Friday, 15 December 2017

काकोरी के शहीदों की स्मृति में

    
         





     काकोरी के शहीदों की स्मृति में
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   अशफाक-बिस्मिल की विरासत को आगे बढ़ाओ!

 
         हर साल का दिसम्बर महिना काकोरी के शहीदों की याद हमें दिलाता है।  काकोरी के शहीदों का एक संगठन था - ' हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन'( एच आर ए ) ।  जिसका मकसद था  -संगठित व हथियार बंद होकर अंग्रेजी हुकूमत से देश को आज़ाद कराना ; आज़ाद भारत को 'संघीय व धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र ' बनाना जिसमें सभी प्रकार के  लूट-शोषण पर पाबंदी हो, कोई गैरबराबरी ना हो , भेदभाव ना हो।
   इस संगठन को आगे बढ़ाने के लिए, हथियार खरीदने के लिए पैसे की भी बहुत जरूरत थी । इसलिए संगठन ने तय किया कि सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में जाने वाले सरकारी खजाने को लूट लिया जाय। और फिर 9 अगस्त 1925 को लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन के पास ट्रेन लूट ली गई। फिर अंग्रेज सरकार लूट में शामिल लोगों को पकड़ने के लिए दिन रात एक करने लगी। 40 लोग गिरफ्तार किए गए  फिर 17 लोगों को सजा सुनाई गई । इनमें से 4 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। 17 दिसम्बर 1927 को राजिंदर लाहिड़ी को फांसी दे दी गई । 19 दिसम्बर 1927 को अशफाक उल्ला खां, रोशन सिंह ,रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी दे दी गई।
यह वह दौर था जब कॉंग्रेस भी 'आज़ादी'का नारा लगा रही थी। कांग्रेस भारतीय पूंजीपतियो व जमींदारों की पार्टी थी । ये  चाहते थे अंग्रेज चले जाएं और सत्ता इनके  हाथ में आये। इन्ही को शहीद भगत सिंह ने "काले अंग्रेज" कहा था।
  दूसरी ओर अंग्रेजों की 'फुट डालो-राज करो' तेजी से आगे बढ़ रही थी। अंग्रेजों को याद था -1857 का पहला स्वतन्त्रता संग्राम । जिसमें हिन्दू-मुस्लिम के एकजुट संघर्ष ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थी। हिन्दू-मुस्लिम जनता की एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजो ने हर चाल चली। हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इनके हथियार बन गए। मुस्लिम लीग, आर-एस-एस व हिन्दू महासभा जैसे साम्प्रदायिक संगठन उसी समय के हैं ।
अशफाक-बिस्मिल जैसे नौजवान हिन्दू-मुस्लिम एकता की भी मिसाल थे। अशफ़ाक़ मुस्लिम थे तो बिस्मिल हिन्दू।  अशफ़ाक़-बिस्मिल-रोशन-लाहिड़ी को अंग्रेजी हुकूमत ने षडयंत्र रचने के आरोप में फांसी दे दी । लेकिन इनके बलिदान ने देश में संघर्ष को क्रांति को और आगे बढ़ा दिया । भारी तादाद में खासकर नौजवान आज़ादी के संघर्ष में कूद पड़े। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पूरे देश में नफरत व गुस्सा बहुत बढ़ गया। मज़दूरों-किसानों-नौजवानों के क्रांतिकारी संघर्षों की लहरें बढ़ते गई। औऱ फिर हुआ यह कि अंग्रेज देश के पूंजीपतियों-जमींदारों (काले अंग्रेजों)  को सत्ता सौंप कर चल दिए। इनकी पार्टी 'कांग्रेस पार्टी' की सरकार बन गयी।
तब से बीते 60-70 सालों में कांग्रेस के अलावा अन्य पार्टियों की सरकारें भी बनी है या वे सरकार बनाने में शामिल रही है अब तो तीन साल से मोदीमय भाजपा बहुमत से सरकार चला रही है। 
 इन सभी पार्टियों ने देश के बड़े बड़े पूंजीपतियों के हितों को ही आगे बढ़ाया है। चंद करोड़ रुपये की पूंजी के मालिक 70 सालों में कई लाख करोड़ की पूंजी के मालिक बन चुके है। अब इनमें अम्बानी-अडानी-पतंजलि-अज़ीमप्रेम ज़ी आदि भी शामिल हैं।
उद्योगपतियों (पूंजीपतियों)व उनकी पार्टियों के बीच पहले एक पर्दा जो लगा रहता था मोदी जी व उनकी सरकार ने इसे भी फैंक दिया है। आज हर कोई कह सकता है देश को अम्बानी-अडानी चला रहे है कि मोदी सरकार अम्बानी -अडानी की सरकार है।  बैंकों का 8-12 लाख करोड़ रुपए कर्ज फंसा हुआ है इसका बड़ा हिस्सा देश के 8-10 पूंजीपतियो के पास है ये इसे वापस नहीं लौटा रहे है। मोदी जी व उनकी सरकार की योजना है कि इस कर्ज की रकम को बट्टा खाते में डाल दिया जाए। वसूली या संपत्ति को जब्त करने के बजाय सरकार 2 लाख करोड़ रुपए बैंकों में डालेगी। साफ है आम जनता की मेहनत की लूट से इसे वसूला जाएगा। यही नही ! बैंकों में जनता की जमा रकम पर डकैती डालने के लिए नया कानून एफ.आर.डी.आई. बनाया जा रहा है।
 मोदी व मनमोहन की नीतियों में कोई फर्क नहीं है। मोदी सरकार मनमोहन सरकार की नीतियों को धड़ल्ले से आगे बढ़ा रही है। आधार कार्ड , जी एस टी ये कांग्रेस के जमाने की ही चीजें थी। मोदी जी व भाजपा   पहले इनका खूब विरोध करते थे। लेकिन सत्ता हासिल होते ही जी.एस.टी लागू कर दिया जबकि आधार कार्ड हर नागरिक के लिए अघोषित तौर पर अनिवार्य कर दिया गया है।
नोटबंदी के लिए मोदी सरकार ने कहा था कि 4-5 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आएगा । क्योकि इनके हिसाब से 4-5 लाख करोड़ रुपये काला धन  था। लेकिन 1 करोड़ लोगों के बेरोजगार होने, 100 से ज्यादा लोगों की मौत व चौतरफा नुकसान के अलावा क्या हासिल हुआ ? कुछ भी नहीं। 16000 करोड़ रुपए हासिल हुए लेकिन इससे काफी ज्यादा पैसा तो नोट छापने व लोगो को व्याज देने में चला गया। इस नोटबंदी के दौरान दौलत किसकी बढ़ी ? अम्बानी से लेकर पतंजलि तक की । देश के 10 शीर्ष पूंजीपतियों की पूंजी में 50% से लेकर 170% तक की वृद्धि  हो गई।
सचमुच  हालात और खराब होते जा रहे हैं। 'फुट डालो-राज करो' अंग्रेजी हुकूमत के नारे को आज जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। आज 'महंगाई' 'रोज़गार'  'महंगी शिक्षा' 'महंगे इलाज' और अधिकारों के सवाल गायब कर दिए गए है। आज मेहनतकश जनता के एक हिस्से को मेहनतकश जनता के दूसरे हिस्से के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है। एक दूसरे के खिलाफ नफरत की दीवार खड़ी की जा रही है। आज हर तरफ 'गाय' 'हिन्दू' 'मुस्लिम' 'बीफ' 'राम मन्दिर' का शोर है। कोई क्या पहनेगा , क्या खायेगा , क्या पसंद करेगा, किसकी व कितनी आलोचना करेगा ? यह सब भी सरकार  उसकी पार्टी व संगठन तय कर रहे हैं। कुल मिलाकर फ़ासिस्ट हिटलर की चाल आज देश में दोहराई जा रही है। जर्मनी के थाइसेन व क्रूप्स जैसे बड़े बड़े पूंजीपतियो ने हिटलर व नाज़ी पार्टी को पाला पोसा था । फिर 1933 में सत्ता पर बिठा दिया । हिटलर ने प्राचीन जर्मन देश के महान होने के बात की ; जर्मन नस्ल के महान होने की बात जनता में की। यहूदी लोगों के खिलाफ नफरत पैदा की व दंगे आयोजित किये।  जर्मन जनता का एक हिस्सा इन बातों को सच मानने लगा । वह हिटलर व नाज़ी पार्टी के साथ हो लिया। फिर हिटलर के राज में लाखों यहुदियों का क़त्लेआम किया गया; ट्रेड यूनियनों, संगठनों, मज़दूरो,किसानों व छात्रों पर जानलेवा हमले किये गए । जनता के अधिकारों को रौंद दिया गया। यही नही हिटलर की पार्टी व दस्ते के बहुत सारे लोगों का भी सफाया कर दिया । चुनाव खत्म हो गए। इस प्रकार हिटलर ने आतंकी तानाशाही कायम कर दी ।
   आज यही खतरा एकदम हमारे निकट भी है । देश के बड़े बड़े पूँजीवादी घराने उसी दिशा की ओर बढ़ रहे है। जिस दिशा की ओर कभी जर्मनी गया था।
 इसलिए आज जरूरत है काकोरी के उन शहीदों से प्रेरणा लेने की ; एकजुट होकर संघर्ष करने की जिन्होंने महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। जरूरत है मेहनतकश जनता को बांटने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट हुआ जाए। मेहनतकश जनता के राज समाजवाद की ओर बढ़ा जाए।

           

Friday, 10 November 2017

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति शताब्दी वर्ष पर

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति शताब्दी वर्ष पर
यह वक्त संकल्प लेने, काम में जुट जाने का है
    
      ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के सौ वर्ष पूरे हो गये। पिछले एक वर्ष से भारत सहित पूरी दुनिया में इस क्रांति के शताब्दी वर्ष को न केवल मजदूर वर्ग द्वारा याद किया गया बल्कि पूंजीपति वर्ग द्वारा अपने ही ढंग से याद किया गया। यहां तक कि रूस के आज के साम्राज्यवादी शासकों ने भी क्रांति को रूसी समाज की एक उपलब्धि के रूप में याद किया। इसे याद करने में कुछ ऐसा है जैसे कोई मौत के मुंह से बच गया हो।
        ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ बीसवीं सदी की सबसे निर्णायक घटनाओं में ही एक नहीं थी बल्कि यह मानव इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से भी एक साबित हुई है। इस क्रांति ने साबित कर दिया था कि शोषित मजदूर, किसान अपनी सत्ता कायम कर सकते हैं और शोषण-उत्पीड़न का समाज से नामोनिशान मिटा सकते हैं। इस क्रांति ने न केवल कई क्रांतियों को जन्म दिया बल्कि गुलाम देशों को अपनी आजादी हासिल करने में पे्ररणा से लेकर सीधी मदद की।
     ‘महान अक्टूबर क्रांति’ ने रूस के जनगण को वह सब कुछ दिया जो कि फ्रांसीसी या इंग्लिश या अमेरिकी क्रांति ने अपने नागरिकों से वायदा किया था। यह इतिहास की सच्चाई है आजादी, बराबरी, भाईचारे आदि की बातें करने वाली ये क्रांतियां महज पूंजीपति वर्ग की सत्ता प्राप्ति का जरिया बन गयीं। क्रांति में प्राण-प्रण से लगने वाले मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी ठगे और छले गये। इसके उलट अक्टूबर क्रांति ने पहले ही क्षण आजादी, बराबरी, भाईचारे के नारे को पूर्णता प्रदान कर दी। फिनलैंड को जारशाही साम्राज्य से आजाद किया, सदियों से उत्पीड़ित स्त्रियों को पूर्ण बराबरी प्रदान की और समाजवादी रूस में सभी शोषित-उत्पीड़ित भाईचारे के अभिनव सूत्र में बंध गये।    
       ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ का विजय रथ आगे न बढ़ सके इसके लिए उस वक्त के जालिम शोषकों ने हर कोशिश की। फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और जर्मनी जैसे देशों ने रूस में कायम हो चुकी मजदूर-किसान सत्ता को नष्ट करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। वर्षों समाजवादी राज्य को देशी-विदेशी शत्रुओं से भीषण लड़ाई लड़नी पड़ी। शोषक किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि रूस में समाजवाद कायम हो। साम्राज्यवादी भयभीत थे कि कहीं उनके घर भी क्रांति की आग से न जल जायें।
        हकीकत में 1918 में यूरोप के कई देशों में ऐसा हुआ भी था। जर्मनी, हंगरी, इटली और आस्ट्रिया उन देशों में प्रमुख थे जहां मजदूर क्रांतियां दस्तक दे रही थीं। ‘सारी सत्ता सोवियतों को दो’, ‘समाजवाद जिंदाबाद’ जैसे नारे गली-गली में लगाये जा रहे थे। क्रांतियों की इस श्रृंखला का दमन पूंजीपति वर्ग भारी दमन व षड्यंत्रों के दम पर ही कर पाया। सौ वर्ष पहले मजदूरों ने शोषक पूंजीपतियों को दिन में ही तारे दिखा दिये थे। इसलिए क्रांतियों की काट करने के लिए उसने फासीवाद, नाजीवाद का सहारा लिया। इसीलिए वह अब जैसे ही संगठित क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन का थोड़ा भी दर्शन करता है तो पूरी ताकत से बर्बरता पर उतर आता है। वह अपने संविधान को ताक पर रखकर तुरंत आपातकाल की घोषणा करने लगता है। लोकतंत्र, मानवाधिकार, प्रेस सभी निलंबित कर दिये जाते हैं।
       ‘महान अक्टूबर क्रांति’ से पैदा हुई ऊर्जा का विश्वव्यापी प्रसार पूंजीवाद के सारे हथकंडों के बावजूद उस जमाने में तेजी से हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के बाद तो समाजवाद शब्द हर आजाद देश की जुबान पर चढ़ गया। चीन, कोरिया, वियतनाम की क्रांतियों ने समाजवाद को एक नई जमीन प्रदान की। यह ‘महान अक्टूबर क्रांति’ की प्रेरणा और मदद से ही संभव हो सका था।
       इतिहास की गति देखिये सौ वर्ष पूर्व दुनिया में कहीं समाजवाद नहीं था और आज सौ वर्ष बाद भी दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। सौ वर्ष पूर्व पूंजीपति वर्ग अपनी सत्ता को लेकर पूर्ण आश्वस्त था आज वह अक्सर समाजवाद, मार्क्सवाद की चर्चा उपहास उड़ाने के लिए करता है। फिर क्या क्रांतियां अतीत की बात हो गयी हैं? क्या क्रांतियों का युग बीत चुका है?
     सच्चाई एकदम उलट है। क्रांतियां प्रकृति से लेकर मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे लीक से हट कर होती हैं। और अपने चरित्र में वे सर्वदा अनुपम होती हैं। वे जब जन्म ले और विकसित हो रही होती हैं तब शोषक उनसे अंजान और लापरवाह बने रहते हैं। जब वे प्रकट होती हैं तो शोषक हक्के-बक्के और बदहवास हो जाते हैं। सौ वर्ष पूर्व जार, पूंजीपति जमींदारों ने कभी नहीं सोचा था कि उनके दिन पूरे हो चुके हैं। आगे बढ़े हुए, क्रांति कर्म में लगे मजदूरों ने नहीं सोचा था कि क्रांति के जरिये मुक्ति हासिल की जा सकती है। क्रांति उतनी ही सच साबित होती गयी जितना उसको लाने के लिए सारी मजदूर, किसान बहुसंख्यक आबादी काम करने लगी।
      ‘महान अक्टूबर क्रांति’ का सौवां वर्ष इस क्रांति को याद करने, सबक निकालने, संकल्प लेने का वर्ष है। पूंजी की गुलामी से मुक्ति की राह आसान नहीं है। पिछले सौ वर्षों में पूंजीपति वर्ग ने अपनी व्यवस्था की दीर्घजीविता के लिए बहुत सबक निकाले हैं। बहुत युक्तियां खोजी हैं। दुश्मन पहले से ज्यादा बलवान हुआ है पर महान अक्टूबर क्रांति हमें सिखलाती है कि इतिहास में सबसे बड़ी ताकत मजदूर, किसान है, जनता है। क्रांतिकारी जनता के सामने हर ताकत बौनी है। शासकों की सारी तिकड़में, युक्तियां उसके सामने फेल हैं।।    साभार -enagrik.com

Friday, 6 October 2017

बी एच यू की छात्राओं का संघर्ष और उसके निहितार्थ

बी एच यू की छात्राओं का संघर्ष व इसके निहितार्थ

     बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की छात्राओं ने सितंबर माह के तीसरे हफ्ते में अपना संघर्ष शुरू किया था। यह संघर्ष सामान्य से असामान्य हो गया।
एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न की घटना हुई। इसके विरोध में तत्काल ही छात्राएं एकजुट हुई। प्रॉक्टर से शिकायत हुई, कुलपति से शिकायत हुई। दोनों का ही जवाब तिलमिलाने वाला था पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित था। कुलपति तो संघ परिवार से जो था उसके नस नस में स्त्री विरोधी रुख था। छात्राओं से कहा गया कि होस्टल से 6 बजे के बाद बाहर मत निकलें।
छात्राओं की मांग थी सुरक्षा की, होस्टल परिसर में सी सी टी वी लगाने की। लेकिन इन्हें कुलपति व विश्वविद्यालय प्रशासन ने कान ही नही दिए।
अन्ततः छात्राओं को धरने पर बैठना पड़ा। एक मुद्दा जिसे तत्काल ही सुल्टाया जा सकता था उसे फासिस्ट मानसिकता ने दूसरे धरातल पर पहुंचा दिया।प्रोक्टरीयल बोर्ड के अपने लठैतों भी छात्राओं को डराने धमकाने का काम किया। छात्राओं के परिजनों को फोन के जरिये दबाव बनाने के प्रयास हुए। होस्टल छात्रावास में पानी, बिजली को भी बाधित किया गया। लेकिन संघर्ष में बाकी छात्र-छात्राएं भी शामिल होती गए।
इस दौरान प्रधानमंत्री भी वंहा से होकर गुजरे। आंदोलनकारियों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री महोदय जो कि बनारस के सांसद है कम से कम सांसद होने के नाते तो उनके बीच आएंगे, बात सुनेंगें। लेकिन उम्मीद ! वह भी फासिस्टों से !! इस उम्मीद को पूरा तो होना न था। इस सबने संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम ही किया।
कुलपति, विश्वविद्यालय प्रशासन कुछ भी सुनने को तैयार न था। न ही योगी सरकार कोई हस्तक्षेप कर रही थी। वह भी सब कुछ होने दे रही थी। अंततः सबने मिलकर इस आवाज को खामोश करने के लिए अपने हाथ बढ़ाये।
तुरंत ही भारी तादाद में पुलिस फोर्स व अर्धसैनिक बल तैनात कर दी गई। महिला पुलिस की तैनाती नही की गई। यह सब मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए भी था लेकिन आंदोलन को इसने आगे बढ़ाने का ही काम किया।
साफ साफ तौर पर अब एक तरफ जनवाद, न्याय व प्रगतिशीलता के लिए बुलन्द आवाज थी दूसरी तरफ दमनकारी, जनवाद विरोधी, स्त्रीविरोधी प्रतिक्रियावादी ताकते थी। अन्ततः दमन चक्र चलाया गया। आंदोलन तात्कालिक तौर पर बिखरने के साथ-साथ कुछ हासिल कर गया साथ ही भविष्य के संदर्भो में नई उम्मीदों को भी जगा गया। प्रॉक्टर को इस्तीफा देना पड़ा। कुलपति को प्रकारांतर से हटना पड़ा नए कुलपति को लाना पड़ा। इस संघर्ष के साथ साथ अब यह भी तय हो गया कि आने वाले समय में ऐसी टकराहटें और भी बढेंगी। व्यक्तिगत मसलों पर जनवाद के भाव के चलते ही सही फासिस्ट ताकतों का नौजवान छात्र छात्राएं जबरदस्त प्रतिरोध करेंगी ।


Tuesday, 12 September 2017

4-5 लाख करोड़ रुपये काले धन का मोदी का दावा हवाई साबित हुआ

    
4-5 लाख करोड़ रुपये काले धन का मोदी का दावा हवाई साबित हुआ
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     बेशर्मी-झूठ-धूर्तता में फ़ासीवादी अव्वल होते हैं। यह बात फिर फिर पुष्ट हुई। नोटबंदी के सम्बन्ध में मोदी-जेटली के तर्क व दावे सुपरफ्लॉप हो गए। लेकिन फिर भी इनकी "बेशर्मी जिंदाबाद,झूठ मक्कारी जिंदाबाद" का स्लोगन जारी है। इनका नोटबंदी के लिए सबसे मजबूत तर्क व दावा था कि आर बी आई द्वारा जारी 500-1000 के नोटो का एक मुख्य हिस्सा वापस नही आएगा यानी 4-5 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आएगा, और ये 4-5 लाख करोड़ रुपये इसलिए वापस नही आएगा क्योकि यह काला धन होगा; और फिर इस पर सरकार का दावा होगा ये सरकार का मुनाफा होगा !!!  इसके अलावा कहा गया था जाली नोट की रोकथाम, आतंकवाद पर लगाम लगेगी!!  रिजर्व बैंक ने अब कहा है कि 98.96% नोट वापस आ गए है। अब इन गुजरे 10 माह में साबित हुआ कि नोटबंदी सुपरफ्लॉप रही शायद 1.04% भी वापस आ जाते यदि सरकार ने बाद के दौर में रोक नही लगाई होती ।
आम जनता के लिए तो यह एक त्रासदी से कम नहीं थी। 100 से ज्यादा लोगों की नोटबंदी की सर्जीकल स्ट्राइक ने हत्या कर दी । छोटे उद्योग धंधे के मालिक , कारोबारी का धंधा चौपट हो गया। किसान बर्बाद हुए। मज़दूर बेरोजगार हो गए। बी स्टैंडर्ड के मुताबिक 70 लाख लोग इस दौरान बेकार हो गए।इस तरह आर्थिक गतिविधियों के अत्यधिक संकुचित हो जाने से जी डी पी की दर भी लगभग 2 % तक गिर गई।
आरबीआई ने अपनी सालाना रिपोर्ट में यह कहा है कि नोटबंदी के दौरान महज 41 करोड़ रुपये के जाली नोट पकड़ में आए। कि नोटबंदी के बाद लोगों ने बंद हुए 15.44 लाख करोड़ रुपये में से 15.28 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग प्रणाली में जमा करा दिए। । लगभग 16 हज़ार करोड़ रुपये के नोट वापस नही आये जबकि नए नोटों की छपाई की लागत 7,965 करोड़ रुपये रही। जबकि बैंको में जमा हो चुके कई लाख करोड़ रुपये की रकम पर सोचिए कितना व्याज बैंक को चुकाना होगा !!! यानी चौतरफा बर्बादी !!!
    इस कवायद का असर वित्त वर्ष 2016-17 में सरकार को आरबीआई से मिलने वाले लाभांश पर पड़ा है, जो करीब आधा घटकर 30,659 करोड़ रुपये रहा।
     भा ज पा  का सहयोगी बी एम  एस ने भी नोटबंदी पर कहा है- "असंगठित क्षेत्र की ढाई लाख यूनिटें बंद हो गईं और रियल एस्टेट सेक्टर पर बहुत बुरा असर पड़ा है. बड़ी तादाद में लोगों ने नौकरियां गंवाई हैं."
        लेकिन बेशर्मी व धूर्तता से वित्त मंत्री अरुण जेटली प्रधान मंत्री ने फिर दोहराया है कि नोटबंदी का असर अनुमान के अनुरूप ही रहा है कि जो पैसा बैंकों में जमा हो गया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह पूरा धन वैध है। नरेंद्र मोदी ने लाल किले से बताया कि नोटबंदी के बाद 3 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में आ गए। इसमें से जमा 1.75 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन शक के दायरे में है। इसके अलावा 2 लाख करोड़ रुपये का काला धन बैंक पहुंचा है। इन फर्जी व गोल मोल बातों को करके अवाम को बार बार धोखा नही दिया जा सकता।
अब "अर्थशास्त्री" भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि अर्थव्यस्था नोटबंदी की वजह से नही गिरी बल्कि 'तकनीकी' कारणों से हुआ है।
कहां तो 4-5 लाख करोड़ के काले धन का दावा !! जिसे कि वापस ही नही लौटना था। और कंहा अब जो पैसे वापस आ गए है उसमें से 3 लाख करोड़ पर काला धन होने का दावा !! बेशर्मी, धूर्तता व कुतर्क की कोई इंतहा नही !!

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Sunday, 27 August 2017

भारतीय राज्य और बाबा राम रहीम



        भारतीय राज्य और बाबा राम रहीम
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पिछले कुछ समय से डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरुमीत उर्फ राम रहीम का मामला सुर्खियों में है। कुछ समय पहले  रामरहीम ने मैसेंजर ऑफ गॉड फ़िल्म भी बनाई थी जिसमें खुद को ईश्वरीय शक्ति के रूप में इसने प्रचारित किया था।  फिलहाल यह सुर्खिया यौन शोषण के मसले पर चल रहे मुकदमे व इसके बाद हुई हिंसा के चलते है। आज से तकरीबन 15 वर्ष पहले दो साध्वीयों ने यौन शोषण का आरोप राम रहीम पर लगाया था । इन लड़कियों ने अटल बिहारी बाजपेई की सरकार तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भेजे गुमनाम पत्र में यह आरोप लगाये थे जिसमें यह भी कहा गया था कि ऐसा कई लड़कियों के साथ राम रहीम ने किया है। 
   पत्र में यह भी लिखा गया था कि सभी राम रहीम की ताकत व पहुंच के साथ ही घर वालों के अंधविश्वास के चलते कुछ न कर पाने को मजबूर हुए व चुप चाप सब कुछ सहते रहे रामरहीम अपनी पहुंच, हथियारों व गुंडों का खौफ इन सभी विरोध करने वालों को दिखाता था ।कुछ ऐसे भी थे जो घर वापस आ गए। इनके इस पत्र  को तब अखबार में छापने वाले पत्रकार की हत्या रामरहीम ने करवा दी। यौन शोषण के इस आरोप के बाद ही हाईकोर्ट के इसे स्वत:संज्ञान लेने से राम रहीम के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था।जिस पर सी बी आई जांच चल रही थी सी बी आई की कोर्ट में ही मामला चल रहा था। इन 15 सालों में राम रहीम ने अपनी दौलत, हैसियत एवं ताकत कई गुना इजाफा कर लिया था।         
         धार्मिक गतिविधियों के जरिये ,लोगों के अंधविश्वास व धार्मिक पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल करके व लोगों के बीच कुछ राहत के काम करते हुए इसने अपने नेटवर्क को मजबूत किया । एक साम्राज्य खड़ा कर लिया। जिसके चलते लाखों की तादाद में लोग इसके अनुयायी बने थे। राजनीतिक पार्टियों से इसके गहरे संबंध रहे हैं  विशेषकर भाजपा से । 7 अक्टूबर 2014 को विधायक के लिए खड़े भाजपा के 44 उम्मीदवारों की बैठक रामरहीम के साथ सिरसा में होती है जिसमें कैलाश विजयवर्गीय भी शामिल थे। एक बैठक अमित शाह के साथ भी हुई थी तभी पिछ्ले विधान सभा चुनाव में रामरहीम ने खुलकर भाजपा का समर्थन दिया था।
 25 अगस्त पंचकुला की सी बी आई कोर्ट में राम रहीम की पेशी थी। हरियाणा की खट्टर सरकार ने 700 एकड़ के भब्य  क्षेत्र में रह रहे यौन शोषण के आरोपी राम रहीम से गुजारिश की कि वह पेशी पर जाए। राम रहीम ने अपने हवाई जहाज से कोर्ट जाने की बात की । लेकिन फिर फ़ासीवादी खट्टर सरकार ने जैसे तैसे गाड़ी से कोर्ट जाने के लिए बाबा को मनाया।अंततः 400-800 गाड़ियों का काफिला कोर्ट की ओर रवाना हुआ था भाजपा सरकार ने ऐसा करने की प्रशासनिक अनुमति भी दी । 
     इस बात की संभावना दिखने लगी थी की कोर्ट में फैसला पक्ष में न आने पर बाबा के लम्पट समर्थक विरोध या हिंसा कर सकते है। लेकिन भाजपा सरकार ने इन लाखों समर्थकों को रोकने के लिए व उनको एकजुट न होने देने के कोई विशेष प्रयास नहीं किये। धारा 144 लागू की तो वह भी केवल नाम के लिए। अंततः:कोर्ट के आदेश के बाद ही हरियाणा की भाजपा सरकार ने अर्धसैनिक बलों को बुलाया। लेकिन तब भी कोई सख्ती नही की गई। परिणाम फिर वही हुआ जैसा होने की संभावना जताई गई थी। जैसे ही कोर्ट ने धूर्त ,लम्पट व अपराधी राम रहिंम को यौन शोषण के दोषी होने का फ़ैसला सुनाया वैसे ही बाबा के लम्पट समर्थकों का तांडव शुरू हो गया। लगभग 32 लोगों की  26 अगस्त तक मौत हो गई। जबकि 250 से ज्यादा लोग घायल हो गए ।
       इसके अलावा बसों, गाड़ियों, व रेलों में आगजनी व तोड़ फोड़ की गई। अब एक ओर 5 राज्यों में अलर्ट जारी किया गया है जबकि कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है इंटरनेट पर रोक लगा दी गई है। 
एक ओर हिंसा व इसमें मारे जाते लोग तो दूसरी ओर खट्टर सरकार से लेकर केंद्र की मोदी सरकार का सुर अपराधी रामरहीम के प्रति बहुत नरम है। "भारत का नक्शा मिटा देंगे" नारे लगाने वालों के खिलाफ आज फासिस्ट संघी राष्ट्रवादियों की जुबान को आज लकवा मार गया है। मोदी "शांति" संदेश के लिए ट्वीट कर रहे है। साक्षी महाराज कोर्ट को डरा रहे है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधाओं के हिसाब से जो कोई भी अपराधी रामरहीम व उसके लम्पट दस्ते की आलोचना कर रहे है वह भारतीय संस्कृति को बदनाम कर रहे है। कुल मिलाकर फासिस्टों ने ख़ुद को बेनकाब करने के साथ साथ अपनी पक्षधरता भी साफ कर दी है। वह यह कि वह महिलाओं के खिलाफ अपराध को अंजाम देने वाले लम्पट व धूर्त संतो के साथ है जैसा कि अतीत में वे बलात्कार के आरोपी स्वामी नित्यानंद के साथ खड़े थे । 
दरअसल रामरहीम , आशाराम, नित्यानाद, स्वामी ओम, रजनीश, निर्मल बाबा  आदि आदि इसकी फेहरिश्त लंबी है इन सभी को राजनीतिक पार्टियों का भी संरक्षण प्राप्त रहता है। कोंग्रेस के साथ चंद्रास्वामी का नाम भी चिपका हुआ था। प्रधानमंत्री से चंद्रास्वामी के सीधे संबध थे। दूसरे रूप में कहा जाय तो यह कि भारतीय राज्य अपनी जहनियत में कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा है।  शासकों ने शुरू से ही अपने फ़ायदे में धर्म को अपनी गोद में पाला पोसा है इसे संरक्षण प्रदान किया है।
 इसने धर्म, धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करने , सार्वजनिक जीवन में इसके दखल को खत्म करने तथा इसे निजी जीवन तक सीमित करने  के कोई भी कदम कभी नहीं उठाए। धर्म को राज्य के मामले में राजनीति में लाने पर रोक नहीं लगाई । इसके उलट इन दोनों का साथ शुरू से ही बना रहा।  पूंजीवादी राजनीतिज्ञ धर्म, धार्मिक त्योहारों कार्यक्रमों व संस्थाओं में आते जाते रहे व इसका इस्तेमाल करते रहे। इसी का नतीजा आज एक ओर रामरहीम के रूप में दिखाई देता है जो अपने लम्पट दस्तों के जरिये राज्य के कानूनों को चुनौति देने लगता है व खुद को राज्य आए ऊपर समझने का भरम पाल बैठता है । तो दूसरी तरफ फासिस्ट संघ परिवार है भाजपा जैसे है जिन्होंने साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण के जरिए अपना प्रसार किया है और मौजूदा वक्त में इसे एकाधिकारी पूंजी ने सत्ता पर बिठाया है। इनकी ताकत राम रहीम जैसे जिनके लाखों अनुयायी हो से काफी बढ़ जाती है। इन दोनों की पैदा होने की जमीन एक ही है।







Tuesday, 15 August 2017

बच्चों की हत्यारी योगी सरकार

बच्चों की मौत की जिम्मेदार भाजपा सरकार शर्म करो !
                       मुख्य मंत्री इस्तीफा दो !

          ये वक्त बहुत त्रासदी पूर्ण है दुखदायी है। एक तरफ धूर्त शासक आज़ादी का जश्न मनाने में मशगूल है और दूसरी तरफ गम शोक में डूबे हुए लोग हैं परिवार हैं जिनके देखते सुनते 63 मासूम बच्चों की अस्पताल में मौत हो चुकी है। इन बच्चों की मौत पर योगी व योगी सरकार को कोई अफसोस नही, दुख नहीं।  प्रधानमंत्री जी के लिए यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं जिस पर ट्वीट करते। अडानी को 6000 करोड़ रुपये दिलवाने वाले , व अम्बानी के 'जिओ' के लिए सरकार की साख बेचने वाले इस मुद्दे पर खामोश है।
 सत्ता पर बैठी योगी-मोदी सरकार की संवेदनहीनता व बेशर्मी शीर्ष पर है। लेकिन ये तथ्य इन्हें कठघरे में खड़ा करने को पर्याप्त है कि प्राइवेट फर्म को ऑक्सिजन के लिए 70 लाख रुपये के भुगतान में देरी की असल वजह मुख्यमंत्री की बैठक थी। इसलिए इन मौतों के लिए साफ तौर पर योगी सरकार जिम्मेदार है। ये हत्याएं है जिसके जिम्मेदार योगी व उनकी सरकार है।
     मुख्य मंत्री योगी इस क्षेत्र से 5 बार सांसद रह चुके हैं। खुद संसद में इस मुद्दे पर उन्होंने पहले हंगामे किये है। "माँ गंगा ने बुलाया है" कहने वाले मोदी जी भी इस मर्ज को जानते रहे होंगे। इसलिए भी कि जापानी इन्सिफैलाइटिस कोई आज की बीमारी नही है। पिछले 20-30 सालों से पूर्वी उत्तर प्रदेश में गरीब मेहनतकश परिवारों से उनके बच्चे छीनती रही है।
      तब सवाल बनता है कि पिछले तीन सालों में मोदी सरकार ने इस 'बीमारी' को जड़ से खत्म करने को क्या विशेष योजना बनायी ? कितने करोड़ का बजट इस बीमारी पर शोध व इलाज के लिए रखा गया ? कितने डॉक्टर, नर्स , दवाओं आदि की व्यवस्था इस बीमारी के लिए की गई ? आदि आदि। जवाब मिलेगा कुछ नहीं। और फिर पिछले 4-5 माह में योगी सरकार ने क्या क्या किया ? यदि कुछ हुआ भी है तो बेहद मामूली है।       
 यही सवाल सपा, कांग्रेस, बसपा से भी है कि जब इनकी सरकार थी तब इन्होंने क्या क्या किया? इन सभी का काम है बस जब विपक्ष में रहो ; हंगामा खड़ा करो; वोट की फसल तैयार करो। और फिर जब जीत जाओ तो पूंजीपतियों को मालामाल करने वाली नीतियों को लागू करो , खुद भी मालामाल होओ। जैसा कि योगी जी व मोदी जी की अगुवाई में बी जे पी कर रही है। 
       देश भर में 'सार्वजनिक स्वास्थ्य' के हालात बेहद बदहाल हैं । कुल बजट का मात्र लगभग 1 % हिस्सा ही स्वास्थ्य पर खर्च होता है जबकि दुनिया का औसत लगभग 6 % है।'शिशु मृत्यु दर' 'मातृत्व मृत्यु दर' व 'बाल कुपोषण' देश में अभी भी बहुत ज्यादा है। इन मामलों में देश दुनिया के कई गरीब व कमजोर देशों से भी पीछे है। लेकिन हमारे शासकों का मुख्य एजेंडा सार्वजनिक जन स्वास्थ्य नही बल्कि "रक्षा" है, 'रक्षा' के नाम हथियारों को खरीदना है। स्वास्थ्य इनके लिए मुद्दा हो भी क्यों? इनके लिए तो अत्याधुनिक अस्पताल है ही, ये कम पड़े तो अमेरिका या यूरोप चले जाओ। बाजपेयी गए थे न घुटना बनवाने विदेश, सोनिया भी गयी थी। इसीलिए 'देशभक्ति का लाइसेंस बांटने' वाली मोदी-योगी सरकार का भी रक्षा बजट तो ढाई लाख करोड़ रुपये है लेकिन स्वास्थ्य बजट मात्र 48 हज़ार करोड़ रुपये का। यही शासकों की जरूरत है। पूंजीवादी दुनिया में यही होता है। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी शासकों के हित, इच्छा आकांक्षा ही सर्वोपरी होती है मेहनतकश नागरिक तो इसके मातहत ही होते है। पूंजी बढ़ते रहे, मुनाफा बढ़ते रहे किसी भी कीमत पर ! यही इस सिस्टम का मंत्र है। मासूम बच्चे मरें चाहे दंगो में हजारों मारे जाएं या लाखों मरवा दिए जाएं हुक्मरानों को क्या फर्क पड़ता है ।
      इसीलिए अब सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली जो थोड़ा बहुत है भी उसे भी सरकार खत्म करने पर तुली हुई है इनका नारा है  स्वास्थ्य पी पी पी मोड के हवाले कर दो, प्राइवेट कर दो , स्वास्थ्य बीमा(इन्सुरेंस) करवाओ। और सब प्राइवेट खुले नर्सिंग होम के हवाले छोड़ दो। 
            इसलिए आज जरूरत है एकजुट होने की,  एकजुट होकर संघर्ष करने की, सरकार-शासकों को इस बात के लिए मजबूर कर देने के लिए कि देश के हर नागरिक को निःशुल्क व बेहतरीन चिकित्सा दी जाय। साथ ही साथ इस पूंजीवादी सिस्टम के खिलाफ भी खड़े होने की जरूरत है और एक नए समाज 'समाजवाद' लाने की  जिसके लिये शहीद भगत सिंह ने खुद को बलिदान कर दिया था।
   

Friday, 11 August 2017

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार 
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      साल 2013 में उत्तराखंड में 16-17जून को भारी तबाही आई थी। उस वक्त विजय बहुगुणा की अगुवाई में कोंग्रेस की सरकार थी। तब गुजरात के मुख्य मंत्री जो कि अब भारत के प्रधानमंत्री है यंहा उड़न खटोले से चक्कर लगा रहे थे वे बड़े बड़े दावे कर रहे थे "शिकार' को फंसाने के लिए वायदे भी कर रहे थे। 
        साल 2017 तक आते आते अब जबकि उत्तराखंड में बिग बहुमत वाली संघी सरकार सत्ता में है संघी छत्र छाया में पला बढ़ा "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" शख्स मुख्य मंत्री है। तब राजधानी से मात्र 150 किमी की दूर कोटद्वार में भारी बारिश हुई बादल फटे और नाले (रौखड़) में आई बाढ़ से जो तबाही हुई उससे निपटने के तौर तरीकों ने संघी सरकार की "संवेदनशीलता" "सुसंस्कृति" की पोल खोल दी  । इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक जो कि 2013 में कॉंग्रेस मंत्री के बतौर  'आपदा टूरिज़्म' मना रहे थे अब "शुद्धिकृत" होकर संघी सरकार के मंत्री के रूप में अपनी 'दबंग' स्टाइल में आपदा पीड़ितों को राहत देकर आहत कर रहे थे।
          यही वजह है कि कोटद्वार में 4-5 अगस्त को जो तबाही हुई थी तब से अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं। मुख्य सड़को व 4-5 क्षेत्रों में लोगों के गलियों,  दुकानों में गाद अभी भी है। सीवेज लीकेज के चलते मोहलले में सांस लेना मुश्किल हो रहा है। लोगों के घरों में रखा हज़ारो का सामान बर्बाद हो गया । खाने पीने का सामान भी खराब हुआ है। बिमारियों के होने व फैलने की काफी संभावना है। कुलमिलाकर लगभग 100-120 परिवार को ज्यादा नुकसान हुआ है और इनमें से तकरीबन 50 परिवार गुरुद्वारा राहत कैम्प में है। इसके अलावा लगभग 100 से ज्यादा परिवार एसे हैं जिन्हें कम नुकसान हुआ है। लगभग 6 लोगों के मरने की खबर हैं लेकिन मुआवजा केवल 2 परिवारों को 4-4 लाख का मिला। कुछ लोगों के मिसिंग होने की भी खबर है । 2 लोगों का शव अभी फिर मलवे में बरामद हुए हैं। 
     वैसे भी शासकों के लिए आपदा या तो "मानव जनित" होती या फिर "प्राकृतिक या दैवीय आपदा" । इन शब्दावलियों का जाल बुनकर ये अपने कुकर्मों को ढक लेते है। यह नही बताते कि उनके अनियोजित व अनियंत्रित विकास के मॉडल के चलते एक छोटी सी प्राकृतिक घटना मेहनतकश व गरीब लोगो के लिए बड़ी 'आपदा' में बदल जाती है। जिसमें सैकड़ो घर तबाह बर्बाद हो जाते हैं।
         संघी सरकार को "दैवीय" शब्द से बहुत प्यार है। तब संघी सरकार व उसके "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" मुख्य मंत्री ने ऐसे मौके पर क्या किया ? आपदा पीड़ितों से मिलने व सभी क्षेत्रों में जाने की जगह एक जगह गए और 3800 रुपये का चेक पकड़ाकर फ़ोटो खिंचवाकर चलते बने। 185 परिवारों को चेक देने की बात की जा रही है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। एक जगह 12-15 परिवारों को 3800 रुपये चेक देने की बात लोगों ने बताई। साथ ही संयुक्त परिवार को चेक दिया गया। 
            हज़ारो व लाख रुपये के नुकसान झेल रहे कुछ लोगों ने चेक गुस्से में वापस भी लौटाए। आपदा पीड़ित सवाल उठा रहे हैं कि हम इस चेक को भुनाने जाए या फिर अपने घरों की सफाई करें और उन्हें रहने लायक बनाएं। लेकिन जवाब कौन दे ? संघीयों को व उसकी सरकार को वैसे भी सवाल करने व तर्क करने वालों से घोर नफरत जो है। इसका असर नीचे तक है।
            इनके चमचों व दलाल छुटभैयों का हाल भी कम घृणा भरा नहीं है। आपदा पीड़ितों के दर्द को साझा करने उन्हें राहत देने की जगह ये थप्पड़ जड़ देते हैं या गिरहबान पकड़ लेते हैं। दो जगह ऐसे मामले हुए जिसमें आपदा पीड़ित ने सरकार के रुख पर शंका की व सवाल खड़े किए तो एक महाशय ने आपदा पीड़ित को सबके सामने थप्पड़ मार दिया तो दूसरे ने 'दबंग' जनप्रतिनिधि के सामने ही चमचागिरी दिखाते हुए एक आपदा पीड़ित का गिरहबान पकड़ लिया। 
            यही नहीं यह भी बातें सामने आ रही हैं कि बाजार के केंद्र में स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी पर इनकी गिद्ध नज़र लगी हुई है यह आपदा में सबसे ज्यादा बर्बाद है। यंहा लगभग 50 परिवार रहते है अब ये राहत शिविरों में है। ये आज़ादी के वक्त में सरकार द्वारा विस्थापन के चलते यंहा बसाए गए थे। अब सुरक्षा के नाम पर इन्हें इस जगह को छोड़ने के लिए "प्रेरित" किया जा रहा है 5000 रुपये मासिक किराए के रूप में दिए जाने के वायदे हो रहे है। जब लोगों ने इससे इंकार कर दिया तो उनसे राहत कैम्प से चले जाने के लिए के कह दिया। अब ये अपने समुदाय के गुरुद्वारा में रह रहे हैं।
              इन्ही स्थितियों में एक क्षेत्र काशीरामपुर मल्ला के लोगों ने क्रालोस की अगुवाई में तहसील में प्रदर्शन किया एक ज्ञापन मुख्य मंत्री के लिए प्रेषित किया गया जबकि दूसरा ज्ञापन एस डी एम को दिया गया। जिसका असर भी देखने को मिला तुरंत ही शाम तक जे सी बी पहुंच गई व फिर धीरे धीरे सफाई व ब्लीचिंग पावडर का छिड़काव भी हुआ। इसी के साथ अब अन्य लोगों ने भी प्रदर्शन किए है। दबाव में वे किरकिरी होने पर सरकार के एक दो मंत्रियों के भी चक्कर यंहा लगे है। जिसमें उन्होंने 3800 रुपये के चेक पर सफाई देते हुए कहा है कि यह तो प्राथमिक तौर पर राहत दी गई थी बाद में फिर राहत राशि दी जाएगी। लेकिन कुल मिलाकर संघी सरकार को आपदा ने आपदा पीड़ित ही नहीं अन्य लोगों के बीच भी नंगा कर दिया।

Sunday, 9 July 2017

हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न



हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न 

   पिछले तीन सालों में मेहनतकश अल्पसंख्यकों व दलितों पर हमले काफी बढ़ चुके है। आम तौर पर ये हमले गौरक्षक दस्तों द्वारा किये गए है। इनमें हत्याएं भी की गई है। दूसरी ओर गुजरात ऊना के बाद जुनैद व झा-खण्ड में अल्पसंख्यकों की हत्या के मौके पर "ह-त्यारी चुप्पी" को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री महोदय फिर उपदेशात्मक मुद्रा में आये । फासिस्ट हत्यारो को फिर से एक बार उपदेश उन्होंने दिया। इन्हें "भीड़ द्वारा हत्याओं" के रूप में प्रचारित कर फास्सिट अपनी ताकत में इजाफा करते जा रहे है। 
     जब दौर ऐसा हो तब ऐसे शोक संतप्त दहशत भरे माहौल में "जी एस टी" लागू करने की रात को ऐतिहासिक पल बताकर "जश्न" मनाया जाता है। "एक देश-एक कर- एक बाजार" के नारे के साथ एक केंद्रीकृत कर प्रणाली को यूं इस तरह पेश किया जाता है कि मानो मज़दूर मेहनतकश अवाम की जिंदगी में आमूल चूल बदलाव आ जाये। हकीकत यही है कि हर बार की ही तरह यह मज़दूर मेहनतकश अवाम को और ज्यादा निचोड़ने का यंत्र है। प्रत्यक्ष करो की प्रणाली को बढ़ाने की बजाय जो कि व्यक्ति विशेष को प्रभावित करते है इसे और कमजोर कर दिया गया है। इसके बजाय अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को और मजबूत व व्यापक कर दिया गया है जो अपने दायरे मज़दूर मेहनतकश अवाम को समेट लेता है। इसके लिए महंगाई बढ़नी ही है। छोटी पूंजी की तबाही को बढ़ाएगा।   
        अव्वल तो यह कोई यह नहीं पूछ रहा कि जिस जी एस टी को अब ऐतिहासिक करार दिया जा रहा है तब 2012 में क्यों इतना हंगामा इसके विरोध में मोदी - भाजपा ने बरपा था। एकाधिकारी पूंजी की सेवक नरम हिदुत्व वाली कोंग्रेस बेचारी यह क्रेडिट लेने से वंचित रह गयी। उसे इसी का अफसोस है ! वरना तो दोनों में इसे लागू करने के मामले में अभूतपूर्व एकता है। "राष्ट्रवादियों " का यह जश्न खुद इनके अपने लिए साथ ही देश के पूंजीपति वर्ग के लिए है या यूं कहें कि जश्न मनाने का समय यह यदि किसी के लिए है वो पहले सरकार और दूसरे जो असल में सरकार बनाते हैं और सरकारें जिनके लिए काम करती हैं यानी पूंजीपति वर्ग और उसमें भी अंबानी-अदानी टाइप के पूंजीपतियों को जश्न मनाना ही चाहिए। सरकार की कर राजस्व से आय बढ़ेगी तो वह उसे पूंजीपतियों पर ही लुटायेगी।
       यही नही इस " एक देश एक कर एक बाजार" के नारे के साथ शासकों ने राज्य सरकारों के अधिकार को और कमजोर कर दिया। अब राज्यों की निर्भरता केंद्र पर और ज्यादा बढ़ जाएगी। और शासकों की यह सोच या दावा कि इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, संदिग्ध है। नोट बंदी की मार से अर्थव्यवस्था अभी उभरी नही है। आयात निर्यात दोनों ही स्तरों पर संकट मौजूद है। आंतरिक मांग बढ़ने के कोई आसार नहीं हैं। इस सबके बावजूद देश के बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे की दर को और गिरने से रोकने और सरकार के कर राजस्व को बढ़ाने में यह कर सुधार तात्कालिक तौर पर एक हद तक कामयाब होगा। जंहा तक देश की एकता का सवाल है । देश को एकीकृत बाजार से देखने वाले शासक पूंजीपति वर्ग व उसकी पार्टियों का मतलब यही एकता यानी एक बाज़ार है । जबकि वास्तविकता में 'एकता' तभी संभव है जब कि आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत समाजवादी राज्य बने।

Sunday, 14 May 2017

सहारनपुर के शब्बीरपुर दंगे

     सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हुए हमले की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट
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     ( क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की अगुवाई में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं नौजवान भारत सभा के कार्यकर्त्ताओ ने तथ्यों की जांच पड़ताल के लिए शब्बीरपुर गांव का दौरा 8 मई को किया इस जांच पड़ताल के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।)
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सहारनपुर से लगभग 26 किमी दूरी पर शब्बीरपुर गांव पड़ता है । मुख्य सड़क से तकरीबन आधा किमी दूरी पर यह गांव है।इस गांव के आस पास ही महेशपुर व शिमलाना गांव भी पड़ते है। गांव के भीतर प्रवेश करते वक्त सबसे पहले दलित समुदाय के घर पड़ते है। जो कि लगभग 200 मीटर के दायरे में गली के दोनों ओर बसे हुए हैं। यहां घुसते ही हमें गली के दोनों ओर जले हुए घर, तहस नहस किया सामान दिखाई देता है। दलित समुदाय के कुछ युवक, महिलाएं व अधेड़ पुरुष दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर खौफ, गुस्सा व दुख के मिश्रित भाव को साफ साफ पढ़ा जा सकता है। 
  इस गांव के निवासियों के मुताबिक गांव में तकरीबन 2400 वोटर हैं जिसमें लगभग 1200 वोटर ठाकुर समुदाय के , 600 वोटर दलित (चमार)जाति के है। इसके अलावा कश्यप, तेली व धोबी, जोगी (उपाध्याय) आदि समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय के तेली व धोबी के तकरीबन 12- 13 परिवार हैं। गांव में एक प्राइमरी स्कूल हैं जिसमें ठाकुर समुदाय के गिने चुने बच्चे ही पड़ते हैं जबकि अधिकांश दलितों के बच्चे यहां पड़ते हैं।
      गांव की अधिकांश खेती वाली जमीन ठाकुरों के पास है लेकिन 25-35 दलित परिवारों के पास भी जमीन है। दलित प्रधान जो कि 5 भाई है के पास भी तकरीबन 60  बीघा जमीन है। 
      गांव में ठाकुर बिरादरी के बीच भा ज पा के लोगों का आना जाना है। जबकि दलित समुदाय ब स पा से सटा हुआ है। गांव का प्रधान दलित समुदाय से शिव कुमार है जो कि ब स पा से भी जुड़े हुए हैं। इस क्षेत्र के गांव मिर्जापुर के दलित सत्यपाल सिंह ने बताया कि वह खुद आर एस एस(संघ) से लंबे समय से जुड़े हुए है शिमलाना, महेशपुर व शब्बीरपुर गांव में भी संघ की शाखाएं लगती हैं हालांकि इनमें दलितों की संख्या 6-7 के लगभग है और इस गांव से कोई भी दलित शाखाओं में नहीं जाता है।

घटना व घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि----  5 मई को दलित समुदाय को निशाना बनाने से कुछ वक्त पहले कुछ ऐसी बातें हुई थी जिसने दलितों को सबक सिखाने की सोच और मज़बूत होते चले गई । 14 अप्रेल को अम्बेडकर दिवस के मौके पर गांव के दलित अपने रविदास मंदिर के बाहर परिसर में अम्बेडकर की मूर्ती लगाना चाह रहे थे । लेकिंन गांव के ठाकुर समुदाय के लोगों ने इस पर आपत्ति की।प्रशासन ने मूर्ति लगाने की अनुमति दलितों को नहीं दी । मूर्ति लगाने के दौरान पुलिस प्रशासन को गांव के ठाकुर लोगों ने बुलाया। पुलिस मौके पर पहुँची मूर्ति नही लगाने दी गई । दलितों से कहा गया कि वो प्रशासन की अनुमति का इंतजार करें। जो कि नहीं मिली।
     5 मई को इस गांव के पास शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोग "महाराणा प्रताप जयंती" को मनाने के लिए एकजुट हुए थे। इनकी तादात हज़ारों में बताई गई है। इसमे शब्बीरपुर गांव के ठाकुर भी थे। ये सभी सर पे राजपूत स्टाइल का साफा पहने हुए थे, हाथों में तलवार थामे हुए थे व डंडे लिए हुवे थे। 
5 मई को सुबह लगभग 10:30 बजे गांव के ठाकुर समुदाय के कुछ युवक बाइक में दलित समुदाय की ओर से जाने वाले रास्ते पर से डी जे बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इस पर दलितों ने आपत्ति जताई ।  क्योंकि प्रशासन से इनकी अनुमति नहीं थी । इसका दलितों ने विरोध किया लेकिन इस पर भी मामला नही रुका तो दलित प्रधान ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। पुलिस आई और डी जे को हटा दिया गया। दलित समुदाय के लोगों ने आगे बताया कि इसके बाद ये बाइक में रास्ते से गुजरते हुए " अम्बेडकर मुर्दाबाद", "राजपुताना जिंदाबाद" महाराणा प्रताप जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। वह रास्ते से 2-3 बार गुजरे। इन दौरान फिर पुलिस भी आई। 
ठाकुर समुदाय के लोगों का कहना था कि इन दौरान दलित प्रधान ने रास्ते से गुजर रहे इन लोगों पर पथराव किया। जबकि दलित समुदाय के लोग इससे इनकार करते हैं। हो सकता है दलितों की ओर से कुछ पथराव हुआ हो। क्योंकि इसी दौरान ठाकुर समुदाय के लोग महाराण प्रताप जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए रविदास मंदिर पर हमला करने की ओर बढ़े। 
लगभग 11 बजे के आस पास रविदास मंदिर पर हमला बोला गया। दूसरे गांव से आये एक ठाकुर युवक ने रविदास की मूर्ति तोड़ दी नीचे गिरा दी । दलितों ने बताया कि इस पर पेशाब भी की गई। और यह युवक जैसे ही मंदिर के अंदर से बाहर परिसर की ओर निकला वह जमीन पर गिर गया। और उसकी मृत्यु हो गई । इसकी हत्या का आरोप दलितों पर लगाया गया। इण्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक पोस्टमार्टम में मृत्यु की वजह ( suffocation) दम घुटना है। 
तुरंत ही दलितों द्वारा ठाकुर युवक की हत्या की खबर आग की तरह फैलाई गई । और फिर शिमलाना में महाराण प्रयाप जयंती से जुड़े सैकड़ो लोग तुरंत ही गांव में घुस आए। इसके बाद तांडव रचा गया। तलवार, डंडे से लैस इन लोगों ने दलितों पर हमला बोल दिया। थिनर की मदद से घरों को आग के हवाले कर दिया गया। लगभग 55 घर जले । 12 दलित घायल हुए इसमें से एक गंभीर हालत में है। गाय, भैस व अन्य जानवरों को भी निशाना बनाया गया।इस तबाही के निशान हर जगह दिख  रहे थे। यहां से थोड़ी दूर महेशपुर में सड़क के किनारे दलितों के 10 खोखे आग के हवाले कर दिए गए। यह सब चुन चुन कर किया गया। 
घायलों में 5 महिलाएं है जबकि 7 पुरुष। गांव के दलित प्रधान का बेटा  गंभीर हालत में देहरादून जौलीग्रांट में भर्ती है। तलवार व लाठी डंडे के घाव इनके सिर हाथ पैर पर बने हुए हैं। रीना नाम की महिला के शरीर पर बहुत घाव व चोट है। इस महिला के मुताबिक इसकी छाती को भी काटने व उसे आग में डालने की कोशिश हुई। वह किसी तरह बच पायी।

शासन , पुलिस प्रशासन व मीडिया की भूमिका ----- सरकार व पुलिस प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद है व उपेक्षापूर्ण है। यह आरोप है कि घटनास्थल पर हमले के दौरान मौजूद पुलिस हमलावरों का साथ देने लगी व कुछ दलितों के साथ इस दौरान मारपीट भी पुलिस ने की । संदेह की जमीन यहीं से बन जाती है कि जब संघ व भाजपा के लोग अम्बेडकर को हड़पने पर लगे है तब दलितों को उन्हीं के रविदास मंदिर परिसर में अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने से रोक दिया गया व प्रशासन ने इसकी अनुमति ही नहीं दी।
दलितों पर कातिलाना हमले के बाद भी सरकार व मुख्यमंत्री  के ओर से दलितों के पक्ष में कोई प्रयास नहीं हुए जिससे कि उन्हें महसूस होता कि उनके साथ न्याय हुआ हो। इसके बजाय मामला और ज्यादा भड़काने वाला हुआ । एक ओर पुलिस प्रशासन ने पीड़ितों व हमलवारों को बराबर की श्रेणी में रखा और हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगों के साथ साथ दलितों पर भी मुकदमे दर्ज किए दिए गए । 8 मई  तक मात्र 17 लोग ही गिरफ्तार किए गए इसमें लगभग 7 दलित समुदाय के थे जबकि 10 ठाकुर समुदाय के। जबकि दूसरी ओर ठाकुर समुदाय से मृतक परिवार के लोगों को  मुआवजा देने की खबर आई व मेरठ में मुख्य मंत्री योगी द्वारा अम्बेडकर की मुर्ती पर माल्यार्पण न करने की खबर भी फैलने लगी।
घायल लोगों के कोई बयान पुलिस ने 8 मई तक अस्पताल में नहीं लिए थे। घायल लोगों के कपड़े  घटना वाले दिन के ही पहने हुए हैं जो कि खून लगे हुए थे। ये पूरे शासन प्रशासन की संवेदनहीनता को दिखाता है।
इस दौरान गांव में डी एम ने एक बार दौरा किया व कुछ परिवारों को राशन दिया। लेकिन लोगो की जरूरत और ज्यादा की थी उन्हें छत के रूप में तिरपाल की भी जरूरत थी। लेकिन शासन प्रशासन ने फिर मदद को कोई क़दम नहीं उठाया। बाहर से जो लोग मदद पहुंचा रहे थे उन्हें भी प्रशासन ने रोक दिया। 
लखनऊ से गृह सचिव व डी जी पी स्थिति का जायजा लेंने पहुंचे तो वे केवल अधिकारियों से वार्ता करके चले गए गांव जाना व वंहा दलितों से मिलने का काम इन्होंने नहीं किया।
बात यही नही रुकी। दलितों ने भेद भाव पूर्ण व्यवहार के विरोध में तथा मुआवजे के लिए एकजुट होने की कोशिश को भी रोका गया। दलित छात्रावास में रात को ही पी ए सी तैनात कर दी गई। और जब गांधी पार्क से एकजुट दलित लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उस पर लाठीचार्ज कर दिया गया। 
मीडिया ने इस कातिलाना हमले को दो समुदाय के टकराव(clash) के रूप में प्रस्तुत किया। हमलावरों व हमले के शिकार लोगों को एक ही केटेगरी में रखा गया। इसका नतीजा ये रहा कि दलितों में पुलिस प्रशासन व मीडिया के प्रति अविश्वास व नफरत बढ़ते गया।
शबीरपुर घटना की दीर्घकालिक वजह :-----  सहारनपुर  में दलितों की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति तुलनात्मक तौर ठीक है और यह तुलनात्मक तौर पर मुखर भी है । आरक्षण के चलते थोड़ा बहुत सम्पन्नता दलितों में आई है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुए है। लेकिन इन बदलाव को  सवर्ण समुदाय विशेषकर ठाकुर समुदाय के लोग अपनी सामंती मानसिकता के चलते सह नहीं पाते। उन्हें यह बात नफरत से भर देती है कि कल तक जिन्हें वे जब तब रौंदते रहते थे आज वही उन्हें आँख दिखाते है ।
जब से एस सी एस टी एक्ट बना हुआ है  इस मुकदमे के डर से ठाकुर समुदाय के लोगों को जबरन खुद को नियंत्रित करना पड़ता है कभी कभी तो जेल भी जाना पड़ता है। ये बात इन्हें नफरत से भर देती है।ठाकुर समुदाय के लोग महसूस करते है कि बसपा की सरकार थी तो बस इन दलितों का ही राज था। अभी बसपा की सरकार होती तो सारे ठाकुर अंदर होते, भा जा पा के होने केवल 10-12 लोग ही अरेस्ट हुए। दलित व ठाकुरों के बीच के अंतर्विरोध अलग अलग वक्त पर झगड़ो के रूप में दिखते हैं।
चूंकी संघ ने निरंतर ही अपनी नफरत भरी जातिवादी विचारो का बीज इस इलाके में भी बोया है। सवर्ण समुदाय इससे ग्रसित है। वह आरक्षण व सामाजिक समानता का विरोधी है। इसलिए यह अंतर्विरोध और तीखा हुआ है। संघ मुस्लिमों के विरोध में सभी हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है अपने फास्सिट आंदोलन को मजबूत कर रहा है । शब्बीरपुर घटना उसके लिए फायदेमंद नहीं है।
चुकी शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के वोटर दलितों से दुगुने होने के बावजूद ठाकुर अपना प्रधान नहीं बना पाए। एक बार रिजर्ब सीट होने के चलते तो दूसरी दफा सामान्य सीट होने के के बावजूद। 
जब ठाकुर समुदाय के लोगों से यह पूछा गया कि ऐसा कैसे हुआ ? तो उन्होंने जवाब दिया कि सारे चमार, तेली कश्यप एक हो गए हम ठाकुर एक नही हो पाए ज्यादा ठाकुर चुनाव में खड़े हो गए, वोट बंट गए और हार गए। इसका बहुत अफसोस इन्हें हो रहा था। 
इसके अलावा दलितों के पास जमीन होना भी ठाकुर लोगों के कूड़न व चिढ़ को उनके चेहरे व बातों में दिखा रहा रहा था। ठाकुर लोगों से जब पूछा गया कि गांव में सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है ? तो जवाब मिला - सबके पास है दलितों के पास भी बहुत है प्रधान के पास 100 बीघा है उसका भटटा भी है पटवारी भी दलित है जितना मर्जी उतनी जमीन पैसे खाकर दिखा देता है।
ठाकुर परिवार की महिलाएं बोली - हमारी तो इज्जत है हम घर से बाहर नही जा सकती, इनकी(दलित महिलाएं)  क्या इज्जत, सब ट्रैक्टर मैं बैठकर शहर जाती है पैसे लाती है। ठाकुर लोग फिर आगे बोले-इनके ( दलितों) के तो 5-5 लोग एक घर से कमाते है 600 रुपये मज़दूरी मिलती है हमारी तो बस किसानी है हम तो परेशान हैं आमदनी ही नहीं है।
यही वो अंतर्विरोध थे जो लगातार भीतर ही भीतर बढ़ रहे थे दलितों को सबक सिखाने की मंशा लगातार ही बढ़ रही थी। और फिर 5 मई को डी जे के जरिये व फिर नारेबाजी करके मामला दलितों पर बर्बर कातिलाना हमले तक पहुंचा दिया गया। इसमें कम से कम स्थानीय स्तर के भा ज पा , संघ व पुलिस प्रशासन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 5 मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया । जिसमें हजारों लोग गांव में इकट्ठे हुवे थे। ऐसा कार्यक्रम सहारनपुर के गांव में पहली दफा हुआ। जबकि इससे पहले यह जिला मुख्यालय पर हुआ है।
दलित समाज की प्रतिकिया व शासन प्रशासन--- जैसा कि स्पष्ट है विशेष तौर पर पुलिस प्रशासन के प्रति इनमें गहरा आक्रोश था। जब 9 तारीख को दोपहर में गांधी पार्क पर लाठी चार्ज किया गया तो शाम अंधेरा होते होते यह पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ करते हुए दिखा। इनकी मांग थी - हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगो को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करो।
सहारनपुर के रामनगर,नाजीरपुरा,चिलकाना व मानकमऊ में सड़कें ब्लॉक कर दी गई । यह दलित समुदाय के युवाओं के एक संगठन 'भीम आर्मी' ने किया। लाठी डंडो से लैस इन युवाओं को पुलिस प्रशासन ने जब फिर खदेड़ने की कोशिश की तो फिर पुलिस को टारगेट करते हुए हमला बोल दिया गया।पुलिस थाने में आग लगा दी गई । पुलिस की कुछ गाड़िया जला दी गई ।पुलिस का जो भी आदमी हाथ आया उसे दौड़ा दौड़ा कर पिटा गया। अधिकारियों को भी इस आक्रोश को देख डर कर भागना  पड़ा। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया व बाइक जला दी। एक बस से यात्रियों को बाहर कर बस में आग लगा दी गई। 
इस आक्रोश से योगी सरकार के माथे पर कुछ लकीरें उभर आई। तुरंत ही अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दो एस पी पर डालकर उन्हें हटा दिया गया। और अब वह "कानून का राज" कायम करने के नाम पर दलित युवाओं से बनी भीम आर्मी पर हमलावर हो गई है। अस्पताल से लेकर छात्रावास व गांव तक हर जगह इनको चिन्हित कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। जबकि ठाकुर समुदाय के तलवार के बल पर खौफ व दहशत का माहौल पैदा करने वाले महाराण प्रताप जयंती वाली सेना को सर आंखों पर बिठा कर रखा जाता है। उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्यवाही सुनने या देखने पढ़ने को नही मिली।साफ महसूस हो रहा है कि पुलिस प्रशासन अब पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दलित समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। 
कुल मिलाकर शासन -प्रशासन व राज्य सरकार का रुख दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण, उपेक्षापूर्ण , दमनकारी व सबक सिखाने का बना हुआ है। इसलिये आने वाले वक्त में यह समस्या और गहराएगी। वैसे भी जब जातिवादी , साम्प्रदायिक व फासिस्ट विचारों से लैस पार्टी सत्ता में बैठी हुई हो तो इससे अलग व बेहतर की उम्मीद करना मूर्खता है। 



















Wednesday, 22 March 2017

23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर



   23 मार्च शहादत दिवस के अवसर पर
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     पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध अभी जारी है
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     ‘‘निकट भविष्य में अंतिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारंभ किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त होगा।’’  (‘हमें फांसी के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये’ शीर्षक से पंजाब के गर्वनर को लिखे पत्र से)
     यह शब्द शहीदे आजम भगत सिंह के हैं। 23 मार्च, 1931 को जालिम अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भगत सिंह, सुखदेव  और राजगुरू को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था। अंग्रेज शासकों ने सोचा कि उनकी मौत के साथ यह युद्ध वह जीत जायेंगे लेकिन शोषण-उत्पीड़न-असमानता के खिलाफ यह युद्ध आज भी जारी है। इस युद्ध में एक तरफ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी  शासक हैं तो दूसरी तरफ मजदूर-मेहनतकश-छात्र-नौजवान हैं। शहीदे आजम भगत सिंह मजदूरों-मेहनतकशों के योद्धा के बतौर इस युद्ध में शहीद हुए।
     फांसी पर चढ़ने से पहले भगत सिंह महान रूसी क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। फांसी से पहले जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि उन्हें लेनिन की जीवनी पूरी करने का समय दिया जाये। लेनिन उस रूसी क्रांति के नेता थे जिस क्रांति ने दुनिया में पहली बार मजदूरों-किसानों की सत्ता की स्थापना की। रूसी क्रांति ने जारीशाही शासन का समाप्त कर समाजवाद की स्थापना की तथा मानव द्वारा मानव के शोषण का खात्मा किया। यह वर्ष महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति (1917) का सौंवा वर्ष है।
       रूस की समाजवादी क्रांति ने न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा बल्कि 20 वीं सदी के इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी। इस क्रांति ने गुलामी, शोषण, असमानता और साम्राज्यवाद से लोहा लेने वाली ताकतों को नयी ऊर्जा व नयी राह प्रदान की। समाजवादी क्रांति ने दुनिया के शोषित-उत्पीड़ितों को बताया कि पूंजीवादी लोकतंत्र नहीं बल्कि समाजवादी लोकतंत्र ही उनकी मुक्ति का मार्ग है। रूसी समाजवादी क्रांति ने यह साबित कर दिया कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विकल्प समाजवाद है, कि दुनिया को अब परजीवी शासकों की जरूरत नही है बल्कि मजदूर-मेहनतकश स्वंय अपना शासन चला सकते हैं और उनसे बेहतर चला सकते हैं। कि भविष्य समाजवाद का है। दुनिया के कोने-कोने में समाजवाद के लिए संघर्ष करने वालों में भगत सिंह भी एक हैं। 
      भगत सिंह ऐसे युवा थे जो जोश और उमंग के साथ-साथ अपनी वैचारिक परिपक्वता के लिए जाने जाते हैं। भगत सिंह देश के नौजवानों को, वे चाहे मजदूर हों, छात्र हों या फिर बेरोजगार को ऊर्जा से भर देने वाले शख्स हैं। उनका पूरा जीवन बात का गवाह रहा है। युवाओं की उर्जा, उत्साह क्या होता है और अन्याय के खिलाफ अनवरत संघर्ष कैसे किया जाता है यह भगत सिंह से सीखा जा सकता है। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट-शोषण के खिलाफ संघर्ष भगत सिंह के संघर्ष का एक हिस्सा था तो मजदूरों-किसानों का राज समाजवाद की स्थापना करना दूसरा हिस्सा था। आज भी दुनिया और देश पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से मुक्त नहीं है। मजदूरों-किसानों-छात्र-नौजवानों को जीवन कष्टमय बना हुआ है।
       दुनिया में छाया आर्थिक संकट मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन और कष्टों से भर रहा है। शासक वर्ग रही-सही राहत भी मजदूरों-मेहनतकशों से छीन लेने पर आमादा है। पूरी ही दुनिया में शासक वर्ग दक्षिणपंथ की ओर ढुलकता जा रहा है। पूंजीवादी लोकतंत्र को और सीमित करते हुए वे मेहनतकशों पर हमलावर है। पूंजी की लूट, मुनाफे को बढ़ाने के लिए तथा मजदूर-मेहनतकशों को और निचोड़ने के लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। 
        भारत में भी संघी सरकार मजदूरों-मेहनतकशों पर हमले के नये कीर्तिमान रच रही है। श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव, मजदूरों के शोषण के लिए विदेशी निवेश को आतुर यह सरकार पूर्व की सरकारों को भी पीछे छोड़ दे रही है।आर्थिक हमलों के साथ-साथ संघी सरकार अपने फासीवादी एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ा रही है और अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को निर्ममता से कुचल रही है। विरोध के स्वर से निपटने में वह लंपटाई में उतर आयी है। कालेज-कैंपस संघी गुण्डागर्दी के अड्डे बनते जा रहे हैं। 
        ऐसे समय में भगत सिंह व उनके विचार और भी महत्व ग्रहण कर लेते हैं। ऐसे समय में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति और भी प्रासंगिक हो जाती है। चहुंओर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से पीड़ित जन की मुक्ति का मार्ग समाजवादी क्रांति से होकर जाता है। भगत सिंह ऐसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे जो भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के साथ-साथ शोषण और सभी तरह की असमानता से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत थे। जिसमें उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
    भगत सिंह ने कहा था-‘‘ हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असंभव बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतंत्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय संकट में है।’’ (‘अदालत एक ढकोसला है’ से कमिश्नर विशेष ट्रिब्यूनल लाहौर साजिश केस के सामने स्पष्टीकरण)
    आज के इस कठिन दौर में भगत द्वारा बताया गया समाजवाद का रास्ता ही मजदूरों-किसानांं-छात्रों-नौजवानों-महिलाओं के जीवन में बेहतरी का रास्ता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपने पतन में इस कदर डूब चुके हैं कि वे मानवजाति पर एक त्रासदी बन गये हैं। मजदूरों-मेहनतकशों को, छात्रों-युवाओं-महिलाओं को क्रांति और समाजवाद के परचम को लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचाना होगा जिसे शहीदे आजम भगत सिंह ने एक समय बुलंद किया था। 
     अक्टूबर क्रांति के सौवें वर्ष पर तथा शहीदे आजम भगत सिंह के शहादत दिवस पर हम मजदूरों-मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं का आहवान करते हैं कि मुक्ति के संघर्ष को आगे बढ़ायें। 

Saturday, 18 March 2017

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत

 

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत


अंततः नोटबंदी के राजनीतिक स्टंट के जरिये अपने विरोधियों को चित करने की मोदी की मंशा यू पी जीत के साथ पूरी हो गयी। उत्तराखंड व यू पी में लगभग तीन चौथाई सीट हासिल करने के बावजूद मोदी का कॉन्ग्रेस मुक्त भारत का सपना अधूरा रह गया। शायद मोदी जी भूल गए कि जिन
ताकतों ने उन्हे पाल पोस कर दिल्ली के तख़्त पर बिठाया है वही ताकते कोंग्रेस की पीठ पर भी हाथ रखे हुए है।  

     पंजाब में कॉन्ग्रेस तीन चौथाई सीटें हासिल की तो मणिपुर व गोवा में सबसे बड़ी पार्टी रही उत्तराखंड में भा ज पा की वोट % 54 से 46 रह गयी (2014 की तुलना में ) जबकि 2012 की तुलना में लगभग 13 % बढ़ गया। यू पी में 2014 की तुलना में भाजपा का वोट % 42 से 40 के लगभग हो गया। जबकि 2012 के असेम्बली चुनाव की तुलना में 25 % बढ़ गए। पंजाब में भा ज पा का वोट शेयर 2014 के लगभग 9 % से गिरकर 5.4 % ही गया जबकि कोंग्रेस के 2014 के 33 % से बढ़कर 39 % ही गए। गोवा में भाजपा के वोट शेयर 2014 के 53 % से घटकर 33 % हो गए । कॉन्ग्रेस के 37 % से घटकर लगभग 28 % रह गए। यू पी व उत्तराखंड में मिली जीत को ही देश के लिए जनादेश के रूप में प्रचारित किया रहा है। यू पी में फासीवादी ताकतों के लिए सब कुछ दांव पर लगा था । 
      मीडिया की मोदी भक्ति के बावजूद माहौल पक्ष में नहीं था। इसके बावजूद इतने बड़े स्तर पर सीटों का मिलना इस आरोप में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश छोड़ देता है कि ई वी एम में गड़बड़ी की गयी हो । यदि ऐसा नहीं है तो फिर दूसरे समीकरण जिसके लिए मोदी अमित शाह ने अपनी पूरी ताकत लगाई थी वह सफल हो गयी यानि जाति के भीतर सूक्ष्म स्तर के बंटवारे को इस्तेमाल करना , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना, मीडिया में चौतरफा मोदी प्रचार, पूरे मंत्री मंड़ल को चुनाव में झौंक देना आदि।   
      मोदी की यू पी जीत के साथ अम्बानी अदानी जैसी प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व अब और बढ़ने की ओर है। दूसरी ओर फासीवादी ताकतों के हमले जनवादी प्रगतिशील व क्रांतिकारी ताकतों पर बढ़ने है। मज़दूर मेहनतकश अवाम समेत छोटी मझोली पूंजी की तबाही बर्बादी आने वाले वक्त में और तेज होनी है

Wednesday, 8 March 2017

8 मार्च : अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस

8 मार्च :  अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस
 
    मौजूदा दौर में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का है। समस्या तब और विकराल हो जाती है सत्ता पर बैठे लोग इसे परोक्ष तौर बढ़ावा देते है और कुछ तो खुद इसमें शामिल भी है ।    महिला व बल विकास मंत्री मेनका गांधी जब ये कहती है कि हार्मोनल बिस्फोट से बचाव को लक्षमण रेखा होनी चाहिए। तब यह शासकों की घटिया मानसिकता को व्यक्त करता है।
  महिलाये किसी भी उम्र की हों घर या बाहर हर जगह असुरक्षित हैं। निर्भया कांड जैसी घटनाएं अब बढ़ती जा रही है।  
   लेकिन शासकों के पास इलाज के नाम पर वही नीम हकीमी नुस्खा है मज़बूत सरकार - कठोर कानून - मज़बूत क़ानून व्यवस्था । 
  इस तर्क को करने वाले सशत्र बलों द्वारा सशत्र बल विशेषाधिकार क़ानून के तहत मणिपुर से कश्मीर तक महिलाओं पर किये गए यौन हिंसा को सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे से भी बाहर करने को सही ठहराते है व इसे कोर्ट में भी चुनौती न दिए जा सकने को सही बताते है।
     स्पष्ट है कि मामला कुछ व्यक्तियों का नहीं है बल्कि समूछे तंत्र का है व्यवस्था का है। यह पूंजीवादी व्यवस्था जिसकी बुनियाद शोषण और लूट पर टिकी है । जहाँ दिन रात महिला को यौन वस्तु मे बदल देने का प्रचार हो वहां यह मुमकिन नहीं कि लैंगिक बराबरी कायम हो, महिला मुक्ति हासिल हो।
 महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पूंजीवादी समाज के  पूर्व के समाजों में भी मौजूद थी । यानी वर्गीय समाजों की उत्पत्ति के साथ यह यौन हिंसा प्रारंभ होने लगती है और आज यह व्यापक और विकराल रूप धारण करती जा रही है।
  वर्गीय समाज की उत्पत्ति के साथ यौन हिंसा के दो संगठित और भिन्न रूप  एकनिष्ठ विवाह और वेश्यावृत्ति सामने आये। दोनों रूप एक-दूसरे से विपरीत थे परंतु  दोनों ही रूपों में स्त्री का कोई वज़ूद नहीं था वह कहीं नहीं थी। 
उसकी हैसियत संपत्ति की सी थी । जिसे काबू में रखने के लिए तमाम नियम कानून बनाये गए । धर्म के जरिये इसे पवित्र व संस्थाबद्ध कर दिया गया।
   इसलिए अक्टूबर क्रांति शताब्दी वर्ष पर समाजवादी क्रांति की उपलब्धियों को याद करते हुए यही कहना या स्थापित करना होगा कि महिला मुक्ति का रास्ता सिर्फ समाजवाद से होकर जाता है।





 

Friday, 3 February 2017

देशी विदेशी पूंजी के हितों को साधता बजट

देशी विदेशी पूंजी के हितों को साधता बजट

  2017-18 का बजट घोषित हो गया। 16 मई 2014 के दिन से यह तय हो गया था कि जिन नवउदारवादी नीतियों के घोड़े की लगाम पहले कांग्रेस के पास थी अब वह फासीवादी ताकतों के हाथ में थी इसे तेज भागना ही था।
    इसलिए बजट भी उसी तरह का बनना था। 2015 के बजट में ही यह साफ़ ही चुका था। तब सामाजिक कल्याणकारी मदों में दी जाने वाली राशि में बड़ी कटौती की गयी थी। ग़रीब मेहनतकश अवाम के पक्ष में खर्च होने वाली सब्सिडी को और कम कर दिया गया था।
    इसके उलट देशी विदेशी पूंजी को तमाम सहूलियते-छूटें दी गयी । कर में लाखों करोड़ की छूट, कॉर्पोरेट व संपत्ति कर से राहत आदि।
    2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से ही साम्राज्यवादी मुल्कों विशेषकर अमेरिका का ये दबाव और बढ़ा है कि राजकोषीय घाटे को लगातार कम किया जाय, सामाजिक मद में खर्च होने वाले बजट को लगातार कम  किया जाय, सब्सीडी (गरीबों) को ख़त्म किया जाय, पूंजी को लूट के रास्ते को और सुगम बनाया जाय। विनिवेशीकरण नये आर्थिक सुधारों के दौर का ही नारा है।
     यही मूल मंत्र बजट में दिखता है राजकोषीय घाटे को 3.2 % पर लाने के लिए सरकार खुद तो देशी विदेशी पूंजी उनकी तारीफ कर रही है यही हाल नोटबंदी के बाद होने वाले नुकसान के बावजूद सामाजिक मदो  व सब्सिडी में कटौती जारी है। यही नहीं सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश(निजीकरण) के जरिये 72500 करोड़ रूपये उगाहने का लक्ष्य सरकार ने लिया है।
     सार्वजनिक मद स्वास्थ्य, शिक्षा , परिवहन, महिला बाल कल्याण विकास आदि के लिये क्या किया गया कितना बजट दिया गया । इन सभी में बजट के आकार  व मुद्रा स्फीति के अनुपात में गिरावट जारी है।
     वैश्विक मानव विकास सूचकांक में बेहद ख़राब स्थिति के बावजूद संघी मोदी सरकार का इन मदो में कटौती करना उसकी नग्न पूंजीपरस्ती व गरीब अवाम के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही दिखाता है।
    2012 में निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा के लिए पिछले साल जारी "निर्भया फंड" बजट  585 करोड़ को कम करके 400 करोड़ कर दिया गया है।
      मनरेगा में पिछले साल के कुल 47400 करोड़ को बढाकर 48000 करोड़ मात्र किया गया मात्र 1.2 % की बढ़ोत्तरी !! किसानों को कितने के कर्ज माफी से राहत दी गयी ?  राहत तो दूर उल्टा उन्हें सांस्थानिक कर्ज जाल में फ़साने के लिए भारी भरकम राशि कर्ज के लिए उपलब्ध है। 

     इसके उलट पूंजीपतियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स में 5 % की छूट के अलावा उन्हें प्रत्यक्ष व परोक्ष फायदा देने को तमाम बातें बजट में हैं । 2015 में ही संघी मोदी सरकार पूंजीपतियों को 6 लाख करोड़ रूपये टेक्स में छूट दे चुकी थी । 

चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...