प्रवासियों के खिलाफ गुजरात में हिंसा
महाराष्ट्र की तर्ज पर गुजरात में भी उत्तर भारतीयों पर विशेषकर बिहार व उत्तर प्रदेश के लोगो पर बड़ी तादाद में हमले किये गए हैं। हिंसा व नफरत के चलते गुजरात छोड़कर गृह प्रदेश में वापस आना पड़ रहा है। ये सिलसिला अभी रुका नही है।
इस हिंसा के पीछे ठाकोर सेना का हाथ बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि गुजरात के कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर इसके पीछे है। कांग्रेस का आरोप है कि इसके पीछे भा ज पा है उनके संगठन है। आरोप प्रत्यारोप का यह सिलसिला जारी है।
मामले के केवल तात्कालिकता तक जोड़ कर असल वजह को छुपा लिया जाता है। हमने देखा है कि उत्तर भारतीयों के प्रति खासकर यहां के कामगारों मज़दूरों के प्रति जो रोजगार की तलाश में अपने प्रांत से महाराष्ट्र में गए हैं उनके प्रति एक गहरी नफरत भरी राजनीति का प्रचार शिव सेना व बाद में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने निरन्तर किया है। इनके द्वारा अलग अलग वक़्त पर इन उत्तर भारतीयों लोगों पर हमले किये जाते रहे हैं। इस हमले में इन्होंने स्थानीय आबादी को अपने संकीर्ण पूंजीवादी राजनीति के इर्द गिर्द लामबद्ध किया और हिंसा में उसे भागीदार बनाया है।यही स्थिति गुजरात के मामले में भी है। यही असम में हिंदी भाषी मज़दूरों के साथ हुई हिंसा में भी देखा जा सकता है।
संघ परिवार व भाजपा लंबे समय से अपनी साम्प्रदायिक राजनीति में अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिमों के प्रति नफरत का जमकर प्रचार व आंदोलन किया है। इस काम में कांग्रेस भी बहुत पीछे नही रही है। शिव सेना को खड़ा करने में कांग्रेस की भूमिका रही है।
दरअसल रोज़गार का संकट पूरे देश के पैमाने पर मौजूद है गुजरात भी इससे अछूता नहीं है। आरक्षण के लिए अभी कुछ साल पहले हार्दिक पटेल की अगुवाई में जो आन्दोलन हुआ वहां से भी इस संकट को समझा जा सकता है।
इस हिंसा के पीछे ठाकोर सेना का हाथ बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि गुजरात के कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर इसके पीछे है। कांग्रेस का आरोप है कि इसके पीछे भा ज पा है उनके संगठन है। आरोप प्रत्यारोप का यह सिलसिला जारी है।
मामले के केवल तात्कालिकता तक जोड़ कर असल वजह को छुपा लिया जाता है। हमने देखा है कि उत्तर भारतीयों के प्रति खासकर यहां के कामगारों मज़दूरों के प्रति जो रोजगार की तलाश में अपने प्रांत से महाराष्ट्र में गए हैं उनके प्रति एक गहरी नफरत भरी राजनीति का प्रचार शिव सेना व बाद में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने निरन्तर किया है। इनके द्वारा अलग अलग वक़्त पर इन उत्तर भारतीयों लोगों पर हमले किये जाते रहे हैं। इस हमले में इन्होंने स्थानीय आबादी को अपने संकीर्ण पूंजीवादी राजनीति के इर्द गिर्द लामबद्ध किया और हिंसा में उसे भागीदार बनाया है।यही स्थिति गुजरात के मामले में भी है। यही असम में हिंदी भाषी मज़दूरों के साथ हुई हिंसा में भी देखा जा सकता है।
संघ परिवार व भाजपा लंबे समय से अपनी साम्प्रदायिक राजनीति में अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिमों के प्रति नफरत का जमकर प्रचार व आंदोलन किया है। इस काम में कांग्रेस भी बहुत पीछे नही रही है। शिव सेना को खड़ा करने में कांग्रेस की भूमिका रही है।
दरअसल रोज़गार का संकट पूरे देश के पैमाने पर मौजूद है गुजरात भी इससे अछूता नहीं है। आरक्षण के लिए अभी कुछ साल पहले हार्दिक पटेल की अगुवाई में जो आन्दोलन हुआ वहां से भी इस संकट को समझा जा सकता है।
हकीकत यही है कि पूंजीवाद अपनी गति में आम तौर पर बेरोजगार आबादी को बढ़ाता है इसमें एक छोर पर पूंजी तो दूसरे छोर पर कंगाली , बेरोजगारी का संचय होता जाता है। इस बेरोज़गारी का समाधान पूंजीवाद के रहते आम तौर पर सम्भव नहीं है। ऐसी स्थितियों में पूंजीवादी राजनीति एक समय में इस संकट का आभासी समाधान ही प्रस्तुत करती है। इसमें से एक आभासी समाधान यह भी है कि एक क्षेत्र , प्रांत या देश में बेरोजगारी के लिए दूसरे क्षेत्र, प्रांत के लोगों या या धर्म , नस्ल आदि के लोगों को बताया जाय। इस संकीर्ण, साम्प्रदायिक, विभाजनकारी राजनीति का परिणाम अपनी निरंतरता में नफरत व हिंसा को बढ़ाने वाला होता है। गुजरात में भी जो हिंसा हुई है उसके मूल में यही है। जहां तक सभी नागरिकों को सम्मानजनक रोज़गार उपलब्ध कराने का सवाल है यह केवल नियोजित व योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्था में ही सम्भव है। जहां पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के बुनियादी अंतर्विरोध को हल कर लिया जाता है।
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