Sunday, 14 May 2017

सहारनपुर के शब्बीरपुर दंगे

     सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हुए हमले की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट
**************************************************************
     ( क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की अगुवाई में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र एवं नौजवान भारत सभा के कार्यकर्त्ताओ ने तथ्यों की जांच पड़ताल के लिए शब्बीरपुर गांव का दौरा 8 मई को किया इस जांच पड़ताल के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।)
----------------------------------------------------------
सहारनपुर से लगभग 26 किमी दूरी पर शब्बीरपुर गांव पड़ता है । मुख्य सड़क से तकरीबन आधा किमी दूरी पर यह गांव है।इस गांव के आस पास ही महेशपुर व शिमलाना गांव भी पड़ते है। गांव के भीतर प्रवेश करते वक्त सबसे पहले दलित समुदाय के घर पड़ते है। जो कि लगभग 200 मीटर के दायरे में गली के दोनों ओर बसे हुए हैं। यहां घुसते ही हमें गली के दोनों ओर जले हुए घर, तहस नहस किया सामान दिखाई देता है। दलित समुदाय के कुछ युवक, महिलाएं व अधेड़ पुरुष दिखाई देते हैं जिनके चेहरे पर खौफ, गुस्सा व दुख के मिश्रित भाव को साफ साफ पढ़ा जा सकता है। 
  इस गांव के निवासियों के मुताबिक गांव में तकरीबन 2400 वोटर हैं जिसमें लगभग 1200 वोटर ठाकुर समुदाय के , 600 वोटर दलित (चमार)जाति के है। इसके अलावा कश्यप, तेली व धोबी, जोगी (उपाध्याय) आदि समुदाय से हैं। मुस्लिम समुदाय के तेली व धोबी के तकरीबन 12- 13 परिवार हैं। गांव में एक प्राइमरी स्कूल हैं जिसमें ठाकुर समुदाय के गिने चुने बच्चे ही पड़ते हैं जबकि अधिकांश दलितों के बच्चे यहां पड़ते हैं।
      गांव की अधिकांश खेती वाली जमीन ठाकुरों के पास है लेकिन 25-35 दलित परिवारों के पास भी जमीन है। दलित प्रधान जो कि 5 भाई है के पास भी तकरीबन 60  बीघा जमीन है। 
      गांव में ठाकुर बिरादरी के बीच भा ज पा के लोगों का आना जाना है। जबकि दलित समुदाय ब स पा से सटा हुआ है। गांव का प्रधान दलित समुदाय से शिव कुमार है जो कि ब स पा से भी जुड़े हुए हैं। इस क्षेत्र के गांव मिर्जापुर के दलित सत्यपाल सिंह ने बताया कि वह खुद आर एस एस(संघ) से लंबे समय से जुड़े हुए है शिमलाना, महेशपुर व शब्बीरपुर गांव में भी संघ की शाखाएं लगती हैं हालांकि इनमें दलितों की संख्या 6-7 के लगभग है और इस गांव से कोई भी दलित शाखाओं में नहीं जाता है।

घटना व घटना की तात्कालिक पृष्ठभूमि----  5 मई को दलित समुदाय को निशाना बनाने से कुछ वक्त पहले कुछ ऐसी बातें हुई थी जिसने दलितों को सबक सिखाने की सोच और मज़बूत होते चले गई । 14 अप्रेल को अम्बेडकर दिवस के मौके पर गांव के दलित अपने रविदास मंदिर के बाहर परिसर में अम्बेडकर की मूर्ती लगाना चाह रहे थे । लेकिंन गांव के ठाकुर समुदाय के लोगों ने इस पर आपत्ति की।प्रशासन ने मूर्ति लगाने की अनुमति दलितों को नहीं दी । मूर्ति लगाने के दौरान पुलिस प्रशासन को गांव के ठाकुर लोगों ने बुलाया। पुलिस मौके पर पहुँची मूर्ति नही लगाने दी गई । दलितों से कहा गया कि वो प्रशासन की अनुमति का इंतजार करें। जो कि नहीं मिली।
     5 मई को इस गांव के पास शिमलाना में ठाकुर समुदाय के लोग "महाराणा प्रताप जयंती" को मनाने के लिए एकजुट हुए थे। इनकी तादात हज़ारों में बताई गई है। इसमे शब्बीरपुर गांव के ठाकुर भी थे। ये सभी सर पे राजपूत स्टाइल का साफा पहने हुए थे, हाथों में तलवार थामे हुए थे व डंडे लिए हुवे थे। 
5 मई को सुबह लगभग 10:30 बजे गांव के ठाकुर समुदाय के कुछ युवक बाइक में दलित समुदाय की ओर से जाने वाले रास्ते पर से डी जे बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे। इस पर दलितों ने आपत्ति जताई ।  क्योंकि प्रशासन से इनकी अनुमति नहीं थी । इसका दलितों ने विरोध किया लेकिन इस पर भी मामला नही रुका तो दलित प्रधान ने पुलिस प्रशासन को सूचित किया। पुलिस आई और डी जे को हटा दिया गया। दलित समुदाय के लोगों ने आगे बताया कि इसके बाद ये बाइक में रास्ते से गुजरते हुए " अम्बेडकर मुर्दाबाद", "राजपुताना जिंदाबाद" महाराणा प्रताप जिंदाबाद" के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे। वह रास्ते से 2-3 बार गुजरे। इन दौरान फिर पुलिस भी आई। 
ठाकुर समुदाय के लोगों का कहना था कि इन दौरान दलित प्रधान ने रास्ते से गुजर रहे इन लोगों पर पथराव किया। जबकि दलित समुदाय के लोग इससे इनकार करते हैं। हो सकता है दलितों की ओर से कुछ पथराव हुआ हो। क्योंकि इसी दौरान ठाकुर समुदाय के लोग महाराण प्रताप जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए रविदास मंदिर पर हमला करने की ओर बढ़े। 
लगभग 11 बजे के आस पास रविदास मंदिर पर हमला बोला गया। दूसरे गांव से आये एक ठाकुर युवक ने रविदास की मूर्ति तोड़ दी नीचे गिरा दी । दलितों ने बताया कि इस पर पेशाब भी की गई। और यह युवक जैसे ही मंदिर के अंदर से बाहर परिसर की ओर निकला वह जमीन पर गिर गया। और उसकी मृत्यु हो गई । इसकी हत्या का आरोप दलितों पर लगाया गया। इण्डियन एक्सप्रेस के मुताबिक पोस्टमार्टम में मृत्यु की वजह ( suffocation) दम घुटना है। 
तुरंत ही दलितों द्वारा ठाकुर युवक की हत्या की खबर आग की तरह फैलाई गई । और फिर शिमलाना में महाराण प्रयाप जयंती से जुड़े सैकड़ो लोग तुरंत ही गांव में घुस आए। इसके बाद तांडव रचा गया। तलवार, डंडे से लैस इन लोगों ने दलितों पर हमला बोल दिया। थिनर की मदद से घरों को आग के हवाले कर दिया गया। लगभग 55 घर जले । 12 दलित घायल हुए इसमें से एक गंभीर हालत में है। गाय, भैस व अन्य जानवरों को भी निशाना बनाया गया।इस तबाही के निशान हर जगह दिख  रहे थे। यहां से थोड़ी दूर महेशपुर में सड़क के किनारे दलितों के 10 खोखे आग के हवाले कर दिए गए। यह सब चुन चुन कर किया गया। 
घायलों में 5 महिलाएं है जबकि 7 पुरुष। गांव के दलित प्रधान का बेटा  गंभीर हालत में देहरादून जौलीग्रांट में भर्ती है। तलवार व लाठी डंडे के घाव इनके सिर हाथ पैर पर बने हुए हैं। रीना नाम की महिला के शरीर पर बहुत घाव व चोट है। इस महिला के मुताबिक इसकी छाती को भी काटने व उसे आग में डालने की कोशिश हुई। वह किसी तरह बच पायी।

शासन , पुलिस प्रशासन व मीडिया की भूमिका ----- सरकार व पुलिस प्रशासन की भूमिका संदेहास्पद है व उपेक्षापूर्ण है। यह आरोप है कि घटनास्थल पर हमले के दौरान मौजूद पुलिस हमलावरों का साथ देने लगी व कुछ दलितों के साथ इस दौरान मारपीट भी पुलिस ने की । संदेह की जमीन यहीं से बन जाती है कि जब संघ व भाजपा के लोग अम्बेडकर को हड़पने पर लगे है तब दलितों को उन्हीं के रविदास मंदिर परिसर में अम्बेडकर की प्रतिमा लगाने से रोक दिया गया व प्रशासन ने इसकी अनुमति ही नहीं दी।
दलितों पर कातिलाना हमले के बाद भी सरकार व मुख्यमंत्री  के ओर से दलितों के पक्ष में कोई प्रयास नहीं हुए जिससे कि उन्हें महसूस होता कि उनके साथ न्याय हुआ हो। इसके बजाय मामला और ज्यादा भड़काने वाला हुआ । एक ओर पुलिस प्रशासन ने पीड़ितों व हमलवारों को बराबर की श्रेणी में रखा और हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगों के साथ साथ दलितों पर भी मुकदमे दर्ज किए दिए गए । 8 मई  तक मात्र 17 लोग ही गिरफ्तार किए गए इसमें लगभग 7 दलित समुदाय के थे जबकि 10 ठाकुर समुदाय के। जबकि दूसरी ओर ठाकुर समुदाय से मृतक परिवार के लोगों को  मुआवजा देने की खबर आई व मेरठ में मुख्य मंत्री योगी द्वारा अम्बेडकर की मुर्ती पर माल्यार्पण न करने की खबर भी फैलने लगी।
घायल लोगों के कोई बयान पुलिस ने 8 मई तक अस्पताल में नहीं लिए थे। घायल लोगों के कपड़े  घटना वाले दिन के ही पहने हुए हैं जो कि खून लगे हुए थे। ये पूरे शासन प्रशासन की संवेदनहीनता को दिखाता है।
इस दौरान गांव में डी एम ने एक बार दौरा किया व कुछ परिवारों को राशन दिया। लेकिन लोगो की जरूरत और ज्यादा की थी उन्हें छत के रूप में तिरपाल की भी जरूरत थी। लेकिन शासन प्रशासन ने फिर मदद को कोई क़दम नहीं उठाया। बाहर से जो लोग मदद पहुंचा रहे थे उन्हें भी प्रशासन ने रोक दिया। 
लखनऊ से गृह सचिव व डी जी पी स्थिति का जायजा लेंने पहुंचे तो वे केवल अधिकारियों से वार्ता करके चले गए गांव जाना व वंहा दलितों से मिलने का काम इन्होंने नहीं किया।
बात यही नही रुकी। दलितों ने भेद भाव पूर्ण व्यवहार के विरोध में तथा मुआवजे के लिए एकजुट होने की कोशिश को भी रोका गया। दलित छात्रावास में रात को ही पी ए सी तैनात कर दी गई। और जब गांधी पार्क से एकजुट दलित लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उस पर लाठीचार्ज कर दिया गया। 
मीडिया ने इस कातिलाना हमले को दो समुदाय के टकराव(clash) के रूप में प्रस्तुत किया। हमलावरों व हमले के शिकार लोगों को एक ही केटेगरी में रखा गया। इसका नतीजा ये रहा कि दलितों में पुलिस प्रशासन व मीडिया के प्रति अविश्वास व नफरत बढ़ते गया।
शबीरपुर घटना की दीर्घकालिक वजह :-----  सहारनपुर  में दलितों की आर्थिक व राजनीतिक स्थिति तुलनात्मक तौर ठीक है और यह तुलनात्मक तौर पर मुखर भी है । आरक्षण के चलते थोड़ा बहुत सम्पन्नता दलितों में आई है अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुए है। लेकिन इन बदलाव को  सवर्ण समुदाय विशेषकर ठाकुर समुदाय के लोग अपनी सामंती मानसिकता के चलते सह नहीं पाते। उन्हें यह बात नफरत से भर देती है कि कल तक जिन्हें वे जब तब रौंदते रहते थे आज वही उन्हें आँख दिखाते है ।
जब से एस सी एस टी एक्ट बना हुआ है  इस मुकदमे के डर से ठाकुर समुदाय के लोगों को जबरन खुद को नियंत्रित करना पड़ता है कभी कभी तो जेल भी जाना पड़ता है। ये बात इन्हें नफरत से भर देती है।ठाकुर समुदाय के लोग महसूस करते है कि बसपा की सरकार थी तो बस इन दलितों का ही राज था। अभी बसपा की सरकार होती तो सारे ठाकुर अंदर होते, भा जा पा के होने केवल 10-12 लोग ही अरेस्ट हुए। दलित व ठाकुरों के बीच के अंतर्विरोध अलग अलग वक्त पर झगड़ो के रूप में दिखते हैं।
चूंकी संघ ने निरंतर ही अपनी नफरत भरी जातिवादी विचारो का बीज इस इलाके में भी बोया है। सवर्ण समुदाय इससे ग्रसित है। वह आरक्षण व सामाजिक समानता का विरोधी है। इसलिए यह अंतर्विरोध और तीखा हुआ है। संघ मुस्लिमों के विरोध में सभी हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश कर रहा है अपने फास्सिट आंदोलन को मजबूत कर रहा है । शब्बीरपुर घटना उसके लिए फायदेमंद नहीं है।
चुकी शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के वोटर दलितों से दुगुने होने के बावजूद ठाकुर अपना प्रधान नहीं बना पाए। एक बार रिजर्ब सीट होने के चलते तो दूसरी दफा सामान्य सीट होने के के बावजूद। 
जब ठाकुर समुदाय के लोगों से यह पूछा गया कि ऐसा कैसे हुआ ? तो उन्होंने जवाब दिया कि सारे चमार, तेली कश्यप एक हो गए हम ठाकुर एक नही हो पाए ज्यादा ठाकुर चुनाव में खड़े हो गए, वोट बंट गए और हार गए। इसका बहुत अफसोस इन्हें हो रहा था। 
इसके अलावा दलितों के पास जमीन होना भी ठाकुर लोगों के कूड़न व चिढ़ को उनके चेहरे व बातों में दिखा रहा रहा था। ठाकुर लोगों से जब पूछा गया कि गांव में सबसे ज्यादा जमीन किसके पास है ? तो जवाब मिला - सबके पास है दलितों के पास भी बहुत है प्रधान के पास 100 बीघा है उसका भटटा भी है पटवारी भी दलित है जितना मर्जी उतनी जमीन पैसे खाकर दिखा देता है।
ठाकुर परिवार की महिलाएं बोली - हमारी तो इज्जत है हम घर से बाहर नही जा सकती, इनकी(दलित महिलाएं)  क्या इज्जत, सब ट्रैक्टर मैं बैठकर शहर जाती है पैसे लाती है। ठाकुर लोग फिर आगे बोले-इनके ( दलितों) के तो 5-5 लोग एक घर से कमाते है 600 रुपये मज़दूरी मिलती है हमारी तो बस किसानी है हम तो परेशान हैं आमदनी ही नहीं है।
यही वो अंतर्विरोध थे जो लगातार भीतर ही भीतर बढ़ रहे थे दलितों को सबक सिखाने की मंशा लगातार ही बढ़ रही थी। और फिर 5 मई को डी जे के जरिये व फिर नारेबाजी करके मामला दलितों पर बर्बर कातिलाना हमले तक पहुंचा दिया गया। इसमें कम से कम स्थानीय स्तर के भा ज पा , संघ व पुलिस प्रशासन की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। 
 5 मई को शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया । जिसमें हजारों लोग गांव में इकट्ठे हुवे थे। ऐसा कार्यक्रम सहारनपुर के गांव में पहली दफा हुआ। जबकि इससे पहले यह जिला मुख्यालय पर हुआ है।
दलित समाज की प्रतिकिया व शासन प्रशासन--- जैसा कि स्पष्ट है विशेष तौर पर पुलिस प्रशासन के प्रति इनमें गहरा आक्रोश था। जब 9 तारीख को दोपहर में गांधी पार्क पर लाठी चार्ज किया गया तो शाम अंधेरा होते होते यह पुलिस प्रशासन से मुठभेड़ करते हुए दिखा। इनकी मांग थी - हमलावर ठाकुर समुदाय के लोगो को 24 घंटे के भीतर गिरफ्तार करो।
सहारनपुर के रामनगर,नाजीरपुरा,चिलकाना व मानकमऊ में सड़कें ब्लॉक कर दी गई । यह दलित समुदाय के युवाओं के एक संगठन 'भीम आर्मी' ने किया। लाठी डंडो से लैस इन युवाओं को पुलिस प्रशासन ने जब फिर खदेड़ने की कोशिश की तो फिर पुलिस को टारगेट करते हुए हमला बोल दिया गया।पुलिस थाने में आग लगा दी गई । पुलिस की कुछ गाड़िया जला दी गई ।पुलिस का जो भी आदमी हाथ आया उसे दौड़ा दौड़ा कर पिटा गया। अधिकारियों को भी इस आक्रोश को देख डर कर भागना  पड़ा। एक दो पत्रकारों को भी पीटा गया व बाइक जला दी। एक बस से यात्रियों को बाहर कर बस में आग लगा दी गई। 
इस आक्रोश से योगी सरकार के माथे पर कुछ लकीरें उभर आई। तुरंत ही अपनी नाकामयाबी का ठीकरा दो एस पी पर डालकर उन्हें हटा दिया गया। और अब वह "कानून का राज" कायम करने के नाम पर दलित युवाओं से बनी भीम आर्मी पर हमलावर हो गई है। अस्पताल से लेकर छात्रावास व गांव तक हर जगह इनको चिन्हित कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। जबकि ठाकुर समुदाय के तलवार के बल पर खौफ व दहशत का माहौल पैदा करने वाले महाराण प्रताप जयंती वाली सेना को सर आंखों पर बिठा कर रखा जाता है। उनके खिलाफ ऐसी कोई कार्यवाही सुनने या देखने पढ़ने को नही मिली।साफ महसूस हो रहा है कि पुलिस प्रशासन अब पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दलित समुदाय के लोगों को सबक सिखाने की ओर अपने कदम बढ़ा चुका है। 
कुल मिलाकर शासन -प्रशासन व राज्य सरकार का रुख दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण, उपेक्षापूर्ण , दमनकारी व सबक सिखाने का बना हुआ है। इसलिये आने वाले वक्त में यह समस्या और गहराएगी। वैसे भी जब जातिवादी , साम्प्रदायिक व फासिस्ट विचारों से लैस पार्टी सत्ता में बैठी हुई हो तो इससे अलग व बेहतर की उम्मीद करना मूर्खता है। 



















Wednesday, 22 March 2017

23 मार्च भगत सिंह शहादत दिवस पर



   23 मार्च शहादत दिवस के अवसर पर
        --------------------------------––-------------
     पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ युद्ध अभी जारी है
   ***************************************


     ‘‘निकट भविष्य में अंतिम युद्ध लड़ा जायेगा और यह युद्ध निर्णायक होगा। साम्राज्यवाद और पूंजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। यही वह लड़ाई है जिसमें हमने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया है और हम अपने पर गर्व करते हैं कि इस युद्ध को न तो हमने प्रारंभ किया है और न यह हमारे जीवन के साथ समाप्त होगा।’’  (‘हमें फांसी के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये’ शीर्षक से पंजाब के गर्वनर को लिखे पत्र से)
     यह शब्द शहीदे आजम भगत सिंह के हैं। 23 मार्च, 1931 को जालिम अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने भगत सिंह, सुखदेव  और राजगुरू को फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था। अंग्रेज शासकों ने सोचा कि उनकी मौत के साथ यह युद्ध वह जीत जायेंगे लेकिन शोषण-उत्पीड़न-असमानता के खिलाफ यह युद्ध आज भी जारी है। इस युद्ध में एक तरफ पूंजीवादी-साम्राज्यवादी  शासक हैं तो दूसरी तरफ मजदूर-मेहनतकश-छात्र-नौजवान हैं। शहीदे आजम भगत सिंह मजदूरों-मेहनतकशों के योद्धा के बतौर इस युद्ध में शहीद हुए।
     फांसी पर चढ़ने से पहले भगत सिंह महान रूसी क्रांतिकारी लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। फांसी से पहले जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा पूछी गयी तो उन्होंने कहा कि उन्हें लेनिन की जीवनी पूरी करने का समय दिया जाये। लेनिन उस रूसी क्रांति के नेता थे जिस क्रांति ने दुनिया में पहली बार मजदूरों-किसानों की सत्ता की स्थापना की। रूसी क्रांति ने जारीशाही शासन का समाप्त कर समाजवाद की स्थापना की तथा मानव द्वारा मानव के शोषण का खात्मा किया। यह वर्ष महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति (1917) का सौंवा वर्ष है।
       रूस की समाजवादी क्रांति ने न सिर्फ पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा बल्कि 20 वीं सदी के इतिहास की पूरी दिशा ही बदल दी। इस क्रांति ने गुलामी, शोषण, असमानता और साम्राज्यवाद से लोहा लेने वाली ताकतों को नयी ऊर्जा व नयी राह प्रदान की। समाजवादी क्रांति ने दुनिया के शोषित-उत्पीड़ितों को बताया कि पूंजीवादी लोकतंत्र नहीं बल्कि समाजवादी लोकतंत्र ही उनकी मुक्ति का मार्ग है। रूसी समाजवादी क्रांति ने यह साबित कर दिया कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का विकल्प समाजवाद है, कि दुनिया को अब परजीवी शासकों की जरूरत नही है बल्कि मजदूर-मेहनतकश स्वंय अपना शासन चला सकते हैं और उनसे बेहतर चला सकते हैं। कि भविष्य समाजवाद का है। दुनिया के कोने-कोने में समाजवाद के लिए संघर्ष करने वालों में भगत सिंह भी एक हैं। 
      भगत सिंह ऐसे युवा थे जो जोश और उमंग के साथ-साथ अपनी वैचारिक परिपक्वता के लिए जाने जाते हैं। भगत सिंह देश के नौजवानों को, वे चाहे मजदूर हों, छात्र हों या फिर बेरोजगार को ऊर्जा से भर देने वाले शख्स हैं। उनका पूरा जीवन बात का गवाह रहा है। युवाओं की उर्जा, उत्साह क्या होता है और अन्याय के खिलाफ अनवरत संघर्ष कैसे किया जाता है यह भगत सिंह से सीखा जा सकता है। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट-शोषण के खिलाफ संघर्ष भगत सिंह के संघर्ष का एक हिस्सा था तो मजदूरों-किसानों का राज समाजवाद की स्थापना करना दूसरा हिस्सा था। आज भी दुनिया और देश पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से मुक्त नहीं है। मजदूरों-किसानों-छात्र-नौजवानों को जीवन कष्टमय बना हुआ है।
       दुनिया में छाया आर्थिक संकट मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन और कष्टों से भर रहा है। शासक वर्ग रही-सही राहत भी मजदूरों-मेहनतकशों से छीन लेने पर आमादा है। पूरी ही दुनिया में शासक वर्ग दक्षिणपंथ की ओर ढुलकता जा रहा है। पूंजीवादी लोकतंत्र को और सीमित करते हुए वे मेहनतकशों पर हमलावर है। पूंजी की लूट, मुनाफे को बढ़ाने के लिए तथा मजदूर-मेहनतकशों को और निचोड़ने के लिए वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं। 
        भारत में भी संघी सरकार मजदूरों-मेहनतकशों पर हमले के नये कीर्तिमान रच रही है। श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव, मजदूरों के शोषण के लिए विदेशी निवेश को आतुर यह सरकार पूर्व की सरकारों को भी पीछे छोड़ दे रही है।आर्थिक हमलों के साथ-साथ संघी सरकार अपने फासीवादी एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ा रही है और अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज को निर्ममता से कुचल रही है। विरोध के स्वर से निपटने में वह लंपटाई में उतर आयी है। कालेज-कैंपस संघी गुण्डागर्दी के अड्डे बनते जा रहे हैं। 
        ऐसे समय में भगत सिंह व उनके विचार और भी महत्व ग्रहण कर लेते हैं। ऐसे समय में महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति और भी प्रासंगिक हो जाती है। चहुंओर पूंजीवाद-साम्राज्यवाद से पीड़ित जन की मुक्ति का मार्ग समाजवादी क्रांति से होकर जाता है। भगत सिंह ऐसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी थे जो भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के साथ-साथ शोषण और सभी तरह की असमानता से मुक्ति दिलाने के लिए संघर्षरत थे। जिसमें उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
    भगत सिंह ने कहा था-‘‘ हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर एक नये सुगठित समाज में बदलना चाहते हैं। इस तरह मनुष्य के हाथों मनुष्य का शोषण असंभव बनाकर सभी के लिए सब क्षेत्रों में पूरी स्वतंत्रता विश्वसनीय बनायी जाये। जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह कर देने वाले प्रलय संकट में है।’’ (‘अदालत एक ढकोसला है’ से कमिश्नर विशेष ट्रिब्यूनल लाहौर साजिश केस के सामने स्पष्टीकरण)
    आज के इस कठिन दौर में भगत द्वारा बताया गया समाजवाद का रास्ता ही मजदूरों-किसानांं-छात्रों-नौजवानों-महिलाओं के जीवन में बेहतरी का रास्ता है। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद अपने पतन में इस कदर डूब चुके हैं कि वे मानवजाति पर एक त्रासदी बन गये हैं। मजदूरों-मेहनतकशों को, छात्रों-युवाओं-महिलाओं को क्रांति और समाजवाद के परचम को लेकर अपनी मंजिल तक पहुंचाना होगा जिसे शहीदे आजम भगत सिंह ने एक समय बुलंद किया था। 
     अक्टूबर क्रांति के सौवें वर्ष पर तथा शहीदे आजम भगत सिंह के शहादत दिवस पर हम मजदूरों-मेहनतकशों, छात्रों-नौजवानों, महिलाओं का आहवान करते हैं कि मुक्ति के संघर्ष को आगे बढ़ायें। 

Saturday, 18 March 2017

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत

 

धुर प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी की जीत


अंततः नोटबंदी के राजनीतिक स्टंट के जरिये अपने विरोधियों को चित करने की मोदी की मंशा यू पी जीत के साथ पूरी हो गयी। उत्तराखंड व यू पी में लगभग तीन चौथाई सीट हासिल करने के बावजूद मोदी का कॉन्ग्रेस मुक्त भारत का सपना अधूरा रह गया। शायद मोदी जी भूल गए कि जिन
ताकतों ने उन्हे पाल पोस कर दिल्ली के तख़्त पर बिठाया है वही ताकते कोंग्रेस की पीठ पर भी हाथ रखे हुए है।  

     पंजाब में कॉन्ग्रेस तीन चौथाई सीटें हासिल की तो मणिपुर व गोवा में सबसे बड़ी पार्टी रही उत्तराखंड में भा ज पा की वोट % 54 से 46 रह गयी (2014 की तुलना में ) जबकि 2012 की तुलना में लगभग 13 % बढ़ गया। यू पी में 2014 की तुलना में भाजपा का वोट % 42 से 40 के लगभग हो गया। जबकि 2012 के असेम्बली चुनाव की तुलना में 25 % बढ़ गए। पंजाब में भा ज पा का वोट शेयर 2014 के लगभग 9 % से गिरकर 5.4 % ही गया जबकि कोंग्रेस के 2014 के 33 % से बढ़कर 39 % ही गए। गोवा में भाजपा के वोट शेयर 2014 के 53 % से घटकर 33 % हो गए । कॉन्ग्रेस के 37 % से घटकर लगभग 28 % रह गए। यू पी व उत्तराखंड में मिली जीत को ही देश के लिए जनादेश के रूप में प्रचारित किया रहा है। यू पी में फासीवादी ताकतों के लिए सब कुछ दांव पर लगा था । 
      मीडिया की मोदी भक्ति के बावजूद माहौल पक्ष में नहीं था। इसके बावजूद इतने बड़े स्तर पर सीटों का मिलना इस आरोप में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश छोड़ देता है कि ई वी एम में गड़बड़ी की गयी हो । यदि ऐसा नहीं है तो फिर दूसरे समीकरण जिसके लिए मोदी अमित शाह ने अपनी पूरी ताकत लगाई थी वह सफल हो गयी यानि जाति के भीतर सूक्ष्म स्तर के बंटवारे को इस्तेमाल करना , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना, मीडिया में चौतरफा मोदी प्रचार, पूरे मंत्री मंड़ल को चुनाव में झौंक देना आदि।   
      मोदी की यू पी जीत के साथ अम्बानी अदानी जैसी प्रतिक्रियावादी एकाधिकारी पूंजी का वर्चस्व अब और बढ़ने की ओर है। दूसरी ओर फासीवादी ताकतों के हमले जनवादी प्रगतिशील व क्रांतिकारी ताकतों पर बढ़ने है। मज़दूर मेहनतकश अवाम समेत छोटी मझोली पूंजी की तबाही बर्बादी आने वाले वक्त में और तेज होनी है

Wednesday, 8 March 2017

8 मार्च : अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस

8 मार्च :  अन्तराष्ट्रीय श्रमिक महिला दिवस
 
    मौजूदा दौर में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का है। समस्या तब और विकराल हो जाती है सत्ता पर बैठे लोग इसे परोक्ष तौर बढ़ावा देते है और कुछ तो खुद इसमें शामिल भी है ।    महिला व बल विकास मंत्री मेनका गांधी जब ये कहती है कि हार्मोनल बिस्फोट से बचाव को लक्षमण रेखा होनी चाहिए। तब यह शासकों की घटिया मानसिकता को व्यक्त करता है।
  महिलाये किसी भी उम्र की हों घर या बाहर हर जगह असुरक्षित हैं। निर्भया कांड जैसी घटनाएं अब बढ़ती जा रही है।  
   लेकिन शासकों के पास इलाज के नाम पर वही नीम हकीमी नुस्खा है मज़बूत सरकार - कठोर कानून - मज़बूत क़ानून व्यवस्था । 
  इस तर्क को करने वाले सशत्र बलों द्वारा सशत्र बल विशेषाधिकार क़ानून के तहत मणिपुर से कश्मीर तक महिलाओं पर किये गए यौन हिंसा को सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे से भी बाहर करने को सही ठहराते है व इसे कोर्ट में भी चुनौती न दिए जा सकने को सही बताते है।
     स्पष्ट है कि मामला कुछ व्यक्तियों का नहीं है बल्कि समूछे तंत्र का है व्यवस्था का है। यह पूंजीवादी व्यवस्था जिसकी बुनियाद शोषण और लूट पर टिकी है । जहाँ दिन रात महिला को यौन वस्तु मे बदल देने का प्रचार हो वहां यह मुमकिन नहीं कि लैंगिक बराबरी कायम हो, महिला मुक्ति हासिल हो।
 महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा पूंजीवादी समाज के  पूर्व के समाजों में भी मौजूद थी । यानी वर्गीय समाजों की उत्पत्ति के साथ यह यौन हिंसा प्रारंभ होने लगती है और आज यह व्यापक और विकराल रूप धारण करती जा रही है।
  वर्गीय समाज की उत्पत्ति के साथ यौन हिंसा के दो संगठित और भिन्न रूप  एकनिष्ठ विवाह और वेश्यावृत्ति सामने आये। दोनों रूप एक-दूसरे से विपरीत थे परंतु  दोनों ही रूपों में स्त्री का कोई वज़ूद नहीं था वह कहीं नहीं थी। 
उसकी हैसियत संपत्ति की सी थी । जिसे काबू में रखने के लिए तमाम नियम कानून बनाये गए । धर्म के जरिये इसे पवित्र व संस्थाबद्ध कर दिया गया।
   इसलिए अक्टूबर क्रांति शताब्दी वर्ष पर समाजवादी क्रांति की उपलब्धियों को याद करते हुए यही कहना या स्थापित करना होगा कि महिला मुक्ति का रास्ता सिर्फ समाजवाद से होकर जाता है।





 

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...