Friday, 11 August 2017

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार 
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      साल 2013 में उत्तराखंड में 16-17जून को भारी तबाही आई थी। उस वक्त विजय बहुगुणा की अगुवाई में कोंग्रेस की सरकार थी। तब गुजरात के मुख्य मंत्री जो कि अब भारत के प्रधानमंत्री है यंहा उड़न खटोले से चक्कर लगा रहे थे वे बड़े बड़े दावे कर रहे थे "शिकार' को फंसाने के लिए वायदे भी कर रहे थे। 
        साल 2017 तक आते आते अब जबकि उत्तराखंड में बिग बहुमत वाली संघी सरकार सत्ता में है संघी छत्र छाया में पला बढ़ा "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" शख्स मुख्य मंत्री है। तब राजधानी से मात्र 150 किमी की दूर कोटद्वार में भारी बारिश हुई बादल फटे और नाले (रौखड़) में आई बाढ़ से जो तबाही हुई उससे निपटने के तौर तरीकों ने संघी सरकार की "संवेदनशीलता" "सुसंस्कृति" की पोल खोल दी  । इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक जो कि 2013 में कॉंग्रेस मंत्री के बतौर  'आपदा टूरिज़्म' मना रहे थे अब "शुद्धिकृत" होकर संघी सरकार के मंत्री के रूप में अपनी 'दबंग' स्टाइल में आपदा पीड़ितों को राहत देकर आहत कर रहे थे।
          यही वजह है कि कोटद्वार में 4-5 अगस्त को जो तबाही हुई थी तब से अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं। मुख्य सड़को व 4-5 क्षेत्रों में लोगों के गलियों,  दुकानों में गाद अभी भी है। सीवेज लीकेज के चलते मोहलले में सांस लेना मुश्किल हो रहा है। लोगों के घरों में रखा हज़ारो का सामान बर्बाद हो गया । खाने पीने का सामान भी खराब हुआ है। बिमारियों के होने व फैलने की काफी संभावना है। कुलमिलाकर लगभग 100-120 परिवार को ज्यादा नुकसान हुआ है और इनमें से तकरीबन 50 परिवार गुरुद्वारा राहत कैम्प में है। इसके अलावा लगभग 100 से ज्यादा परिवार एसे हैं जिन्हें कम नुकसान हुआ है। लगभग 6 लोगों के मरने की खबर हैं लेकिन मुआवजा केवल 2 परिवारों को 4-4 लाख का मिला। कुछ लोगों के मिसिंग होने की भी खबर है । 2 लोगों का शव अभी फिर मलवे में बरामद हुए हैं। 
     वैसे भी शासकों के लिए आपदा या तो "मानव जनित" होती या फिर "प्राकृतिक या दैवीय आपदा" । इन शब्दावलियों का जाल बुनकर ये अपने कुकर्मों को ढक लेते है। यह नही बताते कि उनके अनियोजित व अनियंत्रित विकास के मॉडल के चलते एक छोटी सी प्राकृतिक घटना मेहनतकश व गरीब लोगो के लिए बड़ी 'आपदा' में बदल जाती है। जिसमें सैकड़ो घर तबाह बर्बाद हो जाते हैं।
         संघी सरकार को "दैवीय" शब्द से बहुत प्यार है। तब संघी सरकार व उसके "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" मुख्य मंत्री ने ऐसे मौके पर क्या किया ? आपदा पीड़ितों से मिलने व सभी क्षेत्रों में जाने की जगह एक जगह गए और 3800 रुपये का चेक पकड़ाकर फ़ोटो खिंचवाकर चलते बने। 185 परिवारों को चेक देने की बात की जा रही है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। एक जगह 12-15 परिवारों को 3800 रुपये चेक देने की बात लोगों ने बताई। साथ ही संयुक्त परिवार को चेक दिया गया। 
            हज़ारो व लाख रुपये के नुकसान झेल रहे कुछ लोगों ने चेक गुस्से में वापस भी लौटाए। आपदा पीड़ित सवाल उठा रहे हैं कि हम इस चेक को भुनाने जाए या फिर अपने घरों की सफाई करें और उन्हें रहने लायक बनाएं। लेकिन जवाब कौन दे ? संघीयों को व उसकी सरकार को वैसे भी सवाल करने व तर्क करने वालों से घोर नफरत जो है। इसका असर नीचे तक है।
            इनके चमचों व दलाल छुटभैयों का हाल भी कम घृणा भरा नहीं है। आपदा पीड़ितों के दर्द को साझा करने उन्हें राहत देने की जगह ये थप्पड़ जड़ देते हैं या गिरहबान पकड़ लेते हैं। दो जगह ऐसे मामले हुए जिसमें आपदा पीड़ित ने सरकार के रुख पर शंका की व सवाल खड़े किए तो एक महाशय ने आपदा पीड़ित को सबके सामने थप्पड़ मार दिया तो दूसरे ने 'दबंग' जनप्रतिनिधि के सामने ही चमचागिरी दिखाते हुए एक आपदा पीड़ित का गिरहबान पकड़ लिया। 
            यही नहीं यह भी बातें सामने आ रही हैं कि बाजार के केंद्र में स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी पर इनकी गिद्ध नज़र लगी हुई है यह आपदा में सबसे ज्यादा बर्बाद है। यंहा लगभग 50 परिवार रहते है अब ये राहत शिविरों में है। ये आज़ादी के वक्त में सरकार द्वारा विस्थापन के चलते यंहा बसाए गए थे। अब सुरक्षा के नाम पर इन्हें इस जगह को छोड़ने के लिए "प्रेरित" किया जा रहा है 5000 रुपये मासिक किराए के रूप में दिए जाने के वायदे हो रहे है। जब लोगों ने इससे इंकार कर दिया तो उनसे राहत कैम्प से चले जाने के लिए के कह दिया। अब ये अपने समुदाय के गुरुद्वारा में रह रहे हैं।
              इन्ही स्थितियों में एक क्षेत्र काशीरामपुर मल्ला के लोगों ने क्रालोस की अगुवाई में तहसील में प्रदर्शन किया एक ज्ञापन मुख्य मंत्री के लिए प्रेषित किया गया जबकि दूसरा ज्ञापन एस डी एम को दिया गया। जिसका असर भी देखने को मिला तुरंत ही शाम तक जे सी बी पहुंच गई व फिर धीरे धीरे सफाई व ब्लीचिंग पावडर का छिड़काव भी हुआ। इसी के साथ अब अन्य लोगों ने भी प्रदर्शन किए है। दबाव में वे किरकिरी होने पर सरकार के एक दो मंत्रियों के भी चक्कर यंहा लगे है। जिसमें उन्होंने 3800 रुपये के चेक पर सफाई देते हुए कहा है कि यह तो प्राथमिक तौर पर राहत दी गई थी बाद में फिर राहत राशि दी जाएगी। लेकिन कुल मिलाकर संघी सरकार को आपदा ने आपदा पीड़ित ही नहीं अन्य लोगों के बीच भी नंगा कर दिया।

Sunday, 9 July 2017

हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न



हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न 

   पिछले तीन सालों में मेहनतकश अल्पसंख्यकों व दलितों पर हमले काफी बढ़ चुके है। आम तौर पर ये हमले गौरक्षक दस्तों द्वारा किये गए है। इनमें हत्याएं भी की गई है। दूसरी ओर गुजरात ऊना के बाद जुनैद व झा-खण्ड में अल्पसंख्यकों की हत्या के मौके पर "ह-त्यारी चुप्पी" को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री महोदय फिर उपदेशात्मक मुद्रा में आये । फासिस्ट हत्यारो को फिर से एक बार उपदेश उन्होंने दिया। इन्हें "भीड़ द्वारा हत्याओं" के रूप में प्रचारित कर फास्सिट अपनी ताकत में इजाफा करते जा रहे है। 
     जब दौर ऐसा हो तब ऐसे शोक संतप्त दहशत भरे माहौल में "जी एस टी" लागू करने की रात को ऐतिहासिक पल बताकर "जश्न" मनाया जाता है। "एक देश-एक कर- एक बाजार" के नारे के साथ एक केंद्रीकृत कर प्रणाली को यूं इस तरह पेश किया जाता है कि मानो मज़दूर मेहनतकश अवाम की जिंदगी में आमूल चूल बदलाव आ जाये। हकीकत यही है कि हर बार की ही तरह यह मज़दूर मेहनतकश अवाम को और ज्यादा निचोड़ने का यंत्र है। प्रत्यक्ष करो की प्रणाली को बढ़ाने की बजाय जो कि व्यक्ति विशेष को प्रभावित करते है इसे और कमजोर कर दिया गया है। इसके बजाय अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को और मजबूत व व्यापक कर दिया गया है जो अपने दायरे मज़दूर मेहनतकश अवाम को समेट लेता है। इसके लिए महंगाई बढ़नी ही है। छोटी पूंजी की तबाही को बढ़ाएगा।   
        अव्वल तो यह कोई यह नहीं पूछ रहा कि जिस जी एस टी को अब ऐतिहासिक करार दिया जा रहा है तब 2012 में क्यों इतना हंगामा इसके विरोध में मोदी - भाजपा ने बरपा था। एकाधिकारी पूंजी की सेवक नरम हिदुत्व वाली कोंग्रेस बेचारी यह क्रेडिट लेने से वंचित रह गयी। उसे इसी का अफसोस है ! वरना तो दोनों में इसे लागू करने के मामले में अभूतपूर्व एकता है। "राष्ट्रवादियों " का यह जश्न खुद इनके अपने लिए साथ ही देश के पूंजीपति वर्ग के लिए है या यूं कहें कि जश्न मनाने का समय यह यदि किसी के लिए है वो पहले सरकार और दूसरे जो असल में सरकार बनाते हैं और सरकारें जिनके लिए काम करती हैं यानी पूंजीपति वर्ग और उसमें भी अंबानी-अदानी टाइप के पूंजीपतियों को जश्न मनाना ही चाहिए। सरकार की कर राजस्व से आय बढ़ेगी तो वह उसे पूंजीपतियों पर ही लुटायेगी।
       यही नही इस " एक देश एक कर एक बाजार" के नारे के साथ शासकों ने राज्य सरकारों के अधिकार को और कमजोर कर दिया। अब राज्यों की निर्भरता केंद्र पर और ज्यादा बढ़ जाएगी। और शासकों की यह सोच या दावा कि इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, संदिग्ध है। नोट बंदी की मार से अर्थव्यवस्था अभी उभरी नही है। आयात निर्यात दोनों ही स्तरों पर संकट मौजूद है। आंतरिक मांग बढ़ने के कोई आसार नहीं हैं। इस सबके बावजूद देश के बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे की दर को और गिरने से रोकने और सरकार के कर राजस्व को बढ़ाने में यह कर सुधार तात्कालिक तौर पर एक हद तक कामयाब होगा। जंहा तक देश की एकता का सवाल है । देश को एकीकृत बाजार से देखने वाले शासक पूंजीपति वर्ग व उसकी पार्टियों का मतलब यही एकता यानी एक बाज़ार है । जबकि वास्तविकता में 'एकता' तभी संभव है जब कि आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत समाजवादी राज्य बने।

Sunday, 14 May 2017

सहारनपुर के शब्बीरपुर दंगे

     सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हुए हमले की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट
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     ( क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की अगुवाई में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं नौजवान भारत सभा के कार्यकर्त्ताओ ने तथ्यों की जांच पड़ताल के लिए शब्बीरपुर गांव का दौरा 8 मई को किया इस जांच पड़ताल के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।)
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सहारनपुर से लगभग 26 किमी दूरी पर शब्बीरपुर गांव पड़ता है । मुख्य सड़क से तकरीबन आधा किमी दूरी पर यह गांव है।इस गांव के आस पास ही महेशपुर व शिमलाना गांव भी पड़ते है। गांव के भीतर प्रवेश करते वक्त सबसे पहले दलित समुदाय के घर पड़ते है। जो कि लगभग 200 मीटर के दायरे में गली के दोनों ओर बसे हुए हैं। यहां घुसते ही हमें गली के दोनों ओर जले हुए घर, तहस नहस किया सामान दिखाई देता है। दलित समुदाय के कुछ युवक, महिलाएं व अधेड़ पुरुष दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर खौफ, गुस्सा व दुख के मिश्रित भाव को साफ साफ पढ़ा जा सकता है। 
  इस गांव के निवासियों के मुताबिक गांव में तकरीबन 2400 वोटर हैं जिसमें लगभग 1200 वोटर ठाकुर समुदाय के , 600 वोटर दलित (चमार)जाति के है। इसके अलावा कश्यप, तेली व धोबी, जोगी (उपाध्याय) आदि समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय के तेली व धोबी के तकरीबन 12- 13 परिवार हैं। गांव में एक प्राइमरी स्कूल हैं जिसमें ठाकुर समुदाय के गिने चुने बच्चे ही पड़ते हैं जबकि अधिकांश दलितों के बच्चे यहां पड़ते हैं।
      गांव की अधिकांश खेती वाली जमीन ठाकुरों के पास है लेकिन 25-35 दलित परिवारों के पास भी जमीन है। दलित प्रधान जो कि 5 भाई है के पास भी तकरीबन 60  बीघा जमीन है। 
      गांव में ठाकुर बिरादरी के बीच भा ज पा के लोगों का आना जाना है। जबकि दलित समुदाय ब स पा से सटा हुआ है। गांव का प्रधान दलित समुदाय से शिव कुमार है जो कि ब स पा से भी जुड़े हुए हैं। इस क्षेत्र के गांव मिर्जापुर के दलित सत्यपाल सिंह ने बताया कि वह खुद आर एस एस(संघ) से लंबे समय से जुड़े हुए है शिमलाना, महेशपुर व शब्बीरपुर गांव में भी संघ की शाखाएं लगती हैं हालांकि इनमें दलितों की संख्या 6-7 के लगभग है और इस गांव से कोई भी दलित शाखाओं में नहीं जाता है।

घटना व घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि----  5 मई को दलित समुदाय को निशाना बनाने से कुछ वक्त पहले कुछ ऐसी बातें हुई थी जिसने दलितों को सबक सिखाने की सोच और मज़बूत होते चले गई । 14 अप्रेल को अम्बेडकर दिवस के मौके पर गांव के दलित अपने रविदास मंदिर के बाहर परिसर में अम्बेडकर की मूर्ती लगाना चाह रहे थे । लेकिंन गांव के ठाकुर समुदाय के लोगों ने इस पर आपत्ति की।प्रशासन ने मूर्ति लगाने की अनुमति दलितों को नहीं दी । मूर्ति लगाने के दौरान पुलिस प्रशासन को गांव के ठाकुर लोगों ने बुलाया। पुलिस मौके पर पहुँची मूर्ति नही लगाने दी गई । दलितों से कहा गया कि वो प्रशासन की अनुमति का इंतजार करें। जो कि नहीं मिली।
     5 मई को इस गांव के पास शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोग "महाराणा प्रताप जयंती" को मनाने के लिए एकजुट हुए थे। इनकी तादात हज़ारों में बताई गई है। इसमे शब्बीरपुर गांव के ठाकुर भी थे। ये सभी सर पे राजपूत स्टाइल का साफा पहने हुए थे, हाथों में तलवार थामे हुए थे व डंडे लिए हुवे थे। 
5 मई को सुबह लगभग 10:30 बजे गांव के ठाकुर समुदाय के कुछ युवक बाइक में दलित समुदाय की ओर से जाने वाले रास्ते पर से डी जे बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इस पर दलितों ने आपत्ति जताई ।  क्योंकि प्रशासन से इनकी अनुमति नहीं थी । इसका दलितों ने विरोध किया लेकिन इस पर भी मामला नही रुका तो दलित प्रधान ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। पुलिस आई और डी जे को हटा दिया गया। दलित समुदाय के लोगों ने आगे बताया कि इसके बाद ये बाइक में रास्ते से गुजरते हुए " अम्बेडकर मुर्दाबाद", "राजपुताना जिंदाबाद" महाराणा प्रताप जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। वह रास्ते से 2-3 बार गुजरे। इन दौरान फिर पुलिस भी आई। 
ठाकुर समुदाय के लोगों का कहना था कि इन दौरान दलित प्रधान ने रास्ते से गुजर रहे इन लोगों पर पथराव किया। जबकि दलित समुदाय के लोग इससे इनकार करते हैं। हो सकता है दलितों की ओर से कुछ पथराव हुआ हो। क्योंकि इसी दौरान ठाकुर समुदाय के लोग महाराण प्रताप जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए रविदास मंदिर पर हमला करने की ओर बढ़े। 
लगभग 11 बजे के आस पास रविदास मंदिर पर हमला बोला गया। दूसरे गांव से आये एक ठाकुर युवक ने रविदास की मूर्ति तोड़ दी नीचे गिरा दी । दलितों ने बताया कि इस पर पेशाब भी की गई। और यह युवक जैसे ही मंदिर के अंदर से बाहर परिसर की ओर निकला वह जमीन पर गिर गया। और उसकी मृत्यु हो गई । इसकी हत्या का आरोप दलितों पर लगाया गया। इण्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक पोस्टमार्टम में मृत्यु की वजह ( suffocation) दम घुटना है। 
तुरंत ही दलितों द्वारा ठाकुर युवक की हत्या की खबर आग की तरह फैलाई गई । और फिर शिमलाना में महाराण प्रयाप जयंती से जुड़े सैकड़ो लोग तुरंत ही गांव में घुस आए। इसके बाद तांडव रचा गया। तलवार, डंडे से लैस इन लोगों ने दलितों पर हमला बोल दिया। थिनर की मदद से घरों को आग के हवाले कर दिया गया। लगभग 55 घर जले । 12 दलित घायल हुए इसमें से एक गंभीर हालत में है। गाय, भैस व अन्य जानवरों को भी निशाना बनाया गया।इस तबाही के निशान हर जगह दिख  रहे थे। यहां से थोड़ी दूर महेशपुर में सड़क के किनारे दलितों के 10 खोखे आग के हवाले कर दिए गए। यह सब चुन चुन कर किया गया। 
घायलों में 5 महिलाएं है जबकि 7 पुरुष। गांव के दलित प्रधान का बेटा  गंभीर हालत में देहरादून जौलीग्रांट में भर्ती है। तलवार व लाठी डंडे के घाव इनके सिर हाथ पैर पर बने हुए हैं। रीना नाम की महिला के शरीर पर बहुत घाव व चोट है। इस महिला के मुताबिक इसकी छाती को भी काटने व उसे आग में डालने की कोशिश हुई। वह किसी तरह बच पायी।

शासन , पुलिस प्रशासन व मीडिया की भूमिका ----- सरकार व पुलिस प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद है व उपेक्षापूर्ण है। यह आरोप है कि घटनास्थल पर हमले के दौरान मौजूद पुलिस हमलावरों का साथ देने लगी व कुछ दलितों के साथ इस दौरान मारपीट भी पुलिस ने की । संदेह की जमीन यहीं से बन जाती है कि जब संघ व भाजपा के लोग अम्बेडकर को हड़पने पर लगे है तब दलितों को उन्हीं के रविदास मंदिर परिसर में अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने से रोक दिया गया व प्रशासन ने इसकी अनुमति ही नहीं दी।
दलितों पर कातिलाना हमले के बाद भी सरकार व मुख्यमंत्री  के ओर से दलितों के पक्ष में कोई प्रयास नहीं हुए जिससे कि उन्हें महसूस होता कि उनके साथ न्याय हुआ हो। इसके बजाय मामला और ज्यादा भड़काने वाला हुआ । एक ओर पुलिस प्रशासन ने पीड़ितों व हमलवारों को बराबर की श्रेणी में रखा और हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगों के साथ साथ दलितों पर भी मुकदमे दर्ज किए दिए गए । 8 मई  तक मात्र 17 लोग ही गिरफ्तार किए गए इसमें लगभग 7 दलित समुदाय के थे जबकि 10 ठाकुर समुदाय के। जबकि दूसरी ओर ठाकुर समुदाय से मृतक परिवार के लोगों को  मुआवजा देने की खबर आई व मेरठ में मुख्य मंत्री योगी द्वारा अम्बेडकर की मुर्ती पर माल्यार्पण न करने की खबर भी फैलने लगी।
घायल लोगों के कोई बयान पुलिस ने 8 मई तक अस्पताल में नहीं लिए थे। घायल लोगों के कपड़े  घटना वाले दिन के ही पहने हुए हैं जो कि खून लगे हुए थे। ये पूरे शासन प्रशासन की संवेदनहीनता को दिखाता है।
इस दौरान गांव में डी एम ने एक बार दौरा किया व कुछ परिवारों को राशन दिया। लेकिन लोगो की जरूरत और ज्यादा की थी उन्हें छत के रूप में तिरपाल की भी जरूरत थी। लेकिन शासन प्रशासन ने फिर मदद को कोई क़दम नहीं उठाया। बाहर से जो लोग मदद पहुंचा रहे थे उन्हें भी प्रशासन ने रोक दिया। 
लखनऊ से गृह सचिव व डी जी पी स्थिति का जायजा लेंने पहुंचे तो वे केवल अधिकारियों से वार्ता करके चले गए गांव जाना व वंहा दलितों से मिलने का काम इन्होंने नहीं किया।
बात यही नही रुकी। दलितों ने भेद भाव पूर्ण व्यवहार के विरोध में तथा मुआवजे के लिए एकजुट होने की कोशिश को भी रोका गया। दलित छात्रावास में रात को ही पी ए सी तैनात कर दी गई। और जब गांधी पार्क से एकजुट दलित लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उस पर लाठीचार्ज कर दिया गया। 
मीडिया ने इस कातिलाना हमले को दो समुदाय के टकराव(clash) के रूप में प्रस्तुत किया। हमलावरों व हमले के शिकार लोगों को एक ही केटेगरी में रखा गया। इसका नतीजा ये रहा कि दलितों में पुलिस प्रशासन व मीडिया के प्रति अविश्वास व नफरत बढ़ते गया।
शबीरपुर घटना की दीर्घकालिक वजह :-----  सहारनपुर  में दलितों की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति तुलनात्मक तौर ठीक है और यह तुलनात्मक तौर पर मुखर भी है । आरक्षण के चलते थोड़ा बहुत सम्पन्नता दलितों में आई है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुए है। लेकिन इन बदलाव को  सवर्ण समुदाय विशेषकर ठाकुर समुदाय के लोग अपनी सामंती मानसिकता के चलते सह नहीं पाते। उन्हें यह बात नफरत से भर देती है कि कल तक जिन्हें वे जब तब रौंदते रहते थे आज वही उन्हें आँख दिखाते है ।
जब से एस सी एस टी एक्ट बना हुआ है  इस मुकदमे के डर से ठाकुर समुदाय के लोगों को जबरन खुद को नियंत्रित करना पड़ता है कभी कभी तो जेल भी जाना पड़ता है। ये बात इन्हें नफरत से भर देती है।ठाकुर समुदाय के लोग महसूस करते है कि बसपा की सरकार थी तो बस इन दलितों का ही राज था। अभी बसपा की सरकार होती तो सारे ठाकुर अंदर होते, भा जा पा के होने केवल 10-12 लोग ही अरेस्ट हुए। दलित व ठाकुरों के बीच के अंतर्विरोध अलग अलग वक्त पर झगड़ो के रूप में दिखते हैं।
चूंकी संघ ने निरंतर ही अपनी नफरत भरी जातिवादी विचारो का बीज इस इलाके में भी बोया है। सवर्ण समुदाय इससे ग्रसित है। वह आरक्षण व सामाजिक समानता का विरोधी है। इसलिए यह अंतर्विरोध और तीखा हुआ है। संघ मुस्लिमों के विरोध में सभी हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है अपने फास्सिट आंदोलन को मजबूत कर रहा है । शब्बीरपुर घटना उसके लिए फायदेमंद नहीं है।
चुकी शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के वोटर दलितों से दुगुने होने के बावजूद ठाकुर अपना प्रधान नहीं बना पाए। एक बार रिजर्ब सीट होने के चलते तो दूसरी दफा सामान्य सीट होने के के बावजूद। 
जब ठाकुर समुदाय के लोगों से यह पूछा गया कि ऐसा कैसे हुआ ? तो उन्होंने जवाब दिया कि सारे चमार, तेली कश्यप एक हो गए हम ठाकुर एक नही हो पाए ज्यादा ठाकुर चुनाव में खड़े हो गए, वोट बंट गए और हार गए। इसका बहुत अफसोस इन्हें हो रहा था। 
इसके अलावा दलितों के पास जमीन होना भी ठाकुर लोगों के कूड़न व चिढ़ को उनके चेहरे व बातों में दिखा रहा रहा था। ठाकुर लोगों से जब पूछा गया कि गांव में सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है ? तो जवाब मिला - सबके पास है दलितों के पास भी बहुत है प्रधान के पास 100 बीघा है उसका भटटा भी है पटवारी भी दलित है जितना मर्जी उतनी जमीन पैसे खाकर दिखा देता है।
ठाकुर परिवार की महिलाएं बोली - हमारी तो इज्जत है हम घर से बाहर नही जा सकती, इनकी(दलित महिलाएं)  क्या इज्जत, सब ट्रैक्टर मैं बैठकर शहर जाती है पैसे लाती है। ठाकुर लोग फिर आगे बोले-इनके ( दलितों) के तो 5-5 लोग एक घर से कमाते है 600 रुपये मज़दूरी मिलती है हमारी तो बस किसानी है हम तो परेशान हैं आमदनी ही नहीं है।
यही वो अंतर्विरोध थे जो लगातार भीतर ही भीतर बढ़ रहे थे दलितों को सबक सिखाने की मंशा लगातार ही बढ़ रही थी। और फिर 5 मई को डी जे के जरिये व फिर नारेबाजी करके मामला दलितों पर बर्बर कातिलाना हमले तक पहुंचा दिया गया। इसमें कम से कम स्थानीय स्तर के भा ज पा , संघ व पुलिस प्रशासन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 5 मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया । जिसमें हजारों लोग गांव में इकट्ठे हुवे थे। ऐसा कार्यक्रम सहारनपुर के गांव में पहली दफा हुआ। जबकि इससे पहले यह जिला मुख्यालय पर हुआ है।
दलित समाज की प्रतिकिया व शासन प्रशासन--- जैसा कि स्पष्ट है विशेष तौर पर पुलिस प्रशासन के प्रति इनमें गहरा आक्रोश था। जब 9 तारीख को दोपहर में गांधी पार्क पर लाठी चार्ज किया गया तो शाम अंधेरा होते होते यह पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ करते हुए दिखा। इनकी मांग थी - हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगो को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करो।
सहारनपुर के रामनगर,नाजीरपुरा,चिलकाना व मानकमऊ में सड़कें ब्लॉक कर दी गई । यह दलित समुदाय के युवाओं के एक संगठन 'भीम आर्मी' ने किया। लाठी डंडो से लैस इन युवाओं को पुलिस प्रशासन ने जब फिर खदेड़ने की कोशिश की तो फिर पुलिस को टारगेट करते हुए हमला बोल दिया गया।पुलिस थाने में आग लगा दी गई । पुलिस की कुछ गाड़िया जला दी गई ।पुलिस का जो भी आदमी हाथ आया उसे दौड़ा दौड़ा कर पिटा गया। अधिकारियों को भी इस आक्रोश को देख डर कर भागना  पड़ा। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया व बाइक जला दी। एक बस से यात्रियों को बाहर कर बस में आग लगा दी गई। 
इस आक्रोश से योगी सरकार के माथे पर कुछ लकीरें उभर आई। तुरंत ही अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दो एस पी पर डालकर उन्हें हटा दिया गया। और अब वह "कानून का राज" कायम करने के नाम पर दलित युवाओं से बनी भीम आर्मी पर हमलावर हो गई है। अस्पताल से लेकर छात्रावास व गांव तक हर जगह इनको चिन्हित कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। जबकि ठाकुर समुदाय के तलवार के बल पर खौफ व दहशत का माहौल पैदा करने वाले महाराण प्रताप जयंती वाली सेना को सर आंखों पर बिठा कर रखा जाता है। उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्यवाही सुनने या देखने पढ़ने को नही मिली।साफ महसूस हो रहा है कि पुलिस प्रशासन अब पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दलित समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। 
कुल मिलाकर शासन -प्रशासन व राज्य सरकार का रुख दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण, उपेक्षापूर्ण , दमनकारी व सबक सिखाने का बना हुआ है। इसलिये आने वाले वक्त में यह समस्या और गहराएगी। वैसे भी जब जातिवादी , साम्प्रदायिक व फासिस्ट विचारों से लैस पार्टी सत्ता में बैठी हुई हो तो इससे अलग व बेहतर की उम्मीद करना मूर्खता है। 



















Wednesday, 22 March 2017

23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर



   23 मार्च शहादत दिवस के अवसर पर
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     पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध अभी जारी है
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     ‘‘निकट भविष्य में अंतिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारंभ किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त होगा।’’  (‘हमें फांसी के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये’ शीर्षक से पंजाब के गर्वनर को लिखे पत्र से)
     यह शब्द शहीदे आजम भगत सिंह के हैं। 23 मार्च, 1931 को जालिम अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भगत सिंह, सुखदेव  और राजगुरू को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था। अंग्रेज शासकों ने सोचा कि उनकी मौत के साथ यह युद्ध वह जीत जायेंगे लेकिन शोषण-उत्पीड़न-असमानता के खिलाफ यह युद्ध आज भी जारी है। इस युद्ध में एक तरफ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी  शासक हैं तो दूसरी तरफ मजदूर-मेहनतकश-छात्र-नौजवान हैं। शहीदे आजम भगत सिंह मजदूरों-मेहनतकशों के योद्धा के बतौर इस युद्ध में शहीद हुए।
     फांसी पर चढ़ने से पहले भगत सिंह महान रूसी क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। फांसी से पहले जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि उन्हें लेनिन की जीवनी पूरी करने का समय दिया जाये। लेनिन उस रूसी क्रांति के नेता थे जिस क्रांति ने दुनिया में पहली बार मजदूरों-किसानों की सत्ता की स्थापना की। रूसी क्रांति ने जारीशाही शासन का समाप्त कर समाजवाद की स्थापना की तथा मानव द्वारा मानव के शोषण का खात्मा किया। यह वर्ष महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति (1917) का सौंवा वर्ष है।
       रूस की समाजवादी क्रांति ने न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा बल्कि 20 वीं सदी के इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी। इस क्रांति ने गुलामी, शोषण, असमानता और साम्राज्यवाद से लोहा लेने वाली ताकतों को नयी ऊर्जा व नयी राह प्रदान की। समाजवादी क्रांति ने दुनिया के शोषित-उत्पीड़ितों को बताया कि पूंजीवादी लोकतंत्र नहीं बल्कि समाजवादी लोकतंत्र ही उनकी मुक्ति का मार्ग है। रूसी समाजवादी क्रांति ने यह साबित कर दिया कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विकल्प समाजवाद है, कि दुनिया को अब परजीवी शासकों की जरूरत नही है बल्कि मजदूर-मेहनतकश स्वंय अपना शासन चला सकते हैं और उनसे बेहतर चला सकते हैं। कि भविष्य समाजवाद का है। दुनिया के कोने-कोने में समाजवाद के लिए संघर्ष करने वालों में भगत सिंह भी एक हैं। 
      भगत सिंह ऐसे युवा थे जो जोश और उमंग के साथ-साथ अपनी वैचारिक परिपक्वता के लिए जाने जाते हैं। भगत सिंह देश के नौजवानों को, वे चाहे मजदूर हों, छात्र हों या फिर बेरोजगार को ऊर्जा से भर देने वाले शख्स हैं। उनका पूरा जीवन बात का गवाह रहा है। युवाओं की उर्जा, उत्साह क्या होता है और अन्याय के खिलाफ अनवरत संघर्ष कैसे किया जाता है यह भगत सिंह से सीखा जा सकता है। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट-शोषण के खिलाफ संघर्ष भगत सिंह के संघर्ष का एक हिस्सा था तो मजदूरों-किसानों का राज समाजवाद की स्थापना करना दूसरा हिस्सा था। आज भी दुनिया और देश पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से मुक्त नहीं है। मजदूरों-किसानों-छात्र-नौजवानों को जीवन कष्टमय बना हुआ है।
       दुनिया में छाया आर्थिक संकट मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन और कष्टों से भर रहा है। शासक वर्ग रही-सही राहत भी मजदूरों-मेहनतकशों से छीन लेने पर आमादा है। पूरी ही दुनिया में शासक वर्ग दक्षिणपंथ की ओर ढुलकता जा रहा है। पूंजीवादी लोकतंत्र को और सीमित करते हुए वे मेहनतकशों पर हमलावर है। पूंजी की लूट, मुनाफे को बढ़ाने के लिए तथा मजदूर-मेहनतकशों को और निचोड़ने के लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। 
        भारत में भी संघी सरकार मजदूरों-मेहनतकशों पर हमले के नये कीर्तिमान रच रही है। श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव, मजदूरों के शोषण के लिए विदेशी निवेश को आतुर यह सरकार पूर्व की सरकारों को भी पीछे छोड़ दे रही है।आर्थिक हमलों के साथ-साथ संघी सरकार अपने फासीवादी एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ा रही है और अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को निर्ममता से कुचल रही है। विरोध के स्वर से निपटने में वह लंपटाई में उतर आयी है। कालेज-कैंपस संघी गुण्डागर्दी के अड्डे बनते जा रहे हैं। 
        ऐसे समय में भगत सिंह व उनके विचार और भी महत्व ग्रहण कर लेते हैं। ऐसे समय में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति और भी प्रासंगिक हो जाती है। चहुंओर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से पीड़ित जन की मुक्ति का मार्ग समाजवादी क्रांति से होकर जाता है। भगत सिंह ऐसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे जो भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के साथ-साथ शोषण और सभी तरह की असमानता से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत थे। जिसमें उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
    भगत सिंह ने कहा था-‘‘ हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असंभव बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतंत्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय संकट में है।’’ (‘अदालत एक ढकोसला है’ से कमिश्नर विशेष ट्रिब्यूनल लाहौर साजिश केस के सामने स्पष्टीकरण)
    आज के इस कठिन दौर में भगत द्वारा बताया गया समाजवाद का रास्ता ही मजदूरों-किसानांं-छात्रों-नौजवानों-महिलाओं के जीवन में बेहतरी का रास्ता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपने पतन में इस कदर डूब चुके हैं कि वे मानवजाति पर एक त्रासदी बन गये हैं। मजदूरों-मेहनतकशों को, छात्रों-युवाओं-महिलाओं को क्रांति और समाजवाद के परचम को लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचाना होगा जिसे शहीदे आजम भगत सिंह ने एक समय बुलंद किया था। 
     अक्टूबर क्रांति के सौवें वर्ष पर तथा शहीदे आजम भगत सिंह के शहादत दिवस पर हम मजदूरों-मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं का आहवान करते हैं कि मुक्ति के संघर्ष को आगे बढ़ायें। 

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