Wednesday, 22 March 2017

23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर



   23 मार्च शहादत दिवस के अवसर पर
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     पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध अभी जारी है
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     ‘‘निकट भविष्य में अंतिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारंभ किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त होगा।’’  (‘हमें फांसी के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये’ शीर्षक से पंजाब के गर्वनर को लिखे पत्र से)
     यह शब्द शहीदे आजम भगत सिंह के हैं। 23 मार्च, 1931 को जालिम अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भगत सिंह, सुखदेव  और राजगुरू को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था। अंग्रेज शासकों ने सोचा कि उनकी मौत के साथ यह युद्ध वह जीत जायेंगे लेकिन शोषण-उत्पीड़न-असमानता के खिलाफ यह युद्ध आज भी जारी है। इस युद्ध में एक तरफ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी  शासक हैं तो दूसरी तरफ मजदूर-मेहनतकश-छात्र-नौजवान हैं। शहीदे आजम भगत सिंह मजदूरों-मेहनतकशों के योद्धा के बतौर इस युद्ध में शहीद हुए।
     फांसी पर चढ़ने से पहले भगत सिंह महान रूसी क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। फांसी से पहले जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि उन्हें लेनिन की जीवनी पूरी करने का समय दिया जाये। लेनिन उस रूसी क्रांति के नेता थे जिस क्रांति ने दुनिया में पहली बार मजदूरों-किसानों की सत्ता की स्थापना की। रूसी क्रांति ने जारीशाही शासन का समाप्त कर समाजवाद की स्थापना की तथा मानव द्वारा मानव के शोषण का खात्मा किया। यह वर्ष महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति (1917) का सौंवा वर्ष है।
       रूस की समाजवादी क्रांति ने न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा बल्कि 20 वीं सदी के इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी। इस क्रांति ने गुलामी, शोषण, असमानता और साम्राज्यवाद से लोहा लेने वाली ताकतों को नयी ऊर्जा व नयी राह प्रदान की। समाजवादी क्रांति ने दुनिया के शोषित-उत्पीड़ितों को बताया कि पूंजीवादी लोकतंत्र नहीं बल्कि समाजवादी लोकतंत्र ही उनकी मुक्ति का मार्ग है। रूसी समाजवादी क्रांति ने यह साबित कर दिया कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विकल्प समाजवाद है, कि दुनिया को अब परजीवी शासकों की जरूरत नही है बल्कि मजदूर-मेहनतकश स्वंय अपना शासन चला सकते हैं और उनसे बेहतर चला सकते हैं। कि भविष्य समाजवाद का है। दुनिया के कोने-कोने में समाजवाद के लिए संघर्ष करने वालों में भगत सिंह भी एक हैं। 
      भगत सिंह ऐसे युवा थे जो जोश और उमंग के साथ-साथ अपनी वैचारिक परिपक्वता के लिए जाने जाते हैं। भगत सिंह देश के नौजवानों को, वे चाहे मजदूर हों, छात्र हों या फिर बेरोजगार को ऊर्जा से भर देने वाले शख्स हैं। उनका पूरा जीवन बात का गवाह रहा है। युवाओं की उर्जा, उत्साह क्या होता है और अन्याय के खिलाफ अनवरत संघर्ष कैसे किया जाता है यह भगत सिंह से सीखा जा सकता है। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट-शोषण के खिलाफ संघर्ष भगत सिंह के संघर्ष का एक हिस्सा था तो मजदूरों-किसानों का राज समाजवाद की स्थापना करना दूसरा हिस्सा था। आज भी दुनिया और देश पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से मुक्त नहीं है। मजदूरों-किसानों-छात्र-नौजवानों को जीवन कष्टमय बना हुआ है।
       दुनिया में छाया आर्थिक संकट मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन और कष्टों से भर रहा है। शासक वर्ग रही-सही राहत भी मजदूरों-मेहनतकशों से छीन लेने पर आमादा है। पूरी ही दुनिया में शासक वर्ग दक्षिणपंथ की ओर ढुलकता जा रहा है। पूंजीवादी लोकतंत्र को और सीमित करते हुए वे मेहनतकशों पर हमलावर है। पूंजी की लूट, मुनाफे को बढ़ाने के लिए तथा मजदूर-मेहनतकशों को और निचोड़ने के लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। 
        भारत में भी संघी सरकार मजदूरों-मेहनतकशों पर हमले के नये कीर्तिमान रच रही है। श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव, मजदूरों के शोषण के लिए विदेशी निवेश को आतुर यह सरकार पूर्व की सरकारों को भी पीछे छोड़ दे रही है।आर्थिक हमलों के साथ-साथ संघी सरकार अपने फासीवादी एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ा रही है और अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को निर्ममता से कुचल रही है। विरोध के स्वर से निपटने में वह लंपटाई में उतर आयी है। कालेज-कैंपस संघी गुण्डागर्दी के अड्डे बनते जा रहे हैं। 
        ऐसे समय में भगत सिंह व उनके विचार और भी महत्व ग्रहण कर लेते हैं। ऐसे समय में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति और भी प्रासंगिक हो जाती है। चहुंओर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से पीड़ित जन की मुक्ति का मार्ग समाजवादी क्रांति से होकर जाता है। भगत सिंह ऐसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे जो भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के साथ-साथ शोषण और सभी तरह की असमानता से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत थे। जिसमें उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
    भगत सिंह ने कहा था-‘‘ हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असंभव बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतंत्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय संकट में है।’’ (‘अदालत एक ढकोसला है’ से कमिश्नर विशेष ट्रिब्यूनल लाहौर साजिश केस के सामने स्पष्टीकरण)
    आज के इस कठिन दौर में भगत द्वारा बताया गया समाजवाद का रास्ता ही मजदूरों-किसानांं-छात्रों-नौजवानों-महिलाओं के जीवन में बेहतरी का रास्ता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपने पतन में इस कदर डूब चुके हैं कि वे मानवजाति पर एक त्रासदी बन गये हैं। मजदूरों-मेहनतकशों को, छात्रों-युवाओं-महिलाओं को क्रांति और समाजवाद के परचम को लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचाना होगा जिसे शहीदे आजम भगत सिंह ने एक समय बुलंद किया था। 
     अक्टूबर क्रांति के सौवें वर्ष पर तथा शहीदे आजम भगत सिंह के शहादत दिवस पर हम मजदूरों-मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं का आहवान करते हैं कि मुक्ति के संघर्ष को आगे बढ़ायें। 

Saturday, 18 March 2017

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत

 

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत


अंततः नोटबंदी के राजनीतिक स्टंट के जरिये अपने विरोधियों को चित करने की मोदी की मंशा यू पी जीत के साथ पूरी हो गयी। उत्तराखंड व यू पी में लगभग तीन चौथाई सीट हासिल करने के बावजूद मोदी का कॉन्ग्रेस मुक्त भारत का सपना अधूरा रह गया। शायद मोदी जी भूल गए कि जिन
ताकतों ने उन्हे पाल पोस कर दिल्ली के तख़्त पर बिठाया है वही ताकते कोंग्रेस की पीठ पर भी हाथ रखे हुए है।  

     पंजाब में कॉन्ग्रेस तीन चौथाई सीटें हासिल की तो मणिपुर व गोवा में सबसे बड़ी पार्टी रही उत्तराखंड में भा ज पा की वोट % 54 से 46 रह गयी (2014 की तुलना में ) जबकि 2012 की तुलना में लगभग 13 % बढ़ गया। यू पी में 2014 की तुलना में भाजपा का वोट % 42 से 40 के लगभग हो गया। जबकि 2012 के असेम्बली चुनाव की तुलना में 25 % बढ़ गए। पंजाब में भा ज पा का वोट शेयर 2014 के लगभग 9 % से गिरकर 5.4 % ही गया जबकि कोंग्रेस के 2014 के 33 % से बढ़कर 39 % ही गए। गोवा में भाजपा के वोट शेयर 2014 के 53 % से घटकर 33 % हो गए । कॉन्ग्रेस के 37 % से घटकर लगभग 28 % रह गए। यू पी व उत्तराखंड में मिली जीत को ही देश के लिए जनादेश के रूप में प्रचारित किया रहा है। यू पी में फासीवादी ताकतों के लिए सब कुछ दांव पर लगा था । 
      मीडिया की मोदी भक्ति के बावजूद माहौल पक्ष में नहीं था। इसके बावजूद इतने बड़े स्तर पर सीटों का मिलना इस आरोप में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश छोड़ देता है कि ई वी एम में गड़बड़ी की गयी हो । यदि ऐसा नहीं है तो फिर दूसरे समीकरण जिसके लिए मोदी अमित शाह ने अपनी पूरी ताकत लगाई थी वह सफल हो गयी यानि जाति के भीतर सूक्ष्म स्तर के बंटवारे को इस्तेमाल करना , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना, मीडिया में चौतरफा मोदी प्रचार, पूरे मंत्री मंड़ल को चुनाव में झौंक देना आदि।   
      मोदी की यू पी जीत के साथ अम्बानी अदानी जैसी प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व अब और बढ़ने की ओर है। दूसरी ओर फासीवादी ताकतों के हमले जनवादी प्रगतिशील व क्रांतिकारी ताकतों पर बढ़ने है। मज़दूर मेहनतकश अवाम समेत छोटी मझोली पूंजी की तबाही बर्बादी आने वाले वक्त में और तेज होनी है

Wednesday, 8 March 2017

8 मार्च : अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस

8 मार्च :  अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस
 
    मौजूदा दौर में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का है। समस्या तब और विकराल हो जाती है सत्ता पर बैठे लोग इसे परोक्ष तौर बढ़ावा देते है और कुछ तो खुद इसमें शामिल भी है ।    महिला व बल विकास मंत्री मेनका गांधी जब ये कहती है कि हार्मोनल बिस्फोट से बचाव को लक्षमण रेखा होनी चाहिए। तब यह शासकों की घटिया मानसिकता को व्यक्त करता है।
  महिलाये किसी भी उम्र की हों घर या बाहर हर जगह असुरक्षित हैं। निर्भया कांड जैसी घटनाएं अब बढ़ती जा रही है।  
   लेकिन शासकों के पास इलाज के नाम पर वही नीम हकीमी नुस्खा है मज़बूत सरकार - कठोर कानून - मज़बूत क़ानून व्यवस्था । 
  इस तर्क को करने वाले सशत्र बलों द्वारा सशत्र बल विशेषाधिकार क़ानून के तहत मणिपुर से कश्मीर तक महिलाओं पर किये गए यौन हिंसा को सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे से भी बाहर करने को सही ठहराते है व इसे कोर्ट में भी चुनौती न दिए जा सकने को सही बताते है।
     स्पष्ट है कि मामला कुछ व्यक्तियों का नहीं है बल्कि समूछे तंत्र का है व्यवस्था का है। यह पूंजीवादी व्यवस्था जिसकी बुनियाद शोषण और लूट पर टिकी है । जहाँ दिन रात महिला को यौन वस्तु मे बदल देने का प्रचार हो वहां यह मुमकिन नहीं कि लैंगिक बराबरी कायम हो, महिला मुक्ति हासिल हो।
 महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पूंजीवादी समाज के  पूर्व के समाजों में भी मौजूद थी । यानी वर्गीय समाजों की उत्पत्ति के साथ यह यौन हिंसा प्रारंभ होने लगती है और आज यह व्यापक और विकराल रूप धारण करती जा रही है।
  वर्गीय समाज की उत्पत्ति के साथ यौन हिंसा के दो संगठित और भिन्न रूप  एकनिष्ठ विवाह और वेश्यावृत्ति सामने आये। दोनों रूप एक-दूसरे से विपरीत थे परंतु  दोनों ही रूपों में स्त्री का कोई वज़ूद नहीं था वह कहीं नहीं थी। 
उसकी हैसियत संपत्ति की सी थी । जिसे काबू में रखने के लिए तमाम नियम कानून बनाये गए । धर्म के जरिये इसे पवित्र व संस्थाबद्ध कर दिया गया।
   इसलिए अक्टूबर क्रांति शताब्दी वर्ष पर समाजवादी क्रांति की उपलब्धियों को याद करते हुए यही कहना या स्थापित करना होगा कि महिला मुक्ति का रास्ता सिर्फ समाजवाद से होकर जाता है।





 

Friday, 3 February 2017

देशी विदेशी पूंजी के हितों को साधता बजट

देशी विदेशी पूंजी के हितों को साधता बजट

  2017-18 का बजट घोषित हो गया। 16 मई 2014 के दिन से यह तय हो गया था कि जिन नवउदारवादी नीतियों के घोड़े की लगाम पहले कांग्रेस के पास थी अब वह फासीवादी ताकतों के हाथ में थी इसे तेज भागना ही था।
    इसलिए बजट भी उसी तरह का बनना था। 2015 के बजट में ही यह साफ़ ही चुका था। तब सामाजिक कल्याणकारी मदों में दी जाने वाली राशि में बड़ी कटौती की गयी थी। ग़रीब मेहनतकश अवाम के पक्ष में खर्च होने वाली सब्सिडी को और कम कर दिया गया था।
    इसके उलट देशी विदेशी पूंजी को तमाम सहूलियते-छूटें दी गयी । कर में लाखों करोड़ की छूट, कॉर्पोरेट व संपत्ति कर से राहत आदि।
    2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद से ही साम्राज्यवादी मुल्कों विशेषकर अमेरिका का ये दबाव और बढ़ा है कि राजकोषीय घाटे को लगातार कम किया जाय, सामाजिक मद में खर्च होने वाले बजट को लगातार कम  किया जाय, सब्सीडी (गरीबों) को ख़त्म किया जाय, पूंजी को लूट के रास्ते को और सुगम बनाया जाय। विनिवेशीकरण नये आर्थिक सुधारों के दौर का ही नारा है।
     यही मूल मंत्र बजट में दिखता है राजकोषीय घाटे को 3.2 % पर लाने के लिए सरकार खुद तो देशी विदेशी पूंजी उनकी तारीफ कर रही है यही हाल नोटबंदी के बाद होने वाले नुकसान के बावजूद सामाजिक मदो  व सब्सिडी में कटौती जारी है। यही नहीं सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश(निजीकरण) के जरिये 72500 करोड़ रूपये उगाहने का लक्ष्य सरकार ने लिया है।
     सार्वजनिक मद स्वास्थ्य, शिक्षा , परिवहन, महिला बाल कल्याण विकास आदि के लिये क्या किया गया कितना बजट दिया गया । इन सभी में बजट के आकार  व मुद्रा स्फीति के अनुपात में गिरावट जारी है।
     वैश्विक मानव विकास सूचकांक में बेहद ख़राब स्थिति के बावजूद संघी मोदी सरकार का इन मदो में कटौती करना उसकी नग्न पूंजीपरस्ती व गरीब अवाम के प्रति घोर संवेदनहीनता को ही दिखाता है।
    2012 में निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा के लिए पिछले साल जारी "निर्भया फंड" बजट  585 करोड़ को कम करके 400 करोड़ कर दिया गया है।
      मनरेगा में पिछले साल के कुल 47400 करोड़ को बढाकर 48000 करोड़ मात्र किया गया मात्र 1.2 % की बढ़ोत्तरी !! किसानों को कितने के कर्ज माफी से राहत दी गयी ?  राहत तो दूर उल्टा उन्हें सांस्थानिक कर्ज जाल में फ़साने के लिए भारी भरकम राशि कर्ज के लिए उपलब्ध है। 

     इसके उलट पूंजीपतियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स में 5 % की छूट के अलावा उन्हें प्रत्यक्ष व परोक्ष फायदा देने को तमाम बातें बजट में हैं । 2015 में ही संघी मोदी सरकार पूंजीपतियों को 6 लाख करोड़ रूपये टेक्स में छूट दे चुकी थी । 

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...