Thursday, 21 November 2019

क्रालोस के 7वें सम्मेलन द्वारा पारित प्रस्ताव

                         
   क्रालोस के 7वें सम्मेलन द्वारा पारित प्रस्ताव
            
     1- मोदी सरकार द्वारा पारित वेज लेवर कोड बिल 2019 के खिलाफ
   
         मेदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत से ही श्रम कानूनों में तेजी से बदलाव करते हुए मजदूर वर्ग पर व्यापक हमला बोल दिया है।
    इन बदलावों के तहत 44 केन्द्रीय व 110 राज्य स्तरीय श्रम कानूनों को खत्म कर इन्हें 4 श्रम संहिताओं (लेवर कोड) में बदला जाना है। इन प्रस्तावित चार संहिताओं में वेज लेवर कोड के अलावा तीन संहिताएं-व्यावसायिक संरक्षा एवं कार्य परिस्थितियों से संबंधित संहिता, औद्योगिक संबंध से संबंधित संहिता तथा सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक कल्याण से संम्बधित संहिता है।
       वेज लेवर कोड बिल 2019 को लोक सभा व राज्य सभा से पास कराके सरकार ने राष्ट्रपति की मंजूरी भी ले ली है। इस बिल में मजदूरी भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 को समाहित कर दिया गया है। इस बिल में पूर्व के सेक्टर के आधार पर निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के प्रावधान को हटाकर केवल कुशलता और भू-स्थिति के आधार पर न्यूनतम वेतन निर्धारित किया जाएगा। रेलवे, खनन, तेल कुओं के लिए केन्द्र सरकार व अन्य क्षेत्रों के लिए राज्य सरकारें मजदूरी तय करेंगी। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार केन्द्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी घोषित करेगी। 
     नये कानून के तहत सरकार केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड व राज्य सलाहकार बोर्ड गठित करेगी। जिनमें मालिकों व मजदूरों /कर्मचारियों के समान संख्या में प्रतिनिधि तथा कुछ स्वतंत्र व्यक्ति व राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस बिल के पास होने के बाद सरकार अप्रेंटिस करने वालों को पहले ही मज़दूर की श्रेणी से बाहर कर चुकी है अब राष्ट्रीय स्तर पर 178 रूपये न्यूनतम मजदूरी (फ्लोर वेज) घोषित करके मजदूर विरोधी परिणाम दिखाने शुरू कर दिये है।
    वर्तमान मोदी सरकार ने पूंजीपति वर्ग के 100 दिन वाले एक्शन प्लान पर आगे बढ़ते हुए अपनी ही संसदीय समिति के प्रस्तावों को भी दरकिनार करते हुए वेज लेवर कोड बिल पास कर दिया। लोक सभा व राज्य सभा से इस बिल का पास हो जाना संसद में बैठी राजनीतिक पार्टियों के घोर पूंजीवादी चरित्र को दिखाता है।
      अपने पिछले कार्याकाल में मोदी सरकार नीम व एफ टी ई सरीखे प्राबधान लागू कर पूंजीपति को भारी मात्रा में ट्रेनी मज़दूरों के रूप में कुशल श्रमिकों की भर्ती की छूट दे चुकी है। स्थायी रोजगार पर हमला बोलना शुरू किया जा चुका है। भविष्य में जिन 3 अन्य कोड बिलों को पारित किया प्रस्तावित है इनके तहत ट्रेड यूनियन गठित करना कठिन बनाना, मालिकों को 300 मज़दूरों तक के उद्यमों मैं छटनी की खुली छूट , हड़ताल हेतु पूर्व नोटिस की समय सीमा बढ़ाने व गैरकानूनी हड़ताल पर भारी जुर्माने व जेल सरीखे प्रावधान लागू किये जाने हैं। इसके साथ ही लेबर इंस्पेक्टरों की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है।
    देश के मजदूर वर्ग ने अपने संघर्षों व अकूत कुर्बानियों से एक समय में ढेरों अधिकार हासिल किये और इन्हीं संघर्षों के दम पर ही सरकारों को मजदूर अधिकारों की सुरक्षा हेतु कानून बनाने को मजबूर होना पड़ा। आज जब मजदूर आन्दोलन काफी कमजोर है और मजदूर वर्ग का बड़ा हिस्सा पूंजीवादी/सुधारवादी पार्टियों के पीछे लामबंद है। तो ऐसे में पूंजीपति वर्ग की सरकारें एक-एक करके मजदूर विरोधी फैसले ले रही हैं तथा श्रम कानूनों को पूंजीपति वर्ग के हित में बदल रही हैं। आज जब पूंजीवादी व्यवस्था चौतरफा संकटों का शिकार है, देश में फासीवादी शक्तियां सत्ता के शीर्ष पर बैठी हैं। ऐसे में वे संकट का सारा बोझ मजदूरों/मेहनतकशों पर डाल रही हैं।
    मजदूर आन्दोलन की कमजोरी और इसकी ताकत के बिखरे होने का फायदा उठाकर शासक मजदूर अधिकारों को रौंद रहे हैं और तेजी से मजदूर विरोधी बिल पास कर रहे हैं। राज्य व केन्द्र स्तर के सलाहकार बोर्ड बनाकर मजदूरों की समझौते की क्षमता को कमजोर करने का षडयंत्र किया जा रहा है। इन बोर्डो में पूंजीपति वर्ग व उसके चाटुकारों और फासीवादियों को बैठाकर मजदूरों/कर्मचारियों को डराने धमकाने की संभावना ज्यादा है।
    लेकिन इतिहास गवाह है कि दुनिया भर की व्यापक मजदूर आबादी कभी भी इन बुर्जुआ कानूनों की मोहताज नहीं रही है। मजदूर वर्ग जब अपनी पूरी ताकत व एकजुटता के साथ मैदान में आएगा तो इन पूंजीवादी फासीवादी शासकों को पीछे हटने पर मजबूर करेगा और अपने हित में बने कानूनों व जनवादी अधिकारों की रक्षा भी करेगा और उनका विस्तार भी करेगा।
    क्रालोस का यह सातवां सम्मेलन मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में किये जा रहे मजदूर विरोधी बदलावों तथा वेज लेवर कोड बिल 2019 का पुरजोर विरोध करता है। श्रम अधिकारों की हिफाजत के लिये  देशभर में होने वाले मजदूर/कर्मचारी संघर्षों का समर्थन करता है तथा मजदूर वर्ग के चलने वाले व्यापक संघर्षों में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का संकल्प व्यक्त करता है।


      2-- दमनकारी कानूनों व इनमें संशोधन के विरोध में

 
     मोदी सरकार द्वारा दूसरी बार सत्ता ग्रहण के 100 दिन के भीतर दमनकारी गैर कानूनी गतिविधिययां रोकथाम कानून(यू.ए.पी.ए.) को और ज्यादा मारक बनाने के लिए जुलाई 2019 में संशोधित किया गया। अभी तक इसके तहत किसी संगठन को आतंकी घोषित किया जाता था अब नए संशोधन के पश्चात किसी व्यक्ति को ही आतंकी घोषित किया जा सकता है। पहले इसकी जांच पुलिस अधिकारी करते थे। अब जांच राष्ट्रीय जांच एजेन्सी(एन.आई.ए.) कर सकती है। इसमें आरोपित व्यक्ति की संपत्ति की जब्ती का प्रावधान किया गया है। जांच प्रक्रिया के लिए एन.आई.ए. के इंस्पैक्टर स्तर के अधिकारी को सक्षम बनाया गया है। संपत्ति जब्ती को पुरानी प्रक्रिया को सरल कर एन.आई.ए. की डी.जी.पी./ए.सी.पी. की अनुमति की व्यवस्था की गई है।
      अब यह व्यवस्था की गई है इसी के साथ राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून में संशोधन कर उसे और मारक बनाया जा रहा है डी एन ए तकनीक(उपयोग एवं अनुपयोग) नियंत्रण बिल के जरिये व्यापक डी एन ए एकत्र करने की साजिश रची जा रही है जो लोगों के निजता के अधिकार का खुला उल्लंघन है जहां एक ओर सरकार दमनकारी कानूनों को और मारक बना रही है वहीं जनवादी हकों से जुड़े कानूनों मसलन सूचना अधिकार कानून, मानव अधिकारों की सुरक्षा कानून में फेरबदल कर इन्हें कमजोर किया जा रहा है।
     दमनकारी कानूनों का काला इतिहास रहा है। जनता के जनवादी अधिकारों को स्वर देने वाले संगठन इसके शिकार बनते रहे हैं। कांग्रेस सरकार के दौर में  आतंकवाद के नाम पर खतरनाक कुख्यात टाडा ( आतंकवाद व विध्वंसात्मक गतिविधि निरोधात्मक कानून )  बना जबकि बाजपेयी की भाजपा सरकार ने( एन डी ए) आतंकवाद निरोधक कानून(पोटा) बनाया था इनकी मार से भारी संख्या में निर्दोष लोग प्रताडि़त रहे। इन कानूनों को बाद में रद्द किया गया मगर यूपीए सरकार ने इनके कई खतरनाक प्रावधानों को बाद में पुराने काले कानून यू.ए.पी.ए. में संशोधित कर शामिल कर दिए।
       अब मोदी सरकार इसे और ज्यादा संहारक बनाने में सक्रीय हुई है और इसने दमनकारी संशोधन पास कर दिये हैं। पूंजीवादी न्याय व्यवस्था दोषारोपण और दंड के लिए निश्चित प्रक्रिया, बचाव का अवसर, साक्ष्य-प्रमाण की अनिवार्यता की बात करती है। किंतु दमनकारी कानून इस धारणा को दर किनार करते हैं खत्म करते हैं। यहां न्याय प्रक्रिया की जगह घेरेबंदी कर शिकार करने के चलते आरोपी के बचाव के अवसर समाप्त कर दिए जाते हैं। विरोधी को केवल शक के आधार पर ही गिरफ्तार कर अपराधी साबित करने के साथ उसी पर खुद को निर्दोष साबित करने जिम्मेदारी डाल दी जाती है।  मनोबल गिर जाने के नाम पर सुरक्षा अमले को विशेषाधिकार दिये जाते हैं। आरोपी को अधिकारविहीनता में डाल दिया जाता है।
       निकट अतीत में आतंकवाद के आरोप से प्रताडि़त मुस्लिमों को तथा 'टाडा' में फंसाये गए हज़ारों  लोगों को वर्षों की यातना के बाद दोषमुक्ति मिली, यह कानूनों के घोर दुरूपयोग को बताता है। दूसरी ओर आतंक, हत्या में लिप्त हिंदूवादी संगठनों के मुकदमे वापस करने की सरकारों की कार्यवाही कानन के पक्षपाती प्रयोग को उजागर करता है।
         शासक वर्ग सामाजिक समस्याओं को हल करने में अक्षम है। जनता के असंतोष की आवाज का दमन करने के लिए वह काले कानूनों का सहारा  लेता है। वर्तमान में दमनकारी कानूनों को और कठोर बनाया जाना फासीवाद की ओर उन्मुख सरकार के कदमों का ही एक हिस्सा है। इसके निशाने पर हर वह व्यक्ति है जो फासीवादी परियोजना का विरोधी है। गहराते आर्थिक संकट से त्रस्त जनता के आक्रोश से शासक वर्ग फासीवादी ताकतों के सहारे निपटना चाहता है।
क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का यह सम्मेलन दमनकारी कानूनों का विरोध करता है।  यू.ए.पी.ए. में संशोधन रदद करने की मांग करता है। जनता से आह्वान करता है कि अपने जनवादी अधिकारों के लिए संगठित हों।   
 3--  अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद के विरूद्ध प्रस्ताव
   
          देश का शासक वर्ग अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद फैलाकर करोड़ों लोगों को उनके बुनियादी हितों के विपरीत खड़ा कर देने की जनविरोधी परियोजना को परवान चढ़ाने में सक्रीय है। पुलवामा आतंकी वारदात हो, सेना की जवाबी कार्यवाही जिसे सर्जीकल स्ट्राइक कहा गया, का प्रचारात्मक कोलाहल हों या फिर सरहदी छिटपुट घटनाओं से लेकर विदेशी मंचों में आतंकवाद के सवाल पर चर्चा हो, या सामरिक साजों-सामान की खरीदारी हो ! हर मसले को युद्ध की सरगर्मी की तरह फैलाना, उन्मादी प्रचार का रूप देकर जनता के मनो-मस्तिष्क में हावी करना शासकों की सचेत कार्यवाही रही है। घर में घुसकर मारने, बदला लेने, सबक सिखाने, परमाणु हमले की पहल न करने की शर्त की परवाह न करने, पाक अधिकृत कश्मीर हथियाने जैसी उत्तेजक बयानबाजियां उछाली जाती रही हैं। सवाल उठाने वालों को देशद्रोही घोषित करने, दुश्मन का पक्षधर बताने की बयानबाजियां भी उछाली जाती रही हैं। बयान सत्ता शीर्ष से प्रचारित होते ही संचार माध्यमों, अखबारों की सनसनी वाले शीर्षकों के साथ सरगर्म बहसें, टी.वी चैनलों की गलाफाड़ बहसें इसे गुंजायमान करती रही हैं। सत्ताधारी पार्टी कारकूनों- छुटभैयों की उत्तेजक, उकसावे की भाषा इसे ज्यादा मारक बनाती रही है।
         अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद के माहौल को खड़ा कर मोदी व भाजपा दूसरी बार सत्ता पर पहुंच गए । अब दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार इस युद्धोन्मादी माहौल को स्थायी रूप से लगातार कायम करने के लिए प्रयासरत रही है इस माहौल की आड़ में सरकार के लिए जनविरोधी कदमों को उठाना आसान हो जाता रहा है। कश्मीर में धारा 370 व अनु 35 ए को निष्प्रभावी बनाने असम में एन आर सी लागू करने से लेकर श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी बदलाव, सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण सरीखे कई कदम इस माहौल की आड़ में सरकार उठा चुकी है।
       मोदी सरकार द्वारा कायम किये जा रहे युद्धोन्माद के निशाने पर पाकिस्तान है। सरकार पाकिस्तान को सबसे बड़ा शत्रु प्रचारित करती रही है। कहने की बात नही है कि पाकिस्तान की सरकार  ही इसी तरह का युद्धोन्माद अपने देश में भारत के खिलाफ भड़काती रही है। दोनों देशों की सरकारें इस युद्धोन्मादी माहौल को कायम कर जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटाने में जुटी रही हैं इस माहौल को लगातार कायम रखने के लिए सीमा पर कुछ सैनिक की निरन्तर बलि चढ़ाने से भी इन्हें कोई गुरेज नहीं है। इस माहौल की आड़ में सरकारें 'मज़बूत सरकार' 'मज़बूत राष्ट्र' सेना के मनोबल को न गिरने देने व निरन्तर सैन्यीकरण को जायज ठहराती रही है। इसी की आड़ में सरकारें हर विरोधी स्वर को राष्ट्र विरोधी करार देती रही है। खाने की बात नहीं है कि अंधराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद संघ भाजपा के फ़ासीवादी अभियान के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
        भारत व पाकिस्तान के मज़दूर मेहनतकशों के हित एक से हैं दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के युद्ध या युद्ध के माहौल का खामियाजा दोनों देशों  की मेहनतकश जनता को उठाना पड़ता है। ऐसे में इस युद्धोन्माद का विरोध जरूरी है।
       क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का यह सम्मेलन अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद को बंद करने की मांग करता है। व्यापक मेहनतकश आबादी का आह्वान करता है कि वे अपने जनवादी अधिकारों की रक्षा के लिए सजग हों और संगठित हों।

        4-  फासीवादी हमलों के विरूद्ध प्रस्ताव
   
        आज पूरी दुनिया विश्व आर्थिक संकट  की चपेट में है। इस कारण दुनिया के कारपोरेट पूंजीपति व बड़े पूंजीपति दक्षिण पंथी और फांसीवादी पार्टियों को पहले से ही कहीं ज्यादा समर्थन-संसाधन दे रहे हैं ताकि ये प्रतिगामी ताकतें इस आर्थिक संकट का पूरा बोझ मेहनतकश जनता पर डाल दें और इससे उत्पन्न आक्रोश को आतंकी तानाशाही पूर्ण कदमों से कुचल दें।
    भारत में भी हिन्दु  फासीवादी संगठन आर.एस.एस. के आनुषांगिक संगठन भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सरकार में है। आर.एस.एस. जिस हिन्दुत्व की बात करता है। वह पुरुष प्रधानता, सामन्ती मूल्यों व सवर्ण वर्चस्व से लैस है। जो अल्पसंख्यकों दलितों महिलाओं को दोयम दर्जे की स्थिति में धकेल देना चाहता है। इस सरकार का नया शासन काल कहीं ज्यादा खतरनाक तेवरों के साथ आम जनता मुख्यतः अल्पसंख्यकों दलित समुदायों व जनवादी लोगों पर हमला कर रहा है। खाने -पहनने से लेकर पढ़ने-लिखने तक पर भांति-भांति की पाबंदिया लगाई जा रही हैं। लोग किसके साथ रहें क्या सोचें जैसी नितान्त निजी चीजों को भी डिक्टेट करने के प्रयास हो रहे है।
         बीते 6 वर्षों के इंजे शासन काल में भीड़ हिंसा के जरिये अल्पसंख्यको ओर हमले बोलना, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की हत्या , विरोध की हर आवाज को देशद्रोही करार देना अधिकाधिक बढ़ता गया है संघी मंडली आज राज्य की संस्थाओं से लेकर न्यायालयों तक में घुसपैठ कर चुकी है । न्यायालय से लेकर सेनाध्यक्ष तक संघी जुबान बोल रहे हैं। एक के बाद एक काले कानूनों को और दमनकारी बनाया जा रहा है। तो नाममात्र के जनवादी अधिकारों को भी  छीना जा रहा है।
        अयोध्या में राम मंदिर के सम्बन्धन में अदालती फैसला हो या कश्मीर में धारा 370 निष्प्रभावी बनाने का सरकारी कदम ये सब संघ भाजपा के कुत्सित एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले कदम हैं। कॉरपोरेट पूंजीपति वर्ग के सहयोग समर्थन से संघ भाजपा तेज़ी से अपने फ़ासीवादी अभियान पर आगे बढ़ रही हैं। एक ओर वह मज़दूरों मेहनतकशों पर निर्मम हमले बोल रही हैं। पूंजी को मनमानी लूट की खुली छूट दे रहे है यो दूसरी ओर नकली दुश्मन , नकली मुद्दे पैदा कर लोगों को गुमराह कर रही है। अपने राजनीतिक विरोधियों को किनारे लगा रही है  साम्प्रदायिक उन्माद, राष्ट्रवादी उन्ममद खड़ा कर खुद को सबसे बड़ा देश भक्त करार दे रही है। शिक्षा संस्कृति से लेकर खान पान तक सबको वह फ़ासीवादी रंग में रही है।
     फासिवाद एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की खुली नग्न आतंकी तानाशाही होता है। संघ भाजपा भारत को तेज़ी से फ़ासीवाद की ओर धकेल रही है इसके निशाने पर मज़दूर मेहनतकश, अल्पसंख्यक, दलित, छात्र नौजवान महिलाओं समेत व्यापक जनता है। इस फासीवादी राक्षश का मुकाबला भ्रष्ट पूंजीवादी दल व उनका चुनावी जोड़ तय लर सकता। क्रांतिकारी, प्रगतिशील ताकतों के नेतृत्व में बना व्यपक मोर्चा ही फासीवाद को चुनौती दे सकता है।
      क्रालोस का  यह सम्मेलन फासीवादी ताकतों द्वारा मेहनतकश जनता के विभिन्न हिस्सों मसलन अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं, जनवादी संस्थाओं व लोगों इत्यादि पर होने वाले हमलों का पुरजोर विरोध करता है। यह सम्मेलन अपने सदस्यों, शुभेच्छुओं का आह्वान करता है कि वे फासीवादी ताकतों द्वारा मेहनतकश जनता पर होने वाले हमलों का विरोध करने के साथ साथ जनता के बीच जाकर इनकी घृणा व खौफ फैलाने वाली राजनीति का भंडाफोड़ करे एवं फासीवादी आंदोलन के बरक्स मेहनतकश जनता को वर्गीय चेतना पर आधारित जनवादी आन्दोलन को खड़ा करने के लिए अपना योगदान दें।
            
                   5-   जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में
            
    जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में 5 अगस्त को राष्ट्रपति के माध्यम से गैजेट नोटिफिकेशन जारी कर मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 व धारा 35 ए को निष्प्रभावी कर दिया। तत्काल बाद ही संसद में जम्मूकश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने का बिल भी पास करवा लिया।
            जम्मू कश्मीर के सम्बन्ध में यह कदम उठाने से कुछ वक्त पहले आतंकवादी घटना होने के बहाने की आड़ में कई हज़ार अर्धसैनिक बलों की तैनाती कर जम्मूकश्मीर की अवाम को नज़रबन्द कर दिया गया तथा कश्मीर को एक प्रकार के यातना कैम्प में बदल दिया गया। फिर 5 अगस्त को धारा 370 को खत्म किये जाने का राष्ट्रपति का आदेश जारी हो गया।
           इस प्रकार से जम्मू कश्मीर को भारत में छल बल से विलय करने का जो कदम आज़ादी के बाद नेहरू की कांग्रेस सरकार द्वारा उठाया गया था वह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अपने मुकाम पर पहुँच गया।
            यह ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत व जम्मूकश्मीर के शासकों के बीच विलय के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण समझौता हुआ था जिसके मुताबिक जम्मूकश्मीर का अपना संविधान, झंडा व प्रधानमंत्री होना था  जबकि भारत को केवल 4 मसलों रक्षा, मुद्रा, संचार व विदेश नीति को तय करने का अधिकार था। जम्मूकश्मीर के सम्बन्ध में अंतिम फैसला जनमतसंग्रह से ही तय होना था। अनु 370 इसी की अभिव्यक्ति थी। अगस्त 1953 के बाद ही नेहरू सरकार द्वारा भारत विरोधी षड्यंत्र रचने के फर्जी मुकदमे लगाकर जम्मूकश्मीर के शेखब्दुलाह समेत लगभग दो दर्जन लोगों को गिरफ्तार कर जेल डाल दिया गया तथा जम्मूकश्मीर के भारत में छल बल से विलय की प्रक्रिया शुरू हो गई। बाद के काल में यानी पिछले 30-40 सालों से जम्मूकश्मीर की अवाम फौजी संगीनों के साये में जी रही है। इस प्रकार देखा जाय तो साफ है कि अनु 370 को व्यवहार में पहले ही कांग्रेस सरकार के दौर में खत्म किया जा चुका था और फिर मोदी सरकार ने इस सम्बन्ध में जो भ्रम की स्थिति थी अनु 370 को खत्म करके उसे भी पूरी तरह खत्म कर दिया। मोदी सरकार ने इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया की भी खुलेआम धज्जियां उड़ाई। इसने राज्यपाल की राज्य सरकार के रूप में व्याख्या कर मनमाने व फासीवादी तौर तरीकों से 370 को खत्म कर दिया।
            जम्मूकश्मीर की अवाम शुरुआत से ही स्थिति को समझती है वह भारत सरकार द्वारा उठाये इन कदमों को शुरुआत से ही अपने आत्मनिर्यण के अधिकार पर हमले के रूप में देखती है इन कदमों को छल बल से भारत में विलय के रूप में देखती है। वे शुरुआत से ही इसका विरोध करते रहे है।
           अब पिछले 3 माह से जम्मूकश्मीर की अवाम कर्फ्यू की स्थिति में अपने अपने घरों में कैद है वह भयानक अलगाव, असुरक्षा व यंत्रणा की स्थिति में है।
           यह सम्मेलन मोदी सरकार द्वारा उठाये गए इन फासीवादी कदमों का विरोध करता है। साथ ही मांग करता है कि भारत सरकार जम्मूकश्मीर से कर्फ्यू को तत्काल रद्द करने के साथ साथ जम्मूकश्मीर की अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करते हुए अगस्त 1953 से पहले की स्थिति को बहाल कर वहां जनमत संग्रह के अपने वायदे को व्यवहार में लागू करे।

         6- देश में बढ़ती भीड़ हिंसा के सम्बन्ध में

        देश में पिछले कुछ सालों से कथित भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा व हत्याओं की संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हुई है। कुछ गिनी चुनी घटनाओं को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश घटनाएं गौरक्षा के नाम पर हुई हैं। इन कथित गौरक्षकों का निशाना आम तौर पर मेहनतकश मुस्लिम समुदाय के लोग बने हैं  जबकि दलित समुदाय के  मेहनतकश लोग भी इनके निशाने पर रहे हैं।
        2015 में गाज़ियाबाद के दादरी में गौमांस का आरोप लगाकर अख़लाक़ की हत्या कर दी गई थी उसके बाद से अब तक 150 घटनाओं का अनुमान है जिनमें 70 से ज्यादा हत्याएं हो चुकी हैं। 300 से ज्यादा को घायल किये जाने का अनुमान है। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड, गुजरात में ज्यादा घटनाएं हुई हैं।
       इन बढ़ती घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट अपनी चिंता जता कर इसके खिलाफ कड़े कानून बनाये जाने को कह चुका है लेकिन इसके बावजूद मोदी सरकार का रुख इन घटनाओं को बढ़ावा देने वाला हैं। मोदी सरकार के मंत्री फूलमालाओं से ऐसी हत्या के आरोपियों का स्वागत करते हैं।
        दरअसल देश में जैसे जैसे फासीवादी आंदोलन बढ़ता गया है और यह सत्ता पर पहुंचा है। इन कथित भीड़ हत्याओं में बढ़ोत्तरी होती गयी है। इन बीते 4 सालों में साल दर साल ऐसी घटनाओं की संख्या निरंतर बढ़ती गई है। इन घटनाओं को भीड़ हत्या कहना मामले की गंभीरता पर पर्दा डालना है। वास्तव में ये कथित भीड़ हिंसा  फासीवादी दस्तों द्वारा परोक्ष या प्रत्यक्ष ढंग से की जा रही हैं। यह कथित भीड़ हिंसा संघ परिवार के लिए अपने फासीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने का एक औजार है। इनके हिंदुत्व की फासीवादी विचारधारा में मुस्लिमों व दलितों के प्रति घृणा व नफरत के सिवाय और कुछ नहीं है। इसीलिए कोई हैरत नहीं कि इन कथित भीड़ हिंसा के शिकार मेहनतकश मुस्लिम व दलित हों। भीड़ हिंसा के नाम पर संघी दस्ते आरोपित करने, न्याय करने की भूमिका अपने हाथ में लेने लगे हैं फ़ासीवाद की ओर बढ़ने के ये शुरुवाती संकेत हैं। भाजपा व संघ एकाधिकारी पूंजी के हित में देश में जनवादी सोच तथा संवैधानिक-जनवादी अधिकारों को व्यवहार में निष्प्रभावी या कमजोर कर रही है।
     क्रालोस का सातवां सम्मेलन इन कथित भीड़ हिंसा के नाम पर हिन्दू फासीवादी दस्तों द्वारा की जा रही हिंसा व हत्याओं की निंदा व भर्त्सना करता है साथ ही इसके खिलाफ व्यापक मेहनतकश जनता को एकजुट करने व संघर्ष करने का संकल्प लेता है।

    7--  राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर ( एन.आर.सी. ) के सम्बन्ध में
     असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने के तहत 19 लाख लोगों की नागरिकता पर हमला बोला जा चुका है। 19 लाख लोगों को देशविहीन, राष्ट्रविहीन बनाया जा चुका है। हमले की शिकार आबादी का बहुलांश मेहनतकश हैं।
      एन.आर.सी. की पहली प्रक्रिया भारत में 1951 की जनगणना के साथ हुई थी। इसके बाद न्यायालय के हस्तक्षेप से केंद्र की सत्ता में संघ परिवार के पहुंच जाने के बाद एन.आर.सी. की प्रक्रिया पुन: शुरू कर दी गई। फासीवादी संघी संगठनों ने लम्बे समय से देश भर में ध्रुवीकरण के अपने घृणित एजेंडे के तहत असम में अलग-अलग वक़्त पर अलग-अलग जगहों से पहुंची भारी  आबादी में से मुस्लिम आबादी को बांग्लादेशी घुसपैठियों के रूप में दुष्प्रचार का जरिया बनाया। एन.आर.सी. की एस प्रक्रिया के लिए असम में 24 मार्च 1971 से पहले बसे लोगों को ही भारत का नागरिक माना जाना था वह भी उसी स्थिति में जब कि व्यक्ति खुद को दस्तावेजों के आधार पर नागरिक साबित कर सके।
       असम में एन.आर.सी. की इस प्रक्रिया के तहत पहले 40 लाख एन आर सी लिस्ट में आने से वंचित हो गए। बाद में एन.आर.सी. की इसी प्रक्रिया के तहत यह संख्या 40 लाख से घटकर 19 लाख पर आ गयी। असम में 19 लाख की यह आबादी जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों ही है नागरिकता के लिस्ट से वंचित होने के बाद भयानक अलगाव, असुरक्षा एवं अवसाद में हैं। इसी तनाव व दबाव में कुछ लोगों की मौतें भी हुई हैं। भाजपा जिसे इंसानियत, साम्प्रदायिक सौहार्द व आम अवाम की एकजुटता व दुख दर्द से घोर नफ़रत है। ये अब 19 लाख की इस नागरिकताविहीन आबादी में लगभग 12 लाख हिन्दू आबादी होने से फिलहाल दिखावे के लिए इस एन.आर.सी. प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। जबकि दूसरी ओर पूरे देश में एन.आर.सी. लागू करने की बात कह रहे हैं।
         इस प्रकार नागरिकता से वंचित होने वाले इन लाखों लोगों  के लिए डिटेंसन कैम्प (यातना कैम्प) बनाये जा रहे हैं। असम में अभी 6 कैम्प निर्माणाधीन हैं। असम में फिलहाल 3000 लोग ऐसे कैम्पों में रह रहे हैं जिनमें 29 लोगों की मृत्यु ही चुकी है। मोदी सरकार की चाहत है कि देश के हर जिले में ऐसे डिटेंसन कैम्प बनाये जाएं।
      दूसरी ओर फासीवादी मोदी सरकार  नागरिकता कानून को भी साम्प्रदायिक आधार पर संशोधित करने के लिए प्रयासरत है। जिसके तहत पड़ोसी मुल्कों की गैर मुस्लिम आबादी के लिए भारत की नागरिकता हासिल करना आसान बनाया जा रहा है।
     देश में आज़ादी से पहले बड़ी तादाद में गरीब मज़दूर आबादी का भारी मात्रा में विस्थापन हुआ यह जबरन भी हुआ था। आज़ादी के बाद भी करोड़ों लोगों का विस्थापन भांति भांति की परियोजनाओं तथा रोज़गार की तलाश में हुआ। इनमें से अधिकांश के पास नागरिकता साबित करने हेतु दस्तावेज होने की संभावना बहुत कम है। ऐसी स्थिति में एन.आर.सी. की प्रक्रिया बेमानी है।
    दूसरा आज वैश्वीकरण के जमाने में देश के हुक्मरान विदेशी पूंजी व पूंजी के मालिकों का लाल कालीन बिछाकर स्वागत कर रहे हैं। पूंजी को कहीं भी घुसपैठ व विचरण करने की स्वतंत्रता है। इसकी राह की सारी रुकावटें खत्म की जा रही हैं। दूसरी ओर मज़दूर मेहनतकश नागरिकों जो ज़िंदा रह सकने भर के लिए रोजगार की तलाश में एक देश से दूसरे देश अवैध या वैध तरीके से प्रवेश करते हैं उन्हें "घुसपैठिये" या "दीमक" कहा जाता है।
        संघ भाजपा के इस अभियान के निशाने पर मुस्लिम आबादी है। वे पूरे देश में बाहर से आयी मुस्लिम आबादी को घुसपैठिये करार देकर समूचे मुस्लिम समुदाय को और आतंकित और दोयम दर्जे की स्थिति में  धकेलने पर उतारू है।
        यह सम्मेलन इस घृणित फासीवादी सोच तथा इन कदमों का विरोध करता है साथ ही एन.आर.सी की इस प्रक्रिया को रद्द किए जाने तथा देश में रह रही गरीब मेहनतकश आबादी को देश का नागरिक माने जाने का पक्षधर है।

          8-- शहीदों को श्रद्धांजलि
          हमारे पिछले सम्मेलन से अब तक देश दुनिया में चल रहे जन पक्षधर संघर्षों में भारी संख्या में लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। इन लोगों में अफ्रीका, पश्चिम एशिया व लातिन अमेरिका में साम्राज्यवादी हमले व घुसपैठ के खिलाफ लड़ने वाले जनपक्षधर लोगों से लेकर विभिन्न देशों में पूंजीवादी शासकों के द्वारा थोपे गए कटौती कार्यक्रमों के विरोध में खड़े हुए लोग तक सब शामिल हैं। इनमें वर्षों पुरानी तानाशाहियों को धूल चटाने वाले जन संघर्षों में कुर्बान हुए लोग भी शामिल हैं। अपनी महंगी होती शिक्षा के खिलाफ संघर्ष में जान गंवाने वाले छात्र नौजवान भी शामिल हैं इसमें जनवादी अधिकारों की की रक्षा करने में जुटे पत्रकार-बुद्धिजीवी भी शामिल हैं जिनकी शासक गिरोह ने निर्मम हत्या करवा दी तो इनमें सेना-पुलिस की गोलियों का शिकार बनते संघर्षरत मजदूर किसान भी शामिल है। इसी के साथ दुनिया भर में पूंजीवाद साम्राज्यवाद का नाश कर समाजवाद की स्थापना का सपना संजोए ढेरों क्रांतिकारी भी इन संघर्षों में शहीद हो गए ।
         इसके अलावा पूंजीवादी व्यवस्था ने इन वर्षों में भी देश दुनिया के कल कारखानों-खेतों में, साम्राज्यवादी हमलों में,  बेकारी भूखमरी से लेकर सामान्य बीमारियों से आम जनता का कत्लेआम जारी रखा है
        क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन का सांतवा सम्मेलन इन सभी लोगों को याद करता है तथा शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष तेज करने का संकल्प लेता है।
   9 -बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद में अदालती निर्णय के बारे में
         सर्वोच्च न्यायालय ने वर्षों पुराने इस विवाद में राम मंदिर के पक्ष में निर्णय देकर दिखला दिया कि भारत की शीर्ष अदालत भी किस कदर सत्ताधारी फासीवादी गिरोह के सम्मुख आत्मसमर्पण कर चुकी है। अदालत ने भले ही इसे भूमि विवाद  मानने की बात कही पर अंत में जो फैसला सुनाया गया वह कानून पर कम 'आस्था' 'जनमत' से अधिक प्रेरित लगा।
         दरअसल यह फैसला कोई न्यायिक फैसला ना होकर विशुद्ध राजनीति फैसला है। जिसे सत्ताधारी फासीवादी गिरोह के अनुरूप लिया गया है इनके मनोकूल काम को न्यायिक जामा पहनाने का काम सर्वोच्च अदालत ने किया है। अदालत ने हिन्दू फासीवादियों के कुकृत्यों को कानूनी वैधता प्रदान करने का काम शुरू कर दिया है। कश्मीर में धारा 370 हटाने से लेकर इस मसले पर अदालती रुख इस बात को साबित कर देता है।
         इस फैसले के बाद शीर्ष अदालत से इस बात की उम्मीद करना बेमानी हो चुका है कि वह फ़ासीवादियों के गैरकानूनी कृत्यों पर लगाम लगाएगी। इसके निहितार्थ न केवल मुस्लिम आबादी के लिए खतरनाक हैं जो इस फैसले से खुद को छला हुआ महसूस करेगी बल्कि इसके निहितार्थ देश की व्यापक मज़दूर मेहनतकश अवाम के लिए भी खतरनाक हैं जिसे अब फासीवादी गिरोहों के हमलों से भी कोई अदालती सुरक्षा हासिल नहीं होगी।
तथ्य और तर्क की जगह 'जनमत' व ' आस्था' से फैसले लेने की यह परम्परा फासीवादी निजाम की ओर देश की तेज़ी से बढ़ने का एक कदम है।
       क्रालोस का सांतवा सम्मेलन अदालतों के फासिवादी नज़रिए से निर्णय देने की ओर बढ़ने का विरोध करता है तथा फासीवादी अभियान को रोकने के लिए पुरजोर संघर्ष का संकल्प लेता है।

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