संवैधानिक तानशाही के 4 दशक बाद ....
( 26 जून 1975 )
( 26 जून 1975 )
जून 1975 के आपात काल के आतंक के दौर को गुजरे हुए अब लगभग 4 दशक गुजर चुके है। आज के दौर की फ़ासीवादी सरकार खुद को "लोकतंत्र के रक्षक" के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वह इस संवैधानिक तानाशाही को इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत आकांक्षा के चलते या फिर ज्यादा से ज्यादा कॉंग्रेस का लोकतंत्र पर हमले के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यही कुछ हद तक अन्य पूंजीवादी उदार बुद्धिजीवी भी करते है। बस दोनों में ये फर्क है कि मोदी एंड कंपनी इस आड़ में फासीवाद की ओर बढ़ रही है फासीवाद कायम करना ही इनका मकसद है जबकि उदार पूंजीवादी बुद्धिजीवी लोकतंत्र को वर्ग निरपेक्ष व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
26 जून को इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में 'आपात काल' थोपा था। 'तानाशाही' संविधान अनुच्छेद 352 के जरिये ही कायम हुई थी। तब आम नागरिकों के सभी जनवादी व संवैधानिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। लगभग सवा लाख लोगों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया गया। सरकारी आतंक पुलिस के जरिये कायम कर दिया गया।जन संघर्षों का भयानक दमन किया गया। जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया तथा सौंदर्यीकरण के नाम पर 7 लाख गरीब मज़दूर मेहनतकशों को दिल्ली से बाहर गंदगी में खदेड़ दिया गया था।
इस संवैधानिक तानाशाही के जरिये पूंजीवादी जनतंत्र जो कि पूंजीपति वर्ग की आम अवाम पर तानाशाही का छुपा रूप है जिसमें अवाम को सीमित अधिकार हासिल होते है वह नग्न होकर अपने वास्तविक स्वरूप में सामने आ गयी। यह संवैधानिक तानाशाही भी तब शासक पूंजीपति वर्ग द्वारा देशव्यापी जनसंघर्षों से निपटने का ही तरीका था। यह 'इंदिरा की सनक' का नतीजा नहीं बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से अपने शोषण उत्पीड़न से अवाम के इनकार कर देने व सड़कों पर संघर्ष के लिए उमड़ आने का नतीजा था। हक़ीक़त ये है कि पूंजीवादी विकास का जो रास्ता शासकों ने आज़ादी के चुना था वह संकट दर संकट आगे बढ़ता रहा। 65 में आई एम एफ से करार के रूप में कर्ज लेना व फिर डॉलर के सापेक्ष रुपये का भारी अवमूल्यन कर देना। 1973 तक आते आते देश में अनाज का संकट , डीजल-पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगना, बेरोजगारी का भयावह हो जाना व तनख्वाह देना बहुत मुश्किल जाना। यही नही रेलवे के 21 दिन के ऐतिहासिक हड़ताल, पी ए सी की यूनिट का बगावत कर देना साथ नक्सलबाड़ी आंदोलन स्थिति इस हद तक गंभीर थी खाने पीने की चीजों के बहुत महंगे होने से कई जगह पर दंगे होने लगे। शासकों का दूसरा हिस्सा भी इस माहौल में 'इंदिरा गद्दी छोड़ो' का नारा दे रहा था। इन स्थितियों में शासक पूंजीपति वर्ग के लिए जरूरी हो गया कि इन सब पर सख्ती से लगाम लगाये। इंदिरा गांधी ने 26 जून को आंतरिक सुरक्षा का तर्क देकर 'मीसा' लगाकर तानाशाही थोप दी ।
कांग्रेस के इंदिरा गांधी के 'गरीबी हटाओ' की जगह 4 दशकों बाद आज "धर्म-संस्कृति और राष्ट्रवाद" का चोला पहनी हुई पार्टी भाजपा है नेता ' नरेंद्र मोदी' हैं जिनका नारा था "अच्छे दिन आएंगे"। अब खतरा तानाशाही का नहीं बल्कि फासीवाद यानी खूनी आतंकी तानाशाही का है।
वैश्विक आर्थिक के संकट के इस दौर में पूरी दुनिया में जनविरोधी नवउदारवादी नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाने के साथ शासक पूंजीपति वर्ग अपनी राजनीति में भी घोर प्रतिक्रियावादी होता चला गया है वह दक्षिणपंथी या फ़ासीवादी ताकतों को आगे बढ़ा रहा है। यही हाल भारत में भी हैं । साल 2014 में ही देश एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों ने मोदी व संघ परिवार को सत्ता पर बिठाया है। सत्ता में पहुंचने के बाद यह फ़ासीवादी आंदोलन लगातार आगे बढ़ रहा है।
इन्होंने संविधान व जनवादी अधिकारों को व्यवहार में लगभग खोखला बना दिया है। खान-पान, रहन-सहन अपने पसंद-नापसंद के हिसाब से जीवन जीने के अधिकार साथ ही 'आलोचना करने' 'सवाल उठाने' के अधिकार पर इन्होंने हर तरफ हमला बोला है। किसी के घर में घुसकर उसकी खाने-पीने की तलाशी लेने का मसला हो या विवाह का मसला हो इन्होंने इस पर भी 'भारतीय संस्कृति' व 'लव जिहाद' के नाम से हमला बोला है। अखलाक की हत्या व केरल का हदिया प्रकरण, तनुसेठ का पासपोर्ट मामला ये इसी की अभिव्यक्ति है।
तानाशाही को तो आम जनता तो तत्काल महसूस कर सकती है व जन विरोधी सरकार को साफ साफ पहचान सकती है इसलिए इसके विरोध में संघर्ष कर सकती है। लेकिन फासीवाद तो आम जनता के ही बड़े हिस्से को फ़ासीवादी ताकतें द्वारा झूठ-लफ्फाजी के जाल में फंसाकर कायम होता हैं। इसलिए इसका विरोध बहुत कठिन व जटिल हो जाता हैं क्योंकि जिस जनता की बर्बादी व तबाही हो रही होती है उसका बड़ा हिस्सा "अच्छे दिनों" की उम्मीद में फासीवादियों के साथ खड़े हो जाता है। वर्तमान दौर का आम जनता के लिए बड़ा खतरा फासीवाद का है जो बिल्कुल हमारे निकट है। निश्चित तौर पर इसका जवाब फासीवाद विरोधी शक्तियों का सड़कों पर संघर्ष ही हो सकता है ।
अतीत में इंदिरा की तानाशाही का जवाब आम जनता ने अपनी एकता व संघर्षों से दिया था । यही दुनिया में हुआ था जब हिटलर के फासीवाद को सोवियत रूस की क्रांतिकारी जनता ने ध्वस्त कर दिया था । बढ़ते फ़ासीवादी खतरे का जवाब आज भी यही है। यानी मज़दूर मेहनतकश जनता की एकजुटता, समाजवाद के लिए संघर्ष, इसी के साथ फासीवाद विरोधी ताक़तों की एकजुटता। कोई मोदी व भाजपा विरोधी चुनावी मोर्चा इस फ़ासीवादी आंदोलन का जवाब नही हो सकता।
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