काकोरी के शहीद
आज से लगभग 90 साल पहले दिसंबर 1927 में 4 नौजवांनो को फांसी हुई थी। ये चार नौजवान थे अशफ़ाक़ उल्ला खां, राजेन्द्र लाहिड़ी, रोशन सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल
इनकी चाहत थी और संघर्ष था कि देश अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हो ! कि देश में हिन्दू मुस्लिम के नाम पर जनता को बांटने की साजिश खत्म हो ! कि धर्म सबका निजी मामला हो ! कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन से धर्म को बाहर कर दिया जाय !
अपने मकसद के लिए ही इन्होंने काकोरी में ट्रेन के खजाने को हासिल करने की कोशिश की। अंग्रेजी हुकूमत की नज़र में यह डकैती थी। इन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेज सरकार ने इन्हें फांसी दे दी। ये चार काकोरी के शहीद आज भी हमें प्रेरित करते हैं।
इनका संघर्ष, इनका जज्बा, इनका बलिदान और अलग अलग धर्म से होने के बावजूद आज़ादी के लिए इनका एकजुट संघर्ष ! आज भी हमें सही राह दिखाता है। इनके विचार आज 'हिन्दू-मुस्लिम' 'मंदिर-मस्जिद' के हंगामे से निपटने के लिए जरूरी हैं।
आज वक़्त ज्यादा संगीन है ज्यादा खतरनाक है। आज हर तरफ़ 'हिन्दू-मुस्लिम' 'मंदिर-मस्जिद' का शोर है हंगामा है। इस शोर में, इस साजिश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। बराबरी के अधिकार पर हमला बोला जा रहा है। आज शासक जनवादी और संविधान
में मिले अधिकारों को व्यवहार में खत्म करने की ओर बढ़ रहे हैं यह सब कुछ हिन्दू-मुस्लिम, मन्दिर-मस्जिद का हंगामा खड़ा कर किया जा रहा है फर्जी देशभक्ति का हंगामा और उन्माद खड़ा करके किया जा रहा है।
इस उन्माद में, इस शोर गुल में वो आवाजें कुचल दी जा रही हैं दबा दी जा रही हैं जो पूछती है कि सवा लाख टीचर जिन्हें एक झटके में मोदी- योगी शासन में बाहर कर दिया गया उनका क्या हुआ? जो किसानों की आत्महत्याओं और उनके आंदोलन पर गोली चलाने के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं ! मेहनतकश दलितों व मुस्लिमों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ आवाज उठाते हैं।
इस हंगामे में ये आवाज गायब कर दी जा रही हैं कि बैंक के 8 लाख करोड़ रुपये जिसे डकारकर पूंजीपति मालामाल हुए हैं इन पूंजीपतियों से क्यों नही वसूले जा रहे है ? क्यों इसे बट्टे खाते में डाला जाता है ? मेहनतकश जनता के बेटे-बेटियों के लिए तो 'ठेके' की नौकरी है जबकि अम्बानी-अडानी जैसों को सारे संसाधन लुटाए जा रहे हैं सारे कानून इनके हिसाब से तोड़े मरोड़े और बनाये जा रहे हैं ऐसा क्यों ? क्यों जनता को कंगाल बनाने और पूंजीपतियों की दौलत बढ़ाने वाले कानून बनाये जा रहे हैं ?
क्या जनता सरकार इसलिए बनाती है कि सरकार जनता पर अपनी मनमर्जी थोपे ? सक्षम और ताकतवर लोगों के पक्ष में काम करे ? मज़दूरों, किसानों, छात्रों, बेरोजगारों के संघर्ष का मज़ाक उड़ाये, इन पर लाठियां चलाये और फर्जी मुकदमे लगा दे।
माहौल कितना गंभीर हो चुका है कोई भी बुलन्दशहर में इंस्पेक्टर की हत्या से अंदाजा कर सकता है। संघी फासिस्ट दस्ते बजरंग दल का हाथ इसमें बताया जा रहा है।
मोदी-योगी सरकार इस तरह अपना काम कर रही है। इनका अंदाज हिटलर-मुसोलिनी सा ही है। सवाल केवल मोदी-योगी या भा ज पा का नहीं है। कांग्रेस, सपा, बसपा सभी पूंजीवादी पार्टियों का बुरा हाल है। सभी पूंजीपतियों के लिए काम करती हैं या इनकी हैसियत भी पूंजीपतियों सी हो गई है। सभी पार्टियां मेहनतकश जनता के विरोध में हैं। सभी भ्रष्ट हैं और जनता के आंदोलनों का सभी ने दमन किया है।
आज समाज इसी मुकाम पे खड़ा है। आज पूंजी और देश के टॉप पूंजीवादी घराने समाज को बर्बरता और जंगलराज की ओर धकेल रहे हैं। इनकी मुनाफे की अंध हवस सब कुछ निगल लेने को बेचैन है। ये एक ओर छोटी संपत्ति-छोटी पूंजी के मालिकों की संपत्ति - पूंजी को हड़प ले रहे हैं । दूसरी तरफ ये मज़दूरों की मेहनत को पूरी तरह निचोड़ लेने को बेताब हैं। यही नहीं पेंशन, प्रोविडेंट फंड, सब्सिडी, राशन, बैंक जमा आदि पर भी इनकी गिद्ध नज़र जमी हुई है।
आज असल सवाल यही है कि हमारा समाज किधर की ओर जाएगा ? क्या बड़ी बड़ी पूंजी के मालिक और इनकी पार्टी जनता को बांटने में सफल हो पाएंगे ? क्या ये हिटलर-मुसोलिनी की तरह समाज को बर्बादी तबाही की दिशा में ले जाने में सफल होंगे ? आतंकी तानाशाही कायम करने में कामयाब होंगे ? जहां बड़ी बड़ी पूंजी के मालिकों के मुनाफे की हवस का नंगा नाच होगा। जहां मेहनतकश जनता के हर हिस्से की आवाज को खामोश कर दिया जायेगा। या फिर जनता अपने संघर्षों के दम पर समाजवाद की ओर बढ़ेगी। मज़दूर मेहनतकश जनता के राज को बनाएगी। जहां सारे संसाधनों की मालिक जनता होगी। जनता ही सब कुछ तय करेगी।
भविष्य कैसा होगा ? यह सब कुछ हम पर है। यदि हम एकजुट होते हैं 'मंदिर-मस्जिद' के इनके नारों में नहीं फंसते हैं 'हिन्दू-मुस्लिम' के इनके जाल में नहीं फंसते हैं तो तय है कि जीत हमारी होगी। हमारे एकजुट संघर्ष ही हमें जीत दिला सकते हैं। समाजवाद की ओर ले जा सकते हैं।
इनकी चाहत थी और संघर्ष था कि देश अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद हो ! कि देश में हिन्दू मुस्लिम के नाम पर जनता को बांटने की साजिश खत्म हो ! कि धर्म सबका निजी मामला हो ! कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन से धर्म को बाहर कर दिया जाय !
अपने मकसद के लिए ही इन्होंने काकोरी में ट्रेन के खजाने को हासिल करने की कोशिश की। अंग्रेजी हुकूमत की नज़र में यह डकैती थी। इन्हें बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेज सरकार ने इन्हें फांसी दे दी। ये चार काकोरी के शहीद आज भी हमें प्रेरित करते हैं।
इनका संघर्ष, इनका जज्बा, इनका बलिदान और अलग अलग धर्म से होने के बावजूद आज़ादी के लिए इनका एकजुट संघर्ष ! आज भी हमें सही राह दिखाता है। इनके विचार आज 'हिन्दू-मुस्लिम' 'मंदिर-मस्जिद' के हंगामे से निपटने के लिए जरूरी हैं।
आज वक़्त ज्यादा संगीन है ज्यादा खतरनाक है। आज हर तरफ़ 'हिन्दू-मुस्लिम' 'मंदिर-मस्जिद' का शोर है हंगामा है। इस शोर में, इस साजिश में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। बराबरी के अधिकार पर हमला बोला जा रहा है। आज शासक जनवादी और संविधान
में मिले अधिकारों को व्यवहार में खत्म करने की ओर बढ़ रहे हैं यह सब कुछ हिन्दू-मुस्लिम, मन्दिर-मस्जिद का हंगामा खड़ा कर किया जा रहा है फर्जी देशभक्ति का हंगामा और उन्माद खड़ा करके किया जा रहा है।
इस उन्माद में, इस शोर गुल में वो आवाजें कुचल दी जा रही हैं दबा दी जा रही हैं जो पूछती है कि सवा लाख टीचर जिन्हें एक झटके में मोदी- योगी शासन में बाहर कर दिया गया उनका क्या हुआ? जो किसानों की आत्महत्याओं और उनके आंदोलन पर गोली चलाने के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं ! मेहनतकश दलितों व मुस्लिमों पर बढ़ते हमलों के खिलाफ आवाज उठाते हैं।
इस हंगामे में ये आवाज गायब कर दी जा रही हैं कि बैंक के 8 लाख करोड़ रुपये जिसे डकारकर पूंजीपति मालामाल हुए हैं इन पूंजीपतियों से क्यों नही वसूले जा रहे है ? क्यों इसे बट्टे खाते में डाला जाता है ? मेहनतकश जनता के बेटे-बेटियों के लिए तो 'ठेके' की नौकरी है जबकि अम्बानी-अडानी जैसों को सारे संसाधन लुटाए जा रहे हैं सारे कानून इनके हिसाब से तोड़े मरोड़े और बनाये जा रहे हैं ऐसा क्यों ? क्यों जनता को कंगाल बनाने और पूंजीपतियों की दौलत बढ़ाने वाले कानून बनाये जा रहे हैं ?
क्या जनता सरकार इसलिए बनाती है कि सरकार जनता पर अपनी मनमर्जी थोपे ? सक्षम और ताकतवर लोगों के पक्ष में काम करे ? मज़दूरों, किसानों, छात्रों, बेरोजगारों के संघर्ष का मज़ाक उड़ाये, इन पर लाठियां चलाये और फर्जी मुकदमे लगा दे।
माहौल कितना गंभीर हो चुका है कोई भी बुलन्दशहर में इंस्पेक्टर की हत्या से अंदाजा कर सकता है। संघी फासिस्ट दस्ते बजरंग दल का हाथ इसमें बताया जा रहा है।
मोदी-योगी सरकार इस तरह अपना काम कर रही है। इनका अंदाज हिटलर-मुसोलिनी सा ही है। सवाल केवल मोदी-योगी या भा ज पा का नहीं है। कांग्रेस, सपा, बसपा सभी पूंजीवादी पार्टियों का बुरा हाल है। सभी पूंजीपतियों के लिए काम करती हैं या इनकी हैसियत भी पूंजीपतियों सी हो गई है। सभी पार्टियां मेहनतकश जनता के विरोध में हैं। सभी भ्रष्ट हैं और जनता के आंदोलनों का सभी ने दमन किया है।
आज समाज इसी मुकाम पे खड़ा है। आज पूंजी और देश के टॉप पूंजीवादी घराने समाज को बर्बरता और जंगलराज की ओर धकेल रहे हैं। इनकी मुनाफे की अंध हवस सब कुछ निगल लेने को बेचैन है। ये एक ओर छोटी संपत्ति-छोटी पूंजी के मालिकों की संपत्ति - पूंजी को हड़प ले रहे हैं । दूसरी तरफ ये मज़दूरों की मेहनत को पूरी तरह निचोड़ लेने को बेताब हैं। यही नहीं पेंशन, प्रोविडेंट फंड, सब्सिडी, राशन, बैंक जमा आदि पर भी इनकी गिद्ध नज़र जमी हुई है।
आज असल सवाल यही है कि हमारा समाज किधर की ओर जाएगा ? क्या बड़ी बड़ी पूंजी के मालिक और इनकी पार्टी जनता को बांटने में सफल हो पाएंगे ? क्या ये हिटलर-मुसोलिनी की तरह समाज को बर्बादी तबाही की दिशा में ले जाने में सफल होंगे ? आतंकी तानाशाही कायम करने में कामयाब होंगे ? जहां बड़ी बड़ी पूंजी के मालिकों के मुनाफे की हवस का नंगा नाच होगा। जहां मेहनतकश जनता के हर हिस्से की आवाज को खामोश कर दिया जायेगा। या फिर जनता अपने संघर्षों के दम पर समाजवाद की ओर बढ़ेगी। मज़दूर मेहनतकश जनता के राज को बनाएगी। जहां सारे संसाधनों की मालिक जनता होगी। जनता ही सब कुछ तय करेगी।
भविष्य कैसा होगा ? यह सब कुछ हम पर है। यदि हम एकजुट होते हैं 'मंदिर-मस्जिद' के इनके नारों में नहीं फंसते हैं 'हिन्दू-मुस्लिम' के इनके जाल में नहीं फंसते हैं तो तय है कि जीत हमारी होगी। हमारे एकजुट संघर्ष ही हमें जीत दिला सकते हैं। समाजवाद की ओर ले जा सकते हैं।
No comments:
Post a Comment