प्रोन्नति
में आरक्षण के सवाल पर क्या रुख हो ? प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ़ सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त सरकारी कर्मचारियों
ने अपनी आवाज़ हर सरकारी विभाग में अधिकांश राज्यों में बुलन्द कर रखी थी वहीं उसी दौरान
अखबार की यह सुर्खी कि उत्तराखण्ड के पहाड़ी जिले में स्थित एक सरकारी प्राथमिक शिक्षण
संस्थान में भोजन माता के पद पर नियुक्त की गयी महिला की दलित जाति से होने के चलते
सवर्ण घरों के बच्चों ने स्कूल में भोजन करने से इंकार कर दिया था यही तथा इसी व अन्य
प्रकार की जातिगत उत्पीड़न की ढेरों घटनायें स्वत: ही प्रोन्नति
में भी क्यों आरक्षण का समर्थन किया जाना चाहिये इसका अहसास कराती है। इसी के साथ-साथ प्रोन्नति में आरक्षण के खिलाफ़ उठी यह चौतरफ़ा आवाज विशेषकर उत्तराखण्ड
में ढोल-नगाड़े-गीतों-नुक्कड़ नाटकों के साथ, अखबारों में इसका जबर्दस्त प्रचार व इसके
पक्ष में तर्क गढ़्ती व फ़िजा बनाती मीडिया जो कि खुद भी इसी संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त
है इस आवाज व प्रचार का प्रभुत्व ही खुद प्रोन्नति में आरक्षण के समर्थन में व इसे
लागू किये जाने के पक्ष में मज़बूत तर्क बनता है। ‘समानता’ ‘योग्यता’ और अब ‘सुप्रीम कोर्ट
का निर्णय’ जैसे शब्द व ऐसे फ़िजूल के तर्क की आड़
में अपनी खुद की पीठ थपथपाते ये लोग खुद से यह तर्क नहीं करते या नहीं करना चाहते कि
एक असमान समाज में एक सामाजिक गैरबराबरी वाले समाज में ‘समानता का सिद्धान्त’ को लागू करने
का अर्थ पहले से सक्षम व ताकतवर लोगों को और मज़बूत करने के सिवाय और कुछ भी नहीं है।
इस खाई को पाटने के लिये ‘असमानता का नियम’ लागू करना ही
पड़ेगा। इसी
प्रकार ये आरक्षण विरोधी स्वघोषित योग्य लोग योग्यता को आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से निरपेक्ष मानते हैं यानी कैसी भी परिस्थितियां हो
योग्य हमेशा ही योग्य होगा/ रहेगा, जैसे योग्यता
पैदायशी होती हो सवर्णों के जीन में हो। ये भूल जाते हैं कि बुनियादी तौर पर व आम तौर
पर परिस्थितियां ही योग्यता को निर्धारित करती हैं। आरक्षित कोटे से आया कोई डॉक्टर
या इन्जीनियर इनकी नज़रों मे अयोग्य होता है जबकि कई लाख रुपये डोनेशन देकर बना कोई
डॉक्टर या इन्जीनियर अपने सवर्ण पृष्ठ्भूमी के चलते इनके लिये "योग्य" हो जाता है। परिस्थितियां निश्चित तौर पर
दोनों के लिये भिन्न हैं एक हजारों सालों से वंचित अपमानित है तिरष्कृत है व पशुतुल्य
समझा गया है श्रम से जुडे़ सभी काम व सवर्णों के सभी घृणित काम इसी के कन्धों पर थे
जबकि दूसरे का समाज के सभी सुख-सुविधाओं पर आरक्षण है। लेकिन
इस तथ्य को ये अपने पास भी फ़टकने नहीं देते। इक्कीसवीं सदी
तक आते-आते पूंजीवाद ने इस फ़ासले को कम कर दिया है। पिछले कई
दशकों से चल रहे पूंजीवादी विकास व बाद मे लागू आरक्षण की प्रक्रिया ने दलित-पिछड़ी जाति में भी वर्गीय विभाजन कर दिया है इनके बीच से कुछ हिस्सा अपनी हैसियत
में ऊपर उठ गया है ‘फ़िक्की’ की तर्ज़ पर इसमें से निकले पूंजीपतियों
ने अपन|
एसोसिएशन ‘डिक्की’ बना रखा है ब.स.पा. व इसकी सुप्रीमो मायावती पूंजीपतियों की ही पार्टी
है। दलित-पिछडे़ डाक्टर-इन्जीनियर भी इस
जमात में शामिल है आज आरक्षण का लाभ भी दलितो-पिछड़ों का यही मध्यम
व उच्च मध्यम वर्गीय हिस्सा उठा रहा है। जबकि इनका अधिकांश हिस्सा मज़दूर है जो की निजी
क्षेत्र में काम करता है जहां कोई आरक्षण नहीं है। इस प्रकार जाति भेदभाव भी लगातार
कम हुआ है। निजी क्षेत्र तो दूर की बात आज तो सरकारी क्षेत्र में भी नियमित नियुक्ति
के बजाय ठेकेदारी व संविदा पर कर्मचारी रखे जा रहे हैं यहां भी कोई आरक्षण नहीं है
। लेकिन आरक्षण विरोधी लोग
इन तथ्यों को भी आंख-कान नहीं देते। उन्हें लगता है कि
"योग्य" होने का लाइसेन्स केवल उन्हीं
के पास है कि भारत सरकार ने करोड़ों सरकारी नौकरियों के पद सृजित किये हैं बस ये केवल
दलित-पिछड़े ही हैं जिनके आरक्षण के कारण वे या उनके
"योग्य" बच्चे बेरोजगार हैं या उन जैसे
"योग्य" का प्रमोशन नहीं हो पा रहा है। उनका दिमाग शासक वर्ग की पूंजीवादी
नीतियों को कभी कठ्घरे में खड़ा करने व इसके खिलाफ़ संघर्ष करने की ओर नहीं जाता। चौतरफ़ा
बेरोजगारी व इसकी बढ़ती दर इनकी नज़रों से ओझल रहती है। हकीकत तो यही
है की आरक्षण की व्यवश्था के बावजूद आज भी हर जगह सवर्णों का ही वर्चस्व है। अधिकतर
सभी उच्च पदों पर ये ही आसीन हैं। ये श्रेष्ठता बोध से इतने आत्ममुग्ध हैं कुन्ठित
हैं कि किसी दलित-पिछड़े जाति के अधिकारी को बर्दाश्त नहीं कर
पाते उन पर तरह-तरह के व्यंग्यबाण चलाते रहते हैं कुछ केसों में
तो इस माहौल से तंग आकर इन अधिकारियों को इस्तिफ़ा देकर नौकरी छोड़्नी भी पड़ी है। स्थिति
आज भी यह है कि आरक्षित पदों पर भी दलितो-पिछड़ों से उम्मीदवार
न मिलने के चलते पद काफ़ी लम्बे समय से रिक्त चलते रहते हैं। अब यदि प्रश्न इस रूप में प्रश्तुत हो कि क्या आरक्षण मात्र से इस समस्या का
हल बुनियादी तौर पर संभव है तो स्पष्टत: यह केवल एक सुधार है
समस्या का बुनियादी हल नहीं। दलितो-पिछ्ड़ों का बहुलांश आज मजदूर
वर्ग की पातों में है। ब.स.पा. समेत सभी पूंजीवादी चुना्वबाज पार्टियां अपने-अपने वोट
बैंक के गणितीय समीकरण के हिसाब से व्यवहार कर रही है। इस समस्या का वास्तविक समाधान
मज़दूर वर्ग के संघर्षों के दम पर ही संभव है। आर्थिक-सामाजिक
गैरबराबरी को व तमाम शोशण-उत्पीड़्न खत्म करने के मकसद से एक नयी
समाज व्यवश्था ‘समाजवाद’ का निर्माण अतीत
में मजदूर वर्ग के नेतृत्व में हुआ था। इसी के दबाव में व अपनी जरूरत के हिसाब से हमारे
शासकों ने आरक्षण जैसी व्यवश्था का प्रावधान संविधान में किया था। और अब भविष्य में
एक क्रान्तिकारी संघर्ष के जरिये ही एक झटके से इस समस्या का खात्मा होगा। मज़दूर जिसमें दलितों-पिछ्ड़ों की संख्या काफ़ी है अपने को वर्ग के बतौर संगठित करके इस क्रान्तिकारी
संघर्ष को अंज़ाम देगा।
जनवादी अधिकारों के लिए संघर्षशील व साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी संगठन
Saturday, 6 October 2012
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