असहिषुणता के विरोध में संयुक्त कार्यक्रम
काकोरी के शहीदों को याद करते हुए 20 दिसम्बर को दिल्ली उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में गोष्ठियों का आयोजन किया गया। संयुकत रूप जारी पर्चे का वितरण किया गया। क्रालोस द्वारा एक पर्चा इसी मुद्दे पर पहली जारी किया गया था। क्रालोस , पछास, इमके व प्र म ए के चार संगठनों ने संयुक्त तौर पर कार्यक्रम का आयोजन किया।
पूंजीवाद मुर्दाबाद ! समाजवाद जिंदाबाद !
बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में साहित्यकारों व कलाकारों द्वारा पुरस्कार वापसी के समर्थन में
बढ़ते सांप्रदायिक उन्माद तथा असहमति की आवाज को खत्म करने की साजिश के खिलाफ एकजुट होओ !
साथियो ,
केंद्र की सत्ता पर मोदी सरकार को काबिज हुए 18 माह से ज्यादा का समय हो चुका है । इस दौरान सांप्रदायिक व कट्टरपंथी संगठन खुलकर आगे बढ़े हैं । गौमांस , लव जिहाद जैसे मुद्दे खूब उछाले गए हैं ।महंगाई बेरोजगारी आम नागरिकों के अधिकारों के मुद्दे नदारद हैं । श्रम क़ानूनों ,ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमला बोला गया है । इस दौरान मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ खड़े लोगों को कांग्रेसी या देश द्रोही साबित करने की कोशिशें हुई है । इस दौरान सांप्रदायिक दंगे काफी बढ़े हैं यह गृह मंत्रालय की रिपोर्ट भी कहती है ।
इस समय ही कट्टरपंथी ताकतों ने कन्नड विद्वान कलबुर्गी की हत्या की । उसके बाद दादरी में बछड़े के मांस का अफवाह फैलाकर प्रायोजित तरीके से अखलाक की हत्या कर दी गई ।लेकिन देश के मुखिया ने इस जरूरी समय पर चुप्पी साध ली । असहमति की आवाज को कुचलने की कोशिश लगातार हुई हैं सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की घटनाएं होते रही हैं । घटनाए इसके पहले व बाद में भी होते रही हैं । ये हत्याएं साम्प्रादायिक व कट्टरपंथी संगठनों के खुलकर खेलने देने का ही नतीजा हैं। ये हत्याएँ मात्र व्यक्तियों की हत्या नहीं बल्कि एक खास विचार व सोच को खत्म करने की दिशा की ओर है।
यह खास विचार व सोच है :-- विज्ञान पर भरोसा , वैज्ञानिक व तर्कफरक सोच ; तथा गैरबराबरी व अन्याय शोषण उत्पीड़न के विरोध में संघर्ष करना व जाति-धर्म-लिंग के नाम हो रही गैरबराबरी के विरोध में बराबरी की वकालत करना । पिछले एक साल में इस विचार व सोच को कमजोर करने को हमले बहुत तेजी से बढ़े हैं । इसीलिए शिक्षण संस्थाओं से लेकर तमाम संस्थाओं में साम्प्रदायिक व्यक्तियों की तैनाती की जा रही है । आम नागरिकों का खान-पान, रहन-सहन कैसा व क्या हो । इस मामले में संघ परिवार खुलकर फतवा सुना रहा है ।
ऐसा घुटन भरा माहौल पहले न था । निश्चित तौर पर ऐसे माहौल का विरोध होना स्वाभाविक था । कलबुर्गी व अखलाक की हत्या वह मुकाम था जहां साहित्यकारों व कलाकारों व प्रख्यात वैज्ञानिक भार्गव ने अपने पुरस्कार वापस लौटाए । इसके चलते मोदी सरकार को अपनी साख दांव पर नज़र आने लगी । लेकिन फासिस्ट स्टाइल में ही मोदी सरकार ने इस विरोध को फर्जी साबित करने की तमाम कोशिश की । दिल्ली व बिहार चुनाव की ही तरह वे इसमें भी असफल साबित हो रहे हैं ।
मोदी सरकार ने इस विरोध को कुंद करने के लिए ‘प्रायोजित विरोध’ भी रचा । मोदी सरकार ने तर्क दिये कि यह विरोध आपात काल के समय क्यों नहीं हुआ , या फिर सिक्ख दंगों के समय क्यों नही हुआ या तब कांग्रेस का विरोध क्यों नहीं किया या फिर विरोध दूसरे ढंग से होना चाहिए पुरस्कार वापस नहीं करने चाहिए आदि आदि । गुजरात दंगों का तो संघ व मोदी सरकार जान बूझकर नाम ही नहीं लिया । अब मोदी सरकार के विरोध का मतलब मोदी जी के प्रति असहिष्णुता बताया जा रहा है ।
निश्चित तौर पर कुछ साहित्यकारों की कमजोरिया रही हैं लेकिन क्या इससे उनके ‘गलत को गलत’ कहने का अधिकार खत्म हो जाता है ? क्या इससे मोदी सरकार का हर ‘गलत काम’ सही साबित हो जाता है ? क्या अब मोदी सरकार यह तय करेगी कि किसीको कब विरोध करना चाहिए ? किसका विरोध करना चाहिए ? विरोध कैसे करना चाहिए ? यही फासिस्टों का अंदाज भी होता है कि उनका यदि विरोध भी हो, तो उनकी मर्जी से हो ।
भाजपा की ही तरह कांग्रेस भी देश के बड़े पूंजीपतियों की ही पार्टी है । इसे भी दंगों के आयोजन से कोई परहेज नहीं रहा है । 84 के दंगों का दाग इनके माथे पर लगा हुआ है । आपातकाल की खौफनाक यादें आज भी लोगों के जेहन में हैं । फिलहाल कॉर्पोरेट घरानों ने कांग्रेस को ड्राइविंग सीट से पीछे करके इसे मोदी व भाजपा को थमा दिया है । दोनों ही टाटा –बिड़ला –अंबानी –अदानी जैसों के सेवक हैं । अन्य चुनावबाज पूंजीवादी पार्टियां भी इन दोनों की तरह ‘पूंजीवाद’ को ही आगे बढ़ा रही हैं ।
दरअसल पूंजीपति वर्ग मंदी का सारा बोझ मेहनतकश नागरिकों पर डाल रहा है । वह अपने गिरते मुनाफे को हासिल करने को आम जनता की जेब से सब कुछ निचोड़ लेना चाहता है । वह पहले के सारे जनपक्षधर कानूनों व अधिकारों को खत्म कर देना चाहता है । उसकी इस राह में रुकावटें भी हैं । जिनको वह तुरत फुरत में खत्म कर देना चाहता है । इस चाहत ने ही मोदी जी व भाजपा-संघ को सत्ता पर पहुंचा दिया ।
आज के पूंजीपति वर्ग या पूंजीवाद को तर्क , तार्किक व वैज्ञानिक सोच सहन नहीं है । यह आज सामाजिक बराबरी के अधिकार की बातों , विरोधी विचार या सोच को धैर्यपूर्वक सुनने की सोच के खिलाफ खड़ा है । यह प्रगतिशील विचारों व सोच का विरोधी है । यह संवैधानिक व जनवादी अधिकारों के विरोध में खड़ा है । आज का पूंजीवाद कूपमंडूक व पुराथनपंथी सोच को बढ़ावा देने वाला है । यह सांप्रदायिक, नस्लवादी जातिवादी राजनीति को बढ़ावा देने वाला है । इसलिए भी कि उसकी हुकूमत बनी और बची रहे ।
निश्चित तौर पर साहित्यकारों - कलाकारों का विरोध इस पूरी समाजविरोधी सोच के खिलाफ होना चाहिए । जो विरोध उन्होने किया वह स्वागत योग्य है । लेकिन इतने तक सीमित रहना ठीक नहीं । यह नाकाफी है । बरतोल्त ब्रेख्त के शब्दों में यह कहना ही सही होगा कि
“कलाकार,…….
जो कुछ है तुम्हें वही दिखाना चाहिए ,
लेकिन जो है उसे दिखाते हुए तुम्हें
जो होना चाहिए और नहीं है ,
और जो राहतमंद हो सकता है
उसकी ओर भी इशारा करना चाहिए ......
तय मानो; तुम एक अंधेरे युग में रह रहे हो .... । ”
आज ऐसे दौर में जब हिटलरी-मुसोलीनी अंदाज हर ओर पैर पसार रहा है तब बरतोल्त ब्रेख्त, क्रिस्टोफर कौडवेल व राल्फ फाक्स जैसे साहित्यकारों –कलाकारों के तर्ज पर चलने की बहुत जरूरत है।
आज सांप्रदायिक फासीवादी ताक़तें लगातार आगे बढ़ रही हैं । केजरीवाल या नीतीश की जीत का मतलब फासीवादी ताकतों की हार नहीं हैं । केजरीवाल हो या नीतीश वह भी इसी पूंजीवाद के घोड़े पर सवार है । इन सभी की आर्थिक नीतियां लगभग एक सी हैं ।
आज सांप्रदायिक फासीवादी विचारों व संगठनों को पीछे धकेलने के लिए जरूरी है कि अपने राजनीतिक व जनवादी अधिकारों के लिए सजग होकर जुझारू संघर्ष किया जाय । हर प्रकार के सांप्रदायिक घटनाओं व कूपमंडूक सोच के विरोध में संघर्ष तेज किया जाय ।
फासीवाद को अंतिम तौर तभी हराया जा सकता है जब इसे पैदा करने वाली व्यवस्था को खत्म करने के लिए संघर्ष किया जाय । यानी पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म करने के संघर्ष का हिस्सा बना जाय । तथा समाजवादी व्यवस्था का निर्माण किया जाय । इस मायने में आज भगत सिंह के विचारों पर चलने की सख्त जरूरत है ।
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