आतंकी हमले और अंधराष्ट्रवाद
पुलवामा में मेहनतकशों के 42 बेटे कथित आतंकी हमले में मारे गये हैं यह बेहद दुःखद व निन्दनीय है। यह हमला आत्मघाती दस्ते के द्वारा अंजाम दिया गया। अब तस्वीर साफ होती जा रही है कि संभावित हमले की की खुफिया जानकारी होने के बावजूद सुरक्षा में भारी लापरवाही बरती गई या फिर हमले को हो जाने दिया गया।
अब इस हमले के बाद मोदी और शाह की जोड़ी इसके जरिये चुनावों में अंधराष्ट्रवाद व युद्ध का उन्माद पैदा कर रहे है । कुछ समय से इनके बुझे हुए चेहरों में घृणित मुस्कान तैरती साफ देखी जा सकती है ये अपना चुनाव प्रचार अंधाधुंध तरीके से न केवल जारी रखे हुए हैं बल्कि सर्वदलीय बैठक जो इस आतंकी हमले के बाद रखी गई थी देश के पी एम ने इसमें उपस्थित रहना भी जरूरी न समझा वो चुनाव प्रचार में निकल गए गृह मंत्री को बिठाकर। दूसरी ओर गोदी मीडिया अपने चैनल व अखबार पर तो संघ परिवार के लम्पट संगठन सड़कों पर युद्धोन्माद व अंधराष्ट्रवादी उन्माद पैदा कर रहे हैं। ये एक ओर पाकिस्तान को ललकार रहे हैं तो दूसरी तरफ संघी लम्पट कश्मीरी लोगों देहरादून से लेकर अन्य शहरों में हमलावर है उन्हें खदेड़ रहे हैं। अब यह इनके लिए 'वोटों की फसल' तैयार करने का जरिया बन गया है साथ ही बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे तमाम सवालों को पीछे धकेलने का औजार भी।
ये सवाल करने को तैयार नहीं कि नोटबंदी के जरिये कथित आतंकवाद की कमर तोड़ देने वाल दावों का क्या हुआ। ये यह बताने को तैयार नहीं कि जब एक तरफ उन्हें इतनी नफरत पाकिस्तान से है तो फिर क्यों मोदी के दौर में भारत पाक के बीच व्यापार साल दर साल बढ़ता रहा। निर्यात 1920 मिलियन डॉलर तो आयात 488 मिलियन डॉलर हो गया। क्यों फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेटा पाकिस्तान के नागरिक के साथ मिलकर कम्पनी चला रहे है ? आदि आदि।
एक तरफ युद्द की ललकार दूसरी तरफ खरबो का व्यापार ! यही स्थिति पाकिस्तानी शासकों की है।
आज़ादी के बाद दोनों ही देशों के पूँजीवादी शासकों ने कश्मीर को लेकर जो नीति बनाई और फिर बाद में एक दूसरे देशों को अस्थिर करने अपने घृणित हितों के अनुरूप एक दूसरे के मुल्कों में हस्तक्षेप करते रहे है। साथ ही अपने अपने देशों में दोनों देशों के शासक अपनी अपनी मेहनतकश जनता के दिलों में एक दूसरे के खिलाफ नफरत का बीजारोपण कर इसे आगे बढ़ाते गए हैं। यह अंधराष्ट्रवादी उन्माद शासकों के लिए बड़े काम की चीज बन जाती है। सत्ताधारी पार्टी फिर सत्ता पर अपनी गिरफ़्त बनाये रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
इन बातों के साथ साथ यह भी बात है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 'कश्मीर समस्या' पर कश्मीरी अवाम को अलगाव में डालने, क्रूर दमन तथा साम्प्रदायिक उन्माद का जो घृणित खेल खेला गया उसने समस्या को विकराल बना दिया है। इन सब चीजों या कारणों से स्थिति बेहद जटिल बन गयी है। पिछले एक साल में आतंकी हमले बढ़ते गए हैं। पुलवामा की ही तरह का हमला लम्बे समय के बाद होने की बात कही जा रही है।
इसलिए भारत व पाकिस्तानी पूँजीवादी शासकों की घृणित मंसूबों व नीतियों, अंतर्विरोधों के चलते हस्तक्षेप व इसके लिए पालित पोषित या फिर प्रतिक्रिया में उपजे कथित आतंकी संगठनों के हमलों में या फिर छद्म युद्धों में मेहनतकशों के बेटे ही मारे जाते हैं। ऐसा दोनों ही जगहों में होता है। इसलिए जरूरी है युद्धों व कथित आतंकी संगठनों को पैदा करने वाले पूँजीवादी निजाम को ध्वस्त किया जाय ।
ये सवाल करने को तैयार नहीं कि नोटबंदी के जरिये कथित आतंकवाद की कमर तोड़ देने वाल दावों का क्या हुआ। ये यह बताने को तैयार नहीं कि जब एक तरफ उन्हें इतनी नफरत पाकिस्तान से है तो फिर क्यों मोदी के दौर में भारत पाक के बीच व्यापार साल दर साल बढ़ता रहा। निर्यात 1920 मिलियन डॉलर तो आयात 488 मिलियन डॉलर हो गया। क्यों फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेटा पाकिस्तान के नागरिक के साथ मिलकर कम्पनी चला रहे है ? आदि आदि।
एक तरफ युद्द की ललकार दूसरी तरफ खरबो का व्यापार ! यही स्थिति पाकिस्तानी शासकों की है।
आज़ादी के बाद दोनों ही देशों के पूँजीवादी शासकों ने कश्मीर को लेकर जो नीति बनाई और फिर बाद में एक दूसरे देशों को अस्थिर करने अपने घृणित हितों के अनुरूप एक दूसरे के मुल्कों में हस्तक्षेप करते रहे है। साथ ही अपने अपने देशों में दोनों देशों के शासक अपनी अपनी मेहनतकश जनता के दिलों में एक दूसरे के खिलाफ नफरत का बीजारोपण कर इसे आगे बढ़ाते गए हैं। यह अंधराष्ट्रवादी उन्माद शासकों के लिए बड़े काम की चीज बन जाती है। सत्ताधारी पार्टी फिर सत्ता पर अपनी गिरफ़्त बनाये रखने के लिए भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
इन बातों के साथ साथ यह भी बात है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 'कश्मीर समस्या' पर कश्मीरी अवाम को अलगाव में डालने, क्रूर दमन तथा साम्प्रदायिक उन्माद का जो घृणित खेल खेला गया उसने समस्या को विकराल बना दिया है। इन सब चीजों या कारणों से स्थिति बेहद जटिल बन गयी है। पिछले एक साल में आतंकी हमले बढ़ते गए हैं। पुलवामा की ही तरह का हमला लम्बे समय के बाद होने की बात कही जा रही है।
इसलिए भारत व पाकिस्तानी पूँजीवादी शासकों की घृणित मंसूबों व नीतियों, अंतर्विरोधों के चलते हस्तक्षेप व इसके लिए पालित पोषित या फिर प्रतिक्रिया में उपजे कथित आतंकी संगठनों के हमलों में या फिर छद्म युद्धों में मेहनतकशों के बेटे ही मारे जाते हैं। ऐसा दोनों ही जगहों में होता है। इसलिए जरूरी है युद्धों व कथित आतंकी संगठनों को पैदा करने वाले पूँजीवादी निजाम को ध्वस्त किया जाय ।
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