'23 मार्च' भगत सिंह शहादत दिवस के 87 वें साल पर
23 मार्च 1931 का दिन भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव को अंग्रेजी हुक्मरानों द्वारा फांसी दी गई थी तब से अब 87 साल गुजर चुके हैं । इन 87 सालों में देश के शासक बदल गए। भगत सिंह की बातों में कहा जाय तो गोरे अंग्रेज तो चले गए काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज़ हो गए। एक खतरनाक दमन, अंग्रेजी हुकूमत के आतंक साथ ही दंगों का दौर आज़ादी से पहले गुजरा था। और आज़ादी के बाद आज जब 'सवाल' उठाने पर पहरे लग रहे हों ; अधिकारों की -रोजगार की-महंगाई की बात करना गुनाह हो। जब मेहनतकश दलितों-मुस्लिमों के पक्ष में आवाज उठाना देशद्रोह हो ; हर चीज को जब 'धर्म-संस्कृति-देशभक्ति' की चाशनी में परोसा जा रहा हो; जब चौतरफा नफरत और दंगो की ही साजिश रची जा रही हो तब कहना ही होगा कि यह वक़्त बेहद खतरनाक है !
अवश्य ही ! जिस समाज का ख्वाब भगत सिंह ने बुना था यह वैसा समाज नहीं है। भगत सिंह व उनके साथियों का ख्वाब था देश आज़ाद हो ; कि आज़ाद भारत समाजवादी देश बने। जिसमें अन्याय उत्पीड़न शोषण के लिए कोई जगह न हो ; जिसमें धर्म लोगों का निजी मामला हो, कोई गैरबराबरी ना हो; जिसमें पूंजी की जकड़न से समाज मुक्त हो; मेहनतकश जनता में भाईचारा हो ।
ऐसे समाज के लिए भगत सिंह व उनके साथियों ने कुर्बानी दी। वह न केवल अंग्रेजो से लड़े बल्कि देश के काले अंग्रेजों के भी वह विरोधी थे। भगत सिंह कहते थे कुछ फर्क नही पड़ेगा यदि अंग्रेज पूंजीपति चले भी जाएं उनकी जगह देश के पूंजीपति जमीदार शासक बन जाएं तो। यही वजह थी कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई और साथ ही राजगुरु व सुखदेव को भी।
ये नौजवान शहीद हो गए मगर इनके विचार को अंग्रेज सरकार न मार सकी । इनके कुर्बानी व विचारों की चर्चा घर घर होने लगी। बस स्थितियां ऐसी बनी कि देश आजाद तो हुआ लेकिन सत्ता काले अंग्रेजो को मिल गयी।
इन काले अंग्रजों की बदौलत आज संसाधनों व जनता की लूट खसोट निर्मम हो चुकी है। नोटबंदी व जी.एस.टी की हकीकत हमारे सामने है। बढ़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी को हर कोई महसूस करता है। फैक्ट्रियों में मज़दूर का भयानक शोषण है तो उधर किसान आत्महत्याएं कर रहे है। लेकिन चैनलों में "चमकता भारत" है "खुशहाल जनता" है । टी वी चैनलों की-अखबारों की क्या कहें ? वंहा से जनता के दुख दर्द गायब हैं जनता के मुद्दे गायब हैं । वंहा चीख-शोरगुल,गाली-गलौज के सिवाय क्या है ? यंहा बस "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति-युद्ध" का उन्माद है। "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति" के ठेकेदारों का ही अब चौतरफा आतंक है। ये हिटलर-मुसोलिनी के भक्त अपने आतंक से जनता को रौंद रहे है। इनके आतंक से मेहनतकश इंसान कसमसा रहा है। दूसरी ओर शासक पूंजीपतिवर्ग है उसके मुनाफे का कारोबार इन सबसे बढ़ती पर है, शेयर बाजार आसमान छू रहा है। हाल ये है कि देश की कुल संपदा का 73 % हिस्सा देश के 1 % पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका है जो कि पहले 58 % था। यही वो "विकास" है जिसके जश्न मनाये जा रहे है। यही जनता की "खुशहाली" है।
जनता की इस बर्बादी के लिए शासक पूंजीपति जिम्मेदार है । लंबे वक्त तक पूंजीपतियों ने कांग्रेस को सत्ता पर बिठाये रखा। अपने मुनाफे के कारोबार को बहुत बढ़ाया। मंदी का दौर आया तो पूंजीपतियों ने फासीवादी ताकतों को सत्ता पर बिठा दिया । 'अम्बानी-अडानी का हाथ अब मोदी-शाह के साथ' है इनके सर पर है। अब 'जनता को कंगाल बनाने -पूंजीपतियों को मालामाल करने' की स्कीम जोर शोर से चल रही है। इसीलिए 'पकोड़े बेचना' 'कबाड़ बेचना' 'गुब्बारे बेचना' इनकी नज़र में रोजगार है। जनता इस लूट को न समझ पाए इसलिये 'फूट डालो-राज करो' का मंत्र हर ओर है। इसीलिए दंगे अब कभी इधर तो कभी उधर बहुत जरूरी है। जनता 'हिन्दू -मुस्लिम' में बंट जाएं ऐसे मुद्दे बेहद जरूरी हैं । सीमाओं पर युद्ध जरूरी है। हथियारों के अरबों-खरबों के धंधे का सवाल जो है। फिर पड़ोसियों के खिलाफ घोर नफरत भी तो बहुत जरूरी है ताकि 'राष्ट्रवाद' का कारोबार चलता रहे और 'युद्ध' को जायज ठहराया जा सके । दोनों तरफ सीमाओं पर रहने वाले घरों में जो खौफ-दहशत व मौत पसरी रहती है उनको कोई क्यों सुने। इन दंगो में कौन मरता है ? सीमाओं पर कौन मरता है ? नोटबंदी से जो मरे वो कौन लोग थे ? क्या कोई पूंजीपति या नेता या बड़ा अधिकारी था ? नहीं । निश्चित तौर पर --मरने वाले मेहनतकश लोग थे। चाहे वह किसी भी धर्म के हों , जाति के हों या फिर क्षेत्र के हों । मेहनतकश जनता या उनके बच्चे ही सब जगह मारे जाते है।
मेहनतकश जनता मेहनत करती है संघर्ष में कुर्बानी देती है यही चीज है जो एकजुट करती है संगठित करती है। आज़ादी का संघर्ष हम मेहनतकशों की कुर्बानी को बताता है दुनिया हम मेहनतकशों की खून पसीने से ही रोशन है। इस खून-पसीने में कोई हिन्दू-मुस्लिम या ऊंची-नीची जाति नहीं बता सकता। यही वह चीज है बुनियाद है जो हमें ताकतवर बनाती है और जिससे शासक खौफ खाते है डरते हैं। अन्याय, शोषण और जुल्म से लड़ने में यही एकता मेहनतकश जनता का हथियार है । शहीद भगत सिंह इसी एकता की बात करते हुए अंग्रेजों से लड़ गए थे। यही आज की राह है।
इसलिए आज अंधेरे दौर में फिर से जरूरत है शहीद भगत को याद करने की। अपने दौर में भगत सिंह ने इन "धर्म-संस्कृति" के ठेकेदारों को खूब खरी खोटी सुनाई थी। भगत सिंह ने लिखा --“....जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है।.. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर ....सिर-फुटौव्वल करवाते हैं...।....फायदा...इन दंगों से अत्याचारियों(अंग्रेजों को) को मिला है वही नौकरशाही-जिसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था....आज अपनी जड़ें ... मज़बूत कर चुकी है।.... .....संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। .....तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो।..1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं।...इसलिए गदर पार्टी-जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।"’( साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज " नामक लेख से)
भगत सिंह की शहादत के 87 वें साल पर जरूरी है कि विशेषकर युवा भगत सिंह की इस आवाज को सुनें जो भगत सिंह ने अपने दौर में युवाओं के लिए लिखी थी । भगत सिंह के शब्दों में ---
" चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक।... वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध(जगाना) कर दे..बड़े बड़े साम्राज्य उलट डाले।...अमेरिका के युवक विश्वास करते है कि अधिकारों को रौंदने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है। हे भारतीय युवक!... उठ, आँखें खोल,देख....गरज उठ !...( साप्ताहिक मतवाला में छपे लेख : "युवक" से )
आज वक़्त की जरूरत है कि शहीद भगत सिंह के विचारों की राह पर बढ़ा जाए ! संगठित हुआ जाय ! भगत सिंह के समाजवाद के ख्वाब को हकीकत में बदलने की दिशा में बढ़ा जाय।
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