष्ट्र के झंडे के नीचे करोड़ों बेरोजगार नौजवान, न्यूनतम मजदूरी को तरसते करोड़ों मजदूर और महंगाई से त्रस्त करोड़ों लोग हैं रोज ब रोज यौन हिंसा की शिकार महिलाएं हैं जो हताश-निराश हैं, बेचैन हैं और घुट-घुट कर जीने को मजबूर हैं तो वहीं दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र के नाम पर दिन-रात तेजी से दौलत बटोरते, मुट्ठी भर अरबपति हैं जिनकी दौलत की हवस बढ़ती ही जा रही है ये हर तरह से सुरक्षित हैं सरकार इनकी सेवा में दिन-रात मुस्तैद है। इसी को कुछ लोग 'ब्रिटिश राज से अरबपतियों का राज' भी कह रहे हैं।

         हकीकत यही है। यह पूंजीपतियों का राज है। यही देश के मालिक हैं। शासन-प्रशासन और सरकार इन्हीं की है। इन्हीं के मुनाफे के हिसाब से सारी योजनाएं बनती हैं नीतियां बनती हैं। यह पूंजीवाद है। 

          इसीलिए 4-5 सालों में, एक तरफ  अरबपतियों की संख्या के मामले में, भारत दुनिया में तीसरे न. पर पहुंच गया है तो दूसरी तरफ भुखमरी में, भारत विश्व गुरु बनने की कगार पर है। हालत यह है कि एक ओर देश के 10 टॉप पूंजीपतियों की रोज की औसत कमाई करीब 300 करोड़ रुपये है तो दूसरी ओर देश के करोड़ों लोग हैं जिनकी रोज की कमाई ही इतनी कम है कि वे जैसे-तैसे गुजर-बसर करते हुए सरकारी राशन पर जिंदा भर हैं। 

        बात इतनी ही नहीं है यह भी है कि कर (टेक्स) का बहुत बड़ा बोझ आम जनता के कंधों पर डाला जा रहा है यह बढ़ता ही जा रहा है। साल 2022 में सरकार ने जी.एस.टी से ही 14.83 लाख करोड़ रुपये टेक्स वसूल कर लिए। इसमें देश के ऊपर के 10 प्रतिशत अमीर लोगों का हिस्सा केवल 3 प्रतिशत था जबकि नीचे की 50 प्रतिशत जनता से 64 प्रतिशत हिस्सा वसूला गया है।

        यह भयंकर लूट-खसोट, शोषण और असमानता समाज को बड़े विस्फोट की ओर धकेल रही है। कुछ-कुछ वैसा ही विस्फोट, जैसा श्रीलंका, बांग्लादेश और कई देशों में हुआ या जैसा अंग्रेजी राज में हुआ था। 

        अंग्रेजों के राज में लूट-खसोट, जुल्म-सितम से जनता त्रस्त थी। इस गुलामी और लूट खसोट से मुक्ति के लिए जनता ने बार-बार संघर्ष किये, बगावतें की। तब 'हिंदू-मुस्लिम-सिख' जनता ने एकजुट होकर संघर्ष किये। यह एकता अंग्रेज शासकों के लिए खतरा थी। 

         अंग्रेज सरकार ने धर्म का भयंकर इस्तेमाल किया। धार्मिक कट्टरपंथी संगठनों को पाला पोसा। ये मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, संघ, अकाली दल जैसे संगठन थे। इस तरह अंग्रेज शासकों ने जनता को धर्मों में उलझाया, बांटा और लड़ाया। इसके खिलाफ अशफ़ाक़-बिस्मिल जैसे हज़ारों हज़ार नौजवानों ने आवाज उठाई। आज़ादी के आंदोलन को आगे बढ़ाया। एक ओर कुर्बानियां हुई तो दूसरी ओर संघर्ष आगे बढ़ता गया। आजादी तो हासिल हो गयी मगर काले अंग्रेजों, देशी पूंजीपतियों का राज आ गया। अब तो यह बात शायद ही किसी से छुपी हुई हो। यह इतना साफ है कि कोई मोदी सरकार को 'कॉरपोरेट सरकार' कहता है तो कोई 'अडानी-अंबानी' की सरकार।

          हमें पाठ पढ़ाया जा रहा है कि ये पूंजीपति ही हैं ये पूंजी (पेंसा) लगाते हैं दौलत पैदा करते हैं फैक्ट्रियां खोलते हैं लोगों को रोजगार देते हैं और देश का विकास करते हैं। क्या यह सच है ? नहीं। वास्तव में यह बिल्कुल फर्जी बात है।

            हकीकत इसके ठीक उलटी है।  प्रकृति के बाद यह इंसान का श्रम ही है जो हर चीज का निर्माण करता है। देश के करोड़ो करोड़ मजदूरों मेहनतकशों का श्रम ही है जो  दौलत पैदा कर रहा है हर चीज का निर्माण कर रहा है। मगर सारे संसाधनों के मालिक पूंजीपति हैं ये इसे हथियाकर मालामाल हो रहे हैं। इन्हें तरह-तरह से टेक्स में छूट है बिजली में छूट है; जमीनों कौड़ी के मोल दी जाती है और मजदूरों के श्रम की लूट की छूट है। ये बैंकों का कई लाख करोड़ रुपये कर्ज डकार जाते हैं। इसके अलावा सरकारी खजाना इन पर तरह-तरह से लुटाया जाता है इस तरह पूंजीपति करोड़पति से अरबपति फिर खरबपति बनते हैं। 

         इसका क्या नतीजा होता है? वही जो देश मे हो रहा है। एक ओर भयानक  असमानता, भयानक बेरोजगारी तो दूसरी ओर ऊंची महंगाई। एक ओर जनता के सामने भयानक आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा, बढ़ती आत्महत्याएं और मानसिक बीमारियां तो दूसरी तरफ नशाखोरी, हिंसा और अपराध। यह स्थिति असन्तोष और गुस्से को बढ़ाती है जनता को बगावत (विद्रोह) की ओर धकेल देती है। जैसा कि कई देशों में हो रहा है। जैसा कि आज़ाद भारत में इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान हुआ और इससे पहले अंग्रेज शासकों के खिलाफ हुआ था।

           जनता के इस असन्तोष और गुस्से को ठंडा करने का एक ही उपाय शासकों के पास है। वही उपाय जो अंग्रेजों ने किया था, जो हिटलर ने किया था। यह उपाय है - धर्म के नाम पर नफरत और उन्माद पैदा करो; जनता को बांटो और लड़ा दो। 'हिंदू राष्ट्र' बनाने के नाम पर यही हो रहा है। 'हिंदू-मुस्लिम' 'मंदिर-मस्जिद' की राजनीति इसीलिए है। 'हिंदू राष्ट्र' का नारा अडानी-अम्बानी जैसे कॉरपोरेट पूंजीपतियों की सेवा करता है इनका मुनाफा बढ़ाता है जबकि मजदूरों, किसानों, बेरोजगार नौजवानों और छोटे मझौले कारोबारियों को कंगाल बनाता है और कुचलता है। इस तरह ये हिंदू फासीवाद यानी आतंक का तानाशाही वाला राज कायम करना चाहते हैं।

         इसलिए, ऐसे दौर में जरूरी है कि काकोरी के शहीदों को याद किया जाय। इनकी विरासत को आगे बढ़ाया जाय। धर्म के नाम पर उन्माद और नफरत की राजनीति के खिलाफ आवाज उठाई जाय।

                       


           

        

      

        

        

           

          

         

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