Saturday, 15 March 2014

communalism and fassism


                                     सर्कुलर : सांप्रदायिकता के संबंध में
            साथियो   मौजूदा दौर में साम्प्रदायिक उन्माद की बढ़ती हुई घटनाओं के मद्देनजर कार्यकारिणी सांप्रदायिकता के विषय पर इस सर्कुलर को जारी कर रही है इस संबंध में एक पर्चा भी वितरित किया जाना है व्यापक प्रचार प्रसार अभियान एक – डेढ़ माह तक चलाया जाना है नए नए संपर्को के जरिये सांगठनिक प्रसार के लिए साथी शिद्दत से प्रयास करेंगे । सभी कार्यकर्त्ताओं व सदस्यों की सांप्रदायिकता पर सही व गहरी समझ बनाने के मकसद से यह सर्कुलर जारी किया जा रहा है सभी साथी इस विषय पर गहन समझ बनाने के लिए अपनी अपनी इकाइयों में  बात चित करेंगे ।      
                       
                                    सांप्रदायिकता और फासीवाद
                        कविता : गोरख पांडे :  इस बार दंगा   बहुत बड़ा था
                                    खूब हुई थी
                                    खून की बारिश , अगले साल अच्छी होगी फसल , मतदान की” 

            रूपरेखा :    1:  भूमिका :
                          2: सांप्रदायिकता का इतिहास व इसकी पृष्ठभूमि------- अ  :   आज़ादी से पहले सांप्रदायिकता का इतिहास
                                                                                                   :   आज़ादी के बाद सांप्रदायिकता का इतिहास
                          3: सांप्रदायिकता  क्या है  ?               
  4 फासीवाद और इसका संक्षिप्त इतिहास  
                          5: समाज में सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए गड़े गए मिथक                 
  6 साम्प्रदायिकता विरोधी मुहीम की दिशा 
          भूमिका : 2014  के लोक सभा के चुनाव अब करीब हैं  जैसे जैसे चुनाव हमारे करीब आते जा रहे है वैसे वैसे सांप्रदायिक दंगों में इजाफा होता जा रहा है । अभी मौजूदा वक्त की हालिया घटनाओं पर ही गौर करें किश्तवाड़ ( जम्मू ) फिर मुजफ्फर नगर व शामली में हुए दंगे इस बात की मिसाल हैं । किश्तवाड में तीन लोग दंगे में मारे गए 80 से ज्यादा घायल हुए . मुजफ़्फ़रनगर व शामली में हुए दंगे में 60 से ज्यादा लोग मारे गए यही नही बल्कि 50 हज़ार से ज्यादा मजदूर मेहनतकश लोग शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर कर दिये गए है   दंगाइयों ने  कुछ लड़कियों के साथ बलात्कार उन्हें जिन्दा जला दिया हजारों लोगों को उनके अपने घर से बेघर कर दिया ।  अपने ही मुल्क में उन्हें कैम्पों में शरणार्थिेयों की तरह रहने को  मज़बूर कर दिया गया और यह बेहद अफसोसजनक व दुखद है कि इन कैम्पों में अब तक 50 मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है । 92 व इससे पहले के सांप्रदायिक उन्माद व दंगों में भी शांत व सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम करने वाले इस क्षेत्र में इस बार दंगे करवा दिये गए । सपा बसपा कॉंग्रेस बारतीय किसान यूनियन तथा मुस्लिम कट्टरपंथियों  की इसमें कम या ज्यादा भूमिका रही है जबकि भाजपा व संघ तो इसके सूत्रधार ही रहे है यह तो इनका घोषित एजेंडा ही है । सभी धर्मो व जातियों के मजदूर मेहनतकश लोगों के लिए यह बेहद गंभीर व चुनौतिपूर्ण वक्त है इन तथ्यों की रोशनी में इसकी गंभीरता को समझा जा सकता है
साहिर रचित नज्म परछाइयाँ
            “ गुजिश्ता  जंग में घर ही जले मगर इस बार                                   अजब नहीं है की तनहाइयाँ जल जाये
               गुजिश्ता  जंग में पैकर जले थे
            अजब नहीं है कि परछाइयाँ भी जल जाएं ”
  (गुजिश्ता : अतीत , पैकर : शरीर )

            पिछले एक साल में उत्तर प्रदेश के  विभिन्न इलाकों  में सांप्रदायिक तनावों व दंगों की  लगभग 107 घटनाएँ घट चुकी हैं । असम के कोकराझार में लगभग 5 लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा जबकि कई लोग मारे गए और घायल हुए  । उत्तराखंड की शांत वादियाँ भी सांप्रदायिकता के आगोश में आ गई जब अक्तूबर 2011 में रुद्रपुर में दंगा हुआ जिसमें 4 लोग मारे गए व कई घायल हुए ।  
             यदि अतीत में झाँका जाय तो तस्वीर स्पष्ट हो जाएगा कि पिछले 100-150 सालो के भारतीय इतिहास की यह सबसे बड़े घटना था कि सन 2002 तक आते आते गुजरात में सांप्रदायिकता का सफर एक नई मंजिल में दाखिल हुआ यह यहाँ फासीज़्म का रूप धारण कर चुका था । `गोधरा कांड की प्रतिक्रिया कहकर राज्य मशीनरी की शह पर संगठित व योजनाबद्ध हमला कर नरसंहार को अंजाम दिया गया । गोधरा कांड में 58 लोग मारे गए थे जबकि इसके बाद हुए नसंहार में 1243 लोग मारे गए 3586 लोग घायल हुए जबकि 179 लोग लापता हो गए । वीभत्स बलात्कार व हत्याकांड यहा हुए अल्पसंख्यक समुदाय के एक लाख से ज्यादा  लोग विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर कर दिये गए  जबकि इससे पहले 1984 में इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली व इसके आस-पास के इलाकों में हुए दंगों में 3000 से अधिक अल्पसंख्यक  लोग  मारे गए थे हजारों  लोग विस्थापित हुए थे  
            1967 के बाद 47 जगहों पर 85 बड़े दंगे हो चुके हैं जिसमें से 10 दक्षिण भारत में , पूर्वी भारत में 12, पश्चिमी भारत में 16 तो उत्तरी भारत में 20 दंगे हो चुके हैं । । 1970 के दशक में   7 दंगे 1980 के दशक में 14 जबकि 1990 के दशक में सबसे ज्यादा दंगे (23) हुए 2000s में 13 दंगे हुए .. इन दंगों में कुलमिलाकर 12828 लोग मारे गए . ( स्रोत  : outlook indiacom 5 march 2013 )       
            भारत के अधिकाश प्रांत आज इस सामाजिक समस्या की चपेट में हैं । ऐसा नहीं कि सांप्रदायिक दंगे इसी दशक में हुए हों बल्कि यह कहना ही सही होगा इसका औपनिवेशिक अतीत रहा है ब्रिटिश शासकों की भी इसमें प्रमुखभूमिका रही है    
            सांप्रदायिक दंगे जहां अलग अलग मजहब के लोगों के बीच हुए है वहीं एक ही मज़हब के भीतर उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों पर हमले के रूप में भी हुए हैं । सांप्रदायिक दंगे भाषायी आधार पर भी हुए है । असम में हिन्दी भाषी क्षेत्रों के मजदूरों पर हमले हुए जबकि महाराष्ट्र में शिव सेना ने  पहले दक्षिण भारतीयों व  फिर बाद में उत्तर भारतीयों पर हमले करवाए ।
            भारतीय उपमहाद्वीप में ना केवल भारत बल्कि पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी दंगों का इतिहास है । पाकिस्तान व बांग्लादेश में बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय के कट्टरपंथी संगठनों द्वारा अल्पसंख्यक हिन्दु समुदाय के लोगो को अपना निशाना बनाया जाता है। बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर जो अत्याचार होते है उसे तसलीमा नसरीन की किताब 'लज्जा' से समझा जा सकता है । इसकी ठीक उलटी तस्वीर भारत में हैं जहाँ धर्मनिरपेक्ष संविधान की कसम खाने वाली पूंजीवादी पार्टियाँ भी इसकी धज्जियां उड़ाती रहती हैं सांप्रदायिक संगठनों व पार्टियों ने तो यह सब किया ही है । अल्पसंख्यक समुदाय के सिक्ख को जहां कॉंग्रेस ने निशाना बनाया वहीं मुस्लिम व ईसाई लोगों पर यहाँ बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के सांप्रदायिक व फासीवादी ताकतों द्वारा बड़े स्तर पर हमले किये गए ।       
            सभी जगह आम तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को बहुसंख्यक समुदाय के सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों द्वारा निशाना बनाया जाता है । अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को ही आम तौर पर हर तरह का नुकसान दंगों में उठाना पड़ता है ।  जो सांप्रदायिक दंगे या हमले के शिकार होते है वह आम तौर पर मजदूर मेहनतकश लोग होते है । जिनकी हत्याएँ होती हैं महिलाओं को अपमानित किया जाता है बलत्कृत कर जिंदा जला दिया जाता है मासूम व अबोध बच्चों को भी नही बख्शा जाता , यही वे लोग हैं  जिन्हें विस्थापन–पलायन का दर्द भी झेलना पड़ता है । सांप्रदायिक उन्माद व दंगों के दौर में बर्बरता व पागलपन चारों ओर पसर जाता है। 
            अब एक बार फिर से आने वाले चुनावों के मद्देनजर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण काफी तेज हो गया है मजदूर-मेहनतकश अवाम के मुद्दे बेरोजगारी-महंगाई परिदृश्य से नदारद हैं । गरीबी ,अशिक्षा, भुखमरी, कुपोषण, वैश्यावृत्ति आदि आदि जैसी गंभीर सामाजिक समस्याएँ पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं के लिए कोई मायने नहीं रखते । मंदिर-मस्जिद, धारा 370 की समाप्ति , नए आर्थिक सुधार , सामान नागरिक संहिता आदि-आदि जैसे मुद्दे इन पूंजीवादी राजनेताओं की जबान से होते हुए अखबार, टी.वी. चैनलों व सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिये फजा में तैर रहे हैं ।
            सांप्रदायिक व फासीवादी संगठन समाज में पैदा होने वाली इन हर गंभीर समस्या के लिए दूसरे  सम्प्रदाय या समुदाय मसलन मजहब जाति, क्षेत्र या नस्ल  आदि के लोगों को दोषी ठहराते हैं । यह सांप्रदायिकता एक विचारधारा है राजनीति है  जिसके इर्द-गिर्द सांप्रदायिक संगठन व पार्टियां खुद को खड़ा करती है । सांप्रदायिकता अलग अलग धर्मों जातियोंव क्षेत्रों के मजदूर मेहनतकश अवाम के बीच मौजूद समरसता,सौहार्द को खत्म कर देता है .
            सांप्रदायिकता कुछ खास स्थितियों में फ़ासिज़्म में बदल जाती है जो कि बेहद खतरनाक स्थिति है । जर्मनी ,स्पेन व इटली जैसे मुल्क  के हिटलर, फ़्रांकों व मुसोलीनी के दौर का इतिहास हमारे सामने है, । जिस मध्यम वर्ग व मेहनतकश लोगों को अपनी  अंधदेश भक्ति व यहूदी विरोध के इर्द गिर्द हिटलर जैसे फासिस्टों ने अपने पीछे लामबद्ध कर लिया था सत्ता पर बैठते ही इनके अधिकारों को जब्त कर हिंसा व आतंक का खौफ पैदा कर दिया था ।
            सभी धर्मों,जातियों व क्षेत्र की मजदूर मेहनतकश जनता के लिए यह बेहद गंभीर व चुनौतीपूर्ण वक्त है  यह चुनौतीपूर्ण है क्योकि जहा एक ओर बढ़ती बेरोजगारी व बढ़ती महंगाई ने आम जनता की जिंदगी को नारकीय बना दिया है बेहतर जिंदगी की चाहत में सड़को पर होने वाले आम जनता के संघर्षों पर लाठीया गोलिया बरसती हैं फर्जी मुकदमे दर्ज कर जेल में सड़ने के लिए डाल दिया जाता है वहीं दूसरी ओर बड़े बड़े  दंगों के आयोजन की तैयारी चल रही है । 
             बलात्कार करने व फिर जलाकर मार देने वाले, मासूम बच्चों को मौत की नीद सुला देने वाले हज़ारों लाखो मजदूर मेहनतकश इंसानों  के जीवन को चंद लम्हों में तबाह बर्बाद करने वाले ये लोग कौन है ?  इंसानियत  भाईचारे व अमन शांति के दुश्मन कौन हैं ?  कौन हैं जिन्हें मजदूर मेहनतकश इंसानों की एकजुटता से खतरा है ? ये ऐसे प्रश्न हें जिन पर मंथन करने की जरूरत है सोचने की जरूरत है । प्रश्न और भी हैं किसकी शह पर ये दंगाई बेखौक होकर लूटपाट बलात्कार हत्या का षडयंत्र रचते हैं ? कौन है जो इन दंगाई संगठनों व पार्टियों को पालता पोसता है व इस्तेमाल करता है ? क्यों नहीं धर्मनिरपेक्ष राजनीति  की बातें करने वाली पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां व सरकारें दंगाइयों को दंगो के दौरान गोली मार देने के आदेश देती ? क्यों नही इन सभी दंगाइयों को गिरफ्तार कर  जेल में डाल दिया जाता?
          इन प्रश्नों व चुनौतियों  की रोशनी में ही सांप्रदायिकता की गहराई से जांच पड़ताल करने की जरूरत है । आइये तथ्यों की छानबीन करते हुए आगे बढ़ें ।
2 : सांप्रदायिकता का इतिहास व इसकी पृष्ठभूमि  अ :   आज़ादी से पहले सांप्रदायिकता की स्थिति :  समाज का सांप्रदायिकरण करने में संप्रादायिक इतिहासकारों की भी काफी भूमिका रही है । यदि सामंती व्यवस्था या मध्यकाल की बात की जाय तब सांप्रदायिकता के लिए कतई गुंजाइश नही थी । तब शासक चाहे किसी भी मजहब के रहे हों उनका व्यवहार धार्मिक विश्वासों से नहीं बल्कि अपने साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा, अत्यधिक संपत्ति व धन अर्जित करने आदि के लालच से तय होता था । इसी प्रकार प्रजा (जनता) चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम उसका शोषण-उत्पीड़न होना ही था चाहे शासक  हिन्दु हो या मुस्लिम ।
            हकीकत तो यही है एक मुस्लिम शासक ने दूसरे मुस्लिम शासक को हराने के लिए  हिन्दू शासकों से गठजोढ़ कायम किया जबकि हिन्दू शासकों  ने अपने विरोधी हिन्दू शासकों को हराने के लिए मुस्लिमों का सहयोग लिया। जिस सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के लिए महमूद गजनवी कुख्यात है उसकी लूट में मददगार करने वालों में हिन्दू सैनिक भी थे व तिलक नाम का  ब्राहामण उसका सेनापति था.  जब बाबर ( मुस्लिम) व इब्राहिम लोदी( मुस्लिम) के बीच युद्ध हुआ तब राणा सांगा (हिन्दू) बाबर का साथ दे रहे थे ; जब मुगल शासक अकबर हिन्दू शासक राणा प्रताप से युद्ध लड़ा तब अकबर का सहयोगी राजा मान सिंह था जबकि राणा प्रताप का सहयोगी एक मुस्लिम शासक हाकिम खान सूर था  इसी तरह औरंगजेब व शिवाजी के बीच हुए युद्ध में राजा जय सिंह ने औरंगजेब का साथ दिया जबकि शिवाजी के तोपखाने का मुखिया एक पठान था । इसलिए इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि कौन शासक किस धर्म के बारे में क्या बात करता है ।    
             इतिहास में और पीछे की बात करें तो पता चलेगा कि सम्राट अशोक, बिम्बिसार, चन्द्रगुप्त मौर्य , चन्द्रद्रगुप्त विक्रमादित्य आदि-आदि अपने  ही धर्म के दूसरी रियासतों के राजाओं से युद्धरत थे । यही नहीं  इस तथाकथित  स्वर्ण काल में अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या का षडयंत्र रचा  था जबकि मुगल काल में औरगंजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर भाइयों की हत्या कर दी ।
सांप्रदायिक होने व धार्मिक होने व में बहुत फर्क है । अपने धर्म में धार्मिक परम्पराओं व आस्था में विश्वास होने से कोई सांप्रदायिक नहीं हो जाता बशर्ते कि दूसरे धर्म व उसके मानने वाले लोगों के प्रति कोई दुराग्रह ना हो पूर्वाग्रह न हो ।
            सांप्रदायिकता आधुनिक पूंजीवादी समाज में पैदा हुई है किन्हीं खास एतिहासिक परिस्थितियों में पैदा हुई है । भारत में यह परिस्थिति तब बनी थी जब कि यह अंग्रेजों का गुलाम था और वह भी तब जब खुद ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी और इस वक्त तक अंग्रेज  हिंदुस्तान में एक-दो शताब्दी से ज्यादा वक्त गुजार चुके थे । यह दौर हिंदुस्तान में आर्थिक ,सामाजिक  व राजनीतिक परिवर्तन का था ।
            मध्यकाल में जबकि सामंती व्यवस्था थी मुख्य तौर पर कृषि व फिर दस्तकारी इसका आधार थे । जीवन निर्वाह के साधनों मसलन अनाज , कपड़े आदि आदि का उत्पादन केवल स्थानीय जरूरतों को पूरा करने के लिए लिए होता था बाजार में बेचने के लिए नहीं । बाज़ार सीमित था यहाँ वही चीज बिकने के लिए आती थी जो कि स्थानीय जरूरतों को पैदा करने के बाद बचती थी । दस्तकार अपने औजारों के खुद मालिक थे । कृषि ग्रामीण सामुदायिक ज़मीनों पर होती थी जो राजा की होती थी या फिर उसकी जिसे वह दान कर देता था । इसलिए प्रजा चाहे वह हिन्दू  हो या मुस्लिम उसे शासक कोई भी हो इससे फर्क नहीं पड़ता था ।
            यह ऐसा समाज था जहां श्रमजीवी जनता नागरिक की हैसियत से नही बल्कि प्रजा की स्थिति में थी अधिकारविहीन थी । राजनीति में जनता की भागीदारी व जनवादी अधिकारों का यह जमाना नहीं था । अत: सांप्रदायिक राजनीति व विचारधारा को पैदा करने वाली जमीन अभी मौजूद नहीं थी ।
सांप्रदायिकता के लिए जिस आर्थिक व सामाजिक उथल-पुथल ने जमीन तैयार की थी उसे ध्यान में रखना होगा । जहां सामंती काल एक प्रकार की जड़ता मौजूद थी परिवर्तन की गति बेहद धीमी थी,बेरोजगारी जैसी चीज मौजूद नहीं थी राजाओं के बीच होने वाले युद्ध को छोड़ दिया जाय तो प्रतिस्पर्द्धा जैसी कोई चीज प्रजा के जीवन में नहीं थी अत: अनिश्चितता व असुरक्षा आर्थिक सामाजिक संदर्भों में बेहद कम थी ।
लेकिन 17 वी सदी की शुरुआत में भारत में अंग्रेजों के आने के बाद तस्वीर धीमे-धीमे बदलने लगती है अब ऐसे आर्थिक-सामाजिक आघात हुए  जिसे कि यवन (ग्रीक) हूण, शक, कुषाण व फिर मुगल काल में सोचा भी नहीं जा सकता था । अब  गुजरते वक्त के साथ अंग्रेज़ एक-दो सदी में सभी बिखरी रियासतों को जीत कर पूरे भारत को अपने अधीन कर लेते हैं ; यहाँ की सामंती अर्थव्यवस्था को चकनाचूर कर देते हैं पूंजीवाद की नींव डालते हैं . अंग्रेजो ने कृषि में सामुदायिक अर्थव्यवस्था को ख़त्म करके जमींदारी व्यवस्था को स्थापित कर दिया; वस्तु लगान को खत्म करके मुद्रा लगान तय कर दिया जबकि दूसरी ओर हिंदुस्तान के दस्तकार  ब्रिटेन से मशीनों से बन कर आ रहे काफी सस्ते माल के चलते तबाह हो गए । इस विकास ने भारत में सामाजिक संरचना में बड़ा बदलाव कर दिया था नए सामाजिक वर्ग और तबके या संस्तर अस्तित्व में आ गए । अब एक ओर अपनी श्रम शक्ति को बेचने वाला अपने औजारों से महरूम मजदूर वर्ग तो दूसरी ओर उत्पादन के साधनों का मालिक पूंजीपति वर्ग वजूद में आ चुका था । बैंकर्स,  व्यापारी, उद्योगपति, जमींदार व बागान मालिक ,दलाल के रूप में नए वर्ग वजूद में आ गए थे । शिक्षा के प्रसार के चलते अब  समाज में विभिन्न पेशे में नौकरी करने वाले  व इसके लिए लालायित  रहने वाले लोगों का एक शिक्षित मध्यम वर्ग वज़ूद में आ गया । इस नये समाज में अब बाज़ार की जरूरत के हिसाब से पैदावार पर जोर बढा । अब बाज़ार की भूमिका जीवन में बढने लगी थी ।.
           
पहले भारत में अकालनहीं आया था । अंग्रेजों के आने के बाद हुई तबाही : --   
वर्ष                                अकाल से होने वाली मौतें
1800 – 25                                  1,000,000
1825 – 50                    400,000
1850 – 75                    5,000,000
1875- 1900                  15,000,000
सन
कपास का निर्यात
1813
90 लाख पौंड
1833
3 करोड़ 20 लाख पौंड
1844
8 करोड़ 80 लाख पौंड
इस प्रकार सामंती समाज में अब आधुनिक पूंजीवादी समाज के लक्षण पैदा हो गए जिसका धीमे-धीमे विकास होने लगा तब दस्तकारी व कृषि में तबाह हो रहे लोगों के लिए रोजगार बेहद सीमित होने के चलते अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया ।  वकील डॉक्टर इंजीनीयर आदि के रूप में जो  शिक्षित मध्यम वर्ग अस्तित्व में आया था उसके सामने भी रोजगार का संकट था। हिन्दू, मुस्लिम या सिक्ख सभी के लिए यह संकट मौजूद था । इसने पहले से आ रहे सामाजिक व पारिवारिक सम्बन्धों पर भी हमला किया । अब समाज में हर तरफ प्रतिस्पर्द्धा अपने पैर पसार रही थी ; आम लोगों के जीवन में असुरक्षा, अनिश्चितता,अलगाव व अविश्वास घर करते जा रहा था । इन्हीं  स्थितियों में तबाह  बर्बाद हो रहे किसानों, आदिवासियों दस्तकारों आदि के  संघर्ष अंग्रेजों के खिलाफ आम होता जा रहे थे . इन्हीं स्थितियों में 1857 का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम होता हैं जिसको अंग्रेज असफल कर देते हैं यह संग्राम, ब्रिटिश हुकूमत को सबक लेने पर बाध्य करती है । फिर 1858 में सीधे ब्रिटिश शासक भारत को अपने नियंत्रण में ले लेते है । अंग्रेजों द्वारा की जा रही लूट को इन तालिकाओं से भी समझा जा सकता है ( स्रोत – आज का भारत : रजनी पाम दत्त )                                                       
इस स्वतन्त्रता संग्राम में  अंग्रेज़  हिन्दू-मुस्लिम एकजुटता को देख चुके थे साथ ही अंग्रेजों ने यह भी  देखा कि संग्रामियों ने बहादुर शाह जफर को बिना किसी धार्मिक भेद के अपना नायक चुना था । यह ब्रिटिश शासकों के लिए खतरनाक था । अब ब्रिटिश शासकों के लिए यह भी जरूरी हो गया कि अलग अलग मज़हब के लोगो के बीच विभाजक रेखा खींच दी जाय, अलग अलग मज़हब व जातियों के लोगों को एक दूसरे के खिलाफ खडा कर दिया जाय . इस “फूट डालो-राज करो को अमल में लाने के लिए ब्रिटिश शासकों ने इतिहास को देखने का सांप्रदायिक नज़रिया विकसित किया । बंबई के गवर्नर लार्ड एंफिस्तान ने मई 1859 में कहा : -- “प्राचीन रोमन सम्राट का यह आदर्श वाक्य था कि “फूट डालो राज करो और यही हमारा भी आदर्श वाक्य होना चाहिए ”। ।
            और इसकी शुरुआत इतिहासकारों के जरिये  हो गई जब कि  जेम्स मिल नाम के इतिहासकार ने भारत के इतिहास को तीन हिस्सों में बाँटा । अंग्रेजों से पहले के काल को “हिन्दू काल ” व “ मुस्लिम काल ” कहा गया जबकि औपनिवेशिक काल (अंग्रेजों के काल) को “ईसाई काल ” नहीं बल्कि “ब्रिटिश काल ” कहा गया । यह इतिहास को प्रस्तुत करने व व्याख्यायित करने का अवैज्ञानिक व अतार्किक तरीका था ; यह साम्प्रादायिक व्याख्या थी इतिहास की । अंग्रेज़ इतिहासकर डाउसन व एच. एम. इलियट ने भी यही काम किया । अग्रेंज़ी हुकूमत ( औपनिवेशिक शासन ) को भारत में बनाए रखने के लिए एतिहासिक तथ्यों से खिलवाड़ करते हुए अपने माफिक तथ्य लेते हुए इतिहास की व्याख्या की । इलियट ने 1849 में अपनी किताब द हिस्टरी ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरीयन्स की भूमिका में लिखा कि हिंदुओं के प्रति मुस्लिम शासक बेहद निरंकुश थे । अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भारत के संबंध में कहा भारत का कोई इतिहास नहीं हैं और कहा गया कि भारत में सभ्यता व संस्कृति की शुरूआत अंग्रेजी राज आने से हुई ।                        
सन
अनाज का निर्यात ( कीमत में )
1849
8 लाख 58 हज़ार पौंड
1858
38 लाख पौंड
1877
79 लाख पौंड
1901
93 लाख पौंड
1914
1 करोड़ 93 लाख पौंड
            हिन्दू व मुस्लिम सांप्रदायिक इतिहासकारों ने इन इतिहासकारों अनुसरण ही नहीं किया बल्कि इनसे चार कदम आगे बढ़ गए । हिन्दू सांप्रदायिक इतिहासकारों ने कहा कि मुगलकाल से पहले का युग हिंदुस्तान में “ स्वर्ण युग ” था; कि सारी समस्याएँ यहाँ मुसलमानों के आने के बाद शुरू हुई ; कि मुस्लिम शासन हिंदुओं पर अत्याचार व अपमान का युग था ; कि हिन्दू शासक न्यायप्रिय, उदार, सहनशील, दयालु व धार्मिक होते थे जबकि मुस्लिम शासक क्रूर, अत्याचारी, दुराचारी थे इनका धर्म इन्हे कट्टर व हिंसक बनाता था ।
            जबकि मुस्लिम साम्प्रदायिक इतिहासकारों ने कहा कि मुगलकालीन दौर में भारत ने समृद्धि हासिल की यही काल भारतीय युग का “स्वर्ण युग” था कि मुगलकालीन दौर से पहले यहाँ असभ्यता थी व अंधकार था । साथ ही इन इतिहासकारों ने मुसलिम शासकों का महिमामंडन किया क्योंकि इनकी नज़र में काफिरों को नीचा दिखाया गया था ।
              अब यदि यह सवाल उठाया जाय कि इतिहास क्या होता है ?  एक  इतिहासकार को इतिहास की व्याख्या व मूलांकन कैसे करना चाहिए ?  तब आइये फ्रांसीसी दार्शनिक फ्रेज़र व डी डी कौशाम्बी से इसे समझें । फ्रेजर ने एक बार कटाक्ष करते हुए कहा “इतिहास राजवंशों में जन्मे हरामजादों के नाम तो गिनाता है , किन्तु यह नहीं बताता कि गेहूं की उत्पत्ति कैसे हुई ”। यह कटाक्ष हमारे सामने इतिहास को समझने व इसकी व्याख्या के संबंध में व्याप्त समस्या को प्रस्तुत कर देता  है  साथ ही कुछ दिशा भी देता है । या डी . डी . कौशांबी के शब्दो में कहा जाय तो यह “यह सच है कि आदमी केवल रोटी( भोजन सामग्री ) पर ही जीवित नहीं रहता परंतु हमने अभी तक इंसान की कोई ऐसी नस्ल तैयार नहीं की जो रोटी(भोजन सामग्री ) के बिना जीवित रहती हो.”  यह तथ्य हमें समाज में उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए मजबूर करता है ।
            समाज या जीवन निरंतर बना रहे, चलता रहे लिहाजा जरूरी है कि भौतिक चीजों यानि अनाज( भोजन सामग्री), कपड़े आदि-आदि जीवन के लिए जरूरी चीजों का उत्पादन होते रहे साथ ही इन उत्पादित वस्तुओं का समाज में वितरण होता रहे । और सही मायने में उत्पादन व वितरण साथ ही उत्पादन की कार्यवाही में इस्तेमाल में आने वाले औज़ार ही ऐसी कुंजी है जिसका बदलता स्वरूप समाज के इतिहास की सही वस्तुपरक ,तथ्यपरक व तार्किक तस्वीर हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है ।
भिन्न-भिन्न चीजों के उत्पादन की कार्यवाही के दौरान इन्सानों के बीच एक निश्चित आपसी सामाजिक संबंध कायम होते है जो कि `उत्पादन संबंध कहलाते हैं । उत्पादन सम्बन्धों का अर्थ “उत्पादन के साधन” पर मालिकाने से है .साथ ही पैदा हो रही चीजों के “वितरण” से व इन चीजों को पैदा करने में लोगों की भूमिका और इस प्रकार उत्पादन के साधनों पर मालिकाने का सवाल ही बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है । उत्पादन में वाले औज़ार, मशीन ,जमीन आदि-आदि का मालिक कौन है ,पूरा समाज या फिर मुट्ठी भर लोग; यह पहेली बुनियादी महत्व की है ।  
 यह मालिकाना ही तय करता है कि समाज में उत्पादित वस्तुओं का वितरण कैसे होगा और साथ ही साथ यह भी तय करता है कि उत्पादन में लोगों की क्या भूमिका व कैसे संबंध होंगे । इस प्रकार हम इस प्रश्न की काफी करीब पहुँच जाते है इतिहास के संबंध में जिसे हमने उठाया था । एक बार फिर से डी . डी . कौशांबी के शब्दों को उधार लिया जाय तो कहना होगा कि “ उत्पादन के साधनों में व सम्बन्धों ( उत्पादन) में होने वाले क्रमिक परिवर्तनों का काल क्रम से प्रस्तुत किया गया विवरण ही इतिहास है ” । इस प्रकार भिन्न संदर्भों में कहा जाय तो यह कि इतिहास हमें बेहतर भविष्य की ओर उन्मुख करता है बशर्ते कि बीते हुए वक्त या इतिहास का सही सही सार संकलन करते हुए और जो गलतिया हो चुकी हैं  उन्हें सबक लेते हुए दूर किया जाय ।       
            अब पुन: उस दौर में लौटें जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था अंग्रेज शासकों की नीतियों से अब भारत के  व्यापारी धनी हो रहे थे जबकि जमींदारों की स्थिति खराब हो रही थी । जमींदारों में ज्यादा तादाद मुस्लिमों की थी । 1857 में संग्राम मुगल शासकों की भागीदारी  को देखकर अंग्रेज शासकों  ने इनसे दूरी बनाई तो दूसरी ओर हिन्दू अभिजात वर्ग को अपने पक्ष में रखा । जैसे ही ब्रिटिश शासकों के खिलाफ कॉंग्रेस का सुर थोड़ा तीखा होना शुरू हुआ वैसे ही अंग्रेजों ने सर सैयद अहमद वाले मुस्लिम अभिजात वर्ग से नज़दीकिया बढ़ाई । अंग्रेज़ सर जॉन स्ट्राचे ने कहा “ ...मुसलमानों का अभिजात वर्ग हमारी कमजोरी का नहीं बल्कि शक्ति का स्रोत है ।
            साम्प्रदायिकरण के मकसद से 1883 में  अंग्रेजों ने फिर कदम आगे बढाया .अब नगरपालिका में सीटों के आबंटन के संबंध में अंग्रेज़ शासकों ने स्वशासन बिल प्रस्तुत किया तो मुस्लिम अभिजात वर्ग के सर सैयद अहमद ने इसका विरोध किया और कहा कि....  आबादी के सभी वर्गों ने शिक्षा में बराबर या आनुपातिक तरक्की नहीं की है ... अत: चुनाव के जरिये प्रतिनिधित्व .... का अर्थ है  बहुसंख्यक ( हिन्दू ) जनसंख्या का के विचारों व हितों का प्रतिनिधित्व ... । इस प्रकार हिन्दू व मुस्लिम अभिजात वर्ग में एक विभाजन (द्वंद ) पैदा हो गया । हालांकि अल्पसंख्यकों की यह आशंका स्वाभाविक भी है ।
             1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज़ो के सहयोग से हो चुकी थी  । इसे सर सैयद अहमद ने हिन्दू पार्टी कहा था हालांकि पश्चिमी भारत का  मुस्लिम आभिजात वर्ग इससे सहमत नहीं था वह कांग्रेस के साथ था । पश्चिमी भारत का मुस्लिम अभिजात व्यापारी था चुकी रेल, डाक , तार आदि आधारभूत सुविधाओं के चलते इसे हिन्दू अभिजात व्यापारी की तरह ही  बहुत फायदा हो रहा था इसलिए इन्होंने विरोध नहीं किया ।      
            इसी दौर में सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी को लेकर भी मुस्लिम व हिन्दू अभिजात वर्ग में तनाव पैदा होने लगा । अब चुकी राजकाज की भाषा फारसी की जगह अँग्रेजी हो चुकी थी । ब्रिटिश शासक नागरी प्रस्ताव लाये और फारसी व हिन्दी (देवनागीरी ) लिख पढ़ सकने वाले व्यक्ति की ही सरकारी नौकरी में नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया  । पश्चिमी भारत  के  मुस्लिम अभिजात को छोड़कर बाकी मुस्लिम अभिजात ने इसका विरोध किया क्योंकि देवनागिरी का इनको कोई ज्ञान ही नही था ।  जबकि हिन्दू अभिजात समुदाय फारसी भी जानता था । इस प्रकार हिन्दू व मुस्लिम अभिजात समुदाय के बीच  फिर तनाव की स्थिति पैदा हो गई ।   
            “रोजी-रोटी का सवाल खड़ा करती है जनता ,                                      
                        शासन कुछ देर सिर खुजलाता है
      एकाएक सांप्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है ......
            हर हाथ के लिए काम मांगती है जनता
                        शासन कुछ देर विचार करता है
       एकाएक सांप्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है ......
      अपने बुनियादी हकों का हवाला देती है जनता
                        शासन कुछ देर झपकी लेता है
      एकाएक सांप्रदायिक फसाद शुरू हो जाता है ......
                        सांप्रदायिक फसाद शुरू होते ही
                        हरकत में आ जाती हैं बंदूकें
           
स्थिति कभी गंभीर
            कभी नियंत्रण में बतलायी जाती है
                        एक लंबे अरसे के लिए
                        स्थगित हो जाती है जनता
                        और उसकी मांगें …….
                        इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में शासन
                        अपनी चरमराती कुर्सी को
            ठोंक पीट कर पुन: ठीक कर लेता है । 
            .............. ( नरेंद्र जैन )

             इस दौर में एक ओर दयानंद सरस्वती, केशव सेन आदि जैसे लोगों के नेतृत्व में पुनरुत्थान व धर्म सुधार के आंदोलन हो रहे थे जो अतीत का महिमामंडन कर रहे थे तथा प्राचीन काल की श्रेष्ठता की बात करते हुए उस ओर लौटने के नारे लगा रहे थे तो दूसरी ओर राष्ट्रवादी आंदोलन भी पैदा हो रहे थे । तह राष्ट्रवादी आंदोलन अंग्रेज़  शासकों की गुलामी से आज़ादी के लिए हो रहे थे । दिक्कततलब यह था कि इन  राष्ट्रवादी आंदोलनों में भी कुछ राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा जनता को अपने पीछे लामबद्ध करने के लिए पिछड़ी मूल्य मान्यताओं का इस्तेमाल किया जा रहा था । इन धार्मिक व सामंती मूल्यमान्यताओं से कुछ राष्ट्रवादी नेता किस हद तक ग्रसित थे इसे कॉंग्रेस के नेता बाल गंगाधार तिलक के उदाहरण से समझा जा सकता है बाल गंगाधर तिलक ने एज ऑफ कनसेंट बिल के विरोध में व्यापक अभियान छेड़ दिया जबकि यह बिल 10 वर्ष की लड़कियों के साथ सहवास की उम्र को 12 वर्ष किए जाने के लिए था वह यहीं नही रुके बल्कि गौ रक्षा समिति का गठन भी उन्होने  किया , राष्ट्रवादी आंदोलन में जनता को एकजुट करने के लिए  तिलक ने गणेश उत्सव का आयोजन भी शुरू कर दिया था ।
            राष्ट्रवादी आंदोलन में इन हिन्दू धार्मिक प्रतीकों व आयोजनों के इस्तेमाल ने भी साम्प्रादायिकता को मजबूत किया ।  खुद महात्मा गांधी ने राजनीति व धर्म को उलझा दिया था वह एक ओर हिंदुवाद व उसके धार्मिक धारणाओं का उपदेश देते थे तो दूसरी ओर राजनीतिक उद्देश्य का । हालांकि महात्मा गांधी सांप्रदायिक नहीं थे । लेकिन यह सारी चीजें मुस्लिमों को आशंकित करती थी उनमें अविश्वास व असुरक्षा पैदा करती थी  तथा उन्हें अलगाव व कट्टरपन की दिशा में धकेलती थी । साथ ही साथ यह मुस्लिम सांप्रदायिकता व हिन्दू सांप्रदायिकता को मज़बूत करता था । अंग्रेज़ शासकों ने कभी हिन्दू सांप्रदायवादियों को तो कभी मुस्लिम सांप्रदायवादियों को दुलार-पुचकार कर  इसे और बढ़ाने में भूमिका निभाई ।
            इन साम्प्रादायिक तत्वों ने गरीब किसानों के संघर्ष को भी साम्प्रादायिक रंग दे दिया । केरल में हिन्दू भूस्वामियों के खिलाफ गरीब मुस्लिम किसानों के संघर्ष  हो रहे थे तथा पंजाब में मुस्लिम भूस्वामियों के खिलाफ गरीब हिन्दू किसानों के संघर्ष हो रहे थे लेकिन इन्होंने  इसे साम्प्रादायिक बना दिया   इस प्रकार हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने हिन्दू मुस्लिम भूस्वामियों के पक्ष में काम किया ।
            1870 के बाद से ही हिन्दू भूस्वामियों, साहूकारों व मध्यम वर्ग के एक हिस्से ने मुस्लिम विरोधी भावनाएं भड़काना शुरू कर दिया । यही नही भाषायी विवाद को सांप्रदायिक रंग दे दिया ।  कॉंग्रेस की ही तरह मुस्लिम लीग का गठन भी अब अंग्रेजों के सहयोग से दिसंबर 1906 में हो गया था  । इसके तत्काल बाद 1907 में पंजान हिन्दू महासभा का गठन हिन्दू साम्प्रादायिक तत्वों द्वारा किया गया जबकि 1915 में हिन्दू महासभा का भी गठन हो गया ।  इसी दौर में बंगाल में जन आन्दोलन की बाढ़  इसमें हिन्दू मुस्लिमों की एकजुटता को  फिर अंग्रेजों में सिहरन पैदा कर दी थी ।  इससे निपटने के लिए अंग्रेज़ शासकों ने धर्म के आधार पर बंगाल का विभाजन  कर दिया था । 1909 के दौरान ब्रिटिश शासकों ने सांप्रदायिकता को और ज्यादा पुष्ट करने के लिए धर्म के आधार पर अलग चुनाव क्षेत्रों अलग प्रतिनिधित्व प्रणाली का प्रावधान किया  इसमें मुसलिमों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया । कुल मिलाकर ये कदम हिन्दू मुस्लिम समुदाय के बीच अविश्वास अलगाव व आशंकाओं को निरंतर बढ़ाते जा रही थी । अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा पाले पोसे जा रहे आर एस एस व मुस्लिम लीग जैसे सांप्रदायिक संगठन इस काम में बहुत मददगार व कारगर साबित हो रहे थे ।
            मुस्लिम लीग शुरुआत के दिनों सांप्रदायिक विचारों का वाहक था लेकिन बाद में यह कॉंग्रेस की तरह यह भी धीरे-धीरे ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी होने लगी । मुस्लिम लीग के मुहम्मद अली जिन्ना 1930 से पहले नेहरू की तरह धर्मनिरपेक्ष थे । जिन्ना के प्रयासों से ही 1916 में मुस्लिम लीग व कॉंग्रेस में समझौता हुआ जिसमें 1009 के प्रावधानों से पीछे हटते हुए  मुस्लिमों के लिए अलग मतदाता सूची बनाए जाने पर सहमति हुई ।   
            आगे बढ़ने से पहले इस दौर की संक्षित बात की जाय  । यह दुनिया में उथल – पुथल का दौर था । एक ओर साम्राज्यवादी  (अमेरिका फ्रांस ब्रिटेन आदि जैसे लूटेरे मुल्क )मुल्को के बीच बाज़ार व प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए विश्व युद्ध  हो रहा था तो दूसरी ओर “रोटी व शांति” का नारा देते हुए  रूस में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में  मेहनतकश जनता  ने सत्ता पर कब्जा कर लिया व समाजवाद की स्थापना की । मजदूर वर्ग की इस क्रान्ति ने भारत की जनता पर भी अपना प्रभाव डाला था और यहा मजदूर किसानों के आंदोलनों की लहरें आने लगी थी । क्रांतिकारी संघर्ष की धारा भी पैदा हो गई भगत सिंह , चंद्रशेखर, आज़ाद असफाक उल्ला खाँ आदि जिसके नायक थे जिन्होने समाजवादी समाज के निर्माण को अपना लक्ष्य घोषित किया ।  यही धारा सही मायने में धर्मनिरपेक्ष थी । सांप्रदायिकता के विरोध में भगत सिंह का लिखा लेख आज भी मौजूं है ।
इसी दौर में एक वक्त में क्रांतिकारी रहे सावरकर काला पानी की सजा को ना सहन कर पाने की स्थिति में माफीनामे के आधार पर रिहा हो चुके थे और अब क्रांतिकारी न रहकर घोर साम्प्रादायिक हो गए । वह 1923 से हिन्दू महासभा के मार्गदर्शक बन गए थे । तब “ हिंदूइज़्म : हू इज हिन्दू नामक किताब सावरकर ने लिखी जिसमें पहली दफा हिन्दुत्व व राष्ट्रवाद की साम्प्रादायिक व्याख्या की गई थी  इसमें उन्होने कहा “ राजनीति का हिंदुकरण करो और हिंदुओं का सैन्यकरण करो । 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हो चुकी थी । यह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश , दिल्ली व पंजाब के हिन्दू बहुल इलाकों में 1940 तक मजबूत आधार बना चुकी थी । जबकि 1936 में आर एस एस ने राष्ट्र सेविका समिति का गठन किया । ये सभी साम्प्रदायिक संगठन ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में कोई संघर्ष नहीं करते थे बल्कि उनकी सेवा कर कृपापात्र बनते थे । हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक संगठनों ने पूँजीपतियों-भूस्वामियों- अभिजात वर्ग व ब्रिटिश हुकूमत के पक्ष में मजदूर किसानों के आंदोलन में घुसपैठ कर सांप्रदायिक दंगों का आयोजन किया ।
........... 1919 के जालियावाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने सांप्रदायिक दंगों का खूब प्रचार किया जिसमें सांप्रदायिक संगठनों ने मुख्य भूमिका निभाई थी तब इस दौर में शहीद भगत सिंह ने जून 1928 में           सांप्रदायिक दंगे और इनका इलाज शिर्षक से लेख लिखा था ।
                        “भारतवर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है । एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं ... लाहौर के ताज़ा दंगे ही देख लें । ... यह मारकाट इसलिए नहीं की गई कि फलां आदमी दोषी है वरन इसलिए कि फलां आदमी हिन्दू है या मुस्लिम है या सिक्ख है .... जहां तक देखा जाय इन दंगों  के पीछे सांप्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है .....। बस सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है । .... लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं .... संसार के सभी गरीबों के चाहे वह किसी जाति, रंग धर्म या राष्ट्र के हों अधिकार एक ही हैं । तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग जाति, नस्ल और राष्ट्रीयता और देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो ।” 
 कुल मिलाकर यह कहना होगा कि 1830 के दशक में इतिहास की साम्प्रादायिक नज़रिये से व्याख्या शुरू हुई जो 40-50 वर्ष बाद सुव्यवस्थित रूप में होने लगी इसके नतीजे के रूप में 1893 में पूना व कलकत्ता में छोटी-मोटी हिंसक झड़पें (साम्प्रादायिक ) हुई । अगले 20 साल में यह निरंतर बढ़ता सांप्रदायिकरण 1920 व इसके बाद सांप्रदायिकता बिस्फोटक रूप में सामने आया । साथ ही यह भी कहना पड़ेगा कि द्विराष्ट्रवादी सिद्धान्त या देश के विभाजन के लिए भी पृष्ठभूमी अब बन चुकी थी । सत्ता में हिस्सेदारी के प्रश्न पर ही मुस्लिम लीग व कॉंग्रेस के बीच 1927 में समझौता हुआ जिसमें मुस्लिम लीग से जिन्ना के प्रस्ताव पर संयुक्त मतदाता सूची में आबादी के आधार पर प्रत्येक प्रांत व विधानमंडल में मुसलिमों के लिए  सीटें आरक्षित करने की बात थी । लेकिन बाद में इस समझौते से कॉंग्रेस पीछे हट गई ऐसा होने में हिन्दू सभा की भी भूमिका थी । लेकिन अभी तक भी पाकिस्तान के विचार का जन्म नहीं हुआ था ।   
            1935 के संविधान में अंग्रेजों ने  मुसलमानों को विधान मंडलों में एक-तिहाई प्रतिनिधित्व देने की घोषणा की । यही नहीं 1909 के कदम से आगे बढ़ते हुए अब पुन: अलग अलग धर्मों तथा जमींदारों व उद्योगपतियों के लिए अलग अलग निर्वाचन मंडलों की व्यवस्था कर दी गई थी । यह सांप्रदायिक चुनाव क्षेत्र की ही या चुनाव में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की ही व्यवस्था एक प्रकार से थी । 1937 में हुए चुनाव में मुस्लिम लीग की करारी हार हुई यह मुस्लिम बहुल चार प्रान्तों में से भी किसी पर बहुमत हासिल नहीं कर पायी जबकि कॉंग्रेस को आधी सीटें मिली । अब कॉंग्रेस ने मुस्लिम लीग की कमजोर स्थिति को देखते हुए राजनीतिक भूमिका निभाने के इसके हर दावे को ठुकरा दिया और खुद यह दावा किया कि कॉंग्रेस ही समूचे देश की प्रतिनिधि संस्था है । कॉंग्रेस की इस सोच ने मुस्लिम लीग को फिर परे धकेल दिया ।  साम्प्रादायिक सोच व ध्रुवीकरण को बढ़ाने में कॉंग्रेस फिर मददगार साबित हुई ।
            और अंतत: मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान की मांग को पहली बार अपनाया ।  हालाकि 1930 में जब शायर इकबाल ने अलग मुस्लिम भारत के निर्माण की मांग की थी तो मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया था ।  लेकिन इसके बावजूद 1945 तक सोचा नहीं जा सकता था कि पाकिस्तान वजूद में आ सकता है। लेकिन एक बार जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कॉंग्रेस ने फिर मुस्लिम लीग को पीछे धकेल दिया । दरअसल कैबिनेट प्रस्ताव के तहत प्रांतीय सरकारों व केंद्र सरकार के संबंध में प्रांतीय सरकारों को पूर्ण स्वायत्ता देने की बात की गई थी । इसमें केंद्र सरकार के पास रक्षा , संचार व विदेश नीति का अधिकार था जबकि शेष शक्तियां प्रान्तों के पास थी और इन प्रान्तों को दस साल बाद अलग हो जाने का अधिकार था ।  यह प्रस्ताव मुस्लिम लीग को स्वीकार था लेकिन जवाहर लाल नेहरू व सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में कॉंग्रेस को शक्तिशाली केंद्र सरकार व कमजोर प्रांतीय सरकारों की पक्षधर थे । कॉंग्रेस को तय करना था कि वह कमजोर केंद्र -अधिकार सम्पन्न प्रांत व अविभाजित भारत को चुने या फिर शक्तिशाली केंद्र-कमजोर प्रांत व विभाजित भारत को चुनें । उन्होने शक्तिशाली केंद्र व विभाजित भारत को चुना यानी सारे अधिकार दिल्ली की केन्द्रीय भारत सरकार के पास जबकि राज्यों के पास नाममात्र के अधिकार ।
            यह कैबिनेट प्रस्ताव ऐसे वक्त पर आया जब एक ओर द्वितीय विश्व युद्ध के चलते ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो चुकी थी तो दूसरी ओर मजदूर-किसानों व सेना के विद्रोह हो रहे थे । यह क्रांतिकारी लहर थी जिसने हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल कायम की लेकिन पूँजीपतियों व जमींदारों की पार्टी कॉंग्रेस ,मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व आर एस एस ने अंग्रेजी हुकूमत का पक्ष लेते हुए सेना द्वारा हथियार उठाने की निंदा की और कहा कि यह अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने का समय नहीं है ।
            इस प्रकार हम देख सकते हैं कि सांप्रदायिकता को बढ़ाने में ना केवल ब्रिटिश शासकों की व मुस्लिम-हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों व संगठनों की भूमिका रही बल्कि इसमे कांग्रेस की भी भूमिका थी । संप्रदाय या धर्म के आधार पर भारत के बँटवारे में इन्हीं की भूमिका थी ।
            ब : आजाद भारत में सांप्रदायिकता :  भारत के विभाजन के बाद जिस स्वतंत्र भारत का गठन हुआ था उसमें सत्ता पूँजीपति-जमीदार वर्ग के पास ही रही ।  बिड़ला –टाटा- सिंघानिया-किर्लोसकर-सिंधिया जैसे पूँजीपतियों व राजे-रजवाड़े-जमीदारों की पार्टी कॉंग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी । इसीलिए आज़ादी के बाद अब भारतीय शासक ने भी उसी लूट -शोषण - दोहन के तंत्र को मजबूत किया । ब्रिटिश शासकों द्वारा बनाई गई फौज-पुलिस-अफसरशाही यानी पूरे तंत्र को कुछ फेरबदल के साथ ज्यों का त्यों बनाए रखा । इसीलिए  संभव नहीं था कि सांप्रदायिकता खत्म होती । इन शासकों ने सांप्रदायिक फासीवादी संगठनों को पालने पोसने का काम किया है इसे नियन्त्रित करते हुए व ढील देते हुए  जब जब भी जरूरत हुई इसे अपनी जरूरत के हिसाब से खुल कर खेलने का मौका भी दिया है ।
             इस आज़ादी के दौरान भी पिछली दफा की ही तरह मजदूर किसान मेहनतकश हिन्दू मुस्लिम जनता को फिर सांप्रदायिक दंगों की मार झेलनी पड़ी । हत्या, बलात्कार व विस्थापन का दंश अवाम को झेलना पड़ा । इस विभाजन में तकरीबन 5 लाख बेगुनाह मेहनतकश जनता मारी  गई व 55  लाख लोग विस्थापित हुए ।        26 जनवरी 1950 को भारत  को गणतन्त्र घोषित कर दिया गया और इसका अपना संविधान लागू हुआ । संविधान में 'धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य' शब्द दर्ज किए जाने के बावजूद व्यवहार में सांप्रदायिक संगठनों व तत्वों के फलने फूलने के लिए माहौल दिया गया । धर्म व राजनीति के गठजोढ़ को कभी भी ध्वस्त नहीं किया गया ।
            धर्मनिरपेक्ष का स्पष्ट अर्थ था कि धर्म को व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला बना दिया जाय ; राज्य यानी सरकार व उसकी पूरी मशीनरी ( कार्यपालिका-न्यायपालिका-विधायिका वगैरह ) में धर्म की किसी भी प्रकार की दखलंदाजी को पूरी तरह खत्म कर दिया जाय । सरकार व उसके तंत्र द्वारा समाज में धार्मिक कूपमंडूक सोच  को खत्म करने के लिए वैज्ञानिक, तार्किक सोच व चिंतन को बढ़ावा दिया जाय । पूरी शिक्षा व्यवस्था व प्रचार तंत्र को इसी अनुरूप बनाया जाय । धार्मिक कार्यक्रम राज्य व उसके प्रतिनिधियों, सत्ता के प्रतिष्ठानों द्वारा किसी भी स्थिति में आयोजित ना किए जाएँ ।
            इसके विपरीत भारतीय शासकों ने पिछड़ी मूल्य मान्यताओं, दक़ियानूसी सोच, अंधविश्वास, धार्मिक  व कूपमंडूक सोच को बढ़ावा देना जारी रखा । राज्य ( सत्ता प्रतिष्ठानों )द्वारा  ना केवल धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों में भूमिका निभाई गई बल्कि राज्य की संस्थाओं आदि के निर्माण में भी हिन्दू धार्मिक पद्धति से शुभ कार्य के नाम पर गणेश पूजन, नारियल फोड़ने जैसे धार्मिक कार्यक्रम किए गए । अभी हाल में मंगल ग्रह के लिए यान भेजते वक्त भी यह पाखंड किया गया । इन सभी चीजों ने अपनी बारी में सांप्रदायिकता की समस्या को विकराल बनाया । 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद आर. एस . एस . पर प्रतिबंध तो लगाया गया ।  लेकिन साम्प्रदायिक  संगठनों व उसके मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए उन पर कोई प्रहार नहीं किया गया । नेहरू की नेतृत्व वाली सरकार ने खुद को केवल सांप्रदायिक संगठनों की आलोचना तक ही सीमित रखा । ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रिटिश शासकों की ही तरह भारतीय शासकों के लिए भी सांप्रदायिकता बहुत फायदेमंद थी ।
            चुकीं भारत में हिन्दू बहुसंख्यक थे जबकि मुस्लिम, ईसाई ,सिक्ख, जैन ,बौद्ध व पारसी अल्पसंख्यक थे । बहुसंख्यक हिंदुओं में भी सवर्ण हिंदुओं का ही वर्चस्व शताब्दियों से दलित-शूद्र हिंदुओं पर रहा था । इसलिए राज्य के हर निकायों में मसलन विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका  या फिर इसका चौथा स्तम्भ कहलाने वाला मीडिया हर स्तर पर सवर्ण हिंदुओं का वर्चस्व था । जिसके चलते इस पूरी व्यवस्था का संचालन करने वाले  शासक जानबूझकर या अनचाहे आम तौर पर अपने सवर्ण हिन्दू होने की मन:स्थिति से भी प्रभावित होते थे व  इसके प्रभाव में भी  निर्णय  लेते थे व क़ानूनों का भी निर्माण करते थे । इसलिए यह कहना सही होगा कि यह पूरी मशीनरी आम तौर पर अल्पसंख्यक विरोधी थी , महिला विरोधी थी व दलित विरोधी थी विशेष तौर पर मजदूर मेहनतकश आबादी के संबंध में । और यह स्थिति पिछले 65 -66 सालों में भी कुछ कमी के बावजूद बनी हुई है ।
              इसी का ही यह नतीजा है कि आज सांप्रदायिकता का फासीवादी स्वरूप हमारे सामने है । सांप्रदायिक तनाव या दंगे व हमलों का आर्थिक संकट से गहरा संबंध है । जब जब भी देश के भीतर आर्थिक संकट पैदा हुआ, नौकरियों के लिए गला-काट प्रतियोगिता ज्यादा तीखी हुई , मध्यम वर्ग पर संकट पर तीखा हुआ व व्यवसाय पर  तीखा संकट आया,  बढ़ती बेरोजगारी व महंगाई के विरोध में जनता के आंदोलन तेज होने लगे  तब तब दंगे आयोजित हुए  या करवाए गए ।            मुस्लिम समुदाय का कॉंग्रेस पर काफी भरोसा था उन्हें महसूस होता था कि वे कॉंग्रेस के होने से सुरक्षित हैं लेकिन यह भरोसा कम भी हो रहा था जब 1962 में जबलपुर के दंगे हुए जो कि आज़ाद भारत का सबसे बड़ा दंगा था तब यह भरोसा भी खत्म होने लगा । मुस्लिम समुदाय के लिए अलगाव व  असुरक्षा का माहौल इस प्रकार बढ़ता गया जिसके चलते मुस्लिम साम्प्रादायिक संगठनों की पैठ भी इनके बीच बढ़ने लगी । जमीयत ए उलेमा ए हिन्द जमात ए इस्लामी इस्लामिक स्टूडेंट मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिम्मी ) को फलने फूलने का मौका मिला । दूसरी ओर  हिन्दू कट्टरपंथी साम्प्रादायिक संगठन भी लगातार समाज में सांप्रादायिकता का जहर फैलाकर अपना आधार बढ़ाते रहे  । यह अपनी प्रतिक्रिया में पैदा हो रही मुस्लिम सांप्रदायिकता से व मुस्लिम समुदाय में बढ़ते अलगाव व असुरक्षा व कट्टरपन से भी अपनी ताकत हासिल करता रहा ।    
            इन तथ्यों की रोशनी में भी इसे समझा जा सकता है उत्तर प्रदेश में संसदीय सीटों 1952 व 1957 के संसदीय चुनावों में जनसंघ ( भाजपा ) का वोट प्रतिशत 7.29 से बढ़कर 14.89 हो गया । 1957 में इसे कुल 86 संसदीय सीटों में से 2 सीट हासिल हुई । जबकि 1962 में यह बढ़कर 7 हो गई थी ।
            हिन्दू साम्प्रादायिक संगठनों ने पड़ोसी मुल्को विशेष कर  पाकिस्तान व चीन के खिलाफ अंध देश भक्ति का प्रचार भी जारी रखा । 1962  में जब भारतीय अर्थव्यवस्था संकट का शिकार होने लगी  पूंजीपति वर्ग का मुनाफे का संकट गहराने लगा,महंगाई व बेरोजगारी बढ़ने के चलते जनांदोलन  बाढ़ आने लगी तब हमारे शासकों ने इस अंध राष्ट्रवाद का खूब प्रचार किया । नेहरू सरकार ने सीमा विवाद पर चीन के साथ जंग का ऐलान कर दिया, चीन( उस वक्त मजदूर किसानों की सत्ता थी उसे हमारे शासकों ने कमजोर आंकने की कोशिश की ) । देश के भीतर भारत सुरक्षा कानून जैसे काले कानून लागू कर आपात काल सी स्थिति पैदा कर दी गई । और फिर लाल बहादुर  शास्त्री के काल में 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ । 1962 के चीन युद्ध के दौरान संघ व जन संघ  द्वारा जन आंदोलनों से निपटने के लिए जिस प्रकार से अंधदेश भक्तिपूर्ण माहौल तैयार कर शासकों की जो सेवा की गई इसी का नतीजा हुआ कि 1963 में गणतन्त्र दिवस के परेड में भाग लेने के लिए नेहरू सरकार ने संघ को आमंत्रित किया । जिसमें 200 से अधिक संघियों ने पूरी वर्दी व बैंड बाजे के साथ परेड में भागीदारी की ।
            इस प्रकार कॉंग्रेस ,नेहरू सरकार व भारतीय शासकों की `छदम धर्मनिरपेक्षता या `नरम हिन्दुत्व ने हिटलर के पद चिन्हों पर चलने वाले फासीवादी साम्प्रादायिक संघियों को पुरस्कृत करके समाज में अपनी साख बनाने व पैठ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । निश्चित तौर पर ये सभी घटनाएँ मुस्लिम सांप्रदायिकता को भी और ज्यादा खाद पानी देकर और पुष्ट करती थी  । अंतत: ये सब भारतीय शासकों को संकट से उबारने में बड़ी भूमिका अदा करती थी । ऐसा यह मजदूर मेहनतकश हिन्दू मुस्लिम जनता की एकजुटता को भंग करके करते थे । अर्थव्यवस्था के  संकट ग्रस्त होने के चलते ही इस दौर में पहली बार भारत सरकार ने लुटेरी संस्था विश्व बैंक से अगले कई वर्षों तक 90 करोड़ डालर सालाना की दर से कर्ज लिए साथ ही अमेरीका  व आई. एम .एफ . के दबाव में रुपये का भारत के इतिहास का सबसे बड़ा अवमूल्यन ( 57.6 % )किया गया । एक डालर अब 4.76 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये के बराबर हो गया ।  
            यही नहीं साठ के अंतिम वर्षों में आर्थिक संकट के दौर में जब बॉम्बे के उद्योग धंधे मंदी की चपेट में आए तब यह  तथाकथित धर्म निरपेक्षता का नकाब ओड़े हुए कॉंग्रेस कॉंग्रेस पार्टी ही थी जिसने शिव सेना जैसे साम्प्रदायिक पार्टी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी जिसमें वहाँ के उद्योगपतियों ने भरपूर  आर्थिक मदद की थी । ऐसी पार्टी को खडा करने के पीछे यहां मजदूरों के शक्तिशाली ट्रेड युनियन आन्दोलन को खत्म कर देना था । इस मकसद से दंगे भी आयोजित किये गये । 1970 के भीवंडी व जलगांव में हुए दंगों में इसी `उत्तर व दक्षिण भारतीय विरोधी व मुस्लिम विरोधी  शिव सेना का ही हाथ था । यही नहीं दलितों के संगठन दलित पैंथर्सपर भी हमले किये गये व दलितों के विरोध में दंगे भड़का दिये गये । दलित पैन्थर्स के नेता भगवत जादव की हत्या कर दी । 
            जबकि दूसरी ओर संघ सांप्रदायिक प्रचार-प्रसार पर ज़ोर शोर से लगी हुई थी । 1969 में जनसंघ ने पटना अधिवेशन में मुसलमानों का भारतीयकरण का प्रस्ताव पारित किया । यह भी गौर करने वाली बात है कि जिस फासीवादी संघ ने  47 की आज़ादी व धर्मनिरपेक्ष संविधान व अधिकारों का मखौल उड़ाया था व तानाशाही की पक्षधर है वही 1975 में आपात काल के विरोध में इंदिरा गांधी की सरकार के खिलाफ जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में बने मोर्चे शामिल हो गई जिसमें सिक्ख साम्प्रादायिक संगठन अकाली दल , मुस्लिम सांप्रदायिक संगठन जमात ए इस्लामी भी थी । खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले जय प्रकाश नारायण ने साम्प्रादायिक व फासीवादी संगठनों के साथ तब  गठजोड़ कायम किया था ।
            1977 में संघ के अटल विहारी बाजपेयी तथा शाही इमाम ने अनेकों जनसभाएं इकट्ठे संबोधित की थी । इस वक्त तक विश्व हिन्दू परिषद का गठन भी हो चुका था । 1983  में जम्मू कश्मीर के चुनाव में इंदिरा गांधी ने वोट हासिल करने के लिए सांप्रदायिक भाषण दिये थे । यही नहीं पंजाब में फिर धर्म के आधार पर अलग  सिक्खों के खालिस्तान  की मांग करने वाले प्रतिक्रियावादी आतंकवादी संगठन को बनाने में भी कॉंग्रेस व इंदिरा गांधी की भूमिका रही है । इंदिरा गांधी के नेतृत्व में ही कॉंग्रेस ने हिन्दू वोटों को पाने के लिए मीनाक्षीपुरम में दलितों के इस्लाम धर्म में रूपान्तरण का खुले तौर पर प्रयोग किया । जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या उसके बोडीगार्ड द्वारा हत्या कर दी जाती है जो कि सिक्ख धर्म के थे तो उसके बाद दिल्ली व उत्तर भारत में सिक्खों पर कॉंग्रेस के नेतृत्व में हमला बोल दिया गया । हिन्दू सिक्ख सांप्रदायिक उन्माद पैदा किया गया । 
            राजीव गाँधी के कार्यकाल में ही तलाक़शुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए संसद में मुस्लिम महिला बिल पास कर दिया । यह मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए हुआ तथा सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला कृत्य था । मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगने पर सरकार ने हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों को खुश करने के लिए बाबरी मस्जिद के दरवाजे उनके लिए खोल दिये । अब कॉंग्रेस सरकार 22-23 दिसंबर 1949 के उस कदम से आगे बढ़ गई थी  । 1949 में जब हिन्दू सांप्रदायिक तत्वों ने बाबरी मस्जिद में घुसकर वहाँ राम-सीता की मूर्तियाँ रख दी थी तब नेहरू सरकार ने  जिलाधिकारी के के नैयर से  मूर्तियों को वहाँ से निकालने की मात्र “अपील” भर की । मूर्तिया ना निकाले जाने पर परिसर में ताला लगा दिया गया जिसे अब 1986 में राजीव गांधी ने खुलवा दिया।
            90 में मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की घोषणा की गई जिसके तहत अनुसूचित जातियों व पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान था तब भी साम्प्रादायिक संगठनों ने हिन्दू धर्म बचाओ `एकात्मा यज्ञ का अभियान छेड़ा । इसके बाद तो राम मंदिर बनाने का रथ अभियान चला । कॉंग्रेस ने फिर नर्म हिन्दुत्व का परिचय दिया  जब बाबरी मस्जिद ध्वंस के समय नरसिंहाराव के नेतृत्व वाली कॉंग्रेस की केंद्र सरकार ने इसे हो जाने दिया । राम मंदिर के निर्माण पर भाजपा आर एस एस व विश्व हिन्दू परिषद आदि ने देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया गया ।
            यह आश्चर्यजनक नहीं है कि यह वही दौर था जब देश के भीतर अर्थव्यवस्था काफी संकटग्रस्त थी केवल 1 अरब डालर के करीब विदेशी मुद्रा रिजर्व में बची हुई थी आयात के लिए जबर्दस्त संकट खड़ा होने लगा था सरकार पूंजीपतिवर्ग के पक्ष में डंकल प्रस्ताव के रूप में नई आर्थिक नीतियों को देश में लागू करने की योजना बना रही थी तब  ठीक  इसी  दौर में पूरे  देश को  सांप्रदायिक उन्माद में डूबा दिया गया था । इस प्रायोजित उन्माद में  `डंकल समझौते के विरोध में उठने वाली जनता की आवाज को दबा दिया गया । एक बार फिर बहुत योजनाबद्ध ढंग से कॉरपोरेट घरानों पूंजीपतियों व उसकी सभी पार्टिया ने सांप्रदायिक उन्माद के आयोजन में अपनी अपनी भूमिका अदा की अपने अखबारों के दम पर इस काम को अंजाम दिया । और फिर इस सांप्रदायिक उन्माद के माहौल में निजीकरण-उदारीकरण के डंकल प्रस्ताव को  सभी पार्टियों ने संसद में ध्वनि मत से पारित कर दिया ।
“पंद्रह या सोलह बरस की एक लड़की के कपड़े
            जगह-जगह से फटे हुए थे
            एक पेड़ के नीचे खड़ी कभी रोने लगती
            कभी हंसने लगती.....
            तभी दंगाइयों का एक गिरोह आया
            और उनमें से एक ज़ोर से चिल्लाया
            ए लड़की तू हिन्दू है या मुसलमान ?
            लड़की बिना कुछ समझे सिर्फ देख रही थी
            निर्विकार .......!
            तभी पास खड़े आदमी ने कहा
            यह पागल है श्रीमान ...
              दंगाइयों में से फिर दूसरा चिल्लाया :
            लेकिन यह हिन्दू है या मुसलमान ?
पास खड़े आदमी ने रिरियाते हुए कहा:
            मालिक एक तो जानना है तीस पर पूरी पागल...
            तभी तीसरा ज़ोर से चीखा :
            लेकिन यह हिन्दू है या मुसलमान ?
            इसके बाद एक सन्नाटा छा गया
            लेकिन तभी वह लड़की ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी
            तब आपस में जैसे एक दूसरे को सूचना देते हुए
            दंगाइयों ने कहा :
            पागल है साली ......... एकदम पागल !’’  …………..  ( राजेश जोशी : पागल कविता से गुजरात का विक्षोभ कविता संग्रह से )
            यह भारत के पिछले सवा सौ सालों के इतिहास में समाज के सांप्रदायिकरण का सबसे बड़ी व चरम घटना थी । इस दौरान अलग अलग राज्यों के कई शहरों में दंगे भड़के । जिसमें बहुत वीभत्स व दर्दनाक घटनाओं को इन कट्टरपंथी संगठनों ने अंजाम दिया । आम तौर पर सभी दंगों का शिकार मजदूर मेहनतकश अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी रही है । संपत्ति की लूट पाट जैसे टी वी, फ्रिज आदि , हत्याएँ तो होती ही है साथ ही इन दंगों का शिकार सबसे ज्यादा महिलाएं होती है जिनसे  यौन हिंसा की जाती है व इस मकसद से गायब भी कर दिया जाता हैं व सबूत मिटाने के लिए जला दिया जाता है ।
             और इसके बाद तो अब तक नए नए तरीके ईजाद कर संघ व उसके 50 से ज्यादा संगठन सांप्रदायिकरण ध्रुवीकरण करने में लगे हैं असम, कर्नाटक, उड़ीसा जम्मू आदि राज्यों में भी कई दंगे ये आयोजित करवा चुके हैं । ईसाइयों के विरोध में भी दंगे आयोजित किए गए हैं । आम तौर पर अधिकांश दंगों में पुलिस व पी ए सी की भूमिका दंगों में  निष्क्रिय रहने या दंगाइयों का साथ देने या इसमें शामिल होने की भी रही है । प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सभी पूंजीवादी पार्टियों का दंगों में कम या ज्यादा हाथ रहता है । अभी हाल की मुजफ्फरनगर दंगा इसका उदाहरण हैं इसके आयोजन में संघ व भाजपा पिछले दो साल से तैयारी कर रही थी यहाँ दंगे के आयोजन  तो दूसरी ओर इस दंगे के सफल होने में कॉंग्रेस, सपा तथा बसपा के मुस्लिम विधायकों की भी भूमिका रही है । यह सब 2014 के लोकसभा के चुनाव में सत्ता तक पहुचने का जरिया था ।
            इस कारण से भी सांप्रदायिकता या साम्प्रादायिक हमलों व दंगों में खास वक्त के दौरान भी काफी इजाफा हो जाता था । यह कारण इस पूंजीवादी लोकतन्त्र में सत्ता तक पहुँच बनाने के लिए चुनाव के मौके का इस्तेमाल का था । हालांकि सत्ता में पहुचने का यह मकसद भी पूंजीपति वर्ग के पक्ष में शासन प्रशासन को निरंकुश करना होता है दूसरे रूप में कहा जाय तो इन्हें खुद सत्ता में पहुचाने में पूंजीपतियों की भूमिका होती है । यदि हम मौजूदावक्त पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि नरेंद्र मोदी  की तारीफ में मजदूर मेहनतकश जनता ने कसीदे नहीं गढ़े बल्कि यह टाटा, अंबानी व बजाज आदि जैसे बड़े  पूंजीपति ही हैं जो उनकी पार्टी को सत्ता में उनके नेतृत्व में देखना चाहता है । वह ऐसा क्यों चाहते है ?  क्योंकि गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने निरंकुशता की मिसाल कायम की है जिसके चलते मजदूर वर्ग के ट्रेड यूनियन आंदोलन को खत्म कर दिये गए जबकि मोदी के इन प्रशंसकों की पूंजी में कई कई हज़ार %की बढ़ोत्तरी हो चुकी है ।
            साम्प्रदायिक दंगों के इतिहास में 92 के साम्प्रदायिक उन्माद के 10 साल बाद गुजरात में अब यह फासीज़्म के रूप में अवतरित हो गया । जिसमें पूरी राज्य मशीनरी ने आदिवासियों तथा हिन्दू जनता के गरीब हिस्सों व मध्यम वर्गीय लोगों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में लामबद्ध कर लिया गया था ।  जिस तरह से आर्थिक संकट गहरा रहा है महंगाई , बेरोजगारी बढ़ रही है और साथ ही हर जगह मेहनतकश जनता के आंदोलन बढ़ रहे है उसमें गुजरात में फ़ासिज़्म के सफल प्रयोग को पूरे देश के स्तर पर दोहराये जाने की संभावना मजबूत होते जा रही है । अतीत में जर्मनी, स्पेन व इटली की ही तरह अब भारत में भी फासीवाद का खतरा मंडरा रहा है हालांकि यह खतरा केवल धार्मिक ( हिन्दू ) फासीवाद के रूप में ही नहीं है जिसके लिए संघ परिवार व भाजपा को पूंजीपतियों द्वारा पाला पोसा जा रहा है । यह सैनिक फासीवाद या फिर कमजोर संभावना के रूप में  संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सामाजिक फासीवाद के रूप में भी आ सकता है।
            खतरा अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का भी है यह मुस्लिम सांप्रदायिकता, सिक्ख सांप्रदायिकता आदि के रूप में है यह रक्षात्मक होता है । जहां अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता लगातार असुरक्षा व कट्टरपन को बढ़ाते हुए अलगाववाद की ओर जाती है जैसा कि खालिस्तानी आतंकवाद था । वहीं बहुसंख्यक सांप्रदायिकता आक्रामक होती है फासीवादी राज्य की स्थापना की ओर जाती हैं खुद को राष्ट्रवादी या देशभक्त के रूप में स्थापित करती है  इसलिए बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बड़े खतरे के तौर पर सामने है ।   
            सांप्रदायिकता क्या है :   जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है सांप्रदायिकता आधुनिक पूंजीवादी समाज में घटने वाली सोच है विचारधारा है ।  दो अलग समुदायों के बीच चाहे वह धर्म के आधार पर हो या जाति या फिर नस्ल के आधार पर होने वाला हर झगड़ा या संघर्ष सांप्रदायिकता नहीं है । धार्मिक , जाति या नस्लीय झगड़े या संघर्ष पहले भी होते रहे हैं  भारत में बोद्धों व हिन्दु ब्राहमणों का संघर्ष , यूरोप में 14वी सदी में धर्म युद्ध हुए  थे लेकिन इन्हें सांप्रदायिकता नहीं कहा जा सकता।  
            पूंजीवाद के भ्रूण में आने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के साथ जनवादी अधिकारों की चेतना भी पैदा हुई । खुद फ्रांस व इंग्लैंड में पूँजीपतियों ने राजनीतिक अधिकारों यानि सत्ता में हिस्सेदारी के लिए संघर्ष छेड़ा था । फ्रांस में तो सामन्तो से राजनीतिक अधिकारों के लिए पूँजीपतियों ने सामन्तो का सफाया कर दिया था । इस प्रकार आर्थिक ताकत रखने वाले पूंजीपति वर्ग के हाथ में सत्ता आ गई । अपने इस संघर्ष में पूँजीपतियों ने मजदूर मेहनतकश जनता को भी अपने पीछे लामबद्ध कर लिया । लेकिन पूंजीपति वर्ग ने राजनीतिक अधिकार के लिए सत्ता इसलिए हासिल नहीं की थी कि उसे समाज की बेहतरी के लिए काम करने थे बल्कि यह काम उसने पूंजी को और ज्यादा बढ़ाने की गरज से किया था । पूंजी के बढ़ने के लिए जरूरी था कि इसकी राह में आ रहे छोटी –छोटी रियासतें व सामंत को हटा दिया जाय और यह उसने कर दिया । पूंजी के लगातार बढ़ते रहने के लिए यह भी जरूरी था कि  बाज़ार , प्राकृतिक संसाधन व मजदूर उसके शिकंजे में हों इसी ने राष्ट्र जैसी अवधारणा को जन्म दिया ।  पूँजीपतियों ने अपनी फोर्स के दम पर यह सब किया था ।
            इस प्रकार पूंजीवादी जनतंत्र का जन्म हुआ । धीरे धीरे इसमें आम जनता के अधिकारों का कुछ सीमित विस्तार हुआ । और आज भारत समेत दुनिया के अधिकांश जगह पर यही पूंजीवादी जनतंत्र हैं ।  जिसमें सारे अधिकार पूंजीपति वर्ग के पास है और मजदूर मेहनतकश जनता के पास सीमित जनवादी अधिकार है इसे भी पूंजीपति वर्ग को खतरा होने पर जब्त कर लिया जाता है । इस व्यवस्था में पूंजीपति वर्ग की पार्टियां जो सरकार बनाती हैं जनता के वोटों से चुनी जाती हैं । जिसके दम पर शासक  जनता का शासन होने जनता की सरकार होने का भ्रम जनता के बीच बनाकर रखता है । विचार अभिव्यक्ति, संगठन बनाने व विरोध करने की एक हद तक आज़ादी इसमें होती है ।
            सांप्रदायिकता के लिए जरूरी था कि  पूंजीवादी जनतंत्र हो । जिसे हमारे शासक दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहते हैं वह भी यही पूंजीवादी लोकतन्त्र हैं  
सांप्रादायिक संगठन इन्हीं जनवादी अधिकारों का प्रयोग करते हुए मजदूर मेहनतकश जनता के अधिकारों के खात्मे की ओर जाते हैं । जैसे जैसे समाज में सांप्रदायिकता बढ़ती हैं  उसी अनुपात में जनता की जनवादी चेतना व जनवादी अधिकारों की स्थिति कमजोर होते जाती है ।  सांप्रदायिकता जनवादी चेतना की ठीक विरोधी है । पिछले डेढ़-पौने दो सौ सालों के इतिहास में  जैसे जैसे दुनिया के स्तर पर पूंजीवादी व्यवस्था संकट में  बार बार फंसते हुए आगे बढ़ी है  वैसे वैसे सांप्रदायिकता के लिए  भी पृष्ठभूमि तैयार होते गई है ।
            सांप्रदायिकता समाज के वास्तविक विभाजन को नकारती है वह समाज के इस विभाजन पर पर्दा डालती है या इसे “प्राकृतिक नियम” कहकर  मजबूत करती है । समाज का विभाजन है शोषित –उत्पीड़ित व शोषक उत्पीड़क के रूप में , अमीर व गरीब के रूप में , शासित व शासक के रूप में या दूसरे रूप में कहा जाय तो मजदूर व पूंजीपति वर्ग के रूप में ।
            सांप्रदायिकता एक सोच है विचारधारा है और प्रतिक्रियावादी पूंजीपति वर्ग की राजनीति है  जो पूरे इतिहास को अलग अलग धर्मों ,  जातियों या फिर  नस्लों के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करती है । इस प्रकार सांप्रदायिकता दो अलग अलग मजहब जाति नस्ल आदि  के लोगों को अलग थलग समुदायों में बाँट देती है ।  इसके मुताबिक एक समुदाय के हित दूसरे समुदाय के विरोध में होते हैं एक समुदाय के आर्थिक राजनीतिक व संस्कृतिक हित एक जैसे होते है जो कि दूसरे समुदाय के लोगों से बिलकुल अलग होते हैं ।  
            सांप्रदायिकता के लिए भारत की जमीन काफी उर्वरा है ऐसा इसलिए कि यहाँ काफी विविधता है । अलग अलग मज़हब के लोग यहाँ रहते हैं । यहाँ ना केवल धर्म के रूप में विविधता है बल्कि भाषायी विविधता है सांस्कृतिक विविधता है  और साथ ही भौगोलिक विविधता है । यह कहना सही होगा कि भारत बहुराष्ट्रीयता  वाला देश है ।  इसीलिए  महाराष्ट्र नव निर्माण सेना मराठा मानुष के नाम पर उत्तर भारतियों पर हमला करने में कामयाब हो पाती है ।  
            सांप्रादायिकता राष्ट्र की परिभाषा भी इसी संकीर्ण व घृणित सोच से करती है वह धार्मिक आधार पर राष्ट्र की बात करती है । जैसे संघ परिवार भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत करता है । जबकि राष्ट्र होने के लिए चार शर्तें है जिसके अंतर्गत  क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भौगोलिक पहचान हो , एक भाषा हो ,एक संस्कृति हो व एक एकीकृत अर्थव्यवस्था हो  इसमें धर्म के लिए कोई स्थान नहीं है ।
            अब यदि दूसरे रूप में यह सवाल उठाया जाय कि क्या कश्मीर के हिन्दू व  पंजाब के हिन्दू  या  बंगाल के हिन्दू में केवल हिन्दू होने के अलावा क्या और कोई समानता है ?  नहीं ! इनकी  वेशभूषा , रहन सहन , खान-पान , भाषा आदि सभी में फर्क है । यदि यह फर्क है तो इसका एक और भी अर्थ है वह यह कि कश्मीर का हिन्दू कश्मीर के मुस्लिम के साथ सहजता ,एकता व अपनत्व महसूस करेगा जबकि पंजाबी या बंगाली हिन्दू के साथ उसी धर्म का होने के बावजूद दूरी महसूस करेगा ।  यही बात मुस्लिमों या अन्य धर्मों के संबंध में भी सच है 
            क्या एक ही धर्म को मानने वाले सभी लोगों के आर्थिक , सामाजिक व राजनीतिक हित एक से हो सकते है ?  नहीं !  क्या एक हिन्दू मजदूर व एक हिन्दू पूंजीपति के एक ही हित हो सकते है ? नहीं !  जबकि एक हिन्दू मजदूर, मुस्लिम मजदूर व सिक्ख मजदूर के  समान आर्थिक , सामाजिक व राजनीतिक हित हैं । वह हित है अपनी फैक्ट्री के मालिक से वेतन वृद्धि आदि आदि के लिए संघर्ष करना चाहे मालिक किसी भी धर्म का हो ।  उसी प्रकार यह भी उतना ही सही है कि एक हिन्दू पूंजीपति व मुस्लिम पूंजीपति के एक सामान आर्थिक सामाजिक राजनीतिक हित हैं । दोनों के आर्थिक हित व राजनीतिक हैं कि  उन मजदूरों से  चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम या फिर सिक्ख इनसे अधिक से अधिक काम कराना  कम से कम पैसा देना तथा  मजदूर आंदोलन  होने पर उसके दमन का प्रबंध किया जाय ।
            लेकिन यहाँ  सांप्रदायिकता क्या कहती व करती है ? वह हिदुओं , मुस्लिमों , सिक्खों व  इसाईयों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करती है या एक क्षेत्र व भाषा के लोगों को  दूसरे क्षेत्र व भाषा के खिलाफ खड़ा करती है । यह उनमें एक दूसरे के प्रति नफरत व हिंसक उन्माद पैदा करती है । इस प्रकार एक ही आर्थिक सामाजिक हैसियत वाले मजदूर मेहनतकश लेकिन भिन्न धर्मों के लोगों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर देती है । उनकी एकता व संघर्ष को खत्म कर देता है ।
             पूंजीवादी व्यवस्था का विकास समाज में असमानता को तीव्र करता जाता है असमान विकास करता हुआ आगे बढ़ता है जिसके चलते कुछ इलाकों का ज्यादा विकास होता है कुछ पिछड़े रह जाते हैं खुद शहरों में एक ओर आलीशान इमारतें व पॉश इलाके होते है तो दूसरी ओर मलीन बस्तिया, झुग्गी झोपड़ियाँ । विकास  सारी सुविधाएं  इन्हीं शहरों में केन्द्रित होते जाती हैं जबकि गाँव देहात विरान, सुविधाओं व विकास से महरूम होते जाते हैं । जिसके चलते गाँव देहात व अविकसित इलाकों से शहरों की ओर पलायन बढ़ता जाता है ।
            पूंजीवादी व्यवस्था के इस विकास से समाज में खेतों, फ़ैक्ट्रीयों आदि जगह काम करने वाले मजदूर वर्ग का जन्म होता है दूसरी ओर मालिक पूंजीपति वर्ग इसके अलावा छोटे व्यवसाई दुकानदार आदि आदि के रूप में निम्न पूंजीपति वर्ग , मध्यम वर्ग तो दूसरी ओर अपनी संपत्ति व पूंजी से उजड़ रहे लोग जिनको किसी प्रकार का काम नहीं मिल पाता है एक वक्त पर लंपटों की फौज में बदल जाते हैं । मध्यम वर्ग व निम्न पूंजीपति वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवादी विकास के चलते  लगातार  उतार चढ़ाव के साथ संकटों में घिरा रहता है ।
            यही संकटग्रस्त मध्यम  वर्ग , निम्न मध्यम वर्ग व निम्न पूंजीपति वर्ग के लोग आम तौर पर सांप्रदायिकता के वाहक बनते हैं फिर वक्त के साथ संकट बढ़ने पर मजदूर भी इसमें कम चेतना व गलत समझ के चलते इसमें शामिल हो जाते हैं । दंगों या साम्प्रदायिक उन्माद के क्षणों में फिर लंपटों की फौज को इसमें भर्ती कर हिंसक व वीभत्स कारनामे किए जाते हैं । सांप्रदायिकता इन वर्गों तबकों के  आर्थिक सामाजिक लालसाओं व आवश्यकताओं की आभासी पूर्ति करती है ।
            इस प्रकार सांप्रदायिकता समाज में एक वास्तविक समस्या आर्थिक संकट जो बेरोजगारी व महंगाई को तीखा कर देता है का आभासी या झूठा समाधान प्रस्तुत करती है । ऐसा यह हर सामाजिक समस्या के लिए दूसरे धर्म ,जाति, नस्ल या क्षेत्र के लोगों को ज़िम्मेवार ठहराकर करती है । दो भिन्न समुदायों के बीच होने  वाली यह सांप्रदायिक हिंसा या हमला अपने भीतर आर्थिक स्वार्थों को छुपाए हुए होता है । यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण केंद्रीय मुद्दो या देश व्यापी मुद्दों को उठाकर भी किया जाता है व स्थानीय मुद्दों के इर्द गिर्द किया जाता है ।
             1981 में बिहार शरीफ में हुए दंगो के उदाहरण लें - नालंदा जिले के इस कस्बे में आलू की खेती काफी ज़ोरों पर थी और कोल्ड स्टोरेज बनने के बाद तो आलू खेती का धंघे में और उछाल आ गया । यहाँ मुस्लिम कब्रिस्तान की कुछ जमीने खाली पड़ी हुई थी इस्तेमाल में नही आ रही थी । इस जमीन पर किसान  यादवों की लालची नज़र आलू में हो रही मुनाफे के चलते पड़  गई । आर एस एस ने इस मौके को ताड़ लिया इन किसान यादवों के  लालच को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया व कब्रिस्तान की जमीन कब्जाने के लिए दंगा करवा दिया गया ।    
फासीज़्म और इसका संक्षिप्त इतिहास : 
             फासीवाद पूंजीपति वर्ग की नंगी व खूनी तानाशाही हैं । जो तानाशाही शासन से इन अर्थों में अलग है कि जहां तानाशाही सीधे सीधे पूंजीपति वर्ग की सरकार द्वारा आम जनता को उनके जनवादी अधिकारों से महरूम कर देती है तेजी से बढ़ रहे उनके आंदोलनों का दमन करती है व नियंत्रित करती है  वही फासीज़्म  एक राजनीतिक आंदोलन की शक्ल में आम जनता के अलग अलग हिस्सों वर्गों व तबकों को अपने पीछे आंदोलित करते हुए सत्ता को अपने हाथ में ले लेता है यह तेजी से बढ़ रहे क्रांतिकारी आंदोलन के दौर में पूंजीपति वर्ग द्वारा सत्ता पर कब्जा बरकारार रखे जाने का खतरनाक तरीका है । फ़ासिस्ट  एक लफ्फाजी भरे ऐजेंडे के इर्द-गिर्द अपना आदोलन विकसित करते हैं यह लफ्फाजी अंध राष्ट्र भक्ति के रूप में, किसी धर्म, नस्ल, जाति या क्षेत्र के  विरोध व नफरत के रूप में होती है यह पूँजीपतियों के विरोध का नाटक करते हुए समाजवाद के नारे के रूप में या फिर  सैन्य शासन के महिमामंडन के रूप भी में होता  है ।   
            तानाशाही में जहां आम जनता को अपने जनवादी अधिकारों के छीने जाने का अहसास होता है अपनी आज़ादी के अपहरण का अहसास होता  हैं और आम जनता के सभी हिस्से इसके विरोध में निरंतर संघर्ष  करते हैं वहीं फासीवाद मध्यम व निम्न मध्यम वर्ग , छोटे व्यवसाइयों कारोबारियों व मजदूर वर्ग के बड़े हिस्से को अपने पीछे कुछ खास मुद्दों के इर्द गिर्द एकजुट कर लेते हैं और फासिस्ट आंदोलन में शामिल यह आम जनता अपने जनवादी अधिकारों या आज़ादी का अपने बेहतर भविष्य की उम्मीद में खुद ही समर्पण कर देती हैं और इसके चलते फासिस्ट संगठन सत्ता में पहुँचते ही आसानी से पूंजीपति वर्ग की खूनी व घृणित तानाशाही शुरू हो जाती है, और जब तक आम जनता के इन वर्गों व तबकों को बारी बारी से दमन होने पर अपने अधिकारों या आज़ादी को छीने जाने का अहसास  होता है तब तक वक्त हाथ से निकल जाता  है । 1975 में इंदिरा गांधी की सरकार के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग ने सिविल तानाशाही स्थापित की थी । जिसका जबर्दस्त विरोध हुआ था           पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अपने बुनियादी अंतर्विरोध के चलते लगातार संकटों में फसते रहती है यह संकट मंदी का संकट है जो कि आर्थिक संकट है । यह संकट कुछ वक्त के लिए जब खतम होता सा महसूस होता है तो तब तक पहले से बढ़ा संकट आ जाता है । यह मंदी का यह संकट 2008 से पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में लिए हुए है जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता दुनिया के पूंजीपति वर्ग के पास नहीं है जो रास्ता है  भी वह आम जनता की ज़िदगी को और ज्यादा तबाही की ओर धकेलने की दिशा में है । पूंजीवाद का यह संकट पैदा होता है निजी मालिकाने व सामाजिक उत्पादन की अंतर्विरोध की वजह से ।
            पूंजीवाद में उत्पादन के साधनों का मालिक पूंजीपति वर्ग होता है जबकि उत्पादन की कार्यवाही में लाखों करोड़ों श्रमिक लगे रहते है इस सामूहिक श्रम की बदौलत जो भी माल ( जीवन निर्वाह के साधन ) फ़ैक्ट्रीयों व खेतों आदि जगह तैयार होता है उसके मालिक पूंजीपति ही होते है पूजीपति इसे बाज़ार के लिए पैदा करवाता है ना की जनता की जरूरत के लिए । चुकीं पूंजीपति अपने मुनाफे की हवस में अपने श्रमिकों  से अधिक से अधिक काम करवाता है व जितना संभव हो उतनी  कम तनख्वाह देता है इसका एक नतीजा यह होता है कि आम जनता के बड़े हिस्से की क्रय शक्ति कमजोर होती जाती है  तो दूसरा नतीजा यह होता है कि फ़ैक्टरीयों में जो माल धड़ा धड़ तैयार हो रहा था वह बाज़ार में पहुँचकर बिक नहीं पाता है डम्प पड़ जाता है । और जैसे ही एक क्षेत्र में यह स्थिति पैदा होती है वैसे ही यह पूरी अर्थव्यवस्था मै फैल जाती है । यही मंदी या आर्थिक संकट है । इसके चलते कामगारों की छटनी बड़े स्तर पर होने लगती है बेरोजगारी और ज्यादा फैल जाती है महंगाई बढ़ जाती है । खुद पूंजीपति वर्ग के लिए  भी निवेश का संकट बढ़ जाता है । यही आर्थिक संकट  फिर सामाजिक संकट में बदल जाता है जो  राजनीतिक संकटों को जन्म देता है । वर्तमान दुनिया संकट के इसी मुहाने पर खड़ी है ।
            निजी मालिकाने व सामाजिक उत्पादन के इस अंतर्विरोध को सिर्फ एक ही दिशा में हल किया जा सकता है वह यह कि निजी  मालिकाने की व्यवस्था को खत्म कर सामाजिक मालिकाने की व्यवस्था कर दी जाय । 1917 में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में इसी दिशा में इसे हल किया गया जब मजदूर वर्ग ने अपनी पार्टी के नेतृत्व में संगठित होकर मेहनतकश जनता को अपने साथ लेकर समाजवादी क्रांति को अंजाम दिया था ।  तब सत्ता अब पूंजीपति वर्ग के हाथ से निकलकर मजदूर मेहनतकश जनता के हाथों में आ गई । पूरे अधिकार अब उसके पास थे ।
            यह दौर उथल पुथल का था ।  पूंजीवादी आर्थिक संकट एक ओर विश्व युद्ध को जन्म दे रहे थे तो दूसरी ओर क्रांतिकारी संघर्षों को भी जन्म दे रहे  थे । मजदूर वर्ग की इसी क्रान्ति से घबराकर जर्मनी, इटली, स्पेन हंगरी व आस्ट्रिया आदि मुल्कों में पूंजीपति वर्ग ने फासीवादी राज्य कायम किया था । संशोधनवादी कम्युनिस्ट पार्टियों ने यहाँ फासिस्ट संगठनों को सत्ता तक पहुचने में बड़ी भूमिका निभाई थी ।  वर्तमान संकटों के गहराते जाने की स्थिति में भी जहां एक ओर मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी क्रान्ति की संभावना है तो वहीं दूसरी तरफ इस बात की भी संभावना है कि पूंजीपति वर्ग इनसे घबराकर फासीस्ट संगठनों की मदद कर फासीवाद स्थापित कर दे ।   
             जर्मनी के फासिस्ट ( नाजीवाद ) समाजवाद की भी लफ्फाजी करते थे खुद को “राष्ट्रीय समाजवादी कहते थे अपनी पार्टी का नाम रखा “राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन श्रमिक दल । जबकि हकीकत में वह समाजवाद के दुश्मन थे । हिटलर ने आर्य नस्ल की श्रेष्ठता व शुद्धता की लफ्फाजी की अतीत का महिमामंडन किया व उससे गौरान्वित होने का अहसास कराया , यहूदी विरोध में नफरत का उन्माद पैदा किया । पड़ोसी मुल्को के खिलाफ नफरत व युद्ध के उन्माद का माहौल पैदा किया था तथा  फासीवाद के दर्शन को सैद्धान्तिक रूप देने के लिए “ मेन कैम्फ ” किताब लिखी । इसमें उसने लिखा “ अनंत युद्ध से मानव जाति महान बनी है अनंत शांति से मानव जाती नष्ट हो जाएगी” .... “ नारी शिक्षा का चरम रूप उसे भावी माँ बनाना होना चाहिए ” । इटली के फासिस्ट मुसोलिनी आदि कहते थे :  “फासीज़्म पवित्रता व युद्ध में विश्वास करता है ; फ़ासिज़्म जनवादी विचारधारा की सारी पेचीदा पद्धति से लड़ता है” । फासिज़्म के लिए लफ्फाजी एक हथियार है ।
            इन सभी मुल्कों में फासिस्टों ने कम या ज्यादा फर्क के साथ यही किया ये महिलाओं को घर की चारदीवारी के भीतर तक सीमित कर देने के पक्ष में थे ऐसा उन्होने सत्ता में पहुचते ही किया भी । जर्मनी में हिटलर व उसकी फासिस्ट पार्टी को सत्ता में पहुचाने वाले जो लोग थे और जिनको लेकर हिटलर ने अर्थनीति समिति बनाई थी उसके सदस्य थे : हथियारों के कारखानों के बादशाह–हर क्रुप वान बोलहेल ; जर्मनी स्टील ट्रस्ट के – डॉ ए वोलगर ; इस्पात उद्योग का बादशाह- हर फ्रिट्ज़ थाइसेन; विद्युत उद्योग के बादशाह - वन सीमेंस आदि आदि  । हर देश में फासिस्टों को पालने पोसने वाले थाइसेन , क्रुप , सीमेंस , क्रूडर फोर्ड , वोलहेल  आदि आदि जैसे बड़े बड़े उद्योगपतियों व वित्तीय पूँजीपति  ही होते हैं । यही आज के भारत के फासिस्टों के बारे में भी सत्य है टाटा ,अंबानी बजाज जैसे पूंजीपति नरेंद्र मोदी के यू ही प्रशंसक नहीं हैं । गहराते आर्थिक संकट व बढ़ते जनांदोलनों से निपटने के लिए  वे फासिस्ट संगठन व मोदी में अपना भविष्य देख रहे हैं । इन पूंजीवादी घरानों द्वारा संचालित मीडिया उसे तारणहार के रूप में  प्रचारित कर रहा है ।  
            इन सभी में एक समान चीजें मौजूद हैं–वैधानिकता व न्यायालयों के प्रति घृणा , हिंसा का गुण गान , उदार व मानवतावादी विचारों का विरोध , शक्तिशाली सत्ता की मांग व युद्ध को मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ गुण बताना , दूसरे मुल्को पर कब्जे के लिए युद्ध छेड़ना , जबर्दस्त लफ्फाजी व अफवाह का प्रचार , घिनौनी साजिश  आदि आदि ।  इनके सत्ता में पहुचते ही निरंकुशता , आतंक , दमन हत्या व षडयंत्र  का वातावरण चौतरफा पसर जाता है ।
             हैरत की बात है कि जिस हिटलर ने जर्मन आर्य नस्ल की बात की थी वह खुद विदेशी था आस्ट्रिया का था । हिटलर के संगठन में साधारण सदस्यों के ऊपर झंझावाहिनी ( एस ए ) थी जिसके सदस्य भूरे रंग का कुर्ता पहनते थे व बाईं बाह पर स्वस्तिक का निशान लगाते हुए होते थे । इसके अलावा काली वर्दी पहने हुए चुनिन्दा रक्षक ( एस एस ) होते थे जो काली वर्दी जिस पर सफ़ेद नरमुंडों का चिह्न होता था संगठन अर्धगुप्त था साथ ही एक प्रकार का सैनिक प्रशिक्षण भी इन लोगों को दिया जाता था  । फरवरी 1933 में इन फासिस्टों ने षडयंत्र रचा  जब इन्होने जर्मन संसद राइखस्ट्राग को जला दिया और इसका आरोप क्रांतिकारियों पर लगा दिया । फिर क्रांतिकारियों की धर पकड़ कर मारकाट शुरू कर दी गई । मजदूरों के क्रांतिकारी संघर्ष को खून में डुबो दिया गया इनके नेता लिबनेख्त व रोजा लक्ज़मबर्ग की हत्या कर दी । हिटलर की सामाजवाद की लफ्फाजी की चलते जो लोग झ्ंझावाहिनी में आ गए थे अब समाजवाद को ना पाकर जब उनमें असंतोष पैदा हो गया तब इनका भी खूनी सफाया कर दिया गया ।  
            जर्मनी में यहूदियों के कत्ले आम के लिए फासिस्टों ने घृणित प्रयोग किए । जिस जर्मन आर्य नस्ल की शुद्धता  लफ्फाजी के पीछे मजदूरों, मध्यम वर्ग के लोगों, छोटे कारोबारियों व्यवसायियों को अपने पीछे  यहूदी विरोध में लामबद्ध किया था उनका आवाज को खामोश करने में भी सारी हदें पार की गई । महिलाओं की शिक्षा में भारी कटौती करके उन्हें ज्यादा से ज्यादा  योद्धा पैदा करने के लिए उन्हें प्रोत्साहित व मजबूर किया गया ताकि इन योद्धाओं को युद्ध में झोंका जा सके ।
               जर्मन फासिस्टों ने युद्धोन्माद पैदा कर पोलैंड, बेल्जियम आदि मुल्कों पर कब्जा कर लिया और फिर मजदूरवर्ग के समाजवादी रूस पर हमला बोल दिया समाजवादी रूस ने भारी कुर्बानी देकर जर्मनी को परास्त कर दिया और हिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी । फासिस्टों का हश्र यही होना है ।
            नरेंद्र मोदी , प्रचार तंत्र व उसका “विकास” का माडल  : पिछले कुछ समय से हर तरह के प्रचार माध्यमों में नरेंद्र मोदी जैसा फासिस्ट छाया हुआ है । जिसके माथे पर गुजरात के सैकड़ों बेगुनाह मुस्लिम स्त्री पुरुष व बच्चों के नरसंहार में अगुआई करने का कलंक है साथ ही निर्दोष लोगों का आतंकवाद के नाम इंकाउंटर का कलंक है । नरेंद्र मोदी के पीछे संघ व उसकी पूरी लौबी की ताकत है । संघ की पूरी कार्यपद्धति व ढांचा फासिस्ट संगठनों का ही नमूना है  नरेंद्र मोदी के जरिये अब संघ व उसकी लौबी अपने घृणित मंसूबों को अंजाम देना चाहती है । अब टाटा, बजाज व अंबानी जैसे पूँजीपतियों के एक धड़े ने नरेंद्र मोदी की पीठ पर हाथ रख दिया है ।
            मोदी व संघ जानते है कि यदि उन्हें सत्ता तक पहुँचना है तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को 92 के ध्रुवीकरण से काफी ज्यादा ऊंचाई पर पहुचाना होगा । इस का नतीजा हमारे सामने है । लेकिन यह ध्रुवीकरण भी  फिलहाल एक सीमा तक ही किया जा सकता है यह संघ व मोदी जानते है ।
            इसीलिए गुजरात के तथाकथित विकास पर मीडिया व प्रचार सामग्री द्वारा अभिभूत होनेचमत्कृत कर देने का अहसास आम जनता विशेषकर मध्यम वर्ग को कराया जा रहा है । इस “ विकास के कसीदे गढ़े जा रहे है । नरेंद्र मोदी द्वारा “ विकास , विश्वास व विजय ” का नारा दिया जा रहा है । खुद मरेन्द्र मोदी ने अपनी जनसम्पर्क मशीनरी के दम पर खुद को नायक के रूप में स्थापित किया है । फर्जी आकड़ों के दम पर गुजरात की  “चमचमाती तस्वीर” की लफ्फाजी की जा रही है । विकास की इस लफ्फाजी के पीछे छुपे स्याह पक्ष को समझने के लिए कुछ तथ्यों पर निगाह डालें :                        
सन
कुल शिक्षित बेरोजगार
1990
5,93,155
2000
1,55,517
2011
8,96,029
                                                                       
2006-11 के बीच विभिन्न राज्यों की विकास दर % में
वर्ष
गुजरात
महाराष्ट्र
तमिलनाडु
हरियाणा
भारत
2006-11
9.34
10.34
9.42
9.89
8.70
( स्रोत : socio economic review gujaraat state )
                                                                        ( स्रोत : deciphering Gujaraat’s developments by critical concerns )
            मोदी के काल में 16 हज़ार मेहनतकशों ने आत्महत्या  की थी जिसमें  से  9829 मजदूर, 5447 किसान व 919 खेतीहर मजदूर थे ।
                                   
                                                मोदी काल में उद्योगपतियों के विकास की तस्वीर
कंपनियों का नाम
2012 का बाज़ार पूंजीकरण
2002 से % में वृद्धि
अदानी इंटरप्राइजेज़
31,059 करोड़ रु.
8615 %
इलेकान इजीनीयरिग क .
449 करोड़ रु.
7138 %
गुजरात N R E कोक
1200 करोड़ रु.
8766 %
रतनामी मेटल्स
634 करोड़ रु.
7425 %
यूनाइटेड फोस्फोरस
5497 करोड़ रु.
87995 %
                  उपरोक्त तथ्य साफ साफ दिखा रहे है कि गुजरात का विकास मेहनतकश जनता की तबाही के दम पर पूँजीपतियों का विकास है । इस हिन्दू हृदय सम्राट या विकास पुरुष नरेंद्र मोदी के राज में जहां ट्रेड यूनियन अधिकारों को रौदा गया श्रम कानूनों को खत्म करने की ओर बढ़ा गया था वहीं  टाटा मोटर्स को 33 हज़ार करोड़ रुपये की छूट दी गई  । तथा टाटा को 9750 करोड़ रुपये का ऋण 0.10 % व्याज दर से दिया गया । एस्सार ग्रुप को सर्वोच्च न्यालय के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए 2.08 लाख वर्ग मी . जमीन  दी गई थी ।  पूँजीपतियों के प्रति दरियादिली के ऐसे ही कई और भी उदाहरण हैं ।          
                  मोदी के इस गुजरात में 1700 करोड़ का सुजलाम सुफलाम घोटाला तथा 260 करोड़ का नरेगा में घोटाला हुआ है । मोदी के इस गुजरात में 2004-05 से 2009-10 के बीच गरीबी घटने  की दर 8.5% है जबकि महाराष्ट्र ( 13.7%) तमिलनाडु ( 12.3 %) कर्नाटक ( 9.7%) राजस्थान ( 9.6% ) इससे ऊपर है ।
            अन्य ढेर सारे मिथक या झूठ की तरह इस “ विकास ” के संबंध में भी मोदी , संघ लौबी  उसके प्रचारतंत्र ने  मिथक या झूठ गढ़ लिया है । फासिस्टों की एक विशेष पहचान है लफ्फाजी और अफवाह के द्वारा उन्माद पैदा करने का । यही नरेंद्र मोदी की स्थिति है ।
            नरेंद्र मोदी व इसके प्रचारतंत्र ने उत्तराखंड आपदा के वक्त भी यही किया था । मोदी ने दावा किया कि उसने गुजरात के 15000 लोगों को सकुशल आपदास्थल  से बाहर निकलवा दिया । लेकिन जब इसकी छानबीन हुई तो पता लगा कि यह भी एक प्रकार का झूठ या लफ्फाजी ही थी । दरअसल एप्को वर्डवाइड नाम की अमेरिकन विज्ञापन  या जनसम्पर्क एजेंसी ने यह प्रचारित किया था ।  इस एजेंसी ने ही  मिट रोबिनी व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का भी चुनाव प्रचार किया था ।  2007 में ही नरेंद्र मोदी ने इस एजेंसी से एक समझौता किया था । इस सेवा के लिए नरेंद्र  मोदी द्वारा इस कंपनी को अगस्त 2007 से 25000 डालर सालाना भुगतान किया जा रहा  है ।
            समाज में सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए गढ़े गए मिथक :  देश के भीतर हिन्दू सांप्रदायिक फासीवादी संगठन आक्रामक स्थिति में है । ये समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करने के लिए नए नए तर्क व मिथक गढ़ते हैं इन मिथकों को हकीकत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है । ये इतिहास का मिथ्याकरण करके अपने हिसाब से ढालकर प्रस्तुत करते है  बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के आम जनता के अलग अलग हिस्से इन गलत तकों, मिथकों व लफ़्फ़ाजियों  को हकीकत समझकर इनके पीछे एक जुट हो जाती है ये फासिस्ट संगठन इन्हें फिर हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं । इसलिए इन तर्कों मिथकों को समझना बेहद जरूरी है :----     1 : लव जिहाद का सिद्धान्त : --- हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों द्वारा यह जबर्दस्त दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मुस्लिम हिन्दू लड़कियों को अपने जाल में फंसाकर  उनसे शादी कर अपनी आबादी  बढ़ा रहे हैं । इसे संघियों ने लव जिहाद का नाम दिया है ।  मुजफ्फरनगर शामली में  इस लव जिहाद के सिद्धान्त के दम पर सांप्रदायिक उन्माद व हमले का सफल आयोजन इनके द्वारा किया गया ।  इससे पहले दक्षिणी  कर्नाटक में संघ के हिन्दू जागृति समिति ने दुष्प्रचार किया कि प्रांत में 30000 हिन्दू लड़कियों को मुस्लिमों ने अपने प्यार में फंसाकर मुस्लिम बना दिया है ठीक ऐसा ही प्रचार केरल में भी किया गया केरल उच्च न्यायालय के आदेश पर पुलिस ने गहराई से जांच पड़ताल की लेकिन उसे एक भी सबूत नहीं मिला । संघी गिरोह ने जिन 30 हज़ार लड़कियों के उस दौरान गुम होने का प्रचार किया हकीकत में इस समय अवधि में 404 लड़कियां गायब हुई थी उनमें से 332 को पुलिस ने खोज लिया था तहक़ीक़ात करने पर पता चला कि इनमें  अधिकांश हिन्दू लड़कियां हिन्दू लड़कों के साथ शादी के लिए घर से भाग  गई थी ।
            संघी गिरोह का यह दुष्प्रचार आज हर तरफ फैल गया है मुजफ्फर नगर शामली में हुए दंगों से इसे समझा जा सकता है  यह ऐसे इलाके थे जो 92 के दंगों में भी सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम कर रहे थे यहाँ इस दौर में सरकार की पूंजीपरस्त नीतियों के चलते कृषि संकट लगातार गहरा रहा है गन्ने की वाजिब कीमत ना मिल पाने व इसका समय पर भुगतान न हो पाने के चलते संकट बढ़ा है साथ ही मनरेगा योजना के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ जाने के चलते धनी किसानों से इनका अंतर्विरोध बन गया  । अब यहाँ लिंगानुपात पर निगाह डाली जाय तो यह 863 का है । अभी भी यहाँ घोर पितृसत्तात्मक मूल्य मौजूद है इन स्थितियों में महिलाओं का अपने अधिकारों के लिए सजग होने का मतलब है इन पितृसत्तात्मक मूल्यों से लैस पंचायत या खाप पंचायत के खिलाफ हो जाना । जो कि इन पंचायतों की नज़र में पाप है घोर अपराध है । इन स्थितियों में लव जिहाद का सिद्धान्त काफी असरकारक होना था । हमउम्र या सहपाठी हिन्दू लड़की का मुस्लिम लड़के से बातचीत करने को भी इसी रूप में प्रचारित कर सांप्रदायिक भावनाए भड़काने में इस्तेमाल किया गया।            
               इन इलाकों में पिछले 2 वर्ष से संघ परिवार की सक्रियता बढ़ी । जाट समुदाय के बेरोजगार युवकों व स्थानीय गुंडा तत्वों को सफलतापूर्वक अपने फासीवादी मंसूबों में शामिल करा लिया । लगभग 8 माह पहले संघ परिवार ने लगभग हर गांव व कस्बे से 10 -15 युवकों की भर्ती की। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं कई गुना इनके संगठित व योजनाबद्ध प्रयासों से बढ़ गई। यह  इनके द्वारा मुस्लिम वेश बनाकर भी किया जाता था । इस प्रकार संघ परिवार ने  लव जिहादके अपने सिद्धान्त को यहाँ आगे बढ़ाया ।
            2: मुस्लिमों के चार शादी करने व कई कई बच्चे पैदा करने व जनसंख्या बढ़ाकर मुस्लिम राष्ट्र बनाने का मिथक :    हर धर्म का विवाह के सम्बन्ध में अपने अपने धार्मिक नियम बने हुए है मुस्लिम धर्म में 4 शादियों की इजाजत है  । इस धार्मिक व महिला विरोधी तथ्य के दम पर ही यह प्रचारित किया गया है कि मुस्लिम चार चार शादी करते है व 25-30 बच्चे पैदा करते है । और फिर इस फर्जी जनसंख्या विज्ञान के दम पर बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय के दिमाग में यह डर व असुरक्षाबोध पैदा करते हैं कि वह अल्पसंख्यक रह जाएँगे और फिर मुस्लिमों का राज होगा ।
            संघ का यह तथ्य हकीकत से बिलकुल परे व कूपमंडूक सोच को दिखाता है फिलहाल तथ्यों की रोशनी में बात करें । प्रकृति में लड़का व लड़की के पैदा होने का अनुपात लगभग लगभग बराबर है । तब इस स्थिति में यह कैसे संभव है कि हर मुस्लिम चार चार शादी कर ले । यदि यह माना जाय कि एक मुस्लिम चार शादी करता है  तब इसका यह अर्थ होगा कि उसी अनुपात में मुस्लिम लड़कों के तीन चौथाई  हिस्से का विवाह ही संभव नहीं होगा  जो कि है नहीं ।  1981 में मुसलमानों में लिंगानुपात था 1000 लड़कियों पर 1068 लड़के । इसका अर्थ है कि 68 मुस्लिम लड़के विवाह नहीं कर पाएंगे ।
            तथ्य बताते हैं कि बहू विवाह सबसे ज्यादा आदिवासियों में हुए हैं ( 15.25 %) फिर बोड़ो ( 7.9 % ) जैन (7.0 % ) ।  एक से ज्यादा विवाह मुस्लिमों से ज्यादा हिंदुओं में हुए है हिंदुओं में यह 5.80 % है जबकि मुस्लिमों में 5.70% । संघियों का इस नारे” हम दो हमारे दो ,वो पाँच उनके पच्चीस” का खोखलापन स्पष्ट है
             अब जनसंख्या बढोत्तरी के तथ्य को लिया जाय क्या इस महंगाई व बेरोजगारी  में 25-30 बच्चों के परिवार का पालन पोषण संभव है ? नहीं ! आइये जनगणना के आंकड़ों को लें :
वर्ष
कुल जनसंख्या
हिन्दू
मुस्लिम
ईसाई
 1961
43.9 करोड़
83.4 %
10.5 %
2.60%
1971
54.8 करोड़
82.7 %
11.2%
2.44%
1981
68.5 करोड़
82.4 %
11.7%
2.32 %
1991
85.6 करोड़
82.0% 
12.2%
 2.32 %
             ( स्रोत: सरकारी जनगणना से )साभार “ साम्प्रादायिक फासीवाद –प्रतिरोध की  रणनीति” से )
उपरोक्त तथ्य यह बताते हैं कि पिछले 40 वर्षों  में हिन्दूओं की जनसंख्या प्रतिशत मामूली गिरावट आई है जबकि मुस्लिमों की जनसंख्या में मामूली वृद्धि हुई है  इस हिसाब से मुस्लिमों की आबादी को  हिन्दुओं के बराबर होने के लिए सैकड़ों साल लग जाएँगे । संघ का यह तथ्य एकदम हवाई व फर्जी है जो कहता है की मुस्लिमों की जनसंख्या में 40 % की वृद्धि हो गई है ।1961-71 से 1971-81 के दौरान हिन्दू जनसंख्या वृद्धि 23.71 से बढ़कर 24.42 हो गई जबकि इस अवधि में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर घटकर 30.85 से 30.20 रह गई ।  जनसंख्या वृद्धि या कमी में आर्थिक सामाजिक कारण ही मुख्य भूमिका अदा करते हैं । 
            शिक्षा के प्रसार के चलते 90 के दशक में मुसलमानों कुल प्रजनन दर 4.3 से घटकर 3.6 हो गई है  यानि 0.7 %  की कमी । जबकि इस दौर में पूरी आबादी का कुल प्रजनन दर 3.4 से घटकर 2.9 हो गया यानि 0.5 % की कमी । इस तरह मुस्लिमों में यह गिरावट औसत गिरावट ज्यादा तेज रही ।
            3 : मुस्लिम तुस्टिकरण के संबंध में :---- सांप्रदायिकरण के मकसद से ये संगठन  यह भी प्रचारित करते हैं कि सरकारों  ( विशेषकर कॉंग्रेस ) ने मुस्लिमों का लगातार तुष्टीकरण किया है मतलब कि उन्हें ज्यादा सुविधाएं व रियायतें दी जा रही हैं । तथ्य इसके बिलकुल उल्टी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं । 
            भारत में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 12% है जबकि केंद्र सरकार की नौकरियों में मुस्लिमों का रोजगार समूह-में 1.61 % , बी  में 3.00% , सी में 4.41 %  तथा डी में 5.12 % है । 
                                                              केंद्र सरकार की नौकरियों में मुस्लिम रोजगार के स्थिति      
समूह
   A
B
C
D
वर्ष 1992 में मुस्लिम प्रतिनिधित्व
1.61 %
3.00 %                                    
4.4 %
5.12%
                                                            ( स्रोत : सांप्रदायिकता –ए ग्राफिक एकाउंट : राम पुनियानी व शरद शर्मा  :  पेज 158 )
            टाटा और बिड़ला जैसे औद्योगिक घरानों सहित सभी निजी क्षेत्र की नौकरियों में 8.16 % मुसलमान थे जबकि वहीं इस दौर में 11.5 % अनुसूचित जातियों के लोग नौकरियों पर थे । 1980 में कुल लोक सभा की कुल  545 सीटों से 49 सांसद मुस्लिम रहे थे जो कि कुल सीटों का 10%था यह अब तक का सबसे ज्यादा उपस्थिती मुस्लिमों की है  । उसके बाद यह  घटा है 2009 में 30 सीटें मिली जो कि मात्र 6 % थी । जबकि इनकी कुल आबादी 12 % थी ।
            शाहबानों केस जो कि मुस्लिम महिलाओं के गुजारा भत्ता देने के संबंध में था सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में आदेश दिया लेकिन राजीव गांधी की कॉंग्रेस सरकार ने इस फैसले को संसद में पलट दिया । यह मुस्लिम कट्टरपंथियों का तुष्टीकरण था व पुरुष प्रधान मानसिकता का द्योतक था लेकिन मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर यह हमला था । मुस्लिम महिलाओं का यह तुष्टीकरण नहीं था बल्कि इसने मुस्लिम महिलाओं के जीवन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेहतरी की जो उम्मीद दिखी थी कॉंग्रेस सरकार ने इस पर पानी फेर दिया ।
            यह भी कहा जाता है कि मुस्लिमों को हज यात्रा में रियायत मिलती है । सही है कि हज यात्रा के लिए रियायत मिलती है लेकिन हिंदुओं के कुम्भ ,अर्धकुंभ से लेकर कई धार्मिक मेले में सरकार द्वारा अरबों रुपया खर्च किया जाता है जिसकी तुलना में हज में दी जाने वाली रियायत तो कुछ भी नहीं है ।
4: आर एस एस ( संघ ) राष्ट्रवादी व देशभक्त है :   आर एस एस अपने गठन के समय से आज तक कभी भी राष्ट्रवादी व देशभक्त नहीं रहा है । राष्ट्रवाद या देशभक्त का आज़ादी से पहले साफ व सीधा अर्थ था कि ब्रिटिश हुकूमत (साम्राज्यवाद )के खिलाफ जंग छेड़ दी जाती और साथ ही साथ देशी राजे रजवाड़े जमींदारों के विरोध में भी  संघर्ष किया जाता । लेकिन अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति की ये छटपटाहट कभी संघियों के दिल में नहीं रही ।
            ब्रिटिश शासकों की छत्रछाया में पैदा होकर पला बढ़ा संघ अंग्रेज़ परस्त था अत: देश विरोधी भी था ।  एक ओर हिन्दू मुस्लिम जनता का अंग्रेज शासक  निर्मम दमन व कत्लेआम कर रहे थे दूसरी तरफ संघ “ हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में मशगूल होकर हिन्दू मुस्लिम जनता की एकजुटता को खत्म करने में लगा था ।
            आज भी देश भक्त होने का अर्थ है अमेरिकी नेतृत्व में साम्राज्यवादी मुल्कों की देश के भीतर हर तरह की दखलंदाजी का विरोध  तथा देश के भीतर हर तरह के सामंती मूल्य मान्यताओं छूयाछूत आदि आदि व सामंती उत्पीड़न के विरोध में  जनवादी चेतना व अधिकारों का विस्तार ।  लेकिन आर एस एस ने न तो यह पहले किया था ना ही आज कर रही है । आर एस एस वर्ण यवस्था व जाति व्यवस्था का समर्थक है साथ ही महिला विरोधी भी ।
             आर एस एस के संस्थापक हेडगेवार दो बार जेल गए एक बार खिलाफत आंदोलन के वक्त जबकि दूसरी बार सत्याग्रह; लेकिन यह जेल जाना ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में न था बल्कि जेल में संघ का प्रचार था । संघ के नेता गोवलकर ने विचार नवनीत किताब में लिखा “ अंग्रेजों के विरोध को देशभक्ति व राष्ट्रीयता का समानार्थी माना गया ....... इस प्रतिगामी दृष्टिकोण के विनाशकारी प्रभाव हुए
            अटल बिहारी बाजपेयी  जिनके  भारत छोड़ो आंदोलन में जेल जाने की चर्चा की जाती है  इसकी हकीकत भी कुछ और थी । बाजपेयी के द्वारा ब्रिटिश सरकार के लिए पत्र लिखा गया था जिसमें उन्होने बयान दिया कि वे केवल दर्शक थे अपने भाई के साथ भीड़ के साथ साथ चल रहा था उसने कोई भी सहायता नहीं की  । इस पर उन्हें रिहा कर दिया गया । इस बयान में विरोधियों के दो नेताओं ककुवा बनाम लीलाधर और महुआ का नाम भी लिया गया जिन पर फिर मुकदमा चलाया गया ।
5: आतंकवाद के संदर्भ में   मिथक : आतंकवाद के सम्बन्ध में यह प्रचारित किया जाता है कि मुस्लिम आतंकवादी होते हैं । यानी आतंकवाद व मुस्लिम को एक दूसरे का  पर्यायवाची बना दिया गया है । यह प्रचार तब से बहुत तेजी से दुनिया में फैलाया जा रहा है जब से अमेरिका के ट्विन टावर विश्व व्यापार केंद के दफ्तर पर हमला किया गया था । आतंकवाद को पैदा करने वाली चीज आर्थिक सामाजिक व राजनीतिक हैं इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं । लेकिन खुद सरकारी यानि शासकों के  आतंकवाद  जिसे वह अपनी सेना व पुलिस के दम पर कायम करता है उसे शांतिअनुशासन सुरक्षा कहा जाता है ।     
            हमारे देश के संघी व उसके अन्य संगठन व पार्टी इस बात को खूब प्रचारित करती है । उसके लिए तो जैसे अमेरिकी साम्राज्यवादीयों ने मनमाफिक चीज उन्हें उपहार में दे दी हो । इन संघियों ने कहना शुरू कर दिया  कि आतंकवादी मुस्लिम ही होते हैं इसके लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया  यहीं नही इनहोने कई जगहों पर मुस्लिम वेश भूषा में बम बिष्फोट भी करवाए जिसका इल्जाम भी अल्पसंख्यक मुस्लिमों पर लगाया गये  
            अमेरिकन साम्राज्यवादी व उनके बुद्धिजीवी सेमुयल हटिंगटन द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त सभ्यताओं का संघर्ष “   द्वारा लिखी किताब इनके लिए फायदेमंद हुई  उसने ईसाई व इसलाम के बीच संघर्ष की बात कही । अमेरिकी साम्राज्यवादियों के माथे पर करोड़ों बेगुनाह लोगों  व बच्चों की निर्मम हत्या का कलंक है । जापान , वियतनाम , इराक, ग्वाटेमाला,  निकारागुआ आदि मुल्क लिस्ट लंबी है । यह दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी मुल्क  है । तालीबानी आतंकवादियों को पैदा करने वाले अमेरिकी साम्राज्यवादी ही हैं जिसे उन्होने रूस के  मजदूर राज के खिलाफ  व बाद में रूसी  साम्राज्यवादियों के खिलाफ पाला पोसा व तैयार किया था ।
            अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने अपने आर्थिक व सामरिक हित के लिए अफ़गानिस्तान इराक, सीरिया, ईरान आदि जैसे मुल्को को शैतानी व  आतंकवादी राष्ट्र कहकर इन पर अपनी व नाटो की सेना के दम पर कत्लेआम किया । रासायनिक हथियारो के नाम पर इराक पर हमला किया गया मकसद वहाँ के तेल कुओं को अपने हिसाब से चलाना था । और खुद भारत में भी नई आर्थिक नीतियों के रूप में यह हमला आम जनता पर हो रहा है। 
            लेकिन संघ जैसे फासिस्टों में इतनी जुर्रत कहाँ कि अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोध में बोलें इसके उल्टा वह तो इनकी सेवा करने के लिए आतुर हैं क्यों कि  भारत के एकधिकारी पूंजीपति ऐसा चाहते हैं । इसलिए वह खुद ही मुस्लिमों के विरोध में पूरे देश में माहौल बने और जनता विशेषकर हिन्दू  सोचें कि मुस्लिम होने का मतलब आतंकवादी है । और फिर इनके खिलाफ माहौल बन जाये । और संघ के पीछे लामबद्ध होकर उसे सत्ता में पहुंचा दें । भाजपा नेता द्वारा कहा गया हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं है लेकिन जितने आतंकवादी पकड़े गए वो मुस्लिम है
            इसीलिए संघ व  उसके बजरंग दल आदि जैसे संगठनों ने मुस्लिम वेश धारण कर कई बिष्फ़ोटो को अंजाम देने की घृणित कार्यवाही की । नांदेड में ही बम बनाते वक्त दो बजरंग दल के कार्यकर्त्ता मारे गए थे । नादेड में हुए धमाके  फरवरी (2007 में) के आरोपियों के ब्रेन मैपिंग व नार्को टेस्ट से संघ, विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल की कारगुजारी सामने आई । लेकिन इन सभी बिष्फोटों में कई निर्दोष मुस्लिम युवकों को फसाया गया व उन्हें जेल जाना पड़ा लेकिन इसके बावजूद संघ का हाथ इनमें खुलकर सामने आया । यहाँ तक कि शासक वर्ग की बड़ी पार्टी कॉंग्रेस के नेता पी चिदम्बरम को बोलना पड़ा कि देश में भगवा आतंकवाद भी खतरा है ।
            महाराष्ट्र के परभनी, पुरना, जालान, मुंबई , मालेगांव आदि जगहों पर संघ व बजरंग दल के का*र्यकर्त्ताओं ने बम बिष्फोट को अंजाम दिया । कर्नल पुरोहित ( आर्मी का ) साध्वी प्रज्ञा,  आदि जैसे कई लोग इस मामले में फसे । गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार ने तो इस बिला पर फर्जी एंकाउंटर की झड़ी ही लगा ही दी । इशरत जहां फर्जी एंकाउंटर केस मौजूदा वक्त में चर्चा में है ।
            लेकिन जल्द ही आतंकी संघियों का नाम मीडिया में आना बंद हो गया । खुद पी चिदम्बरम के मुह से निकला शब्द “ भगवा आतंकवाद आजकल उनकी जबान से गायब है । यह यूं ही गायब  नहीं हो गया है । बल्कि शासक वर्ग की अलग अलग पार्टियों का अंतर्विरोध आपसी खीचतान के चलते जनता के बीच हकीकत ना पहुँच जाय इसलिए खामोशी सबसे बड़ा हथियार थी।
            6 : धारा 370 के संबंध में :  एक बार फिर से धारा 370 का मुद्दा फजा में तैर रहा है ।  संघ व उसके पी एम इन वेटिंग नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को उछाला है । संघ कहता है एक देश में दो विधान नही चलेगा । और अब तर्क को दूसरी दिशा में धकेलकर कहा जा रहा है कि 370 ने कश्मीर की जनता को क्या दिया महिलाओं को क्या दिया । यह उसके भी खिलाफ है । यह भी  इन संगठनों द्वारा कहा जाता है कि कश्मीर को विशेषाधिकार है । अब चुकी संघ व नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा विकास-विश्वास के नारे के साथ सांप्रदायिकता का जहर परोस रही है इसलिय अब धारा 370 के संबंध में ये कह रहे हैं इस धारा ने कश्मीर का विकास नही होने दिया है ।
            आर एस एस ने अपनी पैदाइश के वक्त से `हिन्दू राष्ट्र की बात करती आई है और वह इसके साथ ही पाकिस्तान बर्मा व बांग्लादेश को भारत में मिलाकर अखंड भारत बनाने की बात करते हैं । इनकी यह ख़्वाहिश व मकसद  पुराने राजा महाराजाओं की तरह ही साम्राज्य विस्तार की घृणित महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है लेकिन इनका यह अखंड भारत देश के पूंजीपति वर्ग के लिए बहुत फायदे की चीज है क्यों की तब उनका बाज़ार काफी फ़ैल जाएगा, प्रकृतिक संसाधनों का विशाल क्षेत्र व सस्ते मजदूर मिल जाएँगे ।
            अनुच्छेद 370 के सम्बन्ध में बात करने के लिए उस दौर पर निगाह डालनी होगी  जब यह बना था । आज़ादी के समय भारत में 500-600 रियासतें थी इन सभी रियासतों के सामने तीन विकल्प थे 1 : वे या तो भारत के साथ मिल जाएँ   : 2 – या फिर पाकिस्तान के साथ मिल जाएँ ; 3: या आज़ाद रहें ।
            अधिकांश रियासतों को नेहरू व पटेल के नेतृत्व में चल रही भारत सरकार ने  भारत(दिल्ली) में मिला लिया । लेकिन हैदराबाद कश्मीर व जूनागढ़ ने मिलने पर आनाकानी की तो उन्हें सेना के दम पर भारत में मिला लिया गया । कश्मीर का राजा हिन्दू ( हरी सिंह) था जबकि प्रजा ज़्यादातर मुस्लिम थी । इस दौरान के पाकिस्तान ने कश्मीर को कब्जाने के लिए हमला बोल दिया । नेसनल कोन्फ्रेंस शेख अब्दुला के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्ष कश्मीर बनाने की बात कर रहे थे लेकिन आक्रमण हो जाने पर राजा व शेख अब्दुला ने भारत की नेहरू सरकार से मदद माँगी । एक समझौते या संधी के बाद ही वहाँ सेना भेजी गई ।                           
भारतीय पुलिस पर एक नज़र : ---- एमनेस्टी इंटरनेसनल ने कहा था “ पुलिस अपराधियों का सबसे बढ़ा संगति गिरोह है “ । सांप्रदायिक दंगों केदौरान इसकी भूमिका खुद दंगे में शामिल होने की रही है व अल्पसंख्यकों पर हमले की रही है । जबकि  अल्पसंख्यक  सी आर पी एफ , बी एस एफ की उपस्थिती में दंगों के दौरान  खुद को सुरक्षित  महसूस करते है : कुछ उदाहरण --
1 :मेरठ दंगे 1987 :   यहा पी ए सी के सिपाहियों ने हाशिमपुरा से 34 मुस्लिम युवकों को घरों से उठाकर ले गई और नहर के किनारे ले जाकर मार दिया । जबकि मलयाना गाँव में जुम्मे की नमाज के बाद बाहर आ रहे 67 मुस्लिमों को मार दिया । गोलीबारी का आदेश देने वाले त्रिपाठी को कुछ समय को निलंबित कर बहाल कर दिया गया बाकियों को तो कोई सजा ही नहीं हुई ।
2 : मुरादाबाद दंगे 1980: यहा भी दंगों के दौरान पी ए सी ने ईदगाह मैदान में क्रूरता पूर्वक गोली चलायी जिसमें सैकड़ो मारे गए थे किसी  भी पुलिस अधिकारी को इस जघन्य अपराध की  सजा नही दी गई ।  
3: भागल पुर दंगे 1989 :  दंगों के दौरान भागलपुर के चँदेरी गाँव में 100 आदमियों ने एक घर में शरण ली थी जिन्हें सेना ने सुरक्षा दी थी सेना के मेजर विर्क को कहीं दूसरी जगह जाना था उन्होने बिहार मिलिटरी पुलिस को सुरक्षा की ज़िम्मेदारी दी।  बिहार मिलिटरी पुलिस ने लोगों को घर से सुरक्षित निकालने के बहाने इन्हें दंगाइयों को सौप दिया । यदि मेजर विर्क ने चौकसी ना दिखाई होती तो यह पता घटना भी दाब जाती । मेजर विर्क को झील के बाहर जूते समेत एक मनुष्य की टांग देखी जो कि एक औरत थी जिन्हें दंगाइयों ने मरा समझकर झील में फैक दिया था तब उसकी आपबीती सुनने पर ही यह घटना उजागर हुई । इसी तरह लोंगन गाव में मुस्लिम आबादी के 100 लोगों को मारकर गोभी के खेत में दफना दिया गया । भागलपुर के दंगों में 1000 लोग मारे गए पुलिस ने खुलेआम दंगाइयों का साथ दिया ।              ( स्रोत : भारत में सांप्रदायिकता- इतिहास और अनुभव से )

             इस समझौते के मुताबिक कश्मीर के अंदरूनी मामलों में भारत सरकार दखल नहीं देगी,  केवल विदेश मामले ,संचार , मुद्रा व सुरक्षा ही भारत सरकार के नियंत्रण में होंगे जबकि कश्मीर का अपना संविधान होगा, अलग प्रधानमंत्री व अलग झण्डा होगा । इन विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 370 के तहत विशेष अधिकार भी जम्मू कश्मीर को दिये गए । जिसके तहत जम्मू कश्मीर के संबंध में कानून बनाने की संसद शक्ति को सीमित कर दिया गया । जम्मू कश्मीर की विधान मण्डल की सिफ़ारिश पर ही या सहमति पर ही संसद यहाँ के संबंध में कानून बना सकती थी और अनुच्छेद 238 को यहाँ लागू नहीं किया जा सकता था ।  इस संधी को मानने के बावजूद कश्मीर का एक तीहाई हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया । इस मुद्दे को भारत सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गई । संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर जनमत संग्रह करवाए जाने की बात की थी ।
             इसके बाद धीरे धीरे इसके जबर्दस्ती या षडयंत्र से भारत में विलय की कोशिशें चलने लगी । कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला पर इसके लिए दबाव बनाया गया लेकिन उन्होने इस दबाव को मानने से मना कर दिया । लेकिन शेखअब्दुला को 1953 में देश द्रोह के आरोप में 17 साल के कारावास की सजा सुना दी गई । इसके बाद कश्मीर पर भारत सरकार का नियंत्रण बढ़ता गया । प्रधानमंत्री का पद मुख्यमंत्री में बदल  दिया गया जबकि सदर ए रियासत को राज्यपाल में । इस प्रकार ताकत छल फरेब के दम पर कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया ।  कश्मीर में अलगाववाद  व मुस्लिम कट्टरपंथ की समस्या के लिए हमारे शासक ही दोषी हैं ।
             जहां तक विशेष प्रावधानों या अधिकारों की बात है जो कि परिस्थितियों के अनुसार अलग अलग है  तो यह अनु . 371 के तहत महाराष्ट्र व गुजरात के संबंध में , अनु . 371 (अ) के तहत नागालैंड व इसी प्रकार मीजोरम, सिक्किम आदि आदि जगहों के लिए भी हैं फिर इनकी चर्चा भी क्यों ना की जाय । लेकिन संघ इस सबका मतलब जानता है  इसलिए अन्य पर चुप्पी साध जाता है ।   
            7 : दंगो की शुरुआत मुस्लिम करते है  :  यह भी अन्य सभी की ही तरह का फर्जी तथ्य है दं अलग अलग जगह हुए दँगों के संबंध में गठित जांच आयोगों की रिपोर्ट के उद्वरण से यह स्पष्ट  हो जाएगा :-
            1 :अहमदाब्द 1969 :-- “आयोग से सच्चाई छिपाने विशेष रूप से आर एस एस और जनसंघ ( भाजपा) के नेताओं की दंगों में भागीदारी को छिपाने के लिए जानबूझकर प्रयास किए गए ।“ ( न्यायमूर्ती : जगमोहन रेड्डी आयोग से )
            2: भिवंडी जलगांव 1970 : -- उच्च अधिकारियों को  दी रिपोर्ट में  जिले के अधिकारे ने कहा है  “ ... हिंदुओं विशेषकर आर एस एस और कुछ पी एस पी लोगों का एक वर्ग .... शिवाजी को सम्मान देने के लिए जुलूस में शामिल नहीं हुए थे वे यह अपना हक जताने और यदि हो डसके तो मुस्लिमों को बहदकाने व बेज्जत करने आए थे । गाँव वालों ने मुस्लिम विरोधी भाषण लगाए आक्रामक व्यवहार किया .... मोती मस्जिद पर  गुलाल फेंका । पुलिस ने चुप रहकर मदद की” ( न्यायमूर्ती डी  पी मडौन आयोग   )
            3: तेल्लीचेरी 1971 :       “यहाँ हिन्दू मुस्लिम सदियों से भाईचारे के साथ रह रहे थे ।  आर एस एस  व जनसंघ द्वारा अपनी यूनिटें यहाँ स्थापित करके गतिविधियां शुरू कर दी गई । मुस्लिम विरोधी प्रचार होने लगा जिसकी प्रतिक्रिया में मुस्लिमों का मुस्लिम लीग ( सांप्रदायिक संगठन ) के पास जाने के बाद से तनाव पैदा हो गया और इन उपद्रवों के लिए पृष्ठभूमि तैयार हो गई ( न्यायमूर्ती : जोसफ विथायथी आयोग की रिपोर्ट  )
            4: जमशेदपुर 1979 :  “ खुफिया शाखा जमशेदपुर ने ( मार्च 23 , 1979 ) ने अपनी रिपोर्ट में आर एस एस के मंडलीय सम्मेलन का .. उल्लेख किया है जिसमें ... सर्व संघचालक को भए भाग लेना था । ... जुलूस के मार्ग के बारे में मतभेद बढ़ गया .... संयुक्त बजरंगबली आखाडा समिति ... साम्प्रादायिक भावनाएं भड़ काने वाले पर्चे बांटे ...  उनका आर एस एस के साथ ... संबंध था ..... हिंसक भीड़ ने ..... मुस्लिम विरोधी नारे लगाए .... जमशेदपुर  में भी पर्चे बांटे गए हिन्दूऑन की भावनाओं को भड़काया गया घटनाओङको तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया .... यह सब एक साजिश का हिस्सा लगता था ”
            5 : कन्या कुमारी दंगे 1982 :  न्यायमूर्ती वेणुगोपाल आयोग में कहा गया है  “ साम्प्रादायिक हिंसा भड़काने के लिए आर एस एस की कारी पद्धति इस प्रकार है – बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को यह कहकर भड़काना कि इसाई देश एक नागरिक नहीं हैं ..... बहुसंख्यक समुदायों के युवकों को खंजरों तलवारों भालों को चलाने के लिए प्रशिक्षण देना .... सांप्रदायिक खाई को बढ़ाने के लिए अफवाहें फैलाना और छोटी छोटी बातों को सांप्रदायिक रंग देकर सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काना ।  ( स्रोत : - सांप्रदायिक फासीवाद – प्रतिरोध की रणनीति )
सांप्रदायिकता के विकास के अलग अलग चरण  :         सांप्रदायिकता के संबंध में जांच पड़ताल करने पर हम पाते हैं कि सांप्रदायिकता पूंजीपति वर्ग की राजनीति है यह भी प्रतिक्रियावादी दौर के पूंजीपति वर्ग की । इतिहास में ऐसा भी दौर रहा है जब पूंजीपति वर्ग ने जनता को साथ लेकर  सामंती मूल्य मान्यताओं को चुनौती दी , धर्म को चुनौती दी  यही नही इसने “ समानता-स्वतन्त्रता-भाईचारे” का नारा दिया था । यह तर्कविज्ञान का युग था हर चीज को तर्क व विज्ञान की कसौटी पर कसा जाता था   यह पूंजीपति वर्ग प्रगतिशील था, क्रांतिकारी था । पूंजीपति वर्ग ने 18 वी सदी में  ( आज से सवा दो सौ साल पहले )यह सब  कर दिखाया था । उसने जनता पर चर्च व  धर्म के प्रभुत्व व हस्तक्षेप को ध्वस्त कर दिया । सामंतों , दैवीय इच्छा का प्रतिनिधि कहलाने वाले राजाओं को  इतिहास के कूड़ेदान में फैक दिया ।  सामंती मूल्यमान्यताओं को ध्वस्त कर दिया था । जनता की प्रजा जैसी स्थिति को खत्म कर नागरिक की स्थिति में ला दिया जिसके सीमित अधिकार थे ।
            लेकिन उसके सत्तर अस्सी साल बीतते बीतते पूंजीपति वर्ग की प्रगतिशील भूमिका समाप्त हो गई । अब यह प्रतिक्रियावादी हो चुका था । अब यह उन सामंती मूल्य मान्यताओ व धार्मिक प्रतीको प्रतिबिंबों व धर्म को पुन:  स्थापित कर रहा था । जिसे इसने एक कोने में सिमटने को मजबूर कर दिया था । ब्रिटिश शासकों ने भारत को अपने शिकंजे में रखने व भारतीयों के विरोध से निपटने के लिए  यही तरीका अपनाया । इन्होने भारतीय समाज का सांप्रदायिकरण किया । 1925 गुजरते गुजरते हिन्दू व मुस्लिम सांप्रदायिक संगठन वजूद में आ गए थे । अंग्रेज़ इस  सांप्रदायिकरण को अपने अंतिम दिनों तक बढ़ाते गए थे ।
             अंग्रेजी हुकूमत ने जिस पूंजीवाद के बीज यहाँ बोये थे उसने भारत में आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन के साथ नए वर्गो व तबकों को पैदा किया था साथ ही  लगातार संकटों को जन्म दिया था । जिससे  चारों ओर असुरक्षा तनाव हताशा व प्रतिस्पर्द्धा  का वातावरण  बन गया था । इन पस्थितियों में ही सांप्रदायिकता का जन्म हुआ  इसी प्रक्रिया में हमने यह देखा कि 1870 के आस पास हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिकता बहुत ही न्यून रूप में मौजूद थी । हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिक संगठन अपनी  तमाम कोशिशों के बावजूद  आंदोलनों के दौर में अपनी समाज में जड़ नहीं पकड़ पाते थे । अपने में सिमट कर रह जाने को मजबूर हो जाते थे । हालांकि इनका मकसद आंदोलनों को कमजोर करना ही होता था । प्रथम विश्व युद्ध के बाद हिंदुस्तान में  देश की आज़ादी के आंदोलनों( राष्ट्रवादी आंदोलनों )  की जो लहर आई उसमें सांप्रदायिकता के लिए गुंजाइश नही थी ।
            ब्रिटिश  साम्राज्यवाद  से मुक्ति की चाहत में जो राष्ट्रवादी आंदोलन ज्वार भाटा की तरह आते थे उस दौरान जनता में उम्मीदों ,उमंगों व सृजनात्मक ऊर्जा का संचार होता था इसलिए संभव नहीं था कि सांप्रदायिक संगठन अपना आधार बढ़ा पाते । लेकिन अलग अलग कारणों से जैसे ही आंदोलन कमजोर पड़ता था या पीछे हटता था वैसे वैसे समाज में नाउम्मीदी , हताशा , तनाव , असुरक्षा व अविश्वास का माहौल बन जाता था । इस दौरान ही सांप्रदायिक संगठनों  के लिए मौका होता था कि अपने आपको सही ठहराते हुए समाज में अपनी जडों को फैलाएँ । इसी का नतीजा होता था कि सांप्रदायिक दंगे भड़क जाते थे । इनका फैलाव पहले से ज्यादा हो जाता था ।
            यही स्थिति हमें आज़ादी के बाद भी देखने को मिलती है । आज़ादी के तीन साल बाद गणतन्त्र घोषित होने यानी सन 1950 से 1960 के 11 सालों  के दौरान  देश में कुल 351 लोग मारे गए थे तथा 3488 लोग घायल हुए थे जबकि सन 1961 से 1971 के बीच 11 वर्षों में 3 हज़ार से ज्यादा लोग मारे गए । यानी लगभग 800 % बढ़ोत्तरी । यही दौर शिव सेना की पैदाइश का भी है ।
            1950 से से 1960 का काल यदि हम ध्यान दें तो यह दौर भारत को गणतन्त्र घोषित करने का था धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाया गया , सार्विक मताधिकार की व्यवस्था की गई  । पूंजीवादी विकास के रास्ते पर ब*ढ़ाने के लिए सरकार ने कल्याणकारी राज्य के निर्माण की ओर कदम बढ़ाए गए । योजना आयोग का गठन किया गया  , पंचवर्षीय  योजना लागू की गई । यह भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का काल था । समाज में एक हद बेरोजगारी व अन्य समस्याए  मौजूद थी लेकिन यह संकट तीखा नहीं था । और इससे बढ़कर यह कि सांप्रदायिकता का वाहक मध्यम वर्ग समृद्ध हुआ था ।  इसलिए सांप्रदायिक विचारों के फैलने व दंगे होने की गुंजाइश काफी कमजोर थी । 
             60 के बाद धीमे धीमे अर्थव्यवस्था संकट की ओर बढ़ने लगी । 65-66  में खाद्यान्न संकट  भी छा गया ।  बेरोजगारी व महंगाई गरीबी आदि बढ़ने लगी । समाज में फिर असुरक्षा ,तनाव व गलाकाटू प्रतिद्वंदीता  की स्थिति पैदा हो गई । सामाजिक असंतोष बढ़ने लगा । जनांदोलन फिर तेज होने लगे । यह स्थिति सांप्रदायिक संगठनों को खुश करने वाली थी । हिन्दू मुस्लिम सांप्रदयिक संगठनों के फैलने के लिए माहौल था ।  इसी दौर में चीन व पाकिस्तान के खिलाफ हिटलर व मुसोलिनी की भारतीय औलाद संघ जनसंघ ने अंधदेश भक्ति का उन्माद पैदा कर समाज में अपनी घुसपैठ काफी ज्यादा बना ली  थी । इस दौर में बड़े बड़े दंगे हुए ।
            लेकिन पूंजीपति वर्ग की अर्थव्यवस्था का यह संकट और तीखा होता जा रहा था । फिर एक बार कॉंग्रेस समाजवादगरीबी हटाओ की लफ्फाजी करते हुए सत्ता पर पहुँच गई । इस संकट ने तीखे राजनीतिक व सामाजिक संकट को जन्म दे दिया था । देशव्यापी हड़तालें ,व जनांदोलनों का सिलसिला फिर लहरों की तरह उफान पर आ गया । इससे निपटने के लिए तानाशाही देश में लागू कर दी गई । इसके विरोध के नाम पर हिन्दू मुस्लिम सिक्ख सांप्रदायिक संगठन एक ही छत “जे पी आंदोलन”  के नीचे आ गए । यह संकट चुनाव में कॉंग्रेस को भी निगल गई । अब जनता पार्टी व सांप्रदायिक पार्टी जनसंघ ने मिलकर सरकार बनाई ।  जनसंघ के सत्ता में पहुचने के बाद संघ के लिए बेहतरीन अवसर था कि वह बड़े स्तर पर समाज का सांप्रदायिकरण करे । सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस वक्त संघियों के कब्जे में ही आ गया । शिक्षा व्यवस्था व मीडिया के सांप्रदायिकरण  में संघियों ने भरपूर कोशिश की । वर्ष 1978 में “विद्या भारती अखिल भारतीय  शिक्षा संस्थान ”की स्थापना की गई थी । उद्योगपतियों ने इनके स्थापना में भरपूर मदद की थी । वर्ष 1998 तक  मिजोरम को छोड़ सारे ही प्रदेशों में ये शिक्षा संस्थान फैल चुके थे । इस संस्था के 14000 स्कूल थे जिनमें 18 लाख छात्र पढ़ रहे थे ।  इन अलग अलग नामों वाले स्कूलों में इतिहास की साम्प्रादायिक व्याख्याके दम पर छात्रों को अपने सांप्रदायिक औज़ार के रूप में ढाला जा रहा है ।
            1980 के बाद तो संकट फिर गहराने लगा ।  इससे निपटने के लिए हमारे हुक्मरानों ने लूटेरे साम्राज्यवादी मुल्कों से गठजोड़ कायम करने की ओर कदम बढ़ाए । गहराते संकट के इस दौर में जब इंदिरा गाधी की हत्या हो गई तो “छद्म धर्मनिरपेक्षता” का चोला पहने कॉग्रेसियों ने इसे भी उतार फैका था । तब सांप्रदायिक उन्माद खड़ा कर सिखों का कत्लेआम किया गया था । जबकि इसके बाद 90 के दशक के करीब आते आते जब अर्थव्यवस्था गहरे संकट में फस गई । तब इस दौर में साम्प्रादायिकता काफी बड़े  स्तर पर पहुँच गई । यह व्यापक हो गई थी । हिन्दू सांप्रदायिक संगठनों ने व्यापक स्तर पर केन्द्रीय मुद्दे “राम मंदिर निर्माण” के इर्द गिर्द सांप्रदायीकरण करने में सफलता हासिल की थी । सांप्रदायिक विभाजन का अब तक का यह सबसे चरम था । इसके नतीजे के बतौर भाजपा के सीटों में काफी बढ़ोत्तरी हो गई वह मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभर गई । 84 के चुनावों में मात्र दो सीट हासिल करने वाली भाजपा 91 के चुनावों में 120 सीट हासिल कर लेती है ।
            यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि 90 के दशक में पूंजीपति वर्ग को संकट से उबारने के लिए नई आर्थिक नीति ” लागू की थी । इसे बहुत धीमी गति से लागू किया गया । जिसका नतीजा यह हुआ कि धीमे धीमे विकास दर बढ़ने लगी । 2004-09 में यह आज़ादी के बाद से अब तक की सबसे तेज दर थी । लेकिन अर्थव्यवस्था का यह विकास रोजगार विहीन था । इसलिए रोजगार का संकट आंशिक कमी के बावजूद बना रहा । इसी दौर में सांप्रदायिकरण बेहद व्यापक हो गया था । 90 के दशक के बाद निजीकरण-वैश्वीकरण के नारे व नीतियों ने समाज को बड़े संकट की ओर धकेला । ये संकट ही संघ को सत्ता तक पहुचने में मददगार साबित हुए ।  इसी दौर में गुजरात में हिन्दू सांप्रदायिकता  फासीवाद के रूप में प्रकट हुयी जिसके तहत मुस्लिम अल्पसंख्यकों का नरसंहार किया गया । इसके बाद  संघ ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और तेज़ करने के लिए नए नए तरीके ईजाद किए हैं । मुस्लिम वेश धारण कर आतंकवादी गतिविधियों को भी अंजाम दिया गया ।
            भारतीय अर्थव्यवस्था के संकट के अब और गहराने के आसार बन गए थे जब 2008 में दुनिया में छाई आर्थिक मंदी की गिरफ्त में भारत भी आ गया और खुद भारत सरकार को भी इस सच्चाई को स्वीकार करना पड़ा । इससे बेरोजगारी व महंगाई का संकट फिर तीखा होने लगा । यह स्थिति अब और गंभीर होते जा रही है । जो कि सांप्रदायिक ताकतों विशेषकर संघ परिवार के लिए और ज्यादा मुफीद है ।
            सांप्रदायिकता के संदर्भ में एक और बात है जो गौर करने के लायक है  वह यह कि  90 के दशक के बाद  सांप्रदायिकता की स्थिति में काफी फर्क आ गया है । जहां इससे पहले के काल में समाज में सांप्रदायिक मन: स्थिति कुछ खास वक्त के लिए बनती थी । ऐसा तनाव या दंगे के रूप में यह प्रकट होता था । लेकिन तनाव या दंगों के निपटने के कुछ समय बाद ही फिर कुछ फर्क के साथ पुरानी स्थिति बहाल हो जाती थी । जबकि  90 के दशक या उसके बाद के काल दिखाते है कि सांप्रदायिक सोच या मन:स्थिति एक हद तक स्थिरता ग्रहण कर चुकी है । समाज में अब दंगे व्यापक हो गए हैं एक ओर इनकी आवृत्ति बहुत बढ़ गई है तो दूसरी ओर वीभत्स घटनाओ की विशेषकर महिलाओं के खिलाफ तादाद भी बढ़ गई है । सबसे बड़ी  चीज यह कि  हिन्दू सांप्रदायिकता अपने फासीवादी रूप में आ चुकी है ।
             सांप्रदायिकता के सम्बन्ध में यह कहना भी सही होगा कि पूंजीवादी संकटों के दौर में क्रांतिकारी धारा या संघर्षों के कमजोर होने या मेहनतकश जनता के सामने  सही विकल्प न होने की स्थिति से सांप्रदायिकता उसी अनुपात में फैलती व मज़बूत होते गई है ।  
सांप्रदायिकता विरोधी मुहिम की दिशा :
             सांप्रदायिकता विरोधी मुहिम की दिशा क्या हो ? यह बेहद महत्वपूर्ण सवाल है । सांप्रदायिकता के इतिहास व इसको जन्म देने वाली आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक पृष्ठभूमि पर गौर करने के बाद  इसके विरोध में संघर्ष की सही दिशा अपनाने  के संबंध में बनती है । निश्चित तौर पर स्पष्ट सैद्धान्तिक समझदारी हासिल करने के बाद जो चीज निर्णायक है वह व्यवहार संबंधी है या कहें कि इस सैद्धान्तिक समझदारी की रोशनी में ही निकले कार्यभारों को व्यवहार में दृढ़तापूर्वक लागू करने की है ।  मौजूदा वक्त में जिस प्रकार से हिन्दू सांप्रदायिकता फासीवाद की ओर अग्रसर है उससे जो गंभीर खतरा  है और उसके उलट अलगाववाद व कट्टरपंथ के रूप में मुस्लिम, सिक्ख या ईसाई अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता भी एक खतरे के रूप में मौजूद हैं ।
            सबसे पहला व तात्कालिक  कार्य भार इसमें यही बनता है कि इनके द्वारा जो जहर समाज में फैलाया जा रहा है और दंगों के आयोजन के रूप में जो चुनौती दी जा रही है  उसको स्वीकार करते हुए इसके खिलाफ सही राजनीतिक जमीन पर खड़े होकर जनता को इनके जहर से बाहर निकालने की जरूरत बनती है जाहिर है ऐसा केवल उनमें वर्ग बोध या वर्गीय चेतना पैदा करके ही किया जा सकता है । साथ ही बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को निशाना प्रमुखता से बनाया जाना चाहिए ।
            प्रगतिशील ताक़तें चाहे वह किसी भी मजहब के हो उनके बीच एकजुटता कायम करने की जरूरत बनती है और एक व्यापक मोर्चा बनाए जाने की जरूरत बनती है जो सांप्रदायिकता विरोधी हों । समाज के हर तबके व वर्ग के बीच यह भी प्रचारित करने की बेहद जरूरत है कि सांप्रदायिकता ना केवल एक धर्म के खिलाफ है  बल्कि यह एक ही धर्म की शासित  जनता के खिलाफ है महिलाओं  व दलितों के खिलाफ भी  है ।  साथ ही इसके फासीवादी  स्वरूप को उजागर करने की जरूरत बनती है ।  
            चुकी भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता का प्रावधान है इसलिये इस बात के लिए भी संघर्ष किए जाने की जरूरत बनती है कि यह सही मायने में धर्मनिरपेक्ष हों । राज्य की सारी ही सस्थाओं को धर्मनिरपेक्ष बनाए  बगैर सांप्रदायिकता से नहीं निपटा जा सकता है  शिक्षा व्यवस्था में किए गए सांप्रदायिकरण को प्रतिबंधित किए जाने की जरूरत है साथ ही इंसान को सांप्रदायिक औज़ार के रूप में ढालने वाली शिक्षण सस्थाओं को ध्वस्त किए जाने की जरूरत है ।  शिक्षा व्यवस्था में  तार्किक , वैज्ञानिक  सोच व चिंतन को बढ़ावा देने वाली तथा सामाजिक सरोकारों व संवेदनशीलता को बढ़ाने वाली अध्ययन सामग्री की दरकार बनती है     सभी प्रकार के प्रचार माध्यमों में किसी भी प्रकार के साम्प्रदायिक प्रचार को प्रतिबंधित करने की मांग के लिए भी संघर्ष बंनता है ।
            सांप्रदायिकता के संबंध में यह बात ठीक है कि  इसमें सांप्रदायिक व कट्टरपंथी संगठनों की ही मुख्य भूमिका रहती है लेकिन दूसरी बात भी उतनी ही ठीक है कि अन्य पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां जो कि  छद्म धर्मनिरपेक्षता की चादर ओड़े हुए है इसलिए इनके इस नरम हिन्दुत्व को उजागर किए जाने की जरूरत है इनके नकाब को उतारने की जरूरत  है ।
            पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों व राज्य के अन्य प्रतिनिधियों द्वारा सर्व धर्म समभाव के रूप में धर्मनिरपेक्षता को प्रस्तुत किया जाता है इसे उजागर करने की जरूरत बनती है । धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को स्थापित करने की जरूरत बनती है ।        
            अंत: में इस बात को रेखांकित करके कि सांप्रदायिकता पूंजीवाद की प्रतिक्रियावादी दौर की राजनीति है  आज का पूंजीवाद मरता हुआ सड़ता हुआ पूंजीवाद है  इसका यह अर्थ भी है कि अब जब तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है तब तक इस समस्या से जूझते रहना पड़ेगा ।  अब पूंजीवादी व्यवस्था में कोई भी प्रगतिशील चीज नहीं बची है अपने उदित होते दौर में जिस पूंजीवाद व पूंजीपति वर्ग ने धर्म व सामंती मूल्य मान्यताओं पर प्रहार कर  इसे कूड़ेदान में फैक दिया था  वक्त गुजरते गुजरते अपने मरणासन्न दौर में  आज यह ठीक इन्हीं चीजों का भरपूर इस्तेमाल करते हुए समाज विकास की गति को पीछे के ओर धकेलने की कोशिश कर रहा है । जिसका नतीजा तरह तरह के सामाजिक संकटों के रूप में है ।  इसलिए  सांप्रदायिकता का सही व मुकम्मल जवाब भी यहीं से दिया जा सकता है यह जवाब समाजवाद के निर्माण के दम पर ही हो सकता है और यह मुकम्मल जवाब मजदूर वर्ग की राजनीति के दम पर ही संभव है । मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवाद की दिशा में चल रहे संघर्ष में  अलग वर्गों व तबकों की भूमिका बनाकर ही यह किया जा सकता है ।  
             सांप्रदायिकता विरोधी संघर्ष में फौरी तौर पर निम्न मागों  के इर्द गिर्द संघर्ष करने  की जरूरत बनती  है :
                        1: मुजफ्फरनगर दंगे को आयोजन में भूमिका अदा करने वाले सपा, बसपा, कॉंग्रेस व भाजपा आदि के विधायकों सांसदों व अन्य लोगों को अविलंब गिरफ्तार करो व इनके खिलाफ नरसंहार  का मुकदमा चलाया जाय । 
                        2 : हर तरह के सांप्रदायिक प्रचार पर रोक लगाओ । हर प्रकार की साम्प्रदायिक प्रचार साहित्य के लिए दोषी लोगों को अविलंब कड़ी सजा दो ।
                        3 : साम्प्रादायिक संगठनों  व पार्टियों पर प्रतिबंध लगाओ ।
                        4:  सांप्रदायिक दंगों को आयोजित करने या उसमें शामिल होने वाले व्यक्ति के लिए  हर प्रकार के चुनाव प्रतिबंधित  हों ।
                        5 : राज्य द्वारा धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन बंद हो तथा इनके उदघाटन में जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक अधिकारियो की भागीदारी प्रतिबंधित हो व उल्लंघन होने पर कड़ी सजा हो ।
                        8: टी वी चैनलों पर चलाये जा रहे नाटक या अन्य विधाएँ जो कि समाज में अंधविश्वास धार्मिक पाखंड को बढ़ावा देती है  उस पर रोक लगे ।
                        9 : राज्य की हर संस्थानो द्वारा शुभ कार्य के नाम पर धार्मिक पद्धति से कर्मकांड पर रोक लगे । इसका उल्लंघन करने पर कड़ी सजा हो ।
                        10: शिक्षा व्यवस्था में भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाले पाठ्यक्रम पर रोक लगे । अंधविश्वास व धार्मिक पोंगापंथ को बढ़ावा देने वाले पाठ्यक्रम पर रोक लगे । इसकी जगह पर तार्किक व वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने वाली पाठ्यक्रम पर ज़ोर दिया जाय ।

तथ्यात्मक स्रोत :  1:  communal riots : facts and myths राम पुनियानी   2 : सांप्रदायिकता –ए ग्राफिक एकाउंट : राम पुनियानी एव शरद शर्मा   3: भारत में सांप्रदायिकता – इतिहास और अनुभव : असगर अली इंजीनियर  4: साम्राज्यवाद का उदय और अस्त : अयोध्या सिंह  5 : आज का भारत : रजनी पाम दत्त 5 : गोधरा और गुजरात : सुभाष झा 6 : सांप्रदायिक फासीवाद –प्रतिरोध की रणनीति : कौमी एकता मंच (  हरियाणा ) 7 : आधुनिक भारत में विचारधारा और राजनीति – बिपन चंद्र 8: ड़ी ड़ी कौशांबी

प्रसिद्ध जनपक्षधर साहित्यकार मूशी प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता के संबंध में मशहूर कथन मौजूदा वक्त में बेहद प्रासंगिक हो जाता है : --- “सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है । उसे अपने असली रूप में आने में शायद लज्जा आती है इसलिए वह उस गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढकर जंगल के सभी जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खाल ओढ़कर आती है ।”

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