Monday, 15 June 2020

हत्या के विरोध में अमेरिकी जनता का जबरदस्त प्रतिरोध




      'अश्वेतों की जान मायने रखती है' ! तथा ' मैं सांस नहीं ले पा रहा हूँ'' ! इन्हीं नारों के साथ अमेरिका के कई शहरों में न्याय, अधिकार, समानता की आकांक्षा लिए हजारों लोग सड़कों पर 26 मई से प्रर्दशन को निकल पड़े हैं। यह सैलाब आगे बढ़ता जा रहा है। इसके दमन के लिए राष्ट्रीय गार्ड लगा दी गई है मगर संघर्ष फैल रहा है। ब्रिटेन व फ्रांस में भी इस संघर्ष के समर्थन में बड़ी रैलियां निकली है हिंसक प्रदर्शन हुए हैं। अब धूर्त अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प अमेरिका में मिलिट्री के द्वारा दमन की बातें भी करने लगे हैं।
      10 जून तक 200 शहरों में फैल चुका यह प्रदर्शन 46 वर्षीय अश्वेत (काले) जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के विरोध में है। फ्लॉयड की हत्या श्वेत (गोरे) पुलिस कर्मी ने की। अमेरिका के मिनेसोटा राज्य में मिनियापोलिस शहर में यह घटना हुई थी। इसमें 4 पुलिसकर्मी शामिल थे। एक पुलिसकर्मी ने अपने घुटने से फ्लॉयड का गला दबाया और तब तक दबाता रहा जब तक कि उसकी मौत नहीं हो गई। इस दौरान ज्यार्ज कहता रहा 'मैं सांस नहीं ले पा रहा हूँ'। मगर इस आवाज को अनसुना कर दिया गया। बाकी पुलिसकर्मी इस दौरान सहयोगी की भूमिका में थे।
     इन्हीं 4 पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के लिए आक्रोश सड़कों पर फुट पड़ा। इस आक्रोश में लंबे वक्त से नस्लवादी हिंसा व उत्पीड़न के खिलाफ गूंज है। इस उमड़ते प्रदर्शन में लॉकडाउन में लम्पट ट्रम्प की अगुवाई में अमेरिकी लम्पट शासकों के घृणित तौर तरीकों से उपजी हताशा-निराशा की गूंज भी है साथ ही साथ बेरोजगारी, असुरक्षित भविष्य और भुखमरी सी स्थिति के खिलाफ भी यह आवाज है।
      भारत में जो अल्पसंख्यक विरोधी घोर फासीवादी रुख, राजनीति तथा घृणित जातिवादी रुख के चलते आये दिन हिंसा की घटनाएं होती हैं भारतीय पुलिस का विशेषकर उत्तर भारत तथा गुजरात में, जो घोर मुस्लिम विरोधी तथा जातिवादी है । वही चीज अमेरिका में घृणित नस्लवादी फासीवादी राजनीति के रूप में दिखाई देता हैं। आज के दौर में इन घोर फासीवादी प्रवृत्तियों का हावी होना अपने अंतिम मूल्यांकन में यह मरणासन्न पूंजीवाद के भीषण संकट की निशानी है।
      फासीवादी नेता ट्रम्प ने अमेरिका में जन प्रतिरोध को कुचलने के लिए मिलिट्री लगाने की धमकी दी थी। तथा फासीवाद विरोधी मोर्चा 'एंटीफा' को आतंकवादी संगठन की श्रेणी में डालने की धमकी दी गई। एक शहर में मिलिट्री लगाई गई जबकि कई शहरों में 'पुलिस' के साथ राष्ट्रीय गार्ड लगाई गई। मगर दमन जितना बड़ा, प्रतिरोध उससे ज्यादा गति से आगे बढ़ा।
     इस व्यापक दमन में लगभग 10000 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। 13 लोगों की मौत हुई है। मगर संघर्ष और ज्यादा व्यापक अनुशासित भी हुआ है।
      यह प्रतिरोध अमेरिका के 27 राज्यों के 200 शहरों में फैल चुका है। इसमें अब मजदूर, नर्स भी शामिल हो चुके हैं। न केवल अमेरिका बल्कि यूरोप के कई मुल्कों में भी इस संघर्ष के समर्थन में बड़ी रैलियां निकली हैं।
      अमेरिकी साम्राज्यवादी शासक वर्ग का दूसरा धड़ा संघर्ष का दिखावे के लिए तथा इसे अपने पक्ष में ढालने के लिए समर्थन व प्रयास कर रहा है। हालांकि ट्रम्प के रुख ने मतभेद की स्थिति पैदा कर दी है।
       इस संघर्ष की काफी सीमाएं भी है आंदोलन संगठित नहीं है तथा यह किसी क्रांतिकारी संगठनों के नियंत्रण में नहीं है। एंटीफा भांति भांति के विचारों वाले संघटनों का एक व्यापक प्लेटफार्म है जो फासीवादी रुझानों, कार्रवाइयों के खिलाफ कड़ा प्रतिरोध करता है।
      जहां तक अमेरिकी समाज में नस्लीय भेद, नस्लवादी सोच का मसला है यह बेहद पुराना है। 16 वीं -17 वीं सदी में अमेरिकी महाद्वीप से सोने चांदी की तलाश ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस, पुर्तगाली शासकों में यहां इन्हें उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया। अमेरिका के मूल निवासियों का एक ओर सफाया किया गया दूसरी ओर इन व्यापारिक साम्राज्यवादी देशों के बीच आपसी संघर्ष हुआ। उत्त्तरी अमेरिका के मुख्य हिस्सों पर ब्रिटेन का प्रभुत्व कायम हुआ। इसी दौर में अमेरिका में काम करवाने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप से लाखों की तादाद में जहाजों में भर-भर कर काले (नीग्रो) लोगों को बंधक बनाकर, जबरन बेगारी हेतु अमेरिका ले जाया गया। यह आधुनिक 'दासता' का जमाना था। बड़ी तादाद में इन 'ग़ुलामों' 'दासों' का जो भोले-भाले इंसान थे, इनकी खरीद-फरोख्त का कारोबार विकसित हो गया था। इनसे खानों, खेतों व अन्य जगहों पर जबरन बेहद उत्पीड़नकारी ढंग से काम करवाया जाता था। काम के दौरान, भूख से, बीमारी से तथा जहाजों में भी लाखों की तादाद में, ये अश्वेत मारे गए।
     वास्तविकता में यह परोक्ष हत्याएं थी। 'यूरोपीय सभ्य समाज' के चेहरे के भीतर 'यह घृणित व अमानवीय' चेहरा था। यह भारत में 'भारतीय व कुत्तों' को प्रवेश नहीं के 'नस्लीय श्रेष्ठता' के रूप में दिखता था। इसी भयानक लूट-खसोट ने ब्रिटेन, फ़्रांस में पूंजीवाद के विकास को तेज़ी से आगे बढ़ाया था।
       इसी दौरान यानी 1776 में अमेरिकी क्रांति हुई। जिसका नारा 'स्वतंत्रता व समानता' का था। यह क्रांति ब्रिटिश शासकों तथा अमेरिका में बस चुके ब्रिटेन से ही प्रवासी हो चुके पूंजीपतियों, कारोबारियों तथा अन्य लोगों के बीच था।
      यह पूँजीवादी क्रांति भी लाखों गुलाम अश्वेतों के जीवन में कोई बदलाव नहीं लाई। इसके उलट दासता को संस्थागत के दिया गया।   
      अमेरिका ( ब्रिटिश उपनिवेश ) के उत्तर व दक्षिण हिस्से में फर्क था। उत्त्तरी हिस्से में तेज पूँजीवादी विकास था, उद्योग का तेज विस्तार हो रहा था, यहां ग़ुलामों की जरूरत नहीं थी, दासता यहां विकास के आगे रोड़ा थी। इसीलिए इस हिस्से में दास प्रथा कमजोर होते चली गयी जबकि दक्षिण हिस्सा,पिछड़ा व कृषि वाला था यहां दासों की खूब जरूरत थी। दक्षिणी हिस्से अपने ढंग से चलना चाहते थे। सत्ता के केन्द्रीकरण (संघ) उत्त्तरी हिस्से की चाहत थी। 19 वीं सदी के 60 के दशक में उत्त्तरी व दक्षिणी हिस्से के संघर्ष ने गृह युद्ध का रूप धारण किया। अब्राहम लिंकन की अगुवाई में अन्ततः दक्षिणी हिस्से के प्रतिरोध को दमन कर गृहयुद्ध को जीत लिया गया। इस प्रकार  वो संयुक्त राज्य अमेरिका वज़ूद में आया जिसमें लगभग 40 से ज्यादा राज्य (प्रांत) थे। यह गृह युद्ध दासों की मुक्ति के मकसद से नहीं था। अब दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।
    ऐसा नहीं कि इसके खिलाफ कोई प्रतिरोध न  हुआ  हो। 1811 में ही अश्वेत दासों द्वारा विद्रोह किया गया। तब 500 अश्वेत हथियारों से लैस होकर अंग्रेज शासकों के खिलाफ विद्रोह किया मगर यह कुचल दिया गया।
      अब इस विद्रोह के लगभग 50 साल बाद 'दास प्रथा' को गैरकानूनी घोषित किये जाने के बावजूद नस्लवादी भेदभाव, उत्पीड़न का खात्मा नहीं हुआ। 'शेयर क्रॉपर' व 'कन्विक्ट लिजिंग' के नाम से यह दूसरे रूप में जारी रही। हालांकि पहले की तुलना में यह कमजोर हो गयी। दासों का 90 फीसदी हिस्सा दक्षिणी हिस्से में था।
       1916 में 200 शेयर क्रॉपर (अश्वेत) की हत्या कर दी गई। यह श्वेत पुलिसकर्मियों द्वारा की गई थी। इसे इलेन नरसंहार कहा जाता है। इस वक़्त लाखों की तादाद में दक्षिणी हिस्से से उत्तर की ओर अश्वेतों का पलायन या विस्थापन हुआ था।
      सामाजिक राजनीतिक व आर्थिक हर स्तर पर यह नस्लीय भेदभाव, उत्पीड़न व हिंसा अलग अलग वक़्त पर फिर बाद में भी चलती रही। फासीवादी संगठन कु कलक्स क्लान (kkk)  व पुलिस इसमें सबसे आगे-आगे थी।
      1940 के दशक से सिविल राइट आंदोलनों ने जोर पकड़ा। जबकि इसी दौर में यानी पुनर्निर्माण व दूसरे युद्ध के बीच लगभग 5500 अश्वेतों (अफ्रीकी अमेरिकन) 'भीड़ हिंसा' में मारे गए थे।
      ब्लैक पैंथर तथा मार्टिन लूथर किंग जूनियर की अगुवाई में 'मांगें व आकांक्षाएं' के रूप में मागें सूत्रीत की गई व व्यापक संघर्ष हुआ। यह 1960-70 के दशक में चला। 1968 तक आते आते यह आज के 'में सांस नहीं ले पा रहा हूं' 'अश्वेत जिंदगी मायने रखती है' जैसे व्यापक आंदोलन की तरह देशव्यापी हो गया। लाखों लोगों ने इसमें शिरकत की। मार्टिन लूथर की हत्या कर दी गई। आंदोलन का दमन भी किया गया। 40 से ज्यादा लोग मारे गए। तीन-चार हज़ार लोग घायल हो गए। लगभग 27000 से ज्यादा लोग गिरफ्तार कर लिए गए।
       इस आंदोलन के दबाव में अश्वेतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था अमेरिकी हुक्मरानों को करनी पड़ी। इसके बाद फ़िल्म इंडस्ट्री से लेकर, पुलिस, मिलिट्री व सभी जगहों पर अश्वेत लोग पहूंचे। इनका आत्मासातीकरण व्यवस्था में हुआ। यह वह दौर भी था जब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। बाद में 70 के दशक में यह ठहराव ग्रस्त होने की ओर बढ़ी।
      बीते 50-60 सालों में अश्वेतों  के बीच भी ध्रुवीकरण बढ़ा। यह एक हद तक भारत में जातिवाद के खात्मे के लिए शासकों द्वारा की गई आरक्षण व अश्पृश्यता उन्मूलन कानून जैसी ही थी तथा खुद जातिवाद का शिकार रहे समूह के भीतर इसने ध्रुवीकरण को अंजाम दिया। आज दलितों की पार्टियां है मगर वह दलित उत्पीड़न हिंसा पर खामोश है। क्योंकि मसला अब जाति नहीं वर्ग का है। यही पूंजीवाद का असल विभाजन है। यही स्थिति मुस्लिमों के मसले पर भी है।
       यही चीज थोड़ा भिन्न रूप में अमेरिका में अश्वेतों के खिलाफ होती हिंसा व उत्पीड़न की है। इसीलिए अश्वेतों के बीच से वो लोग जो शासकों की जमात में पहुंच चुके हैं वो खामोश हैं या केवल सीमित विरोध है।
       पिछले 3 दशकों से जब से विश्व अर्थव्यवस्था संकट की ओर बढ़ी है व खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी। तब से अमेरिका के 7-8 प्रांतों में अश्वेतों व महिलाओं के लिए किये गए विशेष प्रावधानों को खत्म किया जा रहा है।
      अब 2007-08 से गहन संकट की ओर बढ़ चुकी विश्व अर्थव्यवस्था को 12 साल हो चुके हैं और अब कोरोना महामारी ने संकट को अप्रत्याशित रूप से कई गुना बढ़ा दिया है। अमेरिका में बेरोजगारी, महंगाई, गरीबों के लिए इलाज के अभाव या बेहद कमजोर होने ने स्थिति को विस्फोटक बनाया है। अश्वेत लोग इसके सबसे ज्यादा शिकार है। दूसरी ओर फासीवादी राजनीति के अमेरिकी समाज में तेज़ी से बढ़ने के चलते अश्वेत, एशियाई व अप्रवासी लोगो  पर हमले बढ़े हैं। गरीब अश्वेतों की स्थिति सबसे बदतर है। जेलों में सबसे ज्यादा यही हैं गरीब बस्तियों में अधिकांश यही हैं कोरोना का शिकार भी अधिकतर यही हैं। पुलिस की हिंसा का शिकार तो लंबे वक्त से होते रहे हैं।
       कोरोना महामारी का शिकार भी अधिकांश इन्हीं के बीच से गरीब हैं। महामारी से निपटने की स्थिति ने अधिकांश को भयानक असुरक्षा में डाल दिया है। ट्रम्प के रवैये ने स्वास्थ्यकर्मियों से लेकर मजदूरों को भी आक्रोशित किया है साथ ही शासक वर्ग के दूसरे धड़े भी बेचैन हैं।
इन भयानक संकटग्रस्त  स्थितियों में ही ज्यार्ज फ्लॉयड की हत्या ने चिंगारी का काम किया। इसने जंगल में आग की तरह फैलने का काम किया। इसमें अलग-अलग तरह के लोग शामिल हुए। यह संघर्ष फिलहाल उत्पीड़न, भेदभाव, असमानता के खिलाफ है। इसकी दिशा समाजवाद की ओर फिलहाल कतई नहीं है। इस दिशा में इसके बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।



     

Saturday, 30 May 2020

दिल्ली हिंसा के नाम पर गिरफ्तार किये गए सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों को रिहा करो !
      
   
      मोदी सरकार बिल्कुल षड्यंत्रकारी तरीके अपने विरोधियों को निशाने पर ले रही है। दो साल पहले भीमा कोरेगांव की तर्ज़ पर ही सीएए, एनआरसी व एनपीआर विरोधी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया जा रहा है।
       ऐसे वक़्त में जब एक तरफ कोरोना महामारी के खिलाफ 'जंग' का एलान किया गया है समस्त "देशवासियों" को एकजुट होकर इस 'जंग' में साथ होने का "आह्वान" किया गया तब "लॉकडाउन" की आड़ में मोदी सरकार सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों से निपट रही है।
        ऐसा लगने लगा है कि मोदी सरकार की 'जंग' कोरोना महामारी से नहीं बल्कि अपने विरोधियों को फंसाने व गिरफ्तार करके जेल में डालने की है। इस तरह जेल में डालकर पूरे समाज में दहशत व खौफ पैदा कर देना चाहती है ताकि कोई भी अधिकारों की बात ना करे, अन्याय व जुल्म के खिलाफ खड़ा न हो।
      मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल में हिन्दू फासीवादी एजेंडों को खुलकर आगे बढ़ाया। अन्धराष्ट्रवादी, साम्प्रदायिक मुद्दों के जरिये मोदी सरकार ने गहन होते आर्थिक संकट से ध्यान हटाया तथा राजनीतिक ध्रुवीकरण को चरम की ओर ले बढ़े। कश्मीर मुद्दा, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन कानून इसी की कड़ी हैं। एक-एक कार ये एजेंडे फैंके गए क्रमशः।
       नागरिकता संशोधन कानून, एन आर सी तथा एन पी आर ऐसा फासीवादी एजेंडा था और है जो देश के करोड़ों मजदूर मेहनतकशों को गैरनागरिक होने की श्रेणी में डाल देता, इन्हें अपने ही देश में घुसपैठिया या शरणार्थी बना देता। विशेष तौर पर यह मुस्लिमों के खिलाफ लक्षित था।
इसके खिलाफ प्रतिरोध तो होना ही था। देश भर में इसके खिलाफ आवाज उठी। हिंदू फासीवाद के खिलाफ इतना सशक्त प्रतिरोध पहली बार हुआ था। इस आंदोलन ने फासीवादी ताकतों को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया।
        सीएए, एनआरसी व एनपीआर के खिलाफ दिल्ली केंद्र बन गया था। शहीन बाग एक मॉडल बन चुका था। यहीं नहीं दिल्ली में कई जगह ऐसे ही शहीन बाग बन चुके थे। यहीं से फिर मोदी-शाह की सरकार ने साजिश रची। दिल्ली के दंगों का आयोजन किया गया। जिसमें कपिल शर्मा व अनुराग ठाकुर जैसे कुछ अन्य पर्दे के सामने थे जबकि पर्दे के पीछे पूरा संघी फासीवादी गिरोह। अन्ततः दिल्ली के प्रायोजित नरसंहार के आयोजकों ने 'दिल्ली हिंसा' के नाम पर उन्हीं को दंगे  के लिए आरोपी बनाना शुरू कर दिया जो दंगों के शिकार थे, जो सीएए  विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे या उसे लीड कर रहे थे। जे एन यू, जामिया , दिल्ली विश्वविद्यालय व अन्य कॉलेज के छात्रों की गिरफ्तारी की जा रही है। अभी तक 1300 लोगों की गिरफ्तारी की गई है। संगीन मुकदमे लगाए जा रहे हैं। यू ए पी ए, राजद्रोह या फिर कुछ और।
       27 वर्षीय सफूरा जगरर जो कि जामिया की शोध   विद्यार्थी हैं और गर्भवती है उन्हें यू ए पी ए यानी कथित आतंकवाद विरोधी कानून के तहत तिहाड़ जेल में ठूंस दिया गया। इसी प्रकार और भी हैं। कश्मीर से भी महिला पत्रकार समेत कुछ अन्य पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत मुकदमा ठोक दिया गया। दिल्ली में जामिया, जे एन यू व दिल्ली विश्वविद्यालय के उन छात्रों को निशाना बनाया जा रहा है जो सीएए विरोधी प्रदर्शन में शामिल थे। मीरान हैदर, उमर खालिद आदि ऐसे ही कई नाम हैं।  अधिकांश मुस्लिमों को निशाने पर लिया जा रहा है।
      अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की छात्रा नताशा व देवांगना को भी दिल्ली हिंसा के नाम पर गिरफ्तार के लिया गया। बाद में जैसे ही इन्हें कोर्ट से जमानत मिली तत्काल ही दूसरे मुकदमे में पुलिस ने इन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया। नताशा पर अब यू ए पी ए का मुकदमा दर्ज कर देनी की बात सामने आ रही है।
      निश्चित तौर पर ऐसे वक्त में जब एक तरफ कोरोना से जंग के नाम पर लॉकडाउन किया गया हो, देश के नागरिकों से एकजुट होकर इससे लड़ने की अपील की गई हो, सोशल डिस्टेंसिग की बात की जा रही है तब ऐसे वक्त में मोदी सरकार का यह कृत्य घृणित, षड्यंत्रकारी व प्रतिशोधात्मक है यह घोर निंदनीय है। इन सभी को अविलंब रिहा किया जाय।   

Saturday, 23 May 2020

लॉकडाउन की आड़ में घोर निरंकुशता

लॉकडाउन की आड़ में घोर निरंकुशता

        लॉकडाउन की घोषणा के बाद ऐसा लगा जैसा मोदी सरकार को अपनी मन की मुराद मिल गयी हो। एक-एक करके सीएए एनपीआर विरोधी प्रदर्शन में शामिल लोगों को मोदी सरकार निशाने पर लेने लगी। विशेषकर यह खेल दिल्ली में सीधे सीधे गृह मंत्रालय के अधीन पुलिस के माध्यम से किया गया।
        दिल्ली में जिस दंगे के जरिये सीएए विरोधी प्रदर्शन को खत्म कर देने की साजिश रची गई थी, अब उसी की साजिश रचने का आरोप सीएए प्रदर्शनकारियों पर लगाये गए। कुछ लोगों पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह इत्तेफाक नहीं कि इसमें सभी मुस्लिम हैं। अधिकांश नौजवान है। कॉलेज में पढ़ने वाले हैं।
       इन्हीं में एक है सफूरा जगर, जिनकी उम्र है 27 साल। वह अभी गर्भवती है इसके बाबजूद उन्हें तिहाड़ जेल में डाल दिया गया। इसके अलावा और भी है जिन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।
     सफूरा के खिलाफ हिन्दू फासीवादी तथा लम्पट मीडिया चरित्र हनन से लेकर भयानक दुष्प्रचार में लगा हुआ है।
      इसके अलावा आपदा प्रबंधन एक्ट तथा महामारी रोग अधिनियम के तहत लोगों के, जनपक्षधर लोगों के तथा पत्रकारों की आवाज को भी खामोश किया जा रहा है। उन पर राजद्रोह से लेकर संगीन मुकदमे दर्ज किए गए हैं। आम लोगो के दुख तकलीफों का पता पूरे समाज को पता लगे, सरकार का घोर जनविरोधी रुख तथा संवेदनहीनता समाज को पता लगे, यह सरकार नहीं चाहती।
     यहीं से फिर वह जो कोई भी सरकार को बेनकाब कर रहा है उसकी आवाज को बंद कर दिया जा रहा है। द वायर के संपादक, ठेका मजदूर कल्याण एसोसिएशन के अध्यक्ष, पछास के एक कार्यकर्त्ता तथा कई पत्रकार इसी दमन के शिकार हुए। बाकि आम अवाम तो लॉकडाउन के उल्लंघन में पिट रहीं है अपमानित हो रही है तथा मुकदमे झेल रही है।
   साफ तौर पर यह स्थिति दिखाती है कि मोदी सरकार व इनकी राज्य सरकारें लॉकडाउन का इस्तेमाल अपने विरोधियों से निपटने तथा निरंकुशता की ओर बढ़ने के रूप में कर रही है।
   


Sunday, 17 May 2020

कोरोना महामारी के दौर में काम के घंटो को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ते शासक

कोरोना महामारी के दौर में काम के घंटो को 8 से 12 घंटे करने की ओर बढ़ते शासक


        कोरोना महामारी के दौर ने मजदूर मेहनतकशों के सामने शासकों को नंगा कर दिया है।  लाखों की तादाद में प्रवासी मजदूर सड़कों पर है। वे भूखे प्यासे रोटी और सुरक्षा तथा अपनों की तलाश में अपने गांव की ओर पैदल जा रहे हैं। इसमें महिलाएं हैं, बच्चे हैं, पुरुष हैं तथा साथ में सामान की गठरी है। इन्हें सैकड़ों किमी की यात्रा करनी हैं। बस एक ही मंजिल है किसी भी तरह अपने गांव  पहुंचना है अपने लोगों के बीच पहुंचना है यदि मौत हो भी तो अपने लोगो के बीच। 
       एक तरफ मजदूरों का काफिला है तो दूसरी तरफ मूकदर्शक सरकार है जो इस दौर में भी उन पत्रकारों को जेल में ठूंसने में लगी हुई है जो हकीकत को सामने ला रहे हैं। सरकार को मजदूरों की मौत से , भूखे प्यासे दर दर भटकने से कोई फर्क नही पड़ता है। बस सरकार को बेनकाब होने की, अपनी इमेज की  चिंता है। सरकार को इस बात की चिंता है कि यदि प्रवासी मजदूर अपने घरों को चले गए तो पूंजीपतियों की पूंजी का क्या होगा जो कि उद्योग में लगे हुए है। इसलिए भरपूर कोशिश है कि मजदूरों को किसी भी तरह से अपने घर की ओर पलायन से रोका जाए। मजदूरों को मजबूर होकर सड़कों पर प्रदर्शन करने पड़े। लुधियाना, कठुआ, सूरत, अहमदाबाद समेत कई जगहों पर ऐसे प्रदर्शन हुए। यह हिंसक भी हुआ। संघर्ष अभी भी कहीं के कहीं हो ही रहे हैं।
     इस सबके चलते मोदी सरकार को पीछे हटना पड़ा। ट्रेन 'श्रमिक ट्रेन' के नाम से चलाने पड़े। मगर इसका हश्र वैसा ही होना था जैसा कि मजदूरों गरीब किसानों के संबंध में घोषित होने वाली योजनाओं का होता है। तमाम जटिलताएं पैदा की गई। यह कागजी कार्यवाही के नाम और हुआ। यात्रा का किराया भी भूखे प्यासेमजदूरों से ही वसूला गया।  बहुत कम ट्रेन चलाकर ही दावा किया गया कि लाखों मजदूर को उनके इलाके में पहुंचाया गया।। हकीकत क्या है ? 
       मजदूर आज भी सड़कों पर है। कई मजदूर भूखे प्यासे होने के चलते, सैकड़ों किमी की जानलेवा यात्रा के चलते या फिर बसों, ट्रक, ट्रेन के नीचे आकर जान गंवा चुके हैं। 
       लेकिन सरकार यहीं नहीं रुकी। हिन्दू फासीवादी सरकार ने कोरोना संकट की आड़ में बेशर्मी से मजदूरों और हमला बोल दिया। गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों में बचे खुचे श्रम कानूनों पर भी जोरदार हमला बोल दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार ने श्रम कानूनों को 3 साल के लिए स्थगित करने का फैसला लिया। ऐतिहासिक तौर पर मजदूर वर्ग ने 8 घंटे काम के नारे को धरातल पर उतारने को जो कुर्बानियां दी थी , उस पर हमला बोला गया। लेकिन इतिहास, समाज व वक़्त कभी ठहरता नहीं है। मजदूर वर्ग व बाकी मेहनतकश जनता के संघर्ष फिर से सैलाब की तरह उमड़ेंगे।
    

      
     

















           
      
       
     
     

    
     






अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...