कोरोना महामारी के दौर में काम के घंटो को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ते शासक
कोरोना महामारी के दौर ने मजदूर मेहनतकशों के सामने शासकों को नंगा कर दिया है। लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर सड़कों पर है। वे भूखे प्यासे रोटी और सुरक्षा तथा अपनों की तलाश में अपने गांव की ओर पैदल जा रहे हैं। इसमें महिलाएं हैं, बच्चे हैं, पुरुष हैं तथा साथ में सामान की गठरी है। इन्हें सैकड़ों किमी की यात्रा करनी हैं। बस एक ही मंजिल है किसी भी तरह अपने गांव पहुंचना है अपने लोगों के बीच पहुंचना है यदि मौत हो भी तो अपने लोगो के बीच।
एक तरफ मजदूरों का काफिला है तो दूसरी तरफ मूकदर्शक सरकार है जो इस दौर में भी उन पत्रकारों को जेल में ठूंसने में लगी हुई है जो हकीकत को सामने ला रहे हैं। सरकार को मजदूरों की मौत से , भूखे प्यासे दर दर भटकने से कोई फर्क नही पड़ता है। बस सरकार को बेनकाब होने की, अपनी इमेज की चिंता है। सरकार को इस बात की चिंता है कि यदि प्रवासी मजदूर अपने घरों को चले गए तो पूंजीपतियों की पूंजी का क्या होगा जो कि उद्योग में लगे हुए है। इसलिए भरपूर कोशिश है कि मजदूरों को किसी भी तरह से अपने घर की ओर पलायन से रोका जाए। मजदूरों को मजबूर होकर सड़कों पर प्रदर्शन करने पड़े। लुधियाना, कठुआ, सूरत, अहमदाबाद समेत कई जगहों पर ऐसे प्रदर्शन हुए। यह हिंसक भी हुआ। संघर्ष अभी भी कहीं के कहीं हो ही रहे हैं।
इस सबके चलते मोदी सरकार को पीछे हटना पड़ा। ट्रेन 'श्रमिक ट्रेन' के नाम से चलाने पड़े। मगर इसका हश्र वैसा ही होना था जैसा कि मजदूरों गरीब किसानों के संबंध में घोषित होने वाली योजनाओं का होता है। तमाम जटिलताएं पैदा की गई। यह कागजी कार्यवाही के नाम और हुआ। यात्रा का किराया भी भूखे प्यासेमजदूरों से ही वसूला गया। बहुत कम ट्रेन चलाकर ही दावा किया गया कि लाखों मजदूर को उनके इलाके में पहुंचाया गया।। हकीकत क्या है ?
मजदूर आज भी सड़कों पर है। कई मजदूर भूखे प्यासे होने के चलते, सैकड़ों किमी की जानलेवा यात्रा के चलते या फिर बसों, ट्रक, ट्रेन के नीचे आकर जान गंवा चुके हैं।
लेकिन सरकार यहीं नहीं रुकी। हिन्दू फासीवादी सरकार ने कोरोना संकट की आड़ में बेशर्मी से मजदूरों और हमला बोल दिया। गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों में बचे खुचे श्रम कानूनों पर भी जोरदार हमला बोल दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रम कानूनों को 3 साल के लिए स्थगित करने का फैसला लिया। ऐतिहासिक तौर पर मजदूर वर्ग ने 8 घंटे काम के नारे को धरातल पर उतारने को जो कुर्बानियां दी थी , उस पर हमला बोला गया। लेकिन इतिहास, समाज व वक़्त कभी ठहरता नहीं है। मजदूर वर्ग व बाकी मेहनतकश जनता के संघर्ष फिर से सैलाब की तरह उमड़ेंगे।
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