Tuesday, 29 October 2013

uttarakahnd gov. emp. strike


          राज्य कर्मचारियों की जायज मांगों के संबंध में सरकार अविलम्ब जी.ओ. जारी करे !
साथियो,         
            उत्तराखंड में राज्य कर्मचारियों द्वारा राज्य संयुक्त कर्मचारी परिषद के बैनर तले पिछले कई दिनों से अपनी जायज आर्थिक मांगो के संबंध में संघर्ष चलाया जा रहा है । कर्मचारियों की मुख्य मांगे वेतन विसंगति दूर किए जाने व तीन प्रोन्नति या प्रोन्नत वेतनमान दिये जाने के संबंध में है । इन मांगों के संबंध में इससे पहले भी राज्य कर्मचारी संघर्ष करते रहे हैं लेकिन हर बार शासको का रवैया ऐसा ही रहता है ।  
            इस संघर्ष के प्रति राज्य सरकार का रुख उपेक्षापूर्ण है टालामटोली का है। और कोशिश यही है कि जब तक मजबूरी न बन जाय तब तक इसे लटकाए रखे । और इस स्थिति में भी जब कभी कर्मचारी अपनी हदों को पार करते हैं तो फिर आंदोलन को वापस लेने के लिए उन को `नो वर्क – नो पे या फिर एस्मा जैसा काला कानून लागू करने की धमकी देने से भी कोई गुरेज नही होता है । जबकि यह स्थिति खुद सरकार द्वारा पैदा की गई है जो कि कर्मचारियों के संबंध में 6th वेतनमान  व प्रोन्नति के संबंध में खुद स्वयं द्वारा मान्य नियमों को लागू करने से बचती रहती है । कहा जा रहा है कि इसे लागू करने से खजाने पर 450 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा । और यही तर्क तब दिया गया था जब शिक्षा मित्रों ने अपना मानदेय बढ़ाने के लिए राजधानी में प्रदर्शन किया था । जनता के हर हिस्से के आंदोलन के प्रति सरकार का कम या ज्यादा तीव्रता के साथ यही व्यवहार रहता है ।
            ये अमीर पूंजीवादी राजनेता जो विधान सभाओं व संसद में अपने वेतन व सुविधाएं बढ़ाने वाले बिल को सेकंडों में पारित कर  तत्काल लागू कर देते है जो कि पूंजीपति वर्ग के ईमानदार प्रतिनिधि है इसीलिए लाखों करोड़ की पूंजी के मालिकों की मुनाफे की चिंता में ही डूबे रहते है और खुद को व इन पूँजीपतियों को और मालामाल करने के लिए कौड़ियों के मोल इन्हे जमीन देने, देश के खनिज संसाधनों को इन पर लुटा देने, सस्ती बिजली, सस्ता मजदूर देने तथा ढेर सारी छूटें देने को आकाश पाताल एक कर देती है यदि इन्हे जनता के एक बेहद छोटे हिस्से कि मांग भी खजाने में बोझ लगती है तो समझ में आ जाता है कि एसा क्यों है ।
            क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन राज्य सरकार के इस घटिया व संवेदनहीन व्यवहार की तीखी भर्त्सना करता है और मांग करता है कि सरकार कर्मचारियों की मांगो के संबंध में तत्काल आवश्यक दिशानिर्देश जारी करे ।
            कर्मचारियों की मांगे व संघर्ष जायज है इसमे कोई दो राय नहीं । लेकिन इसके साथ ही यह कहना भी सही होगा कि यह संघर्ष मात्र  आर्थिक हितो या सुविधाओं के लिए चलाया जा रहा सीमित या संकीर्ण संघर्ष भी है यह स्थिति मजदूर-कर्मचारियों व मेहनतकश जनता के समग्र हित में ठीक नहीं है और यह स्थिति चिंताजनक भी है ।
            यह स्थिति चिंताजनक, गंभीर व खतरनाक इसलिए है कि जब पूरे देश में मजदूर-कर्मचारी विरोधी श्रम नीति को लागू करने की दिशा केंद्र व राज्य सरकारें बेहद तेजी से अपना कदम बढ़ा रही हो, `संविदा प्रथा`ठेका प्रथा`आउटसोर्सिंग नीति ज़ोर शोर से आगे बढ़ रही हो,  ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमले किए जा रहे हों , निजीकरण का शोर चारों ओर हो तब इन गंभीर चुनौतियों व हमलों के दौर में कर्मचारियों व कर्मचारी यूनियनों का इन नीतियों के विरोध में व्यापक संघर्ष नही दिखाई देता । आज से लगभग 13 वर्ष पहले विध्युत विभाग के कर्मचारियों का विभाग के  निजीकरण के विरोध में किए गए जुझारू संघर्ष को याद करें तो यह समझ में आ जाएगा ।
            विरोध का यह तीखा स्वर व संघर्ष तब भी नहीं दिखाई देता जब सरकारी विभागों के संविदाकर्मी या ठेकाकर्मी या फिर बेहद कम वेतन ( मानदेय ) पर काम करने वाले कर्मी अपने नियमितीकरण या अन्य मांगों के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं और इनके संघर्ष का दमन किया जाता है ।
            शासकों द्वारा अलग-अलग वक्त में 5th , 6th वेतनमान को लागू किया अब तो 7th वेतनमान की चर्चा आम हो गई है । यह इसलिए लागू नही किया गया कि इन्हें कर्मचारियों की  बहुत चिंता थी । एक सोची समझी रणनीति के तहत यह सब किया गया जो कि जारी है । इन वेतनमानों के जरिये उच्च अधिकारियों का वेतन काफी ज्यादा बढ़ाया गया , कर्मचारियों व इनके वेतन में अंतर को काफी बढ़ाया गया । कर्मचारियों के व्यापक व जुझारू संघर्ष करने की प्रवृति को कुंद कर दिया गया एसा वेतन के जरिये सुविधाभोगी बनाकर किया गया । जनता के व्यापक हिस्से मजदूर मेहनतकश से इसके अलगाव को बेहद बढ़ा दिया गया । एक ओर मुट्ठी भर लोगों की तंख्वाह तुलनात्मक तौर पर काफी बढाई गई तो दूसरी तरफ व्यापक मज़दूर आबादी के जीवन को और मुश्किल हालातों में डाला गया । सरकारी विभागों में नई स्थायी भर्तियों को बंद करके काफी कम वेतन पर संविदाकर्मियों, ठेकाकर्मियों की या मानदेयकर्मियों की भर्ती व या आउटसोर्सिंग की प्रक्रिया की ओर जोर - शोर से बढ़ा गया ।
            बीते वक्त की तरह ही सरकार आन्दोलन को तोड़ने के लिए हर तिकड़में कर रही हैं और अब आंदोलन के प्रति उदासीनता व उपेक्षा बरतकर आंदोलन को लंबा खिचने दे रही है ताकि आंदोलन ठंडा पड़ जाये , मेहनतकश जनता के अन्य हिस्से आवश्यक सेवाए ना मिल पाने की स्थिति में कर्मचारियों को ही दोषी माने व  इसका तिरस्कार करें  जबकि इन सभी स्थितियों के लिए सरकार दोषी है ।
      साथियो ,   इसलिए मौजूदा संघर्ष के फ़लक को बढ़ाने की व  इसे व्यापक लिए जाने की बेहद सख्त जरूरत है । हम सभी अच्छी तरह से जानते है कि देश में पूंजीवादी व्यवस्था है और यहाँ  पूंजीपतियों के हितों को ही देश या राष्ट्र हित के रूप में प्रचारित किया जाता है समग्र देश की आर्थिक राजनीतिक व सामरिक नीतियों का इसी के हितों व मुनाफे  के अनुरूप संचालन किया जाता है । 90 के दशक से पहले भी यही होता था और बाद में भी जब 90 के दशक में पूरे  देश को इनके द्वारा साम्प्रादायिक उन्माद की आग में  झोंका  गया तब नई आर्थिक नीतियों का नारा देते हुए `निजीकरण –उदारीकरण – वैश्वीकरण ` को लागू किया गया । यह सब भी देश की पूंजीपतिवर्ग के संकट को हल करने के किया गया था। तब से बीते दो दशक में सरकार  इन्हे लागू करने की दिशा में  काफी आगे बढ़ चुकी है । यू. पी. ए. 1st या 2nd  मैं शामिल पार्टियाँ हो या एन. डी.ए . में सभी पूँजीपतियों के हित में इन्हे लागू किए जाने की पक्षधर है । 
      अत: इन स्थितियों  में जरूरत है  नए आर्थिक सुधारों के नाम पर लागू किए जा रहे `निजीकरण उदारीकरण ` के विरोध में एक व्यापक जुझारू  संघर्ष  चलाये जाने की । साथ ही साथ भारत सरकार पर साम्राज्यवादी मुल्को से किए गए  समझौते रद्द करने के लिए दबाव बनाने की जरूरत है । अंतिम समाधान तभी संभव है जबकि क्रांतिकारी मजदूर वर्ग के नेतृत्व में समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाया जाय ।आइये मांग करें :
            1:  राज्य कर्मचारियों की मागों पर सरकार तत्काल जी . ओ . जारी करे ।
            2:  विध्युत संविदाकर्मियों समेत सभी संविदाकर्मियों, मानदेयकर्मियों को नियमित करो ।
            3:  मजदूरों के ट्रेड यूनियन अधिकारों का हनन बंद करो ।
            4:  नई आर्थिक नीति रद्द करो ।
            5: साम्राज्यवादी मुल्को से किए गए असम्मानजनक व गैरबराबरीपूर्ण समझौते रद्द करो । 
                                                                                     

                                     





         
  

          

Wednesday, 9 October 2013

semeenar on uttaraakhand disaster

कोटद्वार में उत्तराखंड आपदा पर सेमीनार का आयोजन 

क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन ,परिवर्तनकामी छात्र संगठन ,सुमंगला महासंघ व महिला समाख्या के द्वारा कोटद्वार में 8 अक्तूबर को उत्तराखंड आपदा पर एक सेमीनार का आयोजन किया गया। सेमीनार में शहर के अलग अलग संगठनो की भी भागेदारी रही। 
   पूर्व सैनिक संगठन से गोपाल कृष्ण बर्थवाल , भूत पूर्व डी आई जी बलराम सिंह, वरिष्ठ पत्रकार कमल जोशी,कोटद्वार कॉलेज से डॉ . जे एस नेगी , डॉ ऐ एन सिंह तथा नरेन्द्र सिंह ने किया। 
  महिला समाख्या की ओर से प्रीती थपलियाल ,गीता रावत, किरन रावत आदि ने उत्तराखंड आपदा के कारणों पर व उसके प्रभावों पर बातचीत रखी। 
    सुमंगला महासंघ से अध्यक्षा गंगा देवी ने अपनी बातचीत में राज्य सरकार द्वारा बरती गयी आपदा पर आक्रोश व्यक्त किया। 
  भूतपूर्व डी आई जी बलराम सिंह ने केदारनाथ व रामबाडा मै एक दिन हज़ारो लोगो के इकट्ठे होने को राज्य सरकार की अनियोजन व अनियंत्रित पर्यटन की नीति पर प्रश्न चिन्ह किया। 
  वरिष्ठ पत्रकार कमल जोशी ने कहा कि आपदा के बाद राज्य सरकार व इसके मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा द्वारा बरती गयी घोर संवेदनहीनता व लापरवाही को उजागर किया गया। 
  पूर्व सैनिक संगठन से गोपाल कृष्ण बर्थवाल ने कहा की सेना का इस्तेमाल जिसे कि आपदा से निपटने का प्रशिक्क्षण हासिल है यदि सही ढंग से होता तो लोगो को बचाया जा सकता था। 
  परिवर्तन कामी छात्र संगठन के प्रतिनिधि पंकज ने कहा कि आपदा को प्राकृतिक या दैवीय कहकर सरकार अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रही है।
कार्यक्रम में व्यवस्थापक क्रालोस से मुज़नबीन क़मर ने कहा कि अब सवाल आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोगो का सवाल है उनकी दुशवारियों को हल कैसे किया जाय इस पर सोचने की ज़रुरत है 
  इस बीच `केदार का शोक' जो की उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा निर्मित थी का प्रदर्शन भी किया गया। 
 अंत में क्रालोस के भूपाल ने सेमीनार का सम अप करते हुए कहा कि पूंजीवादी आर्थव्यवस्था अपने मुनाफे की हवस में में प्रकृति का विनाश है उत्तराखंड में भी जिस प्रकार  अनियंत्रित तरीके से अकूत मुनाफे की हवस में अनाप-शनाप तरीके से बांधो सड़कों आदि आदि का निर्माण किया जा रहा है वह इस आपदा का कारण रहा है इस आपदा के लिए पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारें जिम्मेदार है व इसके गुनाहगार हैं। इसलिए तात्कालिक संघर्ष के बतौर राज्य सरकार पर संघर्षों के जरिये दबाव बनाकर राहत व पुनर्वास के कामों में तेजी लानी  को मजबूर करना होगा वही दूसरी ओर समाजवाद व्यवस्था के निर्माण के लिए संघर्ष में लोगो की भागेदारी बनानी होगी। 
    कार्यक्रम में गीत महिला समाख्या के साथियों द्वारा प्रस्तुत किये गए।कार्यक्रम का संचालन महिला समाख्या की गीता बगासी ने किया।  . सेमीनार कार्यक्रम में सुशीला देवी ,शंकुंतला देवी,  भागेश्वरी देवी, सिद्धी देवी , श्याम  सिंह रावत अनिल, नारायण , पारुल, रंजना, सुरेन्द्र  अनवर समेत कई लोगों ने शिरकत की।  

Seminar on uttarakhand disaster

       उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा सेमीनार का आयोजन सम्पन्न

     उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में उत्तराखंड आपदा राहत मंच द्वारा 29 सितंबर 2013  को एक सेमीनार का आयोजन किया गया । इस मंच का गठन 16-17 जून की भीषण आपदा से राज्य के आपदा ग्रस्त पहाड़ी इलाकों में सरकार द्वारा बरती घोर संवेदनहीनता बरती गई गैर जवाबदेही व गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का परिचय दिया गया । इस समय जब आपदा ग्रस्त इलाकों को राहत सामाग्री व स्वास्थ्य सुविधाओ की सख्त जरूरत थी तब शासकों का यह रुख बहुत बेशर्मी भरा था ।
      मंच का गठन इसी दौर में किया गया मंच के नेतृत्व में केदारनाथ के उखीमठ , गुप्तकाशी व कालीमठ क्षेत्रों में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए ।उत्तरकाशी के भी कुछ इलाको में इस दौर में कुछ दिन तक चिकत्सीय सुविधाये आपदा प्रभावित लोगों को देने के प्रयास हुए । गुप्तकाशी व उखीमठ में गोष्ठी भी आयोजित की गई ।
    इसी कड़ी में मंच ने देहरादून में सेमीनार का आयोजन किया । सेमीनार का विषय था `उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान। सेमीनार में मंच के घटक संगठनो के कायकर्ता मौजूद थे। इसके अलावा महिला समाख्या कोटद्वार, अस्तित्व संस्था देहरादून,दिशा सामाजिक संगठन, महिला सुमंगला महासंघ कोटद्वार के प्रतिनिधि , जन कवि अतुल शर्मा, संवेदना से साहित्यकार जीतेन भारती व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी से युद्धवीर त्यागी,  शुक्रवार पत्रिका के दिल्ली से आए पत्रकार स्वतंत्र मिश्र केदारनाथ उखीमठ से संगीता नेगी, अखिलेश व पंकज जबकि रामनगर से गणेश ( ईको सेंसिटिव ज़ोन के मुद्दे पर काम कर रहे ) चेतना सामाजिक संगठन से तिरेपन सिंह चौहान व गोपाल कृष्णन, उत्तराखंड महिला मंच की अध्यक्षा कमला पंत व निर्मला बिष्ट शामिल थे ।
   16-17 जून की आपदा में मारे गए लोगो को श्रद्धाजंली अर्पित करने  के बाद कार्यक्रम की शुरुआत की गई। आपदा राहत मंच के गठन की पृष्ठभूमी पर बात चित करने के बाद उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए चले संघर्ष के गीत `लड़ना है भाई ये तो लंबी लड़ाई है ` गीत की प्रस्तुति की गई । क्रालोस के महासचिव भूपाल ने सेमीनार का संचालन किया ।
    परिवर्तन कामी छात्र संगठन के अध्यक्ष साथी नितिन ने मंच द्वारा प्रस्तुत सेमीनार को आधार बनाते हुए वक्तव्य दिया गया ।  वक्तव्य में चिन्हित किया गया कि राज्य में हुई आपदा की असल वजह अंधाधूध , अनियंत्रित व लागत कम करने के फेर में पिछड़ी तकनीक के प्रयोग से हो रहे बांधो सडको सुरंगो बांधों आदि का निर्माण है । राज्य सरकार की संवेदनहीनता व गैर जिम्मेदाराना रुख के चलते मृतको का आकडा कई गुना बढ़ गया। वक्तव्य में कहा गया कि पूंजीवाद एक ओर अकूत मुनाफे की आंधी हवस में प्रकृति को तबाह करता करता है तो दूसरी ओर `पर्यावरण संरक्षण `का राग आलापता है , यह प्रकृति की तबाही – बरबादी अपनी बारी में आम इंसान के लिए आपदा बन जाती है । इसलिए जरूरी है कि इसे संघर्ष में निशाना बनाया जाये । समाजवादी अर्थव्यवस्था चुकीं निजी मालिकाने व सामाजिक उत्पादन के अंतर्विरोध को खत्म करके सामाजिक  मालिकाने को स्थापित करती है अत: मुनाफे की अंधी हवस के लिए अराजक,अनियंत्रित, अनियोजित उत्पादन व प्रकृति का भयानक दोहन व विनाश की परिस्थितियाँ यहाँ खत्म हो जाती है इस प्रकार समाजवाद अपने नियोजित, नियंत्रित व संतुलित विकास के दम पर प्रकृति व मनुष्य के बीच समांजस्य स्थापित करती है ।
    उखीमठ से आए पंकज व संगीता नेगी ने भीषण आपदा व उसके बाद गाव की स्थिति व महिलाओ की स्थिति को बया किया।
   चेतना सामाजिक संगठन के साथी तिरेपन सिंह चौहान ने विस्तार से उत्तराखंड में प्रकृतिक संसाधनों की लूट जिस प्रकार से देशी- विदेशी पूंजी की गठजोड़ ने मचा रखी है उस पर प्रकाश डाला।
   रामनगर से पहुंचे साथी गणेश ने विधायकों व उच्च अधिकारियों की संवेदनहीनता को तथ्यों के जरिये उजागर किया और ईको सेंसिटिव ज़ोन के संदर्भ में उन्होने कहा कि यह इन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए खतरनाक है ।
   मंच द्वारा एक डॉक्यूमेंटरी पिक्चर भी तैयार की गई थी जीसका शीर्षक था `केदार के शोक । इस पिक्चर का प्रदर्शन लांच के बाद किया गया। डॉक्यूमेंटरी के माध्यम से दिखाया गया कि किस प्रकार सोनप्रयाग से ऊपर बने बांध के निर्माण के लिए कंपनी ने भयानक अनियमितताएँ बरते है वैज्ञानिक मानदंडो व तकनीकी के इस्तेमाल का अनदेखा किया है जो सोनप्रयाग की तबाही का बढ़ा कारण बना । सारकारों के दावो की पोल खोलती स्थिति व 16-17 की आपदा से अपनी जान बचाने के लिए ऊपर पहाड़ों की भाग रहे लोग भूख व लगातार हो रही बारिश में ठंड, व ऑक्सीज़न की कमी के कारण मारे गए ये वह लोग थे जिन्हे यदि उचित समय पर राहत मिल जाती तो बचाया जा सकता था इधर – उधर पड़ी मौत से जद्दोजहद करती अंत में मौत से हारती लाशें शासको की भयानक संवेदनहीनता को दिखा रही थी । साथ ही जिन्हे आर्मी द्वारा बचा लिया गया था वो लोग अब तक अपने परिजनो के पास नही पहुंचे थे डॉक्यूमेंटरी में सरकार के दावों पर प्रश्न चिह्न लगाए गए थे । गाव गाव में मेडिकल कैप के आयोजन के दौरान गाव की स्थितियों को  दिखाय गया व इसके माध्यम से भी सरकारी दावों की पोल खोली गई ।
   इस पिक्चर के बाद फिर नागरिक अखबार के संपादक मुनीष कुमार ने अपने वक्तव्य में पहाड़ो की जटिल व भयावह हो गई  स्थितियो का  जिक्र किया गया।
   शुक्रवार पत्रिका के दिल्ली से आये पत्रकार साथी स्वतंत्र मिश्र ने पूरे देश के स्तर पर चल रहे प्राकृतिक संसाधनो की लूट व इसमे पर्यावरण के विनाश व भोपाल गैस कांड का हवाला देकर बताया कि पूंजीपति वर्ग अपने मुनाफे की अंधी हवस में पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचा रहा है।
     सेमीनार में जन कवि अतुल शर्मा द्वारा कविता पढ़ी गई जिसके बोल थे ` सहमी सी गंगा की धार ,कापे है बद्रि केदार ..... `। इस कविता के जरिये आपदा के बाद की पहाड़ के लोगो की मन:स्थिति को व्यक्त किया गया । साथ ही राहत के नाम पर हो रहे दावों की भी धज्जिया उड़ाई गई।
   इंकलाबी मजदूर केंद्र के महासचिव अमित ने उत्तराखंड के मैदानी इलाको विशेषकर लक्सर हरिद्वार में इस दौरान हुई बरबादी व यहा हो रहे सरकारी दावों की कलई खोली ।
   अगले वक्ता के रूप में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के अध्यक्ष प्रेम प्रसाद आर्या ने कहा कि इंसानियत को प्यार करने वालो के लिए जरूरी है कि वे वक्त को सुनें अब वक्त उनके जीतने का है।
  सेमीनार में दिशा सामाजिक संस्था की जाह्नवी , महिला समाख्या कोटद्वार की दीपा ,अस्तित्व संस्था से दीपा व उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के युद्धवीर त्यागी ने भी सेमीनार में अपने विचार रखे सभी ने उत्तराखंड में हो रहे भयानक लूट व दोहन पर चिंता व्यक्त की।  
           


Thursday, 26 September 2013

            आइये! उत्तराखंड आपदा प्रभावित क्षेत्रो में तबाही झेल रहे लोगों के हक में आवाज उठायें !
साथियो ,
          उत्तराखंड में आई आपदा को लगभग 3 माह गुजर चुके हैं। इन बीते तीन माह ने आम ग्रामीण गरीब नागरिकों के प्रति हमारे शासकों की घोर उपेक्षा, संवेदनहीनता व लापरवाही तथा कुप्रबंधन को खूब उजागर किया है ना केवल राज्य सरकार बल्कि संसाधनों से सम्पन्न केंद्र सरकार व उसके समूचे शासन प्रशासन को भी इस आपदा ने आम जनता के सामने नग्न कर दिया।                      
16-17 जून को रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी समेत पिथौरागढ़ व अन्य इलाकों में आई आपदा से भयानक तबाही- बर्बादी होती है। पर्यटकों व स्थानीय लोगों समेत हजारों  लोग मारे जाते हैं। तब सबसे ज्यादा जरूरत थी तत्काल वहाँ फंसे लोगो को बाहर निकालने की, लोगों तक भोजन –पानी -दवा आदि पहुंचाने की आदि। लेकिन हम सबने देखा कि राज्य का मुखिया आपदा से निपटने में नेतृत्व देने ,आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय दिल्ली पहुंच जाता है। मीडिया में व चौतरफा थू –थू होने पर, व आपदा में हाई प्रोफ़ाइल पर्यटकों के भी फंसे होने के चलते फिर पर्यटकों को बाहर निकालने के प्रबंध केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए गए। जबकि इस वक्त इससे निपटने का काम केवल हर जरूरी संसाधनों से सम्पन्न व प्रशासनिक ताने-बाने वाली ताकत (सरकार) ही कर सकती थी |         
लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हजारों की तादाद में जिन गरीब ग्रामीणों के मकान ,खेत व जानवर खत्म हो जाते हैं तथा  सैकड़ों की संख्या में वे परिवार जिनके घर के पुरुष सदस्य आपदा में मारे जाते हैं उनके लिए सरकारों ने घोषणा बाजी के अलावा क्या किया?  इन लोगो को मेडिकल सुविधाओं व राशन आदि की सख्त जरूरत थी लेकिन सरकारों ने जो दावा करती हैं कि वह जनता के लिए है उन्होंने क्या किया ? कुछ भी नहीं सिवाय कुछ औपचारिकताओं के ,नाम का राहत। और हकीकत यही है कि हालात आज भी बेहद खराब हैं। आखिर सरकारों व उसके प्रशासन की जवाबदेही व ज़िम्मेदारी किसके प्रति है,यह किन लोगों के लिए काम करता  हैं व चिंतित रहता है ?  क्या जनता के लिए ? नहीं; बांधों-टनलों, होटल रिज़ॉर्ट,खनन आदि-आदि के कारोबार में लगे पूंजीपतियों के लिए। और इन्होंने खूब मुनाफा बटोर सकें इसलिए यहां की भौगोलिक बनावट को ध्यान दिये बिना अनियंत्रित व अवैज्ञानिक तरीके से पिछड़ी तकनीक का इस्तेमाल करके अंधाधुध ढंग से भारी तादाद में बांधों -सुरंगो, सड़कों आदि आदि का निर्माण किया।  दूसरी ओर अनियंत्रित पर्यटन बेरोक टोक जारी था।  अत: देर सबेर इस अंधाधुध लूट का 16-17 जून जैसी आपदा के रूप में बिस्फोट होना ही था।  यही स्थिति व सच पूरे देश के संबंध में भी है।  टाटा –बिडला-मित्तल-अंबानी आदि द्वारा देश की संपत्ति संसाधनों की लूट अब किसी से छुपी नही है, हमारे जनप्रतिनिधि होने का दावा करने वाले लोग जो कि संसद या विधान सभाओं में बैठते है तथा पूरा शासन व प्रशासनिक महकमा इन टाटा –अंबानी जैसे  देशी विदेशी पूंजी की सेवा में मुस्तैद रहता है।
  और इसलिए सरकारें, उसके विकास का यह पूंजीवादी माडल और ये पूंजीपति अंतत: यह पूंजीवादी व्यवस्था ही इस आपदा की असल वजह हैं इसके लिए जिम्मेदार हैं जो कि इसे प्राकृतिक या दैवीय आपदा कहकर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।  इसीलिए यह सब भी हुआ व होता है कि आम गरीब जनता के प्रति बेहद लापरवाह, संवेदनहीन व संकल्पहीन दिखने व रहने वाले ये पूंजीवादी शासक केदारनाथ धाम को 11 सितंबर से खोल देने के मामले में पूरे प्रशासनिक अमले के साथ संकल्पबद्ध होकर जुट जाते हैं ऐसा क्यो ?  इसे समझना कठिन नहीं है। जैसे ही इस दौरान केदारनाथ के आस-पास जंगलो में सैकड़ों लाशें मिली जिसकी संख्या और बढ़ती लेकिन इसे रोक दिया गया और इस इलाके में जाने पर रोक लगा दी गई।
   इन स्थितियों में तब यह सवाल पैदा होना लाजिमी है कि तब क्या किया जाय, समस्याओं को हल करने के संबंध में किस रास्ते की ओर बढ़ा जाय।निश्चित तौर पर जो रास्ता है वह एकजुट होकर संघर्ष करने का ही है इसी माह शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है जिनका क्रांतिकारी संघर्ष ना केवल विदेशी लुटेरे (अंग्रेज़ो) के खिलाफ था बल्कि देशी पूंजीपतियों व जमीदारों के खिलाफ भी था और इस संघर्ष के जरिये वह देश में समाजवाद ( मजदूर-मेहनतकश जनता का राज) लाना चाहते थे। तब से आज हालात बहुत बदले हैं आज भगत सिंह की विचारधारा व समाजवाद का उनका लक्ष्य आज बहुत ज्यादा प्रासंगिक हो चुका है इसलिए जरूरत है इस विचारधारा को समझने की व समाजवाद की दिशा में संघर्ष करने की। 
  इसीलिए आपदा में राहत काम व आपदा के असली कारणों को आम जनता तक पहुचाने व अपने हक के लिए आवाज उठाने-संगठित होने के मकसद से ही “उत्तराखंड आपदा राहत मंचका गठन विभिन्न संगठनों व नागरिक अखबार द्वारा किया गया।  मंच के नेतृत्व में उत्तरकाशी में कुछ दिन तो रुद्रप्रयाग के गुप्तकाशी, कालीमठ व ऊखीमठ वाले क्षेत्र में कई दिन तक मेडिकल कैंप लगाए गए।  और अब इसी की अगली कड़ी में मंच द्वारा एक सेमीनार का आयोजन देहरादून में किया जा रहा है।  उम्मीद है आप इस कार्यक्रम में शिरकत करेंगे।    
                         
              कार्यक्रम : :                                                         द्वारा
विषय :--  ‘‘उत्तराखण्ड आपदा से उपजे सवाल व उनका समाधान’’        उत्तराखण्ड आपदा राहत मंच
दिनांक :-  29 सितम्बर (रविवार) 2013,       
समय :-   10:00 प्रातः से  शाम 5 बजे तक।      
स्थान :कालूमल धर्मशाला, राजा रोड़,  प्रिंस चैक (निकट रेलवे स्टेशन), देहरादून।                              
संपर्क न .     8126975771 , 9837205978                        

घटक संगठन :- परिवर्तनकामी छात्र संगठन, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रोग्रेसिव मेडिकोज फोरम,नागरिक (पाक्षिक अखबार), इंकलाबी मजदूर केंद्र, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन,                                                                         
      

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...