अंतराष्ट्रीय मजदूर दिवस जिंदाबाद
ऐसे गंभीर व खतरनाक दौर में जब वैश्विक पैमाने पर कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने की कोशिश में पूंजीवादी शासकों ने लॉकडाउन किया हुआ है तब मज़दूर वर्ग की समूची दुनिया में जो स्थिति बन चुकी है निश्चित तौर पर वह अंतराष्ट्रीय मज़दूर दिवस की महत्ता को और जोर व शिद्दत से सामने ले आती है।
मई दिवस के शहीदों के संघर्ष की महत्ता आज कई गुना बढ़ गई है। 8 घंटे काम के नारे के संघर्ष के व फिर दुनिया में समाजवाद कायम होने के बाद इतिहास फिर उसी बिंदु की ओर बढ़ रहा है जहां सवा सौ साल पहले समाज था। समाजवाद आज किसी देश में नहीं है साथ ही 8 घंटे के कार्यदिवस सहित तमाम श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियनों पर हमला निरंतर जारी है।
निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के जरिये एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग पर पिछले कई दशकों से हमलावर है। 2007-08 के संकट के बाद से हमला और ज्यादा तीखा हुआ है। मगर संकट और ज्यादा बढ़ता गया है।
यही स्थिति देश के भीतर भी है। अब दुनिया के पैमाने पर कोरोना संक्रमण के प्रसार में सबसे ज्यादा कष्ट, दुख, यंत्रणा मजदूर वर्ग को ही झेलने पड़ रहे हैं।
देश में मोदी सरकार द्वारा किये गए अयोजनाबद्ध लॉकडाउन के चलते लाखों मजदूरों को सैकड़ों किमी दूर भूखे-प्यासे, सुरक्षा व रोटी की तलाश में अपने गांव की ओर लौटने को मजबूर हुए। मगर उनके लौटने की राह में भी तमाम बाधाएं खड़ी कर दी गई। मज़दूरों की मौतें भी हुई। मजदूरों को क्वेरेंटाइन के नाम पर यातना जैसे हालात में रखा गया।
मजदूर वर्ग के सामने रोज़ी-रोटी, सुरक्षा और स्वास्थ्य का भयानक संकट सामने खड़ा है। भूखे प्यासे व बीमारी की स्थिति में पहुंच चुके मजदूरों के लिए तत्काल राहत की जरूरत थी। मगर सरकार द्वारा इसके उलट काम किया गया। काम के घंटे 8 से 12 करने की दिशा में सरकार कदम बढ़ा रही है ।
बेहद खराब स्थिति के चलते ही भूखे प्यासे मजदूरों को अन्ततः कई जगहों पर प्रदर्शन भी करना पड़ा।
इन स्थितियों ने एक ओर समाजवाद की सार्थकता व उसकी अनिवार्यता को फिर से सामने ला दिया है वहीं मजदूर वर्ग के अंतरष्ट्रीयतावाद को और ज्यादा गहनता से स्थापित किया है।
मई दिवस के मौके पर 'मई दिवस' के, शिकागों के शहीदों को याद करते हुए, समाजवाद के मिशन को ध्यान में रखते हुए तत्काल मजदूरों के लिए राशन का प्रबंध किए जाने, निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण व सुविधा की व्यवस्था, श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियन कानूनों पर हो रहे हमलों के विरोध में संघर्ष करने की जरूरत है। साथ ही निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के खिलाफ़ संघर्ष करते हुए समाजवाद की ओर बढ़ने की सख्त जरूरत है।
ऐसे गंभीर व खतरनाक दौर में जब वैश्विक पैमाने पर कोरोना संक्रमण के प्रसार को रोकने की कोशिश में पूंजीवादी शासकों ने लॉकडाउन किया हुआ है तब मज़दूर वर्ग की समूची दुनिया में जो स्थिति बन चुकी है निश्चित तौर पर वह अंतराष्ट्रीय मज़दूर दिवस की महत्ता को और जोर व शिद्दत से सामने ले आती है।
मई दिवस के शहीदों के संघर्ष की महत्ता आज कई गुना बढ़ गई है। 8 घंटे काम के नारे के संघर्ष के व फिर दुनिया में समाजवाद कायम होने के बाद इतिहास फिर उसी बिंदु की ओर बढ़ रहा है जहां सवा सौ साल पहले समाज था। समाजवाद आज किसी देश में नहीं है साथ ही 8 घंटे के कार्यदिवस सहित तमाम श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियनों पर हमला निरंतर जारी है।
निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के जरिये एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग पर पिछले कई दशकों से हमलावर है। 2007-08 के संकट के बाद से हमला और ज्यादा तीखा हुआ है। मगर संकट और ज्यादा बढ़ता गया है।
यही स्थिति देश के भीतर भी है। अब दुनिया के पैमाने पर कोरोना संक्रमण के प्रसार में सबसे ज्यादा कष्ट, दुख, यंत्रणा मजदूर वर्ग को ही झेलने पड़ रहे हैं।
देश में मोदी सरकार द्वारा किये गए अयोजनाबद्ध लॉकडाउन के चलते लाखों मजदूरों को सैकड़ों किमी दूर भूखे-प्यासे, सुरक्षा व रोटी की तलाश में अपने गांव की ओर लौटने को मजबूर हुए। मगर उनके लौटने की राह में भी तमाम बाधाएं खड़ी कर दी गई। मज़दूरों की मौतें भी हुई। मजदूरों को क्वेरेंटाइन के नाम पर यातना जैसे हालात में रखा गया।
मजदूर वर्ग के सामने रोज़ी-रोटी, सुरक्षा और स्वास्थ्य का भयानक संकट सामने खड़ा है। भूखे प्यासे व बीमारी की स्थिति में पहुंच चुके मजदूरों के लिए तत्काल राहत की जरूरत थी। मगर सरकार द्वारा इसके उलट काम किया गया। काम के घंटे 8 से 12 करने की दिशा में सरकार कदम बढ़ा रही है ।
बेहद खराब स्थिति के चलते ही भूखे प्यासे मजदूरों को अन्ततः कई जगहों पर प्रदर्शन भी करना पड़ा।
इन स्थितियों ने एक ओर समाजवाद की सार्थकता व उसकी अनिवार्यता को फिर से सामने ला दिया है वहीं मजदूर वर्ग के अंतरष्ट्रीयतावाद को और ज्यादा गहनता से स्थापित किया है।
मई दिवस के मौके पर 'मई दिवस' के, शिकागों के शहीदों को याद करते हुए, समाजवाद के मिशन को ध्यान में रखते हुए तत्काल मजदूरों के लिए राशन का प्रबंध किए जाने, निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण व सुविधा की व्यवस्था, श्रम कानूनों व ट्रेड यूनियन कानूनों पर हो रहे हमलों के विरोध में संघर्ष करने की जरूरत है। साथ ही निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों के खिलाफ़ संघर्ष करते हुए समाजवाद की ओर बढ़ने की सख्त जरूरत है।
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