Wednesday, 20 November 2019

क्रालोस के 7वें सम्मेलन 16-17 नव. 2019 द्वारा पारित राजनीतिक रिपोर्ट

         क्रालोस के 7वें सम्मेलन 16-17 नव. 2019 द्वारा पारित राजनीतिक रिपोर्ट
     
                       1--  राजनीतिक रिपोर्ट
                    A- 【 अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति 】
     2007-08 से जारी विश्व पूंजीवादी-साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का संकट 2019 में पुनः गहराने की ओर अग्रसर है। विश्व आर्थिक मंच स्वीकार करने लगा है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नरम पड़ने, व्यापारिक तनाव के उभरने तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय बाजारों की अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के संकट को सूचित कर रहे हैं।
संकटग्रस्त पूंजीवादी अर्थव्यवस्था -: विश्व बैंक के आकंड़ों के हिसाब से वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर  2017 में  3.1 %, 2018 में 3%, 2019 में 2.9 % के साथ क्रमशः गिरावट में है जबकि 2020 में इसकी 2.8 % तक गिरावट की आशंका है।
    विश्व बैंक की रिपोर्ट आगे बताती है कि संयुक्त राज्य अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर वर्ष 2018 में 2.9%, 2019 में 2.5% रही है। यूरो क्षेत्र की विकास दर वर्ष 2018 में 1.9% तथा 2019 में 1.6% रही है। जापानी अर्थव्यवस्था लम्बे समय से ठहराव ग्रस्त रही थी। यह वर्ष 2018 में 0.8% वर्ष 2019 में 0.9% पर रेंग रही है। चीन की अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू उत्पाद के विकास दर भी उतार पर है। यह वर्ष 2018 में 6.5 % थी तथा 2019 में 6.2 % रही। भारत की अर्थव्यवस्था 2018 में 7.3% तथा 2019 में 7.5 % रही। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था की यह विकास दर आंकड़ों के हेर-फेर के द्वारा भी हासिल की गयी है। अब इसमें भी गिरावट का रुझान साफ दिखता है। सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं ठहराव की ओर बढ़ रही है। तुर्की, रूस, ब्राजील की अर्थव्यवस्था भी उतार पर है। वर्ष 2007-08 से शुरू आर्थिक संकट से वित्तीय संस्थानों व पूंजीपतियों को उबारने के लिए दुनिया भर की सरकारों ने अलग-अलग वक़्त पर जो धन झोंका था उसके परिणामस्वरूप सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भारी ऋण बोझ से दबी हुई हैं। अगर वर्तमान संकट बढ़ता है तो सरकारों का आर्थिक संकट अनियंत्रित होने का खतरा बन सकता है।
     साम्राज्यवादी-पूंजीवादी अर्थव्यवस्था संकटों के भंवर में बार-बार गिरती जाती है। शासक वर्ग बीच-बीच में अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने का जश्न मनाते हैं लेकिन थोड़े अंतराल में पुनः संकट उभरने लगता है। चीन, भारत जैसे देश विश्व अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में ताकत बताये जा रहे थे। ये देश भी इस संकट से कभी अछूते नहीं रहे थे। अब विकास दर में उतार के साथ ये  भी स्प्ष्ट तौर पर वैश्विक आर्थिक संकट की गिरफ्त में है
दक्षिणपंथी राजनीति का फैलाव  -:      विश्व भर में एक ओर पूंजीवादी उदारवादी राजनीति का प्रभाव 'उदारीकरण   निजीकरण' की जनविरोधी नीतियों के आगे बढ़ने के साथ ही कम होता गया है। दूसरी ओर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने दक्षिणपंथी राजनीति को सचेत तौर पर आगे बढ़ाया है। दक्षिणपंथी फासीवादी राजनीति का आज की स्थिति में विश्व के अधिकतर भागों में फैलाव हुआ है। वर्ष 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव में जीतकर सत्ता में काबिज हुआ। सत्ता में आते ही ट्रम्प ने उग्र राष्ट्रवादी नीति अपनाने की खुली घोषणा की। इसने शरणार्थियों व प्रवासियों के विरुद्ध बयानबाजी आरंभ कर दी। ट्रम्प की इन गतिविधियों से अमेरिका के भीतर नव फासीवादी तत्वों को अब और ज्यादा प्रश्रय मिलने लगा।
     यूरोप में नव फासीवादी ताकतें और आगे बढ़ी हैं। जर्मनी में ए.एफ.डी. (अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी) फासीवादी पार्टी का जर्मन चुनाव में वोट प्रतिशत तथा सीटें बढ़ी हैं। यूरोपीयन पार्लियामेंट में इसने 2014 के 7% वोट के साथ 7 सीट की जगह 2019 में 11 % वोट के साथ 96 में से 11 सीटें हासिल की हैं। फ्रांस में नेशनलिस्ट फ्रंट (अब नेशनल रैली) को यूरोपीयन संसद में 23 % मतों के साथ 21 सीट हासिल हुई हैं। इटली में लीग (लेगा नॉर्ड) का इटली के चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने के साथ साथ यह इटली की तीसरी बड़ी पार्टी बन गयी है। 2015 में पोलैंड में भी अति दक्षिणपंथियों को चुनाव में ज्यादा सीटें हासिल हुई। इजराइल में बेंजामिन नेतान्यहू के नेतृत्व में लिकुड पार्टी को 2019 में बहुमत नहीं मिला। कुछ समय बाद दोबारा चुनाव होने पर इनकी स्थिति कुछ और कमजोर हो गयी। किसी भी पार्टी को यहां स्प्ष्ट बहुमत नहीं मिला। जापान में शिंजो अबे चुनाव जीत कर सत्ता में आ गये। भारत में हिंदू फासीवादी पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार चुनाव जीतकर सत्ता में आयी है। ब्राजील में बोलसेनारो की जीत से दक्षिणपंथी सत्ता में पहुंचे हैं। यूरोपीय संघ की प्रतिनिधि  सभा में भी फासीवादी ताकतें पहुंच चुकी हैं। स्पेन में अभी चुनाव में दक्षिणपंथी पार्टी वॉक्स का वोट प्रतिशत 15 पहुंच चुका है जबकि इसकी सीटें 24 से बढ़कर 52 हो गई हैं।
    यह धुर दक्षिणपंथी प्रतिगामी राजनीति मजदूर मेहनतकश अवाम के हितों के खिलाफ है। फासीवादी तानाशाही मजदूरों के राजनीतिक संगठन शक्ति को ध्वस्त करने के लिए बदनाम रही है। ये रंगभेद, नस्ली व धार्मिक, अंधराष्ट्रवादी विचारों व नारों के द्वारा असली शोषण को छुपाने और अपने सामूहिक हितों के लिए संगठित होती मेहनतकश जनता को विभाजित करने का काम करती है। यह जनता के बीच भय व्याप्त करने, जनवादी अधिकारों की खिलाफत, सहिष्णुता, विविधता, तार्किकता, धर्मनिरपेक्षता को तिरस्कृत करने के अभियान में लगी रहती हैं। एकाधिकारी पूंजी की सहायता, समर्थन तथा इनके प्रचार माध्यमों का भरपूर सहयोग और राज्य मशीनरी का संरक्षण फासीवादी ताकतों को मिलता रहता है। शरणार्थियों का विरोध, प्रवासियों का विरोध, अंधराष्ट्रवाद इनकी खुद की शक्ति को प्रदर्शित करने के तौर तरीके हैं। यूरोप में यह यूरोपीय संघ के विरोध तक चले जाते हैं।  
   मौजूदा वक्त में दुनिया भर में जनता के संगठित संघर्ष काफी कमजोर हैं। इसलिये शासक वर्ग फासीवादी ताकतों का नपा तुला प्रयोग करेगा।

संरक्षणवादी प्रवृतियां 
     'वैश्वीकरण-उदारीकरण-बाजारीकरण' के संचालन तथा नियमन के लिए विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएं बनाते हुए साम्राज्यवादियों द्वारा ऐसा जताया गया था जैसे कि विश्व व्यापार-विनिमय समानता के आधार पर होगा कि यह वैश्विक सहमति के नियमों के अनुरूप चलेगा लेकिन साम्राज्यवादी ताकतें वैश्विक संस्थाओं नियमों समझौतों की कतई परवाह नहीं करते हैं। मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट गहराने के साथ 'मुक्त बाजार अर्थवयवस्था' की वकालत करने वाले साम्राज्यवादी अपने हितों के अनुकूल तथा उभरती पूंजीवादी शक्तियों को कमजोर करने के लिए आज संरक्षणवादी रवैया अपना रही हैं। खासकर अमेरीका द्वारा 'अमेरिका पहले' की नीति अपनाने की घोषणा की गई। इसके द्वारा इस्पात, एलुमिनियम आदि के क्षेत्र में संरक्षणवादी कदमों का एलान किया गया। चीन, भारत, मेक्सिको के निर्यात पर रोक के लिए दंडात्मक तटकरों को लागू किया गया। इरान, वेनेजुएला को सबक सिखाने हेतु तेल निर्यात पर पाबंदी लगाने जैसे कदम उठाए गये। 'वैश्विकरण-उदारीकरण' के अगुवा प्रस्तावकों  में अमेरिकी साम्राज्यवादी  तथा ब्रिटेन के साम्राज्यवादी शासक थे। इन्हें साम्राज्यवादी वर्चस्वकारी हितों वाले विश्व आर्थिक मंच में वरीयता मिलती रही। अमेरीकी शासकों ने विश्व व्यापार संगठन के साथ 'एपेक' व्यापार गुट बनाकर अपने हितों को संरक्षित किया। विश्व आर्थिक संकट के गहन होने के साथ संरक्षणवादी प्रवृत्ति आगे बढ़ती जा रही है। यह पूंजीवादी साम्राज्यवादी दुनिया के गहराते अंतरविरोधों को बताती है।
साम्राज्यवादियों के बीच बढ़ते अंतर्विरोध:    दुनिया में अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने वर्चस्व के लिए लगातार प्रयासरत   हैं। विशेष तौर पर 90 के दशक में सोवियत समाजिक साम्राज्यवाद के ढह जाने के बाद इनकी स्थिति कुछ वर्चस्व में आयी मगर यह भी ज्यादा वक्त तक नहीं रही। इसे पिछले एक-दो दशक से एक तरफ यूरोपीय साम्राज्यवादी दूसरी तरफ रूसी साम्राज्यवाद की चुनौती तथा साथ ही जापान व चीन की भी चुनौती मिल रही है। विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरीका की आर्थिक हैसियत भी कमजोर हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने और 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति अपनाने के साथ अलग-अलग साम्राज्यवादियों के बीच कुछ असहमतियां भी बढ़ी हैं। ट्रम्प द्वारा यूरोपियन यूनियन के साथ मुक्त व्यापार संबंध कायम करने की वार्ता समाप्त करने के बाद यूरोपियन यूनियन ने जापान के साथ मुक्त व्यापार समझौता (ट्रांस अटलांटिक ट्रेड इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप) कर लिया।
     साम्राज्यवादियों की संस्था जी-7 में एक समय साम्राज्यवादी रूस को भी शामिल किया गया था और इसे जी-8 का नाम दिया गया था। बाद में अमेरिकी व पश्चिमी साम्राज्यवादियों के द्वारा 2014 में रूस को जी-8 से बाहर कर दिया गया। ट्रम्प ने रूस को दोबारा जी-7 में शामिल करने का प्रस्ताव दिया जिसे जर्मनी, ब्रिटेन व फ्रांस ने नकार दिया। अमेरिकी शासकों ने वैश्विक स्तर पर पर्यावरण असन्तुलन व प्रदूषण सम्बन्धी सम्मेलनों में हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करने सम्बन्धी फैसले को लागू करने से खुद को अलग कर लिया। इसके चलते शेष साम्राज्यवादी अमेरिकी नेतृत्व की परवाह किये बिना आगे बढ़ने को प्रवृत्त हुए। यही नही! अमेंरिकी शासको ने ईरान के साथ हुए बहुपक्षीय नाभिकीय समझौते (जॉइंट कंप्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्सन) से खुद को अलग कर लिया और एकतरफा तौर पर ईरान पर व्यापारिक पाबंदियों का कार्यक्रम घोषित कर दिया। उक्त बहुपक्षीय समझौते में अमेरिका, फ्रांस, रूस, चीन, इंग्लैंड, जर्मनी व यूरोपीय संघ शामिल थे। इस समझौते के तहत ईरान की परमाणु सामरिक योजना को सीमित व नियंत्रित किया जाना था। साथ ही ईरान पर लगी व्यापारिक पाबंदियां रद्द किये जाने सहित जब्त की गई खरबों डॉलर की धनराशि मुक्त की जानी थी।
साम्राज्यवाद का तीसरी दुनिया पर हमला:     अमेरिकी शासकों ने किसी की परवाह न करते हुए एक तरफा तौर पर ईरान से हुए नाभिकीय समझौते से जब खुद को अलग कर लिया तब इस वजह से एक ओर मध्य पूर्व एशियाई क्षेत्र में तनाव बढ़ गया दूसरी ओर विभिन्न साम्राज्यवादियों द्वारा किए गए निवेश-करार-समझौते खतरे में पड़ गये। अमेरिकी शासकों के इस कदम का रूस, चीन सहित यूरोपीय साम्राज्यवादियों ने आलोचना की। इस सब के बावजूद अमेरिका की हठधर्मिता आगे बढ़ी। इसने ईरान के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया। दूसरे देशों को भी ईरान से व्यापार संबंध खत्म करने का फरमान जारी कर दिया। अपनी सामरिक शक्ति का भय दिखाकर अमेरिकी साम्राज्यवादी मध्य पूर्व एशिया में अशांति की स्थितियां बनाए हुए हैं। इन्होंने पश्चिमी एशिया में अपने लठैत इजराइल के पक्ष में येरूशलम में अमेरिकी दूतावास बनाने की घोषणा कर दी। पिछले दो दशक से अमेरिकी साम्राज्यवादियो को रूसी साम्राज्यवादियो और उभरती शक्ति चीन से भी चुनौती मिलती रही हैं। अमेरिकी व यूरोपीय साम्राज्यवादियों की साम्राज्यवादी रूस को घेरने तथा इसके पड़ोसी राज्यों में पश्चिमी साम्राज्यवादी समर्थक सत्ताएं स्थापित करने की कोशिशें जारी हैं। रूसी साम्राज्यवादी इनकी विशेषकर अमेरिकी साम्राज्यवादियो की मध्य पूर्व सीरिया आदि में हस्तक्षेप की योजनाओं में चुनौती बनता रहा है। यूक्रेन के मामले में पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने साम्राज्यवादी रूस समर्थक विक्टर यानोविच को हटाकर पारसेंको को यूक्रेन का राष्ट्रपति बनाने में कामयाबी पायी जबकि साम्राज्यवादी रूस क्रीमिया को जनमत संग्रह के जरिए अपने में मिलाने में सफल रहा।
    पश्चिमी साम्राज्यवादी जॉर्जिया के स्वायत्त प्रांत दक्षिण आसेसीया, अबखजिया (2018 से रूस के नियंत्रण में) दोबारा षडयंत्र कर इन्हें अलग कर अपने प्रभाव में लेने को लगातार प्रयासरत रहे मगर प्रयास असफल रहा। अमेरिकी व यूरोपीय शासकों ने साम्राज्यवादी रूस को घेर लेने के लिए फरवरी-मार्च 2018 में राजनयिक बहिष्कार अभियान छेड़ा। पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने अपने समर्थक समूह का प्रसार कर रूसी राजनयिकों को कई देशों से निष्कासित करवाया। 27 देशों ने रूस के 140 राजनयिकों को अपने-अपने देश से निकाल दिया। विवाद का आधार फर्जी था जो भूतपूर्व रूसी जासूस सर्जेई स्क्रीपाल की हत्या के प्रयास का झूठा आरोप रूस पर मढ़कर तैयार किया गया था। रूस अमेरिकी साम्राज्यवाद की सीरिया में तख्तापलट योजना के खिलाफ चुनौती बनकर खड़ा हुआ था। अन्य अनेक मामलों में पश्चिमी साम्राज्यवादियों तथा रूसी साम्राज्यवादियो के बीच अंतर्विरोध उभरते रहे हैं। मध्य पूर्व के क्षेत्र में भी रूसी शासक चुनौती बनकर खड़े हैं।
    चीनी शासक अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के चलते विश्व राजनीतिक पटल पर उभरती ताकत के रूप में विकसित हुए हैं। जहां अमेरिकी साम्राज्यवाद की आर्थिक हैसियत कमजोर हुई है वहीं चीन विश्व की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभरा है। इसने अपनी औद्योगिक ताकत के साथ अपने प्रभाव को एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिका तक पहुंचाया है। व्यापार के क्षेत्र में चीन, अमेरिका व यूरोप के लिए चुनौती बनकर उभरा है। अमेरिकी शासक चीन की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए व्यापार युद्धों के जरिये चीनी माल पर दंडात्मक कर लगाकर उन्हें दबाव में लेने के प्रयास करते रहे हैं। ये चीनी शासकों से सीधे टकराने की जगह भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया का गुट बनाकर चीन को घेरने की मंशा रखते हैं। ये दक्षिणी चीन सागर के द्वीपों के विवादों का लाभ उठाकर वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्रूनेई एवं फिलीपींस को चीन के खिलाफ करने की तिकड़म करते हैं। दूसरी ओर ताईवान में झंझट पैदा कर चीन के भीतर कलह पैदा करने का प्रयास करते रहे हैं।
     दक्षिण एशिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव व पाकिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की अमेरिकी योजना में भारत भी सहयोग करता रहा है। ये सारी टकराहटें पूंजीवादी लूट-खसोट व हिस्सा-बांट के लिए ही होती हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी दूसरे देशों में हस्तक्षेप कर वहां अपनी समर्थक सत्ता स्थापित करने की आक्रामक कार्यवाही को अंजाम देते रहे हैं। हाल ही में लैटिन अमेरिकी देश 'वेनेजुएला' में अमेरिकी हस्तक्षेप साफ दिखा। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को हटाकर जब अमेरिकी मोहरे वाली जुआनगुएडो को कार्यकारी राष्ट्रपति बनाने के लिए सैनिक विद्रोह को भड़का कर सत्ता पलटने का षडयंत्र किया गया था। अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के तेल व्यापार पर प्रतिबंध लगाकर उसकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया गया। वेनेजुएला 1998 के बाद कुछ हद तक कल्याणकारी सुधारवादी कदमों वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था बना था लेकिन संशोधनवादी इसकी "अमेरिकी बोलीवार समाजवाद" कहकर इनकी तारीफ करते थे जबकि यह समाजवाद नहीं था। यही नहीं! इसके साम्राज्यवाद से भी संबंध बने हुए थे। 2007-08 के वैश्विक आर्थिक संकट की गिरफ्त में जब यह मुल्क भी आ गया तब आर्थिक संकट बढ़ने के साथ ही यहां भी जनता की सुविधाओं में कटौती की जाने लगी परिणामस्वरूप असंतोष बढ़ने लगा। इस जनअसंतोष का लाभ उठाकर अमेरिकी साम्राज्यवादियो द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मदूरो को हटाने का षड्यंत्र किया गया जो सफल नहीं हुआ। चीन व रूसी साम्राज्यवादी मदुरो के पक्ष में खड़े रहे।
    बोलीविया में अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप एवं बोलीविया के दक्षिणपंथी ताकतों के षड्यंत्र ने इवो मोरेलस की सरकार का तख्तापलट कर दिया जबकि अभी हाल ही में इवो मोरेलस की पार्टी चुनाव जीत कर फिर सत्तासीन हुई थी। अमेरिकी साम्राज्यवादियों के हस्तक्षेप एवं दक्षिणपंथियों के षड्यंत्र के चलते ही इवो मोरेलस को मेक्सिको में शरण लेनी पड़ी। सत्ता  मध्य पूर्व क्षेत्र लीबिया में अमेरिकी व फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों के समर्थन से संयुक्त अरब अमीरात व मिश्र विद्रोह भड़काने में लगे हुए हैं। ये खलीफा हफ्तार को शरण व सामरिक मदद देकर इसे लीबिया की सत्ता पर काबिज करने का षडयंत्र जारी रखे हुए हैं। यमन में सऊदी अरब द्वारा विनाशकारी आक्रमण एवं नरसंहार को अमेरिकी साम्राज्यवाद का समर्थन जारी है। साम्राज्यवादी शासक 'उदारीकरण-वैश्वीकरण' की नीतियों के जरिये हो रही शोषण की खुली लूट से संतुष्ट नहीं हैं। उधर उत्तरी कोरिया एवं अमेरिका के बीच शिखर वार्ता हुई है। अमेरिकी साम्राज्यवादी उत्तरी कोरिया के नाभिकीय शस्त्रों को समाप्त कर उसे चीन के प्रभाव से मुक्त कर अपने पक्ष में लाना चाहते हैं। इस क्षेत्र का इस्तेमाल चीन की घेरेबंदी के लिए करना चाहते हैं। दूसरी ओर उत्तरी कोरिया अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने में सहायता तथा सुरक्षा की गारंटी चाहता है क्योंकि उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया में मौजूद अमेरिकी सामरिक और मिसाइल रक्षा प्रणाली के निशाने पर है। उत्तरी कोरिया की सचेत कोशिश यह भी है कि इसे चीनी सहयोग को खोना ना पड़े। वार्ताएं अभी भी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंची है। कुल मिलाकर कोरियाई क्षेत्र में शांति व अमन की स्थितियों का कायम होना असंभव है क्योंकि वर्तमान दौर में विश्व शक्ति संतुलन साम्राज्यवाद के पक्ष में है।
साम्राज्यवाद-पूंजीवाद के क्रूर चेहरे को बताता शरणार्थी संकट :     साम्राज्यवाद-पूंजीवाद का अमानवीय चेहरा स्प्ष्ट है  इसने शरणार्थियों-प्रवासियों के विरुद्ध दमनात्मक व्यवहार कर इन्हें अपराधी बताकर बंदी शिविरों में कैद कर दिया है। इसे हर प्रकार की मानवीय सहायता से वंचित करने, बच्चों को माता-पिता से अलग कर बंदी बना देने तथा सरहदों से बाहर धकेल कर मरने के लिए छोड़ देने की अमानवीय कार्यवाहियां की हैं। शरणार्थियों के प्रति अमानवीयता का यह परिदृश्य विश्वव्यापी है। यह पूंजीवाद के पतन की घृणित तस्वीर भी है। ये साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक दुनिया के कोने-कोने तक अपने लिए लूट की खुली छूट चाहते हैं लेकिन जब मानवीय संकट का सवाल आता है तो अपनी सरहदों की नाकेबंदी कर लेते हैं। वर्तमान शरणार्थी संकट पूंजीवादी-साम्राज्यवादी जनविरोधी 'उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण' की नीतियों की निर्मम लूट-खसोट के दौर में साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों की आधिपत्यकारी एवं आक्रमणकारी युद्धों व हमलों से होने वाली तबाही-बर्बादी का नतीजा है। लीबीया, सीरिया, इराक, यमन में साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेप के चलते हुए गृह युद्धों तथा हमलों के चलते लाखों शरणार्थी दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर हैं। इसी के साथ-साथ लैटिन अमेरिकी देशों अलसल्वाडोर, ग्वाटेमाला, होंडुरास, निकारागुआ जैसे देशों के साथ ही अफ्रीकी देशों से भी भारी संख्या में विस्थापन व पलायन बढ़ा। इन स्थितियों के लिए साम्राज्यवादियों के साथ-साथ देशी शासक भी उतने ही गुनाहगार हैं। ये इस या उस साम्राज्यवादी मुल्क के कनिष्ठ सहयोगी बने हुए हैं।
     इस दौर में शरणार्थी समस्या से जुड़ी अनेक परिघटनाएं भी सामने आयीं। संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने तो मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने की परियोजना आरंभ कर दी तथा सरहदों की चौकशी पर सैन्य बल लगा दिए। यूरोपीय देशों ने शरणार्थियों के प्रवेश को रोकने के लिए अपनी सीमाएं बंद कर दी। शरणार्थियों को जहाजों से उतरने नहीं दिया गया गया जो शरणार्थी प्रवेश करने में किसी तरह सफल हुए उन्हें बंदी शिविरों में कैद कर लिया गया। शरण पाने की इस जोखिम भरी यात्रा में हजारों शरणार्थियों की दर्दनाक मौत हो गयी। कई देशों ने तो नए प्रवासियों को वैध-अवैध की भीड़ बताकर उनको देश से निष्कासित किये जाने के पक्ष में माहौल बनाया। दक्षिणपंथी नव फासीवादी शक्तियों ने इससे शह पाकर प्रवासियों पर हमले किये। इटली में छह लाख रोमा आबादी को निष्कासन की धमकी दी गई। यूरोपीय सरकारों के दबाव में शरणार्थियों को रोकने के लिए अल्जीरिया सरकार ने घृणित तौर तरीके अपनाए। इसने शरणार्थियों को पकड़कर सहारा मरुस्थल में मरने के लिए छोड़ दिया जहां पिछले कुछ वर्षों में 35,000 से अधिक की मौत हो गई है। म्यांमार शासकों द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों का देश से सफाया अभियान चलाया गया। लाखों रोहिंग्या परिवार अपमानित जीवन परिस्थितियों का सामना करने को मजबूर हो गए। वे अपने देश को छोड़कर भारत व बांग्लादेश जाने को मजबूर हुए। भारत की हिन्दू फासीवादी सरकार ने शरणार्थियों को आतंकवादी के रूप में प्रचारित कर उन्हें भीतर नहीं प्रवेश करने देने तथा पहले प्रवेश कर चुके लोगों को अपमानजनक जीवन जीने को बाध्य कर दिया।
     भारत में एन.आर.सी. की प्रक्रिया के तहत लाखों मेहनतकश मुस्लिमों को घुसपैठिये के रूप में चिन्हित करने व इनकी नागरिकता को अवैध घोषित करने का अभियान चला हुआ है। हिंदू फासीवादी इस मुद्दे के जरिये अपने फासीवादी आंदोलन को और आगे बढ़ा रहे हैं। हिंदू फासीवादी नागरिकता के मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देकर इसे ध्रूवीकरण का औजार बनाये हुए हैं।
    बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संघर्षों ने विश्व राजनीतिक संतुलन को मानवीय सरोकारों के पक्ष में खड़ा करने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में खड़े होना तथा इन्हें शरण देना मानवीय सरोकारों तथा संहिता के रूप में स्थापित किया था। क्रांतिकारी संघर्षों का आवेग बेहद कमजोर होने की स्थिति में आज का वर्तमान दौर शासकों द्वारा जनता के जनवादी अधिकारों, अन्य सहूलियतों को छीनने के रूप में तथा मानवीय सरोकारों को कुचलने के रूप में सामने आया है।
सामाजिक संकट:   बीते सालों में संपूर्ण विश्व में अमीर-गरीब के बीच असमानता की खाई ज्यादा तेजी से चौड़ी होती
                 गयी है। वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासकों ने कल्याणकारी राज्य के दौर की शेष बची नागरिक सुविधाओं शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन व रोजगार आदि पर भी तीखा हमला बोला है। सरकारों ने इन जिम्मेदारियों से खुद को अलग कर लिया है। इन्हें बाजार के दोहन के लिए छोड़ दिया है। इसके चलते असमानता और ज्यादा गति से बढ़ी है, भारी तादाद में बेरोजगारी बढ़ी है, अभावग्रस्तता बढ़ी है तथा भुखमरी बढ़ी है। विश्व भर में वर्ष 2014 में भुखमरी की सीमा पर 78.37 करोड़ लोग थे जिनकी तादाद वर्ष 2017 में बढ़कर 82.10 करोड़ हो गई।
स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में हर वर्ष 86 लाख लोग विश्व भर में मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व भर में हर वर्ष 10 करोड़ लोग गरीबी की हालात में फंस जाते हैं। इन स्थितियों में भारी अलगाव, अनिश्चितता, असुरक्षा, अवसाद, तनावग्रस्तता ने मानसिक बीमारियों को जन्म दिया है। इसके चलते आत्महत्या, नशाखोरी एवं यौन हिंसा आदि की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका जो विश्व साम्राज्यवाद का सिरमौर बनने का दावा करता है वहां 15-19 वर्ष के किशोर नौजवान उम्र के लड़के-लड़कियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति वर्ष 2007-15 में 5.1% थी जो कि 1975 की तुलना में दुगुनी हो चुकी हैं। यह सामाजिक संकट विश्वव्यापी है। ब्रिटेन में बेघरों की बढ़ती तादाद, अमेरिकी फूड स्टांप तथा ब्रिटेन के फ्री फूड स्टालों के सामने लगी लम्बी कतारें संकट की गवाही देते हैं। साम्राज्यवादी संस्थाएं स्वीकार करती हैं कि मजदूरी वेतन स्तर का ठहराव अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ा रहा है। श्रम बाजार में ठेकाकरण तथा अंशकालिक रोजगार का बोलबाला है। पूंजी श्रम पर हमलावर है। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक सब जानते हुए भी जनविरोधी हमला तेज करते जा रहे हैं।       
साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासकों ने मुनाफे की अपनी हवस में प्रकृति का अंधाधुध व अनियंत्रित दोहन किया है। इसके चलते पर्यावरण असंतुलन व प्रदूषण की समस्या विकराल बन चुकी है। इन्हीं के द्वारा भांति-भांति के पर्यावरणवादी सस्थाओं का जाल भी खड़ा किया गया है। इस दायरे में यानी पूंजीवाद के रहते विकराल होते पर्यावरण संकट का हल नामुमकिन है। साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक सामाजिक समस्याओं के प्रति भी बेहद संवेदनहीन होते हैं। वे समस्याओं का निदान नहीं कर सकते। इसके उलट वे जनता के दमन-उत्पीड़न के तंत्र को मजबूत करते जाते हैं। लूट-खसोट व हिस्सा-बांट के युद्ध हेतु खतरनाक नाभिकीय व सामरिक हथियारों की खरीद तथा दमनतंत्र को और ज्यादा मजबूत करने हेतु इनका रक्षा बजट का आकार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। इन्होंने इस बीच जनता के जनवादी अधिकारों को निष्प्रभावी व सीमित कर वोट डालने के औपचारिक स्तर तक पहुंचा दिया है। पूंजीवादी संसदीय व्यवस्था तथा इसकी जनप्रतिनिधित्व प्रणाली अब लगभग खोखली हो चुकी है। यही नहीं! जनमत के विपरीत भी सरकारों का संचालन-गठन कर दिया जाता है। सरकारें जनता की सामूहिक अभिव्यक्ति को कुचलने के लिए सामान्य दमन व काले कठोर कानूनों को बनाने से भी आगे बढ़कर आपातकाल लागू कर जनता के जनवादी अधिकारों को कुचलने की ओर बढ़ रही हैं। फ्रांस की सरकार ने बढ़ते वर्ग संघर्ष से निपटने के लिए सिर्फ एक कार्टून विवाद के बाद हुए आतंकी हमले की आड़ लेकर आपातकाल लागू कर दिया था व जनता के अधिकारों को कुचल दिया था। अभी हाल ही में श्रीलंका के शासकों ने एक आतंकवादी घटना की आड़ लेकर पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया था। विरोध के स्वरों को रोकने के लिए शासक वर्ग राजनीतिक सेंसरशिप लगा देने की सीमा तक पहुंच जाते हैं। ब्राजील के दक्षिणपंथी राष्ट्रपति बोलसेनारो ने छात्रों के लिए समाजशास्त्र-दर्शनशास्त्र की डिग्री के लिए फंड देना बंद कर दिया। इसका कहना है कि किसान-मजदूर के बेटे मानव जाति के विज्ञान को पढ़कर मार्क्सवादी बन जाएगें वह ऐसा नहीं चाहते! शासक वर्ग जनता पर तरह-तरह की निगरानी की व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। डिजिटल डाटा संग्रह करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस निगरानी तंत्र में शासकों के लिए सहायक हैं।
     समाज में साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण को शासकों ने सचेत और पर आगे बढ़ाया है। प्रवासियों, दूसरे धर्म व नस्ल के लोगों के प्रति वैमनस्य को बढ़ाया है। अंधराष्ट्रवाद व उग्रराष्ट्रवाद के जरिए शासक जनता के अधिकारों पर लगातार हमला बढ़ाते गए हैं। जनता की यह अधिकारहीनता शासकों के तानाशाही भरे रुख को स्पष्ट कर देती है।
जन संघर्षों की स्थिति:    'निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण' की जनविरोधी नीतियों की मार से जहां सामाजिक संकट
                       बढ़ते गये हैं वहीं विश्व भर में जनता का असंतोष उनके संघर्षों के रूप में फुटकर रूप में सामने आया है।
     अप्रवासियों के विरुद्ध शासकों की अमानवीय नीतियों के खिलाफ अमेरिका में लाखों काले-गोरे लोग मिलकर संघर्ष में उतरे। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से पहले भी इन्होंने सामूहिक प्रतिरोध किया था और ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद भी विरोध के लिए ये एकजुट हो रहे हैं। रोमानिया में भ्रष्टाचार संबंधी कानूनों को ढीला करने के शासकों के फैसले के विरुद्ध देश के 70 शहरों में देशव्यापी प्रदर्शन हुए। इसमें छात्रों, नौजवानों, मजदूरों, स्त्री-पुरुषों व बूढ़ों सभी ने भागीदारी की। दिसंबर 2017 में इजराइल में बिजली के निजीकरण एवं जनता के आंदोलनों में न्यायालय के अनावश्यक हस्तक्षेप के विरुद्ध जनता के प्रदर्शन हुए। जनता के विभिन्न हिस्सों की इसमें भागीदारी रही। दिसंबर 2017-जनवरी 2018 में जर्मनी के ऑटोसेक्टर और बिजली सेक्टर के मजदूरों की हड़ताल हुई जो "निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण" के खिलाफ थी। जनवरी 2018 में दुनिया की जनता के संघर्षों में वृद्धि हुई। संघर्षों में सुरक्षाबलों से टकराव भी हुआ। जनवरी 2018 में ग्रीस में मेहनतकश जनता के संघर्ष हुए जो सरकार की सामाजिक मदों में कटौती कार्यक्रम के खिलाफ थी। ईरान में महंगाई व बेरोजगारी के कारण उपजे असंतोष ने जनआंदोलनों को जन्म दे दिया। धार्मिक निरंकुशता के बावजूद लोग संघर्ष में शामिल हुए।
     फ्रांस का "पीली जैकेट आंदोलन" विश्व भर में चर्चा का विषय रहा। यह आंदोलन नवम्बर 2018 से आरंभ होकर देश भर में फैल गया। आंदोलन फ्रांसीसी जनता के संघर्ष के उग्र तेवर के कारण पड़ोसी यूरोपीय देशों के मजदूर-मेहनतकशों को भी आंदोलन के लिए नैतिक ऊर्जा देता गया। जर्मनी, बेल्जियम, बुल्गारिया, सर्बिया व ग्रीस आदि में आंदोलनों का दौर चल पड़ा। आंदोलन ईंधन मूल्य वृद्धि की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ था। आंदोलन ने सामाजिक बराबरी, मजदूरी में भारी वृद्धि, धनिकों के विशेषाधिकारों के खात्मे और राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रो के त्यागपत्र की मांग की। भारी दमन के बावजूद यह आंदोलन लम्बे वक़्त तक चलता रहा। यह आंदोलन ऊर्जावान होते हुए भी सांगठनिक-वैचारिक शक्ति से लैस नहीं था। यही इस आंदोलन की सीमा बन गयी।
     सूडान के तानाशाह ओमर-अल-बशीर को जनता के तीखे संघर्षों के कारण दिसंबर 2018 से शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी। महंगाई व बेरोजगारी से त्रस्त व आक्रोशित जनता ने सैन्य दमन का सामना करते हुए चार माह तक जुझारू संघर्ष किए। अन्ततः 2 वर्ष के भीतर नागरिक-प्रशासन-सरकार के गठन की सहमति के साथ आंदोलन समाप्त हुआ। ओमर-अल-बशीर 1989 से सत्तासीन था। फरवरी 2019 में दोबारा राष्ट्रपति बनने की योजना बना रहा था। जनता के संघर्षों ने उसे चलता कर दिया। इसी तरह अल्जीरिया के तानाशाह अब्दुल अजीज बोत्फ़ालिका को भी जनता के तीखे संघर्षों के कारण फरवरी 2019 त्यागपत्र देना पड़ा। अब्दुल अजीज सैन्य समर्थन से 1970 से सत्ता पर था।
     निकारागुआ में राष्ट्रपति डेनियल ओर्टेगा की सरकार द्वारा आई.एम.एफ के निर्देश पर पेंशन कटौती तथा सामाजिक सुरक्षा खर्च में कटौती के खिलाफ अप्रैल 2018 में जनता के संघर्ष फूट पड़े। संघर्ष का दमन हुआ। लगभग 300 लोगों को दमन के कारण जान भी गंवानी पड़ी। इस देश में अमेरिकी साम्राज्यवादियो की  षडयंत्रकारी कार्यवाहियां चलती रही हैं। ट्यूनीशिया में टैक्सों का बोझ लादे जाने के विरुद्ध जनवरी 2019 में जनता के संघर्ष फिर फूट पड़े। ब्राजील में दक्षिणपंथी राष्ट्रपति बोलसेनारो द्वारा शिक्षा बजट में 30% की कमी के खिलाफ छात्रों का देशव्यापी आंदोलन फूट पड़ा। आंदोलन में 10 लाख छात्र शामिल रहे। जनता के दूसरे हिस्सों का भी इसे समर्थन हासिल हुआ।
     चिली में अभी हाल ही में मेट्रो किराये में वृद्धि के विरोध में लाखों का जनसैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा इसका दमन हुआ जिसमें 20 लोग मारे गए। सैकड़ों घायल हो गए। इराक में बेरोजगारी भ्रष्टाचार के विरोध में सरकार विरोधी प्रदर्शनों की लहर उमड़ आयी है इसका भारी दमन शासकों ने किया है इसमें 300 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इक़वाडोर में कटौती कार्यक्रमों के विरोध में प्रदर्शनों का तांता लगा हुआ है प्रदर्शन का दमन हुआ है इसमें सैकड़ों लोग मारे गए हैं। इसी प्रकार लेबनॉन में व्हाट्स पर टैक्स लगाये जाने के खिलाफ सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। दूसरी ओर इंडोनेशिया में भी छात्रों का संघर्ष फुट पड़ा है।
     चीन में मजदूरों व किसानों के संघर्ष फूटते रहे हैं। इनका क्रूरतापूर्वक दमन चीनी शासक करते रहे हैं। हांगकांग में प्रत्यर्पण कानून के खिलाफ व्यापक जनसंघर्ष हुआ। चीनी शासकों द्वारा किये गए दमन के बावजूद जनसंघर्ष आगे बढ़ता गया। अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने हित में हांगकांग के प्रदर्शनकारियों को प्रशिक्षण-उकसावा देकर चीन में लगातार हस्तक्षेप करते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उईगर प्रांत के मुस्लिम समुदाय को डिटेंशन कैंप में रखना उनका पुनर्शिक्षण करना चीनी शासकों के फासीवादी रुझान का उदाहरण है।

वैश्विक परिस्थितियों का सार संकलन:     विश्व पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासक अपने क्रूर शोषण-दमन के अभियान में   निरन्तर सक्रिय हैं। वे अपने शासन को बनाये रखने व टिकाये रखने के लिए एक बार फिर दक्षिणपंथी नवफासीवादी शक्तियों को बटोर रहे हैं तथा आगे बढ़ा रहे हैं। ये शोषण-लूट को बनाये रखने के लिए दमन-उत्पीड़न की किसी भी सीमा को पार करने को तैयार हैं। दूसरी ओर व्यापक मजदूर मेहनतकश आबादी है जिसने बीसवीं सदी के क्रांतिकारी संघर्षों से हासिल सफलताओं, जनवादी अधिकारों व जीवन की सुरक्षा को खोने का कटु अनुभव पाया है। यह अपने संघर्षों के जरिये शासकों का लगातार प्रतिरोध कर रही है किंतु उसका संघर्ष अभी अपने क्रांतिकारी राजनीतिक नेतृत्वकारी संगठन से विहीन है। विश्व राजनीतिक रंगमंच पर अभी भी साम्राज्यवादी शक्तियां सिरमौर बनी हुई हैं। शेष पूंजीवादी शक्तियां इस अभियान का अनुसरण कर रही हैं। संपूर्ण विश्व पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था अपने इस जनविरोधी चरित्र के कारण नित नये संकटों में घिरती जाती है लेकिन इसके साथ-साथ इसकी शोषण की हवस और भी बढ़ती जाती है।
    इस स्थिति में समाज में बढ़ती लूट-शोषण, बेरोजगारी-असमानता, अमानवीयता व अभावग्रस्तता के दुष्चक्र के खात्मे की दरकार भी बढ़ती जा रही है। हाल-फिलहाल शासकों के समक्ष चुनौती पेश करने वाली व आमूल परिवर्तन की राह खोलने वाली मज़दूर मेहनतकशों की शक्तियां क्रांतिकारी ढंग से संगठित नहीं हैं। मजदूरों व मेहनतकशों की संघर्षकारी शक्ति ही परिवर्तन की क्षमता रखती है। यही पूंजीवाद का नाश कर महत्तम समानता, स्वतंत्रता, जनवाद वाला समाजवादी समाज बना सकती है।
                 B - 【 राष्ट्रीय परिस्थिति 】
       पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से जारी विश्व अर्थव्यवस्था का संकट और भी गहरा हुआ है। विश्व अर्थव्यवस्था के संकट के प्रभाव तथा मोदी सरकार के नोटबन्दी व जी.एस.टी. जैसे विशिष्ट कदमों के चलते साल 2019-20 की दूसरी तिमाही गुजरते-गुजरते भारतीय अर्थव्यवस्था में भी गहरे संकट के लक्षण साफ साफ दिखने लगे हैं। इस दौरान पूंजीवाद की पतनशीलता और इसका दमनकारी व उत्पीड़नकारी चरित्र और भी बढ़ा है। पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे को बनाये रखने व अपनी व्यवस्था को दीर्घजीवी बनाने के लिए राजनीति में घोर प्रतिक्रियावादी कदमों की दिशा में आगे बढ़ चुका है दूसरी ओर यह आर्थिक संकट का सारा बोझ मजदूरों व मेहनतकशों पर डाल रहा है।
      वैसे तो पिछले साल अर्थव्यस्था के जिस विकास दर को आंकड़ेबाजी के खेल के जरिये 7 % से ऊपर बताया जा रहा था वह सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही अब 5 % के नज़दीक पहुंच गयी है। हालांकि इन आंकड़ों पर भी संदेह है कई पूंजीवादी अर्थशास्त्री ही इसे 5 % से काफी नीचे बता रहे हैं। आलम यह है कि अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर की वृध्दि गत वर्ष के 7.8 % से गिरकर जून 19 में 0.2 % तक गिर गई है। फरवरी 2019 में तो औद्योगिक उत्पादन में विकास दर 20 माह के न्यूनतम स्तर 0.1 प्रतिशत तक गिर गयी थी। कुछ महीनों में यह ऋणात्मक रही है। उद्योगों की खस्ता हालत इस बात की पुष्टि करती है। ऑटोसेक्टर से लेकर दैनिक उपभोग की वस्तुओं की बिक्री में जून-जुलाई 2019 आते-आते भारी गिरावट दिखी है। वाहन निर्माता कंपनियां एक ओर उत्पादन क्षमता से काफी कम उत्पादन कर रही हैं तालाबंदी कर रही हैं तो दूसरी ओर बड़ी तादाद में मज़दूरों की छंटनिया भी कर रही हैं। लगभग 10 लाख मज़दूरों की छंटनी होने की खबरें आ रही हैं। वाहनों की बिक्री में 30 साल की सबसे बड़ी गिरावट बतायी जा रही हैं। सार्वजनिक तथा निजी क्ष्रेत्र के कई उद्यम भारी कर्ज जाल में फंसे हुए हैं। इसका नतीजा बैंकों की 8-10 लाख करोड़ रुपये के गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (फंसे हुए कर्ज) के रूप में सामने आया है। सरकार इसके बड़े हिस्से को बट्टे खाते में डालने को बेताब है।
      दूसरी ओर कृषि संकट और ज्यादा गहन हुआ है। कृषि विकास दर गत वर्ष के 5.1% से गिरकर 2% तक गिर गयी है। इस संकट की अभिव्यक्ति इस रूप में भी दिखाई देती है कि औसतन 12000 किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं। कृषि का अधिकाधिक पूंजीवादीकरण तथा बहुराष्ट्रीय निगमों की कृषि क्षेत्र में घुसपैठ ने हालात को अत्यन्त भयावह बना दिया है। घटते रकवे, गिरती आय, बढ़ती ऋणग्रस्तता, बढ़ती लागत और बाजार की होड़ भी कृषि संकट को बढ़ा रही है। कृषि में छोटे-मझौले किसान तो पहले ही खस्ताहाल थे अब धनी किसानों का निचला स्तर भी इस संकट की चपेट में है।
     संकट के और आगे गहराने की आशंका में, टैक्स का दायरा पूंजीपतियों के एक हिस्से व उच्च मध्यम वर्ग पर बढाने तथा कॉरपोरेट टैक्स में कटौती मनमाफिक न होने से जुलाई-अगस्त 2019 में बजट के बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट हुई। शेयर बाजार से पूंजी का पलायन हुआ। मगर जैसे ही कॉरपोरेट टैक्स को घटाकर 22 % किया गया शेयर बाजार के खिलाड़ी, कॉरपोरेट घराने खुशी में झूम उठे। 36 हज़ार के करीब लुढ़क चुका सेंसेक्स उछलकर 39 हज़ार के निकट पहुंच गया। स्पष्ट है कि इस पक्ष में हुई टेक्स दर की कटौती जनता पर टैक्स बढ़ाकर प्रतिसन्तुलित होगी।
    इन बीते वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा, महिला बाल विकास, परिवार कल्याण, सिंचाई परियोजनाओं, सब्सिडी आदि में भारी कटौती की गयी। कुछ मदों में तो जितनी राशि की घोषणा हुई उससे बहुत कम राशि ही जारी की गयी। दूसरी ओर भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर सार्वजनिक जन वितरण प्रणाली को आधार कार्ड से जोड़कर तथा खाद्य सब्सिडी को नकद हस्तान्तरण से प्रतिस्थापित करके गरीब-मेहनतकशों के जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया गया है।
    इन वर्षों में मोदी सरकार ने नागरिक विमानन, फार्मा, सिंगल ब्रांड रिटेल, बैंक, बीमा आदि क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को काफी बढ़ा दिया है। रक्षा क्षेत्र भी एफ.डी.आई. के लिए खोल दिया गया है जिसका एक नमूना राफेल सम्बन्धी भ्रष्टाचार के रूप में भी दिखा। दूसरी ओर सूचना अधिकार कानून में संशोधन कर सरकार ने इसे बेहद कमजोर कर दिया है। यहां आयुक्तों के चयन तथा वेतन तय करने पर सरकार ने अपना नियंत्रण कायम कर लिया है।
     2019 में चुनाव में एकाधिकारी पूंजी के प्रचंड समर्थन, अन्धराष्ट्रवादी उन्माद तथा घृणित तौर तरीकों के जरिये फासीवादी ताकतों की सत्ता में पुनर्वापसी हुई है। अपने दूसरे कार्यकाल के 100 दिनों में ही मोदी सरकार ने मज़दूर मेहनतकशों पर तीखा हमला बोला है। विनिवेशीकरण, कल्याणकारी मदों में भारी कटौती, सब्सिडी में कटौती, सरकारी नौकरियों में कटौती तथा वेतन भत्तों में कटौती की जा रही है। तरह-तरह के टैक्स लादे जा रहे हैं यह 'मोटर वाहन अधिनियम' के जरिये भी हो रहा है व स्वच्छता आदि के नाम पर 'उपकर' लगाकर भी। हर तरह से जनता पर मंहगाई का बोझ बढ़ाया जा रहा है।
रेलवे के कोच कारखानों का निगमीकरण, स्टेशनों का निजीकरण, रेलवे कालोनियों को बेचना तथा 100 दिन में 2 निजी ट्रेन चलाने का जनविरोधी व पूंजीपरस्त लक्ष्य सरकार ने लिया है। बिजली विभाग, इंडियन एयरलाइन्स, एच.ए.एल., बी.एस.एन.एल., डाक विभाग जैसे सार्वजनिक संस्थानों के निजीकरण की ओर सरकार क्रमशः अग्रसर है। यह विनिवेशीकरण के जरिये आगे बढ़ रही है। लगभग 1 लाख करोड़ रुपये इस साल इससे जुटाने का इनका लक्ष्य है। अब बैंको में सरकारी हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत से नीचे लाने की बातें हो रही हैं। एकाधिकारी पूंजी के हित में बैंकों का आपस में विलय कर विशाल आकार के कुछ चुंनिन्दा बैकों में बदला जा रहा है। दूसरी ओर मज़दूर विरोधी वेज कोड बिल भी पास हो चुका है। नीम(एन.ई.ई.एम), एफ.टी.ई.एक्ट के जरिये पूंजीपतियों को श्रम के शोषण की खुली छूट दी जा रही है।
     पिछले 4 वर्षों में भारत की राजनीति फासीवाद की दिशा में और ज्यादा आगे बढ़ चुकी है। भाजपा अपने संघी गुरू के नारे ‘‘राजनीति का हिन्दूकरण करो और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करो’’ पर आगे चल रही है। बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय को अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय का डर दिखाकर उग्र हिन्दुत्व की राजनीति की जा रही है। पुलिस, सेना, न्यायालय, शिक्षा आदि सभी संस्थाओं में हिन्दू फासीवादी काबिज हो चुके हैं। इन्होंने ज्ञान-विज्ञान के स्थान पर समाज में कूपमंडूकता व पोंगापंथ को बढ़ावा दिया है। अयोध्या के मसले पर राम मंदिर के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला दिखाता है कि शीर्ष अदालत भी अब तथ्य तर्क के स्थान पर 'आस्था' व 'जनमत' से फैसले सुनाने लगी है शीर्ष अदालत भी संघी फ़ासीवादियों के सामने समर्पण करती जा रही है। इस फैसले से मुस्लिम समुदाय की अलगाव व दोयम दर्जे की स्थिति में और इजाफा होगा।
     मोदी सरकार के दोबारा सत्तासीन होने के साथ समाज में फासीवादी आंदोलन काफी आगे बढ़ चुका है। लव जिहाद, गौरक्षा, देशभक्ति, समान नागरिक संहिता, राम मंदिर, अंधराष्ट्रवाद आदि इस फासीवादी आंदोलन के औजार हैं। अख़लाक़ से लेकर पहलू खान व तबरेज़ तक कई निर्दोष अल्पसंख्यकों को गौरक्षा के नाम पर इनके फासिस्ट दस्तों ने मार डाला। इनके मंत्री हत्यारे फासिस्टों का फूलमालाओं से स्वागत करते हैं। प्रधानमंत्री अपने कारिंदों के इस घृणित कृत्य का खामोशी से स्वागत करते हैं।   
    अब यह कहना सही होगा कि देश में फासीवादी आन्दोलन अब तक की सबसे मजबूत स्थिति में है तथा भारत में आज फासीवाद का खतरा बिल्कुल दहलीज़ पर खड़ा है। यदि अभी फासीवाद कायम नहीं किया गया है तो सिर्फ इसीलिए कि फ़िलहाल इसकी जरूरत अभी शासक एकाधिकारी पूंजी को नहीं है। लम्बे समय से तबाही-बर्बादी की धीमी मार झेलने के बाद अब तेज़ गति से होती तबाही-बर्बादी की स्थिति मज़दूर मेहनतकश अवाम के असंतोष व आक्रोश को बढ़ाकर जनसंघर्ष की विस्फोटक स्थिति की ओर ले जा सकती है। इससे निपटने के लिए फासीवादी ताकतों को एकाधिकारी पूंजी के मालिक आगे बढ़ाकर सत्ता तक ले आये हैं।
     मोदी सरकार ने विभिन्न राज्यों की गैर भाजपाई सरकारों को अस्थिर करने, विपक्षी नेताओं की खरीद फरोख्त कर उनकी सरकारें गिराने के काम में सबको पीछे छोड़ दिया है। इसके लिए इन्होंने ई.डी., इनकम टैक्स, सी.बी.आई. व राज्यपाल का जमकर इस्तेमाल किया है। अरुणांचल प्रदेश व उत्तराखंड में तो विपक्ष की सरकार अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही बच पायी हालांकि बाद में हुए चुनावों में दोनों जगह भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई। कर्नाटक में पहले राउंड में तो मोदी सरकार की खुली खरीद-फरोख्त के चलते खूब किरकिरी भी हुई थी। इसलिए अगली दफा सरकार गिराने की दिशा में संभल कर कदम बढ़ाये गये। अन्ततः जे.डी.(एस)-कांग्रेस की गठबन्धन सरकार को गिरा कर भाजपा अपनी सरकार बनाने में सफल रही।
     मुख्य विपक्षी पूंजीवादी दल कांग्रेस की स्थिति काफी कमजोर है। हालांकि यह अभी भी 20 % (12 करोड़ वोटर) वोटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। संघ-भाजपा ने अपनी हिन्दू फासीवादी राजनीति और एकाधिकारी पूंजी के सहयोग से इसे बैकफुट पर धकेला है।
     वहीं दूसरे क्षेत्रीय पूंजीवादी दल स.पा., ब.स.पा., डी.एम.के., आर.जे.डी., तृणमूल कांग्रेस आदि भी भा.ज.पा. व कांग्रेस की ही तरह आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं व जनविरोधी हैं। ये भी नई आर्थिक नीतियों के ही समर्थक हैं। इनका आधार भी अभी बना हुआ है हालांकि तृणमूल कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई है। ब.स.पा. की स्थिति में सीटों के लिहाज से सुधार है। स.पा. की स्थिति कमजोर हुई है। यही स्थिति आम आदमी पार्टी की भी है। ये सभी संघ/भाजपा की हिन्दू फासीवादी राजनीति व पूंजी के प्रबंधन के आगे बौने साबित हुए हैं। 
     2019 के चुनाव में भाजपा को 37% मतों के साथ 303 सीटें मिली हैं। इस जीत की वजह कॉरपोरेट घरानों तथा इसके मीडिया का खुला समर्थन व प्रचार, अन्धराष्ट्रवादी उन्माद,  राज्य मशीनरी का इस्तेमाल तथा अन्य ढेरों घृणित तौर तरीके रहे र्है।
    सुधारवादी संसदीय वामपंथी पार्टियों का आधार भी इन दिनों और ज्यादा खिसका है। इनके लिए मोदी या भाजपा का सत्ता में होना ही फासीवाद है। इस "फासीवाद" की पराजय का ख्वाब ये वाम मोर्चा या कांग्रेस के साथ चुनावी गठबन्धन बनाकर देखते हैं। चुनावी जोड़-तोड़ में सिमट जाने की इनकी नीति ने संघी फासीवादियों को ही आगे बढ़ाने में प्रकारांतर से मदद की है।
     इन बीते वर्षों ने साफ दिखाया है कि मोदी सरकार का 'अच्छे दिन' का नारा आम जनता के हर हिस्से के लिए छलावा था। किसानों से सरकार द्वारा किये गए कर्जमाफी व उचित समर्थन मूल्य के वादे हवा हवाई ही साबित हुए हैं। चुनावी दबाव में हार की आशंका से ही इन्होंने 6 हज़ार रुपये किसानों के खाते में 'वोट खरीदने' की गरज से डालने की घोषणा की। वहीं दूसरी ओर किसानों की जमीनों को पूंजीपतियों के लिए अधिग्रहण करना आसान बनाया जा रहा है। साथ ही इनके संघर्षों का दमन भी किया गया है।  
     पूंजी द्वारा प्राकृतिक संसाधनों की लूट को जारी रखने के लिए आदिवासियों को 'जल-जंगल-जमीन' के परंपरागत अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। लाखों आदिवासियों को जंगलों से खदेड़ने का हुक्म सुनाया जा रहा है। वनाधिकार कानून व ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है।
     नौजवानों को दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष देने का नारा भी जुमला ही साबित हुआ है। हाल यह है कि आज पिछले 45 साल में देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है। अब इस सम्बन्ध में आंकड़े जारी करना भी सरकार ने बन्द कर दिया है। "स्टार्ट अप" "मेक इन इंडिया" का आलम यह है कि खुद सरकार ने इसके बारे में बात करनी बन्द कर दी है। देश के मुखिया के हिसाब से इन्होंने पकोड़े बेचने का रोज़गार तो नौजवानों को दिया ही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने तो एक ही झटके में सवा लाख समायोजित शिक्षा मित्रों को नौकरी से बाहर कर दिया जिसके चलते सदमे व आत्महत्या से ढेरों की मौत हो गयी। इसके साथ ही शिक्षा प्रेरकों, लोक कल्याण मित्रों की नौकरियां भी खत्म कर दी गयी। लाखों रोज़गार सेवकों को तो न्यूनतम मानदेय भी कई-कई माह तक नहीं मिलता है।
    इन वर्षों में सरकारी संस्थानों में संविदा व ठेकाकरण बढ़ा है। शिक्षकों/कर्मचारियों की पुरानी पेंशन की मांग को सरकार ने ठुकरा कर इन्हें नयी पेंशन योजना लेने को बाध्य किया है। आशा, आंगनबाड़ी, भोजनमाता, संगिनी आदि की कर्मचारी का दर्जा देने की मांग को अनसुनी कर बहुत ही कम मानदेय पर रखकर उनका शोषण किया जा रहा है।
     हिन्दू फासीवादी अपनी जहनियत में घोर महिला विरोधी हैं, घोर जातिवादी हैं तथा घोर मुस्लिम विरोधी हैं। इनके राज में महिलाओं व बच्चियों के खिलाफ यौन हिंसा व बलात्कार की घटनाएं बढ़़ी हैं। 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 2.6 प्रतिशत की वृद्धि हुयी है। 7 वर्षीया आसिफा, 2.5 वर्षीया ट्वींकल, उन्नाव व शाहजहांपुर की घटनाओं ने यह साफ दिखाया है कि इन्होंने अपने राज में यौन हिंसा व हत्या के आरोपियों के मसले को भी ध्रूवीकरण का औजार बनाया है। आरोपियों को बचाने के लिए इन्होंने "हिन्दू एकता" का नारा गढ़ लिया। आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर, नित्यानंद, चिन्मयानंद के मसले से समझा जा सकता है कि महिलाओं पर अत्याचार की क्या स्थिति है। मुजफ्फरपुर, देवरिया आदि जगहों पर बालिका गृहों में बच्चियों के साथ यौन-उत्पीड़न की घटनाओं में भी इनके लोगों पर संलिप्तता के आरोप लगे। चर्चित हुए '#मी-टू'अभियान ने भी संघ परिवार की महिला विरोधी सोच को जाहिर किया है। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मसले पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवम्बर 19 में इस मसले को 7 जजों की बेंच को भेजना दिखलाता है कि संघी फासीवादियों के प्रभाव में अदालत महिला विरोधी धार्मिक परंपराओं के आगे समर्पण कर रही है।
     बीते वर्षो में दलित उत्पीड़न की घटनाओं में भी तेजी आयी है। ऊना में दलितों की पिटाई, रोहित वेमुला व पायल तड़वी की सांस्थानिक हत्या, सहारनपुर में दलित बस्ती को निशाना बनाया जाना आदि घटनाएं हिंदू फासीवादियों के मेहनतकश दलितों पर बढ़ते हमले की ही अभिव्यक्ति है।
    सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त मध्यम वर्ग की ऊंची जातियों के लोग भी संघियों के सत्ता में आने से मुखर होकर अपनी घोर जातिवादी सोच का परिचय दे रहे हैं। संघ परिवार की शह पर इसके चलते जातिवाद के खिलाफ आंदोलनों के अगुवा व प्रतीक पेरियार, फूले व रविदास जो कि दलितों के लिए प्रेरक व प्रतीक हैं इन पर भी हमला हो रहा है।  
     संघी सरकार ने इसी घृणित सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त होकर एक ओर आरक्षण तो दूसरी ओर एस.सी./एस.टी.एक्ट पर भी हमला बोला। इसने आरक्षण को कमजोर करने के लिए 13 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली तथा आर्थिक आधार पर 10 % आरक्षण का प्रावधान किया। कोर्ट के जरिये एस.सी./एस.टी. एक्ट को कमजोर किया गया हालांकि 2 अप्रैल के दलित संगठनों के देशव्यापी प्रदर्शन के बाद इस बदलाव को वापस ले लिया गया। भीमा कोरेगांव में दलित संगठनों द्वारा मनाए जाने वाले कार्यक्रम का भी साजिशन दमन किया गया। दलित सवाल पर संघ/भाजपा की दुविधा यह है कि ये एक ओर चुनावी मजबूरी व साम्प्रदायिक गोलबंदी के लिए मुसलमानों के खिलाफ दलितों का इस्तेमाल करते हैं तो वहीं दूसरी ओर इसी घृणित जातिवादी सोच के चलते ये मेहनतकश दलितों के भी ख़िलाफ हैं।
      मेहनतकश दलितों पर होती हिंसा के खिलाफ ब.स.पा. व अन्य दलित पार्टियां रस्म अदायगी कर रही हैं या कुछ भा.ज.पा. के गोद में बैठ गयी हैं। ये घोर अवसरवादी हैं। ये बेनकाब हो रही हैं। इस स्थिति में दलित समुदाय के बीच से एक नया उभार पैदा हो चुका है। यह भी सत्ता में हिस्सेदारी का ही ख्वाब देखता है। सही मायने में मेहनतकश दलित समुदाय की समस्या पर आवाज बुलन्द करने वाले इन लोगों को क्रांतिकारी धारा की ओर आना होगा। अन्यथा इनका हश्र भी ब.स.पा. आदि की तरह ही होने को अभिशप्त है। इसी उभार के दबाव में दलितों को झट-पट अपने साथ लाने की चाहत में कई वामपंथी संगठन/पार्टियां भी  "लाल सलाम-नीला सलाम" का गलत नारा पेश कर रहे हैं।
     अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले भी लगभग इसी तरह के हैं। फासीवादी राजनीति के बढ़ने के साथ-साथ मुस्लिमों में मुस्लिम कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ रहा है। इसके चलते भी यहां अलगाव ज्यादा बढ़ रहा है। यह स्थिति हिन्दू फासीवादियों के लिए लाभदायक है। एक प्रकार से हिन्दू फासीवादी दोयम दर्जे की स्थिति में इन्हें धकेलने में कामयाब रहे हैं। गरीब/मेहनतकश मुस्लिमों व अन्य हिस्सों को वर्गीय आधार पर गोलबंद करने तथा साम्प्रदायिकता व फासीवाद के खिलाफ एकजुट करने की जरूरत है।
      आज सभी सम्बन्ध पूंजी से संचालित हो रहे हैं। बाजार की अदृश्य ताकत व मार सर्वव्यापी हो चुकी है। इसका एक नतीजा यह है कि मानवीय संबंधों में सरोकार की भावना, संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। इसके चलते आज पूरे भारतीय समाज में तनाव, जीवन की असुरक्षा, अलगाव व अवसाद और आत्मिक संकट अपने चरम पर है। इसके चलते नशाखोरी, यौन हिंसा, आत्महत्या व अन्य मानसिक बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। 
     इन बीते 4 वर्षों में एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व हर ओर तेजी से बढ़ा है। इस दौर में एक ओर नक्सलवाद के नाम पर आदिवासियों को खनिज संसाधनों से भरपूर जंगलों से खदेड़ने के लिए अभियान तेज़ी से आयोजित हो रहे हैं तो दूसरी ओर "अरबन नक्सल" का एक हौवा खड़ा कर जनसंघर्षों से निपटने की तैयारी हो चुकी है। आतंकवाद या हिस्ट्रीशीटर के नाम पर निर्दोष मुस्लिमों का एनकाउंटर होने की घटनाएं बढ़ चुकी हैं।
      सरकार व संघ परिवार ने अपने आलोचकों, असहमति जताने वालों का मीडिया ट्रायल करवाना, मीडिया के जरिये इनका चरित्र हनन करवाना तथा इन्हें 'देश विरोधी' के रूप प्रचारित करने की अपनी घृणित चाल को अब आम बना दिया है। विरोधियों पर 'राजद्रोह' आदि के फर्जी मुकदमे दर्ज किये जा रहे हैं। इन्हें तरह-तरह की धमकी दी जाती है। इन पर हमले होते हैं। इनकी हत्या की कोशिशें होती हैं। दाभोलकर, गोबिन्द पान्सरे, एम.एम.कलबुर्गी के बाद गौरी लंकेश की सरेआम हत्या इसी बात को बताती है। इतिहासकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों, दलित बुद्धिजीवियों तथा प्रगतिशील जनवादी ताकतों पर 'अर्बन नक्सल' का ठप्पा लगाकर फर्जी मुकदमों में जेलों में ठूंस दिया जाता है। इन्होंने 'अघोषित आपात काल' सी स्थिति पूरे देश में बना दी है। हालांकि अभी फासीवादी निजाम कायम नहीं हुआ है मगर ये घटनाएं स्पष्टतः फासीवाद की ओर बढ़ने को दिखलाती हैं।
     फर्जी एनकाउंटर का चलन विशेषकर उ. प्र. में अब आम होता जा रहा हैं। यह भी फासीवादी आंदोलन को आगे बढाने में मददगार है। उ.प्र.पुलिस द्वारा ही पिछले वर्षों में 1 हजार से ज्यादा एनकाउन्टर किये गये। यह पूंजीवादी लोकतंत्र की स्थापित मान्यताओं व संवैधानिक कानूनी प्रकिया को ध्वस्त करना है। यू.पी. अब इनकी 'हिन्दू फासीवाद' की नयी प्रयोगशाला बन चुका है।
     यही नही! मोदी सरकार ने जनआंदोलनों को कुचलने के उद्देश्य से एन.आई.ए. का कार्यक्षेत्र बढ़ा दिया है साथ ही यू.ए.पी.ए. में भी संशोधन कर दिये हैं। इसके तहत अब सरकार किसी भी व्यक्ति को मात्र शक के आधार पर आतंकी घोषित कर सकती है और उसकी संपत्ति भी जब्त की जा सकती है जबकि एन.आई.ए. को विदेशों में जांच व गिरफ्तारी का अधिकार होगा।          
    इसी के साथ आधार परियोजना का कभी विरोध करने वाली भाजपा इसे तेजी से व्यापक क्षेत्रों में लागू करती गयी है। इसे असंवैधानिक तरीके से 'धन बिल' के रूप में पारित कराया गया। अपराध रोकने के नाम पर डी.एन.ए. बिल के तहत देश के अधिकांश लोगों का डी.एन.ए. एकत्रित करने व डी.एन.ए. बैंक बनाने का प्रावधान किया जा रहा है। यह खतरनाक है जो व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करने के साथ-साथ एक समूचा निगरानी तंत्र भी निर्मित करता है। इससे विरोधियों पर नजर रखना, उन्हें चिन्हित करना व उनका दमन करना बेहद आसान हो जायेगा।
     फासीवादी ताकतें पूंजीवादी लोकतंत्र की ताकतों व संस्थानों को हर जगह कमजोर व प्रतिस्थापित कर रही हैं। इसके चलते इनके व राज्य की संस्थाओं के बीच अंतरविरोध भी साफ दिखा है। गत वर्षों में केंद्र सरकार बनाम सी.बी.आई., सरकार बनाम रिजर्व बैंक, सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट एवं सरकार बनाम एन.एस.एस.ओ. के रूप में हुए विवादों में यह अन्तर्विरोध दिखा जहां फासीवादी ताकतें अपना शिकंजा कायम करने में अंततः सफल रही। इसीकी अभिव्यक्ति यह थी कि भारतीय सांख्यिकी आयोग (एन.एस.एस.ओ.) के तीन में से दो गैर सरकारी सदस्यों ने बेरोजगारी के सही आंकड़े जारी न करने के विरोध में इस्तीफा दे दिया। सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम के 4 जजों की प्रेस कांफ्रेंस मोदी सरकार की शह पर काम कर रहे मुख्य न्यायाधीश की निरंकुशता व मनमर्जी के विरोध में हुई।
     मोदी राज में पूंजीवादी मीडिया पूरी तरह से फासीवादी ताकतों का प्रचार तंत्र बन चुका है। हालांकि ऐसा एकाधिकारी पूंजी के समर्थन से ही हो रहा है। सोशल मीडिया पर भी संघ/भाजपा का कब्जा बना हुआ है। इनके आई.टी. सेल अफवाह फैलाने, झूठ व अर्धसत्य फैलाने के फासीवादी एजेंडे में लगे हुए हैं। 
     दोबारा सत्ता पर आते ही मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था की पस्त पड़ती हालत के बीच फासीवादी एजेंडे को नई धार दे दी है। इस दौरान विभिन्न राष्ट्रीयताओं का दमन ज्यादा तेज हुआ है विशेषकर कश्मीर में। "वॄहत्तर व अखंड भारत" के अपने घृणित एजेण्डे के तहत एक ओर इन्होंने नागरिकता कानून (संशोधन) बिल, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एन.आर.सी.) लागू किया है। इसके तहत इन्होंने मुस्लिम व बांग्लादेशी बराबर घुसपैठिया का अपना फासीवादी एजेंडा देशव्यापी कर दिया है। असम में पहले 40 लाख तो अगली प्रक्रिया में 19 लाख लोग "नागरिकताविहीन" "देशविहीन" हो चुके हैं। दूसरी ओर कश्मीर में इन्होंने अनु. 370 व 35 ए. को खत्म करने का काम भी असंवैधानिक तरीके से कर डाला है। इस प्रकार 1947 से ही "विलय समझौते" को कमजोर करते हुए छल-बल से कश्मीर को भारत में मिलाने की साजिश की भारतीय शासकों की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस ने जो शुरूआत कर दी थी वह 70 सालों में विभिन्न पड़ावों से गुज़रते हुए 2019 में पूरी हो चुकी है। कश्मीर में अभी भी कर्फ्यू है। अवाम बेहद दुख तकलीफों में है। भयानक असुरक्षा व अलगाव में है। कश्मीरी अवाम का संघर्ष दमन के इन हथकण्डों से समाप्त नहीं होगा फ़िलहाल जम्मूकश्मीर की स्थिति फिलिस्तीन सी होने की ही संभावना ज्यादा है।
     भारतीय शासक अपने कमजोर पड़ोसियों पर भी धौंसपट्टी के रिश्ते कायम करने की निरंतर कोशिश में हैं। नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश व मालदीव में मोदी सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप ने इन मुल्कों को चीन की ओर धकेला है जिससे भारतीय शासकों की स्थिति इन मुल्कों में कमजोर हुई है। मोदी सरकार देश के भीतर चीन व पाकिस्तान का खौफ पैदा कर अन्धराष्ट्रवादी उन्माद पैदा कर रही है। "सर्जीकल स्ट्राइक", "पुलवामा हमला", "डोकलाम" जैसी घटनाएं इसी उन्माद को फैलाने का जरिया रही हैं। इस अन्धराष्ट्रवादी उन्माद पर सवार होकर एक ओर ये अपना फासीवादी आंदोलन आगे बढ़ा रहे हैं। दूसरी तरफ जनविरोधी पूंजीपरस्त नीतियों को तेजी से लागू कर रहे हैं।
    शरणार्थी समस्या पर विशेषकर मुस्लिमों के प्रति जो घृणित रुख यूरोप व अमेरिका की नवफासीवादी व दक्षिणपंथी ताकतों का है वही रुख हिन्दू फासीवादियों का भी है। वर्मा के बौद्ध फासीवादियों के भयानक हमले के चलते लाखों मुस्लिम रोहिंग्या शरणार्थियों के रूप में वर्मा से भागने को मजबूर हुए। इन्होंने शरण पाने के लिए भारत का रुख किया तो हिन्दू फासीवादी ताकतों ने पूरे देश में आतंकी के तौर इनकी छवि गढ़ने एवं देश में इन्हें न घुसने देने की बात की।
     इस बीच भारत की विदेश नीति में अमेरिकापरस्ती बढ़ती गयी है। दुनिया के कई मुल्कों को तबाह करने वाले अमेरिका तथा इसके लठैत इजरायल से भारत की निकटता बढ़ी है। अमेरिका की धमकी पर झुकना इनके "राष्ट्रवाद" की पोल खोल देता है जब ईरान से यह अमेरिकी दबाव में तेल का आयात शून्य पर ले आने का वायदा करते हैं। कमजोर मुल्कों के पक्ष में खड़े होने व इनका समर्थन करने का भारत के शासकों का रुख बेहद कमजोर हो चुका है। भारत सरकार ने अपने बन्दरगाहों व सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति अमेरिकी सेना को दे दी है। भारतीय शासक अमेरिकी साम्राज्यवाद के आशीर्वाद से दक्षिण एशिया में इजरायल जैसी स्थिति चाहते है।
     देश में इन बढ़ते फासीवादी हमलों तथा नये आर्थिक सुधारों की तेज गति ने असन्तोष व प्रतिरोध को भी आगे बढ़ाया है। पिछले 4 वर्षों में मजदूरों, किसानों, कर्मचारियों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं, आदिवासियों ने शासक वर्ग की जन विरोधी नीतियों, समाज के फासीवादीकरण व जनवादी अधिकारों के छीने जाने के खिलाफ संघर्ष किया है। हालांकि इस संघर्ष का अधिकांश अभी तात्कालिक मांगों के इर्दगिर्द ही है फिर भी क्षमता भर प्रतिरोध हुआ है।
    मजदूरों ने शोषण-उत्पीड़न-दमन व श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तनों के खिलाफ लगातार संघर्ष किया है। औद्योगिक संस्थानों में यूनियन बनाने तथा छंटनी, तालाबंदी के खिलाफ मजदूर सड़कों पर उतरे। गुड़गांव (हरियाणा) में मारूति व बेलसोनिका; राजस्थान में डायकिन; उत्तराखण्ड में इन्टरार्क, डेल्टा, माइक्रोमेक्स व प्रिकॉल आदि के मजदूरों ने परंपरागत ट्रेड यूनियन आन्दोलन से अलग होकर जुझारू संघर्ष किये। भविष्य निधि कानून में मोदी सरकार द्वारा किये गए बदलाव के खिलाफ बैंगलोर में गारमेंट क्षेत्र की महिला मजदूरों के जुझारू आन्दोलन ने मोदी सरकार को पीछे हटने को बाध्य कर दिया था।
     किसानों ने भी कर्जमाफी, फसलों के उचित दाम, जमीन अधिग्रहण के खिलाफ तथा स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने आदि की मांगों के साथ आन्दोलन किया। महाराष्ट्र के किसानों का लॉंगमार्च, तमिलनाडु के किसानों का मानव मुंडों के साथ दिल्ली में प्रदर्शन, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि में किसानों का जुझारू आन्दोलन हुआ। मंदसौर में किसानों पर गोलियां भी चली जिसमें कुछ किसान मारे गये। हालांकि ये संघर्ष धनी किसानों के नेतृत्व में इनके एजेंडे पर अधिक रहा है। धनी किसान छोटे-मझौले किसानों की संकटग्रस्तता, आक्रोश व असन्तोष को अपने पक्ष में भुनाने में सफल हो जा रहे हैं। ये किसानों के संघर्ष का ही नतीजा था कि 'जमीन अधिग्रहण कानून' में संशोधन के फैसले को मोदी सरकार को वापस लेना पड़ा।
    तूतीकोरिन में स्टरलाइट कंपनी के विरूद्ध वहां के नागरिकों के लंबे जुझारू आन्दोलन में जुलूस के दौरान पुलिस ने लोगों पर गोलियां चला कर 14 लोगों की हत्या कर दी। इसके खिलाफ पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए। इसके अलावा बंगाल का भांगर आन्दोलन, झारखण्ड का पत्थलगढ़ी आन्दोलन एवं केरल के सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश हेतु मध्ययुगीन सामन्ती मान्यताओं एवं फासीवादी ताकतों के विरूद्ध महिलाओं का जुझारू आन्दोलन भी नज़ीर बने।
     प्राकृतिक संसाधनों की लूट व जल-जंगल-जमीन से बेदखली के खिलाफ आदिवासियों ने भी जुझारू आन्दोलन किये हैं। आदिवासियों की बेदखली के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ हुए आन्दोलन से तात्कालिक तौर पर शासकों को पीछे हटना पड़ा।
     चेन्नई से लेकर जे.एन.यू., बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तक कई विश्वविद्यालयों में फासीवादी ताक़तों ने यहां के जनवादी माहौल पर हमला बोल अपने फासीवादी एजेंडे को लागू करने की कोशिश की। रोहित वेमुला, नजीब जैसे फासीवाद विरोधी छात्र इनके हमलों के शिकार बने। इसके जवाब में छात्रों ने हर स्तर पर फासीवादी एजेंडे का तीखा विरोध भी किया है और इनके खिलाफ जुझारू संघर्ष किये है। इसमें कुछ स्थानीय मामलों में जीत भी हासिल की है। बी.एच.यू. की छात्राओं का संघर्ष भी इसमें एक मिसाल है।
    एस.एस.सी. (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन) में धांधली के खिलाफ, मुंबई, बिहार व देहरादून में बेरोजगारी के खिलाफ तथा हाल में पिथौरागढ़ विश्वविद्यालय में पुस्तकों व शिक्षकों के लिए हुए आन्दोलनों ने छात्रों-नौजवानों में पनप रहे आक्रोश को व्यक्त किया।
    इसके अलावा शिक्षा के निजीकरण, फीसवृद्धि, सीट कटौती, विश्वविद्यालय में 13 प्वाइन्ट रोस्टर लागू करने तथा इतिहास व विज्ञान को भगवा रंग में रंगने के विरोध में छात्रों ने संघर्ष किया। जे.एन.यू. एक बार फिर संघर्ष ला गढ़ बना है भारी फीस वृद्धि एवं ड्रेस कोड के खिलाफ छात्रों के जुझारू संघर्ष ने मोदी सरकार को पीछे हटने को बाध्य कर दिया। इसी प्रकार आयुष छात्रों का मेडिकल फीस में भारी वृद्धि के खिलाफ देहरादून (उत्तराखंड) में संघर्ष जारी है। इसके साथ-साथ प्रस्तावित नई शिक्षा नीति 2019 के खिलाफ भी अलग अलग विश्वविद्यालयों में छात्र संघर्षरत हैं। छात्रों-नौजवानों के इन आन्दोलनों ने कई मामलों पर सरकार को पीछे हटने को बाध्य किया।
    सरकारी संस्थानों में ठेकाकरण-संविदाकरण के खिलाफ तथा वेतन विसंगतियों को लेकर आन्दोलन हुए। शिक्षकों व कर्मचारियों का नयी पेंशन स्कीम के खिलाफ काफी लम्बा आन्दोलन हुआ। शिक्षामित्रों, भोजनमाताओं, आशा, आंगनबाड़ी व अन्य संविदा कर्मियों ने भी अपनी तात्कालिक मांगों के लिए संघर्ष किया जो परोक्ष तौर पर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लक्षित थे।
    इसके अलावा दलितों/अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों, महिलाओं व बच्चियों के यौन उत्पीड़न के खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए। दमनकारी कानूनों को और ज्यादा खतरनाक बनाये जाने, जनता के जनवादी अधिकारों व उसकी जनवादी आकांक्षाओं को कुचले जाने के खिलाफ एवं पूंजीवादी व फासीवादी ताकतों द्वारा किये जा रहे दमन-उत्पीड़न व शोषण के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हुए। 
    आज हमारे देश में फासीवाद का खतरा पहले किसी भी समय से सबसे ज्यादा है। फासीवादी ताक़तें आज सता के केंद्रीकरण को और भी तेजी से आगे बढ़ा रही हैं। कैबिनेट, विपक्ष व मंत्रियों की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है। मोदी-शाह-डोभाल व मुट्ठी भर नौकरशाहों के हाथों यह केंद्रीकरण हो रहा है। इस प्रकार एक ओर एकाधिकारी पूंजी समूचे समाज व वर्गों पर अपने निरंकुश प्रभुत्व की ओर इनके जरिये आगे बढ़ रही है दूसरी ओर फासीवादी आन्दोलन अन्धराष्ट्रवाद तथा मुस्लिमों के खिलाफ नफरत के प्रसार के जरिये आगे बढ़ रहा है। यह एकाधिकारी पूंजी के हित में कल्याणकारी राज्य के खात्मे की ओर बढ़ रहा है जैसा कि अब संघी खुलेआम "कल्याणकारी राज्य" के खिलाफ बातें करते हुए "आत्मनिर्भरता' के नाम पर जनता को पूंजी की खुली लूट का शिकार बनने को मजबूर करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि धैर्यपूर्वक जनता के अलग-अलग हिस्सों में शिद्दत से काम किया जाय। दलितों-अल्पसंख्यकों पर हो रहे हर हमले का विरोध किया जाय तथा इनकी लामबंदी की जाय।    
     मजदूरों/मेहनतकशों के हर न्यायपूर्ण संघर्ष के पक्ष में शासकों द्वारा किये जा रहे दमन-उत्पीड़न के खिलाफ, जनवादी अधिकारों को सीमित किए जाने, मेहनतकश जनता की खुफिया निगरानी व दमनकारी कानूनों को बनाए जाने के खिलाफ जनता को एकजुट संघर्ष खड़ा करना वक़्त की जरूरत है।
     इन कामों को करने के लिए हमें पूंजीवाद, फासीवाद का भंडाफोड़ करते हुए इनके हर हमले का मुंहतोड़ जवाब देना होगा। मेहनतकश जनता के बीच अपने कामों को धैर्यपूर्वक करते हुए उन्हें फासीवादियों की पांतों से क्रांतिकारी पांतों में लाना होगा। स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद व फासीवाद के खिलाफ सभी क्रांतिकारी, जनवादी व प्रगतिशील ताकतों तथा जनता के विभिन्न समूहों के साथ मोर्चाबंदी करनी होगी जिसकी दिशा समाजवाद की ओर हो।                

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