इजरायली फासीवादी सत्ता द्वारा किये जा रहे नरसंहार का विरोध करो !
हमास ने 7 अक्टूबर को इजरायल पर सैकड़ो रॉकेट हमला किया था। जिसमे लगभग 1400 आम नागरिक मारे गए थे। इसके बाद इजरायल इस हमले की आड़ में हवाई हमलों और जमीनी स्तर से हमले में 8000-9000 से ज्यादा फिलिस्तीनियों को मार चुका है। इसमें 3000 बच्चे मारे गए हैं। युद्ध विराम की बातों को इजरायली हुकूमत ने खारिज कर दिया है। यह अस्पतालों, स्कूलों, शरणार्थी कैम्पों पर हमास के नाम पर बम बरसा रहा है और नरसंहार कर रहा है।
हमास के हमले को आतंकी हमला कहकर इजरायली शासक पिछले 7-8 दशकों में खुद के द्वारा किये गए फिलिस्तीनी जनता के कत्लेआम पर पर्दा डाल रहे हैं। फिलिस्तीन की जनता को उनके अपने फिलिस्तीन में ही शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर कर दिया गया। लाखों फिलिस्तीनी पड़ोसी देशों में भागने को मजबूर कर दिए गए। फिलिस्तीन पर कब्जा कर लिया। फिलिस्तीन की जनता के प्रतिरोध को बर्बर तरीके से कुचल दिया। फिलिस्तीनियों को गाज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक के छोटे से टुकड़े तक समेट दिया। वेस्ट बैंक में यहूदी बसाई गयी यहां नाम के लिए अल फतह का शासन है। जबकि गाजा पट्टी पर अलग फिलिस्तीनी इस्लामिक राष्ट्र के लिये संघर्ष कर रहे हमास का शासन है।
हमास को एक दौर में पालने पोसने में इजरायली शासकों का ही हाथ बताया जाता है ताकि फिलिस्तीनी जनता के पी एल ओ व अल फतह की अगुवाई में चल रहे अलग धर्मनिरपेक्ष फिलिस्तीनी राष्ट्र के लिए संघर्ष को कमजोर व खत्म किया जा सके। फतह और पी एल ओ कमजोर पड़ा और यह भ्रष्ट हो गया।
इस स्थिति फिलिस्तीन की जनता की मुक्ति की आकांक्षा और संघर्ष को हमास ने आगे बढ़ाया। भले ही इस संघर्ष का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष फिलिस्तीनी राष्ट्र का ना हो और तौर तरीके आतंकी हों। यह तरीका इजरायली शासकों के द्वारा बार बार किये गये आतंकी हमलों का ही नतीजा है।
फिलिस्तीन भू भाग पहले ऑटोमन तुर्क साम्राज्य के कब्जे में थी। यह सामंती साम्राज्य था। बाद में प्रथम विश्व युद्ध में तुर्क साम्राज्य हार गया। इसके हिस्से वाले भूभाग को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और फ़्रांसिसी शासकों ने कब्जा लिया। फिलिस्तीनी भू भाग पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का कब्जा करहो गया।
इस वक्त तक युहुदी के अलग देश की मांग उठने लगी थी। अधिकांश यहुदी यूरोप में धनी थे। रोथ्स्चाइल्ड परिवार 19 वीं-20 वीं सदी में तब सबसे धनी बैंकरों में से एक था। ब्रिटिश संसद में इसी के हिसाब से फिलिस्तीन में यहुदियों को बसाने की बात हुई। इस दौर में फिलिस्तीन में यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धर्म के लोग थी। अधिकांश इसमें मुस्लिम थे।
ब्रिटिश शासकों का कब्जा फिलिस्तीन पर हो जाने के बाद 1917 के बालाफोर घोषणा में खुलेआम फिलिस्तीन में यहूदियों को बसाने की बात कही गयी। फिर यहूदियों का फिलिस्तीन जाने का सिलसिला शुरू हो गया। इसका विरोध भी फिलिस्तीन में होने लगा। 1930-40में इसका विरोध हुआ। फिलिस्तीनियों का दमन भी हुआ। धनी यहूदियों ने फिलिस्तीन में बड़ी मात्रा में खेती की जमीनें खरीदी।
जर्मनी में हिटलर की नाजीवादी सत्ता ने यहूदियों का नरसंहार किया व इन्हें खदेड़ा गया। इसके चलते यहूदियों के पक्ष में सहानुभूति बनी। इस वक्त तक यहूदियों का फिलिस्तीन जाने का सिलसिला चलता रहा। बाद में दूसरा विश्व युद्ध फासीवाद की पराजय के साथ खत्म हुआ।
इस दौर में राष्ट्र मुक्ति के आंदोलनों की दुनिया में लहरें उठ खड़ी हुई। एक तरफ कुछ देशों में इंकलाब हुए तो दूसरी तरफ़ गुलाम मुल्क आजाद होते चले गए। इधर ब्रिटिश साम्राज्यवाद सिमट कर छोटे से इलाके तक सीमित गया तो उधर अमेरिकी साम्राज्यवाद ताकतवर होकर सामने आ गया। दुनिया को नए तरीके से नियंत्रण में रखा जाय इसकी योजनाएं बनने लगी।
पश्चिमी एशिया को सोवियत समाजवाद के प्रभाव से मुक्त रखने और अपने नियंत्रण में रखने के लिए यहूदियों के प्रति उमड़ी सहानुभुति का इस्तेमाल किया गया। फिलिस्तीन के एक हिस्से पर यहूदियों को 1948 में बसाया गया। इस देश का नाम पड़ा इजरायल। फिलिस्तीन के तीन हिस्से किये जाने थे। एक फिलिस्तीन दूसरा इजरायल और तीसरा येरुशलम। मगर हुआ कुछ और।
इजरायल के बसने का फिलिस्तीन और अरब ने विरोध किया। फिलिस्तीनी जनता पर यह फैसला थोप दिया गया। 1948-50 में अरब के विरोध के चलते अरब इजरायल संघर्ष हुआ जिसका अमेरिकी और ब्रिटिश हथियारों और सामरिक सहयोग से अरब और फिलिस्तीनी हरा दिए गए। 7 लाख से ज्यादा फिलस्तीनी शरणार्थी बन गए। कई मारे गए। यही फिलिस्तीनियों के लिए पहला नकबा यानी पहला महाविनाश था। तब से 2007 तक आते आते फिलिस्तीन को इजरायली जियनवादी फासिस्टों ने लगभग कब्जा कर लिया।
अलग फिलिस्तीनी राष्ट्र के लिए फिलिस्तीन की जनता ने लगातार संघर्ष किया। पहला और दूसरा इन्तिफादा ( प्रतिरोध युद्ध) लड़े। नरसंहार झेले। पहले पी एल ओ व अल फतह की अगुबाई में आवाज उठाई। इनके समझौता कर लेने और पीछे हट जाने पर हमास की अगुवाई में आवाज बुलंद की। यह नरसंहार अब गाज़ा और वेस्ट बैंक में 7 अक्टूबर से फिर से शुरू हो चुका है। सभी जनवादी प्रगतिशील ताकतें इस नरसंहार के खिलाफ आवाज उठा रही है।
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