Tuesday, 16 April 2019

भगत सिंह शहादत दिवस पर

                

     भगत सिंह को याद करो !
पूंजीवाद की कब्र खोदो! समाजवाद का झंडा बुलंद करो!


      23 मार्च शहीदे आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू का शहादत दिवस है। भारत की आजादी के लिए शहीद हुए भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत को हम ऐसे समय में मना रहे हैं, जब हमारे शासक 'लोकतंत्र का महापर्व मना रहे है। वे इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते नहीं थक रहे हैं। उनका सारा तंत्र और पूंजीदादी मीडिया 24 घंटे और दिन-रात महान लोकतंत्र के बखान में लगा हुआ है। लेकिन ये सारे लोग ये नहीं बता रहे हैं कि यह 'महापर्व' दुनिया का सबसे खर्चिला पर्व है। अखबारों में बताया जा रहा है कि इस बार का चुनाव दुनिया में सबसे खर्चीला चुनाव होगा। वे यह भी नहीं बता रहे हैं कि इस लोकतंत्र में जन तो कहीं हैं ही नहीं। जब से चुनाव हो रहे हैं तब से इस जन की चुनाव के समय ही झूठे नारों के साथ जय होती है और शेष दिन वह पुलिस, प्रशासन, न्यायालय, पूंजीपतियों के शोषण-उत्पीड़न से कराह रहा होता है। मजदूर, गरीब किसान, महिलाएं, छात्र-युवा, आदिवासी, छोटे कारोबारी अपने जीवन की हकीकत से इस शोषण-उत्पीड़न के बखूबी जानते हैं। ये वही जन हैं जिनकी जिंदगी में चुनाव होने या न होने से कोई बदलाव नहीं होता।
     भारत के महान लोकतंत्र' ने भारत के मजदूरों, किसान, शोषितों-उत्पीड़ितों को वर्षों से ठगने-छलने के अलावा कुछ नहीं किया है। एक तरफ
     भारत के पूंजीपतियों की दौलत रात-दिन बढ़ रही है और दूसरी तरफ मजदूर-किसान गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, गैरबराबरी के दलदल में गले तक फंसे हुये हैं।
    भारत के छात्र-नौजवान महंगी शिक्षा, असुरक्षित भविष्य और बेरोजगारी के कारण हैरान-परेशान हैं।
     भारत की आम मेहनतकश औरतें आये-दिन अपमान, उत्पीड़न और यौन हमलों की शिकार हो रही हैं।
    दलित, आदिवासी, गरीब मुसलमान इनके दिये जख्मों को सहला रहे हैं।
     भगत सिंह ने अपनी फांसी के फंदे पर झूलने से पहले ही देख लिया था कि यदि भारत में गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद काले अंग्रेजों का राज आयेगा तो ऐसा ही होगा। भारत के मजदूर, किसान, नौजवान नई तरह की गुलामी में फंस जायेंगे। और यह नई गुलामी पूंजीपतियों की गुलाम है। अम्बानी, अडाणी, टाटा-बिडला की गुलामी है। भगत सिंह ने यह भी देख लिया था कि भारत तभी गोरे-काले अंग्रेजों की गुलामी से निजात पायेगा जब मजदूरों-किसानों का राज आयेगा। समाजवाद आयेगा।
  जब शासक अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने पाया कि ये क्रांतिकारी और इनके विचार उनके राज के लिए खतरा हैं, तो 1931 को इसी दिन अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने इनको फांसी पर चढ़ा दिया। साम्राज्यवादियों के इस डर का एक मजबूत आधार था। भगत सिंह के विचार ही वह ताकत थे जिससे आज भी शोषक, शासक और साम्राज्यवादी बहुत डरते हैं। भगत सिंह ने कहा था -"इवा में रहेगी मेरे पास की बिजली, ये मुश्ते-खाक है फ़ानी रहे रहे न रहे"।
      भगत सिंह और उनके साथी साम्राज्यवाद के खिलाफ समझौताविहीन संघर्ष के प्रतीक हैं। दुनिया को गुलाम बनाने वाले साम्राज्यवादियों के खिलाफ दुनिया के मजदूर मेहनतकशों ने अपनी एकता को मजबूत करते हुए संघर्ष का ऐलान किया था। रूस में हुई समाजवादी क्रांति ने इसमें अहम भूमिका निभाई और गुलाम देशों को मुक्ति का मार्ग दिखाया। पूरी ही दुनिया में समाजवाद में शोषणमुक्त व वास्तविक बराबरी पर आधारित समाज का विकल्प
जाहिर है कि साम्राज्यवाद व सामंतवाद के खिलाफ संघर्षरत जनता इससे प्रभावित होती और अपने देश को ऐसा ही बनाने का सपना देखते।
      ऐसा सपना देखने वालों के  प्रतिनिधि भगत    सिंह थे। वे मजदूर-मेहनतकशों की सत्ता समाजवादी सोवियत संघ से प्रभावित होकर भारत में भी
     मजदूरों-मेहनतकों की ऐसी सत्ता के प्रबल  समर्थक थे। भगत सिंह वह शख्सियत थे जो हर गुलाम देश में साम्राज्यवाद के विरूद्ध संघर्ष करने वाले मेहनतकशों को उर्जा और प्रेरणा देते थे।
       आज के समय पर नजर दौड़ायें तो हम क्या पाते है। राष्ट्रवाद का इकलौता ठेका लेने वाली भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस पाकिस्तान के खिलाफ तो जहर उगलता है परंतु अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने दुम हिलाने लग जाते है। फुलवामा के आतंकी घटना के बाद जो हुआ उसमें साम्राज्यवाद की भूमिका गौर करने लायक है। फुलवामा में आतंकी हमला होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने ट्वीट किया कि भारत कुछ बड़ा करने के मूड में है।' और भारत ने पाकिस्तान में जाकर हवाई हमला कर दिया। इस दौरान एक भारतीय पायलट के पाकिस्तान द्वारा पकड़ लिये जाने के बाद फिर ट्रंप ने ट्वीट किया कि 'अब कुछ अच्छी खबर आने वाली है तो भारतीय पायलट को छोड़ दिया गया। ये ट्वीट जाहिर कर देते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों देशों को साम्राज्यवाद ने किस हद तक अपने प्रभाव में ले रखा है। दोनों ही देश इन्हीं साम्राज्यवादी देशों से खरीदे हथियारों से आपस में लड़ते हैं और कभी सीमा पार गोलीबारी में निर्दोष शांतिप्रिय नागरिक का तो कभी मजदूरों, किसानों के बेटी के सैनिक के रूप में हत्या करते हैं।
   पूरी दुनिया आज भी साम्राज्यवाद नामक दानव से मुक्त नहीं है। कभी अफगानिस्तान, कभी इराक तो कभी अन्य देश साम्राज्यवादी तूट शोषण व दमन का शिकार होता है। साम्राज्यवाद जब-तब गरीब मुल्कों को अपने मनमाफिक चलाने, आर्थिक मंच के जरिये उन पर प्रतिबंध थोपते रहते हैं। साम्राज्यवाद आज भी खुले-छिपे युद्धों व प्रतिबंधों के जरिये इन गरीब देशों की मेहनतकश जनता को मौत के घाट उतार रहा है। और साम्राज्यवाद के कुकर्मों में देशी शासक पूंजीपति वर्ग उनका साथ देते हैं। भारत में अमेरिकी साम्राज्याचाद की जी हजूरी करने में मोदी सरकार ने तो मनमोहन की सरकार को भी पीछे छोड़ दिया है।
      आज जब मजदूरो-किसानों-छात्र-दलितों के संघर्ष हो रहे हैं तो वह इस बात के संकेत हैं कि वे इस पूँजीवादी लूट-शोषण से ना सिर्फ नाखुश हैं। बल्कि इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। देश में उत्पीड़ित दलितों, मजदूरों, पूँजीवादी लूट और शासकों की बेरूखी से त्रस्त किसानों, कालेज-विश्वविद्यालय के छात्रों के संघर्ष एक अच्छा संकेत है। इन सभी का यह सैलाब एक दिन भगत सिंह की विरासत के आगे बढ़ायेगा और अपनी मुक्ति की ओर बढ़ेगा। जब देश की मेहनतकश जनता एकजुट हो इस पूँजीवादी लूट और दमन का अंत कर देगी। वह अपना वास्तविक लोकतंत्र-समाजवादी लोकतंत्र स्थापित करेगा।
       पांच साल पहले चुनाव के समय मोदी ने कई-कई वायदे किये थे । 'अच्छे दिन' का नारा तो मजाक बनकर रह गया है। जैसे-जैसे मोदी की पोल खुलने लगी और अलोकप्रियता बढ़ने लगी तो नये-नये दांव खेले गये।
        2019 का चुनाव जीतने के लिए देश में युद्ध  का माहौल खड़ा कर दिया। युद्धोन्माद, अंधराष्ट्रवाद की हवा फैलाकर चुनाव जीतने की हर चंद कोशिश की जा रही हैं। राष्ट्रवाद को चुनावी हथकंडा बनाया जा रहा है। भारत के मजदूर, किसान, शोषित-उत्पीड़ित कुछ समय में समझ गये कि यह सब चुनावी हथकंडा है। वे फिर से अपनी रोजी-रोटी, बेरोजगारी, बदहाली की बातों को उठा रहे हैं। वे जल्द ही समझ जायेंगे कि पूंजीवाद में उनकी समस्याओं का कभी भी समाधान नहीं हो सकता है। सिर्फ और सिर्फ समाजवाद ही मजदूरों, किसानों, नौजवानों, शोषितों-उत्पीड़ितों का रास्ता है। और यह रास्ता इंकलाब से होकर जाता है।
      भगत सिंह को आज याद करने का सीधा मतलब है पूँजीवाद-साम्राज्यवाद की कब्र खोदना और समाजवाद का रास्ता बुलंद करना।

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