Monday, 15 October 2018

‘‘मी टू’’ अभियान व भा ज पा

              ‘‘मी टू’’ अभियान   व  भा ज पा
 
      पिछले कुछ वक़्त से देश में #मी टू अभियान ने उन चेहरों को बेनकाब करना शुरू कर दिया है जो अपने उजले चेहरे के पीछे पाखण्ड एवं स्त्री विरोधी कृत्य किये बैठे हैं। यह आंदोलन अमेरिका से अन्य मुल्कों होते हुए भारत पहुंच गया है। फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर पत्रकारिता, खेल जगत में फिलहाल वो महिलाएं जिन्होंने कभी अपने अतीत में यौन शोषण या उत्पीड़न को झेला है अब उन   घटनाओं व व्यक्तियों को सामने ला रही है जिन्होंने तब अपने पद , ताकत, शोहरत का इस्तेमाल अपनी मातहत पर किया। इस अभियान में नाना पाटेकर , आलोक नाथ से लेकर भाजपा के केंद्रीय मंत्री और एक दौर के प्रख्यात पत्रकार संपादक एम जे अकबर पर ऐसे गम्भीर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे है।
       केंद्रीय मंत्री एम जे अकबर के खिलाफ तो अब तक 4-6 महिला पत्रकार ने ऐसे आरोप लगाए है। यह राजनीतिक पार्टियों के लिए ऐसा मुद्दा बन गया है जो न उगलते बन रहा है न निगलते। इस पर सामान्य वक्तव्य देने के अलावा विशिष्ट रूप में कोई  बात या कार्यवाही की बात नही की गई है।
      जहां तक मोदी सरकार का रुख है इस मुद्दे पर मोदी का 'चिरपरिचित मौन' बरकरार है। वैसे भी 'स्नूपगेट' के आरोपियों से ऐसे असुविधाजनक 'मुद्दों' पर वक्तव्य देने की उम्मीद नही की जा सकती। एक ऐसी पार्टी से तो वैसे भी कतई नही जो पितृसत्तात्मक मूल्यों में सनी हुई हो जिसे 'वैवाहिक बलात्कार' पर कार्यवाही का मसला भारतीय संस्कृति या हिदू विवाह संस्कार पर हमला दिखाई देता हो। इसीलिए एम जे अकबर ने  अपने पीछे मोदी सरकार का वरदहस्त के साथ '97' वकील की टीम के दम पर उस महिला पत्रकार पर कानूनी कार्यवाही के रूप में हमला बोल दिया है जिसने एक वक़्त के बाद कुछ कहने का साहस जुटाया था।
      खैर! जहां तक इस अभियान की बात है # मी टू’’ की यही बात खास है कि यह सत्ताधारी वर्ग की शासक वर्ग की ढंकी-छिपी सच्चाई को बाहर लाता है। यहां उत्पीड़क और उत्पीड़ित दोनों ही पूंजीपति वर्ग के सदस्य हैं। उत्पीड़क अपनी कुत्सित यौन इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है। वह राष्ट्रपति होकर या किसी प्रभावशाली पद पर होकर एक स्त्री के मान, गरिमा, इच्छा किसी से भी खेल सकता है। और जिससे खेला जा रहा हो वह अपने को इसके लिए चाहे-अनचाहे पेश करती है चुप रहती है क्योंकि चुप रहने से उस वक्त लाभ है। उसके कैरियर को सहारा मिल सकता है। उसे सफलता मिल सकती है। दौलत, शौहरत, ग्लैमर के साथ सेलीब्रेटी बनने का मौका मिल सकता है। यह उस समय कैरियर के लिए किया जाने वाला अति आवश्यक समझौता (कम्प्रोमाइज) बन जाता है।हर कोई जानता है कि ऐसा होता है। जो कर रहा है वह तो मजे ले रहा है। जिसके साथ हो रहा है वह मानता है यह एक कम्प्रोमाइज है। एक वक्ती चीज है।
       दरअसल सड़ते-गलते पूंजीवादी समाज की यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे हर सामान्य, हर मजदूर-मेहनतकश स्त्री अपने रोज के अनुभव से जानती है, वह है उसके साथ होने वाला यौन दुर्व्यवहार। यह यौन दुर्व्यवहार सामान्य छेड़छाड़, फब्तियां कसने से लेकर वीभत्स गैंग रेप से आगे हत्या तक जाता है।
     '#मी टू ' अभियान से इस बात का अंदाजा लगाया सकता है कि जब शासक वर्ग के स्तर पर महिलाओं की यह स्थिति हो तब आम मज़दूर मेहनतकश महिलाओं की स्थिति कैसी होगी।
      यहीं से इस आन्दोलन की सीमाएं भी उजागर हो जाती है यह व्यापकता में इस समस्या को नही देखता। यह लैंगिक अधिकारों की बराबरी की बात करते हुए सामाजिक बराबरी की दिशा में नही जा पाता। हालांकि इसमें सकारात्मक कहने को यह है कि ऐसे मामले उछलने से, महिलाओं का खुल कर अपनी बात कहने से एक हद तक ऐसी मानसिकता वाले लोगो पर कुछ लगाम तो लगती ही है।
      लेकिन दूसरी तरफ यह मसले को व्यक्तिवादी बना देता है यह पुरुष बनाम स्त्री के रूप में समस्या को देखता है। यह स्त्री विरोधी मानसिकता, पुरूष प्रधान मानसिकता को पैदा करती सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को चिन्हित नही करता। इस रूप में यह आंदोलन संकीर्ण भी है। यह मात्र सुधार की चाहत रखने वाला सहुलियत वाला आंदोलन है। यह इस पूंजीवादी व्यवस्था को अपने निशाने पर कतई भी नही लेता जिसने अपनी गति में महिलाओं को यौन वस्तु में तब्दील कर दिया है। यह केवल कुछ कानूनी नुक्तों के दम पर इस प्रकार के उत्पीड़न पर लगाम लगाने की चाहत रखता है।




  
  

  

प्रवासियों के खिलाफ गुजरात में हिंसा


प्रवासियों के खिलाफ गुजरात में हिंसा
 
महाराष्ट्र की तर्ज पर  गुजरात में भी उत्तर भारतीयों पर विशेषकर बिहार व उत्तर प्रदेश के लोगो पर बड़ी तादाद में हमले किये गए हैं। हिंसा व नफरत के चलते गुजरात छोड़कर गृह प्रदेश में वापस आना पड़ रहा है। ये सिलसिला अभी रुका नही है।
इस हिंसा के पीछे ठाकोर सेना का हाथ बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि गुजरात के कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर इसके पीछे है। कांग्रेस का आरोप है कि इसके पीछे भा ज पा है उनके संगठन है। आरोप प्रत्यारोप का यह सिलसिला जारी है।
 मामले के केवल तात्कालिकता तक जोड़ कर  असल वजह को छुपा लिया जाता है। हमने देखा है कि उत्तर भारतीयों के प्रति खासकर यहां के कामगारों मज़दूरों के प्रति जो रोजगार की तलाश में अपने प्रांत से महाराष्ट्र में गए हैं उनके प्रति एक गहरी नफरत भरी राजनीति का प्रचार शिव सेना व बाद में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने निरन्तर किया है। इनके द्वारा अलग अलग वक़्त पर इन उत्तर भारतीयों लोगों पर हमले किये जाते रहे हैं। इस हमले में इन्होंने स्थानीय आबादी को अपने संकीर्ण पूंजीवादी राजनीति के इर्द गिर्द लामबद्ध किया और हिंसा में उसे भागीदार बनाया है।यही स्थिति गुजरात के मामले में भी है। यही असम में हिंदी भाषी मज़दूरों के साथ हुई हिंसा में भी देखा जा सकता है।

संघ परिवार व भाजपा लंबे समय से अपनी साम्प्रदायिक राजनीति में अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिमों के प्रति नफरत का जमकर प्रचार व आंदोलन किया है। इस काम में कांग्रेस भी बहुत पीछे नही रही है। शिव सेना को खड़ा करने में कांग्रेस की भूमिका रही है।
 दरअसल रोज़गार का संकट पूरे देश के पैमाने पर मौजूद है गुजरात भी इससे अछूता नहीं है। आरक्षण के लिए अभी कुछ साल पहले हार्दिक पटेल की अगुवाई में जो आन्दोलन हुआ वहां से भी इस संकट को समझा जा सकता है। 
हकीकत यही है कि पूंजीवाद अपनी गति में आम तौर पर बेरोजगार आबादी को बढ़ाता है इसमें एक छोर पर पूंजी तो दूसरे छोर पर कंगाली , बेरोजगारी का संचय होता जाता है। इस बेरोज़गारी का समाधान पूंजीवाद के रहते आम तौर पर सम्भव नहीं है। ऐसी स्थितियों में पूंजीवादी राजनीति एक समय में इस संकट का आभासी समाधान ही प्रस्तुत करती है। इसमें से एक आभासी समाधान यह भी है कि एक क्षेत्र , प्रांत या देश में बेरोजगारी के लिए दूसरे क्षेत्र, प्रांत के लोगों या या धर्म , नस्ल आदि के लोगों को बताया जाय। इस संकीर्ण, साम्प्रदायिक, विभाजनकारी राजनीति का परिणाम अपनी निरंतरता में नफरत व हिंसा को बढ़ाने वाला होता है। गुजरात में भी जो हिंसा हुई है उसके मूल में यही है। जहां तक सभी नागरिकों को सम्मानजनक रोज़गार उपलब्ध कराने का सवाल है यह केवल नियोजित व योजनाबद्ध समाजवादी अर्थव्यवस्था में ही सम्भव है। जहां पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के बुनियादी अंतर्विरोध को हल कर लिया जाता है।

Monday, 8 October 2018

पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतें और निरन्तर कमजोर होता रुपया

  पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतें और निरन्तर कमजोर होता रुपया
       
        पेट्रोल डीजल की कीमतें मोदी सरकार के जमाने में तुलनात्मक तौर पर बहुत तेजी से बढ़ती चले गई है और मौजूदा वक्त में यह पेट्रोल 90 तक डीजल 80 तक पहुंच चुका है।
         अब चुकीं एक ओर तीन राज्यों में जल्द ही चुनाव होने है और फर छः माह बाद लोक सभा के चुनाव होने हैं। दूसरी ओर शेयर मार्केट इस बीच लगातार संकट में है इस दबाव में 2.5 रुपये की कटौति की घोषणा तेल की कीमतों में के गई है। कुछ राज्यों के स्तर पर वैट कम करने के बाद तेल की कीमतों में 2.5 से लेकर 5 रुपये की कटौती की बातें की जा रही है।
         कोई कह सकता है कि मोदी सरकार ने जनता को राहत दी है लेकिन हकीकत क्या है ? हकीकत यह है कि मोदी सरकार ने 4 साल में अपनी सत्ता के दौरान औसतन  2.5 लाख करोड़ रुपये जनता से उगाहे हैं जबकि कुल 10 लाख करोड़ रुपए जनता से वसूले गए हैं। 2013-14 में यू पी ए के जमाने में 88,600 करोड़ रुपये वसूले गए थे जबकि इस बीच अंतराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें 137 डालर प्रति बैरल हो गए थे। 2014-15 के मोदी काल के दौर में अंतर्राष्ट्रीय सिर पर तेल की कीमतों के 45 डालर प्रति बैरल हो जाने के बावजूद तेल की कीमतें बढ़ाई गई और 1.05 लाख करोड़ रुपये जनता से वसूले गए। और आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल ( क्रूड ओइल ) की कीमतें 70-80 के बीच बनी हुई हैं। सरकार की वसूली के इतर बात की जाए तो यही स्थिति तेल की मार्केटिंग व रिफाइनिंग कम्पनियों की भी बनती है। ये भी जमकर मुनाफा कूत रही हैं।
        एक आर टी आई के माध्यम से भी यह बात उजागर हुई है कि भारत कई देशों को तेल के निर्यात करता है और इस तेल को 40 रुपये से भी कम कीमत पर कई देशों को बेचा जा रहा है। यह हास्यास्पद ही है कि तेल आयातक देश के शासक अपने देश में उत्पादित तेल का निर्यात करते हैं या करने की अनुमति देते हैं।
           तेल की निरन्तर बढ़ती कीमतों के लिए मात्र अंतराष्ट्रीय बाजार को जिम्मेदार ठहराया जाता है । यू पी ए सरकार के बाद मोदी सरकार का भी यही तर्क था। टेक्स में नाममात्र की कटौती करके तेल की कीमतों में कटौति करने से यह बात साबित हो गई की सरकार का तर्क झूठा था। असल में तेल पर 80-90 % टैक्स लगने के बाद तेल की कीमतें दुगुनी से भी ज्यादा हो जाती हैं।
दरअसल 90 के दशक में देश के हुक्मरानों ने कल्याणकारी राज्य के मॉडल से पिंड छुड़ाकर खुली बाजार वाली अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ाए थे। 90 के दशक से पहले का कल्याणकारी राज्य जहां पूंजीपति वर्ग के हितों के अनुरूप था वहीं 'निजिकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण' के रूप में 90 के दशक में लागू होने वाली नीतियां भी इसी के हितों व तत्कालीन जरूरतों के अनुरूप था। इन्ही नीतियों के तहत कांग्रेस के जमाने में पेट्रोल डीजल की कीमतों को विनियंत्रित किये जाने व इसे बाजार से लिंक करने की ओर कदम बढ़ाए गये। कुछ सीमाएं रखी गई जैसे 50 पैसे से ज्यादा एक माह न बढ़ा पाने का। लेकिन मोदी सरकार ने आते ही इन सीमाओं को भी हटाकर इसे पूरी तरह बाजार से लिंक कर दिया। नतीजा आज सामने है।
         यही स्थिति रुपये की कीमत में डालर के सापेक्ष गिरावट के मसले पर है। 1965 में साम्रज्यवादी संस्था अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज लिया गया। इस कर्ज के एवज में रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा । जो लगभग 4 रुपये का एक डालर था तब रुपये की कीमत गिराकर 7 रुपये से ज्यादा एक डालर के बराबर कर दिया गया। और फिर 90 के दशक में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद भारतीय शासकों का साम्रज्यवादी मुल्कों से सीमित दूरी बरते जाने की नीति में भी बदलाव आया और साम्राज्यवादी मुल्कों से निकटता बढ़ते गई। इसी के साथ साथ डालर के सापेक्ष रुपये का की कीमत भी गिरते गई। साम्राज्यवादी सस्थाओं द्वारा इस तरह से मुद्रा की कीमत गिराकर किसी मुल्क को लूटा जाता है। इसके चलते आयात किसी देश के लिए महंगा व उस देश से होने वाला निर्यात सस्ता होता जाता है।
          मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही यू पी ए के दौर की ही नीतियों को तेजी से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था। आज स्थिति ज्यादा स्पष्ट है कि एकाधिकारी पूंजी के हितों में मोदी सरकार ने आम जनता की आर्थिक व सामाजिक स्थिति को पीछे धकेल दिया है ।



Monday, 17 September 2018

माओवादी लिंक व पी एम की हत्या की धमकी की फर्जी खबर के नाम पर गिरफ्तारियां

       माओवादी लिंक व पी एम की हत्या की    
    धमकी की फर्जी खबर के नाम पर गिरफ्तारियां

     




       देश में पिछले कुछ माह पहले गुजरात की तर्ज  पर मुख्य मीडिया पर खबर उछाली गई कि भीमाकोरेगांव आन्दोलन की अगुवाई करने वालों कुछ लोगों के लिंक माओवादियों से है और एक फर्जी पत्र के जरिये दावा किया गया कि माओवादी प्रधानमंती की हत्या की योजना बना रहे हैं। देश के अधिकांश लोगों ने इस पर भरोसा नहीं किया। कोई भी यह विश्वास नहीं कर सकता कि एक लिखित पत्र द्वारा इस ढंग की योजना को अंजाम दिए जाने वाले खबर सही है।  शासकों में जो माओवादियों के तौर तरीकों से भिज्ञ था वो  भी एक पत्र के आधार पर इस  उड़ाई गई खबर पर   भरोसा करने को तैयार नहीं था। सभी के लिए मोदी की गुजरात स्टाइल चिरपरिचित थी वह यह कि मोदी की लोकप्रियता के गिरते ग्राफ़ और मोदी की हत्या किए जाने की खबर साथ साथ चढ़ते थे। और फिर फर्जी एनकाउंटर का सिलसिला चल पड़ता था। 
       यही आज देश के स्तर पर है। अच्छे दिनों के ख्वाब का नारा  आम अवाम के लिए बुरे और दुखदायी दिनों में बदल चुका है। कथित गौरक्षको के दस्ते के हमले में कई मुस्लिमों व दलितों पर हमले हो चके हैं विरोध करने वाले जेलों में ठूंसे जा रहे है । इन स्थितियों में मोदी का ग्राफ लगातर गिरता जा रहा है। यह मोदी को सत्ता पर बिठाने वाले कॉरपोरेट घरानों के लिए चिंता का विषय है और खुद संघ से लेकर भाजपा के लिए। क्योंकि मोदी को महानायक के रूप में प्रोजेक्ट कर ही वो भी सत्ता पर पहुंचे है।  
      ऐसी स्थिति में जरूरी था कि इस ढंग की खबर उछली जाय कि उसकी आड़ में में कई निशाने सध जाएं।एक तरफ फासिस्टों का विरोध करने वाले जनपक्षधर लोगो को लपेटा जा सके, मोदी के गिरते ग्राफ को थाम कर मोदी पक्ष में सहानुभूति का माहौल खड़ा किया जाय साथ ही देश की जनता के हर हिस्से से वोट हासिल किए जा सकें और भीमा कोरेगांव के दलित आंदोलन को देशव्यापी होने से रोक दिया जाय। इसी मकसद से फिर 8 जनपक्षधर लोगों की गिरफ्तारी की गई। लेकिन शासक भूल जाते हैं कि उनकी अपनी ये सभी करतूतें जनता को उनके खिलाफ खड़ा करती है और जनता को उस दिशा में धकेलती हैं जहां शासकों का वज़ूद  मिटाया जा सके।

 
 

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...