उत्तर प्रदेश पंचायती चुनाव
उत्तर प्रदेश पंचायती चुनाव में क्रालोस द्वारा पर्चा जारी करके मऊ बलिया देवरिया में अभियान लिया गया
इंकलाब जिंदाबाद ! पूंजीवाद मुर्दाबाद !! समाजवाद जिंदाबाद !!!
पंचायती चुनाव से क्या कुछ हासिल होगा
दोस्तों एक बार फिर से पंचायती चुनाव आ गए हैं तमाम प्रत्याशी फ्री रंग बिरंगे दावों वादों के साथ हमारे बीच हैं । एक बार फिर वोटों को हासिल करने के घृणित हथकंडे हो रहे हैं । शराब, पैसा, ताकत, जाति-धर्म, भाई भतीजावाद इसी का बोलबाला है ।
बेरोजगारी, महंगाई अधिकार व गरीबों के मुद्दे इस चुनाव में भी गायब हैं । प्रत्याशी हमारे बीच आता है वोटो की भीख मांगकर अपने मालामाल होने के रास्ते बनाता है । बेरोजगारी महंगाई आदि जनमुद्दों के लिए जनता को एकजुट करना व सक्रिय करने से इनका कोई मतलब नहीं होता । पंचायती निकाय की सीमाओं व अधिकार से भी इनका कोई मतलब नहीं । चुनाव जीतकर अपने लिए अधिकार हासिल करके वह पाँच साल तक जनता के अधिकारों की बात तक नहीं करता ।
पंचायतें व पंचायत प्रतिनिधि जनता के लिए क्या कुछ कर सकते हैं ---- हमारी नज़र में ईमानदार से ईमानदार प्रत्याशी भी जनता के जीवन के दुख दर्द कम नहीं कर सकता खत्म नहीं कर सकता ।
दरअसल पंचायती निकायों की हैसियत कुछ भी नहीं है । क्या देश के 3-4 लाख किसानों की आत्महत्याओं व भूमि अधिग्रहण के मसले पर , क्या बेरोजगारी महंगाई के मसले पर या फिर शिक्षा व्यवस्था के मसले पर पंचायतों के पास अधिकार है ? क्या पंचायतों के पास अपने क्षेत्र के मसले पर सरकार को प्रस्ताव भेजने व इसे लागू करवाने का अधिकार है ।......... नहीं ।
पंचायतें हर तरह से अधिकारविहीन संस्थाएं हैं । ये सरकार की योजनाओं को मात्र ‘लागू’ करने वाली संस्थाएं हैं । इन्हें आर्थिक मदद के लिए सरकार का मुंह ताकते रहना पड़ता है ।
स्थानीय स्तर पर कुछ सुविधाओं हेतु जो कुछ रकम सरकार इन्हें देती है इसे ही हड़पने की होड में प्रत्याशियों द्वारा हर हथकंडे अपनाए जाते हैं । यह सीख भी इन्हें अपने बड़े पूंजीवादी नेताओं से ही मिलती है । चंद दुर्लभ ईमानदार प्रत्याशी ही इसे देख निराश हताश होते हैं ।
आइये बेहतर भविष्य के लिए संघर्ष करें ------ दोस्तों हमारी जिंदगी के कष्टों परेशानियों को कम करने मैं पंचायतें कुछ भी नहीं कर सकती । हमारे देश के पूंजीवादी शासक पंचायत निकायों के जरिये अपनी शासन सत्ता को मज़बूत करते हैं। शोषण उत्पीड़न के तंत्र को गाँव गाँव फैलाते हैं ।
इसके जरिये ये भ्रम फैलाते हैं कि ये निकाय जनता का भविष्य बदल सकते हैं । जो कि बहुत गलत है । यदि कुछ अधिकार इन्हें मिल भी जाय तो भी क्या होगा ? ये सब जनता पर सवारी गाँठने का ही काम करेंगी ।
देश के भीतर सारे ही फैसले लेने व नीतिया बनाने का अधिकार संसद के पास है । भ ज पा , स पा , ब स पा कांग्रेस समेत सभी पूंजीवादी पार्टिया चुनाव के समय जनता के बीच वोट मांगते हैं । इसके बदले अच्छे दिन लाने का वादा करते हैं । लेकिन हर चुनाव के बाद ‘अच्छे दिन ‘ बुरे दिन में बदल जाते हैं । 68 सालों से यही होता रहा है ।
दरअसल सभी पूंजीवादी पार्टिया पूंजीवादी व्यवस्था को चलाने का काम करती हैं जो कि मजदूर मेहनतकश जनता की मेहनत को हड़पने का तंत्र है तथा पूँजीपतियों को मालामाल बनाने का । तथा खुद भी मालामाल बनने का तंत्र है । संसद में ये पार्टिया इनही के लिए नीतिया बनाती हैं व फैसले लेती हैं
ये जनता की सामूहिक ताकत को नकारते हैं ठेंगा ढिखाते हैं । इसके बदले एक व्यक्ति को स्थापित करते हैं कि वही अकेले अकेले सब कुछ कर देगा ।
इसलिए आज असल सवाल सामूहिक तौर पर संघर्ष करने का है । अपने अधिकारों के संघर्ष करने का है ।
ये चुनाव मालिक मजदूर के संबंध नहीं बदल सकते । ये चुनाव अमीरी गरीबी को बढ़ाते हैं । हमें कदम कदम पर एकजुट होकर संघर्ष करके इन प्रत्याशियों पर दबाव बनाने की जरूरत है कि हमारे पक्ष में नीतिया बनायें । हमारे अधिकारों को केवल वोट तक सीमित ना हो बल्कि देश के स्तर पर सभी महत्वपूर्ण फैसले व नीतिया बनाने का अधिकार भी हमें मिले । बड़े महत्वपूर्ण फैसलोन पर जनमत संग्रह करवायें जायें । तथा प्रतिनिधियों का वापस बुलाने का अधिकार भी हमें मिले ।
अंतत: यह सब हासिल हो जाने के बाद भी लूट शोषण उत्पीड़न वाली पूंजीवादी व्यवस्था चलती रहेगी । इसलिए समाजवादी व्यवस्था के लिए भी संघर्ष करने की जरूरत हैं । यही वह व्यवस्था है सारे ही अधिकार मजदूर मेहनतकश आवाम को होंगे । लूट शोषण पर पाबंदी होगी । रोजगार की गारंटी होगी । नि:शुल्क शिक्षा , चिकित्सा व परिवहन के अधिकार होंगे ।
क्रांतिकारी लोक अधिका संगठन
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