Sunday, 27 August 2017

भारतीय राज्य और बाबा राम रहीम



        भारतीय राज्य और बाबा राम रहीम
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पिछले कुछ समय से डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरुमीत उर्फ राम रहीम का मामला सुर्खियों में है। कुछ समय पहले  रामरहीम ने मैसेंजर ऑफ गॉड फ़िल्म भी बनाई थी जिसमें खुद को ईश्वरीय शक्ति के रूप में इसने प्रचारित किया था।  फिलहाल यह सुर्खिया यौन शोषण के मसले पर चल रहे मुकदमे व इसके बाद हुई हिंसा के चलते है। आज से तकरीबन 15 वर्ष पहले दो साध्वीयों ने यौन शोषण का आरोप राम रहीम पर लगाया था । इन लड़कियों ने अटल बिहारी बाजपेई की सरकार तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भेजे गुमनाम पत्र में यह आरोप लगाये थे जिसमें यह भी कहा गया था कि ऐसा कई लड़कियों के साथ राम रहीम ने किया है। 
   पत्र में यह भी लिखा गया था कि सभी राम रहीम की ताकत व पहुंच के साथ ही घर वालों के अंधविश्वास के चलते कुछ न कर पाने को मजबूर हुए व चुप चाप सब कुछ सहते रहे रामरहीम अपनी पहुंच, हथियारों व गुंडों का खौफ इन सभी विरोध करने वालों को दिखाता था ।कुछ ऐसे भी थे जो घर वापस आ गए। इनके इस पत्र  को तब अखबार में छापने वाले पत्रकार की हत्या रामरहीम ने करवा दी। यौन शोषण के इस आरोप के बाद ही हाईकोर्ट के इसे स्वत:संज्ञान लेने से राम रहीम के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था।जिस पर सी बी आई जांच चल रही थी सी बी आई की कोर्ट में ही मामला चल रहा था। इन 15 सालों में राम रहीम ने अपनी दौलत, हैसियत एवं ताकत कई गुना इजाफा कर लिया था।         
         धार्मिक गतिविधियों के जरिये ,लोगों के अंधविश्वास व धार्मिक पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल करके व लोगों के बीच कुछ राहत के काम करते हुए इसने अपने नेटवर्क को मजबूत किया । एक साम्राज्य खड़ा कर लिया। जिसके चलते लाखों की तादाद में लोग इसके अनुयायी बने थे। राजनीतिक पार्टियों से इसके गहरे संबंध रहे हैं  विशेषकर भाजपा से । 7 अक्टूबर 2014 को विधायक के लिए खड़े भाजपा के 44 उम्मीदवारों की बैठक रामरहीम के साथ सिरसा में होती है जिसमें कैलाश विजयवर्गीय भी शामिल थे। एक बैठक अमित शाह के साथ भी हुई थी तभी पिछ्ले विधान सभा चुनाव में रामरहीम ने खुलकर भाजपा का समर्थन दिया था।
 25 अगस्त पंचकुला की सी बी आई कोर्ट में राम रहीम की पेशी थी। हरियाणा की खट्टर सरकार ने 700 एकड़ के भब्य  क्षेत्र में रह रहे यौन शोषण के आरोपी राम रहीम से गुजारिश की कि वह पेशी पर जाए। राम रहीम ने अपने हवाई जहाज से कोर्ट जाने की बात की । लेकिन फिर फ़ासीवादी खट्टर सरकार ने जैसे तैसे गाड़ी से कोर्ट जाने के लिए बाबा को मनाया।अंततः 400-800 गाड़ियों का काफिला कोर्ट की ओर रवाना हुआ था भाजपा सरकार ने ऐसा करने की प्रशासनिक अनुमति भी दी । 
     इस बात की संभावना दिखने लगी थी की कोर्ट में फैसला पक्ष में न आने पर बाबा के लम्पट समर्थक विरोध या हिंसा कर सकते है। लेकिन भाजपा सरकार ने इन लाखों समर्थकों को रोकने के लिए व उनको एकजुट न होने देने के कोई विशेष प्रयास नहीं किये। धारा 144 लागू की तो वह भी केवल नाम के लिए। अंततः:कोर्ट के आदेश के बाद ही हरियाणा की भाजपा सरकार ने अर्धसैनिक बलों को बुलाया। लेकिन तब भी कोई सख्ती नही की गई। परिणाम फिर वही हुआ जैसा होने की संभावना जताई गई थी। जैसे ही कोर्ट ने धूर्त ,लम्पट व अपराधी राम रहिंम को यौन शोषण के दोषी होने का फ़ैसला सुनाया वैसे ही बाबा के लम्पट समर्थकों का तांडव शुरू हो गया। लगभग 32 लोगों की  26 अगस्त तक मौत हो गई। जबकि 250 से ज्यादा लोग घायल हो गए ।
       इसके अलावा बसों, गाड़ियों, व रेलों में आगजनी व तोड़ फोड़ की गई। अब एक ओर 5 राज्यों में अलर्ट जारी किया गया है जबकि कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है इंटरनेट पर रोक लगा दी गई है। 
एक ओर हिंसा व इसमें मारे जाते लोग तो दूसरी ओर खट्टर सरकार से लेकर केंद्र की मोदी सरकार का सुर अपराधी रामरहीम के प्रति बहुत नरम है। "भारत का नक्शा मिटा देंगे" नारे लगाने वालों के खिलाफ आज फासिस्ट संघी राष्ट्रवादियों की जुबान को आज लकवा मार गया है। मोदी "शांति" संदेश के लिए ट्वीट कर रहे है। साक्षी महाराज कोर्ट को डरा रहे है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधाओं के हिसाब से जो कोई भी अपराधी रामरहीम व उसके लम्पट दस्ते की आलोचना कर रहे है वह भारतीय संस्कृति को बदनाम कर रहे है। कुल मिलाकर फासिस्टों ने ख़ुद को बेनकाब करने के साथ साथ अपनी पक्षधरता भी साफ कर दी है। वह यह कि वह महिलाओं के खिलाफ अपराध को अंजाम देने वाले लम्पट व धूर्त संतो के साथ है जैसा कि अतीत में वे बलात्कार के आरोपी स्वामी नित्यानंद के साथ खड़े थे । 
दरअसल रामरहीम , आशाराम, नित्यानाद, स्वामी ओम, रजनीश, निर्मल बाबा  आदि आदि इसकी फेहरिश्त लंबी है इन सभी को राजनीतिक पार्टियों का भी संरक्षण प्राप्त रहता है। कोंग्रेस के साथ चंद्रास्वामी का नाम भी चिपका हुआ था। प्रधानमंत्री से चंद्रास्वामी के सीधे संबध थे। दूसरे रूप में कहा जाय तो यह कि भारतीय राज्य अपनी जहनियत में कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं रहा है।  शासकों ने शुरू से ही अपने फ़ायदे में धर्म को अपनी गोद में पाला पोसा है इसे संरक्षण प्रदान किया है।
 इसने धर्म, धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित करने , सार्वजनिक जीवन में इसके दखल को खत्म करने तथा इसे निजी जीवन तक सीमित करने  के कोई भी कदम कभी नहीं उठाए। धर्म को राज्य के मामले में राजनीति में लाने पर रोक नहीं लगाई । इसके उलट इन दोनों का साथ शुरू से ही बना रहा।  पूंजीवादी राजनीतिज्ञ धर्म, धार्मिक त्योहारों कार्यक्रमों व संस्थाओं में आते जाते रहे व इसका इस्तेमाल करते रहे। इसी का नतीजा आज एक ओर रामरहीम के रूप में दिखाई देता है जो अपने लम्पट दस्तों के जरिये राज्य के कानूनों को चुनौति देने लगता है व खुद को राज्य आए ऊपर समझने का भरम पाल बैठता है । तो दूसरी तरफ फासिस्ट संघ परिवार है भाजपा जैसे है जिन्होंने साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण के जरिए अपना प्रसार किया है और मौजूदा वक्त में इसे एकाधिकारी पूंजी ने सत्ता पर बिठाया है। इनकी ताकत राम रहीम जैसे जिनके लाखों अनुयायी हो से काफी बढ़ जाती है। इन दोनों की पैदा होने की जमीन एक ही है।







Tuesday, 15 August 2017

बच्चों की हत्यारी योगी सरकार

बच्चों की मौत की जिम्मेदार भाजपा सरकार शर्म करो !
                       मुख्य मंत्री इस्तीफा दो !

          ये वक्त बहुत त्रासदी पूर्ण है दुखदायी है। एक तरफ धूर्त शासक आज़ादी का जश्न मनाने में मशगूल है और दूसरी तरफ गम शोक में डूबे हुए लोग हैं परिवार हैं जिनके देखते सुनते 63 मासूम बच्चों की अस्पताल में मौत हो चुकी है। इन बच्चों की मौत पर योगी व योगी सरकार को कोई अफसोस नही, दुख नहीं।  प्रधानमंत्री जी के लिए यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं जिस पर ट्वीट करते। अडानी को 6000 करोड़ रुपये दिलवाने वाले , व अम्बानी के 'जिओ' के लिए सरकार की साख बेचने वाले इस मुद्दे पर खामोश है।
 सत्ता पर बैठी योगी-मोदी सरकार की संवेदनहीनता व बेशर्मी शीर्ष पर है। लेकिन ये तथ्य इन्हें कठघरे में खड़ा करने को पर्याप्त है कि प्राइवेट फर्म को ऑक्सिजन के लिए 70 लाख रुपये के भुगतान में देरी की असल वजह मुख्यमंत्री की बैठक थी। इसलिए इन मौतों के लिए साफ तौर पर योगी सरकार जिम्मेदार है। ये हत्याएं है जिसके जिम्मेदार योगी व उनकी सरकार है।
     मुख्य मंत्री योगी इस क्षेत्र से 5 बार सांसद रह चुके हैं। खुद संसद में इस मुद्दे पर उन्होंने पहले हंगामे किये है। "माँ गंगा ने बुलाया है" कहने वाले मोदी जी भी इस मर्ज को जानते रहे होंगे। इसलिए भी कि जापानी इन्सिफैलाइटिस कोई आज की बीमारी नही है। पिछले 20-30 सालों से पूर्वी उत्तर प्रदेश में गरीब मेहनतकश परिवारों से उनके बच्चे छीनती रही है।
      तब सवाल बनता है कि पिछले तीन सालों में मोदी सरकार ने इस 'बीमारी' को जड़ से खत्म करने को क्या विशेष योजना बनायी ? कितने करोड़ का बजट इस बीमारी पर शोध व इलाज के लिए रखा गया ? कितने डॉक्टर, नर्स , दवाओं आदि की व्यवस्था इस बीमारी के लिए की गई ? आदि आदि। जवाब मिलेगा कुछ नहीं। और फिर पिछले 4-5 माह में योगी सरकार ने क्या क्या किया ? यदि कुछ हुआ भी है तो बेहद मामूली है।       
 यही सवाल सपा, कांग्रेस, बसपा से भी है कि जब इनकी सरकार थी तब इन्होंने क्या क्या किया? इन सभी का काम है बस जब विपक्ष में रहो ; हंगामा खड़ा करो; वोट की फसल तैयार करो। और फिर जब जीत जाओ तो पूंजीपतियों को मालामाल करने वाली नीतियों को लागू करो , खुद भी मालामाल होओ। जैसा कि योगी जी व मोदी जी की अगुवाई में बी जे पी कर रही है। 
       देश भर में 'सार्वजनिक स्वास्थ्य' के हालात बेहद बदहाल हैं । कुल बजट का मात्र लगभग 1 % हिस्सा ही स्वास्थ्य पर खर्च होता है जबकि दुनिया का औसत लगभग 6 % है।'शिशु मृत्यु दर' 'मातृत्व मृत्यु दर' व 'बाल कुपोषण' देश में अभी भी बहुत ज्यादा है। इन मामलों में देश दुनिया के कई गरीब व कमजोर देशों से भी पीछे है। लेकिन हमारे शासकों का मुख्य एजेंडा सार्वजनिक जन स्वास्थ्य नही बल्कि "रक्षा" है, 'रक्षा' के नाम हथियारों को खरीदना है। स्वास्थ्य इनके लिए मुद्दा हो भी क्यों? इनके लिए तो अत्याधुनिक अस्पताल है ही, ये कम पड़े तो अमेरिका या यूरोप चले जाओ। बाजपेयी गए थे न घुटना बनवाने विदेश, सोनिया भी गयी थी। इसीलिए 'देशभक्ति का लाइसेंस बांटने' वाली मोदी-योगी सरकार का भी रक्षा बजट तो ढाई लाख करोड़ रुपये है लेकिन स्वास्थ्य बजट मात्र 48 हज़ार करोड़ रुपये का। यही शासकों की जरूरत है। पूंजीवादी दुनिया में यही होता है। पूंजीवादी समाज में पूंजीवादी शासकों के हित, इच्छा आकांक्षा ही सर्वोपरी होती है मेहनतकश नागरिक तो इसके मातहत ही होते है। पूंजी बढ़ते रहे, मुनाफा बढ़ते रहे किसी भी कीमत पर ! यही इस सिस्टम का मंत्र है। मासूम बच्चे मरें चाहे दंगो में हजारों मारे जाएं या लाखों मरवा दिए जाएं हुक्मरानों को क्या फर्क पड़ता है ।
      इसीलिए अब सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली जो थोड़ा बहुत है भी उसे भी सरकार खत्म करने पर तुली हुई है इनका नारा है  स्वास्थ्य पी पी पी मोड के हवाले कर दो, प्राइवेट कर दो , स्वास्थ्य बीमा(इन्सुरेंस) करवाओ। और सब प्राइवेट खुले नर्सिंग होम के हवाले छोड़ दो। 
            इसलिए आज जरूरत है एकजुट होने की,  एकजुट होकर संघर्ष करने की, सरकार-शासकों को इस बात के लिए मजबूर कर देने के लिए कि देश के हर नागरिक को निःशुल्क व बेहतरीन चिकित्सा दी जाय। साथ ही साथ इस पूंजीवादी सिस्टम के खिलाफ भी खड़े होने की जरूरत है और एक नए समाज 'समाजवाद' लाने की  जिसके लिये शहीद भगत सिंह ने खुद को बलिदान कर दिया था।
   

Friday, 11 August 2017

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार

आपदा, आपदा पीड़ित व संघी सरकार 
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      साल 2013 में उत्तराखंड में 16-17जून को भारी तबाही आई थी। उस वक्त विजय बहुगुणा की अगुवाई में कोंग्रेस की सरकार थी। तब गुजरात के मुख्य मंत्री जो कि अब भारत के प्रधानमंत्री है यंहा उड़न खटोले से चक्कर लगा रहे थे वे बड़े बड़े दावे कर रहे थे "शिकार' को फंसाने के लिए वायदे भी कर रहे थे। 
        साल 2017 तक आते आते अब जबकि उत्तराखंड में बिग बहुमत वाली संघी सरकार सत्ता में है संघी छत्र छाया में पला बढ़ा "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" शख्स मुख्य मंत्री है। तब राजधानी से मात्र 150 किमी की दूर कोटद्वार में भारी बारिश हुई बादल फटे और नाले (रौखड़) में आई बाढ़ से जो तबाही हुई उससे निपटने के तौर तरीकों ने संघी सरकार की "संवेदनशीलता" "सुसंस्कृति" की पोल खोल दी  । इस क्षेत्र के वर्तमान विधायक जो कि 2013 में कॉंग्रेस मंत्री के बतौर  'आपदा टूरिज़्म' मना रहे थे अब "शुद्धिकृत" होकर संघी सरकार के मंत्री के रूप में अपनी 'दबंग' स्टाइल में आपदा पीड़ितों को राहत देकर आहत कर रहे थे।
          यही वजह है कि कोटद्वार में 4-5 अगस्त को जो तबाही हुई थी तब से अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं। मुख्य सड़को व 4-5 क्षेत्रों में लोगों के गलियों,  दुकानों में गाद अभी भी है। सीवेज लीकेज के चलते मोहलले में सांस लेना मुश्किल हो रहा है। लोगों के घरों में रखा हज़ारो का सामान बर्बाद हो गया । खाने पीने का सामान भी खराब हुआ है। बिमारियों के होने व फैलने की काफी संभावना है। कुलमिलाकर लगभग 100-120 परिवार को ज्यादा नुकसान हुआ है और इनमें से तकरीबन 50 परिवार गुरुद्वारा राहत कैम्प में है। इसके अलावा लगभग 100 से ज्यादा परिवार एसे हैं जिन्हें कम नुकसान हुआ है। लगभग 6 लोगों के मरने की खबर हैं लेकिन मुआवजा केवल 2 परिवारों को 4-4 लाख का मिला। कुछ लोगों के मिसिंग होने की भी खबर है । 2 लोगों का शव अभी फिर मलवे में बरामद हुए हैं। 
     वैसे भी शासकों के लिए आपदा या तो "मानव जनित" होती या फिर "प्राकृतिक या दैवीय आपदा" । इन शब्दावलियों का जाल बुनकर ये अपने कुकर्मों को ढक लेते है। यह नही बताते कि उनके अनियोजित व अनियंत्रित विकास के मॉडल के चलते एक छोटी सी प्राकृतिक घटना मेहनतकश व गरीब लोगो के लिए बड़ी 'आपदा' में बदल जाती है। जिसमें सैकड़ो घर तबाह बर्बाद हो जाते हैं।
         संघी सरकार को "दैवीय" शब्द से बहुत प्यार है। तब संघी सरकार व उसके "सुसंस्कृत -सभ्य-संवेदनशील" मुख्य मंत्री ने ऐसे मौके पर क्या किया ? आपदा पीड़ितों से मिलने व सभी क्षेत्रों में जाने की जगह एक जगह गए और 3800 रुपये का चेक पकड़ाकर फ़ोटो खिंचवाकर चलते बने। 185 परिवारों को चेक देने की बात की जा रही है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। एक जगह 12-15 परिवारों को 3800 रुपये चेक देने की बात लोगों ने बताई। साथ ही संयुक्त परिवार को चेक दिया गया। 
            हज़ारो व लाख रुपये के नुकसान झेल रहे कुछ लोगों ने चेक गुस्से में वापस भी लौटाए। आपदा पीड़ित सवाल उठा रहे हैं कि हम इस चेक को भुनाने जाए या फिर अपने घरों की सफाई करें और उन्हें रहने लायक बनाएं। लेकिन जवाब कौन दे ? संघीयों को व उसकी सरकार को वैसे भी सवाल करने व तर्क करने वालों से घोर नफरत जो है। इसका असर नीचे तक है।
            इनके चमचों व दलाल छुटभैयों का हाल भी कम घृणा भरा नहीं है। आपदा पीड़ितों के दर्द को साझा करने उन्हें राहत देने की जगह ये थप्पड़ जड़ देते हैं या गिरहबान पकड़ लेते हैं। दो जगह ऐसे मामले हुए जिसमें आपदा पीड़ित ने सरकार के रुख पर शंका की व सवाल खड़े किए तो एक महाशय ने आपदा पीड़ित को सबके सामने थप्पड़ मार दिया तो दूसरे ने 'दबंग' जनप्रतिनिधि के सामने ही चमचागिरी दिखाते हुए एक आपदा पीड़ित का गिरहबान पकड़ लिया। 
            यही नहीं यह भी बातें सामने आ रही हैं कि बाजार के केंद्र में स्थित रिफ्यूजी कॉलोनी पर इनकी गिद्ध नज़र लगी हुई है यह आपदा में सबसे ज्यादा बर्बाद है। यंहा लगभग 50 परिवार रहते है अब ये राहत शिविरों में है। ये आज़ादी के वक्त में सरकार द्वारा विस्थापन के चलते यंहा बसाए गए थे। अब सुरक्षा के नाम पर इन्हें इस जगह को छोड़ने के लिए "प्रेरित" किया जा रहा है 5000 रुपये मासिक किराए के रूप में दिए जाने के वायदे हो रहे है। जब लोगों ने इससे इंकार कर दिया तो उनसे राहत कैम्प से चले जाने के लिए के कह दिया। अब ये अपने समुदाय के गुरुद्वारा में रह रहे हैं।
              इन्ही स्थितियों में एक क्षेत्र काशीरामपुर मल्ला के लोगों ने क्रालोस की अगुवाई में तहसील में प्रदर्शन किया एक ज्ञापन मुख्य मंत्री के लिए प्रेषित किया गया जबकि दूसरा ज्ञापन एस डी एम को दिया गया। जिसका असर भी देखने को मिला तुरंत ही शाम तक जे सी बी पहुंच गई व फिर धीरे धीरे सफाई व ब्लीचिंग पावडर का छिड़काव भी हुआ। इसी के साथ अब अन्य लोगों ने भी प्रदर्शन किए है। दबाव में वे किरकिरी होने पर सरकार के एक दो मंत्रियों के भी चक्कर यंहा लगे है। जिसमें उन्होंने 3800 रुपये के चेक पर सफाई देते हुए कहा है कि यह तो प्राथमिक तौर पर राहत दी गई थी बाद में फिर राहत राशि दी जाएगी। लेकिन कुल मिलाकर संघी सरकार को आपदा ने आपदा पीड़ित ही नहीं अन्य लोगों के बीच भी नंगा कर दिया।

Sunday, 9 July 2017

हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न



हत्याओंं के दौर में "राष्ट्रवादियों" का जश्न 

   पिछले तीन सालों में मेहनतकश अल्पसंख्यकों व दलितों पर हमले काफी बढ़ चुके है। आम तौर पर ये हमले गौरक्षक दस्तों द्वारा किये गए है। इनमें हत्याएं भी की गई है। दूसरी ओर गुजरात ऊना के बाद जुनैद व झा-खण्ड में अल्पसंख्यकों की हत्या के मौके पर "ह-त्यारी चुप्पी" को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री महोदय फिर उपदेशात्मक मुद्रा में आये । फासिस्ट हत्यारो को फिर से एक बार उपदेश उन्होंने दिया। इन्हें "भीड़ द्वारा हत्याओं" के रूप में प्रचारित कर फास्सिट अपनी ताकत में इजाफा करते जा रहे है। 
     जब दौर ऐसा हो तब ऐसे शोक संतप्त दहशत भरे माहौल में "जी एस टी" लागू करने की रात को ऐतिहासिक पल बताकर "जश्न" मनाया जाता है। "एक देश-एक कर- एक बाजार" के नारे के साथ एक केंद्रीकृत कर प्रणाली को यूं इस तरह पेश किया जाता है कि मानो मज़दूर मेहनतकश अवाम की जिंदगी में आमूल चूल बदलाव आ जाये। हकीकत यही है कि हर बार की ही तरह यह मज़दूर मेहनतकश अवाम को और ज्यादा निचोड़ने का यंत्र है। प्रत्यक्ष करो की प्रणाली को बढ़ाने की बजाय जो कि व्यक्ति विशेष को प्रभावित करते है इसे और कमजोर कर दिया गया है। इसके बजाय अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को और मजबूत व व्यापक कर दिया गया है जो अपने दायरे मज़दूर मेहनतकश अवाम को समेट लेता है। इसके लिए महंगाई बढ़नी ही है। छोटी पूंजी की तबाही को बढ़ाएगा।   
        अव्वल तो यह कोई यह नहीं पूछ रहा कि जिस जी एस टी को अब ऐतिहासिक करार दिया जा रहा है तब 2012 में क्यों इतना हंगामा इसके विरोध में मोदी - भाजपा ने बरपा था। एकाधिकारी पूंजी की सेवक नरम हिदुत्व वाली कोंग्रेस बेचारी यह क्रेडिट लेने से वंचित रह गयी। उसे इसी का अफसोस है ! वरना तो दोनों में इसे लागू करने के मामले में अभूतपूर्व एकता है। "राष्ट्रवादियों " का यह जश्न खुद इनके अपने लिए साथ ही देश के पूंजीपति वर्ग के लिए है या यूं कहें कि जश्न मनाने का समय यह यदि किसी के लिए है वो पहले सरकार और दूसरे जो असल में सरकार बनाते हैं और सरकारें जिनके लिए काम करती हैं यानी पूंजीपति वर्ग और उसमें भी अंबानी-अदानी टाइप के पूंजीपतियों को जश्न मनाना ही चाहिए। सरकार की कर राजस्व से आय बढ़ेगी तो वह उसे पूंजीपतियों पर ही लुटायेगी।
       यही नही इस " एक देश एक कर एक बाजार" के नारे के साथ शासकों ने राज्य सरकारों के अधिकार को और कमजोर कर दिया। अब राज्यों की निर्भरता केंद्र पर और ज्यादा बढ़ जाएगी। और शासकों की यह सोच या दावा कि इससे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, संदिग्ध है। नोट बंदी की मार से अर्थव्यवस्था अभी उभरी नही है। आयात निर्यात दोनों ही स्तरों पर संकट मौजूद है। आंतरिक मांग बढ़ने के कोई आसार नहीं हैं। इस सबके बावजूद देश के बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे की दर को और गिरने से रोकने और सरकार के कर राजस्व को बढ़ाने में यह कर सुधार तात्कालिक तौर पर एक हद तक कामयाब होगा। जंहा तक देश की एकता का सवाल है । देश को एकीकृत बाजार से देखने वाले शासक पूंजीपति वर्ग व उसकी पार्टियों का मतलब यही एकता यानी एक बाज़ार है । जबकि वास्तविकता में 'एकता' तभी संभव है जब कि आत्मनिर्णय के अधिकार के तहत समाजवादी राज्य बने।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम

  अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजरायली विस्तारवाद तथा ईरान पर थोपा युद्द और युद्धविराम        अंततः अमेरिकी साम्राज्यवादियों को फिलहाल पीछे हटना ...