Saturday, 19 May 2018

कर्नाटक चुनाव, भाजपा, कांग्रेस और लोकतंत्र

    कर्नाटक चुनाव, भाजपा,  कांग्रेस और लोकतंत्र
             
        कर्नाटक चुनाव में पिछले चुनावों की ही तरह मोदी व शाह की जोड़ी ने बहुत कुछ दांव पे लगाया। सही कहा जाए तो इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने भ्रष्ट रेड्डी बंधु से हाथ मिलाया, भ्रष्ट येद्दयुरप्पा को मुख्य मंत्री का उम्मीदवार बनाया यही नहीं प्रधानमंत्री ने फिर ऐतिहासिक तथ्यों से मनमाना खिलवाड़ किया साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की हर कोशिश की और चुनाव प्रचार बन्द होने के बावजूद अंतिम दिन नेपाल से प्रचार करने का दांव भी चला। शाह ने 130 सीट जीतने का दावा भी किया। लेकिन इस सबके बावजूद भी बहुमत भाजपा को हासिल नहीं हुआ। वोट प्रतिशत के लिहाज से 36.2% के साथ पार्टी दूसरी नंबर पर थी तो सीट के हिसाब से 104 सीटों के साथ पहले नम्बर पर।
             जहां तक  कॉंग्रेस का सवाल है उसने भी बहुमत हासिल करने का दावा किया था हालांकि वोट प्रतिशत के लिहाज (38%) पहले नंबर पे रही तो सीटों के लिहाज से 78 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर। कांग्रेस पार्टी कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रही नरम हिदुत्व की नीति पर वह चलती रही है। इस चुनाव में भारतीय फासीवादियों के उग्र हिंदुत्व के जवाब में गुजरात से आगे बढ़ते हए कांग्रेस नरम हिंदुत्व पर खुल कर खेलने लगी। वह मठों व मन्दिरों के चक्कर जमकर लगाने लगी। फ़ासीवादी ताकतों का जवाब कांग्रेस ऐसे ही दे सकती है इस नरम हिन्दुत्व की परिणति देर सबेर उग्र हिंदुत्व में ही होनी है।
            आज के जमाने में जब पूंजीवाद का वैश्विक संकट गहन हो रहा हो शासक वर्ग दुनिया भर में प्रतिक्रियावादी ताकतों व दक्षिणपंथी ताकतों का आगे कर रहा हो खुद मध्यमार्गी पार्टी इस दिशा में ढुलक रही हो तो फिर अपने देश में इस पर अचरज कैसा। कांग्रेस की दिशा भी अब यही है। इतना तो स्पष्ट है कि एकाधिकारी पूंजी अब अपनी इस पार्टी के पतन पर ब्रेक लगाने को उत्सुक है। उसकी यह उत्सुकता एक वक़्त के "पप्पू" की गंभीरता व खुद को प्रधानमंत्री के बतौर प्रोजेक्ट करने में दिखती है। यह चुनाव के बाद घटे घटनाक्रम में और भी ज्यादा साफ है कॉंग्रेस की भाजपा के मुंह से जीत छीन लेना यूं ही नही है।
           कर्नाटक चुनाव को 2019 के मोदी के लिटमस टेस्ट की तरह भी प्रस्तुत किया जा रहा था। इतना तो स्पष्ट है कि चुनाव दर चुनाव के आंकड़े दिखाते है कि मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ या मोदी पर भरोसे का ग्राफ गिर रहा है लगभग 6%--10% की गिरावट है। कर्नाटक चुनाव में लोक सभा चुनाव की तुलना में लगभग 7%, की गिरावट है। अब कर्नाटक में सत्ता हाथ से जाने के बाद तय है कि साम्प्रदायिक उन्माद को अब और ज्यादा उग्र होकर आगे बढ़ाया जाएगा। सम्भावना इसकी ज्यादा है कि यह गुजरात की तर्ज पर हो राम मंदिर, अंधराष्ट्रवाद आदि के अलावा यह प्रधानमंत्री यानी मोदी के आतंकवादियों द्वारा मारे जाने की फर्जी खबरों की बाढ़ व गिरफ्तारियों के रूप में हो सकता है।
           खैर कर्नाटक में चुनाव के बाद जो स्थिति बनी जिसमें भाजपा किसी भी कीमत पर सरकार बनाने के लिए बेचैन थी और राज्यपाल ने 15 दिन का समय बहुमत सिद्ध करने के लिए दिया था। यह गुजरे जमाने के कांग्रेस की याद दिलाने वाला था। तब कांग्रेस अपने विरोधियों की प्रांतीय सरकारों को गिराया करती थी । "नैतिकता व शुचिता" की बातें करने वाली भाजपा अब कहने लगी कि "राजनीति भी संभावनाओं की कला है"।इसके लिए विधायकों की खरीद के लिए जमकर कोशिश की गई। दूसरी ओर कांग्रेस ने जे डी एस से अवसरवादी गठजोड़ कर उसके नेता को मुख्यमंत्री घोषित कर सत्ता से भाजपा को बाहर करने के लिए जमकर मोर्चा लिया। अंततः येद्दयुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ा। वे विधायको को ख़रीदने में असफल रहे।
            कांग्रेस इस जीत को अब लोकतंत्र की जीत कह रही है उनका लोकतंत्र सही मायने में है भी यही यानी पूंजीवादी लोकतंत्र। इस लोकतंत्र में पूंजीपति वर्ग की पार्टियां बारी बारी से जनता के बीच से चुनकर आकर उन पर शासन करती है। आम अवाम के ऊपर कुछ बेहद सीमित अधिकारों के रूप में यह पूंजीवादी तानाशाही के अलावा और कुछ नही है। अब कर्नाटक में सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने जनता के जीवन में कोई बदलाव तो आने से रहा। जहां तक फ़ासीवादी ताकतों से लड़ने का सवाल है यह कांग्रेस की न तो मंशा है न ही वह ऐसा कर सकती है।

Saturday, 5 May 2018

सवाल दुनिया को बदलने का है ( कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर)

     सवाल दुनिया को बदलने का है ( कार्ल मार्क्स की 200वीं जयंती पर)
                                                       (  साभार : enagrik.com )

       आज भी पूंजीवादी व्यवस्था के घनघोर समर्थकों से लेकर आमजन तक से एक बात अक्सर सुनने को मिल जाती है जिसका सार यह होता है कि दुनिया में अमीर-गरीब, शोषक-शोषित हमेशा से रहे हैं और हमेशा रहेंगे। जहां आमजन अपने जीवन की हताशापूर्ण स्थितियों से इन नतीजों तक पहुंचे होते हैं वहीं पूंजीवादी व्यवस्था के पैरोकार अपनी व्यवस्था के बचाव में इस तरह के तर्क ईजाद कर रहे होते हैं। इनमें से ज्यादा पढ़े-लिखों के पास इस तरह के पुराने तर्कों का एक जखीरा मौजूद होता है।
         जब आमजन यह कहते हैं कि अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, शासक-शासित हमेशा से मौजूद रहे हैं तो उनकी बात में एक आंशिक सच्चाई होती है। यह सच्चाई केवल उनके सीमित जीवन की सच्चाई नहीं है जिस दौरान दुनिया नहीं बदली। यह सच्चाई ज्यादा बड़ी है। यह सच है कि जब से दुनिया में वर्गीय समाज पैदा हुए हैं तब से हमेशा से अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, शासक-शासित मौजूद रहे हैं। और इस बात को पांच हजार साल हो चुके हैं। मानव के ध
 रती पर कुल दो लाख साल के जीवन में पांच हजार साल ज्यादा नहीं हैं पर ये पांच हजार साल ही मानव सभ्यता के भी काल हैं। इसके पहले तो मानव आदिम कबीलाई समाज में रहता था -सभ्यता पूर्व के काल में। आज के मानव की ज्यादातर यादें तो इसी सभ्यता के काल की हैं।
           इस तरह सभ्यता के काल में मानव समाज एक जैसा रहा है -आमजन के हिसाब से आंसुओं के समुद्र में डूबा हुआ। ऐसा नहीं है कि इस काल में इस समुद्र से बाहर निकलने के लिए आमजन ने प्रयास नहीं किये, पर पाया यह गया कि प्रयास मूलतः असफल हो गये। ऐसे में यह घारणा पैदा होनी स्वाभाविक थी कि दुनिया नहीं बदल सकती। और यह जब आमजन की अपनी जिंदगी की हताशापूर्ण स्थितियों से मेल खा जाती हो तो यह घारणा एकदम पुख्ता हो जाती है।
           पर जैसा कि पहले कहा गया है कि यह एक आंशिक सच्चाई ही थी। ज्यादा बड़ी और ज्यादा व्यापक सच्चाई यह है कि दुनिया बदली है। ठीक इसीलिए यह आगे भी बदलेगी।          
           इस संबंघ में सबसे पहली बात तो यही है कि पांच-सात हजार साल पहले मानव समाज में एक आमूलचूल बदलाव हुआ था। इसी बदलाव के द्वारा पहले का आदिम समाज वर्गीय समाज में रूपांतरित हो गया। अब तक मानव समाज में यह सबसे बड़ा परिवर्तन रहा है।
           यहां यह रेखांकित करना होगा कि जब पांच-सात हजार साल पहले वर्गीय समाज पैदा होने की बात की जा रही है तो यह पूरी दुनिया के लिए नहीं है। यह भारत, चीन और यूनान जैसी चुंनिदा जगहों पर हुआ। अन्य जगहों पर मानव समाज कबीलाई बने रहे और बाद में अलग-अलग समयों पर वर्गीय समाजों में रूपांतरित हुए। यह प्रक्रिया आज भी जारी है -भारत जैसे देशों में भी।
           आदिम कबीलाई समाज का वर्गीय समाज में रूपांतरण एकदम मूलभूत था। कबीलाई समाज में न तो निजी सम्पत्ति थी और न तेरे-मेरे का भाव। सामूहिकता पूरे समाज की आत्मा थी, वैदिक भाषा में वह ‘ऋत’ थी। इसमें अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, शासक-शासित नहीं थे। स्त्री-पुरुष के बीच भेद भी नहीं था। वर्गीय समाज इन सारे ही मामलों में ठीक उलटा था। इसमें निजी सम्पत्ति थी। तेरे-मेरे का भेद था। सामूहिकता के बदले निजी प्रघान था। कुछ लोग अति सम्पतिवान थे बाकी लोग सम्पतिविहीन या बहुत थोड़ी सम्पत्ति वाले थे। इसमें शोषण था, अन्याय-अत्याचार था। इसमें चोरी-डकैती, हत्या-बलात्कार और वेश्यावृत्ति थी जिनसे कबीलाई समाज एकदम अंजान था। कोई आश्चर्य नहीं कि ऋगवेद में ‘ऋत’ के हटकर चले जाने पर इतना विलाप किया गया है। यह भी कोई आश्चर्य नहीं कि इस भयंकर बदलाव ने भारत में बौद्ध घर्म जैसे घर्म को जन्म दिया। ईसाई घर्म की उत्पत्ति के पीछे भी ऐसी ही परिवर्तन की प्रक्रिया थी।
            मानव समाज में यह बदलाव कबीलाई समाज के लोगों के हिसाब से अत्यन्त क्रूर था। यह क्रूरता की दास्तान उपरोक्त घर्मों, मिथकों, पुराण कथाओं और लोक कथाओं से भरी पड़ी है। पर मानव समाज के हिसाब से यह क्रूर परिवर्तन एक प्रगतिशील कदम था। इसी के जरिये मानव समाज आदिम जीवन को छोड़कर सभ्यता में प्रवेश कर सका। इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि जो समाज यह कदम नहीं उठा सके वे उसी आदिम अवस्था में जी रहे हैं। जबकि दूसरे मानव चांद-सितारों तक पहुंच रहे हैं।
             यह बहुत अजीब है कि मानव सभ्यता का यह इतना बड़ा प्रगतिशील कदम इतना ज्यादा क्रूर था। इतना ही नहीं, यह वह कदम भी था जिसने मानव को शेष प्रकृति से अलग करके उसे उसके खिलाफ खड़ा कर दिया। आदिम कबीलाई समाज का मनुष्य शेष प्रकृति का हिस्सा था। वह प्रकृति के एक हिस्से के तौर पर पैदा हुआ था और उसी रूप में बना हुआ था। अब वर्गीय समाज के मनुष्य के रूप में वह प्रकृति के खिलाफ खड़ा हो गया। उसकी सभ्यता का एक प्रमुख तत्व प्रकृति से विलगाव और उसके खिलाफ खड़े होने में था। सभ्यता के विकास के साथ यह तत्व प्रमुख होता गया और अब पूंजीवाद में तो प्राकृतिक विनाश के जरिये समूचे मानव अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा हो गया है। सभ्यता के विकास की इसी गति को देखते हुए रूसो ने कहा था कि सभ्य मानव की हर प्रगति साथ ही अवनति भी है।
              आदिम कबीलाई समाज के वर्गीय समाज में मूलभूत रूपांतरण के बाद ऐसा नहीं हैं कि बदलाव रुक गया। वास्तव में बदलाव हुआ है पर वह उतना मूलभूत नहीं है। इसीलिए सामान्य तौर पर देखने में बदलाव नजर नहीं आता। इसीलिए आमजन इस बदलाव को नजरंदाज कर देता है। जब वर्गीय समाजों में बदलाव के बावजूद निजी सम्पत्ति, अमीर-गरीब, शोषक-शोषित, शासक-शासित बने हुए हैं तो बदलावों का आंख से ओझल हो जाना समझ में आने वाली बात है।
              पर असल बात तो यह है कि बदलावों को हवा-पानी की तरह स्वीकार कर लिया गया है यानी जिंदगी का हिस्सा बन गयी हैं। चंद उदाहरण इसे स्पष्ट करेंगे। आज गुलामी तो क्या बंघुआ मजदूरी भी किसी को स्वीकार नहीं हो सकती। कहीं बंघुआ मजदूरी का मामला सामने आते ही हो-हल्ला मच जाता है। लेकिन एक जमाना था जब गुलामी एक स्वीकार्य आम चीज थी और दूसरे जमाने में बंधुआ मजदूरी आम बात। पहला गुलाम समाज में था दूसरा सामंती समाज में। आज पूंजीवाद में ये दोनों ही नितांत अस्वीकार्य हैं क्योंकि इसमें मजदूर स्वतंत्र होता है, कानून की नजर में मालिक के बराबर होता है। दूसरा उदाहरण लें। गौतम बुद्ध की हिम्मत हुई थी कि तब वे समाज में स्थापित हो रही वर्ण व्यवस्था को खारिज कर दें। उन्होंने अपने बौद्ध संघ में सभी वर्णों के लोगों को शामिल होने की इजाजत दी पर समाज में स्थापित हो रही वर्ण व्यवस्था को उन्होंने चुनौती नहीं दी। आज बहुत सारे दलित वर्ण व्यवस्था को चुनौती देने के लिए हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध घर्म में शामिल हो रहे हैं। आज आम दलित जन को भी वर्ण व्यवस्था स्वीकार नहीं है। तीसरा उदाहरण, आज शासन के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र सामान्य बात मानी जाती है जबकि दो सौ साल पहले सारी दुनिया में राजाओं का ही शासन था। भारत में पुराने राजाओं-रजवाड़ों के वंशज चुनाव के जरिये ही सत्ता तक पहुंच पाते हैं। उनमें से किसी के द्वारा पुराने खानदानी अधिकार का दावा केवल मजाक का विषय ही बनेगा।
              बदलावों के बहुत सारे उदाहरण और दिये जा सकते हैं पर इतना स्पष्ट है कि वर्गीय समाजों की कुछ मूलभूत विशेषताओं के बने रहने के बावजूद इन समाजों में बहुत बदलाव हुए हैं। सबसे बड़े बदलाव तो समाज व्यवस्थाओं के बदलाव ही हैं। गुलाम समाज, सामंती समाज और पूंजीवादी समाज। यह सही है कि सारे ही समाजों में ये व्यवस्थाएं एक के बाद एक क्रमशः मिल जाती हैं। और आज तो इसमें दो राय नहीं कि सारी दुनिया में ही पूंजीवादी व्यवस्था हावी है।
             इन बदलावों को कई तरह से देखा जा सकता है। शोषित-उत्पीड़ित जन के हिसाब से देखें तो एक ओर जहां इनका शोषण बढ़ता गया है वहीं दूसरी ओर इनके खिलाफ क्रूरता कम होती गयी है और आजादी बढ़ती गयी है। गुलाम, भूदास और मजदूर में ये सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष है। शासकों के हिसाब से देखें तो एक ओर उनकी दौलत और ताकत बढ़ती गयी है पर दूसरी ओर उनकी स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता पर लगाम लगी है। पूंजीवादी लोकतंत्रों में शोषक पूंजीपति और शासक पूंजीपति-नेता सभी नियमों में बंघे हुए हैं। पूरे समाज के हिसाब से देखें तो विज्ञान, तकनीक और उत्पादकता का लगातार विकास होता गया है और समाज स्थानीय-विशेषीकृत होने के बदले ज्यादा व्यापक और संभाग होता गया है। पूंजीवाद में तो सारी दुनिया में ही मोटा-मोटी एक संस्कृति है।
               वर्गीय समाजों की इस आम गति के अलावा यदि पूंजीवादी समाज की गति को बारीकी से देखें तो स्वयं इसमें भी काफी बदलाव दिखते हैं। पिछले पांच सौ साल में ही नहीं बल्कि पिछले डेढ़ सौ साल पहले छोटी-छोटी पूंजीवादी कंपनियां और छोटे-छोटे पूंजीपति थे। इंग्लैण्ड जैसे एकाघ देशों को छोड़ दें तो खेती अब भी मुख्य पेशा थी। शासन अभी भी राजा ही कर रहे थे और पूंजीवादी लोकतंत्र पैदा ही हो रहा था। पूंजीवाद की नई दुनिया और सामंतवाद की पुरानी दुनिया आपस में गुत्तम-गुत्था थे तथा ज्यादातर समाजों में दूसरा ही हावी था। साथ में यह भी था कि नये विकसित हो रहे पूंजीवादी देश बाकी समाजों को अपना गुलाम बना रहे थे। भारत इंग्लैण्ड का गुलाम बन चुका था। आज डेढ़ सौ साल बाद दुनिया की तस्वीर एकदम अलग है।
              लब्बे-लुबाब यह कि यह सही नहीं है कि दुनिया जस की तस है। दुनिया लगातार बदलती रही है। यह बदलाव अलग-अलग स्तर का रहा है। यह मात्रात्मक भी रहा है और गुणात्मक भी। गुणात्मक बदलाव भी अलग-अलग तरह का रहा है। वर्गविहीन आदि के कबीलाई समाज से वर्गीय समाज में रूपांतरण एक तरह का था तो सामंती समाज से पूंजीवादी समाज में रूपांतरण (निजी सम्पत्ति की एक व्यवस्था से निजी सम्पत्ति की दूसरी व्यवस्था में रूपांतरण) दूसरी तरह का। स्वयं पूंजीवादी समाज में मुक्त प्रतियोगिता से एकाघिकारी पंूजीवाद में रूपांतरण एक अन्य तरह का गुणात्मक परिवर्तन था।
             कार्ल मार्क्स  ने जब कहा था कि दार्शनिकों ने अभी तक भांति-भांति के तरीके से केवल दुनिया की व्याख्या करने की कोशिश की है जबकि सवाल तो इसे बदलने का है तो दरअसल बदलाव की परियोजना में शामिल होकर ही वे यह बात कर रहे थे। उनके दर्शन और समूचे सिद्धांत का यही उद्देश्य था। सबसे पहले और सबसे बढ़कर वे क्रांतिकारी थे। यहीं से खड़े होकर उन्होंने प्रकृति और समाज में गति और परिवर्तन को देखा। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद प्रकृति और समाज की गति और परिवर्तन के आम सिद्धांत हैं।
              मार्क्स  ने केवल यह नहीं बताया कि गति और परिवर्तन समाज समेत प्रकृति का आम चरित्र है। कि बदलाव होता ही है कि बदलाव मात्रात्मक और गुणात्मक, क्रमिक और छलांग दोनों होता है कि क्रांतिकारी बदलाव समय-समय पर अनिवार्य हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मानव अपने समाज का निर्माण खुद करता है पर उसे  दी गयी परिस्थितियों में। यानी मानव इतिहास की गति का परिणाम और उसका निष्पादक दोनों हैं। मानव समाज में जो भी परिवर्तन हुए हैं उनमें शोषकों और शोषितों, शासकों और शासितों की प्रमुख भूमिका रही है।
              आज जब पूंजीवादी समाज के पैरोकार चीख-चीख कर कह रहे हैं कि उनकी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है तो वे प्रकारांतर से यही कह रहे हैं कि अब मानव समाज में कोई परिवर्तन नहीं होगा। अब गति और परिवर्तन के प्रकृति के सारे नियम निष्क्रिय हो जायेंगे। उनकी व्यवस्था शाश्वत रहेगी। वैसे यह कहना होगा कि पहले के सारे शासकों को भी यही गुमान था। राजा-महाराजा कभी नहीं सोच पाये कि एक समय आयेगा जब उनका शासन नहीं रहेगा।
              पूंजीवादी व्यवस्था के पैराकारों से अलग स्वयं पूंजीवादी समाज की सच्चाई ही यह चीख-चीख  कर कह रही है कि इस व्यवस्था को समाप्त किया जाये और मानवता को एक नये चरण में ले जाया जाये। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक किसी भी पहलू से इस व्यवस्था के अब बने रहने का औचित्य नजर नहीं आता। अब यह व्यवस्था मानवता के लिए अकथनीय दुख, कष्ट और तबाही-बर्बादी का कारण बन गयी है। अब कोई भी तकनीक या उत्पादक प्रगति अपने साथ कई गुना तबाही ला रही है। इस व्यवस्था में आज कई कोणों से मानवता के भविष्य को खतरा पैदा हो गया है।
              आज ऐतिहासिक ही नहीं तात्कालिक तौर पर यह जरूरी हो गया है कि इस व्यवस्था को समाप्त कर नई व्यवस्था कायम की जाये। यह नई व्यवस्था कम्युनिज्म के अलावा और कुछ नहीं हो सकती। और इसमें मानवता को ले जाने का महती कार्यभार मजदूर वर्ग के ऊपर आन पड़ा है।

Wednesday, 4 April 2018

एस सी / एस टी एक्ट , 2 अप्रेल और सरकार

                  एस सी / एस टी एक्ट , 2 अप्रेल और सरकार
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          सर्वोच्च न्यायालय के दो जज यू यू ललित व ए के गोयल की बेंच ने एस सी-एस टी एक्ट में बदलाव कर दिया। बदलाव के पीछे तर्क कनविक्शन दर के कम होने व कानून के दुरुपयोग का दिया गया। अब फैसले के मुताबिक सरकारी कर्मचारी के खिलाफ़ गिरफ्तारी व मुकदमे से पहले उठाए नियुक्त करने वाले अधिकारी की अनुमति व अन्य मामलों में एस एस पी की अनुमति की जरूरत होगी।साथ ही अग्रिम जमानत भी अब मिल सकती है। इस फैसले के कुल नतीजे के बतौर एस सी /एस टी एक्ट भौथरा हो गया।
          देश में आज़ादी के बाद लगातार ही दलितों के प्रति छुआछूत व तमाम तरीके के मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न सामाजिक बाहिष्कार व हत्याओं में अन्य कानूनी प्रावधानों का कोई विशेष फर्क न देखते हुए ही 1989 में एस सी-एस टी एक्ट बनाया गया था। जिसमें अपराध को संज्ञेय, गैरजमानती व असुलहनीय बनाया गया।
 आज जब देश में प्रतिक्रियावाद की आंधी चल रही हो तब यह कानून भी कैसे उन ताकतों को सहन हो सकता है जो अपनी जहनियत में जनवाद व प्रगतिशीलता के विरोधी है। जनवादी मूल्यों व जनवाद , संवैधानिक व जनवादी अधिकारों को कमज़ोर व इसका निषेध करना फ़ासीवादी शक्तियों व इस आंदोलन की खासियत है। कोई कह सकता है कि यह कदम एक फ़ासीवादी सरकार का नही बल्कि कोर्टमात्र के हैं। तब यह फ़ासीवादी आंदोलन को केवल पार्टी या व्यक्ति विशेष तक सीमित करना होगा । 
           आज देश की एकाधिकारी पूंजी की जरूरत है फ़ासीवादी आंदोलन को बनाये रखना व इसे मज़बूत करना। इसने तो बाकायदा इन्हें सत्ता तक पहुंचाया है। तब फिर ऐसे लोग या समूह भी जो इस फासीवादी मानसिकता से ग्रस्त है वह अपने अपने प्रभाव क्षेत्र में जनवाद विरोधी कदमों को ही आगे बढ़ाते हैं। फ़ासीवादी सरकार की अचेत या सचेत या परोक्ष जो भी भूमिका हो। न्यापालिका का यह फैसला तब है जबकि शबीरपुर, ऊना आदि जैसी कई सामूहिक अपराध की घटनाएं हो चुकी है। उससे पहले भी खैरलांजी, मिर्चपुर, बथानीटोला आदि आदि जैसे कई हत्याकांड हो चुके थे। लेकिन सवाल यह भी उठाना चाहिए कि क्यों ऐसे हत्याकांड एस सी-एस टी एक्ट के बावजूद होते रहे ? क्यो ऐसा संभव हुआ कि दलितों की दुहाई देने वाली बसपा के काल में दलित उत्पीड़न होता रहा ?2007 में सर्वजन हिताय का नारा देकर जब मयावती सत्ता में पहुंची थी तब उनकी सरकार ने भी एससी -एस टी को कमजोर किया था। जो लोग, या संगठन या फिर पार्टियां केवल कानून को पवित्र घोषित करने वाले व कानूनी पहलुओं पर जोर देने वालों को यह भी देखना होगा की शबीरपुर, ऊना व इससे पहले के तमाम (1989 के बाद ) दलितों आदिवासियों के खिलाफ़ सामुहिक अपराध को अंजाम देने वालों को क्या सजा हुई ? शबीरपुर तो ताजा मिसाल है !! पीड़ितों दलितों के पक्ष में आवाज उठाने वाले दलित समुदाय के नौजवान जेल में ठूंस दिए गए ! । 
         सवाल उठाया जाना चाहिए कि क्यों ऐसा हो रहा है कि दलितों के पक्ष की बात करने वाले कई दलित बुद्धिजीवी व दलित पार्टी अपने कंधों पर फासिस्टों को ढोये जा रहे है उनके चरणों में लोट-पोट हैं ? या फिर बहुजन हिताय की बात करने वाले सर्वजन हिताय की बात करने लगते हैं ? पूंजीवाद के इस सड़ते गलते दौर में "सत्ता में भागेदारी" का नारा देकर दलितों का ऊपर उठ चुका हिस्सा जो कि शासक वर्ग की श्रेणी में पहुंच चुका है उसके लिए एस सी - एस टी एक्ट में बदकाव का विरोध अपने वोट बैंक को अक्षुण्ण बनाये का जरिया भी है। 2 अप्रेल का प्रदर्शन इसी का नतीजा है। लेकिन फ़ासिस्ट सरकार का रुख 2 अप्रेल के प्रदर्शन का अपने अपने राज्यों में आंदोलन के हिंसक होने की आड़ में दमन किया गया जिसमें कुछ लोग मारे तो कई घायल हो गए। 2 अप्रेल के बाद पूरे आंदोलन से निपटने का तरीका वही है जो कि योगी सरकार का शब्बीर पुर मामले में रहा है। हज़ारों की तादाद में फर्जी मुकदमे दर्ज कर जेल में ठूंस कर खौफ व दहशत का माहौल कायम कर देना ताकि अगली बार प्रदर्शन का साहस न हो सके।
        जहां तक कानून को कमजोर करने के फैसले या प्रयासों का विरोध करने का सवाल है निश्चित तौर पर इस कानून को कमज़ोर करने के खिलाफ आवाज पुरजोर उठनी चाहिए लेकिन साथ ही वो लोग जो सही मायनों में जातिवाद व जातिवादी हिंसा उत्पीड़न व अन्याय को खत्म करना चाहते है उन्हें जातिवाद के दायरे से बाहर निकल कर वर्गीय दायरे में सोचना होगा। वर्गीय आधार पर संगठन व संघर्ष ही इसका सही व धारदार जवाब होगा।

Wednesday, 28 March 2018

'23 मार्च' भगत सिंह शहादत दिवस के 87 वें साल पर

       
         '23 मार्च' भगत सिंह शहादत दिवस के 87 वें साल पर



          23 मार्च 1931 का दिन भगत सिंह , राजगुरु व सुखदेव को अंग्रेजी हुक्मरानों द्वारा फांसी दी गई थी तब से अब 87 साल गुजर चुके हैं । इन 87 सालों में देश के शासक बदल गए। भगत सिंह की बातों में कहा जाय तो गोरे अंग्रेज तो चले गए काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज़ हो गए। एक खतरनाक दमन, अंग्रेजी हुकूमत के आतंक साथ ही दंगों का दौर आज़ादी से पहले गुजरा था। और आज़ादी के बाद आज जब 'सवाल' उठाने पर पहरे लग रहे हों ; अधिकारों की -रोजगार की-महंगाई की बात करना गुनाह हो। जब मेहनतकश दलितों-मुस्लिमों के पक्ष में आवाज उठाना देशद्रोह हो ; हर चीज को जब 'धर्म-संस्कृति-देशभक्ति' की चाशनी में परोसा जा रहा हो;  जब चौतरफा नफरत और दंगो की ही साजिश रची जा रही हो तब कहना ही होगा कि यह वक़्त बेहद खतरनाक है !
           अवश्य ही ! जिस समाज का ख्वाब भगत सिंह ने बुना था यह वैसा समाज नहीं है। भगत सिंह व उनके साथियों का ख्वाब था देश आज़ाद हो ; कि आज़ाद भारत समाजवादी देश बने। जिसमें अन्याय उत्पीड़न शोषण के लिए कोई जगह न हो ; जिसमें धर्म लोगों का निजी मामला हो, कोई गैरबराबरी ना हो; जिसमें पूंजी की जकड़न से समाज मुक्त हो; मेहनतकश जनता में भाईचारा हो ।
             ऐसे समाज के लिए भगत सिंह व उनके साथियों ने कुर्बानी दी। वह न केवल अंग्रेजो से लड़े बल्कि देश के काले अंग्रेजों के भी वह विरोधी थे। भगत सिंह कहते थे कुछ फर्क नही पड़ेगा यदि अंग्रेज पूंजीपति चले भी जाएं उनकी जगह देश के पूंजीपति जमीदार शासक बन जाएं तो। यही वजह थी कि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी गई और साथ ही राजगुरु व सुखदेव को भी।
              ये नौजवान शहीद हो गए मगर इनके विचार को अंग्रेज सरकार न मार सकी । इनके कुर्बानी व विचारों की चर्चा घर घर होने लगी। बस स्थितियां ऐसी बनी कि देश आजाद तो हुआ लेकिन सत्ता काले अंग्रेजो को मिल गयी।
             इन काले अंग्रजों की बदौलत आज संसाधनों व जनता की लूट खसोट निर्मम हो चुकी है। नोटबंदी व जी.एस.टी की हकीकत हमारे  सामने है। बढ़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी को हर कोई महसूस करता है। फैक्ट्रियों में मज़दूर का भयानक  शोषण है तो उधर किसान आत्महत्याएं कर रहे है।  लेकिन चैनलों में "चमकता भारत" है "खुशहाल जनता" है । टी वी चैनलों की-अखबारों की क्या कहें ? वंहा से जनता के दुख दर्द गायब हैं जनता के मुद्दे गायब हैं । वंहा चीख-शोरगुल,गाली-गलौज के सिवाय क्या है ? यंहा बस "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति-युद्ध" का उन्माद है। "धर्म-राष्ट्र-संस्कृति" के ठेकेदारों का ही अब चौतरफा आतंक है। ये हिटलर-मुसोलिनी के भक्त अपने आतंक से जनता को रौंद रहे है। इनके आतंक से मेहनतकश इंसान कसमसा रहा है। दूसरी ओर शासक पूंजीपतिवर्ग है उसके मुनाफे का कारोबार इन सबसे बढ़ती पर है, शेयर बाजार आसमान छू रहा है। हाल ये है कि देश की कुल संपदा का 73 % हिस्सा देश के 1 % पूंजीपतियों के कब्जे में जा चुका है जो कि पहले 58 % था। यही वो "विकास" है जिसके जश्न मनाये जा रहे है। यही जनता की "खुशहाली" है।
                जनता की इस बर्बादी के लिए शासक पूंजीपति जिम्मेदार है । लंबे वक्त तक पूंजीपतियों ने कांग्रेस को सत्ता पर बिठाये रखा। अपने मुनाफे के कारोबार को बहुत बढ़ाया। मंदी का दौर आया तो पूंजीपतियों ने फासीवादी ताकतों को सत्ता पर बिठा दिया । 'अम्बानी-अडानी का हाथ अब मोदी-शाह के साथ' है इनके सर पर है। अब 'जनता को कंगाल बनाने -पूंजीपतियों को मालामाल करने' की स्कीम जोर शोर से चल रही है। इसीलिए 'पकोड़े बेचना' 'कबाड़ बेचना' 'गुब्बारे बेचना'  इनकी नज़र में रोजगार है। जनता इस लूट को न समझ पाए इसलिये 'फूट डालो-राज करो' का मंत्र हर ओर है।  इसीलिए दंगे अब कभी इधर तो कभी उधर बहुत जरूरी है। जनता 'हिन्दू -मुस्लिम' में बंट जाएं ऐसे मुद्दे बेहद जरूरी हैं । सीमाओं पर युद्ध जरूरी है। हथियारों के अरबों-खरबों के धंधे का सवाल जो है। फिर पड़ोसियों के खिलाफ घोर नफरत भी तो बहुत जरूरी है ताकि 'राष्ट्रवाद' का कारोबार चलता रहे और 'युद्ध' को जायज ठहराया जा सके । दोनों तरफ सीमाओं पर रहने वाले घरों में जो खौफ-दहशत व मौत पसरी रहती है उनको कोई क्यों सुने। इन दंगो में कौन मरता है ? सीमाओं पर कौन मरता है ? नोटबंदी से जो मरे वो कौन लोग थे ? क्या कोई पूंजीपति या नेता या बड़ा अधिकारी था ? नहीं । निश्चित तौर पर --मरने वाले मेहनतकश लोग थे। चाहे वह किसी भी धर्म के हों , जाति के हों या फिर क्षेत्र के हों । मेहनतकश जनता या उनके बच्चे ही सब जगह मारे जाते है।
                  मेहनतकश जनता मेहनत करती है संघर्ष में कुर्बानी देती है यही चीज है जो एकजुट करती है संगठित करती है। आज़ादी का संघर्ष हम मेहनतकशों की कुर्बानी को बताता है दुनिया हम मेहनतकशों की खून पसीने से ही रोशन है। इस खून-पसीने में कोई हिन्दू-मुस्लिम या ऊंची-नीची जाति नहीं बता सकता। यही वह चीज है बुनियाद है जो हमें ताकतवर बनाती है और जिससे शासक खौफ खाते है डरते हैं। अन्याय, शोषण और जुल्म से लड़ने में यही एकता मेहनतकश जनता का हथियार है । शहीद भगत सिंह इसी एकता की बात करते हुए अंग्रेजों से लड़ गए थे। यही आज की राह है।
                 इसलिए आज अंधेरे दौर में फिर से जरूरत है शहीद भगत को याद करने की। अपने दौर में भगत सिंह ने इन "धर्म-संस्कृति" के ठेकेदारों को खूब खरी खोटी सुनाई थी। भगत सिंह ने लिखा --“....जहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अख़बारों का हाथ है।.. यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर ....सिर-फुटौव्वल करवाते हैं...।....फायदा...इन दंगों से अत्याचारियों(अंग्रेजों को) को मिला है वही नौकरशाही-जिसके अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो गया था....आज अपनी जड़ें ... मज़बूत कर चुकी है।.... .....संसार के सभी ग़रीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। .....तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताक़त अपने हाथ में लेने का यत्न करो।..1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं।...इसलिए गदर पार्टी-जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू-मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।"’( साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज " नामक लेख से)
              भगत सिंह की शहादत के 87 वें साल पर जरूरी है कि  विशेषकर युवा भगत सिंह की इस आवाज को सुनें जो भगत सिंह ने अपने दौर में युवाओं के लिए लिखी थी । भगत सिंह के शब्दों में ---
" चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक।... वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध(जगाना) कर दे..बड़े बड़े साम्राज्य उलट डाले।...अमेरिका के युवक विश्वास करते है कि अधिकारों को रौंदने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है। हे भारतीय युवक!... उठ, आँखें खोल,देख....गरज उठ !...( साप्ताहिक मतवाला में छपे लेख : "युवक" से )
आज वक़्त की जरूरत है कि शहीद भगत सिंह के विचारों की राह पर बढ़ा जाए ! संगठित हुआ जाय ! भगत सिंह के समाजवाद के ख्वाब को हकीकत में बदलने की दिशा में बढ़ा जाय।

                         

 

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