Sunday, 2 August 2020

उत्तर प्रदेश विकास दुबे एनकाउंटर कांड का निहितार्थ

         
      एक बार फिर उत्तर प्रदेश फर्जी मुठभेड़ के चकते चर्चा में आ गया। यह फर्जी।मुठभेड़ भी प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी की ‘ठोक दो’ यानी ‘एनकाउंटर’ की नीति का नतीजा थी।  विकास दुबे के एनकाउंटर के मामले की  प्रशंसा व विरोध में मीडिया में बहस केंद्रित थी।
       विकास दुबे  पर 60 से ज्यादा संगीन अपराध के मुकदमे दर्ज थे, इसकी ‘हिरासत में हत्या' किये जाने की संभावना है।  विकास दुबे ने मध्य प्रदेश के उज्जैन के मंदिर से आत्मसमर्पण करने की बात मीडिया में गूंजी है। कहा जा रहा है इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस, एस टी एफ उसे गाड़ी में लेकर आ रही थी। उत्तर प्रदेश में ही पहुंचकर रास्ते में ही कथित मुठभेड़ हुई। मगर इस एस टी एफ की कहानी पर कोई विश्वास करने को तैयार नहीं। वास्तव में यह मुठभेड़ नही हत्या है। 
       हकीकत क्या है? यह कि संगठित व कानूनी तौर-तरीके से गठित गिरोह ने असंगठित व गैरकानूनी कहे जाने वाले कथित अपराधी को तब ठिकाने लगा दिया जब वह अपनी मनमर्जी पर उतारू था या खुद को सबसे ऊपर समझने का भ्रम पाल बैठा था।
      पूंजीवादी समाज में इस तरह के कथित अपराध या अपराधियों का पैदा होना कोई अचरज की बात नहीं है गैर कानूनी करार दिए गए काम या अपराध जैसे स्मगलिंग, शराब व जमीन का अवैध कारोबार,  अवैध वसूली आदि-आदि इस समाज में लगातार चलते रहते हैं जिन्हें अंजाम देने वाले अपराधी ही होते हैं। 
         इस प्रकार के कथित अपराध व ऐसे कथित अपराधियों की पालक-पोषक व संरक्षक पुलिस, पूंजीवादी राजनेता या यह समूची व्यवस्था का पूरा ताना-बाना है। अपराध जगत से पूंजीवादी राजनीति में ढेरों लोगों का आना या फिर पूंजीवादी राजनीति में सक्रिय होकर यहां से फिर अपराध को अंजाम देना या गैरकानूनी कही जाने वाली चीजों को अंजाम देना, इसके ढेरों उदाहरण हैं। यही बात विकास दुबे के बारे में भी सच यही जो शुरुवात में भाजपा तो बाद में बसपा से जुड़ा रहा है।
 उत्तर प्रदेश में 2017 से दिसम्बर 2019 तक 5178 ‘एनकाउंटर’ पुलिस द्वारा किये गए जिसमें 103 की हत्या कर दी गई जबकि 1859 घायल हुए। देश में 2019 में 1731 नागरिकों की मौत हिरासत में हुई है। इसमें से 1606 न्यायिक हिरासत (मजिस्ट्रेट के आदेश पर जेल में भेजा जाना) में मारे गए जबकि 125 पुलिस हिरासत में। न्यायिक हिरासत में होने वाली मौतों की वजह प्राकृतिक या अप्राकृतिक बताई जाती है। यदि इसकी गहन जांच हो तो पता लगेगा कि इसमें से अधिकांश परोक्ष या प्रत्यक्ष हत्याएं ही थीं।
      उत्तर प्रदेश में बढ़ते एनकाउंटर की वजह से ही विपक्षी पार्टियों के कई नेता उत्तर प्रदेश को ‘एनकाउंटर प्रदेश’ भी कहते हैं। यह बात कुछ हद तक सही है। मगर ये अपने दौर को भूल जाते हैं।
        पी चिदंबरम के गृहमंत्रित्व काल को थोड़ा याद कीजिये। तब कांग्रेस की सरकार थी। उस जमाने में माओवादी नेताओं का एनकाउंटर आम बात हो चुकी थी। ये फर्जी एनकाउंटर ही होते थे। नागपुर में हुए हेम पांडे व माओवादी नेता आजाद के एनकाउंटर पर तो उस समय खूब हंगामा भी मचा था। तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में माओवाद के नाम पर फर्जी एनकाउंटर कर कई आदिवासियों की हत्या की जा चुकी हैं। इस संबंध में कई रिपोर्ट भी हैं।  
      जहां तक हिन्दू फासीवादी ताकतों के राज में होने वाले एनकाउंटर का सवाल है इसकी अन्य वजह भी हैं। जैसा कि फासीवादियों के बारे में कहा जाता है कि फासीवादी सबसे ज्यादा पतित, सबसे ज्यादा भ्रष्ट तत्व होते हैं। एक मायने में ये पूंजीवादी राज्य से इतर सबसे ज्यादा संगठित आपराधिक तत्व भी हैं। यही वजह है कि गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक ‘फर्जी एनकाउंटर’ को न केवल अंजाम दिया जाता है बल्कि इसे ग्लैमराइज या महिमामंडित भी किया जाता है। इसे इनकी नजर में या आम तौर पर परिभाषित अपराध को खत्म करने में सबसे बड़े ‘हथियार’ के रूप में प्रस्तुत व प्रचारित किया जाता है। चूंकि इनके द्वारा समाज में निरंतर यह प्रचारित किया गया है कि मुस्लिम अपराधी ही होते हैं। इस तरह आसानी से ये एनकाउंटर के जरिये भी अपनी फासीवादी ध्रुवीकरण की राजनीति को आगे बढ़ाते हैं
       फर्जी एनकाउंटर व पुलिस की क्रूरता, चूंकि साफ-साफ दिखाई देती रही है इसीलिए मौजूदा फर्जी एनकाउंटर पर हुई बहस, पुलिस की कार्य प्रणाली पर भी केंद्रित हुई। कहा जाता रहा है कि भारतीय पुलिस 1860-61 के कानून के तहत औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर राज कायम करने, इसे बरकरार रखने के मकसद से गठित की गई थी। चूंकि इसमें कोई भी विशेष सुधार आजादी के बाद भी नहीं हुए, पूरा तंत्र वैसे ही बना रहा इसीलिए आज भारतीय पुलिस का जो दमनकारी व क्रूर चेहरा दिखता है यह उसी     अतीत की देन है। यदि इसमें सुधार कर लिए जाते तो पुलिस मानवीय और जनतांत्रिक होती। इसमें फिर चर्चा करने वाले अलग-अलग आयोगों द्वारा पुलिस तंत्र व इसकी कार्यप्रणाली में सुधार हेतु सुझायी गयी संस्तुतियों की चर्चा करते हैं।    
     इस प्रकार की चर्चा में आंशिक सच्चाई  ही है। हकीकत यह है कि इस प्रकार की चर्चाएं असल मसले पर पर्दा डालने का ही काम करती हैं।
    हकीकत क्या है? यही कि पुलिस संस्था इस पूंजीवादी शासन-प्रशासन का एक महत्वपूर्ण अंग है कि पूंजीवाद में पूंजीपति वर्ग की ही सत्ता होती है, यही शासक है जो कि अल्पसंख्यक हैं जबकि बाकी बहुसंख्यक मजदूर-मेहनतकश जनता है जो इसमें शोषित उत्पीड़ित है।
      पुलिस तंत्र पूंजीपति वर्ग की सत्ता का ही एक दमनकारी औजार है जो कि आम जनता के न्यायपूर्ण व जनवादी प्रतिरोध को नियंत्रित करता है। ऐसा केवल पुलिस द्वारा होने वाले सामान्य दमन से लेकर बर्बर दमन के जरिये ही संभव होता है। इसी को कथित सभ्य जगत के लोग ‘लाॅ एंड आर्डर’ (कानून व्यवस्था) का मसला कहते हैं जिसे कथित शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य माना जाता है।
       इसीलिए पुलिस तंत्र में होने वाले सुधारों का सीधा संबंध शासक पूंजीपति वर्ग से है। यही वजह थी कि आजाद भारत के उस दौर के शासकों ने नेहरू की अगुवाई में ब्रिटिश शासकों द्वारा खड़े किये गए दमनकारी औजार, पुलिस तंत्र को भी लगभग वैसे ही बने रहने दिया। इसमें जातिवादी, स्त्री विरोधी, सामंती मूल्य तथा साम्प्रदायिक मूल्य व चेतना को बने रहने दिया गया।
        आज के दौर में जबकि फासीवादी ताकतों को शासक पूंजीपति वर्ग द्वारा सीधे सत्ता पर बिठाया जा चुका हो तब ऐसे अंधेरे दौर में कोई भी सुधार नहीं होने वाला है बल्कि उलटा ही होना है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली में सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों के निर्मम दमन तथा भीमाकोरेगांव मसले ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस किस हद तक फासीवादियों के औजार की तरह काम कर रही है वस्तुतः यह आज की पूंजीपति वर्ग की जरूरत के अनुरूप ही हो रहा है।

Friday, 26 June 2020

'घोषित आपात काल' से 'अघोषित आपात काल' की ओर


       26 जून 1975 की सुबह-सुबह जब आम लोगों की आंख खुली तो उन्होंने पाया कि उनके मौलिक अधिकार निलंबित हो चुके हैं उनके इर्द-गिर्द पुलिस ही पुलिस है। चारों तरफ पुलिस का आतंक पसरा हुआ है। गिरफ्तारियां, धर पकड़ की अपुष्ट खबरें 'अफवाहों' के रूप में सुनने को मिल रही थी। अख़बार न छप सके इसलिए रात में ही बिजली काट दी गई थी। 21 माह तक आपात काल कायम रहा था।
       आज मोदी व मोदी सरकार के मंत्री कॉंग्रेस को घेरते हुए उसे इस आपात काल की याद दिलाते रहते हैं। कंग्रेस को लोकतंत्र का हत्यारा तो खुद को लोकतंत्र के रक्षक के बतौर प्रस्तुत करते हैं।
      इस तरह 'आपात काल' के विरोधी होने का दम भरते हुए 'अघोषित आपातकाल' सी स्थिति मोदी सरकार कायम के चुकी है।
       इस 'अघोषित आपात काल' सी स्थिति की खासियत यह है कि देश में बिना आपात काल' घोषित किये ही 'अधिकार', 'बराबरी' के लिए तथा 'अन्याय' व 'जुल्म' के विरोध में उठती हर 'आवाज' तथा 'संघर्ष' को कॉरपोरेट मीडिया, संगीन फर्जी मुकदमों, गिरफ्तारियों, संगीनों व काले दमनकारी कानूनों के तले रौंदा जा रहा है। यही मौजूदा दौर की हकीकत है। इसे ' पूंजीवादी संविधान' के जरिये नहीं बल्कि 'संविधान' को 'निष्प्रभावी' करके हासिल किया जा रहा है।
      यह आपात काल से कई गुना ज्यादा खतरनाक, मारक है। यह एक हद तक, 'आतंकी तानाशाही' सी स्थिति है। मोदी-शाह 'आपात काल' को गलियाते हुए भी 'अघोषित आपात काल सी स्थिति' को मजबूत करते जा रहे हैं। 2014 के बाद से ही निरंतर इस ओर बढ़ा गया है। मोदी 2.0 में तो खुलेआम हिन्दू फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाया गया है।
    'अघोषित आपातकाल सी स्थिति' आंदोलन के रूप में है, यह 'फासीवादी आंदोलन' है, यह 'घोर जनविरोधी आंदोलन' है मगर इसके बावजूद, इसी जनता के एक हिस्से का 'समर्थन' इसे हासिल है। यह 'हिंदू फासीवादी आंदोलन' है। पूरे समाज में 'खेमेबंदी' इसी का लक्षण है। इसने इस व्यवस्था के 'कथित सभी अंगों' में 'घुसपैठ' कायम कर ली है। इसकी दिशा 'खुली आतंकी तानाशाही' यानी 'फासीवाद' कायम करने की ओर है।
   घोषित आपात काल 'संविधान' के जरिये कायम थी, यह 'आंदोलन' की शक्ल में नहीं आया। संविधान के अनुच्छेद 352 का इस्तेमाल कर 'सिविल तानाशाही' कायम की गई थी। जिस 'जनता' के खिलाफ यह 'लक्षित' था उसे मालूम था कि 'उनके अधिकार' 'निलंबित' किये जा चुके हैं जनता इसके खिलाफ थी। तब लोकतंत्र का नकाब ओढ़े हुई 'पूंजीपति वर्ग की तानाशाही' खुलकर सामने हाज़िर हो गई थी।
     'घोषित आपात काल' व' अघोषित आपात काल सी स्थिति' दोनों ही शासक पूंजीपति वर्ग की इच्छा का नतीजा है यह अपने-अपने वक़्त के 'आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक' संकट पर काबू पाने के तरीके हैं, उमड़ते जनांदोलनों पर काबू करने के तरीके हैं। फिर भी 'अघोषित आपात काल सी स्थिति' शासक पूंजीपति वर्ग के सबसे ज्यादा जन विरोधी, सबसे ज्यादा भ्रष्ट व पतित, सबसे ज्यादा अन्धराष्ट्रवादी व सम्राज्यवाद परस्त एकाधिकारी पूंजीपतियों की इच्छा, आकांछा का नतीजा है हालांकि अभी इसकी जरूरत 'खुली आतंकी तानाशाही' कायम कर देनी की नहीं है।

Saturday, 20 June 2020

क्रालोस कार्यकर्त्ता नसीम को डराने धमकाने का विरोध करो



     क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन की हल्द्वानी इकाई के कार्यकर्त्ता नसीम को केंद्र सरकार के निर्देश पर काम करने वाली आई बी (खुफिया विभाग) का आदमी बताते हुए दो लोगों ने नसीम को जबरन रास्ते पर रोककर उत्पीड़ित करने का काम किया। उनकी फोटो खींची तथा एक दुकान में कुछ लोगों के सामने डराने धमकाने की कार्यवाही की। जनवरी फरवरी माह में हल्द्वानी के वनभूलपूरा क्षेत्र में हज़ारों अल्पसंख्यक लोग सी ए ए, एन आर सी तथा एन पी आर के विरोध में सड़कों पर उमड़ पड़े थे। इस आंदोलन में क्रालोस के हल्द्वानी क्षेत्र के कार्यकर्त्ता भी इस दौरान गए थे।
      चूंकि मोदी-शाह की सरकार की जंग कोरोना से नहीं बल्कि सी ए ए प्रदर्शनकारियों से चल रही है इसीलिये दिल्ली में दिल्ली दंगों के नाम पर कई नौजवान छात्रों व छात्राओं को जो कि सी ए ए  विरोधी प्रदर्शनों में शामिल थे। उन्हें यू ए पी ए से लेकर तमाम संगीन मुकदमों में जेलों में ठूंसने की घृणित कारवाई को आगे बढ़ा रही है।
      हल्द्वानी में क्रालोस कार्यकर्त्ता को डराने धमकाने की यह कारवाई भी इसी की मिसाल है। क्रालोस मोदी सरकार की इस जनवादविरोधी घृणित कारवाई की तीखी भर्त्सना व निंदा करता है और मांग करता है कि इन डराने धमकाने व न्याय के लिए उठती इन आवाजों को कुचलने की घृणित कार्रवाइयों पर तत्काल रोक लगाए।

बढ़ते युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद का विरोध जरूरी है


       भारत की सीमा पर गलवान घाटी में चीनी व भारतीय सैनिकों के बीच संघर्ष में तकरीबन 20 भारतीय सैनिकों के मारे गए हैं। इस घटना के बाद देश में अन्धराष्ट्रवादी उन्माद का शोर फिर चरम पर है। पिछले कई दिनों से चीनी व भारतीय शासकों के बीच लगातार अंतर्विरोध बढ़े है जिसकी परिणति के बतौर एक ओर सीमा पर तो दूसरी ओर देश के भीतर कॉरपोरेट मीडिया व संघी आई टी सेल द्वारा युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद का माहौल बनाया गया।
    इस युद्धोन्माद व अन्धराष्ट्रवाद की कीमत मज़दूरों किसानों के बेटों को अपनी जान के रूप में सरहद पर चुकानी पड़ी है। यह बेहद दुःखद है। यह सीमा के इस व उस पार दोनों जगहों पर है।
    यह बेहद संगीन व दुखदायी स्थिति है कि एक तरफ देश के भीतर मजदूर मेहनतकश लोग, शासकों के घोर पूंजीपरस्त व घोर जनविरोधी होने के चलते मारे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उनके बेटे अन्धराष्ट्रवादी युद्धोन्माद में सरहदों पर मारे जाते हैं।
       अन्धराष्ट्रवादी युद्धोन्माद शासकों के लिए ऐसा मुद्दा है जहां पूँजीवादी शासक, चाहे वे उदारवादी हों या फिर फासीवादी, एक हो जाते हैं। मगर फासीवादी ताकतों के लिए तो यह कोर मुद्दा है। आज अन्धराष्ट्रवाद अमेरिका से लेकर दुनिया के अधिकांश मुल्कों में छाया हुआ है। इसके जरिये फासीवादी ताकतों को एकाधिकारी पूंजी आगे बढ़ा रही है।
     भारत जैसे मुल्कों के लिए अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद के दो पहलू हैं एक तरफ कमजोर मुल्कों को सर्जीकल स्ट्राइक व घर में घुसकर मारने की धमकी देना तो दूसरी ओर अपने से ताकतवर पूँजीवादी मुल्कों के सामने दुम हिलाना, मालों के बाहिष्कार की खोखली धमकी देना।
      पड़ोसी मुल्कों के खिलाफ नफरत फैलाना, युद्ध के उकसावे की राजनीति, सैन्य महिमामंडन, छद्म युद्ध ! पूँजीवादी फासीवादी शासकों की यह अन्धराष्ट्रवादी राजनीति बहुसंख्यक नागरिकों के लिए बेहद खतरनाक है।  आम नागरिकों, मजदूर मेहनतकशों, निम्न मध्यम वर्ग व मध्यम वर्गीय लोगों, सभी के असन्तोष, संकट से ध्यान हटाने तथा इमके तमाम संघर्षों को ध्वस्त कर देने व डाइवर्ट कर देने में अन्धराष्ट्रवाद शासकों का बेहद मारक हथियार है।
      कोरोना महामारी ने संकट ग्रस्त पूंजीवाद के संकट को गहनतम कर दिया है जो विश्वअर्थव्यवस्था पहले ही संकट में थी व भारत की भी। वह धराशायी होने की ओर बढ़ी है। इस महामारी ने पूंजीवाद की सीमाओं को तीखे ढंग से उजागर किया है। इसने पूँजीवादी फासीवादी शासकों के नकाब लगे घृणित चेहरों को नंगा कर दिया है।
     इसलिये ऐसे दौर में अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद जैसा माहौल बनाये रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
        कोरोना जैसी महामारी या अन्य भीषण आपदा, ऐसे समाज में जिसकी बुनियाद शोषण पर टिकी हुई हो, जहां मुनाफा ही जीवन दर्शन हो, जहां पूंजी ही सब कुछ हो, जहां व्यक्ति व समाज के बीच दुश्मनाना द्वंद हो, जहां पूंजीपति-मजदूर, डॉक्टर-मरीज,वकील-क्लाइन्ट व अन्य रूप में दो परस्पर निरंतर विरोधी हितों में भयानक टकराहट हो ! पूंजीपति वर्ग ही समाज में हावी होता है। यहां समाज , सामाजिक हित नेपथ्य में चला जाता है व्यक्तिगत हित सर्वोपरी हो जाते हैं। यहां पूंजीपति वर्ग कहता है हर व्यक्ति अपने अपने लिए मेहनत करेगा तो समाज भी ऊपर उठ जाएगा, मगर ऐसा होता नहीं, पूंजीपतिवर्ग शेष समाज की तबाही बर्बादी की कीमत पर आगे बढ़ता जाता है ऐसे समाज में त्याग-समर्पण व बलिदान का भाव कहां से आये। जबकि भीषण आपदा व महामारी से निपटने में इन मूल्यों की भी सख्त दरकार होती है। यह पूँजीवाद की सीमा है। यह केवल समाजवाद में ही सम्भव है।
      पूंजीवाद बहुसंख्यक आम नागरिकों को आज के दौर में केवल और केवल तबाही बर्बादी दे सकता है। यह लूट खसोट के जरिये भी होता है यह सामाजिक व्यय में भारी कटौति व टेक्स की बढ़ोत्तरी के जरिये भी होता है तो यह अन्धराष्ट्रवाद व युद्धोन्माद के जरिये भी होता है। इसलिए बेहद जरूरी है कि इसका हर संभव विरोध किया जाय।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...