बी एच यू की छात्राओं का संघर्ष व इसके निहितार्थ
बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की छात्राओं ने सितंबर माह के तीसरे हफ्ते में अपना संघर्ष शुरू किया था। यह संघर्ष सामान्य से असामान्य हो गया।
एक छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न की घटना हुई। इसके विरोध में तत्काल ही छात्राएं एकजुट हुई। प्रॉक्टर से शिकायत हुई, कुलपति से शिकायत हुई। दोनों का ही जवाब तिलमिलाने वाला था पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित था। कुलपति तो संघ परिवार से जो था उसके नस नस में स्त्री विरोधी रुख था। छात्राओं से कहा गया कि होस्टल से 6 बजे के बाद बाहर मत निकलें।
छात्राओं की मांग थी सुरक्षा की, होस्टल परिसर में सी सी टी वी लगाने की। लेकिन इन्हें कुलपति व विश्वविद्यालय प्रशासन ने कान ही नही दिए।
अन्ततः छात्राओं को धरने पर बैठना पड़ा। एक मुद्दा जिसे तत्काल ही सुल्टाया जा सकता था उसे फासिस्ट मानसिकता ने दूसरे धरातल पर पहुंचा दिया।प्रोक्टरीयल बोर्ड के अपने लठैतों भी छात्राओं को डराने धमकाने का काम किया। छात्राओं के परिजनों को फोन के जरिये दबाव बनाने के प्रयास हुए। होस्टल छात्रावास में पानी, बिजली को भी बाधित किया गया। लेकिन संघर्ष में बाकी छात्र-छात्राएं भी शामिल होती गए।
इस दौरान प्रधानमंत्री भी वंहा से होकर गुजरे। आंदोलनकारियों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री महोदय जो कि बनारस के सांसद है कम से कम सांसद होने के नाते तो उनके बीच आएंगे, बात सुनेंगें। लेकिन उम्मीद ! वह भी फासिस्टों से !! इस उम्मीद को पूरा तो होना न था। इस सबने संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम ही किया।
कुलपति, विश्वविद्यालय प्रशासन कुछ भी सुनने को तैयार न था। न ही योगी सरकार कोई हस्तक्षेप कर रही थी। वह भी सब कुछ होने दे रही थी। अंततः सबने मिलकर इस आवाज को खामोश करने के लिए अपने हाथ बढ़ाये।
तुरंत ही भारी तादाद में पुलिस फोर्स व अर्धसैनिक बल तैनात कर दी गई। महिला पुलिस की तैनाती नही की गई। यह सब मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए भी था लेकिन आंदोलन को इसने आगे बढ़ाने का ही काम किया।
साफ साफ तौर पर अब एक तरफ जनवाद, न्याय व प्रगतिशीलता के लिए बुलन्द आवाज थी दूसरी तरफ दमनकारी, जनवाद विरोधी, स्त्रीविरोधी प्रतिक्रियावादी ताकते थी। अन्ततः दमन चक्र चलाया गया। आंदोलन तात्कालिक तौर पर बिखरने के साथ-साथ कुछ हासिल कर गया साथ ही भविष्य के संदर्भो में नई उम्मीदों को भी जगा गया। प्रॉक्टर को इस्तीफा देना पड़ा। कुलपति को प्रकारांतर से हटना पड़ा नए कुलपति को लाना पड़ा। इस संघर्ष के साथ साथ अब यह भी तय हो गया कि आने वाले समय में ऐसी टकराहटें और भी बढेंगी। व्यक्तिगत मसलों पर जनवाद के भाव के चलते ही सही फासिस्ट ताकतों का नौजवान छात्र छात्राएं जबरदस्त प्रतिरोध करेंगी ।
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