काकोरी के शहीद
एक दौर था जब देश अंग्रेजों का गुलाम था । तब जनता को 'आज़ादी' से बहुत प्यार था! गुलामी, गैरबराबरी से घोर नफरत! आज़ादी, बराबरी, अधिकार, इंसानियत इसके लिए जनता संघर्ष कर रही थी, लड़ रही थी और शहीद हो रही थी। इन्हीं में काकोरी के शहीद भी थे।
काकोरी के शहीदों का संगठन था -हिंदुस्तान गणतांत्रिक संघ (एच.आर.ए)। अशफाक़ उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, राजिंद्र लाहिड़ी व रोशन सिंह इसी संघ के सदस्य थे। इनका मकसद था- आज़ाद, सेक्युकर, संघीय, गणतांत्रिक भारत।
अंग्रेज सरकार इन संघर्षों को 'षड्यंत्र' कहती थी। अशफ़ाक़-बिस्मिल-लाहिड़ी व रोशन सिंह पर भी 'काकोरी षड्यंत्र' का आरोप लगा! अंग्रेज सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया । 1927 के दिसम्बर महीने में फांसी दे दी। यह साल जलियावाला बाग के शहीदों का भी 100 वां साल है जब दमनकारी कानून 'रॉलेट एक्ट' के खिलाफ हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख जनता ने एकजुट होकर विरोध किया था ! जिस पर चारों ओर से गोलियां चली थी! सैकड़ों लोग मार दिए गए थे।
हमारी प्रेरणा काकोरी के शहीद हैं! अशफ़ाक़-बिस्मिल-लाहिड़ी व रोशन सिंह हैं! जलियावाला बाग के शहीद हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख हैं ! जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम के रूप में खुद को नहीं देखा। खुद को शोषित-उत्पीड़ित, गुलाम मेहनतकश इंसान के बतौर देखा था।
ऐसे ही अनगिनत लोगों ने कुर्बानियां दी तब यह देश आजाद हुआ था। यह आज़ादी 'आधी-अधूरी' थी। जैसा कि शहीद भगत सिंह ने कहा था। अंग्रेज पूंजीवादी शासकों से तो हमें आज़ादी मिल गई मगर अब देशी पूंजीपति-जमींदार शासक बन गए, शोषक-उत्पीड़क बन बैठे।
आज हालात क्या है ? तस्वीर बिल्कुल साफ-साफ है आज नफरत ही की बातें हो रही है। आज़ादी, अधिकारों की बात करते छात्रों से नफरत, दलितों से नफरत, महिलाओं की बराबरी के लिए आवाज उठाने से नफरत, मुस्लिनों से नफरत ! नफरत सबके जेहन में ठूंसी जा रही है। 'बांटो और राज करो' यही आज खुलकर हो रहा है।
हाल यह है कि आज देश आर्थिक संकट में है ! 10 लाख से ज्यादा मज़दूर नौकरी से निकाले जा चुके हैं। हज़ारों की तादाद में सरकारी कर्मचारियों की छंटनी होनी हैं। 45 सालों बाद देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है! इधर छोटे कारोबारी परेशान हैं दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में हैं। बाजार में सामान भरा पड़ा है मगर खरीददार गायब हैं !
इसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर है ये पूंजीपति इनकी राजनीतिक पार्टियां, नोटबंदी, जी एस टी जैसे इनके तुगलकी फरमान, और पूंजीवादी व्यवस्था !! मगर दूसरी ओर अम्बानी-अदाणी जैसों की पूंजी व दौलत इस संकट में भी खूब बड़ी है। दोनों देश के टॉप पूंजीपति बन चुके हैं।
आज कौन है जो नहीं जानता? कि ये अम्बानी-अदाणी जैसे पूंजीपति ही हैं जो मोदी- शाह की ताकत हैं। यही जो पहले कांग्रेस के साथ थे मगर आज मोदी-शाह के साथ हैं। हर कोई आज यह जानता है कि इनके मुनाफे को तेजी से बढ़ाने के लिये सरकार जनता के जीवन स्तर को और नीचे गिरा रही है। मज़दूर कर्मचारी विरोधी व जनविरोधी कानून तेजी से बना रही है।
ऐसा नहीं कि इसके खिलाफ चुप्पी हो। विरोध जारी है। एक ओर मज़दूर कारखानों में मालिकों व सरकार से लड़ रहे हैं। कर्मचारी राजधानियों में आंदोलन करते हैं। दूसरी ओर छात्र-नौजवान कॉलेजों में बढ़ती भारी फीस के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, किसान सड़कों पर उमड़ आते हैं! सब कुटते हैं पिटते हैं फर्जी मुकदमे झेलते हैं ! खबरों में इनकी कोई जगह नहीं। आती है तो नीचे पट्टी पर सरकती हुई सी खबर !!
इन संघर्षों से सरकार कैसे निपटे ? तबाही-बर्बादी से कल सड़कों पर जनसैलाब उमड़ आये तो फिर क्या हो ? जैसा मिश्र, फ्रांस, लेबनॉन, ईरान, इराक में हो रहा है। इसीलिये देश में बड़ी बड़ी पूंजी के मालिकों ने हिन्दू फासीवादी ताकतों को सत्ता पर बिठाया है। इनके जरिए ये 'आतंकी तानाशाही' कायम कर देना चाहते हैं ताकि जनता के विरोध, संघर्ष, अधिकारों की हर आवाज को कुचल दिया जाय।
सत्ता पर बैठे ये फासीवादी हिटलर-मुसोलिनी की ही तरह हैं। फासीवादी हिटलर व उसकी पार्टी ने 'जर्मन आर्यन राष्ट्र' का नारा दिया था, यहूदियों के खिलाफ नफरत, उन्माद पैदा किया था। फिर बड़ी-बड़ी पूंजी के मालिकों की आतंकी तानाशाही' कायम कर दी थी।
यही खतरा हमारे देश में भी बिल्कुल सामने है। यहां यह सब कुछ 'हिन्दू राष्ट्र' के नाम पर हो रहा है। नफरत भरी राजनीति जनता के दिमाग में ठूंसी जा रही है। समस्या की वजह लम्बे समय से ही मुस्लिम भी बताए जाते रहे हैं! इसीलिए फिर ऐसे मुद्दे लाये जाते है जिनसे यह खाई और चौड़ी हो, नफरत और गहरी हो। सत्ता पर बैठी फासीवादी ताकतें और ज्यादा मजबूत हों। तीन तलाक, राम मंदिर, 370, एन.आर.सी.अब धर्म के आधार पर नागरिकता सशोधन बिल। इन सबके जरिये यह हो रहा है।!
हकीकत यह है कि इस फासीवादी राजनीति के निशाने पर देश के मज़दूर हैं किसान हैं कर्मचारी हैं छात्र-नौजवान हैं मेहनतकश महिलाएं हैं छोटे कारोबारी व दुकानदार हैं।
मगर हो क्या रहा है ? हम खुद को शोषित-उत्पीड़ित नागरिक के बतौर नहीं देख रहे, मज़दूर मेहनतकश इंसान के रूप में नहीं देख रहे हैं बल्कि 'हिन्दू-मुस्लिम' के रूप में देख रहे हैं। फिर सरकार जब एक धर्म विशेष के लोगों को निशाने पर लेती है हमला करती है तो दूसरे धर्म विशेष के लोगों के कलेजे को ठंडक मिलती हैं। इस तरह वे सरकार के हथियार बन जाते हैं, एक मज़दूर ,कर्मचारी, दुकानदार, नागरिक के रूप में अपने ही अधिकारों को लात मार रहे होते हैं।
इस तरह बेहद आसानी से हमारे जनवादी अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों को खोखला कर दिया जाता है। संविधान को व्यवहार में खोखला बना दिया जाता है। जो लोग इसे समझ रहे हैं इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उन्हें अरबन नक्सल बताया जाता है देशविरोधी बताया जाता है।
अब एन.आर.सी देश भर में लागू करने की बात हो रही है। असम में क्या हुआ ? एन.आर.सी प्रक्रिया असम में हुई। हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हुए। खुद को नागरिक साबित करने के लिए लोगों ने दर दर की खाक छानी। कुछ लोग सदमे में मर गए। अन्ततः 19 लाख लोगों की 'नागरिकता' खत्म हो गई। लाखों लोग बूढ़े, बच्चे, महिलाएं व पुरुष जो मेहनतकश इंसान हैं वे अचानक 'घुसपैठिये' हो गए ! 'दीमक' हो गये। ये लोग अपने ही देश में 'देशविहीन' हो गए 'नागरिकताविहीन' हो गये। इसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही हैं। 3000 लोग यातना केम्प में हैं। जिसमें 29 की रहस्यमय मौत हो चुकी है। यही अब देश भर में होना है। कहा जा रहा है कि 'हिंदुओं' को दिक्कत नहीं होगी। असल में यह जनता को अलग-थलग करके निपटा देने की महज साजिश है।
यह कैसी घृणित, घटिया व नफरत भरी नज़र है जिन्हें गरीब मज़दूर मेहनतकश इंसान 'दीमक' नज़र आते हैं। ये विदेशों में दर-दर पूंजी की भीख मांग रहे हैं विदेशी पूंजी व पूंजी के मालिकों के लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं यहां नफरत नहीं है यहां हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई नहीं है पूंजी का मालिक कोई भी हो क्या फर्क है क्योकिं वह ताकतवर है सरकार उसी की दया पर है।
मुट्ठी भर पूंजीपति जो परजीवी हैं जोंक हैं सब कुछ इनके हाथों में हैं नेता इनके, पार्टियां इनकी, देश के संसाधन इनके। सारे अधिकार इनके ही है। आज ये मोदी -शाह के जरिये अपने घृणित मंसूबे आगे बढ़ा रहे हैं। ये मेहनतकश नागरिकों को जानवरों की तरह कभी इधर तो कभी उधर हांक रहे हैं। अधिकारहीन बना रहे हैं।
जो सोचते हैं कि कांग्रेस, आप या कोई और पूंजीवादी पार्टी इनके नेता इस संकट से बाहर निकाल लेगें ! तो वो गलत सोचते हैं। ये सारी पार्टियां पूंजीपतियों की ही हैं। इनके बीच केवल सत्ता के लिए संघर्ष है! ये भी जन विरोधी व भ्रष्ट हैं।
देश के असली निर्माता मेहनतकश नागरिक हैं चाहे हिन्दू हों या मुस्लिम! ये करोड़ों-करोड़ हैं। वे सबसे पहले मज़दूर हैं छात्र हैं किसान है कर्मचारी हैं छोटे-छोटे कारोबारी हैं दुकानदार हैं। रोजी-रोटी के बिना जीवन कहां? इसलिए अधिकार छीने जाने, कमजोर किये जाने की हर साजिश के खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी। हमें हर उस चीज के खिलाफ आवाज उठानी होगी जो हमें बांटती है हमारी एकता को कमजोर करती हैं संघर्ष को कमजोर करती है, संवैधानिक अधिकारों को खोखला बनाती है।
काकोरी के शहीदों को हमारी यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। शहीद भगत सिंह ने 'समाजवाद' की जो राह बताई थी अन्ततः उस दिशा में बढ़ा जाय तभी ऐसे संकटों से मुक्ति मिल सकती है।
काकोरी के शहीदों का संगठन था -हिंदुस्तान गणतांत्रिक संघ (एच.आर.ए)। अशफाक़ उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, राजिंद्र लाहिड़ी व रोशन सिंह इसी संघ के सदस्य थे। इनका मकसद था- आज़ाद, सेक्युकर, संघीय, गणतांत्रिक भारत।
अंग्रेज सरकार इन संघर्षों को 'षड्यंत्र' कहती थी। अशफ़ाक़-बिस्मिल-लाहिड़ी व रोशन सिंह पर भी 'काकोरी षड्यंत्र' का आरोप लगा! अंग्रेज सरकार ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया । 1927 के दिसम्बर महीने में फांसी दे दी। यह साल जलियावाला बाग के शहीदों का भी 100 वां साल है जब दमनकारी कानून 'रॉलेट एक्ट' के खिलाफ हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख जनता ने एकजुट होकर विरोध किया था ! जिस पर चारों ओर से गोलियां चली थी! सैकड़ों लोग मार दिए गए थे।
हमारी प्रेरणा काकोरी के शहीद हैं! अशफ़ाक़-बिस्मिल-लाहिड़ी व रोशन सिंह हैं! जलियावाला बाग के शहीद हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख हैं ! जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम के रूप में खुद को नहीं देखा। खुद को शोषित-उत्पीड़ित, गुलाम मेहनतकश इंसान के बतौर देखा था।
ऐसे ही अनगिनत लोगों ने कुर्बानियां दी तब यह देश आजाद हुआ था। यह आज़ादी 'आधी-अधूरी' थी। जैसा कि शहीद भगत सिंह ने कहा था। अंग्रेज पूंजीवादी शासकों से तो हमें आज़ादी मिल गई मगर अब देशी पूंजीपति-जमींदार शासक बन गए, शोषक-उत्पीड़क बन बैठे।
आज हालात क्या है ? तस्वीर बिल्कुल साफ-साफ है आज नफरत ही की बातें हो रही है। आज़ादी, अधिकारों की बात करते छात्रों से नफरत, दलितों से नफरत, महिलाओं की बराबरी के लिए आवाज उठाने से नफरत, मुस्लिनों से नफरत ! नफरत सबके जेहन में ठूंसी जा रही है। 'बांटो और राज करो' यही आज खुलकर हो रहा है।
हाल यह है कि आज देश आर्थिक संकट में है ! 10 लाख से ज्यादा मज़दूर नौकरी से निकाले जा चुके हैं। हज़ारों की तादाद में सरकारी कर्मचारियों की छंटनी होनी हैं। 45 सालों बाद देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है! इधर छोटे कारोबारी परेशान हैं दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में हैं। बाजार में सामान भरा पड़ा है मगर खरीददार गायब हैं !
इसका जिम्मेदार कौन है ? जाहिर है ये पूंजीपति इनकी राजनीतिक पार्टियां, नोटबंदी, जी एस टी जैसे इनके तुगलकी फरमान, और पूंजीवादी व्यवस्था !! मगर दूसरी ओर अम्बानी-अदाणी जैसों की पूंजी व दौलत इस संकट में भी खूब बड़ी है। दोनों देश के टॉप पूंजीपति बन चुके हैं।
आज कौन है जो नहीं जानता? कि ये अम्बानी-अदाणी जैसे पूंजीपति ही हैं जो मोदी- शाह की ताकत हैं। यही जो पहले कांग्रेस के साथ थे मगर आज मोदी-शाह के साथ हैं। हर कोई आज यह जानता है कि इनके मुनाफे को तेजी से बढ़ाने के लिये सरकार जनता के जीवन स्तर को और नीचे गिरा रही है। मज़दूर कर्मचारी विरोधी व जनविरोधी कानून तेजी से बना रही है।
ऐसा नहीं कि इसके खिलाफ चुप्पी हो। विरोध जारी है। एक ओर मज़दूर कारखानों में मालिकों व सरकार से लड़ रहे हैं। कर्मचारी राजधानियों में आंदोलन करते हैं। दूसरी ओर छात्र-नौजवान कॉलेजों में बढ़ती भारी फीस के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, किसान सड़कों पर उमड़ आते हैं! सब कुटते हैं पिटते हैं फर्जी मुकदमे झेलते हैं ! खबरों में इनकी कोई जगह नहीं। आती है तो नीचे पट्टी पर सरकती हुई सी खबर !!
इन संघर्षों से सरकार कैसे निपटे ? तबाही-बर्बादी से कल सड़कों पर जनसैलाब उमड़ आये तो फिर क्या हो ? जैसा मिश्र, फ्रांस, लेबनॉन, ईरान, इराक में हो रहा है। इसीलिये देश में बड़ी बड़ी पूंजी के मालिकों ने हिन्दू फासीवादी ताकतों को सत्ता पर बिठाया है। इनके जरिए ये 'आतंकी तानाशाही' कायम कर देना चाहते हैं ताकि जनता के विरोध, संघर्ष, अधिकारों की हर आवाज को कुचल दिया जाय।
सत्ता पर बैठे ये फासीवादी हिटलर-मुसोलिनी की ही तरह हैं। फासीवादी हिटलर व उसकी पार्टी ने 'जर्मन आर्यन राष्ट्र' का नारा दिया था, यहूदियों के खिलाफ नफरत, उन्माद पैदा किया था। फिर बड़ी-बड़ी पूंजी के मालिकों की आतंकी तानाशाही' कायम कर दी थी।
यही खतरा हमारे देश में भी बिल्कुल सामने है। यहां यह सब कुछ 'हिन्दू राष्ट्र' के नाम पर हो रहा है। नफरत भरी राजनीति जनता के दिमाग में ठूंसी जा रही है। समस्या की वजह लम्बे समय से ही मुस्लिम भी बताए जाते रहे हैं! इसीलिए फिर ऐसे मुद्दे लाये जाते है जिनसे यह खाई और चौड़ी हो, नफरत और गहरी हो। सत्ता पर बैठी फासीवादी ताकतें और ज्यादा मजबूत हों। तीन तलाक, राम मंदिर, 370, एन.आर.सी.अब धर्म के आधार पर नागरिकता सशोधन बिल। इन सबके जरिये यह हो रहा है।!
हकीकत यह है कि इस फासीवादी राजनीति के निशाने पर देश के मज़दूर हैं किसान हैं कर्मचारी हैं छात्र-नौजवान हैं मेहनतकश महिलाएं हैं छोटे कारोबारी व दुकानदार हैं।
मगर हो क्या रहा है ? हम खुद को शोषित-उत्पीड़ित नागरिक के बतौर नहीं देख रहे, मज़दूर मेहनतकश इंसान के रूप में नहीं देख रहे हैं बल्कि 'हिन्दू-मुस्लिम' के रूप में देख रहे हैं। फिर सरकार जब एक धर्म विशेष के लोगों को निशाने पर लेती है हमला करती है तो दूसरे धर्म विशेष के लोगों के कलेजे को ठंडक मिलती हैं। इस तरह वे सरकार के हथियार बन जाते हैं, एक मज़दूर ,कर्मचारी, दुकानदार, नागरिक के रूप में अपने ही अधिकारों को लात मार रहे होते हैं।
इस तरह बेहद आसानी से हमारे जनवादी अधिकारों, संवैधानिक अधिकारों को खोखला कर दिया जाता है। संविधान को व्यवहार में खोखला बना दिया जाता है। जो लोग इसे समझ रहे हैं इसके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उन्हें अरबन नक्सल बताया जाता है देशविरोधी बताया जाता है।
अब एन.आर.सी देश भर में लागू करने की बात हो रही है। असम में क्या हुआ ? एन.आर.सी प्रक्रिया असम में हुई। हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हुए। खुद को नागरिक साबित करने के लिए लोगों ने दर दर की खाक छानी। कुछ लोग सदमे में मर गए। अन्ततः 19 लाख लोगों की 'नागरिकता' खत्म हो गई। लाखों लोग बूढ़े, बच्चे, महिलाएं व पुरुष जो मेहनतकश इंसान हैं वे अचानक 'घुसपैठिये' हो गए ! 'दीमक' हो गये। ये लोग अपने ही देश में 'देशविहीन' हो गए 'नागरिकताविहीन' हो गये। इसमें हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही हैं। 3000 लोग यातना केम्प में हैं। जिसमें 29 की रहस्यमय मौत हो चुकी है। यही अब देश भर में होना है। कहा जा रहा है कि 'हिंदुओं' को दिक्कत नहीं होगी। असल में यह जनता को अलग-थलग करके निपटा देने की महज साजिश है।
यह कैसी घृणित, घटिया व नफरत भरी नज़र है जिन्हें गरीब मज़दूर मेहनतकश इंसान 'दीमक' नज़र आते हैं। ये विदेशों में दर-दर पूंजी की भीख मांग रहे हैं विदेशी पूंजी व पूंजी के मालिकों के लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं यहां नफरत नहीं है यहां हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई नहीं है पूंजी का मालिक कोई भी हो क्या फर्क है क्योकिं वह ताकतवर है सरकार उसी की दया पर है।
मुट्ठी भर पूंजीपति जो परजीवी हैं जोंक हैं सब कुछ इनके हाथों में हैं नेता इनके, पार्टियां इनकी, देश के संसाधन इनके। सारे अधिकार इनके ही है। आज ये मोदी -शाह के जरिये अपने घृणित मंसूबे आगे बढ़ा रहे हैं। ये मेहनतकश नागरिकों को जानवरों की तरह कभी इधर तो कभी उधर हांक रहे हैं। अधिकारहीन बना रहे हैं।
जो सोचते हैं कि कांग्रेस, आप या कोई और पूंजीवादी पार्टी इनके नेता इस संकट से बाहर निकाल लेगें ! तो वो गलत सोचते हैं। ये सारी पार्टियां पूंजीपतियों की ही हैं। इनके बीच केवल सत्ता के लिए संघर्ष है! ये भी जन विरोधी व भ्रष्ट हैं।
देश के असली निर्माता मेहनतकश नागरिक हैं चाहे हिन्दू हों या मुस्लिम! ये करोड़ों-करोड़ हैं। वे सबसे पहले मज़दूर हैं छात्र हैं किसान है कर्मचारी हैं छोटे-छोटे कारोबारी हैं दुकानदार हैं। रोजी-रोटी के बिना जीवन कहां? इसलिए अधिकार छीने जाने, कमजोर किये जाने की हर साजिश के खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी। हमें हर उस चीज के खिलाफ आवाज उठानी होगी जो हमें बांटती है हमारी एकता को कमजोर करती हैं संघर्ष को कमजोर करती है, संवैधानिक अधिकारों को खोखला बनाती है।
काकोरी के शहीदों को हमारी यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। शहीद भगत सिंह ने 'समाजवाद' की जो राह बताई थी अन्ततः उस दिशा में बढ़ा जाय तभी ऐसे संकटों से मुक्ति मिल सकती है।
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