Wednesday, 27 November 2013

reports on muzaffarnagar communal riots

                              मुजफ्फरनगर दंगों की हकीकत



                            क्रालोस व प्रोमेफो की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट

       क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के नेतृत्व में क्रालोस व प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम के 6-8 कार्यकर्ता 8-9 नवम्बर को मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में गए। इस दौरे में टीम मुजफ्फरनगर से लगभग 25 किमी. दूर शाहपुर कस्बे व बुढाना क्षेत्र में सहायता शिविरों व कुछ गांवों में गई। टीम हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोगों से मिली। हालांकि शासन-प्रशासन के लोगों से टीम नहीं मिली। तथ्यांे का स्रोत दोनों ही समुदाय  के लोगों से बातचीत, दंगाग्रस्त स्थानों का भ्रमण, अखबार व एक तथ्यान्वेषी रिपोर्ट ईविल स्टाल्क्स आफ लैंड है जो कि 24 सदस्यीय एक दल ‘अनहद’ द्वारा तैयार की गई है। 
       सबसे पहले जब तथ्यान्वेषी टीम जब मुजफ्फरनगर पहुंची तो मुजफ्फरनगर शहर में जीवन सामान्य सा प्रतीत हो रहा था लेकिन शाहपुर पहुंचते ही माहौल में व्याप्त तनाव महसूस होने लगा। यहां पिछले 3 दिन से अनिश्चितकाल के लिए बाजार बंद था। यहीं सबसे पहले शाहपुर पुलिस चौकी के नजदीक तकरीबन 10 लोगों के समूह से टीम ने बातचीत की। इसमें कृष्णपाल सिंह, शाहपुर नगर पंचायत के वाइस चेयरमेन चंद्रवीर सिंह, विनोद कुमार, कंचन आदि आदि थे। इन सभी ने हमें बताया कि शासन-प्रशासन एकतरफा कार्यवाही कर रहा है। मुस्लिमों को प्रशासन का सहारा है। मुस्लिमों के प्रति एक नफरत इनमें दिखी। इन्होंने कहा कि साले मुस्लिमों को अमूल का दूध पीने को मिल रहा है कैंपो में, कैंप से मुस्लिम इसलिए अपने घरों को नहीं जा रहे हैं क्योंकि सभी को 12 लाख रुपया व नौकरी मिल रही है। बाजार बंद होने का कारण पूछने पर बोले कि 6 नवंबर को डा. हरवीर आर्या पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने जब वे गाड़ी में बैठे थे तब हमला किया और इसके अलावा बसों को जलाया गया, उसमें बैठी महिला यात्रियों को अपमानित किया गया। इसमें 15 नामजद व 150 गैरनामजद मुस्लिमों का नाम दर्ज है। इन सभी की गिरफ्तारी ना होने तक बाजार बंद रहेगा। तीन की गिरफ्तारी हो चुकी है लेकिन एक को विधायक के दबाव में छोड़ दिया गया। साथ ही इस समूह ने दंगों के लिए भाजपा को निर्दोष बताते हुए सपा को जिम्मेवार ठहराया। अन्य जगह यह पता लगा कि डा. हरवीर आर्या के यहां एक मुस्लिम कबाड़ी का शव मिला। जिसके विरोध में मुस्लिम समुदाय ने बसों पर पथराव किया।  
     इसी समूह से बातचीत में पता लगा कि डा. हरवीर आर्या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जिला प्रभारी हैं। आर.एस.एस. के कैंप शाहपुर में लगते रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या किसी क्षेत्र में हिन्दुओं का पलायन भी हुआ है या इनके कैंप लगे हैं तो पता लगा कि 2-4 गांव के हिन्दू समुदाय के लोग पलायन का शिकार हुए व कमालपुर कैंपों में रह रहे हैं। यह पूछने पर कि क्या उनसे मिला जा सकता है तो बोले कि कुछ दिन कैंप में रहे थे उसके बाद वापस चले गए। 
      इसके बाद टीम शाहपुर में ईदगाह के पास लगे पलायन कर गए मुस्लिम सहायता शिविर में गये। इसमंे तकरीबन 1000 से ज्यादा स्त्री पुरुष व बच्चे रह रहे हैं। 10 बाई 10 के टैंट लगे हुए हैं जिसमें कई सदस्यों का एक परिवार रह रहा है। सरकार की ओर से इन्हें कोई भी मदद नहीं दी जा रही है। केवल कुछ दिन खाना दिया गया व 5 परिवार पर एक बाल्टी-प्लेट। इसके अलावा कुछ मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये का मुआवजा व नौकरी मिली है। कई गांव मसलन कुटबा, कुटबी, काकड़ा, लाखबावडी, सीसोल आदि से पलायन कर गए मुस्लिम परिवार यहां पर शरण लिए हुए हैं। 
       ये सभी गरीब मजदूर पृष्ठभूमि के हैं। टैंट के आस-पास गंदगी कम है। बच्चे व वयस्क लोग बीमार भी हैं। बुखार, अमीबिक दस्त आदि से ग्रस्त हैं। महिलाओं को ज्यादा समस्याओं का सामना करना पड रहा है क्योंकि नहाने व शौच की सही व्यवस्था नहीं है। जो भी मदद आ रही है टेंट समेत खान-पान तक सभी जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिन्द व जमात-ए-इस्लामी व नागरिकों से मिल रही है। सरकार के सारे दावे कागजी साबित हो रहे हैं।  
       सपा सरकार संपत्ति के नुकसान पर व घायलों को 5 लाख रुपये देने व मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये मुआवजा देने व एक नौकरी देने की घोषणा कर चुकी है लेकिन हकीकत कोसों दूर है। मुआवजा दस्तावेज के बगैर नहीं मिल पाएगा। जबकि कईयों के पास दस्तावेज ना होने की संभावाना मौजूद है। साथ ही एक शपथ पत्र भी भरवाया जा रहा है जिसके सातवें बिन्दु में बेहद आपत्तिजनक बात की गई है। वह यह कि ‘मुस्लिम शरणार्थी को अन्यत्र जाने पर ही मुआवजा देने की शर्त है’।    
        इस शिविर में काकड़ा के आबिद, इस्लाम्मुद्दीन, महमूद तथा फजना, जुबेदा आदि से बात हुई। साथ ही यहां पर सपा के एक कार्यकर्ता अख्लाक कुरेशी से बातचित हुई। उन्होंने दंगों में सपा की भूमिका से साफ-साफ इंकार करते हुए भाजपा को दोषी ठहराया। उन्होंने बताया कि पंचायतें यहां पर काफी पहले से होती रही हैं। तब भारतीय किसान यूनियन के महेन्द्र सिंह टिकैत इसके नेता थे। इन पंचायतों में दोनों ही समुदाय के लोग शिरकत करते थे तथा हथियार के बिना ये पंचायत हुआ करती थीं। यह किसान संगठन धनी किसानों के हितों के लिए संघर्ष करता था।
      यहीं बातचीत में पता लगा कि कवाल कांड के बाद जब 31 अगस्त को पंचायत(हिन्दू जाटों की) हुई तो प्रशासन इसे रोकने में नाकामयाब रहा। यह भी पता लगा कि 30 अगस्त को खालापार में नमाज अदा होने के बाद सभा की गई जिसे बी.एस.पी. विधायक कादिर राणा, सपा विधायक रशीद सिद्दीकी, बसपा विधायक मुरसालीन, कांग्रेस के पूर्व मंत्री शहीदुल अजम व मौलाना नजीर ने संबोधित किया जिसमें उन्होंने भडकाऊ व नफरत फैलाने वाले भाषण दिये।
       5 सितंबर को एक महापंचायत हुई जिसे भाजपा व आर.एस.एस. द्वारा संगठित किया। जिसमें विश्व हिन्दू परिषद के बाबा हरकिशन, बाबा सीता राम व आर.एस.एस. कायकर्ता विजेंद्र मौजूद थे। यह ‘बेटी-बहू बचाओ’ महापंचायत थी। निषेधाज्ञा के बावजूद 7 सितंबर को नगला मंदौर में महापंचायत होनी थी।  उत्तर प्रदेश के डी.जी.पी. जो कि भाजपा के विधायक हुकुम सिंह के नजदीकी रिश्तेदार प्रतीत होते हैं वह एक दिन पहले ही इस स्थल पर ओफिसियल हेलीकाप्टर लेकर गए। यह ऐसा वक्त था जब भयानक तनाव, दहशत व अफवाह का माहौल यहां चौतरफा व्याप्त था। इन महापंचायतों में मुस्लिम समुदाय के प्रति जमकर नफरत भरी गई। उत्तेजना व उन्माद के माहौल को और ज्यादा बढ़ाया गया। एम.एम.एस. व सी.डी.एस. के रूप में एक वीडियो भाजपा व आर.एस.एस. के कार्यकर्ताओं द्वारा फैलाई गई। भाजपा के विधायक संगीत सोम ने यह वीडियो अपलोड की थी। यह वीडियो फर्जी था।   
     जाट समुदाय के लोग ट्रेक्टर ट्रालियों में बैठकर हाथों में हथियारों को लहराते हुए मुस्लिमों के खिलाफ ‘मुस्लिमों का एक ही स्थान कब्रिस्तान या पाकिस्तान’, ‘देश, बहू और गाय को बचाना है तो नरेंद्र मोदी को लाना है’, ‘सोनी सोनी लड़कियों के सिंदूर भर देंगे और बाकियों को काट देंगे’ जैसे घृणित नारेबाजी करते हुए जब शाहपुर के देहात पलड़ा व बसीकलां से होते हुए शाहपुर को जा रहे थे तब रास्ते में यहीं पर इन्होंने बसीकलां की एक मुस्लिम महिला को भाला मार दिया जिसकी मृत्यु हो गई। इसके अलावा ये रास्ते में मारपीट करते जा रहे थे जिसमें चोटें र्भी आईं। इस सब के विरोध में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने इन पर पथराव किया। जिससे जाट समुदाय(हिन्दू) के लोगो को चोटें भी आईं। चोट की स्थिति में ही ये महापंचायत में पहुंचे। जहां लाख की संख्या में लोग इकट्ठे थे।
महापंचायत के इन दो-तीन दिनों के दौरान ही मुस्लिम समुदाय पर हमले शुरू हो गए। खौफ व दहशत में ही मुस्लिम समुदाय के लोग अपने-अपने घरों से अपनी जान बचाने के लिए भाग निकले। 6-9 सितंबर के बीच लगभग 50 हजार से ज्यादा मुस्लिम पलायन को मजबूर हुए हालांकि कुछ का यह आंकड़ा एक लाख तक का है। मुजफ्फरनगर, शामली आदि क्षेत्रों के कई-कई गांव से यह पलायन हुआ। जोकि शरणार्थियों के रूप में सहायता शिविरों में रहने को मजबूर हैं और कई ऐसे भी हैं जोकि अपने रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं। कई परिवार दिल्ली पलायन कर गए हैं। 
       ‘अनहद’ द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछले 2 वर्ष से संघ परिवार के सक्रियता बढ़ी है। जाट समुदाय के बेरोजगार युवकों व स्थानीय गुंडा तत्वों को सफलतापूर्वक अपने फासीवादी मंसूबों में शामिल करा लिया गया है। यह ऐसा क्षेत्र है जो कि 92 के दंगों से अछूता रहा। दोनों समुदाय के लोग मिल-जुल कर रहते थे। लगभग 8 माह पहले संघ परिवार ने लगभग हर गांव व कस्बे से 10 -15 युवकों की भर्ती की। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं कई गुना इनके संगठित व योजनाबद्ध प्रयासों से बढ़ गई। यह मुस्लिम वेश बनाकर भी होता था। और इस प्रकार संघ परिवार ‘लव जिहाद’ के अपने सिद्धान्त को आगे बढ़ाने में सफल हो गया।  
      यह ऐसे इलाके हैं जहां लिंगानुपात 863 (2011 के हिसाब से) है। घोर पितृसत्तात्मक मूल्य यहां अभी मौजूद हैं। महिलाओं का अपने अधिकारों के लिए सजग होने का मतलब इस पितृसत्तात्मक मूल्यों व इन मूल्यों से लैस संस्था पंचायत या खाफ पंचायत के खिलाफ जाना जो कि इनकी नजर में पाप है, घोर अपराध है। इन स्थितियों में ‘लव जिहाद’ का सिद्धान्त काफी असरकारक होना था। हमउम्र या सहपाठी हिन्दू लड़की का मुस्लिम लड़के से बातचीत करने को भी इसी रूप में प्रचारित कर सांप्रदायिक भावनाए भड़काने में इस्तेमाल किया गया। 
      8 माह पहले भाजपा द्वारा एक रैली भी यहां निकाली गई जो कि भाजपा विधायक उमेश मालिक व बिल्डर संजीव बलयान के नेतृत्व में हुई थी। इसमें त्रिशूल बांटे गए, नफरत फैलाने वाले भाषण दिये गए। 
      लिसाढ़ में 5 जून 2013 को एक 24 वर्ष की हिन्दू लड़की 16 वर्ष के मुस्लिम लड़के के साथ गायब हो गई। इसने साम्प्रदयिक तनाव को बढ़ाया। भाजपा ने इसके विरोध में खाफ पंचायत का आयोजन किया जिसमें त्रिशूल बंटे, घृणास्पद भाषण दिये गए। हिंसा हुई जिसके चलते मुस्लिम यहां से भाग गए। यहां पी.ए.सी. लगानी पड़ी। ऐसी घटनाएं बढ़ती रहीं। 
     मार्च 2013 में ही एक लड़के ने होलिका जिसका दहन अगले दिन होना था पहले ही दहन कर दिया। इसके तत्काल बाद मस्जिद पर हमला बोल दिया गया, इमाम को पीटा गया, कुरान जला दी गई, मुस्लिम परिवारों को यहां से पलायन करना पड़ा। एफ.आई.आर. दर्ज हुई। भाजपा के 30 लोग गिरफ्तार किए गए, 3 के खिलाफ रासुका लगी।
      2 जून 2013 को हरिद्वार से एक हिन्दू लड़की शामली के एक मुस्लिम लड़के के पास पहुंची और ये एक होटल में ठहरे थे। भाजपा को जैसे ही यह खबर लगी उसने इस प्रेम प्रसंग को मुस्लिम युवक द्वारा हिन्दू लड़की के साथ बलात्कार करने के रूप में बदल दिया। इसके बाद भाजपा के हुकुम सिंह व सुरेश राणा अपने कार्यकर्ताओं व हजारों लोगों समेत स्थानीय पुलिस चौकी घेर ली और फिर मुस्लिम दुकानों को लूटा गया। हुकुम सिंह, सुरेश राणा व भारतेन्दु के नेतृत्व में बाजार, बस स्टाप व सड़क पर मुस्लिम स्त्री-पुरुषों पर हमला बोल दिया गया। 
     2 जुलाई 2013 को आर.के.पी.गी. कालेज शामली में भाजपा ने महापंचायत का आयोजन किया जहां हुकुम सिंह, सुरेश राणा, व भारतेन्दु पर लगे मुकदमे वापस लेने की मांग की गई। 21 अगस्त को दो बच्चों के झगड़े को साम्प्रदायिक हिंसा में बदल दिया गया जिसमें उमेश मलिक (भाजपा, आर.एस.एस.) समेत 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया व 155 के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए। 
     और फिर 27 अगस्त की खबर जिसे कि खूब कवरेज मिली। एक हिन्दू लड़की के साथ शहनवाज नाम के मुस्लिम लड़के द्वारा छेड़छाड़ की घटना पर सचिन व गौरव द्वारा शहनवाज की हत्या फिर इसके बदले में सचिन व गौरव की हत्या हुई। हकीकत में यह छेड़छाड़ की घटना न होकर आपसी बहसबाजी व इसके हिंसक हो जाने पर हुई हत्याएं थीं। बस इसके बाद संघ व भाजपा ने संयुक्त रूप से बड़ी हिंसा की तैयारी कर दी व 5 सितंबर को पंचायत का ऐलान कर दिया गया। पंचायत में शामिल लोगों ने एक इनसार नाम के मुस्लिम ड्राइवर (कांधला निवासी) की हत्या कर दी गई। 
     महापंचायत के दौरान ही आई.बी.एन. के पत्रकार की हत्या की खबर फैली जो कि हिन्दू था तथा यह खबर भी फैल गई कि जब हिन्दू ट्रैक्टरों से वापस जा रहे थे तब मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा हमला कर दिया गया जिसमें 200 लोगों को मार दिया गया व 16 ट्रैक्टर जला दिये गए हैं। इन्हें जौली कैनाल में फेंक दिया गया है। जबकि यहां भोपा पुलिस स्टेशन में दर्ज एफ.आई.आर. में वास्तविक तौर पर 7 लोग मारे गए थे जिनमें से 3 हिन्दू(सोहनवीर, अजय व ब्रिजपाल) जबकि 4 मुस्लिम (नजर मोहम्मद, सुलतान, लताफत व मो. नाजिम) थे। यह एफ.आई.आर. गांव के लोगों की तरफ से नहीं थी। इसका मतलब था कि ये उस राह से गुजरने वाले व्यक्ति थे जहां से पंचायत से लौटते लोग ट्रैक्टर पर आ रहे थे और इनका निशाना बन गए। यहां केवल 2 ट्रैक्टर जले हुए थे बाकी पुराने व जंग लगे हुए थे। 
       टीम ने शाहपुर से 7-8 किमी अंदर कुटबा व कुटबी गांव की ओर प्रस्थान किया। गन्ने की ऊंची-ऊंची फसल के बीच रास्ते से होकर हम इस गांव में पहुंचे। यहां एक अजीब सा सन्नाटा व दहशत पसरी हुई थी। बड़े-बड़े घर खाली लग रहे थे। लगभग आधे किमी का सफर तय करने के बाद एक बड़े से घर के बाहर एक युवक दिखाई दिया जो कि जाट किसान परिवार से था। इसके अलावा दो लोग और थे बमुश्किल उससे बातचीत हुई। पंकज व राजेश नाम के इन दो लोगों ने बताया कि 7-8 सितंबर को तकरीबन 1500 मुस्लिम बच्चों समेत यहां से पलायन कर गए हैं हालांकि सी.आर.पी.एफ. ही अधिकतर लोगों को यहां से निकाल कर ला पाई। 
       आगे बढ़ने पर तीन चार मजदूर पृष्ठभूमि के हिन्दू लोग दिखाई दिये । इन्होंने कहा कि गांव में 4 लोग 7-8 सितंबर में मरे थे जिसमें दो हिन्दू थे। हालांकि हकीकत यह थी कि 7-8 सितंबर को यहां 8 मुस्लिम मारे गए। माहौल गरम होने पर हम यहां से लौट आए। यह दोनों गांव हिन्दू बहुल हैं। जिसमें जाट समुदाय के धनी किसान व अनुसूचित जाति के हिन्दू भी हैं। सभी मुस्लिम फेरी लगाने, खेत मजदूरी या अन्य मेहनत के काम करते थे। इस गांव में पसरे सन्नाटे व दहशत से समझ में आ रहा था कि पलायन कर गए मुस्लिम परिवार क्यों वापस यहां नहीं लौटना चाहते हैं। लोग अभी भी उन्माद की स्थिति में हैं। एस.एच.ओ. व एस.एस.पी. की गाड़ी व पुलिस पर भी यहां हमला बोल दिया गया था जिसमें एस.एच.ओ. घायल हो गया था। यहां अभी प्रशासन द्वारा दबिश दी जा रही है।   
     फिर वापस आते वक्त हम पलड़ा गांव पर रुके इसके पलड़ व बसीकलां गांव इसके आस पास हैं। ये सभी मुस्लिम बहुल गांव हैं और मुस्लिम पठानों के पास खेती है जबकि बाकी मुस्लिम मेहनतकश है। इन तीनों गांव में कोई दंगा नहीं हुआ। यहां यह भी पता लगा कि भाजपा के लोगों का कुट्मा-कुटमी गांव में लगातार आना जाना था। लोगों ने यह भी बताया कि कुछ हिन्दू लोग दहशत में यहां से चले गए थे लेकिन हम उन्हें वापस ले आए। यहां पर डा. मुकेश ने भी हिन्दू जाट के अत्याचार की तसदीक की कि किस प्रकार पंचायत को जा रहे जाट लोगों ने एक गर्भवती महिला को भाला भोंका। इसके अलावा अन्य के साथ मार काट की।  
      बसीकलां में लगे शिविर में भी हम लोग गए। यहां तकरीबन 250-300 मुस्लिम परिवार(1000 हजार लोग लगभग) शरण लिए हुए हैं। अन्य कैंपों की तरह यहां की स्थिति भी बेहद बुरी है। यहां पर कुटबा कुटबी, सिसौली, लाखबावडी, खेरी बड़ी व भैंसवाल गांव के मुस्लिम शरण लिए हुए हैं। सीसौली गांव वही है जहां भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत व राकेश सिंह रहते  हैं। सिसौली के यामीन पुत्र अलिहसन ने अपने सिर पर धारदार हथियार से लगे 6 घाव व पीठ पर लगे घाव दिखाये। यहीं अन्य लोगों से बातचीत में भी पता लगा कि राकेश टिकैत व नरेश टिकैत ने प्रशासन से कहा कि यहां सब कुछ ठीक है। जब दहशत में यामीन समेत अन्य लोग जीवन की सुरक्षा में पलायन कर रहे थे तब इनके द्वारा इन्हें रोका गया व मार काट की गई। ये सभी गांव हिन्दू बहुल हैं। 
       कैपों व अन्य जगहों पर कई लोगों से बातचीत में पता लगा कि लिसाढ़ व कुछ गांवों में कुछ महिलाओं व लड़कियों से बलात्कार हुए हैं जिन्हें जला दिया गया। लिसाढ़ में 13 मुस्लिम, लाखबावडी में 6 मुस्लिम फुगाना में 40-50  की हत्या 7-8 सितंबर को हुई। इसके अलावा और भी लोग मारे गए हैं। यह अभी भी जारी है। कई जगहों पर घरों को जला दिया गया। ये सभी घटनाएं गुजरात में भाजपा व संघ परिवार के नेतृत्व में कायम फासीवादी राज्य के अत्याचारों की ही तरह हैं।  
       टीम शाहपुर से 13-14 किमी दूर बुढाना के नहरबाई में लगे कैंप पर भी गई। यहां सिंचाई विभाग के गोदाम में यह शिविर लगा हुआ है। अब तकरीबन 450 -500 लोग शिविर में है जबकि बाकी लोग इसी बस्ती में मुस्लिम लोगों के यहां शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। इसके अलावा यहां लोई, कांदला, जोगिया खेडा, मदवाडा, हुसैनपुर, हर्षोली, खतौली तथा शामली में भी सहायता शिविर लगे हैं। सभी जगह पर लोगों ने बताया कि अनुसूचित जाति के हिन्दू लोगों ने उन पर हमला नहीं किया। जब उन पर बहुत दबाव डाला गया तभी कहीं-कहीं हमला किया गया। यहीं पर यह भी उमरदीन से पता लगा कि 8 सितंबर को लाखबावड़ी के एक हिन्दू नाई संजय ने मुस्लिमों पर हमले के वक्त उमरदीन की जान अपनी दुकान में बंद कर बचाई। लोगों ने यह भी बताया कि हमले में बाहर के लोग भी शामिल थे। 
       कुल मिलाकर इन दंगों को या मुस्लिमों पर जाट समुदाय द्वारा किए गए हमले इतनी बडी संख्या में गरीब मजदूर लोगों का पलायन, महिलाओं-लड़कियों के साथ यौन हिंसा व कुछ के साथ वीभत्स बलात्कार, हत्याकांड इस सबकी पृष्ठभूमि रचने में सपा, बसपा, भारतीय किसान यूनियन व कांग्रेस जिनमें कि मुस्लिम विधायक भी हैं, शामिल रहे हैं जबकि संघ परिवार-भाजपा तो समाज में अपने घृणित साम्प्रदायिक फासीवादी अभियान को गुजरात की सफलता के बाद दोहराने की कोशिश में हैं व यहां हुई तबाही के सूत्रधार हैं। सपा के घिनौने खेल को कैंप में रह रहे शरणार्थी कुछ-कुछ समझ रहे हैं लेकिन संघ परिवार लोगों को अपने एजेंडे पर अपने पक्ष में खड़ा करने में कामयाब रहा है जो कि निश्चित तौर पर आने वाले समय में खतरे का संकेत भी हंै।

Tuesday, 29 October 2013

uttarakahnd gov. emp. strike


          राज्य कर्मचारियों की जायज मांगों के संबंध में सरकार अविलम्ब जी.ओ. जारी करे !
साथियो,         
            उत्तराखंड में राज्य कर्मचारियों द्वारा राज्य संयुक्त कर्मचारी परिषद के बैनर तले पिछले कई दिनों से अपनी जायज आर्थिक मांगो के संबंध में संघर्ष चलाया जा रहा है । कर्मचारियों की मुख्य मांगे वेतन विसंगति दूर किए जाने व तीन प्रोन्नति या प्रोन्नत वेतनमान दिये जाने के संबंध में है । इन मांगों के संबंध में इससे पहले भी राज्य कर्मचारी संघर्ष करते रहे हैं लेकिन हर बार शासको का रवैया ऐसा ही रहता है ।  
            इस संघर्ष के प्रति राज्य सरकार का रुख उपेक्षापूर्ण है टालामटोली का है। और कोशिश यही है कि जब तक मजबूरी न बन जाय तब तक इसे लटकाए रखे । और इस स्थिति में भी जब कभी कर्मचारी अपनी हदों को पार करते हैं तो फिर आंदोलन को वापस लेने के लिए उन को `नो वर्क – नो पे या फिर एस्मा जैसा काला कानून लागू करने की धमकी देने से भी कोई गुरेज नही होता है । जबकि यह स्थिति खुद सरकार द्वारा पैदा की गई है जो कि कर्मचारियों के संबंध में 6th वेतनमान  व प्रोन्नति के संबंध में खुद स्वयं द्वारा मान्य नियमों को लागू करने से बचती रहती है । कहा जा रहा है कि इसे लागू करने से खजाने पर 450 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा । और यही तर्क तब दिया गया था जब शिक्षा मित्रों ने अपना मानदेय बढ़ाने के लिए राजधानी में प्रदर्शन किया था । जनता के हर हिस्से के आंदोलन के प्रति सरकार का कम या ज्यादा तीव्रता के साथ यही व्यवहार रहता है ।
            ये अमीर पूंजीवादी राजनेता जो विधान सभाओं व संसद में अपने वेतन व सुविधाएं बढ़ाने वाले बिल को सेकंडों में पारित कर  तत्काल लागू कर देते है जो कि पूंजीपति वर्ग के ईमानदार प्रतिनिधि है इसीलिए लाखों करोड़ की पूंजी के मालिकों की मुनाफे की चिंता में ही डूबे रहते है और खुद को व इन पूँजीपतियों को और मालामाल करने के लिए कौड़ियों के मोल इन्हे जमीन देने, देश के खनिज संसाधनों को इन पर लुटा देने, सस्ती बिजली, सस्ता मजदूर देने तथा ढेर सारी छूटें देने को आकाश पाताल एक कर देती है यदि इन्हे जनता के एक बेहद छोटे हिस्से कि मांग भी खजाने में बोझ लगती है तो समझ में आ जाता है कि एसा क्यों है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन राज्य सरकार के इस घटिया व संवेदनहीन व्यवहार की तीखी भर्त्सना करता है और मांग करता है कि सरकार कर्मचारियों की मांगो के संबंध में तत्काल आवश्यक दिशानिर्देश जारी करे ।
            कर्मचारियों की मांगे व संघर्ष जायज है इसमे कोई दो राय नहीं । लेकिन इसके साथ ही यह कहना भी सही होगा कि यह संघर्ष मात्र  आर्थिक हितो या सुविधाओं के लिए चलाया जा रहा सीमित या संकीर्ण संघर्ष भी है यह स्थिति मजदूर-कर्मचारियों व मेहनतकश जनता के समग्र हित में ठीक नहीं है और यह स्थिति चिंताजनक भी है ।
            यह स्थिति चिंताजनक, गंभीर व खतरनाक इसलिए है कि जब पूरे देश में मजदूर-कर्मचारी विरोधी श्रम नीति को लागू करने की दिशा केंद्र व राज्य सरकारें बेहद तेजी से अपना कदम बढ़ा रही हो, `संविदा प्रथा`ठेका प्रथा`आउटसोर्सिंग नीति ज़ोर शोर से आगे बढ़ रही हो,  ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले किए जा रहे हों , निजीकरण का शोर चारों ओर हो तब इन गंभीर चुनौतियों व हमलों के दौर में कर्मचारियों व कर्मचारी यूनियनों का इन नीतियों के विरोध में व्यापक संघर्ष नही दिखाई देता । आज से लगभग 13 वर्ष पहले विध्युत विभाग के कर्मचारियों का विभाग के  निजीकरण के विरोध में किए गए जुझारू संघर्ष को याद करें तो यह समझ में आ जाएगा ।
            विरोध का यह तीखा स्वर व संघर्ष तब भी नहीं दिखाई देता जब सरकारी विभागों के संविदाकर्मी या ठेकाकर्मी या फिर बेहद कम वेतन ( मानदेय ) पर काम करने वाले कर्मी अपने नियमितीकरण या अन्य मांगों के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं और इनके संघर्ष का दमन किया जाता है ।
            शासकों द्वारा अलग-अलग वक्त में 5th , 6th वेतनमान को लागू किया अब तो 7th वेतनमान की चर्चा आम हो गई है । यह इसलिए लागू नही किया गया कि इन्हें कर्मचारियों की  बहुत चिंता थी । एक सोची समझी रणनीति के तहत यह सब किया गया जो कि जारी है । इन वेतनमानों के जरिये उच्च अधिकारियों का वेतन काफी ज्यादा बढ़ाया गया , कर्मचारियों व इनके वेतन में अंतर को काफी बढ़ाया गया । कर्मचारियों के व्यापक व जुझारू संघर्ष करने की प्रवृति को कुंद कर दिया गया एसा वेतन के जरिये सुविधाभोगी बनाकर किया गया । जनता के व्यापक हिस्से मजदूर मेहनतकश से इसके अलगाव को बेहद बढ़ा दिया गया । एक ओर मुट्ठी भर लोगों की तंख्वाह तुलनात्मक तौर पर काफी बढाई गई तो दूसरी तरफ व्यापक मज़दूर आबादी के जीवन को और मुश्किल हालातों में डाला गया । सरकारी विभागों में नई स्थायी भर्तियों को बंद करके काफी कम वेतन पर संविदाकर्मियों, ठेकाकर्मियों की या मानदेयकर्मियों की भर्ती व या आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया की ओर जोर - शोर से बढ़ा गया ।
            बीते वक्त की तरह ही सरकार आन्दोलन को तोड़ने के लिए हर तिकड़में कर रही हैं और अब आंदोलन के प्रति उदासीनता व उपेक्षा बरतकर आंदोलन को लंबा खिचने दे रही है ताकि आंदोलन ठंडा पड़ जाये , मेहनतकश जनता के अन्य हिस्से आवश्यक सेवाए ना मिल पाने की स्थिति में कर्मचारियों को ही दोषी माने व  इसका तिरस्कार करें  जबकि इन सभी स्थितियों के लिए सरकार दोषी है ।
      साथियो ,   इसलिए मौजूदा संघर्ष के फ़लक को बढ़ाने की व  इसे व्यापक लिए जाने की बेहद सख्त जरूरत है । हम सभी अच्छी तरह से जानते है कि देश में पूंजीवादी व्यवस्था है और यहाँ  पूंजीपतियों के हितों को ही देश या राष्ट्र हित के रूप में प्रचारित किया जाता है समग्र देश की आर्थिक राजनीतिक व सामरिक नीतियों का इसी के हितों व मुनाफे  के अनुरूप संचालन किया जाता है । 90 के दशक से पहले भी यही होता था और बाद में भी जब 90 के दशक में पूरे  देश को इनके द्वारा साम्प्रादायिक उन्माद की आग में  झोंका  गया तब नई आर्थिक नीतियों का नारा देते हुए `निजीकरण –उदारीकरण – वैश्वीकरण ` को लागू किया गया । यह सब भी देश की पूंजीपतिवर्ग के संकट को हल करने के किया गया था। तब से बीते दो दशक में सरकार  इन्हे लागू करने की दिशा में  काफी आगे बढ़ चुकी है । यू. पी. ए. 1st या 2nd  मैं शामिल पार्टियाँ हो या एन. डी.ए . में सभी पूँजीपतियों के हित में इन्हे लागू किए जाने की पक्षधर है । 
      अत: इन स्थितियों  में जरूरत है  नए आर्थिक सुधारों के नाम पर लागू किए जा रहे `निजीकरण उदारीकरण ` के विरोध में एक व्यापक जुझारू  संघर्ष  चलाये जाने की । साथ ही साथ भारत सरकार पर साम्राज्यवादी मुल्को से किए गए  समझौते रद्द करने के लिए दबाव बनाने की जरूरत है । अंतिम समाधान तभी संभव है जबकि क्रांतिकारी मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाया जाय ।आइये मांग करें :
            1:  राज्य कर्मचारियों की मागों पर सरकार तत्काल जी . ओ . जारी करे ।
            2:  विध्युत संविदाकर्मियों समेत सभी संविदाकर्मियों, मानदेयकर्मियों को नियमित करो ।
            3:  मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों का हनन बंद करो ।
            4:  नई आर्थिक नीति रद्द करो ।
            5: साम्राज्यवादी मुल्को से किए गए असम्मानजनक व गैरबराबरीपूर्ण समझौते रद्द करो । 
                                                                                     

                                     





         
  

          

Wednesday, 9 October 2013

semeenar on uttaraakhand disaster

कोटद्वार में उत्तराखंड आपदा पर सेमीनार का आयोजन 

क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन ,परिवर्तनकामी छात्र संगठन ,सुमंगला महासंघ व महिला समाख्या के द्वारा कोटद्वार में 8 अक्तूबर को उत्तराखंड आपदा पर एक सेमीनार का आयोजन किया गया। सेमीनार में शहर के अलग अलग संगठनो की भी भागेदारी रही। 
   पूर्व सैनिक संगठन से गोपाल कृष्ण बर्थवाल , भूत पूर्व डी आई जी बलराम सिंह, वरिष्ठ पत्रकार कमल जोशी,कोटद्वार कॉलेज से डॉ . जे एस नेगी , डॉ ऐ एन सिंह तथा नरेन्द्र सिंह ने किया। 
  महिला समाख्या की ओर से प्रीती थपलियाल ,गीता रावत, किरन रावत आदि ने उत्तराखंड आपदा के कारणों पर व उसके प्रभावों पर बातचीत रखी। 
    सुमंगला महासंघ से अध्यक्षा गंगा देवी ने अपनी बातचीत में राज्य सरकार द्वारा बरती गयी आपदा पर आक्रोश व्यक्त किया। 
  भूतपूर्व डी आई जी बलराम सिंह ने केदारनाथ व रामबाडा मै एक दिन हज़ारो लोगो के इकट्ठे होने को राज्य सरकार की अनियोजन व अनियंत्रित पर्यटन की नीति पर प्रश्न चिन्ह किया। 
  वरिष्ठ पत्रकार कमल जोशी ने कहा कि आपदा के बाद राज्य सरकार व इसके मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा द्वारा बरती गयी घोर संवेदनहीनता व लापरवाही को उजागर किया गया। 
  पूर्व सैनिक संगठन से गोपाल कृष्ण बर्थवाल ने कहा की सेना का इस्तेमाल जिसे कि आपदा से निपटने का प्रशिक्क्षण हासिल है यदि सही ढंग से होता तो लोगो को बचाया जा सकता था। 
  परिवर्तन कामी छात्र संगठन के प्रतिनिधि पंकज ने कहा कि आपदा को प्राकृतिक या दैवीय कहकर सरकार अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रही है।
कार्यक्रम में व्यवस्थापक क्रालोस से मुज़नबीन क़मर ने कहा कि अब सवाल आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोगो का सवाल है उनकी दुशवारियों को हल कैसे किया जाय इस पर सोचने की ज़रुरत है 
  इस बीच `केदार का शोक' जो की उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा निर्मित थी का प्रदर्शन भी किया गया। 
 अंत में क्रालोस के भूपाल ने सेमीनार का सम अप करते हुए कहा कि पूंजीवादी आर्थव्यवस्था अपने मुनाफे की हवस में में प्रकृति का विनाश है उत्तराखंड में भी जिस प्रकार  अनियंत्रित तरीके से अकूत मुनाफे की हवस में अनाप-शनाप तरीके से बांधो सड़कों आदि आदि का निर्माण किया जा रहा है वह इस आपदा का कारण रहा है इस आपदा के लिए पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारें जिम्मेदार है व इसके गुनाहगार हैं। इसलिए तात्कालिक संघर्ष के बतौर राज्य सरकार पर संघर्षों के जरिये दबाव बनाकर राहत व पुनर्वास के कामों में तेजी लानी  को मजबूर करना होगा वही दूसरी ओर समाजवाद व्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्ष में लोगो की भागेदारी बनानी होगी। 
    कार्यक्रम में गीत महिला समाख्या के साथियों द्वारा प्रस्तुत किये गए।कार्यक्रम का संचालन महिला समाख्या की गीता बगासी ने किया।  . सेमीनार कार्यक्रम में सुशीला देवी ,शंकुंतला देवी,  भागेश्वरी देवी, सिद्धी देवी , श्याम  सिंह रावत अनिल, नारायण , पारुल, रंजना, सुरेन्द्र  अनवर समेत कई लोगों ने शिरकत की।  

Seminar on uttarakhand disaster

       उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा सेमीनार का आयोजन सम्पन्न

     उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा 29 सितंबर 2013  को एक सेमीनार का आयोजन किया गया । इस मंच का गठन 16-17 जून की भीषण आपदा से राज्य के आपदा ग्रस्त पहाड़ी इलाकों में सरकार द्वारा बरती घोर संवेदनहीनता बरती गई गैर जवाबदेही व गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिचय दिया गया । इस समय जब आपदा ग्रस्त इलाकों को राहत सामाग्री व स्वास्थ्य सुविधाओ की सख्त जरूरत थी तब शासकों का यह रुख बहुत बेशर्मी भरा था ।
      मंच का गठन इसी दौर में किया गया मंच के नेतृत्व में केदारनाथ के उखीमठ , गुप्तकाशी व कालीमठ क्षेत्रों में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए ।उत्तरकाशी के भी कुछ इलाको में इस दौर में कुछ दिन तक चिकत्सीय सुविधाये आपदा प्रभावित लोगों को देने के प्रयास हुए । गुप्तकाशी व उखीमठ में गोष्ठी भी आयोजित की गई ।
    इसी कड़ी में मंच ने देहरादून में सेमीनार का आयोजन किया । सेमीनार का विषय था `उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान। सेमीनार में मंच के घटक संगठनो के कायकर्ता मौजूद थे। इसके अलावा महिला समाख्या कोटद्वार, अस्तित्व संस्था देहरादून,दिशा सामाजिक संगठन, महिला सुमंगला महासंघ कोटद्वार के प्रतिनिधि , जन कवि अतुल शर्मा, संवेदना से साहित्यकार जीतेन भारती व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी से युद्धवीर त्यागी,  शुक्रवार पत्रिका के दिल्ली से आए पत्रकार स्वतंत्र मिश्र केदारनाथ उखीमठ से संगीता नेगी, अखिलेश व पंकज जबकि रामनगर से गणेश ( ईको सेंसिटिव ज़ोन के मुद्दे पर काम कर रहे ) चेतना सामाजिक संगठन से तिरेपन सिंह चौहान व गोपाल कृष्णन, उत्तराखंड महिला मंच की अध्यक्षा कमला पंत व निर्मला बिष्ट शामिल थे ।
   16-17 जून की आपदा में मारे गए लोगो को श्रद्धाजंली अर्पित करने  के बाद कार्यक्रम की शुरुआत की गई। आपदा राहत मंच के गठन की पृष्ठभूमी पर बात चित करने के बाद उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए चले संघर्ष के गीत `लड़ना है भाई ये तो लंबी लड़ाई है ` गीत की प्रस्तुति की गई । क्रालोस के महासचिव भूपाल ने सेमीनार का संचालन किया ।
    परिवर्तन कामी छात्र संगठन के अध्यक्ष साथी नितिन ने मंच द्वारा प्रस्तुत सेमीनार को आधार बनाते हुए वक्तव्य दिया गया ।  वक्तव्य में चिन्हित किया गया कि राज्य में हुई आपदा की असल वजह अंधाधूध , अनियंत्रित व लागत कम करने के फेर में पिछड़ी तकनीक के प्रयोग से हो रहे बांधो सडको सुरंगो बांधों आदि का निर्माण है । राज्य सरकार की संवेदनहीनता व गैर जिम्मेदाराना रुख के चलते मृतको का आकडा कई गुना बढ़ गया। वक्तव्य में कहा गया कि पूंजीवाद एक ओर अकूत मुनाफे की आंधी हवस में प्रकृति को तबाह करता करता है तो दूसरी ओर `पर्यावरण संरक्षण `का राग आलापता है , यह प्रकृति की तबाही – बरबादी अपनी बारी में आम इंसान के लिए आपदा बन जाती है । इसलिए जरूरी है कि इसे संघर्ष में निशाना बनाया जाये । समाजवादी अर्थव्यवस्था चुकीं निजी मालिकाने व सामाजिक उत्पादन के अंतर्विरोध को खत्म करके सामाजिक  मालिकाने को स्थापित करती है अत: मुनाफे की अंधी हवस के लिए अराजक,अनियंत्रित, अनियोजित उत्पादन व प्रकृति का भयानक दोहन व विनाश की परिस्थितियाँ यहाँ खत्म हो जाती है इस प्रकार समाजवाद अपने नियोजित, नियंत्रित व संतुलित विकास के दम पर प्रकृति व मनुष्य के बीच समांजस्य स्थापित करती है ।
    उखीमठ से आए पंकज व संगीता नेगी ने भीषण आपदा व उसके बाद गाव की स्थिति व महिलाओ की स्थिति को बया किया।
   चेतना सामाजिक संगठन के साथी तिरेपन सिंह चौहान ने विस्तार से उत्तराखंड में प्रकृतिक संसाधनों की लूट जिस प्रकार से देशी- विदेशी पूंजी की गठजोड़ ने मचा रखी है उस पर प्रकाश डाला।
   रामनगर से पहुंचे साथी गणेश ने विधायकों व उच्च अधिकारियों की संवेदनहीनता को तथ्यों के जरिये उजागर किया और ईको सेंसिटिव ज़ोन के संदर्भ में उन्होने कहा कि यह इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए खतरनाक है ।
   मंच द्वारा एक डॉक्यूमेंटरी पिक्चर भी तैयार की गई थी जीसका शीर्षक था `केदार के शोक । इस पिक्चर का प्रदर्शन लांच के बाद किया गया। डॉक्यूमेंटरी के माध्यम से दिखाया गया कि किस प्रकार सोनप्रयाग से ऊपर बने बांध के निर्माण के लिए कंपनी ने भयानक अनियमितताएँ बरते है वैज्ञानिक मानदंडो व तकनीकी के इस्तेमाल का अनदेखा किया है जो सोनप्रयाग की तबाही का बढ़ा कारण बना । सारकारों के दावो की पोल खोलती स्थिति व 16-17 की आपदा से अपनी जान बचाने के लिए ऊपर पहाड़ों की भाग रहे लोग भूख व लगातार हो रही बारिश में ठंड, व ऑक्सीज़न की कमी के कारण मारे गए ये वह लोग थे जिन्हे यदि उचित समय पर राहत मिल जाती तो बचाया जा सकता था इधर – उधर पड़ी मौत से जद्दोजहद करती अंत में मौत से हारती लाशें शासको की भयानक संवेदनहीनता को दिखा रही थी । साथ ही जिन्हे आर्मी द्वारा बचा लिया गया था वो लोग अब तक अपने परिजनो के पास नही पहुंचे थे डॉक्यूमेंटरी में सरकार के दावों पर प्रश्न चिह्न लगाए गए थे । गाव गाव में मेडिकल कैप के आयोजन के दौरान गाव की स्थितियों को  दिखाय गया व इसके माध्यम से भी सरकारी दावों की पोल खोली गई ।
   इस पिक्चर के बाद फिर नागरिक अखबार के संपादक मुनीष कुमार ने अपने वक्तव्य में पहाड़ो की जटिल व भयावह हो गई  स्थितियो का  जिक्र किया गया।
   शुक्रवार पत्रिका के दिल्ली से आये पत्रकार साथी स्वतंत्र मिश्र ने पूरे देश के स्तर पर चल रहे प्राकृतिक संसाधनो की लूट व इसमे पर्यावरण के विनाश व भोपाल गैस कांड का हवाला देकर बताया कि पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे की अंधी हवस में पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है।
     सेमीनार में जन कवि अतुल शर्मा द्वारा कविता पढ़ी गई जिसके बोल थे ` सहमी सी गंगा की धार ,कापे है बद्रि केदार ..... `। इस कविता के जरिये आपदा के बाद की पहाड़ के लोगो की मन:स्थिति को व्यक्त किया गया । साथ ही राहत के नाम पर हो रहे दावों की भी धज्जिया उड़ाई गई।
   इंकलाबी मजदूर केंद्र के महासचिव अमित ने उत्तराखंड के मैदानी इलाको विशेषकर लक्सर हरिद्वार में इस दौरान हुई बरबादी व यहा हो रहे सरकारी दावों की कलई खोली ।
   अगले वक्ता के रूप में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के अध्यक्ष प्रेम प्रसाद आर्या ने कहा कि इंसानियत को प्यार करने वालो के लिए जरूरी है कि वे वक्त को सुनें अब वक्त उनके जीतने का है।
  सेमीनार में दिशा सामाजिक संस्था की जाह्नवी , महिला समाख्या कोटद्वार की दीपा ,अस्तित्व संस्था से दीपा व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के युद्धवीर त्यागी ने भी सेमीनार में अपने विचार रखे सभी ने उत्तराखंड में हो रहे भयानक लूट व दोहन पर चिंता व्यक्त की।  
           


Thursday, 26 September 2013

            आइये! उत्तराखंड आपदा प्रभावित क्षेत्रो में तबाही झेल रहे लोगों के हक में आवाज उठायें !
साथियो ,
          उत्तराखंड में आई आपदा को लगभग 3 माह गुजर चुके हैं। इन बीते तीन माह ने आम ग्रामीण गरीब नागरिकों के प्रति हमारे शासकों की घोर उपेक्षा, संवेदनहीनता व लापरवाही तथा कुप्रबंधन को खूब उजागर किया है ना केवल राज्य सरकार बल्कि संसाधनों से सम्पन्न केंद्र सरकार व उसके समूचे शासन प्रशासन को भी इस आपदा ने आम जनता के सामने नग्न कर दिया।                      
16-17 जून को रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी समेत पिथौरागढ़ व अन्य इलाकों में आई आपदा से भयानक तबाही- बर्बादी होती है। पर्यटकों व स्थानीय लोगों समेत हजारों  लोग मारे जाते हैं। तब सबसे ज्यादा जरूरत थी तत्काल वहाँ फंसे लोगो को बाहर निकालने की, लोगों तक भोजन –पानी -दवा आदि पहुंचाने की आदि। लेकिन हम सबने देखा कि राज्य का मुखिया आपदा से निपटने में नेतृत्व देने ,आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय दिल्ली पहुंच जाता है। मीडिया में व चौतरफा थू –थू होने पर, व आपदा में हाई प्रोफ़ाइल पर्यटकों के भी फंसे होने के चलते फिर पर्यटकों को बाहर निकालने के प्रबंध केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए गए। जबकि इस वक्त इससे निपटने का काम केवल हर जरूरी संसाधनों से सम्पन्न व प्रशासनिक ताने-बाने वाली ताकत (सरकार) ही कर सकती थी |         
लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हजारों की तादाद में जिन गरीब ग्रामीणों के मकान ,खेत व जानवर खत्म हो जाते हैं तथा  सैकड़ों की संख्या में वे परिवार जिनके घर के पुरुष सदस्य आपदा में मारे जाते हैं उनके लिए सरकारों ने घोषणा बाजी के अलावा क्या किया?  इन लोगो को मेडिकल सुविधाओं व राशन आदि की सख्त जरूरत थी लेकिन सरकारों ने जो दावा करती हैं कि वह जनता के लिए है उन्होंने क्या किया ? कुछ भी नहीं सिवाय कुछ औपचारिकताओं के ,नाम का राहत। और हकीकत यही है कि हालात आज भी बेहद खराब हैं। आखिर सरकारों व उसके प्रशासन की जवाबदेही व ज़िम्मेदारी किसके प्रति है,यह किन लोगों के लिए काम करता  हैं व चिंतित रहता है ?  क्या जनता के लिए ? नहीं; बांधों-टनलों, होटल रिज़ॉर्ट,खनन आदि-आदि के कारोबार में लगे पूंजीपतियों के लिए। और इन्होंने खूब मुनाफा बटोर सकें इसलिए यहां की भौगोलिक बनावट को ध्यान दिये बिना अनियंत्रित व अवैज्ञानिक तरीके से पिछड़ी तकनीक का इस्तेमाल करके अंधाधुध ढंग से भारी तादाद में बांधों -सुरंगो, सड़कों आदि आदि का निर्माण किया।  दूसरी ओर अनियंत्रित पर्यटन बेरोक टोक जारी था।  अत: देर सबेर इस अंधाधुध लूट का 16-17 जून जैसी आपदा के रूप में बिस्फोट होना ही था।  यही स्थिति व सच पूरे देश के संबंध में भी है।  टाटा –बिडला-मित्तल-अंबानी आदि द्वारा देश की संपत्ति संसाधनों की लूट अब किसी से छुपी नही है, हमारे जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग जो कि संसद या विधान सभाओं में बैठते है तथा पूरा शासन व प्रशासनिक महकमा इन टाटा –अंबानी जैसे  देशी विदेशी पूंजी की सेवा में मुस्तैद रहता है।
  और इसलिए सरकारें, उसके विकास का यह पूंजीवादी माडल और ये पूंजीपति अंतत: यह पूंजीवादी व्यवस्था ही इस आपदा की असल वजह हैं इसके लिए जिम्मेदार हैं जो कि इसे प्राकृतिक या दैवीय आपदा कहकर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।  इसीलिए यह सब भी हुआ व होता है कि आम गरीब जनता के प्रति बेहद लापरवाह, संवेदनहीन व संकल्पहीन दिखने व रहने वाले ये पूंजीवादी शासक केदारनाथ धाम को 11 सितंबर से खोल देने के मामले में पूरे प्रशासनिक अमले के साथ संकल्पबद्ध होकर जुट जाते हैं ऐसा क्यो ?  इसे समझना कठिन नहीं है। जैसे ही इस दौरान केदारनाथ के आस-पास जंगलो में सैकड़ों लाशें मिली जिसकी संख्या और बढ़ती लेकिन इसे रोक दिया गया और इस इलाके में जाने पर रोक लगा दी गई।
   इन स्थितियों में तब यह सवाल पैदा होना लाजिमी है कि तब क्या किया जाय, समस्याओं को हल करने के संबंध में किस रास्ते की ओर बढ़ा जाय।निश्चित तौर पर जो रास्ता है वह एकजुट होकर संघर्ष करने का ही है इसी माह शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है जिनका क्रांतिकारी संघर्ष ना केवल विदेशी लुटेरे (अंग्रेज़ो) के खिलाफ था बल्कि देशी पूंजीपतियों व जमीदारों के खिलाफ भी था और इस संघर्ष के जरिये वह देश में समाजवाद ( मजदूर-मेहनतकश जनता का राज) लाना चाहते थे। तब से आज हालात बहुत बदले हैं आज भगत सिंह की विचारधारा व समाजवाद का उनका लक्ष्य आज बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो चुका है इसलिए जरूरत है इस विचारधारा को समझने की व समाजवाद की दिशा में संघर्ष करने की। 
  इसीलिए आपदा में राहत काम व आपदा के असली कारणों को आम जनता तक पहुचाने व अपने हक के लिए आवाज उठाने-संगठित होने के मकसद से ही “उत्तराखंड आपदा राहत मंचका गठन विभिन्न संगठनों व नागरिक अखबार द्वारा किया गया।  मंच के नेतृत्व में उत्तरकाशी में कुछ दिन तो रुद्रप्रयाग के गुप्तकाशी, कालीमठ व ऊखीमठ वाले क्षेत्र में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए।  और अब इसी की अगली कड़ी में मंच द्वारा एक सेमीनार का आयोजन देहरादून में किया जा रहा है।  उम्मीद है आप इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे।    
                         
              कार्यक्रम : :                                                         द्वारा
विषय :--  ‘‘उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान’’        उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच
दिनांक :-  29 सितम्बर (रविवार) 2013,       
समय :-   10:00 प्रातः से  शाम 5 बजे तक।      
स्थान :कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़,  प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।                              
संपर्क न .     8126975771 , 9837205978                        

घटक संगठन :- परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम,नागरिक (पाक्षिक अखबार), इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन,                                                                         
      

Friday, 20 September 2013

                                        कार्यक्रम : सेमीनार
        साथियो ,                     
        आगामी  29 सितम्बर (रविवार) 2013 को उत्तराखण्ड आपदा राहत मंचके द्वारा एक सेमीनार का आयोजन किया जा रहा है। जैसा कि सभी जानते हैं कि 16-17 जून को उत्तराखण्ड भीषण आपदा से गुजरा। इस आपदा में हजारों पर्यटक व स्थानीय लोग मारे गए । मंच द्वारा रूद्रप्रयाग के प्रभावित क्षेत्रों में कई दिनों तक व उत्तरकाशी के  प्रभावित क्षेत्रों में मेडिकल कैम्प लगाए गए । इस दौरान आपदा से हुई तबाही, सरकार की घोर असंवेदनशीलता-लापरवाही तथा सरकार के प्रति आम ग्रामीण गरीबों के आक्रोश से भी मंच रूबरू  हुआ। इस आपदा व इससे हुई तबाही तथा इससे निपटने के मामले में सरकार के रुख ने  हमारे समक्ष कई सवाल खडे़ किए हैं मसलन... 
1 .  उत्तराखण्ड में विकास के नाम पर जिस प्रकार से अंधाधुंध ढंग से व अवैज्ञानिक तरीके से बांधों, सड़कों, सुरंगों व होटल, रिजोर्ट आदि का निर्माण हो रहा है, क्या वह इस आपदा के लिए जिम्मेदार नहीं है ? और विकास का इस माडल से दरअसल किन लोगों का हित साधा जा रहा है ? और जो स्पष्ट तौर पर केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के द्वारा बनाई गई नीतियों के तहत अंजाम दिया जा रहा है। क्या यह सरकारें इस आपदा को पैदा करने के दोषी  नहीं है ?
2 .  आपदा के तत्काल बाद आपदा से निपटने के लिए सरकारों द्वारा जिस घोर लापरवाही और हद दर्जे की असंवेदनशीलता का प्रदर्शन  किया गया, उससे आम जनता के लिए क्या सबक हैं ? तथा इसके बाद तब से अब तक जो राहत सामाग्री व चिकित्सकीय सुविधाएं ग्रामीणों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी व जवाबदेही सरकार की बनती थी उस मामले में भी यदि भयानक लापरवाही व असंवेदनशीलता बरती गई है तो क्यों? जबकि संसाधन सम्पन्न लोगों के प्रति सरकार बेहद चिंतित है। ऐसा क्यों ?
उपरोक्त व अन्य सवालों के संदर्भ में एक स्पष्ट  समझ बनाने और समाधान का रास्ता तलाशने हेतु इस सेमीनार का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें आपकी भागेदारी अपेक्षित है।
                         कार्यक्रम : :                                                  द्वारा
विषय:- उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान    उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच
दिनांक :-  29 सितम्बर (रविवार) 2013,                          समय :-   10:00 प्रातः से  शाम 5 बजे तक।
स्थान :-  कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़,  प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।                           
संपर्क न .     8126975771 , 9837205978

                                       



Tuesday, 10 September 2013

mujaffarnagar communal riots

                                                मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगा
               
               
                जैसा कि  तय था 2014 के लोक सभा के चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी पूंजीवादी राजनीतिक पार्टिया केंद्र की सत्ता अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की जी तोड़ कवायद  में  पिछले समय की ही तरह हर घृणित हथकंडे अजमाएँगी । इस जी तोड़ कवायद में समाज में हिन्दू- मुस्लिम वोटो को ध्यान में रखते हुए सांप्रदायिक ध्रूविकरण एक हथियार है जिसे आर . एस. एस. के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सबसे आगे है।90 के दशक में राम मंदिर निर्माण के नाम पर पूरे ही देश को दंगो की आग मे झोंक देने वाली भा ज पा,  राष्ट्रीय सेवक संघ  व इसके अन्य आनुषंगिक संगठनो  ने इस सांप्रदायिक ध्रूविकरण को एक मुकाम तक पहुचाया। लेकिन इसके बाद भी केंद्र में  केवल अपने दम पर सरकार बनाने का ख्वाब अधूरा रहा । इसके बाद फिर नई रणनीति के तहत संघ ने सांप्रदायिक ध्रूविकरण को स्थानीय व क्षेत्रीय मुद्दे के तहत दलितो व आदिवासियों में भी घुसपैठ की गई ‘’ धर्मांतरण ‘’ लव  जेहाद ‘’ आदि आदि  जैसे फर्जी मामले खड़े किए गए  चैरिटी काम करके भी इस मकसद को साधा गया सांप्रदायिककरण किया गया ।और फिर  गुजरात के स्तर पर 2002 का फासीज़्म का प्रयोग भी सफल रहा ।
                इसलिए ऐसा यूं ही नही हुआ कि अलग –अलग शहरो के स्तर या कस्बों के स्तर पर दंगो की तादाद बढ़ गई उत्तर प्रदेश में ही इससे पहले लगभग 17 महीने में ही सांप्रदायिक हिंसा व तनाव की 100 से अधिक घटनाएँ हो चुकी हैं । और अब संघ खुलकर सामने आ गया  है फासिस्ट नरेन्द्रमोदी की केंद्र के लिए   ताजपोशी  , 84 कोसी यात्रा और फिर राम मंदिर की बातें आदि  इसके कारनामों से पैदा होने वाले  सांप्रदायिक  उन्माद की ओर साफ साफ इशारा कर रही हैं।
                किश्तवाड़ की आग अभी बुझी भी नही थी कि  अब मुजफ्फरनगर में दंगे हो गए ।और यहा अब तक सरकारी आकड़ों के मुताबिक ही  तीन दर्जन से  लोग मारे गए है कई गायब है व घायल हैं। हकीकत हमेशा की ही तरह इससे कई गुनी ज्यादा हो सकती है ।यहाँ अगस्त के तीसरे हफ्ते में एक लड़की से हुई छेड़छाड़ अगर इतना बड़ा रूप धारण कर लेती है , महापंचायतें होती है जाट समुदाय के लोगो द्वारा जिसमे लोग हथियारो के साथ पहुचते हैऔर यह सब सपा सरकार व उसके शासन प्रशासन के आखो के सामने घटित होता है। इन महापंचायतों में भाजपा के तीन चार नेता पहुचते है भारतीय किसान यूनियन के नेता  व कांग्रेस के पूर्व संसद हरेन्द्र मालिक भी पहुचते हैं।इनके खिलाफ एफ आई आर के बावजूद कोई कार्यवाही नही की जाती। सपा सरकार इसे हो जाने देती है।तो यह सब ऐसे ही नही हो जाता है।  और फिर मामला हाथ से निकलता दिखाकर भारी तादाद में अर्ध सैनिक बल बुला ली जाती है। कर्फ़्यू लगाया जाता है  केंद्र की कांग्रेस सरकार व उसका गृह मंत्रालय  भी अपने को बेहद चिंतित दिखाकर तुरंत ही सक्रिय हो जाता है।अल्पसंख्यको को भयाक्रांत कर फिर उनके रक्षक बन एक ओर कांग्रेस व सपा उनके वोटो को हासिल करने का समीकरण बना रही है तो दूसरी ओर इन प्रतिक्रियावादी व सांप्रदायिक महापंचायतों को हो जाने का अवसर दे कर नरम हिन्दुत्व का परिचय देकर यहा से भी वोट हासिल करने की जुगत में है। भाजपा तो घोषित तौर पर ही सांप्रदायिक पार्टी है।लेकिन यह पार्टिया भी कम नहीं है । कांग्रेस द्वारा 1984 में सीक्खो का कत्लेआम किया गया था। राजीव गांधी का यह  कुख्यात बयान कि जब पेड़ गिरता है तो धरती कापती है आज भी शायद ही कोई भूला होगा । बस फर्क इतना ही है कि धर्मनिरपेक्ष या सेक्युलर शब्द की लफ्फाजी करते हुए ये यह सब करती हैं  और संघ की तरह इनका ताना बाना नही है ।  
                हकीकत यही है कि भारतीय शासक वर्ग सांप्रदायिक व कट्टरपंथी ताकतों को शुरू से प्रश्रय देते रही हैं। और भारतीय राज्य सवर्ण हिन्दु मानसिकता से ग्रसित है। इसी का परिणाम यह है की एक ओर यह अपनी जहनीयत में महिला विरोधी , दलित विरोधी तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक विरोधी है विशेष तौर पर सारे ही मामलो  में मजदूर- मेहनतकश अवाम के लोग। भारतीय शासक फिर इसे वक्त बेवक्त अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते रहते हैं । इसीलिए यह अनायास नहीं है कि कि टाटा ,अंबानी आदि आदि जैसे पूंजीपति फासिस्ट मोदी की तारीफ में कसीदे गड़ते हैं ।
                इस प्रकार सांप्रदायिक उन्माद  दंगा पैदा करके शासको द्वारा ना केवल सामुदायिक सौहार्द को खत्म कर दिया जाता है व  सत्ता पर पैठ बनाई जाती है बल्कि मजदूर मेहनतकश आवाम की एकता को खंडित कर दिया जाता है व उनके वर्तमान व भावी संघर्षो को कमजोर करने की दिशा में कदम भी बढ़ाया जाता है ।
और यह मजदूर मेहनतकश अवाम ही  है जो कि सांप्रदायिक दंगो के शिकार होते है व इसमें तबाह -बर्बाद होते हैं ।
                क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे में मारे गए लोगो के प्रति अपनी संवेदना व शोक व्यक्त करता है। इस घटना में शामिल लोग जिनके खिलाफ एफ आई आर  दर्ज है उन्हे तत्काल  गिरफ्तार करने की मांग करता है । सांप्रदायिक व कट्टरपंथी संगठनो पर प्रतिबंध लगाने की माँग करता है।  
समस्त मजदूर मेहनतकश अवाम से अपील करता है कि आइये!  इन सभी सांप्रदायिक व कट्टरपंथी  ताकतों व इन्हे प्रश्रय देने वाली  ताकत के विरोध में संघर्ष  एकजुट हो संघर्ष करें  ।                                                                                                
                                                                                                                क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन
               
               
               

                

position over national and international issue

         सीरिया पर अमेरिकी साम्राज्यवादी के संभावित हमले का विरोध करो !
       
         सीरिया में हर प्रकार की साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करो !!  
                               
               
                ``जनतंत्र’’ की स्थापना के नाम पर अमेरीकी साम्राज्यवादियों  द्वारा अन्य पूंजीवादी मुल्को की संप्रभुता पर हमले की दास्ता काफी लंबी है । अपने हितो के प्रतिकूल पड़ती सरकारो के तख्तापलट की इनकी काली करतूते लातिनी अमेरिकी मुल्कों से समझी जा सकती है । रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल व जनवाद की स्थापना के नाम अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा इराक पर हमला बोल दिया गया और उससे पहले आतंकवादके खातमे के नाम पर अफगानिस्तान पर  हमला बोल दिया गया था। इराक पर हुआ हमला खुद साम्राज्यवादी मुल्कों  द्वारा खड़ी की गई संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ को अमेरिकी शासको द्वारा ठेंगे पर रखते हुए किया गया था बाकी साम्राज्यवादी मुल्क कैसे इस लूट मे अपने हिस्सेदारी हो इसकी रणनीति बना रहे थे   इराक मे हुए हमले के बाद से अब तक इराक मे अब तक कई लाख इराक़ी मेहनतकश नागरिक जिसमे मासूम बच्चे भी शामिल हैं  मारे गए है । दुनिया के सामने यह तभी स्पष्ट था कि दरअसल अमेरिकी (साम्राज्यवादी) पूंजीपति वर्ग अपने अर्थव्यवस्था के बढ़ते संकट को हल करने के लिए व  क्रूड ऑइल ( कच्चे तेल ) को नियंत्रित करने के लिए यह सब ताना बाना रच रहा है । जबकि अफगानिस्तान पर अमेरिकी शासको की दीर्घकालिक रणनीति ( सामरिक महत्व ) के तहत  था । और यह भी तभी स्पष्ट हो गया था कि आने वाले वक्त मे सीरिया, ईरान , लीबिया व  उत्तरी कोरिया अमेरिकी साम्राज्यवादियों की निगाह में है।
                टूनीशिया से बगावत के जो लहर शुरू हुई थी वह मिश्र आदि आदि मुल्क होते हुए सीरिया भी जा पहुची थी । मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश आवाम बढ़ती बेरोजगारी , महंगाई से त्रस्त हो आक्रोशित  व आंदोलित होकर अपनी तानाशाही हुकूमतों से टकरायी । इन जनसंघर्षों को साम्राज्यवादी मुल्को विशेषकर अमेरिकी साम्रज्यवादियों ने अपने हितो के अनुरूप नियंत्रित करने को पूरा व्यूह रचा । मध्य पूर्व के इन पूंजीवादी मुल्को के ही पूंजीपतिवर्ग के दूसरे धडों  ने इन जनसंघर्षों  पर  अपना नेतृत्व बनाया अमेरिकी साम्राज्यवादियों का उन्हे पूरा सहयोग मिला । मिश्र के मामले मे इसे साफ साफ देखा जा सकता है ।
                सीरिया जैसे पूंजीवादी मुल्क में बसर  अल असद की सरकार के खिलाफ जो आक्रोश मेहनत कश जनसमुदाय में पैदा हुआ उसे भी धुर्त्त अमेरिकी शासको ने अपने नियंत्रण में करने का भरपूर अवसर के रूप में बदलने की कोशिश की । यहा भी  सीरियाई शासकों का  दूसरा धड़ा जो कि पिछले कई दशकों से सत्ता में बैठने को लालायित था उसने ही मेहनतकश आवाम के संघर्षो के नेतृत्व को हथिया लिया और दूसरी ओर इन्हे अमेरिकी शासकों ने हथियार से लेकर हर तरह से बसर अल असद की सत्ता को उलट देने में इनकी भरपूर मदद की । सीरिया के मामले मे विशेष स्थिति यह बनती थी कि अमेरिकी साम्रज्यावादियों से इसके संबंध पहले से ही खटास भरे रहे हैं यहा रूसी साम्राज्यवादियों का प्रभाव है उसका नौसैनिक अड्डा भी यहाँ है ।यह एक ओर  अमेरिका – इजरायल गठजोड़ का विरोध करता रहा है  तो दूसरी ओर फिलीस्तीन का समर्थन करता रहा है ।  इसीलिए अमेरिकी साम्राज्यवादी इस अपने द्वारा समर्थित विद्रोहको अवसर के रूप मे देख रहे थे  ताकि वहाँ अपना प्रभाव कायम कर सके व अपने संकट का बोझ दूसरे मुल्को  पर डाल सके तेल गैस व पेट्रो डालर पर नियंत्रण ही असल मकसद था  , हालांकि  यहाँ हमला  करना इनके लिए  इतना आसान भी नही है । अन्य साम्राज्यवादी मुल्क भी लूट मे हिस्सदारी के हिसाब से अपनी अपनी  रणनीति बना रहे हैं । भारतीय पूंजीवादी शासको की अवस्थिति की बात की जाय तो यह भी अपने हितो को साधने के लिए घृणित हथकंडे अपना रहा है । इस मुद्दे पर फिलहाल रूसी साम्राज्यवादियों के साथ खड़ा है ।
                अमेरिकी शासक जब इस  समर्थित विद्रोह से वहा हस्तक्षेप कर उसे अपने प्रभाव में लेने में सफल नही हो पाये तो अब वह इस मकसद के लिए  इस तथाकथित रासायनिक हमले द्वारा जनसहार के नाम पर सीरिया की संप्रभुता को रौदने की दिशा मे बढ़ रहा है।जिसका विरोध न केवल दुनिया की अमनपसंद व जनवादपसंद मेहनतकश जनता कर रही है बल्कि खुद साम्राज्यवादी मुल्क अमेरिका की  मेहनतकश अवाम भी इस हमले का विरोध कर रही है।
                सीरिया जैसे पूंजीवादी मुल्क में बसर अल असद के नेतृत्व मे सीरियाई पूंजीपति वर्ग की नग्न तानाशाही शासन मेहनतकश जनता के ऊपर कायम है पूंजीवादी जनवाद में जो सीमित अधिकार मेहनतकश को हासिल होते हैं वह यहा की अवाम को हासिल नही हैं। इसलिए भयावह बेरोजगारी व महंगाई को लेकर यहाँ मेहनतकश अवाम ने आक्रोशित हो जो संघर्ष शुरू किया था और बसर अल असद सरकार साम्राज्यवाद समर्थित विद्रोहियो से निपटने के नाम पर आम जनता का जो दमन कर रही है उससे निपटने के लिए जरूरी है की  उस संघर्ष पर अपना नेतृत्व कायम  किया जाय ।साथ ही  साम्राज्यवादी मुल्को की मुल्क के भीतर  हर दखलंदाज़ी का विरोध करने की जरूरत है अपने जनवादी अधिकारो को हासिल करने की दिशा में संघर्ष करने की सख्त जरूरत है और अंतत:  इस संघर्ष को नई ऊचाइयों तक पहुचाते हुए मजदूर वर्ग के नेतृत्व में सामाजवाद का निर्माण करने की जरूरत है। जबकि दूसरी ओर दुनिया की जनवादपसंद अवाम को सीरियाई मेहनतकश अवाम के साथ एकजुटता कायम करते हुए अमेरिकी साम्राज्यवादी मुल्क द्वारा होने वाले हमले का पुरजोर विरोध करने के साथ साथ यहा हो रहे  हर साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करने की जरूरत है।           
               




चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)

      चुनाव की आड़ में बिहार में नागरिकता परीक्षण (एन आर सी)       बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे...