Saturday, 5 January 2019

राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हालिया विधानसभा चुनाव

राजस्थान, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हालिया विधानसभा चुनाव
 
     हिंदी हार्ट लैंड कहे जाने वाले क्षेत्र में मोदी_शाह की भाजपा हार गई और कांग्रेस जीत गई। यह " नागनाथ का हारना व सांपनाथ का जीतना" है। यह विकल्पहीनता की स्थिति को ही दिखाता है। जहां तक तीसरे मोर्चे की बात है यह भी कोई विकल्प नहीं है। यह भी सांपनाथ से कम नहीं हैं। ये सभी पूंजीपति वर्ग के अलग अलग हिस्सों को ही अभिव्यक्त करने वाले शेड्स है।
       जहां तक भाजपा की पराजय का सवाल है इसके गिरते ग्राफ का सवाल है यह जारी है। भाजपा का मोदी की अगुवाई में मध्य प्रदेश में 2014 में प्राप्त वोट शेयर 54 % से गिरकर 44.3% , राजस्थान में 55 %से गिरकर 38.8 % , छत्तीसगढ़ में 49% से 32.9 % हो गई है। तेलंगाना में 10.7% से 7 % हो गई है। मिज़ोरम में थोड़ी वृद्धि हुई है। औसतन तीन राज्यों में लगभग 12 % की गिरावट हुई है। यह 2019 के लिहाज से मोदी शाह की जोड़ी को पीछे धकेलने वाला साबित हो सकता है।
      जहां तक फासिस्ट आंदोलन का सवाल है। यह अभी भी मजबूत स्थिति में है। 2013 के वोट शेयर के लिहाज से भी इसमें विशेष गिरावट नहीं दिखती। वैसे भी देश की समग्र पूंजीवादी राजनीति अब दक्षिणपंथ की दिशा में झुकी हुई है। कांग्रेस के आने का यह अर्थ नही कि फासीवादी आंदोलन कमजोर होगा  यहां तक कि केंद्र की सत्ता में कायम होने की स्थिति में भी यह असम्भव है।
      जो 2014 से पहले कभी न हो सका उसकी उम्मीद पालना मूर्खता है।  हां ! इनकी आक्रामकता पर बेशक असर पड़ेगा। वस्तुतः यह फासिस्ट आंदोलन एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों की जरूरत है। हालांकि फासीवादी राज्य की इसे अभी जरूरत नहीं है। इसलिए इन चुनाव मात्र से फासीवादियों को हराने का ख्वाब देखना बिल्कुल भी सही नहीं है।
      जहां तक विकल्प का सवाल है जनता के लिए विकल्प कोई क्रांतिकारी ही हो सकता है। जो अभी कहीं दिखता नहीं।

Wednesday, 5 December 2018

बुलन्दशहर और फासिस्ट आन्दोलन

    बुलन्दशहर और फासिस्ट आन्दोलन

       दिसम्बर माह की शुरुवात में उत्तर प्रदेश में फिर फासिस्टों ने अपनी रणनीति को आगे बढ़ाया। बुलंदशहर के स्याना क्षेत्र में बजरंग दल, बी जे पी युवा मोर्चा व विश्व हिंदू परिषद द्वारा इस आंदोलन को आगे बढ़ाने की बातें सामने आ चुकी हैं। अखबारों के मुताबिक स्याना क्षेत्र में गोवंश के अवशेष पाए जाने की खबर गांव वालों से बजरंग दल के जिला संयोजक को मिली। फिर ट्रक्टर  इसे ले जाकर सड़क जाम कर दी गई। यह भी बात सामने आई है कि गांव के कुछ लोग बात यही खत्म कर देना चाहते थे। इन अवशेषों को खत्म कर देन चाहते थे।
       सड़क जाम की स्थिति में ही इंसपेक्टर द्वारा समझाए जाने पर इस अवशेष को जमीन में गाड़ देने और शांत हो जाने पर सहमति बन गयी लेकिन तभी फिर फासिस्ट लम्पटों ने पथराव किया। और  गोलियां भी चलाई गई। पुलिस वाले भाग गए। इंसेक्टर डटे रहे । अंततः इनकी हत्याहो गई। यह भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि अखलाक मसले पर यही इंस्पेक्टर सुबोध जांच अधिकारी थे। यह फासीवादियों के फेवर में नहीं थे।
       यह बात भी नजरअंदाज नही की जा सकती है कि इस दौरान मुस्लिम समुदाय का एक धार्मिक कार्यक्रम भी चल रहा था। इसी क्षेत्र से कुछ किमी दूर जैनपुर गांव के लोगों ने मुस्लिमों के स्वागत में मंदिर वगैरह इनके लिए खोल दिये थे और इनका आतिथ्य सत्कार कर रहे थे। ये साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम कर रहे थे। इस धार्मिक कार्यक्रम के लिए 15 लाख से ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोग यहाँ शिरकत कर रहे थे। यह साम्प्रदायिक सौहार्द किनके लिए खतरनाक है निश्चित तौर पर तात्कालिक तौर पर साम्प्रदायिक पार्टियों व संगठनों के लिए ! अंततः शासकों के लिए।
        संघी प्रवक्ता और भाजपा के मंत्री आदि अब इस कार्यक्रम के प्रति ऐसा माहौल तैयार कर रहे हैं ताकि इस कार्यक्रम को संदेह, आशंका किसी षडयंत्र रचे जाने के रूप में देखा जाय। इस ढंग से भी यह अपने घृणित फ़ासीवादी आंदोलन को आगे बढ़ा रही हैं। फासिस्टों के तर्क के हिसाब से चला जाय तो कुम्भ, कांवड़ और अन्य मौकों जो लाखों करोड़ों लोग एक जगह एकजुट होते हैं तो वे षडयंत्र रचते हैं। षडयंत्र रचकर दंगे भड़काने वाले इसी नज़र से आम लोगो को देखते हैं। उनकी अपनी नज़र  और दिमाग ही इतना घृणित है।
       सतही तौर पर मामला इतना ही दिखता है। हकीकत में यह देश में खुलेआम और षडयंत्रकारी से आगे बढ़ते फ़ासीवादी आंदोलन का सूचक है। पुलिस अधिकारियों का शुरुवात में बजरंग दल के बचाव में आना, योगी और भाजपा का प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर किंतु परन्तु वाले बयान इस षडयंत्र की ओर इशारा करने के लिए पर्याप्त है।
     फासिस्ट आंदोलन की एक आम विशेषता यह भी है फासिस्ट दस्तों के माध्यम से आतंक व दहशत का माहौल कायम करना। इस घटना के माध्यम से भी यही संदेश दिया गया है कि एक इंस्पेक्टर को निपटा सकते हैं तो आम जन की क्या औकात।
     इस मामले में दो एफ आई आर हुई है। एक में बजरंग दल, भजपा युवा मोर्चा क विश्व हिंदू परिषद केकार्यकर्ता समेत 87 लोग नामजद हैं। जबकि दूसरी एफ आई आर मुख्य आरोपी बजरंग दल के जिला संयोजक की ओर से है जो गौकशी करने वालों के खिलाफ है। इस शख्श ने पहले यह कहा था कि उसने गाय को काटते हुए कुछ लोगों को वहां देखा था। जबकि जिस स्थल पर गोवंशीय अवशेष पाए जाने का जिक्र है वहां के लोगों ने इससे इनका किया है साथ ही इसके कोई सबूत भी नही हैं। यही नहीं बाद में यह अपने इस गाय को काटे जाते देखने के आरोप से एक वीडियो के जरिये मुकर गया।
      तमाम अन्य मामलों विशेषकर जो मुस्लिमों से जुड़े हुए होते हैं उन पर मीडिया ट्रायल के माध्यम से बेगुनाह को अपराधी बना देने या आतंकवादी बना देने वाले अब कह रहे हैं कि सिट की जांच होने दीजिए। पता चल जाएगा कि इन्होंने ( आरोपियों) ने कुछ भी नहीं किया है। इन्हें पहले से ही पता होता है कि जांच एजंसियां इनके हाथों में है इन्ही के मुताबिक या तोड़ मरोड़कर फ़ैसला दबाव में करवाया जा सकता है।
अब तस्वीर साफ होते जा रही है कि जिस ढंग से पार्टी, सरकार व पुलिस के उच्च अधिकारी व्यवहार कर रहे हैं यह आरोपियों को बचाने की दिशा में ले जाएगा और गोकशी के मामले को केंद्र मानते हुए इसी को वजह बनाते हुए निर्दोषों को फंसाने की दिशा में बढ़ा जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि मामले को षडयंत्र में तब्दील कर इसे 'हिन्दू-मुस्लिम' के रूप में बदल दिया जाय। अब तथ्यों को झूठ में बदल देने का पूरा खेल जा रहा है। अभी भी बजरंग दल का जिला संयोजक गिरफ्तार नहीं है। जबकि अन्य मामलों में पुलिस का रुख, कुर्की करने, घर वालों को हिरासत में लेने व भयानक टॉर्चर करने का होता है।
      जो भी हो कुछ इनके अपने चिर परिचित अंदाज के अनुरूप ही होगा। फिलहाल ये जिस धार्मिक कार्यक्रम को निशाने पर ले रहे हैं यह घृणित, साम्प्रदायिक, नस्लवादी व्याख्या वाले तर्क फासिस्ट, दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ ही कर सकते हैं जो इसके जरिये अपने आका पूंजीपतियों की सेवा करते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी और भारतीय फासिस्ट इस मामले में एक जुबान हो जाते हैं जबकि दोनों सऊदी अरब जैसे शेखशाहियों से  जुगलबंदी बढ़ाते हैं।

Wednesday, 28 November 2018

नगर निकाय चुनाव पर

                  नगर निकाय चुनाव पर 
                                                   1-11-18
     
        नगर निकाय चुनाव बिल्कुल करीब हैं। कुर्सी के लिए रस्साकसी, जोड़-तोड़ जोर पर है। जिसे देखिए वो टिकट पाने को आतुर है बेचैन है। टिकट के लिए मारामारी चरम पर है। पार्टियों से टिकट न मिल पाने वाले बेचैन हैं सदमे में हैं। कल तक जिस पार्टी में थे उसे छोड़ कर, बगावत कर दूसरी पार्टी का दामन थाम रहे हैं। निर्दलीय बन जा रहे हैं। थुक्का फजीहत, गाली गलौज, दल बदलने, पैसा पानी की तरह बहाने का खेल लोकल स्तर पर अपने चरम पर है। जाहिर है जीतने के बाद इसका कई गुना कमाया जाएगा।  
          इस हंगामे में इन निकायों की 'आम जनता' कहां है ? 'आम जनता' के लिए इसमें क्या है ? छोटे दुकानदारों, खोखे फड़ वाले जिन्हें अतिक्रमण के नाम पर यहां उजाड़ दिया जाता है जिन गरीब मलीन बस्तियों को 'अवैध' कहकर यह निकाय उजाड़ देता है उनके लिए इस चुनाव में क्या है ? कुछ भी नहीं। हकीकत तो ये है कि ग्रामीण जनता के भारी विरोध के बावजूद नगर निगम बना दिये गए, नगर पालिकाएं बना दी गयी। यही होता है इस कथित 'लोकतंत्र' में। जहां लोक यानी जनता पर 'मर्जी' थोप दी जाती है। शासकों की मर्जी 'शासितों' पर थोप दी जाती है।      
       अक्सर ऐसा ही होता है। देश में 'चुनाव के मौके' ही केवल ऐसे 'मौके' होते हैं जब 'आम जनता' की बातें होती हैं जब पूंजीवादी नेता गलियों, मोहल्लों के चक्कर लगाते हैं जब जनता के लिए 'अच्छे दिन' लाने के वादे होते हैं। जिन नेताओं को जनता 'सांसद' 'विधायक' बनाती है वो फिर 'शासक' बन कर आम जनता को 'हैरान' 'परेशान' करते हैं, आम जनता के खिलाफ ही नीतियां बनाते है कानून बनाते हैं। ये कॉरपोरेट घरानों, पूंजीपतियों को मालामाल करते हैं खुद भी मालामाल होते हैं। यही हाल निकायों के भी हैं। जीतने वाले नेताओं के लिए तो यह 'ऊपर' तक पहुंचने की सीढ़ी है। 'सभासद' से होते हुए 'विधायक' 'सांसद' बनने की सीढ़ी!! 'अतिक्रमण' के नाम पर गरीब बस्तियों में बुलडोज़र चलवाने में ये भी आगे आगे होते हैं तब जनता 'माईबाप' नहीं 'अतिक्रमणकारी' होती है। इन निकायों के स्तर पर होने वाला खेल किसी से छुपा नहीं हैं। यहां गरीब मोहल्ले व पाश इलाकों के साथ होने वाले भेद भाव को हर कोई जानता है। साफ सफाई, नालियां, सड़क, स्ट्रीटलाइट व बीमारियों के समय कीटनाशकों का छिड़काव पाश इलाकों में समय समय पर होगा लेकिन गरीब बस्तियों व मोहल्लों की कौन सुध ले। इन गरीब इलाकों की तब इन्हें याद नहीं आती। आती है तो बस चुनाव के मौके पर!! 
          'आम जनता' चाहे वह कहीं की भी हो, किसी भी शहर की हो, किसी भी इलाके की हो उसके दुख दर्द एक से हैं उसकी मुसीबतें भी कमोबेश एक सी हैं उसकी इच्छाएं व मांगें भी लगभग एक सी हैं। 'आम जनता' के मुद्दे हैं - सुरक्षित सम्मानजनक रोज़गार, सूरसा की तरह बढ़ती महंगाई से मुक्ति, रहने के लिए आवास, सस्ती शिक्षा, सस्ता परिवहन, सस्ता व भरोसेमंद इलाज, बेटियों, महिलाओं के लिए अपराध व हिंसा से मुक्ति तथा सुरक्षित व शांति पूर्ण ज़िंदगी।            
         असल बात यही है कि नगर निकायों के चुनावों का इन मुद्दों से कोई सम्बन्ध ही नहीं है। इन मुद्दों पर ये नगर निकाय कुछ भी कर सकने की स्थिति में नहीं हैं। ये निकाय एक प्रकार से प्रशासनिक संस्थाएं हैं जो महज 'चुनी' हुई संस्था है। हालांकि अगर इसे अधिकार भी होता तब भी कुछ शायद ही हो पाता।
        संसद के हाल तो सबको पता ही हैं। सभी सांसद ( चुने गए नेता) संसद में बैठते हैं। संसद नीतियों व कानूनों को बनाने वाली संस्था है। लेकिन इन 80 सालों में कभी भी ऐसी नीति या कानून नहीं बने कि सभी आम नागरिकों को सम्मानजनक रोज़गार देना अनिवार्य हो, सस्ती शिक्षा-सस्ता इलाज-सस्ता आवास व यात्रा की गारंटी हो। जो कुछ भी हुआ वह सब पूंजीपतियों के हिसाब से हुआ। यही आज का सच भी है। 
         अब आज हालात बहुत कठिन बन चुके हैं। आज तो जो कुछ भी अधिकार एक वक्त में जनता को संघर्षों से हासिल हुए थे वह भी छीने जाने का वक़्त है। सब्सिडी, थोड़ा सस्ता राशन, कुछ सरकारी शिक्षा व अस्पताल व कुछ सरकारी नौकरियां! ये सब भी अब खत्म होने की ओर है। रोजगार के नाम पर भोजनमाताएं, आंगनवाड़ी, आशा वर्कर हैं या फिर ठेके पर नौकरियां ! यहां न्यूनतम वेतनमान भी नहीं है। जो कुछ श्रम कानून बने थे वे भी खत्म किये जा रहे हैं। करोड़ो बेरोजगार हैं। लेकिन इनकी फिक्र कौन करे ?
       5 साल में अक्सर 'नेता' बदल जाते हैं पार्टियां बदलती है सरकार बदलती है लेकिन आम जनता की समस्या बनी रहती है। यही नहीं परेशानी, दुःख-दर्द बढ़ते जाते हैं जबकि दूसरी ओर 'नेता' व पूंजीपति मालामाल होते जाते हैं। इसीलिए देश में एक ओर 10 टॉप पूंजीपतियों की पूंजी में भारी वृद्धि हुई है तो वहीं दूसरी ओर भुखमरी की शिकार आबादी में भी भारी वृद्धि होती है। लेकिन सरकार व राजनीतिक पार्टियों के लिए हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दे ही बुनियादी मुद्दे हैं। यह सब जनता को तरह तरह से बांटने की साजिश के अलावा कुछ नहीं है। 
      इसकी असल वजह यही है कि यह पूंजीवादी समाज है। यह पूरा समाज पूंजी की जकड़न में है। इसने हर इंसान को असुरक्षित, अकेला और मानसिक तौर पर बीमार बना दिया है। यहां बड़ी बड़ी पूंजी के मालिक सब कुछ अपनी मुट्ठी में कर लेने को बेताब हैं। मुनाफे की इनकी घोर हवस ने समाज को गहरे संकट की ओर धकेल दिया है। इसलिए किसान, मज़दूर, बेरोजगार, छोटे-मझौले दुकानदार व आम महिलाएं सभी त्रस्त हैं हैरान-परेशान हैं। 
       मानवता ने जो कुछ भी बीते 100-200 सालों में हासिल किया, जो भी अधिकार हासिल किए थे अब पूंजी उसे भी निगलने की ओर बढ़ रही है। 'पूंजी के मालिक' अपनी पार्टी व सरकार के जरिये 'आतंकी तानाशाही' की ओर बढ़ रहे हैं। ये संविधान में हासिल जनवादी अधिकारों को संविधान बदले बिना खत्म कर रहे हैं। हर विरोध को 'देश द्रोह' कहकर कुचलना अब आम होता जा रहा है।    
        इसलिए अब जरूरत है अपने अधिकारों पर हो रहे हमलों के खिलाफ एकजुट होने की! शहीद भगत सिंह के बताए रास्ते की ओर बढ़ने की!! पूंजी के जकड़न से समाज को मुक्त कराने की !!! और समाजवादी समाज बनाने की ।

Saturday, 20 October 2018

यह हादसा नहीं व्यवस्थाजनित हत्या है !

       यह हादसा नहीं व्यवस्थाजनित हत्या है !
 
     अमृतसर में जोड़ा रेल फाटक के पास दशहरा का पर्व मनाने के दौरान ट्रेक पर दौड़ती ट्रेन की चपेट में आने से 62 से ज्यादा लोग मारे गए और 150 से ज्यादा लोग घायल हो गए। यह आम मेहनतकश नागरिकों के लिए दुखद ख़बर है। यह हम सभी को क्षोभ से भर देने वाली व आक्रोशित कर देने वाली खबर भी है। बताया जा रहा है कि यहां पर भीड़ मैदान की क्षमता से काफी ज्यादा थी और लोग ट्रेक पर भी खड़े थे। एक तरफ वी वी आई पी लोगों के लिए मैदान में मंच सजा था यो वहीं दूसरी ओर आम जन ट्रेक के इर्द गिर्द खड़े ही जाने को मजबूर हुए। साथ ही रेलवे प्रशासन से किसी प्रकार की अनुमति न लेने की बात भी उजागर हुई है। इस प्रकार भयानक लापरवाही व अयोजनाबद्धता के चलते आम नागरिक मारे गये। लेकिन मुख्य अतिथि के बतौर यहां शामिल कांग्रेस नेत्री नवजोत कौर सिंह ट्रेन की चपेट में आये लोगो की मदद के लिए प्रबन्ध करने के बजाय वहां से गायब हो गईं।
      इसे हादसा घोषित कर सरकार व राजनीतिक पार्टियां अपने अपराध पर पर्दा डाल रही हैं। इस ढंग के "घोषित हादसे" साल दर साल अलग अलग मौक़ों पर धार्मिक आयोजनों के वक़्त होते रहे हैं। उत्तराखंड में 2014 में केदारनाथ से लेकर बिहार या फिर कहीं और लोग यूं ही मारे गए और घायल हुए।
       दरअसल धर्म, अंधविश्वास आदि की जकड़ में आम जन के होने के चलते ऐसी जगहों पर भारी तादाद पर लोग इकट्ठे हो जाते हैं और फ़िर भयानक अराजकता, अव्यवस्था, अयोजनाबद्धता व लापरवाही के चलते भगदड़ मचने या फिर मौजूदा घटना की तरह आम लोग मारे जाते हैं। शासक अपना ढोंग करके थोड़ा मुआवजा फैंककर अपने गुनाहों पर पर्दा डाल देते हैं वास्तव में ये इनके द्वारा की जाने वाली परोक्ष हत्याएं हैं। ये आम जन को धार्मिक व अंधविश्वास की जकड़बंदी में जकड़े रखने के तमाम जतन करते हैं। आम जन इस जकड़बंदी में फंस कर तमाम तरीकों से इसका शिकार होता है। यदि शासक जनता के प्रति बेहद संवेदनशील होते और धर्मनिरपेक्ष राज्य को व्यवहार में भी कायम किया गया होता साथ ही इन जकड़बन्दियों से मुक्ति के लिए वैज्ञानिक चेतना का व्यापक प्रचार प्रसार कर जनता की चेतना को उन्नत किया गया होता तो ये निर्दोष नागरिक जो यहां मारे गए वह ज़िंदा होते।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...