रांची, सम्भल, हैदराबाद व दिल्ली में हुई यौन हिंसा व हत्या पर
अभी अभी कुछ दिनों के भीतर ही रांची, सम्भल, दिल्ली और हैदराबाद में यौन हिंसा हुई है हैदराबाद व दिल्ली में महिला के साथ यौन हिंसा के बाद उनकी हत्या भी कर दी गई। हैदराबाद में 27 वर्षीया जानवरों की डॉक्टर से चार लोगों ने बलात्कार किया हत्या करने के बाद पेट्रोल डालकर जला दिया। राँची में लड़की का सरेआम किडनेप कर उसके साथ यौन हिंसा की गई। सम्भल में भी एक लड़की के साथ यौन हिंसा के बाद जला दिया गया! लड़की अभी के अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है। जबकि दिल्ली में 55 वर्षीया महिला के साथ यौन हिंसा के बाद हत्या कर दी गई। हकीकत तो यही है कि एसी ही कई घटनाएं इस बीच और भी हुई होंगी ! जो न तो अखबारों की खबरें बन पाती है ना ही पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज होती हैं इसलिए उनकी खबर किसी को नहीं हो पाती।
साल 2017 में ही महिलाओं के अपराध(बलात्कार) के 32559 आंकड़े दर्ज किए गए। इनमें से 93.1 प्रतिशत मामलों में आरोपी करीबी लोग ही थे। महिलाओं के खिलाफ अपराध की ये घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यौन हिंसा व हत्या कर देने की घटनाएं केवल घर से बाहर ही नहीं होती बल्कि घरों पर भी होती हैं। इन्हें अंजाम देने वाले अजनबी ही नहीं होते हैं बल्कि बेहद करीबी लोग भी होते हैं। जो सोचते हैं कि पुलिस व फौज से सुरक्षा मिल जाएगी। उन्हें 'रामपुर तिराहा कांड' को याद रखना चाहिए ! जब 26 साल पहले 2 अक्टूबर को 'अलग उत्तराखंड' के लिए बसों में भर कर स्त्री व पुरुष प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे थे तब पुलिस ने क्या क्या जुल्म महिलाओं पर ढाए थे। यही हाल कश्मीर से लेकर मणिपुर व आदिवासी इलाकों में आंदोलनों में महिलाओं के साथ होता है।
जो सोचते है कि 'कम कपड़े पहनने' से या रात को बाहर घूमने पर ही यह सब होता है तो उन्हें अपनी सोच दुरुस्त करनी होगी। क्योंकि छोटी मासूम बच्चियों से लेकर 80 साल तक की बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी यह हो रहा है। यह घर के अंदर भी बहुत हो रहा है।
इस अपराध के खिलाफ जुमले तो बहुत उछाले गए थे ! दावे भी बहुत किये गए थे ! मगर हश्र हमारे सामने है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' ! 'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार-अबकि बार भाजपा सरकार' जैसे नारे 'हिन्दू फ़ासीवादियों ने उछाले ! नतीजा क्या हुआ ? घटनाएं कम तो नहीं हुई और ज्यादा बढ़ गई ! और हुआ ठीक बिल्कुल उल्टा ! महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के आरोपी ही अब मोदी -योगी की सरकार में मंत्री बन गए और अपने पापों से मुक्त होकर 'संत' बन गए ! कुलदीप सेंगर, चिन्मयानंद जैसों का नाम अब कौन है जो नहीं जानता ! बात केवल इन 'हिन्दू फासीवादी' ताकतों की ही नही है कांग्रेस, सपा, बसपा सभी के यही हाल हैं। सभी यौन हिंसा में लिप्त अपनी पार्टी के आदमी का अंत तक बचाव करते हैं। जब आलम ऐसा हो तो कोई कैसे उम्मीद कर ले कि महिलाओं के खिलाफ होते अपराध कम हो जाएंगे । बल्कि होगा तो इसका उल्टा ही। 'जैसे नेता- वैसी जनता' वाली ही बात होगी। अपराध तो बढ़ते ही जायेंगे।
फिर सवाल यही बनता है कि किया क्या जाय ? क्या अपराधियों को फांसी देने से अपराध कम हो जाएंगे ? महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध की वजह यह भी है कि जिन घटनाओं में अपराधी रसूखदार पैंसे वाले होते हैं आम तौर पर इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता ! पूरा समाज पुरुषवादी सोच, सामंती सोच से ग्रसित है जहां महिलाओं की बराबरी, बराबर के अधिकार के सवाल को ही गलत माना जाता है ! तमाम पाबंदियां महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं उसी को परिवार की इज्जत के नाम पर सब सहना पड़ता है जबकि पुरुष के मामले में ठीक उलटा है। यौन हिंसा को अंजाम देने वालों अपराधियों को केवल 'लड़कों की गलती' कहकर छोड़ देने की बातें होती हैं जबकि लड़कियों के मोबाइल, मॉडर्न कपड़ों से लेकर घर से निकलने पर तक पाबंदी लगा देने की बातें होती हैं !
जहां तक फांसी देकर अपराध खत्म करने का सवाल है यह नामुमकिन हैं ! यह समाज के बुनियादी ढांचे की गड़बड़ी को सही नही कर सकता जिसके चलते अपराधी पैदा होते हैं ! 30-40 साल पहले रंगा-बिल्ला को यौन हिंसा व हत्या के मामले में भी फांसी देने की बात हुई ! दोनों को फांसी दी भी गयी। उसके बाद भी कुछ मामलों में फांसी दी गई ! मगर नतीजा क्या हुआ ?
कोई भी समाज महिलाओं को असुरक्षित स्थिति में रखकर खुद सुरक्षित नहीं रह सकता ! महिलाओं की बेहतर स्थिति बराबरी व सम्मान ही किसी समाज की बेहतरी का मापदंड होता है।
इसलिए जरूरी है कि हर प्रकार की सामन्ती पुरुषवादी सोच के खिलाफ खड़ा हुआ जाय ! महिलाओं के बराबरी के अधिकार व सम्मान के पक्ष में खड़ा हुआ जाय ! इसे न केवल बाहर किया जाय बल्कि अपने-अपने घरों में भी किया जाय। महिलाओं पर होने वाले हर प्रकार के अपराध व जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई जाय !
यही नहीं ! जरूरत है कि समाज के बुनियादी ढांचे को बदलने के लिए संघर्ष किया जाय। आज समाज में हर जगह पूंजी, पैसा व बाज़ार छाया हुआ है ! इस पूंजी का मंत्र है - मुनाफा और मुनाफा ! पूंजी के इस राज में इंसान , इंसानियत का कोई मोल नहीं है ! पूंजी के इस राज में एक ओर बेरोजगारों की भारी फौज है तो दूसरी तरफ गरीबी भुखमरी के चलते वैश्यावृत्ति करती लाखों महिलाएं ! यहां मुनाफे की हवस में एक ओर अफीम,स्मेक आदि नशे का कारोबार होता है तो दूसरी ओर सेक्स, हिंसा पर बनने वाली व पोर्न फिल्मों का कारोबार ! इसका नतीजा होता है कि यह सब कुछ मिलजुलकर समाज में ऐसे इंसानों को पैदा करता है जो यौन हिंसा व हत्याओं को अंजाम देते हैं। इसलिये इस व्यवस्था के रहते ऐसे अपराधों से मुक्ति नामुमकिन है। आमूलचूल परिवर्तन के बिना मुक्ति सम्भव नहीं है। समाजवाद ही इनका हल है।
अभी अभी कुछ दिनों के भीतर ही रांची, सम्भल, दिल्ली और हैदराबाद में यौन हिंसा हुई है हैदराबाद व दिल्ली में महिला के साथ यौन हिंसा के बाद उनकी हत्या भी कर दी गई। हैदराबाद में 27 वर्षीया जानवरों की डॉक्टर से चार लोगों ने बलात्कार किया हत्या करने के बाद पेट्रोल डालकर जला दिया। राँची में लड़की का सरेआम किडनेप कर उसके साथ यौन हिंसा की गई। सम्भल में भी एक लड़की के साथ यौन हिंसा के बाद जला दिया गया! लड़की अभी के अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही है। जबकि दिल्ली में 55 वर्षीया महिला के साथ यौन हिंसा के बाद हत्या कर दी गई। हकीकत तो यही है कि एसी ही कई घटनाएं इस बीच और भी हुई होंगी ! जो न तो अखबारों की खबरें बन पाती है ना ही पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज होती हैं इसलिए उनकी खबर किसी को नहीं हो पाती।
साल 2017 में ही महिलाओं के अपराध(बलात्कार) के 32559 आंकड़े दर्ज किए गए। इनमें से 93.1 प्रतिशत मामलों में आरोपी करीबी लोग ही थे। महिलाओं के खिलाफ अपराध की ये घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यौन हिंसा व हत्या कर देने की घटनाएं केवल घर से बाहर ही नहीं होती बल्कि घरों पर भी होती हैं। इन्हें अंजाम देने वाले अजनबी ही नहीं होते हैं बल्कि बेहद करीबी लोग भी होते हैं। जो सोचते हैं कि पुलिस व फौज से सुरक्षा मिल जाएगी। उन्हें 'रामपुर तिराहा कांड' को याद रखना चाहिए ! जब 26 साल पहले 2 अक्टूबर को 'अलग उत्तराखंड' के लिए बसों में भर कर स्त्री व पुरुष प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे थे तब पुलिस ने क्या क्या जुल्म महिलाओं पर ढाए थे। यही हाल कश्मीर से लेकर मणिपुर व आदिवासी इलाकों में आंदोलनों में महिलाओं के साथ होता है।
जो सोचते है कि 'कम कपड़े पहनने' से या रात को बाहर घूमने पर ही यह सब होता है तो उन्हें अपनी सोच दुरुस्त करनी होगी। क्योंकि छोटी मासूम बच्चियों से लेकर 80 साल तक की बुजुर्ग महिलाओं के साथ भी यह हो रहा है। यह घर के अंदर भी बहुत हो रहा है।
इस अपराध के खिलाफ जुमले तो बहुत उछाले गए थे ! दावे भी बहुत किये गए थे ! मगर हश्र हमारे सामने है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' ! 'बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार-अबकि बार भाजपा सरकार' जैसे नारे 'हिन्दू फ़ासीवादियों ने उछाले ! नतीजा क्या हुआ ? घटनाएं कम तो नहीं हुई और ज्यादा बढ़ गई ! और हुआ ठीक बिल्कुल उल्टा ! महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के आरोपी ही अब मोदी -योगी की सरकार में मंत्री बन गए और अपने पापों से मुक्त होकर 'संत' बन गए ! कुलदीप सेंगर, चिन्मयानंद जैसों का नाम अब कौन है जो नहीं जानता ! बात केवल इन 'हिन्दू फासीवादी' ताकतों की ही नही है कांग्रेस, सपा, बसपा सभी के यही हाल हैं। सभी यौन हिंसा में लिप्त अपनी पार्टी के आदमी का अंत तक बचाव करते हैं। जब आलम ऐसा हो तो कोई कैसे उम्मीद कर ले कि महिलाओं के खिलाफ होते अपराध कम हो जाएंगे । बल्कि होगा तो इसका उल्टा ही। 'जैसे नेता- वैसी जनता' वाली ही बात होगी। अपराध तो बढ़ते ही जायेंगे।
फिर सवाल यही बनता है कि किया क्या जाय ? क्या अपराधियों को फांसी देने से अपराध कम हो जाएंगे ? महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध की वजह यह भी है कि जिन घटनाओं में अपराधी रसूखदार पैंसे वाले होते हैं आम तौर पर इनका कुछ भी नहीं बिगड़ता ! पूरा समाज पुरुषवादी सोच, सामंती सोच से ग्रसित है जहां महिलाओं की बराबरी, बराबर के अधिकार के सवाल को ही गलत माना जाता है ! तमाम पाबंदियां महिलाओं पर ही थोपी जाती हैं उसी को परिवार की इज्जत के नाम पर सब सहना पड़ता है जबकि पुरुष के मामले में ठीक उलटा है। यौन हिंसा को अंजाम देने वालों अपराधियों को केवल 'लड़कों की गलती' कहकर छोड़ देने की बातें होती हैं जबकि लड़कियों के मोबाइल, मॉडर्न कपड़ों से लेकर घर से निकलने पर तक पाबंदी लगा देने की बातें होती हैं !
जहां तक फांसी देकर अपराध खत्म करने का सवाल है यह नामुमकिन हैं ! यह समाज के बुनियादी ढांचे की गड़बड़ी को सही नही कर सकता जिसके चलते अपराधी पैदा होते हैं ! 30-40 साल पहले रंगा-बिल्ला को यौन हिंसा व हत्या के मामले में भी फांसी देने की बात हुई ! दोनों को फांसी दी भी गयी। उसके बाद भी कुछ मामलों में फांसी दी गई ! मगर नतीजा क्या हुआ ?
कोई भी समाज महिलाओं को असुरक्षित स्थिति में रखकर खुद सुरक्षित नहीं रह सकता ! महिलाओं की बेहतर स्थिति बराबरी व सम्मान ही किसी समाज की बेहतरी का मापदंड होता है।
इसलिए जरूरी है कि हर प्रकार की सामन्ती पुरुषवादी सोच के खिलाफ खड़ा हुआ जाय ! महिलाओं के बराबरी के अधिकार व सम्मान के पक्ष में खड़ा हुआ जाय ! इसे न केवल बाहर किया जाय बल्कि अपने-अपने घरों में भी किया जाय। महिलाओं पर होने वाले हर प्रकार के अपराध व जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई जाय !
यही नहीं ! जरूरत है कि समाज के बुनियादी ढांचे को बदलने के लिए संघर्ष किया जाय। आज समाज में हर जगह पूंजी, पैसा व बाज़ार छाया हुआ है ! इस पूंजी का मंत्र है - मुनाफा और मुनाफा ! पूंजी के इस राज में इंसान , इंसानियत का कोई मोल नहीं है ! पूंजी के इस राज में एक ओर बेरोजगारों की भारी फौज है तो दूसरी तरफ गरीबी भुखमरी के चलते वैश्यावृत्ति करती लाखों महिलाएं ! यहां मुनाफे की हवस में एक ओर अफीम,स्मेक आदि नशे का कारोबार होता है तो दूसरी ओर सेक्स, हिंसा पर बनने वाली व पोर्न फिल्मों का कारोबार ! इसका नतीजा होता है कि यह सब कुछ मिलजुलकर समाज में ऐसे इंसानों को पैदा करता है जो यौन हिंसा व हत्याओं को अंजाम देते हैं। इसलिये इस व्यवस्था के रहते ऐसे अपराधों से मुक्ति नामुमकिन है। आमूलचूल परिवर्तन के बिना मुक्ति सम्भव नहीं है। समाजवाद ही इनका हल है।
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